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भारतीय इतिहास : IPS अधिकारी नागेश्वर राव द्वारा आईना दिखाए जाने पर कम्युनिस्ट वृंदा करात का छलका दर्द

Nageshwar Rao takes charge of CBI, reverses all transfers ordered ...भाजपा ने 'दुष्कर्मी रक्षकों' की टोली ...
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कम्युनिस्ट नेता वृंदा करात ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिख आईपीएस अधिकारी एम नागेश्वर राव पर कार्रवाई की मॉंग की है। उन्होंने दिल्ली पुलिस से भी शिकायत की है। राव ने पिछले दिनों भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के अब्राहमीकरण (इस्लाम और ईसाइयत का प्रभुत्व) और मुस्लिम शासकों के खूनी इतिहास को मिटाने के संदर्भ में ट्वीट किया था।
केंद्रीय गृह मंत्री को लिखे पत्र में करात ने आरोप लगाया है कि राव ने सर्विस नियमों का उल्लंघन किया है। उनकी टिप्पणियाँ संविधान के खिलाफ हैं और ‘सांप्रदायिक भावनाओं को उकसाती हैं।
करात ने राव के ट्वीट को अल्पसंख्यकों पर हमला बताते हुए कहा है कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को सॅंभाला था, लेकिन उन पर हिन्दुत्ववादी विद्वानों को दरकिनार करने का आरोप राव ने मढ़ दिया।
उन्होंने कहा है कि मौलाना आजाद के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर राव दो समुदायों के बीच द्वेष को उकसा रहे हैं। साथ ही उन्होंने राव को विश्व हिन्दू परिषद और आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित भी बताया है।
अयोध्या में बाबरी मस्जिद नहीं, राम ...श्रीमति करात को सच्चाई उजागर होने पर नागेश्वर राव, आईपीएस अधिकारी, के ट्वीट से क्यों भड़क रहीं हैं? उन्होंने शायद के के मोहम्मद, रिटायर्ड पुरातत्व निदेशक, द्वारा लिखित पुस्तक को नहीं देखा। जिसमें उन्होंने लिखा है कि "कांग्रेस और वामपंथियों ने रामजन्मभूमि का विवाद हल नहीं होने दिया। खुदाई में मंदिर के अनेक अवशेषों को छुपा, केवल एक खम्बा दिखाकर कोर्ट में झूठ बोला।" दूसरे, 2013 में हिन्दी पाक्षिक का संपादन करते अपने स्तम्भ में इन मुद्दों को उठाया था, तब यूपीए की सरकार थी।      
भारतीय इतिहास से भयंकर छेड़छाड़ का आरोप तो वर्षों से उजागर किये जाने का प्रयत्न किया जा रहा है, लेकिन छद्दम इतिहासकारों और छद्दम धर्म-निरपेक्षों द्वारा उन्हें साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और शांति के दुश्मन आदि आरोपों से सम्मानित करते रहे। आखिर भारतीयों को किस कारण उनके वास्तविक इतिहास से अज्ञान रखा गया? भारत के गौरवमयी इतिहास को धूमिल करने का अपराध करने का अधिकार किसने दिया था और क्यों? कार्यवाही नागेश्वर पर नहीं इतिहास से छेड़छाड़ करने वालों के विरुद्ध होनी चाहिए। मोदी सरकार को युद्ध-स्तर पर इस गंभीर मुद्दे पर काम करे और सच्चाई सामने आने पर सभी इतिहासकारों को ब्लैकलिस्ट किया जाए। यह किसी पार्टी या मजहब की बात नहीं, देश के सम्मान का है।  
कम्युनिस्ट नेता ने यह भी आरोप लगाया कि राव 31 जुलाई को रिटायर हो रहे है। उन्होंने यह विवादित टिप्पणी इसलिए कि ताकि वे आसानी से बीजेपी और आरएसएस में शामिल हो सके। उन्होंने कहा कि राव ने सेवा में रहते हुए यह ट्वीट किया है जो आईपीएस के नियमों के उल्लंघन है। राव के खिलाफ आईपीसी की संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा भी चलाया जाना चाहिए।
करात ने इस संबंध में दिल्ली पुलिस को भी पत्र लिख कर राव के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 ए और 295 ए के तहत प्राथमिकी दर्ज करने को कहा। दिल्ली पुलिस आयुक्त, डीसीपी, और मंडी मार्ग पुलिस स्टेशन के एसएचओ को संबोधित पत्र में कहा गया है, “राव समुदायों के बीच दुश्मनी और मुसलमानों के खिलाफ नफरत की भावनाएं को भड़काने का काम कर रहे है।”
कुछ दिनों पहले IPS अधिकारी एम नागेश्वर राव ने वामपंथियों द्वारा भारतीय इतिहास से किए गए छेड़छाड़ के संबंध में ट्वीट किया था। जिसमें उन्होंने शिक्षा मंत्री रह चुके मौलाना अबुल कलाम आजाद के खिलाफ इस्लामिक आक्रांताओं और मुस्लिम शासकों के खूनी इतिहास को छिपाने और उनका महिमामंडन करने का आरोप लगाया था।
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राव ने बताया था कि भारत के इतिहास को बड़ी सफाई से ‘विकृत’ किया गया। ऐसा करने वाले को शिक्षा मंत्री का नाम दिया गया। शिक्षा मंत्री रहते हुए मुस्लिम नेता 1947-1977 के बीच 20 साल भारतीय मन-मस्तिष्क के प्रभारी बने बैठे थे।
एम नागेश्वर राव ने ट्वीट किया था कि, “मौलाना अबुल कलाम आजाद के 11 साल (1947-58) के बाद, हुमायूँ कबीर, एमसी छागला और फकरुद्दीन अली अहमद- 4 साल (1963-67), फिर नुरुल हसन- 5 साल (1972-77)। शेष 10 साल अन्य वामपंथी जैसे वीकेआरवी राव… ने ये जिम्मेदारी सँभाली।”
उन्होंने आगे कहा कि इसके अलावा बाकी के 10 साल वीकेआरवी राव जैसे ‘वामपंथियों’ ने भारतीयों के दिमाग पर राज किया
वीकेआरवी राव तमिलनाडु के एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थे, जिन्होंने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
राव दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति बने, योजना आयोग के सदस्य रहें और 1969 से 1971 के बीच शिक्षा मंत्री बने थे
नागेश्वर राव ने कुछ दिन पूर्व ट्वीट कर कहा, ‘ये लोग हिंदू सभ्यता को नीचा दिखाने, हिंदू धर्म को गाली देने इत्यादि के लिए जिम्मेदार हैं उन्होंने कहा कि इन लोगों ने इतिहास के साथ छेड़छाड़ किया और खूनी इस्लामिक शासन को नकारा और लीपापोती कर दी
सीपीएम नेता ने कहा कि हर एक अधिकारी संविधान को मानने और उसकी रक्षा करने की जिम्मेदारी से बंधा हुआ होता है लेकिन राव ने ट्विटर पर सार्वजनिक टिप्पणी कर संविधान की भावना के खिलाफ बोला है और राजनीतिक रूप से प्रेरित बेहद भड़काऊ बातों को लिखा है
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इस पाक्षिक को सम्पादित करते अपने बहुचर्चित स्तम्भ में यूपीए सरकार के कार्यकाल में लाल किले पर उठाया प्रश्न था जिस....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ सर्वविदित हैं। वामपंथियों ने बड़ी सफाई से इस्लामिक आक्रा.....
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने राम मंदिर भूमि पूजन को लेकर फिर ज़हर उगला है। हैद.....
उन्होंने कहा, ‘यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने सेवा नियमों का उल्लंघन किया है या सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काया है जब वह नब्बे के दशक के अंत में ओडिशा के बरहामपुर विकास प्राधिकरण में सेवारत अधिकारी थे, उन्होंने कुछ इसी तरह के जहरीले सांप्रदायिक बयान दिए थे दो आधिकारिक की पूछताछ में उन्हें दोषी पाया गाया और उन्हें दोषी ठहराया और अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई इस तरह वे बुरे रिकॉर्ड के साथ आदतन अपमान करने वाले व्यक्ति हैं

नेताओं का दोगलापन : कोरोना वॉरियर्स पर पत्थरवर्षा के समय मौन, पुष्पवर्षा को बताया तमाशा

आर.बी.एल. निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अपनी जान को जोखिम में डालकर स्वास्थ्यकर्मी कोरोना मरीजों की जान बचाने में रात-दिन लगे हुए हैं। यहां तक कि कोरोना मरीजों की जांच के लिए गई मेडिकल टीम पर पत्थरों की वर्षा की गई, जिसमें कई स्वास्थ्यकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके अलावा लॉकडाउन का पालन कराने गए पुलिसकर्मियों को पत्थरवर्षा का सामना करना पड़ा। लेकिन दुख और हैरानी की बात है कि कुछ नेताओं को स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों पर हुई पत्थरवर्षा से कोई परेशानी नहीं हुई। हिंसक हमलों के बावजूद उन्होंने मौनव्रत धारण कर लिया। जब तीनों सेनाओं ने स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के सम्मान में पुष्पवर्षा की, तो उन्हें परेशानी होने लगी और उनकी आवाज भी लौट आई। नेताओं ने संवेदनहीनता का परिचय देते हुए इस सम्मान समारोह को तमाशा, सर्कस और फिजूलखर्ची करार दिया। 
सीताराम येचुरी ने बताया सम्मान समारोह को तमाशा
कोरोना से लड़ने वाले सभी लोगों को कोरोना वॉरियर्स का नाम दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कोरोना वॉरियर्स को सम्मान में ताली और थाली बजाने के बाद दीपक जलाने की अपली की। जिसे लोगों का पूरा समर्थन मिला। इसी क्रम में तीनों सेनाओं ने कोरोना वॉरियर्स के सम्मान में फ्लाई पास्ट निकालने का फैसला किया और 3 मई को अस्पतालों और पुलिस मुख्यालय पर आसमान से पुष्पवर्षा की गई। लेकिन वामपंथी नेता सीताराम येचुरी ने इस सम्मान कार्यक्रमों को तमाशा बता दिया। उनके बयान से लगता है कि उन्हें गरीब मजदूरों की चिंता है, लेकिन स्वास्थ्यकर्मी और पुलिसकर्मियों की जान की परवाह नहीं है।


कोरोना वायरस के लिए चीन को दोषी ठहराने पर सीताराम येचुरी और उनकी पार्टी को परेशानी होती है, वे इसका खुलकर विरोध करते हैं। जब कोरोना फैलाने को लेकर तबलीगी जमात की आलोचना होने लगी तो वाम नेताओं ने मरकज का बचाव करने की पूरी कोशिश की। लेकिन कोरोना वॉरियर्स पर हो रहे हमलों पर उनकी आंखें नहीं खुली। जब मोदी सरकार कोरोना वॉरियर्स का सम्मान करती है, तो उन्हें तमाशा लगता है। येचुरी ने ट्वीट करते हुए मोदी सरकार पर लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं देने की जगह तमाशा को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया।
ममता सरकार ने इजाजत नहीं दी
पश्चिम बंगाल में ममता सरकार ने वायुसेना को फ्लाई पास्ट की इजाजत नहीं दी। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वायुसेना के अधिकारी ने कहा कि बंगाल के दो अस्पतालों में वायुसेना ने पुष्पवर्षा की योजना बनाई थी, लेकिन राज्य सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी। केंद्र और ममता सरकार के बीच कोरोना वायरस के संक्रमण के दौरान केंद्रीय टीम भेजने, मौतों की वजह स्पष्ट करने को लेकर तनाव चल रहा है। केंद्र ने राज्य में टेस्टिंग क्षमता को लेकर भी चिंता जाहिर की है।

समाजवादी पार्टी ने भी उठाया सवाल
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कहा है कि यूपी में क्वारैंटाइन सेंटर्स में बदसलूकी की खबरें आ रही हैं। कहीं खाने-पीने की कमी की समस्या उठाने पर केवल आश्वासन दिया जा रहा है। ऐसे में फूल बरसाने का क्या मतलब है?

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मुस्लिम नरसंहार के लिए मोदी सरकार कर रही कोरोना का इस्तेमाल: अरुंधति रॉय

अरुंधति रॉय, कोरोना वायरस
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि कोरोना जिसने विश्व में अपनी चादर फैला रखी है, कहीं हिन्दू-मुस्लिम नहीं हो रहा, लेकिन भारत में हिन्दू-मुसलमान ढूंढा जा रहा है, कोरोना को मोदी सरकार का मुस्लिम संहार के लिए प्रयोग कर रही है, और इस जहर को वामपंथी मीडिया फ़ैलाने के लिए दिन-रात एक किए हुए है। वामपंथी यह घिनौना काम इसलिए कर रहे हैं क्योकि यह वैश्विक बीमारी कहीं और से नहीं बल्कि वामपंथियों की जन्मस्थली चीन से फैली है। 
भारत में वामपंथी हिन्दू-मुसलमान करने का साहस तो कर सकते हैं, लेकिन चीन में मुसलमान नहीं इस्लाम पर हो रहे कुठाराघातों के विरुद्ध किसी वामपंथी में लिखना तो दूर बोलने तक का साहस नहीं। कुछ दिनों बाद रमजान हैं, देखते हैं रोजा न रखने पर कितने वामपंथी चीन सरकार के विरुद्ध लिखते अथवा मुंह खोलते हैं? 
घनघोर वामपंथन अरुंधति रॉय को भारतीय मीडिया में अब कवरेज नहीं मिल रहा है। ऐसे में उन्होंने अपना प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए एक जर्मन मीडिया संस्थान का सहारा लिया। ‘डीडब्ल्यू न्यूज़’ को इंटरव्यू देते हुए अरुंधति ने न सिर्फ़ भारत में कोरोना वायरस के प्रसार को लेकर अफवाह फैलाई, बल्कि मोदी सरकार को बदनाम करने के चक्कर में लोगों के बीच डर का माहौल बनाने का भी प्रयास किया। बिना किसी सबूत के उन्होंने भारत में कोरोना के आँकड़ों को ग़लत बताना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि ये आधिकारिक आँकड़े मोदी सरकार के हैं, वो इस पर जरा भी विश्वास नहीं करतीं।
इसके बाद अरुंधति अपना वही पुराना ‘हिन्दू-मुस्लिम विवाद’ और ‘मुस्लिमों पर अत्याचार’ वाला राग लेकर बैठ गईं और कहा कि कोरोना के कारण भारत की ‘पोल खुल गई’ है। उन्होंने दावा किया कि भारत न सिर्फ़ कोरोना वायरस, बल्कि घृणा और भूख से भी बेहाल है। उन्होंने कहा कि कोरोना के कारण मुस्लिमों के ख़िलाफ़ घृणा में बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को भी मुस्लिमों के नरसंहार करार दिया और कहा कि उसके बाद से ही घृणा में बढ़ोतरी हुई है। वो यहाँ तक झूठ बोल बैठीं कि दिल्ली में हुए दंगे सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर अत्याचार के रूप में हुए थे।
जमातियों को बचाने पगलाई 
अरुंधति रॉय का ये बयान तबलीगी जमात वालों को बचाने की मुहिम सी लगती है, जिन्होंने देश भर में कोरोना फैलाया। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित मरकज़ में हज़ारों मुसलमानों का जुटना और फिर लॉकडाउन तोड़ने वाली हरकत छिपी नहीं है। जगह-जगह मुसलमानों के मोहल्ले में पुलिस और मेडिकल टीम पर हमले हुए। इसलिए, अरुंधति एक ऐसा नैरेटिव बनाना चाह रही हैं, जैसे मुस्लिमों पर ही अत्याचार हुआ हो। ताज़ा हिंसा की घटनाओं को देखें तो स्पष्ट है कि कई मुसलमान इसे ‘काफिरों को दिए सज़ा’ के रूप में देख रहे हैं।
तबलीगी जमात का मुख्यालय भारत में कोरोना का हॉटस्पॉट बन गया। जमातियों ने पुलिस व प्रशासन के साथ सहयोग नहीं किया। जमातियों को खोजने गई पुलिस पर हमले हुए। उनके मोहल्लों में मेडिकल टेस्ट करने गए स्वास्थ्यकर्मियों को खदेड़ दिया गया। इन सबका दोषी कौन है? क्या अरुंधति रॉय इसे ही ‘मुसलमानों के ख़िलाफ़ अत्याचार’ मानती हैं? दिल्ली दंगों को लेकर उनके दावे झूठे हैं, क्योंकि ताहिर हुसैन जैसों की हरकतों पर उन्होंने चुप्पी साध ली। दिल्ली में हुए दंगे शाहीन बाग़ और जाफराबाद में मुस्लिम भीड़ द्वारा सड़कों पर कब्ज़ा किए जाने और स्थानीय लोगों को लगातार परेशान करने के बाद हुआ। पेट्रोल बम भी उन्होंने ही फेंके।
अरुंधति का दावा है कि मोदी सरकार कोरोना की आड़ में मीडिया को दबा रही है। युवा नेताओं को गिरफ़्तार किया जा रहा है और विरोधियों को कुचला जा रहा है। वो राजद छात्र नेता हैदर की ओर इशारा कर रही थीं, जिसे दिल्ली दंगों में उसकी भूमिका के कारण गिरफ्तार किया गया है। अरुंधति दंगा करने वालों पर कार्रवाई का विरोध करती हैं। साथ ही वे जिन पत्रकारों और कथित एक्टिविस्ट्स की बात कर रही हैं, उनमें से कई हिंसा फैलाने के आरोपित हैं। किसे नहीं पता कि भीमा-कोरेगाँव हिंसा मामले में जो आज जेल में हैं, वो भी एक्टिविस्ट्स ही कहे जाते हैं।
अरुंधति इसके बाद आरएसएस को गाली बकने लगीं। उन्होंने कहा कि भाजपा और संघ भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। यहाँ तक कि वो हिटलर के नाजी काल से मोदी सरकार की तुलना करने लगीं और कहा कि जैसे जर्मनी में उस दौर में यहूदियों के नरसंहार के लिए तिकड़म आजमाए जाते थे, ठीक उसी तरह आज कोरोना का इस्तेमाल भारत में किया जा रहा। जबकि, मुल्ला-मौलवियों ने ही अधिकतर सरकारी दिशा-निर्देशों को धता बताते हुए मेडिकल सलाहों का मखौल उड़ाया। मोदी सरकार कोरोना से प्रभावी तरीके से निपट रही है, ऐसे में अरुंधति का ‘नाजी कार्ड’ खेलना वामपंथियों का पुराना पेशा है।
ये वामपंथी ‘नरसंहार’ जैसे शब्द का ऐसे प्रयोग करते हैं, जैसे किसी को एक थप्पड़ लगने का मतलब भी यही हुआ। उन्होंने झूठा आरोप लगाया कि मोदी सरकार मुसलमानों के लिए डिटेंशन सेंटर बनवा रही है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे अरुंधति रॉय फिक्शन लिखते-लिखते कथा-कहानियों की दुनिया में ही जीने लगी हैं। अरुंधति रॉय फेक न्यूज़ फैलाने वाले और झूठे फैक्ट चेकिंग करने वाले ‘ऑल्टन्यूज़’ को भी डोनेशन देती रही हैं।
TheTelegraph का झूठ: दलित का खाना मुसलमान ने नहीं खाया
मीडिया का प्रोपेगेंडा कैसे काम करता है, इसको TheTelegraph के झूठ से समझिए। TheTelegraph का झूठ विचार को लेकर नहीं बल्कि पत्रकारिता के साथ है, खबरों के साथ है। भ्रामक हेडलाइन, गुमराह करने वाली तस्वीरें और बेहद अतार्किक आँकड़े, दक्षिणपंथी सत्ता-विरोधी मीडिया गुटों का यह प्रमुख हथियार हमेशा से ही रहा है। लेकिन यह चिंता का विषय तब बन जाता है, जब द टेलीग्राफ़ (The Telegraph) जैसे प्रोपेगेंडा-प्रमुख, कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के बीच भी ऐसे कुत्सित प्रयास करने से बाज नहीं आते।
द टेलीग्राफ़ ने उत्तर प्रदेश की एक घटना में 3 तरह की कलाकारी कर के पेश की हैं –
शीर्षक – खबर का शीर्षक है: “क्वारंटाइन में भी अस्पृश्यता” (Untouchability, even in quarantine)
फीचर फोटो – इस खबर के साथ बेहद अप्रासंगिक तस्वीर लगाई गई है, जिसमें कि आरएसएस की ड्रेस पहने कुछ लोग खाना खिला रहे हैं
आरोपित का नाम – इस घटना में दलित से खाना ना लेने वाले का नाम सिराज अहमद है, जो कि ना ही खाना परोसने वाला आरएसएस कार्यकर्ताओं में से एक है, ना ही पीड़ित दलित! सिराज वह आदमी है, जिसने दलित प्रधान के हाथों से खाना लेने से इनकार कर दिया था।

दलित महिला प्रधान द्वारा भोजन नहीं करने पर सिराज अहमद पर केस 
वास्तव में, यह घटना गत 10 अप्रैल को घटी है। घटना उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले की है, जहाँ ग्राम प्रधान लीलावती देवी ने भुजौली खुर्द गाँव के स्कूल में बने क्वारंटाइन सेंटर में रसोईया ना होने की वजह से खुद ही क्वारंटाइन में रखे गए पाँच लोगों के लिए खाना बनाया था।
द टेलीग्राफ़ ने उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति द्वारा दलित से खाना ना लेने की घटना को बेहद भ्रामक तरह से पेश करने का नया कारनामा किया है। इसमें उसने आरएसएस की छवि खराब करने का एक और असफल प्रयास किया है। लेकिन, अब कम से कम यह तो स्पष्ट है कि दलितों की तुलना कोरोना वायरस से करने वाले द टेलीग्राफ के लिए अस्पृश्यता और छुआ-छूत समाजिक चिंतन से कहीं अधिक उसके अपने निजी प्रोपेगेंडा का हिस्सा है और इससे अधिक कुछ नहीं।
इस घटना के बाद ग्राम प्रधान ने उप जिलाधिकारी देश दीपक सिंह और खंड विकास अधिकारी रमाकांत यादव को इस बारे में सूचना दी और पुलिस से लिखित शिकायत की। उन्होंने बताया कि इस मामले में सिराज अहमद के खिलाफ दलित अत्याचार विरोधी अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है।
इन पाँच लोगों में से 2 मुस्लिम थे। इनमें से एक सिराज अहमद नाम के व्यक्ति ने दलित के हाथ बना खाना खाने पर बिरादरी से बहिष्कृत हो जाने की बात कहकर भोजन करने से इंकार कर दिया था।
TheTelegraph का झूठ 
बंगाल से छपने वाले इस दैनिक अंग्रेजी ‘द टेलीग्राफ’ ने इस एक खबर के जरिए कई निशाने साधने की कोशिश की है। सबसे पहला मकसद तो यह कि लोगों का ध्यान खींचने में सफलता। क्योंकि भारत में ‘कॉन्ग्रेस काल’ से वैचारिकता दासता का प्रतीक यह तथाकथित समाचार पत्र निरंतर ही ऐसी हरकतें करता आया है, जिस कारण यह चर्चा का विषय बना रहा।
हाल ही में यही वामपंथी अखबार देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पर अपमानजनक और जातिसूचक व्यंग्य करते हुए उन्हें वायरस तक कह चुका है। अब द टेलीग्राफ़ के दोगले स्तर की पहचान यहीं पर की जा सकती है, कि महज कुछ दिन पहले ही समाज के वंचित समुदाय के किसी व्यक्ति को उसकी निजी गरिमा और पद को नजरअंदाज करते हुए उन्हें ‘वायरस’ तक कह देता है और कुछ ही दिन में अस्पृश्यता जैसे गंभीर विषय पर ज्ञान देते हुए एक हेडलाइन में बेचता नजर आता है।
द टेलीग्राफ के लिए अपनी विषैली मानसिकता के प्रसार के लिए तथ्यों से लेकर नैरेटिव को लेकर झूठ और भ्रम परोसना कोई नई बात नहीं है, वह सावरकर से लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक पर अपमानजनक व्यंग्य करता हुआ पाया गया है।
एक सबसे बड़ा ध्येय जो टेलीग्राफ का इस खबर के पीछे रहा, वह ये कि आरएसएस की छवि को धूमिल करने का प्रयास! इस रिपोर्ट में द टेलीग्राफ ने सभी बातों से ऊपर फीचर इमेज के लिए चुनी गई तस्वीर को रखा है, जिसमें आरएसएस के लोगों को खाना परोसते हुए दिखाया गया है, ताकि पहली दृष्टि में भ्रामक शीर्षक के साथ यही सन्देश जाए कि सिराज अहमद ने नहीं बल्कि खाना परोसने में आरएसएस लोगों को साथ जातिगत भेदभाव कर रहा है।
वास्तविकता तो यह है कि आरएसएस के कार्यकर्ता देशभर में क्वारंटाइन में भी वंचित, बेसहारा और भूखे लोगों को राशन उपलब्ध कराने से लेकर लोगों को हर प्रकार की मदद उपलब्ध करवा रहा है। लेकिन द टेलीग्राफ यहाँ पर बस यही साबित करता नजर आता है कि वह एक ‘घृणोपजीवी’ है और वह कभी भी विरोधी विचारधारा के कार्यों से संतुष्ट नहीं रहेगा। क्योंकि यदि वह ऐसा समझौता करता है, तो उसका अस्तित्व ही कुछ शेष नहीं रह जाता।
कश्मीरी पत्थरबाजों के बाद अब डॉक्टरों पर पत्थर फेंकने वालों के समर्थन में
भारत में कोरोना को फैलाने में तबलीगी जमात के लोगों की भूमिका स्पष्ट तौर पर सामने आई है। देश भर में कोरोना मरीजों की कुल संख्या के 30 प्रतिशत का जुड़ाव तबलीगी जमात से है। उत्तर प्रदेश और दिल्ली में तो यह आंकड़ा 60 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। लेकिन, संकट के इस दौर में लोगों की मदद करने की बजाय अरुंधति रॉय जैसी कथित बुद्धिजीवी अपने जहरीले बयानों से एक खास वर्ग को उकसाने के काम में जुटी हैं। और भी दुखदायी यह है कि अरुंधती जैसे लोग यह काम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कर रहे हैं। ये वही लोग हैं जो कोरोना का इलाज कर रहे डॉक्टरों पर होने वाले हमलों पर चुप्पी साधे रखते हैं। जर्मन न्यूज एजेंसी नेटवर्क डॉचे वेले को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि कोरोना संकट से निपटने की सरकार की रणनीति भारत में मुस्लिमों के खिलाफ नरसंहार के हालात पैदा कर रही है। अरुंधती के इस बयान को पाकिस्तान के पीटीवी ने प्रमुखता से दिखाया और इसे भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने में जुटा है। यह पहला मौका नहीं है जब अरुंधती ने देश के खिलाफ विषवमन किया हो। कश्मीरी पत्थरबाजों से लेकर अफजल गुरु और एनपीआर तक पर अरुंधती का रुख देश के खिलाफ रहा है।
देश को धता बताते अरुंधती के बोल
  • NPR पर जानकारी मांगी जाए तो अपना नाम रंगा-बिल्ला बताइए
  • कश्मीर समस्या का एकमात्र हल कश्मीर की आजादी है
  • 70 लाख भारतीय सैनिक मिलकर ‘आजादी गैंग’ को हरा नहीं पाते
  • अफजल गुरु के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे
  • 1998 में अटल सरकार का परमाणु परीक्षण करना गलत था। (एजेंसीज इनपुट्स सहित)
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चीन से निकला कोरोना वायरस विश्व अर्थव्यवस्था को जरूर प्रभावित कर रहा है, वैसे भारत भी इससे अछूता नहीं। लेकिन जिस त.....

महाराष्ट्र : दो संतों की मॉब लिंचिंग पर क्यों मौन हैं ढोंगी लिबरल और सेक्युलर गैंग?

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
महाराष्ट्र में आज हिंदुत्व की बात करने वाली शिवसेना की सरकार है। लेकिन इस सरकार में हिन्दू सुरक्षित नहीं है। हिन्दुओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। पालघर में जिस तरह पुलिस की मौजूदगी में दो संतों और उनके ड्राइवर की मॉब लिंचिंग की गई है, उससे पूरा देश हैरान है। इस घटना को गुरुवार को अंजाम दिया गया, लेकिन इस मॉब लिंचिंग पर न तो उद्धव ठाकरे का बयान आया है और न ही लिबरल और सेक्युलर गिरोह का। 
हैरानी की बात यह है कि गौ-तस्करों के मामले में लिंचिंग-लिंचिंग की रट लगाने वाले बुद्धिजीवी संतों की हत्या पर मौन है। न तो टीवी चैनलों पर डिबेट हो रही और न ही कोई मार्च निकाला जा रहा है। इस घटना ने फिर साबित कर दिया है कि तथाकथित बुद्धिजीवियों को सिर्फ गौ-तस्करों की चिंता है।अब कोई #mob lynching, #intolerance, #award vapsi, #not in my name आदि किसी गैंगस्टर की आवाज़ नहीं निकल रही, किस बिल में छिपे बैठे हैं या उनके घर कोई महाशोक है? इतना ही नहीं एक्टर आमिर खान और उसकी पत्नी की भी आवाज़ नहीं निकल रही, जबकि यह मॉब लिंचिंग महाराष्ट्र से बाहर नहीं, महाराष्ट्र में ही हुई है। राहुल गाँधी, अरविन्द केजरीवाल, किसी वामपंथी तक की बोलती बंद है, मुंह में दही जमाए बैठे हैं, क्यों नहीं बोलते अब?     
मॉब लिंचिंग की यह घटना उस समय घटी जब पालघर जिले के गडचिनचले गांव के लोगों ने चोर होने के शक में तीन लोगों को उनकी कार से बाहर निकालकर उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। पुलिस के मुताबिक सुशील गिरि महाराज, जयेश और नरेश येलगडे एक वैन में बैठ कर सूरत में किसी शख्स के अंतिम संस्कार के लिए जा रहे थे। इन तीनों में से ही एक शख्स कार चला रहा था। इसी बीच 200 से अधिक ग्रामीणों ने तीनों को चोर समझकर रोक लिया। उन्होंने शुरुआत में तो उन पर पथराव किया और एक बार जब गाड़ी रुकी, तो तीनों को बाहर निकाला गया और लाठी-डंडों से जमकर पीटा गया। इसी दौरान ड्राइवर ने पुलिस को कॉल भी किया कि उनके वाहन पर हमला किया जा रहा है और ग्रामीण उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे थे। जल्द ही पुलिस टीम भी मौके पर पहुंच गई।
पुलिस टीम के पहुंचने पर भी ग्रामीण नहीं रूके, यहां तक कि उन्होंने पुलिस के वाहनों पर भी हमला कर दिया। खबरों के मुताबिक इस हमले में कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हो गए हैं। पालघर के कलेक्टर कैलाश शिंदे ने बताया, ‘जिन तीन लोगों की भीड़ ने पिटाई की उन्हें अस्पताल लाया गया था जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मामले में लगभग 110 गांवों वालों को पूछताछ के लिए पुलिस थाने में लाया गया है और आगे की जांच जारी है।’
महाराष्ट्र के पालघर में दो साधु और एक ड्राइवर की मॉब लिंचिंग के मामले में FIR दर्ज कर 110 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें से 101 लोगों को 30 अप्रैल तक पुलिस कस्टडी में भेजा गया है, जबकि 9 नाबालिगों को जुवेनाइल सेंटर होम में भेज दिया गया है।
साधुओं की निर्मम हत्या को लेकर साधु-संतों सहित नेताओं ने रोष जताया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने रविवार(अप्रैल 19) को इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की और चेतावनी दी कि अगर हत्यारों की शीघ्र गिरफ्तारी नहीं की गई तो महाराष्ट्र सरकार के विरुद्ध आंदोलन किया जाएगा।



पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कड़ी कार्यवाही की मांग 
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, “पालघर में जिस क्रूरता के साथ मॉब लिंचिंग हुई, वह मानवता को शर्मसार करने वाली है। पालघर में भीड़ हिंसा की घटना का वीडियो हैरान करने वाला और अमानवीय है। ऐसे संकट के समय इस तरह की घटना और भी ज्यादा परेशान करने वाली है। मैं राज्य सरकार से गुजारिश करता हूँ कि वह इस मामले की उच्च स्तरीय जाँच करवाएँ और जो दोषी हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।”


भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और प्रवक्ता बैजयंत पांडा ने भी घटना को लेकर रोष जताया है। उन्होंने इस घटना को शर्मनाक बताया और उद्धव सरकार को निशाने पर लिया। पांडा ने ट्वीट किया, “पालघर में पुलिस के सामने भीड़ हिंसा की घटना का वीडियो दहला देने वाला है। वह भी तब, जब कुछ ही दिन पहले उद्धव सरकार के शासन में एक पुलिसकर्मी और डॉक्टर पर हमला हुआ था। मीडिया के एक वर्ग ने इसे ‘संतों के भेष में चोरों’ का मामला बताकर घटना को कमतर दिखाया।”
स्टेट स्पॉन्सर्ड? या पुलिस स्पॉन्सर्ड?- रोहित सरदाना, आजतक पत्रकार 
आज तक के पत्रकार रोहित सरदाना ने भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कई सवाल खड़े किए। उन्होंने घटना का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “महाराष्ट्र के पालघर में हुई इस हत्या को क्या कहें? स्टेट स्पॉन्सर्ड? या पुलिस स्पॉन्सर्ड? महाराष्ट्र सरकार की शान में आए दिन कसीदे पढ़ने वाले फिल्मी सितारों में से कितनों ने इस बारे में ट्वीट किया?”
वहीं आज तक की पत्रकार श्वेता सिंह ने भी इसे प्रायोजित हत्या बताते हुए कहा, “एक वृद्ध साधु वर्दी से उम्मीद लगाए पीछे छिपे। तो उसने खुद उन्हें भीड़ को सौंप दिया! ‘चोर समझकर’ मारने वाली पूरी रिपोर्ट मनगढ़ंत दिख रही है। ये वीडियो तो प्रायोजित हत्या का है।” बता दें कि मीडिया गिरोह साधुओं की मॉब लिंचिंग कर हत्या की खबर की रिपोर्टिंग ‘चोर समझकर’ पीट-पीट कर हत्या के रूप में की है।

“आज भगवा के साथ हुए नरसंहार पर मुझे भारत का मौन खल रहा?-- एक्टर मुकेश खन्ना

एक्टर मुकेश खन्ना ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “आज भगवा के साथ हुए नरसंहार पर मुझे भारत का मौन खल रहा? क्या संन्यासी साधु संत का कोई मानवाधिकार नहीं होता? हिंदुत्व का राग अलापने वाली भगवा ध्वज लेकर चलने वाली सरकार क्या मर चुकी है? क्या सनातन के संहार के बाद देश खड़ा रह सकेगा? कोई अन्य संप्रदाय का धर्मगुरू होता फिर?”
सोशल मीडिया पर भी घटना को लेकर लोगों में काफी आक्रोश देखने को मिला। लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रियाएँ दीं। एक ने लिखा, “अगर पालघर ग़लती से यूपी में होता और मरने वाला तबरेज या अखलाक होता तो चूड़ियाँ टूटने की इतनी आवाज़ आती कि कोरोना मर जाता।”
आहत इंदौरी नाम के एक यूजर ने लिखा, “हिन्दुओं ने बेवजह किसी मौलवी की पुलिस के सामने पीट पीट कर हत्या कर दी होती तो ये अब तक अंतराष्ट्रीय खबर बन गई होती और कॉन्ग्रेस, सपा, बसपा आदि दलों का रो-रो कर बुरा हाल होता।”




एक अन्य यूजर ने लिखा, “बालासाहेब होते तो आज संतों को मारने वालों के हाथों को काट देते, लेकिन दुर्भाग्य से आज उनके बेटे की सरकार है जो कॉन्ग्रेस की गोदी में खेल रहा है।”
एक ने लिखा, “अखलाक ओर पहलू खान पर आँसू बहाने वाले लिबरल्स महाराष्ट्र के पालघर में 2 संत और उनके ड्राइवर को बड़े ही बेरहमी से लिंचिंग कर मौत के घाट उतार दिया गया तब चुप क्यों हैं?? कहाँ हैं लोकतंत्र के ठेकेदार?? क्यों… ये तो संतों की मृत्यु हुई है, कौन पूछता है संतों को?”
घटना की जानकारी मिलने पर शुरुआत में पहुंचे पुलिसकर्मी पीड़ितों को बचा नहीं सके क्योंकि हमलावरों की संख्या बहुत अधिक थी और भीड़ ने पुलिस वाहन में भी पीड़ितों की पिटाई की। कासा पुलिस स्टेशन के निरीक्षक आनंदराव काले ने बताया कि यह वीभत्स घटना गुरुवार को रात में 9.30 से 10 बजे के बीच हुई।
एक सीनियर पुलिस अधिकारी का कहना है कि फिलहाल मामले की सभी एंगल से जांच की जा रही है। इस बात की भी जांच की जा रही है कि क्या इलाके में सोशल मीडिया के जरिए अफवाह फैलाई जा रही है? आखिर इतने सारे ग्रामीण एक साथ कैसे जमा हो गए? ग्रामीणों से भी इसको लेकर पूछताछ की जा रही है।
जिस बेरहमी से संतों और उनके ड्राइवर को पीट-पीटकर मौत के घाट उतारा गया है और पुलिस पर पथराव किया गया। उससे पता चलता है कि महाराष्ट्र में सरकार बदलते ही देश और हिन्दू विरोधियों के हौसले बुलंद है। उन्हें न तो पुलिस का डर है और न कानून का। अब उनके निशाने पर बेकसूर साधु-संत हैं।
महाराष्ट्र में अपराधियों के हौसले इसलिए बुलंद है,क्योंकि उद्धव सरकार को कांग्रेस और एनसीपी का समर्थन हासिल है। इसलिए उद्धव सरकार कांग्रेस और एनसीपी नेताओं के संरक्षण में चलने वाले अपराधी गिरोहों पर लगाम लगाने में नाकाम साबित हो रही है। आज प्रदेश में अपराधी गिरोहों का बोलबाला है। बैशाखी पर चल रही उद्धव सरकार की कमजोरी और नाकामी का खामियाजा प्रदेश की बेकसूर जनता को भुगतना पड़ रहा है। 
क्या है पालघर मामला 
जूना अखाड़ा के 2 महंत कल्पवृक्ष गिरी महाराज (70 वर्ष), महंत सुशील गिरी महाराज (35 वर्ष) अपने ड्राइवर निलेश तेलगडे (30 वर्ष) के साथ मुंबई से गुजरात अपने गुरु भाई को समाधि देने के लिए जा रहे थे। दरअसल, श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा 13 मंडी मिर्जापुर परिवार के एक महंत राम गिरी जी गुजरात के वेरावल सोमनाथ के पास ब्रह्मलीन हो गए थे। दोनों संत महाराष्ट्र के कांदिवली ईस्ट के रहने वाले थे और मुंबई से गुजरात अपने गुरु की अंत्‍येष्टि में शामिल होने जा रहे थे।
इसी दौरान रास्ते में उन्हें महाराष्ट के पालघर जिले में स्थित दहाणु तहसील के गडचिनचले गाँव में पालघर थाने के पुलिसकर्मियों ने पुलिस चौकी के पास रोका। इसके बाद ड्राइवर के साथ दोनों संतों को भी गाड़ी से बाहर निकलने के लिए कहा गया और उन लोगों को पुलिस वालों ने, सड़क के बीच में ही बैठा दिया, कहा जा रहा है वहाँ गाँव के करीब 200 के आस पास लोग अचानक ही इकट्ठे हो गए।
फिर भीड़ ने, पुलिस वालों के सामने ही डंडे और पत्थरों से मार-मार कर दोनों सन्तों और ड्राइवर की बेरहमी से हत्या कर दी। बता दें कि यह गाँव और इलाका आदिवासी बहुल है और ग्रामीणों में ज़्यादातर ईसाई और कुछ के मुस्लिम समुदाय का होने का दावा भी संत समाज के कुछ लोगों द्वारा किया गया है।