Showing posts with label arfa khanum. Show all posts
Showing posts with label arfa khanum. Show all posts

जब मिले गुहा और आरफा के सुर: मोदी के लिए गालियां निकलनी थी !

रामचंद्र गुहा और आरफा खान्नुम
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
पिछले दिनों में राजस्थान में कॉंग्रेस नेता सचिन पायलट की बग़ावत और गहलौत सरकार के संकट में पड़ने से सवाल उठ रहा है कि अगर चुनी हुई सरकारों को भय या लालच से गिराया जा सकता है और अपनी मन-मर्ज़ी की पार्टी की सरकार को स्थापित किया जा सकता है तो फिर लोकतंत्र में चुनाव के मायने ही क्या रह गये? भारतीय लोकतंत्र की सेहत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम करने का तरीक़ा, विपक्ष की ज़िम्मेदारी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उपजे गंभीर सवालों पर जाने माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा से द वायर की सीनियर एडिटर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी से विस्तार से चर्चा की।
इनकी चर्चा पर तो बाद में आते हैं, सर्वप्रथम इनकी मंदबुद्धि से ही साक्षात्कार कर लिया जाए, देखिए :
Gandhi, others had agreed to hand over Netaji
Gandhi, Nehru, Jinnah &
 Azadhad agreed to
 handover
Subhas Chandra Bose
 to British Govt.
 He was subsequently
placed under house arrest
 by the British before
 escaping from India in 1940.

किस हैसियत से महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार से नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विरुद्ध अनुबंध पर हस्ताक्षर किये थे?
गाँधी वध क्यों : नाथूराम गोडसे | Gandhi ...क्यों नहीं गाँधी वध उपरांत चितपावन ब्राह्मणों के हुए नरसंहार की जाँच करवाई गयी? जबकि आज़ाद भारत में सबसे भयंकर नरसंहार आज तक दूसरा कोई नहीं हुआ।
क्यों नहीं गाँधी का पोस्टमॉर्टेम करवाया गया? क्यों नहीं, गांधीजी की सांसे चलते उन्हें निकटतम अस्पताल लेकर जाया गया?
क्यों नाथूराम गोडसे के कोर्ट में दर्ज वो 150 बयान जो उन्होंने माइक से पढ़कर दर्ज करवाए थे, को सार्वजनिक होने से प्रतिबन्ध लगाया गया था? गोडसे को गालियां देंगे, लेकिन उन बयानों पर चर्चा नहीं करेंगे, क्योकि बयानों की चर्चा करने पर तुष्टिकरण नीति का भंडा फूट जायेगा।
What is the conspiracy theory about the death of Netaji Subhash ...
गोडसे ने गाँधी को मारा क्यों?गुहा और खानम ने मोदी पर खूब प्रहार किए, लेकिन इतिहासकार और सीनियर एडिटर ने अपनी योग्यता पर सवाल खड़े कर दिए। इन्हें नहीं मालूम की लोकतंत्र की निर्मम हत्या तो देश में हुए पहले आम चुनाव में कांग्रेस ने कर दी थी, जब उत्तर प्रदेश के रामपुर से हिन्दू महासभा के उम्मीदवार विशन सेठ लगभग 6,000 वोटों से जवाहर लाल नेहरू के लाडले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को हराना हजम न होने पर, तुरंत तत्कालीन मुख्यमंत्री गोबिंद वल्लभ पंत को परिणाम पलटने के लिए बोला था कि "मुझे आज़ाद पार्लियामेंट में चाहिए।" और पंत ने साम, दाम, दंड और भेद अपनाकर अपने विजयी रथ पर सवार सेठ को बीच जुलुस से कलेक्टर ने अगवा कर मतदान केंद्र पर ले जाकर, उन्हीं के सामने उनकी वोटों को आज़ाद में मिलाकर हारे हुए उम्मीदवार को विजयी घोषित करवा दिया था। अपनी आँखों के सामने अपनी बर्बादी होते देख, सेठ रोते-बिलगते चिल्लाते रहे और वहां उपस्थित मजिस्ट्रेट, कलेक्टर और गणना अधिकारी कहते रहे कि "सेठ साहब हम अपनी नौकरी बचा रहे हैं।"
जब सोमनाथ मन्दिर के जीणोद्धार उपरांत उद्घाटन के लिए तत्कालीन महामहिम डॉ राजेंद्र प्रसाद को जवाहर लाल नेहरू क्यों मना कर रहे थे?
उनकी मृत्यु पर नेहरू क्यों नहीं शामिल हुए? क्यों नेहरू तत्कालीन महामहिम डॉ राधाकृष्णन को डॉ राजन बाबू की शव यात्रा में शामिल न होने के लिए मना करते रहे?
जब राजन बाबू का स्वास्थ्य बहुत ही नाजुक स्थिति में तब तत्कालीन गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने राजघाट के निकट इनकी समाधि के लिए कहा, तब नेहरूजी ने कहा कि "नहीं, वहां मेरी समाधि बनेगी। इनकी कहीं आगे बनाओ।" जब शास्त्री जी ने कहा कि "आगे यमुना अति निकट है, और बाढ़ का पानी आने पर समाधि को नुकसान पहुँच सकता है, उस नेहरूजी ने कहा था,"होने दो" 
1965 में हुए इंडो-पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सरकार द्वारा जब पाकिस्तान समर्थक गिरफ्तार देशद्रोहियों को उनकी मृत्यु उपरांत देशभक्त किसने घोषित किया? क्यों नहीं प्रधानमंत्री शास्त्री की रहस्यमयी मृत्यु की जाँच करवाई गयी? 
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जब अपने चुनाव विरोधी राजनारायण से मुकदमा हार गयीं थी, उस स्थिति में प्रधानमंत्री पद छोड़ने की बजाए देश में आपातकालीन क्यों लगाई? मीडिया पर सेंसरशिप क्यों लगाई?
जब कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर बने, तब रामजन्मभूमि विवाद पर आयी तारीख पर जज को घर बुलाकर कहा कि "मुझे तारीख नहीं, इस तारीख पर फैसला चाहिए", यह समाचार सुनते ही क्यों राजीव गाँधी ने तुरंत समर्थन वापस लेकर चंद्रशेखर सरकार को गिरा दिया था? आदि, आदि। एक लम्बी सूची है। 
https://www.facebook.com/watch/?v=601639617123950  
ऐसे में जब रामचंद्र गुहा जैसा इतिहासकार और पत्रकार आरफा खानम शेरवानी जैसी एक साथ बैठेंगे तो कल्पना करिए कि इनके बीच हुई बातचीत का बॉयप्रोडक्ट क्या निकलेगा। बिलकुल सही समझा आपने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भरपूर घृणा और भाजपा के लिए ढेर सारी नफरत।
साक्षात्कार के नाम पर वामपंथ प्रमाणित अलग-अलग क्षेत्रों की दो कालजयी शख्सियतें द वायर पर एक साथ बैठीं। मकसद अलग-अलग विषयों पर नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ जहर उगलना।
परेशानी मोदी सरकार से है या फिर कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने से?
इंटरव्यू की शुरुआत से ही आरफा अपने मेहमान रामचंद्र गुहा से भाजपा सरकार पर सवाल शुरू करती है। सवालों से ज्यादा उनके शब्दों में इस बात की नाराजगी झलकती है कि आखिर मोदी प्रदेशों में पार्टी की सरकार बनाने पर क्यों आतुर हैं।
वो पूछती हैं कि आखिर केंद्र में बैठे लोग क्यों राज्यों में सरकार गिरा रहे हैं? क्या इससे लोकतंत्र सुरक्षित रह गया है? रामचंद्र गुहा भी अपनी पर्सनेलिटी के हिसाब से इन सवालों का जवाब देते हैं। लेकिन मध्यप्रदेश में कॉन्ग्रेस सरकार गिरने से आहत दोनों वामपंथ सर्टिफाइड वरिष्ठ भूल जाते हैं कि राज्य सरकार बनने पर जिस भाजपा को आज लोकतंत्र का खतरा करार दिया जा रहा है, उसी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को 13वें लोकसभा चुनाव में सियासी उलटफेर के चलते अपनी केंद्र से हाथ धोना पड़ा था। लोकतंत्र पर खतरा उस समय नहीं आया था शायद। क्योंकि लोगों ने उसे राजनीति का हिस्सा मान लिया था।

आज मध्यप्रदेश में सीट जाने का दुख है। मगर, ये नहीं समझना चाहते कि इसके पीछे भाजपा उत्तरदायी कैसे है? क्या सिंधिया के मन में खटास भाजपा ने पैदा की या फिर कॉन्ग्रेस के उस नेतृत्व ने जो आज भी परिवारवाद के पुराने ढर्रे पर पार्टी को नेहरू की कॉन्ग्रेस साबित करना चाहता है और काबिल नेताओं को दरकिनार कर। आज राजस्थान में भी जो हालत है- क्या उसके लिए जिम्मेवार बीजेपी है या फिर सीएम गहलोत जैसे कॉन्ग्रेसी ओल्ड गार्डों का अहंकार। जिन्होंने पायलट की काबिलियत को हमेशा से नकारा।
हर कोई इस बात को जानता है कि मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट ने कॉन्ग्रेस को जिताने के लिए क्या कुछ नहीं किया। उनकी क्षमताओं की अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब सिंधिया पार्टी से हटे तो मध्यप्रदेश में सरकार गिर गई और जब पायलट गए तो कई नेताओं ने उनका समर्थन किया।
आरफा खान्नम और रामचंद्र गुहा आज भाजपा को लोकतंत्र पर खतरा बता रहे हैं। लेकिन इस पर बात नहीं करते कि कॉन्ग्रेस पार्टी में वे कौन सी कमियाँ हैं जिसके कारण जरा सी सियासी बयार पर उसकी कुर्सी हिल जाती है।
मीडिया का स्वरुप किसने बदला मोदी या वामपंथियों ने?
साक्षात्कार में बात निकलती है कि पिछले कुछ सालों में राजनीति का स्वरूप बहुत बदल गया है। बिलकुल बदला है और समय की माँग है राजनीति में बदलाव। संसाधन, माध्यम, तकनीक, बौद्धिकता, सजगता कुशलता सब इस बदलाव में बराबर के हिस्सेदार हैं। मगर, कोई बता सकता है कि मीडिया का स्वरूप क्यों बदला? और क्यों बदला मीडिया के सवाल पूछने का ढंग?
क्या कारण है कि राजनीति गलियारों में मची हलचल का आँकलन करने से ज्यादा मीडिया के लिए सवाल ये है कि आखिर ये क्यों हुआ और कैसे इसे लोकतंत्र के लिए घातक कहा जाए। आखिर क्यों सूचनाओं से ज्यादा प्रोपेगेंडा परोसा जा रहा है? क्यों ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख से ज्यादा उनका महिमामंडन हो रहा है?
जो लोग देश की अर्थव्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। क्या उन्हें नहीं मालूम कि यूपीए में भी एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ था। क्या उस समय विषय गर्माया था? शायद नहीं। क्योंकि तब बोलने की आजादी की नहीं थी। बात चमचागिरी की थी।
भाजपा के ख़िलाफ़ विकल्प, एकमात्र विकल्प को सर-आँखों पर बैठाने की थी और उन्हीं की नीतियों की जी हुजूरी की थी। आज जब समय बदला तो कुछ गिने-चुने शब्दों के आधार पर सवाल-जवाब हो रहा है।
अब आगे इंटरव्यू में बात करते हुए गुहा दावा करते हैं कि भाजपा की राजनीति का एक स्वरूप ये भी है कि जो उनकी बात नहीं मानता उसके पीछे जाँच एजेंसी लग जाती है और सुप्रीम कोर्ट भी अपना काम सही से नहीं कर पाती। गुहा जी के ऐसे सवालों का क्या जवाब हो खुद सोचिए।
क्या निराधार मामलों में किसी राजनेता को बेवजह फँसाया जा सकता है वो भी तब जब सबूत ही न मिले। किसी पर केस तब होता है जब उसका इतिहास काले चिट्ठों में सना हो। पूर्व मंत्री व कॉन्ग्रेस नेता चिंदंबरम का मामला लीजिए। जब चिदंबरम जेल गए तब बातें उठी कि अमित शाह का बदला है। क्या पर्याय था ऐसी अनर्गल बातों का? क्या चिंदबरम का INX घोटाले से कोई लेना देना नहीं था?
सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं बक्शा 
सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठाना भी आज इस धड़े के लिए आसान हो चुका है, क्योंकि वहाँ से सुनवाई हर तारीख पर टलने की बजाय अब फैसला आ रहा है। ऐसे लोगों को तो खुश होना चाहिए कि जिन मुद्दों पर कभी किसी ने कॉन्ग्रेस काल में सोचा नहीं था कि फैसला आ पाएगा, उन पर सुप्रीम कोर्ट तेजी से सुनवाई करके उन्हें सुलझा रहा है। मगर, नहीं, क्योंकि फैसला इनके विरुद्ध है तो न्यायपालिका पर आरोप मढ़ना इनके लिए आसान है।
आगे बात भाजपा पर आने वाले पैसे की अकॉउंटिबिलीटी की। गुहा कहते हैं कि पता ही नहीं चल रहा पार्टी के पास पैसा कहाँ से आ रहा है। कहाँ से वह विधायकों को खरीदने के लिए पैसे खर्च कर रही है।
विचार करिए, देश का इतना जागरूक नागरिक जो आज किसी पार्टी के बारे में कुछ पता लगाना चाह रहा है और सूचनाएँ उससे छिपा ली जा रही है। ऐसा मुमकिन है क्या? अगर ऐसे ही मुखर होकर इतिहासकारों और पत्रकारों की लॉबी ने कॉन्ग्रेस से उस समय में सवाल किया होता तो आज जो राजीव गाँधी फाउंडेशन के नाम पर जो कारनामे सामने आ रहे हैं, उनकी जगह उन मामलों पर हुई कार्रवाई सुर्खियों में होती और लोग ये सोच रहे होते कि विश्वासघात के नाम पर कॉन्ग्रेस कहाँ-कहाँ अव्वल रही।
चापलूस कौन?
दोनों बुद्धीजीवि द वायर के बैनर तले बैठकर देश के प्रधानमंत्री के लिए बोलते हैं उनका कोई सलाहकार समूह नहीं है। सिर्फ़ चापलूसी समूह है। अपनी बात को बैलेंस करते हुए एक जगह वीडियो में गुहा ये कहते नजर आते हैं कि कई जगहों पर नरेंद्र मोदी, इंदिरा गाँधी से आगे निकल गए हैं।
हालाँकि थोड़ी ही देर बाद ये कह देते हैं कि इंदिरा गाँधी ने कभी भी सेना से छेड़छाड़ नहीं की। वे अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए तरह तरह के आरोप लगाते हैं। मगर, भूल जाते हैं आपातकाल के समय क्या हुआ था? वो आपातकाल जहाँ किसी को अपने पक्ष और विपक्ष में रखने की बात ही नहीं थी। सिर्फ़ सेंसरशिप थी।
गुहा को नहीं मालूम कि  कॉन्ग्रेस ने कैसे एक सार्वजनिक स्थान (डीडी चैनल) को राजनीतिक प्रतिद्वंदी को निशाना बनाने के लिए उपयोग किया था। जब अमेरिका ने नरेंद्र मोदी का वीजा देने से मना कर दिया था तो उसकी खुशी मिठाई बाँटकर हुई थी। सोचिए ये कारनामा तब का है जब नरेंद्र मोदी सीएम थे।
गुहा के साक्षात्कार की गंभीरता इस बात से लगाइए कि उनका मत है कि आज के दौर में एनडीटीवी, द वायर जैसे संसथान स्वतंत्र रूप से खड़े और बाकी सारे डर गए हैं। उनका कहना है कि इन लोगों में विज्ञापन आदि का डर रहता है। रही बात एंकर्स की तो केवल रवीश कुमार को छोड़ दिया जाए तो सभी इनकी चापलूसी और चमचागिरी करते हैं। गुहा को ये सब देखकर लगता है कि हम अकबर या राणा प्रताप के समय में आ गए हैं।
अंग्रेजी अख़बारों पर भी गुहा का गुस्सा 
इस साक्षात्कार के बीच में तो आपको ये भी लगेगा कि रामचंद्र गुहा मोदी सरकार की तारीफें सुनकर इतना ज्यादा थक चुके हैं कि उन्हें कोई अखबार पसंद नहीं। वो हिंदुस्तान टाइम्स से लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया पर अपना गुस्सा उतारते हैं। उनका कहना है कि ये अखबार हफ्ते के तीन दिन नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हैं। आक्रमक भाव के साथ गुहा पूछते हैं कि बताइए क्या ये सब पहले होता था?
आरफा खानम की पत्रकारिता 
इस इंटरव्यू के साथ आपको रामचंद्र गुहा की कुंठा और आरफा खानम के चेहरे पर शांति का भाव बताएगा कि ये पूरा मुद्दा दोनों के लिए कितना अहम है। याद करिए यही आरफा खानम को जब इन्होंने मोहम्मद आरिफ के साथ इंटरव्यू किया था। नरेंद्र मोदी और उनकी कार्यनीति पर उनकी सहमति देखते हुए जैसे आरफा सवाल पर सवाल पूछना चाहती थीं। मगर रामचंद्र गुहा को शांत चित के साथ सुनी जा रही हैं।
आगे जब सवाल भी करती हैं तो किसी बात का कोई काउंटर नहीं बल्कि उन्हीं बातों को उन बिंदुओं से विस्तार देती हैं जिन्हें गुहा करना भूल गए। वो ताली-थाली को मिले जनसमर्थन पर सवाल उठाती है और लोगों की मंशा पर प्रश्न करती हैं। साथ ही इसी आधार पर मोदी सरकार को घेरती हैं और पूछती हैं कि इन लोगों को सड़कों पर नाचने का और सड़कों पर बम पटाखे जलाने का किसने अधिकार दे दिया?
अब जाहिर है कि ये अधिकार नरेंद्र मोदी ने या भाजपा सरकार ने उन्हें नहीं दिया। ये उसी लोकतंत्र देश के नागरिक हैं। जिनकी मनमर्जियाँ उनके घरों की गलियों में तब भी चल रही थी जब कॉन्ग्रेस थी और वही मनमर्जियाँ अब भी चल रही हैं। इसके अलावा द वायर की गंभीर पत्रकार को जरूरत है ऐसे सवाल पूछने से पहले ये समझने की कि जब नरेंद्र मोदी ने दोनों कार्य करने की अपील लोगों से की तो देश में लॉकडाउन लगाकर। उनका मकसद वही था जो उन्होंने कहा। मगर लोगों ने उसे गलत समझकर क्या किया। इसका ठीकरा वो नरेंद्र मोदी के सिर माथे नहीं फोड़ सकतीं। आरफा आगे अपने शो में नरेंद्र मोदी को कम्युनल इंदिरा गाँधी कहलवाना चाहती हैं और गुहा कहते हैं कि कम्युनल तो हैं ही साथ में घमंडी भी हैं।
इस इंटरव्यू को सुनिए और महसूस कीजिए कि एक वामपंथ सर्टिफाइड इतिहासकार की बातों में बैलेंस करने के नाम पर नरेंद्र मोदी से समकक्ष इंदिरा गाँधी का उदहारण जरूर है। मगर, ये स्पष्ट रूप से कहने की क्षमता नहीं है कि इंदिरा गाँधी के राज में कुछ भी गलत हुआ।
अवलोकन करें:-



NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
19 मई 1910 को मुम्बई – पुणे के बीच ‘ बारामती ‘ में संस्कारित राष्ट्रवादी हिन्दु परिवार मेँ जन्मेँ वीर नाथूराम गोडसे एक ....
उनके बातों से साफ पता चलता है कि इंदिरा गाँधी यदि कभी गलत के चरम पर भी पहुँची तो भी वो नरेंद्र मोदी से हर मायने में कम थीं। उनके मुताबिक नरेंद्र मोदी को भारत की और भारत की संस्कृति की समझ नहीं है। लेकिन इंदिरा गाँधी को थी। इंटरव्यू में गुहा स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि वे नरेंद्र मोदी की विचारधारा के साथ हिंदुत्व के ख़िलाफ़ हैं। लेकिन क्या करें भारत के पास अभी कोई विकल्प भी नहीं है।

मजहबी मुस्लिम मर्द न छेड़छाड़ कर सकते हैं, न ही बलात्कार : सदानंद धुमे

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
तबलीगी जमात की लापरवाही ने भारत की बड़ी आबादी को कोरोना वायरस से बचाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और देश के स्वास्थ्यकर्मियों की कोशिशों पर काफी हद तक पानी फेर दिया है। देशव्यापी लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के जरिए कोरोना वायरस संक्रमण पर काफी हद तक लगाम लगाने की उम्मीद थी, मगर अब आलम यह है कि तबलीगी जमात से जुड़े कोरोना वायरस मामले में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है।
अब ये जाहिल जमाती इलाज के दौरान महिला मेडिकल स्टाफ के साथ बदतमीजियाँ कर रहे हैं और डॉक्टरों के ऊपर थूक कर उन्हें संक्रमित करने की बेहूदी कोशिश कर रहे हैं। एक तरफ जहाँ पूरा देश इन तबलीगी जमात द्वारा फैलाए गए संकट से लड़ने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ इतना बड़ा क्राइम करने के बाद भी ये लोग अपनी बेहूदगी से बाज नहीं आ रहे। गाजियाबाद और कानपुर समेत कई जगहों से इनके द्वारा महिला स्टाफ के साथ बदतमीजियाँ की खबरें सामने आई। गाजियाबाद के एमएमजी हॉस्पिटल के आइसोलेशन वार्ड में रखे गए तबलीगी जमाती बिना कपड़ों, पैंट के नंगे घूम रहे थे, अश्लील वीडियो चलाने के साथ ही ये जमाती नर्सों को गंदे-गंदे इशारे कर रहे थे और नर्सों से बीड़ी-सिगरेट की माँग भी कर रहे थे।
आरफा खानम शेरवानी
आरफा का मानना है कि नर्सें झूठ बोल रही हैं 
वायर की आरफा खानम का दिल है कि मानता नहीं
जैसे ही यह खबर सामने आई, इस्लामी कट्टरपंथियों की वकालत करने वाला समूह सक्रिय हो गया। इनको हमेशा माफ कर देने वाले समूह ने इनके समर्थन में उतरकर उनके बचाव की भरपूर कोशिश की। इन्हीं में से एक थे- वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) के स्तंभकार सदानंद धुमे। उन्होंने ये साबित करने का भरसक प्रयास किया कि देश को कोरोना संकट में डालने वाले तबलीगी जमात के सदस्य निर्दोष हैं।
प्रोपेगेंडा वेबसाइट द वायर की वरिष्ठ संपादक आरफा खानम शेरवानी को तबलीगी जमात के सदस्यों की नंगई पर यकीन नहीं हो रहा। उन्हें लगता है कि गाजियाबाद से एमएमजी हॉस्पिटल में नर्सों के सामने जमात के सदस्यों के पतलून उतारने की खबरें झूठी हैं। आरोप लगाने वाली नर्सें प्रोपेगेंडा में शामिल हैं। यह दूसरी बात है कि एडीएम और एसपी के ज्वाइंट इन्वेस्टीगेशन में नर्सों के आरोप सही पाए गए हैं और इस तरह की हरकत करने वाले जमात के 5 सदस्यों पर मुकदमा भी दर्ज किया गया है।
लेकिन, आरफा ने यह मानने से इनकार कर दिया है कि तबलीगी जमात वाले महिलाओं के साथ बदसलूकी या उनका शोषण कर सकते हैं। उसने ट्वीट कर रहा है, “वे नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने वाले लोग हैं, जो मजहब/समाज की सेवा के लिए दुनियादारी यहॉं तक कि अपने परिवार से भी दूर रहते हैं।” आगे आरफा ने जोर देकर कहा है कि प्रोपेगेंडा अब बंद होना चाहिए।
आरफा ने चिर-परिचित विक्टिम कार्ड से भी तबलीगी जमात के करतूतों पर पर्दा डालने की कोशिश की है। उसके मुताबिक तबलीगी जमात को जिस तरह मीडिया निशाना बना रहा है वह सही नहीं है। इसके बहाने पूरे मुस्लिम समुदाय को नीचा दिखाया जा रहा है। उसने कहा, “खुदा न करे लेकिन जमात के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की वजह से यदि मुसलमानों पर हमला होता है तो मीडिया का प्रोपेगेंडा और अधिकारियों की चुप्पी इसके लिए जिम्मेदार होगी।”
आरफा जिन लोगों का बचाव कर रही हैं उनकी करतूतें केवल एक अस्पताल तक ही सीमित नहीं है। यूपी के अलग-अलग जिलों से जमातियों द्वारा हॉस्पिटल में बदतमीजी किए जाने की ख़बरें आ रही हैं। बिजनौर में 8 इंडोनेशियाई जमातियों ने अंडा-करी और बिरयानी की माँग की थी। साथ ही उन्होंने सफाई कर्मचारियों के साथ भी अभद्रता की थी। बस्ती और आगरा में भी बिरयानी माँग कर हॉस्पिटल कर्मचारियों को परेशान किया। मुरादाबाद में जमातियों ने दाल-रोटी खाने से इनकार कर दिया। दिल्ली के एलएनजेपी हॉस्पिटल और हैदराबाद के गॉंधी हॉस्पिटल में इनके उपद्रव के बाद पुलिस की तैनाती करनी पड़ी। इनलोगों ने सड़कों पर, अस्पतालों में, डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों पर थूक कर संक्रमण तक फैलाने की कोशिश की है। देश में जो नए मामले सामने आए हैं उनमें आधे से अधिक तबलीगी जमात के निजामुद्दीन स्थित मरकज से जुड़े हैं।



ऐसे में आरफा की प्रतिक्रिया से साफ है कि उम्माह के आगे उनके लिए कुछ भी मायने नहीं रखता। महिलाओं का सम्मान भी नहीं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नारी अधिकारों की कथित पैरोकार वामपंथी और मीडिया गिरोह के दूसरे सदस्य महिलाओं के इस उत्पीड़न और तबलीगी जमात की करतूतों का किस तरह बचाव करते हैं।
सदानंद धुमे
सदानंद धुमे 
मजहबी मुस्लिम मर्द न छेड़छाड़ कर सकते हैं, न ही बलात्कार : सदानंद धुमे
सदानंद धुमे ने द वायर की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी, जिन्होंने भी तबलीगी जमात के सदस्यों का बचाव किया और नर्सों पर झूठ बोलने का आरोप लगाया, के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वो तबलीगी जमात के विचारों के प्रशंसक नहीं है, लेकिन जिस किसी ने भी उनके साथ समय बिताया है, उनको पता है कि उनका रुढ़िवाद महिलाओं के लिए कितना उपयुक्त और पवित्र है। सदानंद धुमे यहीं पर नहीं रुके। उन्होंने आगे यह भी आरोप लगाया कि तबलीगी जमात के सदस्यों के अभद्रता की बातें झूठी हैं और सामान्य तौर पर मुसलमानों को बरगलाने की यह कोशिशें नीचता से परे है।
धुमे अपने ट्वीट के माध्यम से यह कहना चाह रहे थे कि सबसे पहली बात तो ये कि मजहबी मुस्लिम मर्द न तो छेड़छाड़ कर सकते हैं और न ही बलात्कारी हो सकते हैं और दूसरी बात उन्होंने कही कि जिन नर्सों ने तबलीगी जमात के सदस्यों के खिलाफ दुर्व्यवहार की शिकायत की थी, वे झूठ बोल रही थीं क्योंकि वो मुसलमानों की छवि को धूमिल करना चाहती थीं। धुमे ने मुसलमानों को धार्मिक पुरुष साबित करने की कोशिश और उनके बचाव में नर्सों द्वारा लिखित शिकायत को नकार दिया।
इन जाहिलों और अशिष्ट व्यक्तियों के बचाव में उतरने पर कई लोगों ने उन्हें आड़े हाथों लिया। लोगों ने ना सिर्फ उनसे कट्टरपंथी इस्लाम के लिए माफी माँगने के लिए कहा, बल्कि उन्हें महिला के खिलाफ हो रहे अपराध के लिए भी जिम्मेदार ठहराया।
दरअसल 2011 का एक मामला ही साबित करता है कि वास्तव में धूमे का ज्ञान कितना छिछला, तुच्छ और अधूरा है। 2011 में टोरंटो में एक इमाम पर यौन उत्पीड़न के लिए 13 मामलों के तहत आरोप लगाया गया था। 48 वर्षीय मोहम्मद मसरूर ने एक इमाम के रूप में काम किया और कई देशों का दौरा किया था, जिसमें बच्चों और युवाओं को कुरान की शिक्षा दी थी। पुलिस ने अपनी जाँच में मसरूर के पास से उसके खुद के पासपोर्ट के अलावा तीन अन्य नाम का पासपोर्ट पाया था। मसरूर के खिलाफ पाँच पूर्व छात्राओं ने खिलाफ दुर्व्यवहार के 13 आरोप लगाए गए थे। जानकारी के मुताबिक इमाम तबलीगी जमात का सदस्य था, जिसका उद्देश्य इस्लामिक आंदोलन को जमीनी स्तर पर चलाना था। यह आंदोलन काफी हद तक बांग्लादेश में सक्रिय है।
अवलोकन करें:-
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार केंद्र की सत्ता पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काबिज होने पर वर्षों से सत्ता की मल.....
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
साभार एक तरफ जहाँ पूरा देश कोरोना वायरस संकट...
सदानंद धुमे ने अपने ट्वीट में कहा कि चूँकि उन्होंने तबलीगी जमात के कुछ लोगों से मुलाकात की है और उनके अनुसार वो लोग ‘पवित्र’ थे, तो इसका मतलब ये है कि तबलीगी जमात का कोई भी सदस्य महिलाओं के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकता है। इसलिए महिलाएँ झूठ बोल रही हैं।

सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
ऐसा लगता है मानो जैसे-जैसे समय बीत रहा है, CAA-NRC का विरोध अब शाहीन बाग़ से होते हुए अपने असली रंग में आने लगा है। देशद्रोही नारे लगाने के कारण गिरफ्तार हुए शरजील इमाम के पकड़े जाने के ठीक एक दिन बाद ही सोशल मीडिया पर एक नया वीडियो शेयर होते देखा जा रहा है। इस वीडियो में CAA के विरोध प्रदर्शन के लिए जमा भीड़ को एक वकील द्वारा विशेष ब्रांड और कम्पनी के आर्थिक बहिष्कार की सलाह देते हुए देखा जा सकता है।
Image may contain: 1 person, smiling
 CAA विरोध के नाम पर आर्थिक जिहाद की माँग
CAA विरोधी मुसलमानों को स्वामी रामदेव, रिलायंस,अम्बानी और अडानी के उत्पादों के बहिष्कार करने के लिए बोल सकते हैं, लेकिन आज तक किसी में चीनी उत्पादों के बहिष्कार करने की हिम्मत नहीं हुई, जहाँ पर अब नए कुरान लिखे जाने की कवायद शुरू होने के अलावा इस्लाम पर इतनी पाबंदियां लगाई जा चुकी हैं, जिसका समय-समय पर अपने ब्लॉग में उल्लेख भी करता रहा हूँ। यदि इसका एक प्रतिशत भी भारत में हो रहा होता, CAA से कहीं अधिक चीख-पुकार हो रही होने के साथ-साथ सारे मानवाधिकार वाले भी शोर मचा रहे होते। लेकिन चीन में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर सब खामोश हैं, क्यों? इस बात को विश्व भी जनता है कि मुसलमान जितना सुरक्षित भारत में है, कहीं और नहीं। 

टाइम्स एक्सप्रेस द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो को बीजेपी नेता संबित पात्रा ने भी अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर किया है।

टाइम्स एक्सप्रेस के अनुसार, यह वीडियो उस वक़्त बनाया गया है जब वकील भानु प्रताप सिंह ने CAA पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद दिल्ली के मुस्तफाबाद में धरने पर बैठी जनता को संबोधित कर रहे थे।
इस वीडियो में वकील भानु प्रताप भीड़ को सम्बोधित करते हुए कह रहे हैं- “खुद को हिंदुस्तानी कहना बंद करो, हम भारतीय हैं। इस सरकार की सबसे बड़ी ताकत मीडिया है। वो मीडिया आज की तारीख में अम्बानी ने खरीद लिए हैं। ये अम्बानी ही आरएसएस और भाजपा की पैसे की तिजोरी हैं। बताओ हम टीवी देखकर किसे पैसा दे रहे हैं? अम्बानी को दे रहे हैं या नहीं? हम इनकी रीढ़ की हड्डी तोड़ देंगे। क्या ये सीरियल और पिक्चर हमारे आंदोलन से बढ़कर हैं? हम अपना पैसा दुश्मन को क्यों दें? हम अपना एक भी पैसा रिलायंस को नहीं देंगे। हम इस रिलायंस की कमर तोड़ देंगे।”
“….रवीश जी ने कहा था टीवी मत देख, हम नहीं माने। लेकिन अब तो मानो, सरकार हमें दफन करना चाहती है, मारना चाहती है। सरकार के पास पैसा, पुलिस, फ़ौज और अदालतें भी हैं। हमारे पास कुछ भी नहीं है, ना सरकार, ना फ़ौज, ना पुलिस। हमारे पास बस हमारी एकता और बुद्धि है। इसी बुद्धि का इस्तेमाल कर के आज यहाँ सब लोग निर्णय करो, हम आज से टीवी पर ताला लगा देंगे, टीवी नहीं देखेंगे। रिलायंस के जितने भी… जिओ के मोबाइल हैं, सब चेंज करो, एयरटेल के लो, चाहे आईडिया के लो, चाहे वोडाफोन के खरीदो, जिसके लो लेकिन रिलायंस की कमर तोड़नी है चाहे जो हो जाए। इसके अलावा रिलायंस का पेट्रोल पम्प, जितने भी उत्पादन हैं, कोई भी रिलायंस का उत्पादन, सबका बहिष्कार करो।”
“….इसके साथ-साथ इस रामदेव के जितने भी उत्पादन हैं सब कचरा हैं। सब गाय और गोबर ही तो खिला रहा है वो। इसको बंद करो। रामदेव का सब पैसा हमारे खिलाफ जाता है। हमारा ही पैसा, अधिकतर पैसा आरएसएस के लिए हथियार खरीदने के काम आ रहा है। हम इन दुश्मनों की कमर और रीढ़ की हड्डी तोड़ देंगे। जिसकी रीढ़ टूट जाती है, कभी सीधा खड़ा नहीं हो पाता है। ये काम हमें करना है, ये काम हम ही कर सकते हैं, कोई दूसरा नहीं करेगा।”
वकील भानू प्रताप आगे कहते हैं- “अपने दोस्त, रिश्तेदारों को समझाओ, हम लड़ाई के मैदान में हैं, हम पिकनिक नहीं कर रहे, हम सैर मनाने नहीं आए हैं, लड़ाई की रणनीति हमें अपनानी पड़ेगी और उसका इस्तेमाल करना होगा। अब बस एक जरुरी बात बताना चाहूँगा, साथियों हम सबको सबसे ज्यादा दिक्क्त पुलिस से होती है। क्योंकि कानून हमें मालूम नहीं है और हमारी अज्ञानता का वो फायदा उठाते हैं। ना हम अखिलेश यादव के भरोसे हैं, ना उस दिल्ली के मुख्य्मंत्री केजरीवाल के भरोसे हैं, जो इस आंदोलन में अभी तक एक बार भी नहीं आया।”

इस्लाम की हुकूमत लाने के लिए कैसे करना है बेवक़ूफ़ हिन्दुओ का इस्तेमाल

कुछ दिनों पहले तक कई खबरें आये दिन आती थी जिसमे मुस्लिम कट्टरपंथी कहते थे की हम वन्दे मातरम नहीं कहेंगे, और कई घटनाओं में तो जन गन मन का भी विरोध किया गया, पर इन दिनों देश भर में यही तत्व तिरंगा लेकर चल रहे है और राष्ट्रगान गा रहे है
असल में ये एक सोची समझी चाल है और इस बात को खुद मुस्लिम पत्रकार अरफा खानुम ने स्वीकार किया है, जहाँ सभी धर्म के लोग होते है वहां पर सेकुलरिज्म, देशभक्ति की बात करो, पर जहाँ पर सभी मुसलमान हो वहां पर इस्लामिक हुकूमत की बात करो
अरफा खानुम का विडियो सामने आया है जिसमे वो मुसलमानों की भीड़ के आगे बोल रही है और बता रही है की कुछ समय के लिए हमे भारत के प्रति वफादारी दिखानी है, हमे तिरंगा लहराना है, राष्ट्रगान भी गाना है पर ये चीज सिर्फ तब तक जब तक हम इस्लामिक सोसाइटी यानि भारत में इस्लाम की हुकूमत न ले आये
अरफा खानुम मुसलमानों की भीड़ को बताती है की अभी हम अल्पसंख्यक है अभी संख्या उतनी नहीं हैइसलिए अभी अल तकिया यानि छल छलावा करना होगा और सेक्युलर यानि बेवक़ूफ़ हिन्दुओ का अभी इस्तेमाल करना होगा, इसके लिए हमे तिरंगा लहराना पड़े तो लहराना होगा, राष्ट्रगान गाना पड़े तो गाना होगा

अरफा बताती है की भले हम कुछ समय के लिए सेकुलरिज्म को अपना लेते है पर हम कभी अपनी असल विचारधारा (गजवा हिन्द) को नहीं छोड़ेंगे और ये सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक के लिए है जब तक हम इस्लामिक सोसाइटी यानि भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते
अरफा खानुम किस प्रकार प्लान बता रही है वो आपको गौर से सुनना चाहिए, इन दिनों कट्टरपंथी तत्व जो तिरंगा लहरा रहे है, राष्ट्रगान गा रहे है वो इनकी स्ट्रेटेजी का हिस्सा है, सुनिए क्या कहती है अरफा
इस देश में काफी सारे सेक्युलर हिन्दू अरफा खानुम और इनके जैसे लोगों का मोदी विरोध में जमकर साथ दे रहे है, अरफा खानुम इन सेकुलरों के सामने तो भाईचारे, दलित, आदिवासी की बात करती है, पर मुस्लिम भीड़ के आगे वो पूरी प्लानिंग समझाती है
अवलोकन करें:-
About this website
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम इतिहासकार और लेखक विलियम डालरिम्पल (William Dalrymple) ने एक कार्यक्रम के दौरान यह स्वीकार किया कि देश में वामपं.....
About this website
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी. एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एक तरफ कांग्रेस और इसके समर्थक दल देश नागरिक संशोधन कानून के विरुद्ध मुसलमानों में ज....
About this website
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
चीन के शिनजिंग प्रांत में उइगर मुसलमानों की भाँति ही हजारों की संख्या में कजाकिस्तान के मुस्लिमों को भी बंदी बनाक....
अरफ़ा की इस बात से देश समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्षों को अपनी आंखें खोलने चाहिए, जो सेकुलरिज्म का हर वक़्त राग अलापते रहते हैं। वास्तव में हिन्दुओं का छद्दम धर्म-निरपेक्षों द्वारा मूर्ख ही बनाया जा रहा, बल्कि ये लोग स्वयं गजवा हिन्द बनाने में इन कट्टरपंथी स्लीपर सैल्स की मदद कर, भारत को पुनः गुलाम बनाने की ओर धकेल रहे हैं, जो अरफ़ा के बयानों से स्पष्ट झलक रहा है।  (एजेंसीज इनपुट्स सहित)