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राममंदिर : श्रीरंगनाथ स्वामी मंदिर से कावेरी नदी का पवित्र जल क्यों मंगवाया गया?

श्रीरंगम, श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर, इस्लामी
            श्रीरंगम के श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर  (फोटो साभार: TOI)
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए हुए भूमिपूजन के साथ ही इसके लिए दशकों से चल रहा आंदोलन समाप्त हो गया है। राम मंदिर भूमिपूजन की खासियत ये रही कि यहाँ देश भर के कई पवित्र हिन्दू तीर्थों से मिट्टी और जल लाया गया – कन्याकुमारी से तीनों समुद्रों के संगम का जल, रामेश्वरम की मिट्टी, POK में स्थित शरद पीठ की मिट्टी और कई अन्य स्थलों से भी चीजें आईं।
यहाँ इस्लामी आक्रांताओं ने कभी तबाही मचाई थी?
क्या आप जानते हैं कि आखिर इन सब स्थलों का जल एवं मिट्टी क्यों मंगवाई गयी? इसका मूल कारण है, ताकि जनता उन धार्मिक तीर्थों की महानता को स्मरण कर सकें कि किस तरह मुग़ल आतताइयों से इन धार्मिक स्थलों की रक्षा की गयी थी। जिसे छद्दम इतिहासकारों ने चंद चांदी के टुकड़ों की खातिर अपने जमीर को बेच भारत के वास्तविक इतिहास को छुपा कर मुगलों के खूनी इतिहास पर पर्दा डाल उन्हें महान बताकर झूठा इतिहास पढ़ने के विवश किया गया। अयोध्या में राममंदिर का इस कारण भी कट्टरपंथियों और छद्दम धर्म-निरपेक्षों द्वारा विरोध किया जा रहा है। यह जल और मिट्टी केवल नींव में ही नहीं दबी, बल्कि उसके फलीफुत होने पर जो वास्तविक इतिहास की फुलवारी निकलेगी, उससे इन सबको भय सता रहा है।   
श्रीरंगम(श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर) से कावेरी नदी का पवित्र जल भी ले जाया गया
श्रीरंगम की मिट्टी का वहाँ जाना बहुत बड़ी बात है क्योंकि ये वैष्णवजनों के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। वैष्णव, यानी भगवान विष्णु की उपासना करने वाले हिन्दू। भगवान राम विष्णु के 7वें अवतार हैं। इस पृथ्वी पर 106 वैष्णव दिव्य देशम हैं और श्रीरंगम का श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर उनमें से सबसे पुराना माना जाता है। 12 अलवरों की कृति ‘नलाईरा दिव्य प्रबंधम’ में इन सबका जिक्र मिलता है। ये फिलहाल दुनिया का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर है, जो अभी सक्रिय है।

इस मंदिर के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को ‘कोविल ओलुगू’ में दर्ज किया गया है। कोविल ओलुगू में इस मंदिर के इतिहास का पूरा विवरण है। काफी बड़ी अवधि में इसका विस्तार किया गया है – चोला साम्राज्य के दौरान इसके इतिहास से लेकर 18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा इस पर कब्जा किए जाने तक। ये तमिल के मणिप्रवला लिपि में लिखित है। इसे श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर के इतिहास का सबसे पुष्ट स्रोत माना जाता है।
जिस मंदिर का इतना बड़ा इतिहास डॉक्यूमेंट कर के रखा गया हो, आश्चर्य की बात है कि आजकल के किसी भी इतिहासकार ने दिल्ली सल्तनत के दौरान मंदिर पर हुए हमलों को लेकर कुछ नहीं लिखा है और न ही इसका ठीक तरह से अध्ययन किया गया। चोला और पाण्ड्या साम्राज्य के समय श्रीरंगम का श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर पूरी दुनिया के वैष्णव भक्तों का सबसे बड़ा स्थल था। उस समय युद्ध और अनिश्चितता का दौर आता-जाता रहता था लेकिन जो भी सत्ता में रहा, उसने मंदिर के प्रबंधन का अच्छी तरह ध्यान रखा।
श्रीरंगन के श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर पर पहला इस्लामिक हमला 
उस समय युद्ध और तनावों के बावजूद किसी ने भी श्रीरंगम को नुकसान नहीं पहुँचाया और न ही इसकी प्रतिष्ठा में कोई कमी आने दी। लेकिन, सन 1310 में मलवेरमान कुलशेखरम पाण्ड्या की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके बेटों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया। लेकिन, उन्हें ये पता होना चाहिए था कि उसी समय दिल्ली सल्तनत की फौजें दक्षिण भारत पर चढ़ाई करने बढ़ रही थी।
मलिक कफूर, जो अलाउद्दीन खिलजी का सबसे प्रमुख दास फौज कमांडर था, 1311 में उसने काकतिया, यादव और होयसाला साम्राज्यों को अपने आधीन कर के उन्हें दिल्ली सल्तनत के अंदर आने के लिए मजबूर कर दिया। इसके बाद उसकी नजर पाण्ड्या साम्राज्य की ओर पड़ी, जिसे आमिर खुसरो ने बार-बार मालाबार कह कर संबोधित किया है। यहाँ के धन-वैभव से दिल्ली सल्तनत की जीभ लपलपाने लगी।
आखिरकार मार्च 1311 में मलिक कफूर की फौज ने पाण्ड्या साम्राज्य में घुसने में कामयाबी पाई और कुलशेखरा पाण्ड्या के बेटे वीर पाण्ड्या को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया। वो लोग थोप्पूर से होकर वहाँ घुसे थे। हालाँकि, वो ऐसा करने में असफल रहे और उन्होंने गुस्से में चिदंबरम मंदिर को निशाना बनाया और फिर श्रीरंगम की ओर बढ़ गए। वो श्रीरंगम में उत्तरी छोर से घुसे थे। श्रीरंगम उस समय अपने धन-वैभव के लिए भी प्रसिद्ध था।
वहाँ घुसते ही मलिक कफूर की फौज ने वैष्णव संतों के साथ अत्याचार शुरू किया और उन्हें आसानी से हरा दिया। इसके बाद मंदिर में तोड़-फोड़ शुरू हुई और खजाना लूट लिया गया। मंदिर से कई बहुमूल्य चीजें चोरी कर ली गईं। इसके बाद मई 1311 में वो वापस दिल्ली की तरफ कूच करने लगा। हालाँकि, पाण्ड्या के सत्ताधीशों ने अगले एक दशक में श्रीरंगम और श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर का पुराना धन-वैभव वापस लाने में कामयाबी पाई।
दूसरा हमला : 12000 हिन्दुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी और भगवान 48 वर्षों तक इधर-उधर भटकते रहे 
1320 में पंजाब के गवर्नर गाजी मलिक की मदद से राज्य के वफ़ादारों ने ही खिलजियों को सत्ता से उखाड़ फेंका। भारतीय-तुर्की दासों के वंशज मलिक ने इसके बाद गियाशुद्दीन तुगलक के नाम से गद्दी पर बैठ कर तुगलक वंश की स्थापना की। खिजलियों के अंतर्गत डेक्कन में कुछ राज्य थे लेकिन तुगलक ने उन पर सम्पूर्ण रूप से कब्ज़ा करने का मन बनाया। वो वहाँ पूर्ण फौजी नियंत्रण चाहता था।
उसने 1321 में एक बहुत ही विशाल फ़ौज भेजी, ताकि पूरी दक्षिण भारत पर कब्ज़ा कर सके। इस फ़ौज का नेतृत्व उसका सबसे बड़ा बेटा उलुग खान कर रहा था, जो बाद में मोहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। हालाँकि, 1321 में उसका ये सपना ध्वस्त हो गया क्योंकि तुगलकों की फ़ौज को वारंगल में बुरी हार मिली। इसके बाद भी 2 साल बाद उसने वारंगल फतह कर के मालाबार की और कूच किया।
तमिलनाडु को ही तब मालाबार के नाम से जाना जाता था। पहले तो उसने तोडाइमंडलम पर कब्ज़ा किया और उसके बाद वो श्रीरंगम की ओर बढ़ा। यह एक ऐसा आक्रमण था, जिसकी चर्चा वैष्णव जगत के कई साहित्यों में होती है। श्रीरंगम के श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर में उलुग खान द्वारा मचाई गई तबाही का जिक्र गुरूपरम्पराई, प्रपन्नमित्रं और कोविल ओलुगू में विस्तृत रूप से मिलती है। ये सभी आक्रमण की अवधि 1323 ही बताते हैं।
जब उलुग खान की फौज श्रीरंगम पहुँची, तब वहाँ मंदिरों में एक मेला और त्योहार चल रहा था। श्रीरंगनाथस्वामी की प्रतिमा (उरचवार आझागिया मानवला पेरूमाल) को मुख्य मंदिर से कावेरी नदी के तट पर स्थित एक मंदिर में ले जाया जा रहा था। 12000 वैष्णव भक्त इस यात्रा में शामिल थे। जैसे ही वहाँ इस्लामी फौज के आने की खबर फैली, श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर के मुख्य पुजारी श्रीरंगराजनाथम वदुलदेशिका ने यात्रा को समाप्त कर दिया।
उन्होंने प्रतिमा को मंदिर के धन के साथ दक्षिण की तरफ भेज दिया। इसके बाद जैसे ही उलुग खान वहाँ पहुँचा, वो मूर्ति को न पाकर पागल हो गया और उसने 12,000 वैष्णव भक्तों का सिर कलम करने का आदेश जारी कर दिया। इसे कोविल उलुगू में एक ऐसे आक्रमण के रूप में बताया गया है, जिसने 12,000 सिर का बलिदान ले लिया। इस्लामी आक्रान्ताओं से बचने के लिए श्रीरंगनाथस्वामी की प्रतिमा मंदिर-मंदिर घूमती रही।
अंत में वो प्रतिमा तिरुमल पहुँची, जहाँ उसे कोई खतरा नहीं था और वहाँ वो सुरक्षित थी। इस्लामी आक्रान्ताओं से बचने के लिए प्रतिमा को 48 वर्ष अपने मंदिर से बाहर बिताने पड़े। इसके बाद 1371 में विजयनगर साम्राज्य ने इस्लामी आक्रान्ताओं के मंसूबों को ध्वस्त कर श्रीरंगम के श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर में प्रतिमा को पुनः स्थापित किया। दूसरा वाला आक्रमण भयंकर इसलिए थे क्योंकि तुगलकों ने दिल्ली से मलाबार पर नियंत्रण कर लिया था।
एक दशक तक वो ऐसे ही राज करते रहे। इसे वैष्णव इतिहास का सबसे अँधकार भरा युग माना जाता है। इस्लामी आक्रांता उलुग खान का एक प्रतिनिधि तो श्रीरंगम में ही रहता था और उसने पवित्र श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर के सामने ही अपना घर बना लिया था। उसने श्रीरंगम के आसपास के गाँवों पर कुछ वर्ष तक राज किया। कहते हैं कि मंदिर में रहते-रहते उसे तरह-तरह की बीमारियाँ हो गई थीं। बाद में वो कन्नूर गया, जहाँ उसने पॉयसलेसवार मंदिर को नुकसान पहुँचाया।
इधर बुक्का राय ने श्रीरंगम के श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर को इस्लामी आक्रान्ताओं से बचा कर इसका पुराना वैभव को वापस लाने में सफलता पाई और उसके बाद विजयनगर के संगम वंश ने भी इसे जारी रखा। लेकिन, वामपंथी इतिहासकारों ने इन घटनाओं को हमारी किताबों में जगह नहीं दी क्योंकि वो चाहते थे कि हमें गलत इतिहास पढ़ाया जाए। इस्लामी आक्रान्ताओं के कृत्यों को छिपाने की कोशिश हुई।

वैदिक शिक्षक डेविड फ्रॉली : ‘राम मंदिर निर्माण नेहरूवादियों, मार्क्सवादियों, मीडिया, शिक्षाविदों की हार है, जिसने इतिहास, पुरातत्व, भक्ति को नकारने की कोशिश की’

डेविड फ्रॉली ने
पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित अमेरिकी वैदिक शिक्षक डेविड फ्रॉली ने बुधवार (अगस्त 5, 2020) को कहा कि राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत एक अरब सपनों का साकार होना है। ज्ञात हो, डेविड फ्रॉली वेद, हिन्दुत्व, योग, आयुर्वेद और वैदिक एस्ट्रॉलजी पर कई किताबें लिख चुके हैं।
डेविड फ्रॉली ने टाइम्स नाउ के प्रधान संपादक राहुल शिवशंकर के साथ एक्सक्लुसिव इंटरव्यू में राम मंदिर पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भगवान राम की महिमा को पुन: स्थापित किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि अयोध्या विवाद संभवतः दुनिया के इतिहास में सबसे अधिक समय तक चलने वाला मुकदमा था।
अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन का कार्यक्रम
भूमि पूजन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 
डेविड फ्रॉली ने राम मंदिर के निर्माण को देश की आजादी के बाद आधुनिक भारत की सबसे महत्वपूर्ण घटना बताते हुए कहा कि रामायण एशिया की सबसे लोकप्रिय कहानियों में से एक है और अब राम मंदिर भारत को उसके वास्तविक भाग्य के प्रति जागृत करेगा। उन्होंने आगे कहा, “हमें ‘अयोध्या के विजय’ को श्री राम की विजय के रूप में स्वीकार करना चाहिए।”
फ्रॉली ने कहा कि अयोध्या भारत के सात पवित्र शहरों में सबसे महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही उन्होंने कहा, “हिन्दू धर्म एक परंपरा है जो कई प्रकार के आध्यात्मिक मार्ग स्वीकार करता है। यह संकीर्ण विचारधारा वाली परंपरा नहीं है।”

फ्रॉली ने आगे कहा, “हिन्दुओं ने अपने मंदिरों के पुन: प्राप्ति के लिए राजनीतिक रूप से कोई स्टैंड नहीं लिया। जब तक हिन्दू राजनीतिक रूप से स्टैंड नहीं लेगें, उन्हें अल्पसंख्यक ही माना जाएगा, उन जगहों पर भी, जहाँ पर वो बहुसंख्यक हैं।”
फ्रॉली ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “राम मंदिर का निर्माण नेहरूवादियों, मार्क्सवादियों, माओवादियों, चीन समर्थकों, मीडिया और शिक्षाविदों के लिए हार है, जिसने इतिहास, पुरातत्व और भक्ति को नकारने की कोशिश की थी।”
डॉ फ्रॉली ने अपने ट्वीट के माध्यम से वास्तविकता को नकारने वालों को बेनकाब कर एक नयी बहस को जन्म दे दिया है। ट्विटर पर इनके पक्षकारों की भी कमी नहीं। इस सच्चाई से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि केवल मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते भारत के गौरवमयी इतिहास को अंधकारमय कर मुग़ल आतताइयों को महान बताया गया, जो भारत के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण समय रहा। यदि वास्तविक इतिहास पढ़ाया जाता न अयोध्या मुद्दा विवादित बनता और न ही रामजन्म स्थान मुकदमा इतना लम्बा चलता।
साम्प्रदायिक कौन?
जब संघ समर्पित विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल एवं हिन्दू महासभा ने हिन्दुओं को अपने राम के प्रति जागृत करने आंदोलन कर रहे थे, छद्दम धर्म-निरपेक्षों के साथ हमारा मीडिया संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और हिन्दू महासभा के विरुद्ध देश में शांति भंग कर साम्प्रदायिकता का जहर फ़ैलाने जैसे समाचारों को खूब प्रसारित कर रहा था। बाबरी पक्षकार और इनके समर्थक दल झूठ पर झूठ बोल जनता को गुमराह कर राममंदिर पक्षकारों के विरुद्ध समाचारों को प्रमुखता दे रहे थे, उस समय किसी खोजी पत्रकार ने वास्तविकता को उजागर करने का साहस तक नहीं किया। 2014 चुनाव के बाद ऐसा समय चक्र घुमा, वही मीडिया गले फाड़-फाड़ कर राम धुन गाने लगा।
अगर राम मंदिर मुक़दमे का गहन अध्ययन किया जाए, तो तुष्टिकरण की चाटुकारिता में मुस्लिम कट्टरपंथियों का साथ छद्दम धर्म-निरपेक्ष, धूर्त नारा गंगा-जमुना तहजीब, संविधान पर आघात का शोर मचाने वाले हिन्दुओं की भी जमात थी। राम के अस्तित्व को नाकारा जा रहा है, लालची हिन्दू धर्म पर होते प्रहारों को बर्दाश्त करते रहे। मुस्लिम कट्टरपंथी तो साम्प्रदायिकता फ़ैलाने में बदनाम है, लेकिन इनका साथ देने में जयचन्दी हिन्दू भी पीछे नहीं रहे।
इतना ही नहीं, अभी जब नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में हुए धरने और प्रदर्शनों में साम्प्रदायिकता का नंगा नाच इन्हीं जयचन्दी हिन्दुओं के सम्मिलित रहते "fuck hindutva ", "मोदी तेरी कब्र खुदेगी" और "योगी तेरी कब्र खुदेगी" आदि नारेबाजी के माध्यम से होता रहा। दूसरे, जब दिल्ली में हिन्दू-विरोधी दंगे हुए, तो आरोपियों को बचाने में यही छद्द्म धर्म-निरपेक्ष हिन्दू आगे आ रहा है, इनमें से कोई कोट पर जनेऊ पहन घूमते देखा गया तो किसी को हनुमान चालीसा पढ़ते आदि।     




प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में बुधवार(अगस्त 5) को राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन किया और मंदिर की आधारशिला रखी। इसके बाद उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, “यह मेरा सौभाग्य था कि श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मुझे मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में आमंत्रित किया। आज पूरा देश राममय और हर मन दीपमय है। सदियों का इंतजार समाप्त हुआ।”
मोदी ने कहा, ”राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। कोई काम करना हो, तो प्रेरणा के लिए हम भगवान राम की ओर ही देखते हैं। भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिए। इमारतें नष्ट कर दी गईं, अस्तित्व मिटाने का प्रयास भी बहुत हुआ, लेकिन राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं। श्रीराम भारत की मर्यादा हैं, श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।”

भारतीय इतिहास : IPS अधिकारी नागेश्वर राव द्वारा आईना दिखाए जाने पर कम्युनिस्ट वृंदा करात का छलका दर्द

Nageshwar Rao takes charge of CBI, reverses all transfers ordered ...भाजपा ने 'दुष्कर्मी रक्षकों' की टोली ...
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कम्युनिस्ट नेता वृंदा करात ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिख आईपीएस अधिकारी एम नागेश्वर राव पर कार्रवाई की मॉंग की है। उन्होंने दिल्ली पुलिस से भी शिकायत की है। राव ने पिछले दिनों भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के अब्राहमीकरण (इस्लाम और ईसाइयत का प्रभुत्व) और मुस्लिम शासकों के खूनी इतिहास को मिटाने के संदर्भ में ट्वीट किया था।
केंद्रीय गृह मंत्री को लिखे पत्र में करात ने आरोप लगाया है कि राव ने सर्विस नियमों का उल्लंघन किया है। उनकी टिप्पणियाँ संविधान के खिलाफ हैं और ‘सांप्रदायिक भावनाओं को उकसाती हैं।
करात ने राव के ट्वीट को अल्पसंख्यकों पर हमला बताते हुए कहा है कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को सॅंभाला था, लेकिन उन पर हिन्दुत्ववादी विद्वानों को दरकिनार करने का आरोप राव ने मढ़ दिया।
उन्होंने कहा है कि मौलाना आजाद के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर राव दो समुदायों के बीच द्वेष को उकसा रहे हैं। साथ ही उन्होंने राव को विश्व हिन्दू परिषद और आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित भी बताया है।
अयोध्या में बाबरी मस्जिद नहीं, राम ...श्रीमति करात को सच्चाई उजागर होने पर नागेश्वर राव, आईपीएस अधिकारी, के ट्वीट से क्यों भड़क रहीं हैं? उन्होंने शायद के के मोहम्मद, रिटायर्ड पुरातत्व निदेशक, द्वारा लिखित पुस्तक को नहीं देखा। जिसमें उन्होंने लिखा है कि "कांग्रेस और वामपंथियों ने रामजन्मभूमि का विवाद हल नहीं होने दिया। खुदाई में मंदिर के अनेक अवशेषों को छुपा, केवल एक खम्बा दिखाकर कोर्ट में झूठ बोला।" दूसरे, 2013 में हिन्दी पाक्षिक का संपादन करते अपने स्तम्भ में इन मुद्दों को उठाया था, तब यूपीए की सरकार थी।      
भारतीय इतिहास से भयंकर छेड़छाड़ का आरोप तो वर्षों से उजागर किये जाने का प्रयत्न किया जा रहा है, लेकिन छद्दम इतिहासकारों और छद्दम धर्म-निरपेक्षों द्वारा उन्हें साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और शांति के दुश्मन आदि आरोपों से सम्मानित करते रहे। आखिर भारतीयों को किस कारण उनके वास्तविक इतिहास से अज्ञान रखा गया? भारत के गौरवमयी इतिहास को धूमिल करने का अपराध करने का अधिकार किसने दिया था और क्यों? कार्यवाही नागेश्वर पर नहीं इतिहास से छेड़छाड़ करने वालों के विरुद्ध होनी चाहिए। मोदी सरकार को युद्ध-स्तर पर इस गंभीर मुद्दे पर काम करे और सच्चाई सामने आने पर सभी इतिहासकारों को ब्लैकलिस्ट किया जाए। यह किसी पार्टी या मजहब की बात नहीं, देश के सम्मान का है।  
कम्युनिस्ट नेता ने यह भी आरोप लगाया कि राव 31 जुलाई को रिटायर हो रहे है। उन्होंने यह विवादित टिप्पणी इसलिए कि ताकि वे आसानी से बीजेपी और आरएसएस में शामिल हो सके। उन्होंने कहा कि राव ने सेवा में रहते हुए यह ट्वीट किया है जो आईपीएस के नियमों के उल्लंघन है। राव के खिलाफ आईपीसी की संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा भी चलाया जाना चाहिए।
करात ने इस संबंध में दिल्ली पुलिस को भी पत्र लिख कर राव के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 ए और 295 ए के तहत प्राथमिकी दर्ज करने को कहा। दिल्ली पुलिस आयुक्त, डीसीपी, और मंडी मार्ग पुलिस स्टेशन के एसएचओ को संबोधित पत्र में कहा गया है, “राव समुदायों के बीच दुश्मनी और मुसलमानों के खिलाफ नफरत की भावनाएं को भड़काने का काम कर रहे है।”
कुछ दिनों पहले IPS अधिकारी एम नागेश्वर राव ने वामपंथियों द्वारा भारतीय इतिहास से किए गए छेड़छाड़ के संबंध में ट्वीट किया था। जिसमें उन्होंने शिक्षा मंत्री रह चुके मौलाना अबुल कलाम आजाद के खिलाफ इस्लामिक आक्रांताओं और मुस्लिम शासकों के खूनी इतिहास को छिपाने और उनका महिमामंडन करने का आरोप लगाया था।
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राव ने बताया था कि भारत के इतिहास को बड़ी सफाई से ‘विकृत’ किया गया। ऐसा करने वाले को शिक्षा मंत्री का नाम दिया गया। शिक्षा मंत्री रहते हुए मुस्लिम नेता 1947-1977 के बीच 20 साल भारतीय मन-मस्तिष्क के प्रभारी बने बैठे थे।
एम नागेश्वर राव ने ट्वीट किया था कि, “मौलाना अबुल कलाम आजाद के 11 साल (1947-58) के बाद, हुमायूँ कबीर, एमसी छागला और फकरुद्दीन अली अहमद- 4 साल (1963-67), फिर नुरुल हसन- 5 साल (1972-77)। शेष 10 साल अन्य वामपंथी जैसे वीकेआरवी राव… ने ये जिम्मेदारी सँभाली।”
उन्होंने आगे कहा कि इसके अलावा बाकी के 10 साल वीकेआरवी राव जैसे ‘वामपंथियों’ ने भारतीयों के दिमाग पर राज किया
वीकेआरवी राव तमिलनाडु के एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
राव दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बने, योजना आयोग के सदस्य रहें और 1969 से 1971 के बीच शिक्षा मंत्री बने थे
नागेश्वर राव ने कुछ दिन पूर्व ट्वीट कर कहा, ‘ये लोग हिंदू सभ्यता को नीचा दिखाने, हिंदू धर्म को गाली देने इत्यादि के लिए जिम्मेदार हैं उन्होंने कहा कि इन लोगों ने इतिहास के साथ छेड़छाड़ किया और खूनी इस्लामिक शासन को नकारा और लीपापोती कर दी
सीपीएम नेता ने कहा कि हर एक अधिकारी संविधान को मानने और उसकी रक्षा करने की जिम्मेदारी से बंधा हुआ होता है लेकिन राव ने ट्विटर पर सार्वजनिक टिप्पणी कर संविधान की भावना के खिलाफ बोला है और राजनीतिक रूप से प्रेरित बेहद भड़काऊ बातों को लिखा है
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इस पाक्षिक को सम्पादित करते अपने बहुचर्चित स्तम्भ में यूपीए सरकार के कार्यकाल में लाल किले पर उठाया प्रश्न था जिस....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ सर्वविदित हैं। वामपंथियों ने बड़ी सफाई से इस्लामिक आक्रा.....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने राम मंदिर भूमि पूजन को लेकर फिर ज़हर उगला है। हैद.....
उन्होंने कहा, ‘यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने सेवा नियमों का उल्लंघन किया है या सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काया है जब वह नब्बे के दशक के अंत में ओडिशा के बरहामपुर विकास प्राधिकरण में सेवारत अधिकारी थे, उन्होंने कुछ इसी तरह के जहरीले सांप्रदायिक बयान दिए थे दो आधिकारिक की पूछताछ में उन्हें दोषी पाया गाया और उन्हें दोषी ठहराया और अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई इस तरह वे बुरे रिकॉर्ड के साथ आदतन अपमान करने वाले व्यक्ति हैं

जब मिले गुहा और आरफा के सुर: मोदी के लिए गालियां निकलनी थी !

रामचंद्र गुहा और आरफा खान्नुम
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
पिछले दिनों में राजस्थान में कॉंग्रेस नेता सचिन पायलट की बग़ावत और गहलौत सरकार के संकट में पड़ने से सवाल उठ रहा है कि अगर चुनी हुई सरकारों को भय या लालच से गिराया जा सकता है और अपनी मन-मर्ज़ी की पार्टी की सरकार को स्थापित किया जा सकता है तो फिर लोकतंत्र में चुनाव के मायने ही क्या रह गये? भारतीय लोकतंत्र की सेहत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम करने का तरीक़ा, विपक्ष की ज़िम्मेदारी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उपजे गंभीर सवालों पर जाने माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा से द वायर की सीनियर एडिटर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी से विस्तार से चर्चा की।
इनकी चर्चा पर तो बाद में आते हैं, सर्वप्रथम इनकी मंदबुद्धि से ही साक्षात्कार कर लिया जाए, देखिए :
Gandhi, others had agreed to hand over Netaji
Gandhi, Nehru, Jinnah &
 Azadhad agreed to
 handover
Subhas Chandra Bose
 to British Govt.
 He was subsequently
placed under house arrest
 by the British before
 escaping from India in 1940.

किस हैसियत से महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार से नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विरुद्ध अनुबंध पर हस्ताक्षर किये थे?
गाँधी वध क्यों : नाथूराम गोडसे | Gandhi ...क्यों नहीं गाँधी वध उपरांत चितपावन ब्राह्मणों के हुए नरसंहार की जाँच करवाई गयी? जबकि आज़ाद भारत में सबसे भयंकर नरसंहार आज तक दूसरा कोई नहीं हुआ।
क्यों नहीं गाँधी का पोस्टमॉर्टेम करवाया गया? क्यों नहीं, गांधीजी की सांसे चलते उन्हें निकटतम अस्पताल लेकर जाया गया?
क्यों नाथूराम गोडसे के कोर्ट में दर्ज वो 150 बयान जो उन्होंने माइक से पढ़कर दर्ज करवाए थे, को सार्वजनिक होने से प्रतिबन्ध लगाया गया था? गोडसे को गालियां देंगे, लेकिन उन बयानों पर चर्चा नहीं करेंगे, क्योकि बयानों की चर्चा करने पर तुष्टिकरण नीति का भंडा फूट जायेगा।
What is the conspiracy theory about the death of Netaji Subhash ...
गोडसे ने गाँधी को मारा क्यों?गुहा और खानम ने मोदी पर खूब प्रहार किए, लेकिन इतिहासकार और सीनियर एडिटर ने अपनी योग्यता पर सवाल खड़े कर दिए। इन्हें नहीं मालूम की लोकतंत्र की निर्मम हत्या तो देश में हुए पहले आम चुनाव में कांग्रेस ने कर दी थी, जब उत्तर प्रदेश के रामपुर से हिन्दू महासभा के उम्मीदवार विशन सेठ लगभग 6,000 वोटों से जवाहर लाल नेहरू के लाडले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को हराना हजम न होने पर, तुरंत तत्कालीन मुख्यमंत्री गोबिंद वल्लभ पंत को परिणाम पलटने के लिए बोला था कि "मुझे आज़ाद पार्लियामेंट में चाहिए।" और पंत ने साम, दाम, दंड और भेद अपनाकर अपने विजयी रथ पर सवार सेठ को बीच जुलुस से कलेक्टर ने अगवा कर मतदान केंद्र पर ले जाकर, उन्हीं के सामने उनकी वोटों को आज़ाद में मिलाकर हारे हुए उम्मीदवार को विजयी घोषित करवा दिया था। अपनी आँखों के सामने अपनी बर्बादी होते देख, सेठ रोते-बिलगते चिल्लाते रहे और वहां उपस्थित मजिस्ट्रेट, कलेक्टर और गणना अधिकारी कहते रहे कि "सेठ साहब हम अपनी नौकरी बचा रहे हैं।"
जब सोमनाथ मन्दिर के जीणोद्धार उपरांत उद्घाटन के लिए तत्कालीन महामहिम डॉ राजेंद्र प्रसाद को जवाहर लाल नेहरू क्यों मना कर रहे थे?
उनकी मृत्यु पर नेहरू क्यों नहीं शामिल हुए? क्यों नेहरू तत्कालीन महामहिम डॉ राधाकृष्णन को डॉ राजन बाबू की शव यात्रा में शामिल न होने के लिए मना करते रहे?
जब राजन बाबू का स्वास्थ्य बहुत ही नाजुक स्थिति में तब तत्कालीन गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने राजघाट के निकट इनकी समाधि के लिए कहा, तब नेहरूजी ने कहा कि "नहीं, वहां मेरी समाधि बनेगी। इनकी कहीं आगे बनाओ।" जब शास्त्री जी ने कहा कि "आगे यमुना अति निकट है, और बाढ़ का पानी आने पर समाधि को नुकसान पहुँच सकता है, उस नेहरूजी ने कहा था,"होने दो" 
1965 में हुए इंडो-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सरकार द्वारा जब पाकिस्तान समर्थक गिरफ्तार देशद्रोहियों को उनकी मृत्यु उपरांत देशभक्त किसने घोषित किया? क्यों नहीं प्रधानमंत्री शास्त्री की रहस्यमयी मृत्यु की जाँच करवाई गयी? 
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जब अपने चुनाव विरोधी राजनारायण से मुकदमा हार गयीं थी, उस स्थिति में प्रधानमंत्री पद छोड़ने की बजाए देश में आपातकालीन क्यों लगाई? मीडिया पर सेंसरशिप क्यों लगाई?
जब कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर बने, तब रामजन्मभूमि विवाद पर आयी तारीख पर जज को घर बुलाकर कहा कि "मुझे तारीख नहीं, इस तारीख पर फैसला चाहिए", यह समाचार सुनते ही क्यों राजीव गाँधी ने तुरंत समर्थन वापस लेकर चंद्रशेखर सरकार को गिरा दिया था? आदि, आदि। एक लम्बी सूची है। 
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ऐसे में जब रामचंद्र गुहा जैसा इतिहासकार और पत्रकार आरफा खानम शेरवानी जैसी एक साथ बैठेंगे तो कल्पना करिए कि इनके बीच हुई बातचीत का बॉयप्रोडक्ट क्या निकलेगा। बिलकुल सही समझा आपने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भरपूर घृणा और भाजपा के लिए ढेर सारी नफरत।
साक्षात्कार के नाम पर वामपंथ प्रमाणित अलग-अलग क्षेत्रों की दो कालजयी शख्सियतें द वायर पर एक साथ बैठीं। मकसद अलग-अलग विषयों पर नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ जहर उगलना।
परेशानी मोदी सरकार से है या फिर कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने से?
इंटरव्यू की शुरुआत से ही आरफा अपने मेहमान रामचंद्र गुहा से भाजपा सरकार पर सवाल शुरू करती है। सवालों से ज्यादा उनके शब्दों में इस बात की नाराजगी झलकती है कि आखिर मोदी प्रदेशों में पार्टी की सरकार बनाने पर क्यों आतुर हैं।
वो पूछती हैं कि आखिर केंद्र में बैठे लोग क्यों राज्यों में सरकार गिरा रहे हैं? क्या इससे लोकतंत्र सुरक्षित रह गया है? रामचंद्र गुहा भी अपनी पर्सनेलिटी के हिसाब से इन सवालों का जवाब देते हैं। लेकिन मध्यप्रदेश में कॉन्ग्रेस सरकार गिरने से आहत दोनों वामपंथ सर्टिफाइड वरिष्ठ भूल जाते हैं कि राज्य सरकार बनने पर जिस भाजपा को आज लोकतंत्र का खतरा करार दिया जा रहा है, उसी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को 13वें लोकसभा चुनाव में सियासी उलटफेर के चलते अपनी केंद्र से हाथ धोना पड़ा था। लोकतंत्र पर खतरा उस समय नहीं आया था शायद। क्योंकि लोगों ने उसे राजनीति का हिस्सा मान लिया था।

आज मध्यप्रदेश में सीट जाने का दुख है। मगर, ये नहीं समझना चाहते कि इसके पीछे भाजपा उत्तरदायी कैसे है? क्या सिंधिया के मन में खटास भाजपा ने पैदा की या फिर कॉन्ग्रेस के उस नेतृत्व ने जो आज भी परिवारवाद के पुराने ढर्रे पर पार्टी को नेहरू की कॉन्ग्रेस साबित करना चाहता है और काबिल नेताओं को दरकिनार कर। आज राजस्थान में भी जो हालत है- क्या उसके लिए जिम्मेवार बीजेपी है या फिर सीएम गहलोत जैसे कॉन्ग्रेसी ओल्ड गार्डों का अहंकार। जिन्होंने पायलट की काबिलियत को हमेशा से नकारा।
हर कोई इस बात को जानता है कि मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट ने कॉन्ग्रेस को जिताने के लिए क्या कुछ नहीं किया। उनकी क्षमताओं की अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब सिंधिया पार्टी से हटे तो मध्यप्रदेश में सरकार गिर गई और जब पायलट गए तो कई नेताओं ने उनका समर्थन किया।
आरफा खान्नम और रामचंद्र गुहा आज भाजपा को लोकतंत्र पर खतरा बता रहे हैं। लेकिन इस पर बात नहीं करते कि कॉन्ग्रेस पार्टी में वे कौन सी कमियाँ हैं जिसके कारण जरा सी सियासी बयार पर उसकी कुर्सी हिल जाती है।
मीडिया का स्वरुप किसने बदला मोदी या वामपंथियों ने?
साक्षात्कार में बात निकलती है कि पिछले कुछ सालों में राजनीति का स्वरूप बहुत बदल गया है। बिलकुल बदला है और समय की माँग है राजनीति में बदलाव। संसाधन, माध्यम, तकनीक, बौद्धिकता, सजगता कुशलता सब इस बदलाव में बराबर के हिस्सेदार हैं। मगर, कोई बता सकता है कि मीडिया का स्वरूप क्यों बदला? और क्यों बदला मीडिया के सवाल पूछने का ढंग?
क्या कारण है कि राजनीति गलियारों में मची हलचल का आँकलन करने से ज्यादा मीडिया के लिए सवाल ये है कि आखिर ये क्यों हुआ और कैसे इसे लोकतंत्र के लिए घातक कहा जाए। आखिर क्यों सूचनाओं से ज्यादा प्रोपेगेंडा परोसा जा रहा है? क्यों ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख से ज्यादा उनका महिमामंडन हो रहा है?
जो लोग देश की अर्थव्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। क्या उन्हें नहीं मालूम कि यूपीए में भी एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ था। क्या उस समय विषय गर्माया था? शायद नहीं। क्योंकि तब बोलने की आजादी की नहीं थी। बात चमचागिरी की थी।
भाजपा के ख़िलाफ़ विकल्प, एकमात्र विकल्प को सर-आँखों पर बैठाने की थी और उन्हीं की नीतियों की जी हुजूरी की थी। आज जब समय बदला तो कुछ गिने-चुने शब्दों के आधार पर सवाल-जवाब हो रहा है।
अब आगे इंटरव्यू में बात करते हुए गुहा दावा करते हैं कि भाजपा की राजनीति का एक स्वरूप ये भी है कि जो उनकी बात नहीं मानता उसके पीछे जाँच एजेंसी लग जाती है और सुप्रीम कोर्ट भी अपना काम सही से नहीं कर पाती। गुहा जी के ऐसे सवालों का क्या जवाब हो खुद सोचिए।
क्या निराधार मामलों में किसी राजनेता को बेवजह फँसाया जा सकता है वो भी तब जब सबूत ही न मिले। किसी पर केस तब होता है जब उसका इतिहास काले चिट्ठों में सना हो। पूर्व मंत्री व कॉन्ग्रेस नेता चिंदंबरम का मामला लीजिए। जब चिदंबरम जेल गए तब बातें उठी कि अमित शाह का बदला है। क्या पर्याय था ऐसी अनर्गल बातों का? क्या चिंदबरम का INX घोटाले से कोई लेना देना नहीं था?
सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं बक्शा 
सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठाना भी आज इस धड़े के लिए आसान हो चुका है, क्योंकि वहाँ से सुनवाई हर तारीख पर टलने की बजाय अब फैसला आ रहा है। ऐसे लोगों को तो खुश होना चाहिए कि जिन मुद्दों पर कभी किसी ने कॉन्ग्रेस काल में सोचा नहीं था कि फैसला आ पाएगा, उन पर सुप्रीम कोर्ट तेजी से सुनवाई करके उन्हें सुलझा रहा है। मगर, नहीं, क्योंकि फैसला इनके विरुद्ध है तो न्यायपालिका पर आरोप मढ़ना इनके लिए आसान है।
आगे बात भाजपा पर आने वाले पैसे की अकॉउंटिबिलीटी की। गुहा कहते हैं कि पता ही नहीं चल रहा पार्टी के पास पैसा कहाँ से आ रहा है। कहाँ से वह विधायकों को खरीदने के लिए पैसे खर्च कर रही है।
विचार करिए, देश का इतना जागरूक नागरिक जो आज किसी पार्टी के बारे में कुछ पता लगाना चाह रहा है और सूचनाएँ उससे छिपा ली जा रही है। ऐसा मुमकिन है क्या? अगर ऐसे ही मुखर होकर इतिहासकारों और पत्रकारों की लॉबी ने कॉन्ग्रेस से उस समय में सवाल किया होता तो आज जो राजीव गाँधी फाउंडेशन के नाम पर जो कारनामे सामने आ रहे हैं, उनकी जगह उन मामलों पर हुई कार्रवाई सुर्खियों में होती और लोग ये सोच रहे होते कि विश्वासघात के नाम पर कॉन्ग्रेस कहाँ-कहाँ अव्वल रही।
चापलूस कौन?
दोनों बुद्धीजीवि द वायर के बैनर तले बैठकर देश के प्रधानमंत्री के लिए बोलते हैं उनका कोई सलाहकार समूह नहीं है। सिर्फ़ चापलूसी समूह है। अपनी बात को बैलेंस करते हुए एक जगह वीडियो में गुहा ये कहते नजर आते हैं कि कई जगहों पर नरेंद्र मोदी, इंदिरा गाँधी से आगे निकल गए हैं।
हालाँकि थोड़ी ही देर बाद ये कह देते हैं कि इंदिरा गाँधी ने कभी भी सेना से छेड़छाड़ नहीं की। वे अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए तरह तरह के आरोप लगाते हैं। मगर, भूल जाते हैं आपातकाल के समय क्या हुआ था? वो आपातकाल जहाँ किसी को अपने पक्ष और विपक्ष में रखने की बात ही नहीं थी। सिर्फ़ सेंसरशिप थी।
गुहा को नहीं मालूम कि  कॉन्ग्रेस ने कैसे एक सार्वजनिक स्थान (डीडी चैनल) को राजनीतिक प्रतिद्वंदी को निशाना बनाने के लिए उपयोग किया था। जब अमेरिका ने नरेंद्र मोदी का वीजा देने से मना कर दिया था तो उसकी खुशी मिठाई बाँटकर हुई थी। सोचिए ये कारनामा तब का है जब नरेंद्र मोदी सीएम थे।
गुहा के साक्षात्कार की गंभीरता इस बात से लगाइए कि उनका मत है कि आज के दौर में एनडीटीवी, द वायर जैसे संसथान स्वतंत्र रूप से खड़े और बाकी सारे डर गए हैं। उनका कहना है कि इन लोगों में विज्ञापन आदि का डर रहता है। रही बात एंकर्स की तो केवल रवीश कुमार को छोड़ दिया जाए तो सभी इनकी चापलूसी और चमचागिरी करते हैं। गुहा को ये सब देखकर लगता है कि हम अकबर या राणा प्रताप के समय में आ गए हैं।
अंग्रेजी अख़बारों पर भी गुहा का गुस्सा 
इस साक्षात्कार के बीच में तो आपको ये भी लगेगा कि रामचंद्र गुहा मोदी सरकार की तारीफें सुनकर इतना ज्यादा थक चुके हैं कि उन्हें कोई अखबार पसंद नहीं। वो हिंदुस्तान टाइम्स से लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया पर अपना गुस्सा उतारते हैं। उनका कहना है कि ये अखबार हफ्ते के तीन दिन नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हैं। आक्रमक भाव के साथ गुहा पूछते हैं कि बताइए क्या ये सब पहले होता था?
आरफा खानम की पत्रकारिता 
इस इंटरव्यू के साथ आपको रामचंद्र गुहा की कुंठा और आरफा खानम के चेहरे पर शांति का भाव बताएगा कि ये पूरा मुद्दा दोनों के लिए कितना अहम है। याद करिए यही आरफा खानम को जब इन्होंने मोहम्मद आरिफ के साथ इंटरव्यू किया था। नरेंद्र मोदी और उनकी कार्यनीति पर उनकी सहमति देखते हुए जैसे आरफा सवाल पर सवाल पूछना चाहती थीं। मगर रामचंद्र गुहा को शांत चित के साथ सुनी जा रही हैं।
आगे जब सवाल भी करती हैं तो किसी बात का कोई काउंटर नहीं बल्कि उन्हीं बातों को उन बिंदुओं से विस्तार देती हैं जिन्हें गुहा करना भूल गए। वो ताली-थाली को मिले जनसमर्थन पर सवाल उठाती है और लोगों की मंशा पर प्रश्न करती हैं। साथ ही इसी आधार पर मोदी सरकार को घेरती हैं और पूछती हैं कि इन लोगों को सड़कों पर नाचने का और सड़कों पर बम पटाखे जलाने का किसने अधिकार दे दिया?
अब जाहिर है कि ये अधिकार नरेंद्र मोदी ने या भाजपा सरकार ने उन्हें नहीं दिया। ये उसी लोकतंत्र देश के नागरिक हैं। जिनकी मनमर्जियाँ उनके घरों की गलियों में तब भी चल रही थी जब कॉन्ग्रेस थी और वही मनमर्जियाँ अब भी चल रही हैं। इसके अलावा द वायर की गंभीर पत्रकार को जरूरत है ऐसे सवाल पूछने से पहले ये समझने की कि जब नरेंद्र मोदी ने दोनों कार्य करने की अपील लोगों से की तो देश में लॉकडाउन लगाकर। उनका मकसद वही था जो उन्होंने कहा। मगर लोगों ने उसे गलत समझकर क्या किया। इसका ठीकरा वो नरेंद्र मोदी के सिर माथे नहीं फोड़ सकतीं। आरफा आगे अपने शो में नरेंद्र मोदी को कम्युनल इंदिरा गाँधी कहलवाना चाहती हैं और गुहा कहते हैं कि कम्युनल तो हैं ही साथ में घमंडी भी हैं।
इस इंटरव्यू को सुनिए और महसूस कीजिए कि एक वामपंथ सर्टिफाइड इतिहासकार की बातों में बैलेंस करने के नाम पर नरेंद्र मोदी से समकक्ष इंदिरा गाँधी का उदहारण जरूर है। मगर, ये स्पष्ट रूप से कहने की क्षमता नहीं है कि इंदिरा गाँधी के राज में कुछ भी गलत हुआ।
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उनके बातों से साफ पता चलता है कि इंदिरा गाँधी यदि कभी गलत के चरम पर भी पहुँची तो भी वो नरेंद्र मोदी से हर मायने में कम थीं। उनके मुताबिक नरेंद्र मोदी को भारत की और भारत की संस्कृति की समझ नहीं है। लेकिन इंदिरा गाँधी को थी। इंटरव्यू में गुहा स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि वे नरेंद्र मोदी की विचारधारा के साथ हिंदुत्व के ख़िलाफ़ हैं। लेकिन क्या करें भारत के पास अभी कोई विकल्प भी नहीं है।