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उत्तर प्रदेश : 69000 शिक्षक भर्ती घोटाला मामला: टॉपर को नहीं पता देश के राष्ट्रपति का नाम

एसटीएफ करेगा यूपी टीचर घोटाला मामले की जांच
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जब से सोशल मीडिया का श्रीगणेश हुआ है, नितरोज ऐसे वीडियो आते थे, जिसमें अध्यापकों को अपने ही मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक के नाम जानने के अलावा अंग्रेजी में सप्ताह और महीनों के नाम नहीं लिख सकते। कक्षा में अध्यापिका द्वारा सोना, स्वेटर बुनने के अतिरिक्त मसाज करवाने के वीडियो आते रहे हैं। मायावती से लेकर आज योगी आदित्यनाथ की सरकार आ चुकी है। सवाल यह है कि पिछली सरकारों ने इस गंभीर समस्या पर मंथन क्यों नहीं किया? 
अभिभावक आखिर अपने बच्चों के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए स्कूल भेजते हैं, लेकिन उनके अध्यापक ही जब बेसिक शिक्षा से अज्ञान होंगे, बच्चों को क्या पढ़ाएंगे?
उत्तर प्रदेश के 69000 सहायक शिक्षक भर्ती मामले की जांच एसआईटी को सौंप दी गई है। डीजीपी मुख्यालय की तरफ से एसटीएफ को इस मामले की जांच सौंपी गई है।एएसपी रैंक की एसटीएफ टीम अब इस मामले की जांच करेगी। इस मामले में अब तक लगभग 11 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा मंत्री के मुताबिक एक गिरोह पंचम लाल आश्रम उच्चतर माध्यमिक स्कूल प्रयागराज से साठ गांठ कर परीक्षार्थियों की गैर कानूनी ढंग से मदद कर उनसे पैसे की वसूली करता था
उन्होंने कहा कि अभ्यर्थियों ने गलत तरीके से परीक्षा पास की है तो उन्हें डिबार किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर इस घोटाले में उसके प्रबंधक और संबंधित स्टाफ जो भी इसमें शामिल पाया जाएगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में आज प्रयागराज पुलिस ने धर्मेन्द्र को गिरफ्तार किया है।उत्तर प्रदेश में 69000 टीचरों की भर्ती परीक्षा के टॉपर धर्मेंद्र पर आरोप है कि इन्हें देश के राष्ट्रपति तक का नाम नहीं पता है। प्रयागराज की पुलिस ने आज उन्हें गिरफतार कर लिया है। दूसरी तरफ कांग्रेस इस पूरे मामले को यूपी का व्यापम घोटाला बता रही है
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गौरतलब है कि कट ऑफ मामले में देश की शीर्ष अदालत ने मंगलवार को आदेश जारी कर उत्तर प्रदेश सरकार को 37339 पदों को होल्ड करने का आदेश दिया था। साथ ही कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 जुलाई 2020 की तारीख तय की है। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से 40/45 के कटऑफ पर कितने शिक्षा मित्र पास हुए हैं, इसका डाटा मांगा था लेकिन शिक्षामित्रों का कहना है कि लिखित परीक्षा में टोटल 45357 शिक्षामित्रों ने फॉर्म डाला था, जिसमें से 8018 शिक्षामित्र 60-65% के साथ पास हुए

दिल्ली : शिक्षा क्रांति का काला सच

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दिल्ली के उप मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने एक किताब लिखी है- शिक्षा। इस किताब में सिसोदिया लिखते हैं कि अलग-अलग राज्यों में शिक्षा पर बहुत से काम हुए हैं। लेकिन इनमें एक बड़ी कमी यह रह जाती है कि इन प्रयासों से अच्छी शिक्षा देने का काम 5-10 प्रतिशत बच्चों तक ही हो पाया। बाकी के 90-95 प्रतिशत बच्चों को अगर शिक्षा देने का काम हुआ भी तो वह बेहद कामचलाउ तरीके से और खानापूर्ति के लिए ही।
सुनने में ऐसी बातें बहुत अच्छी लगती हैं। इस तरह की बातें सिसोदिया ही नहीं, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके अन्य साथी भी करते नज़र आते हैं। लेकिन खुद को गरीबों का हितैषी बता किए जाने वाले लंबे-चौड़े दावों की असलियत कुछ और ही है।
क्या सच में दिल्ली में 5 साल चली आम आदमी पार्टी की सरकार सभी बच्चों की एक समान चिंता करती रही? क्या सरकार की प्राथमिकता में 95 प्रतिशत स्कूल थे?
चुनावी बिगुल बजने से पहले दिल्ली सरकार ने करोड़ों खर्च कर दिल्ली के कोने-कोने में 3 स्कूलों के विज्ञापन टँगवाए। ये स्कूल हैं- वेस्ट विनोद नगर, खिचड़ीपुर और राउज एवेन्यू। वेस्ट विनोद नगर और खिचड़ीपुर, दोनों सिसोदिया के विधानसभा क्षेत्र पटपड़गंज का हिस्सा है। वहीं, राउज एवेन्यू दिल्ली के बीचो-बीच। सिसोदिया ने अपने क्षेत्र के मयूर विहार के साथ-साथ वेस्ट विनोद नगर में भी अत्याधुनिक स्विमिंग पूल बनवाए और प्रचार तंत्र के जरिए ऐसी हवा बनाई कि मानों दिल्ली के सभी स्कूलों में स्विमिंग पूल हैं। जिम की तस्वीर राउज एवेन्यू से ही आती है। यही नहीं सोशल मीडिया पर सबसे अधिक फोटो राउज एवेन्यू के ही दिखाई देते हैं जो कि सेंट्रल दिल्ली में है और सभी बड़े मीडिया घरानों के ऑफिस के नजदीक भी।
प्रचार तंत्र की रणनीति ही जबरदस्त थी। अपना चेहरा चमकाने के लिए सिसोदिया आधिकारिक विज्ञापन के 3 में से दो स्कूल अपने विधानसभा क्षेत्र का शामिल करवाते हैं। ओवरऑल गिने-चुने स्कूलों की फोटो दिखाकर यह नैरेटिव बनाने की कोशिश करते रहे हैं कि दिल्ली के स्कूल 5 साल में ही बदतर से विश्वस्तरीय हो गए हैं। इस कोशिश में लाखों बच्चों को बेरहमी से स्कूलों से निकाले जाने, बेहद ख़राब परीक्षा परिणाम, लगातार घटते बच्चे, दो तिहाई स्कूलों में साइंस की पढ़ाई न होना, लगभग आधे शिक्षकों के खाली पद और अतिथि शिक्षकों की गुणवत्ता का सवाल कहीं पीछे छूट जाता है। जबकि यही सवाल बच्चों के लिए मायने रखते हैं।
केवल 54 स्कूलों की चिन्ता 
आम आदमी पार्टी जब सत्ता में आई तो लगभग एक हजार स्कूल दिल्ली सरकार के अधीन थी। आप की सरकार ने सभी स्कूलों के एक समान विकास की चिंता करने की बजाय 6 महीने बाद मॉडल स्कूल के नाम पर अच्छा प्रदर्शन कर रहे गिने-चुने 54 स्कूलों को छाँट लिया। इन स्कूलों पर 250 करोड़ रुपए खर्च किए। शेष को उनके हाल पर छोड़ दिया।
जिन स्कूलों को बेहतर करने का जिम्मा लिया भी गया, उनकी हालत बाहर से चमकाने की कोशिश तो हुई, लेकिन असलियत जल्द सामने आ गई कि अधिकतर जगहों पर किया गया काम दोयम दर्जे का था। इंडियन एक्सप्रेस में 27 अगस्त 2018 को छपी रिपोर्ट की मानें तो 3 वर्ष बाद भी कई स्कूलों में बुनियादी सुविधाएँ नहीं थी। कई स्कूलों में करवाए गए काम की गुणवत्ता इतनी ख़राब निकली कि दरारें आने लगीं। 13 जिलों के डिस्ट्रिक्ट डिप्टी डायरेक्टर एजुकेशन ने ये शिकायत की थी कि दिल्ली टूरिज्म एंड ट्रांसपोर्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (DTTDC) में काफी खामियाँ है और कई जगह बड़े दरार काम खत्म होने के तुरंत बाद ही दिखने शुरू हो गए।
आज तक कोई यह नही बता पाया कि इन स्कूलों की हालत कैसी है। आज इन्हीं में से 8 स्कूलों की तस्वीर सोशल मीडिया पर शिक्षा क्रांति के दावे के साथ शेयर की जाती है। इनके अलावे बाकी स्कूल अपने हाल पर ही हैं। नए कमरे और छोटे-मोटे बदलाव को छोड़कर कहीं विशेष ध्यान नहीं दिया गया। फरवरी 2019 में आई दिल्ली के इकॉनोमिक सर्वे के रिपोर्ट की मानें तो 54 में से केवल 24 में ही काम अब तक पूरा हो सका है।
जो 5 नए स्कूल, स्कूल ऑफ एक्सीलेंस खुले, उनमें विद्यार्थी-शिक्षक का अनुपात दिल्ली सरकार की वेबसाइट के मुताबिक इस प्रकार है:
स्कूल का नाम ————— विद्यार्थियों की संख्या —————–शिक्षकों की संख्या
रोहिणी सेक्टर 17 —————— 841 ——————————— 48
कालकाजी ————————  362 ———————————- 40
मदनपुर खादर ——————— 811 ——————————— 38
खिचड़ीपुर ————————- 852 ——————————–    57
द्वारका सेक्टर 22 —————— 846 ——————————–   56
खिचड़ीपुर मनीष सिसोदिया के विधानसभा क्षेत्र पटपड़गंज में आता है। इस स्कूल में 15 बच्चों पर एक शिक्षक है। कालकाजी, जहाँ से सिसोदिया के शिक्षा सलाहकार आतिशी उम्मीदवार हैं, वहाँ 9 बच्चों पर एक शिक्षक हैं। दिलचस्प बात ये है कि ये 5 स्कूल किसी भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा में नहीं बनाए गए हैं। खिचड़ीपुर सिसोदिया का इलाका है, कालकाजी आतिशी, मदनपुर खादर अमानतुल्लाह खान और द्वारका आदर्श शास्त्री का विधानसभा क्षेत्र है।
लेकिन जैसे ही दिल्ली के बाकी के सामान्य स्कूलों की हालत देखेंगे तो पता चलेगा कि गरीबों की बस्ती में चलने वाले स्कूल में बच्चों की भीड़ तो है, लेकिन शिक्षकों की भारी कमी है। जो शिक्षक हैं भी, उनमें बड़ी संख्या अतिथि शिक्षकों की है। SC वर्ग के लिए आरक्षित कोंडली की बात हो या फिर बुराड़ी, संगम विहार, त्रिलोकपुरी, जहाँगीरपुरी, सुल्तानपुरी, खजूरी ख़ास जैसे इलाकों के स्कूल में शिक्षक-विद्यार्थी का अनुपात वैसा नहीं है, जैसा केजरीवाल के चहेते स्कूलों में।
एक नज़र कुछ प्रमुख स्कूलों पर:
स्कूल का नाम ————————– विद्यार्थियों की संख्या ————— शिक्षकों की संख्या
राजकीय कन्या विद्यालय बुरारी ——————– 2325 ———————————— 36
सर्वोदय कन्या विद्यालय निठारी ——————– 4412 ———————————— 57
सर्वोदय कन्या विद्यालय सुल्तानपुरी —————– 4240 ———————————— 67
सर्वोदय बाल विद्यालय खजूरी खास —————– 4549 ———————————— 74
सर्वोदय कन्या विद्यालय(जीनत महल), जाफराबाद —- 4641 ——————————   64
60-65 बच्चों पर एक शिक्षक, ये हाल दिल्ली की घनी आबादी में बसे तमाम स्कूलों की है।
अपने चहेते स्कूलों में अच्छे अच्छे शिक्षकों को बहाल कर, उनमें सारी सुविधाएँ दिखाकर केजरीवाल और सिसोदिया पूरी दिल्ली के स्कूलों को वर्ल्ड क्लास बताते हैं लेकिन सच्चाई बिल्कुल उलट है। जो सरकार 1030 स्कूलों में भी भेदभाव करती हो, कुछ ख़ास बच्चों पर पूरा ध्यान, बाकियों को अपने हाल पर छोड़ देती हो, आप उसके कामकाज के तरीके समझ सकते हैं।
बजट में गिने-चुने स्कूलों पर ध्यान 
दिल्ली सरकार के बजट का अध्ययन करेंगे तो चहेते और बाकी स्कूलों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार आपको स्पष्ट दिखेगा।
जब बात लाइब्रेरी बनाने की आई तो बाकी के स्कूलों को 5000 से लेकर 15000 तक की राशि दी, लेकिन अपने चहेते नए स्कूलों को एक-एक लाख रुपये दिए गए. इन पैसे का क्या हुआ, कुछ अता-पता नहीं। 
बच्चों के बैठने के लिए डेस्क-बेंच की बात आई तो फिर चहेते स्कूल ही हावी रहे। नए बने अपने सभी 5 चहेते स्कूलों में पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) को और कथित 54 मॉडल स्कूलों में दिल्ली टूरिज्म एंड ट्रांसपोर्ट डेवलपमेंट कारपोरेशन (DTTDC) के जरिये प्राथमिकता में आधुनिक बेंच-डेस्क लगवाए गए। इन्हीं की तस्वीरें दिखाई जाती है।
चीफ मिनिस्टर सुपर टैलेंटेड चिल्ड्रेन स्कालरशिप योजना के तहत भी केवल राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय और अपने चहेते 54 स्कूलों के चिन्हित बच्चों को ही लाभ पहुँचाने का काम हुआ, जिसके तहत IIT जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दिल्ली के नामी गिरामी कोचिंग संस्थानों की मदद ली गई। दिल्ली के 5 प्रतिशत स्कूलों के लिए विशेष व्यवस्था करने के नाम पर बाकि के गरीब बच्चों को उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया गया। गौरतलब है कि इन स्कूलों में विशेष कोचिंग के जरिए IIT की प्रवेश परीक्षा में पास हुए बच्चों की सफलता को आप सरकार अपनी सफलता बताती है। यही नहीं, यह झूठ फैलाने की भी कोशिश करती है कि यह पहली बार हुआ जब दिल्ली के सरकारी स्कूल के बच्चें IIT में गए। दिल्ली में पहले भी हजारों विद्यार्थी सरकारी स्कूल से ही पढ़कर IIT में गए हैं, जिनमें इन पंक्तियों के लेखक का भाई भी शामिल है, जो 2005 में IIT में पढ़ने गया और अभी कनाडा में एक बड़ी कंपनी में नौकरी करता है।
बात जब डिजिटल लर्निंग योजना के तहत बच्चों को टैबलेट देने की आई तो इसके लिए भी अपने चहेते 5 स्कूल ऑफ एक्सिलेंस को ही चुना गया। राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय को छोड़ दे तो किसी और स्कूल के कुछ गिने-चुने बच्चें ही इससे लाभान्वित होंगे। इस योजना के तहत 11वीं और 12वीं के सभी बच्चों को टैबलेट दिए गए है।
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नगर निगम स्कूल में धर्म के नाम पर अलग कक्षाएं
अब इस स्कूल की वीडियो देखिए, जो दिल्ली के स्कूलों में साम्प्रदायिकता का जहर घोले जाने को उजागर कर रही है। समझ में नहीं आता इस गंभीर मुद्दे पर #intolerance#award vapsi, #not in my name गैंग के अलावा गंगा-यमुना की तहजीब और संविधान की दुहाई देने वाले छद्दम धर्म-निरपेक्ष क्यों खामोश हैं? इतना ही नहीं, हिन्दू की दुहाई देने वाली भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस भी चुप्पी साधे हुए हैं। इस साम्प्रदायिकता के कौन है जिम्मेदार, आम आदमी पार्टी या नगर निगम में सत्ताधारी भाजपा? किसके आदेश पर स्कूल में धर्म के आधार पर कक्षाओं का विभाजन हुआ? मोदी जी क्या इसी तरह "सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास" होगा? जब इस स्कूल का यह हाल है, अन्य स्कूलों का भगवान ही मालिक है।

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने शासनकाल के दौरान जनता को ठगने का काम क.....
आज दिल्ली के 1030 स्कूलों में 1472401 बच्चें पढ़ते हैं लेकिन इनमें से इस सरकार का ध्यान 5 स्कूलों के लगभग 4000 बच्चों पर ही है। ये भी दिल्ली के ही बच्चें है लेकिन बाकी के बच्चें भी उसी तरह की सुविधाओं और सहयोग की अपेक्षा रखते हैं जैसे बाकी। लेकिन ये अपेक्षा NGO चलाने वाले नए बने राजनेताओं से नहीं की जा सकती, जिन्होंने आजीवन 2-4 उदाहरणों के जरिए ही लोगों को बेवकूफ बनाकर पैसे कमाए हैं।

दिल्ली : अच्छी शिक्षा नीति होने के बावजूद क्यों कम हो रहे बच्चे?


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने को अपनी राजनीति का केंद्र बताने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल लगातार किसी न किसी तरह के घोटाले में पड़ते जा रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनके उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया एक तरफ दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था की तारीफों के पूल बांधते नहीं थक रहे वहीं दूसरी तरफ आंकड़े इन सब बातों से इतर नजर आते हैं।
कुछ स्कूलों की खूबसूरत तस्वीरों और गतिविधियों की बातें कर सोशल मीडिया पर इस तरह का माहौल बनाया गया जैसे कि दिल्ली के स्कूलों में केजरीवाल सरकार कमाल कर रही है लेकिन असल हालात तो कुछ और ही हैं। दिल्ली में शिक्षा क्षेत्र में करीब 46 प्रतिशत बजट का खर्च नहीं होने, ड्रॉप आउट में बढ़ोतरी, 500 स्कूलों में प्रिंसिपल के खाली पद, आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्ल्यूएस) श्रेणी के हजारों बच्चों को दाखिला न मिलने सहित शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट समेत कई बातें सामने आई हैं।
केजरीवाल के खोखले वायदे 
असल में दिल्ली के सरकारी स्कूलों की हालत बाकी शहरों के मुकाबले पहले से ही अच्छी है। देश के कई स्कूलों में जहां बच्चे जमीन पर बैठ कर पढ़ाई करने को मजबूर थे उस समय भी दिल्ली के स्कूल अच्छी बिल्डिंगों में चल रहे थे। इसलिए केजरीवाल सरकार का यह दावा बेमानी लगता है, जिसमें वो कहते हैं कि दिल्ली के पिछड़े स्कूलों को उन्होंने वर्ल्ड लेवेल का बना दिया है।
दिल्ली में शिक्षा के नाम पर स्कूलों में हुए राजनीतिक प्रयोग को बिना किसी रिसर्च के उत्कृष्ठ घोषित कर दिया गया, इसके साथ ही इसे आदर्श शिक्षा मॉडल मानते हुए बाकी जगहों पर लागू करने की वकालत भी शुरू हो गई। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली के जिस शिक्षा मॉडल का गुणगान करते केजरीवाल सरकार नहीं थकती है वो असल में एक लंबे-चौड़े झूठ पर आधारित है।
केजरीवाल की नीतियों से बेहाल होते बच्चे 
दिल्ली की शिक्षा क्रांति के बड़े-बड़े दावे करने वाली केजरीवाल सरकार असल में शिक्षा प्रणाली में बिल्कुल फेल साबित हो रही है। दिल्ली में नौंवी क्लास के लगभग आधे बच्चे हर साल फेल हो रहे हैं। ऐसी ही स्थिति 11वीं के बच्चों की भी है, जिसमें से हर साल लगभग एक तिहाई बच्चे फेल हो रहे हैं।
सिर्फ इतनी नहीं है कि बच्चे फेल हो रहे हैं, असल में केजरीवाल सरकार की नीति से फेल हुए बच्चों की परेशानी बढ़ भी गई हैं। इस नीति के तहत फेल हो चुके बच्चों को दोबारा परीक्षा में भी बैठने नहीं दिया जा रहा है। अगर सत्र 2017-18 की ही बात करें तो 66 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जिन्हें दोबारा नामांकन नहीं करने दिया गया, जिसकी वजह से करीब 1 लाख बच्चे स्कूली शिक्षा नहीं ले पाए।
केजरीवाल सरकार की इस अघोषित नीति के चलते सबसे ज्यादा नुकसान 10वीं और 12वीं के छात्रों का हुआ जो फेल हो गए थे। इसमें से 91 प्रतिशत बच्चे दोबारा रजिस्ट्रेशन नहीं करा पाए, केजरीवाल सरकार ने यह बात खुद ही उच्च न्यायालय में मानी है।
भयावह नतीजे 
रिजल्ट के परिणामों को लेकर केजरीवाल सरकार अपनी तारीफ करने से कहीं नहीं चूकती है लेकिन वह इस बात को कभी नहीं बताती कि आखिर हर साल 12वीं की परीक्षा देने वाले छात्रों की संख्या में इतनी तेजी से कमी क्यों आ रही है।
दिल्ली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2005 से 2014 तक परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या 60,570 से बढ़कर 1,66,257 हुई थी, वह 2015 से घटते-घटते 2018 में 1,12,826 रह गई। इसके साथ ही केजरीवाल सरकार का प्राइवेट को पहली बार पीछे छोड़ देने का दावा भी गलत है। 2005 में 13 अंकों से दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ा और साल 2009 और 2010 में भी ऐसा हुआ। साथ ही पिछले 10 सालों में 12वीं के परिणाम कभी 85 प्रतिशत से कम नहीं रहे।
केजरीवाल सरकार 12वीं परिणाम का श्रेय खुद लेने में लगी हुई है लेकिन जैसे ही 10वीं क्लास के खराब परिणामों की बात आती है तो वह चुप्पी साध लेती है। वह इस बात को सामने नहीं लाती है कि 10वीं के सरकारी स्कूलों के परिणाम प्रइवेट स्कूलों के मुकाबले बहुत ही खराब हैं।
इस वर्ष की बात करें तो दिल्ली के सरकारी स्कूलों का रिजल्ट 71.58 प्रतिशत और प्राइवेट स्कूलों का 93.12 प्रतिशत रहा। पिछले सत्र में ये 69.32 प्रतिशत और 89.45 प्रतिशत था। मतलब पिछले साल 20 अंक से पीछे और इस साल 21 अंकों का फासला रहा है। जिन सरकारी स्कूलों ने साल 2013 में प्राइवेट स्कूलों को पीछे छोड़ा था, आज दो सालों से 13 साल के न्यूनतम आंकड़ों से भी पीछे हैं और इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं है।
सर्वे ने खोली पोल 
दिल्ली इकॉनोमिक सर्वे 2018-19 की रिपोर्ट के मुताबिक नामांकन लगातार घट रहे हैं। सत्र 2013-14 में जहां दिल्ली के 992 स्कूलों में 16.10 लाख विद्यार्थी पढ़ते थे, 2017-18 आते-आते बच्चों की संख्या घटकर 14.81 लाख रह गई। वहीं प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2,277 से घटकर 1,719 हुई लेकिन लेकिन नामांकित बच्चों की संख्या 13.57 लाख से बढ़कर 16.21 लाख पहुंच गई।
रिपोर्ट यह इशारा भी करती है कि दिल्ली में बहुत से बच्चे स्कूली शिक्षा से दूर हैं। 2014-15 में दिल्ली स्कूली शिक्षा ले रहे बच्चों की संख्या 44.13 लाख थी, वह 2017-18 में घटकर 43.93 लाख पहुंच गई और दिल्ली की जनसँख्या बढ़ी तो बच्चे कम कैसे हो गए!
लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित 
दिल्ली में शिक्षकों की भारी कमी है, हजारों पद खाली पड़े हैं। इनकी कमी भारी संख्या में नियुक्त अतिथि शिक्षकों से की जाती है जिनकी गुणवत्ता सवालों के घेरे में है। हाल ही में सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि 21,135 अतिथि शिक्षकों में से 16,383 शिक्षक नियुक्ति के लिए हुई परीक्षा में न्यूनतम अंक भी नही ला पाए। केजरीवाल सरकार इन्हीं शिक्षकों को स्थायी करने का दावा करती है। वहीं स्थायी प्राचार्य की कमी से भी दिल्ली के विद्यालय बेहद प्रभावित हैं, लगभग दो तिहाई स्कूलों में प्राचार्य पद खाली हैं।
500 नए स्कूल, 17000 शिक्षकों की बहाली, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के वादे, गिने-चुने स्कूलों की तस्वीर दिखाकर ये बताया जा रहा है कि शिक्षा में क्रांति हो गई है। आखिर इस कथित क्रांति से बच्चों को क्या फायदा हुआ जब आज भी दिल्ली के लाखों बच्चें स्कूली शिक्षा से वंचित हैं।
कक्षा में इतने डेस्क बच्चे गायब 
नगर निगम स्कूलों का साज़िशन खात्मा 
दिल्ली सरकार के पास केवल 1,030 स्कूल हैं और नगर निगम के जिम्मे लगभग 1,700 स्कूल आते हैं। प्राथमिक कक्षाएं अब तक नगर निगम के स्कूलों में होती थीं और माध्यमिक शिक्षा के लिए बच्चे दिल्ली सरकार के स्कूलों में जाते थे। केजरीवाल सरकार को जब 2017 में एमसीडी चुनाव में हार का सामना करना पड़ा तो अपने अधीन के स्कूलों में घट रहे नामांकन को रोकने और निगम स्कूलों को बंद करने के लिए आप सरकार ने बड़ी संख्या में अपने स्कूलों में प्राथमिक कक्षाओं में नामांकन लेना शुरू कर दिए।
इसके बाद 2014-18 के बीच रिकॉर्ड 319 स्कूलों में प्राथमिक कक्षाएं लगने लगीं। वर्तमान समय में 720 सर्वोदय विधालय की प्राथमिक कक्षाएं चल रही हैं, इसके साथ ही 144 स्कूलों में भी नर्सरी की पढ़ाई शुरू कर दी गई ताकि नगर निगम के स्कूलों को खत्म किया जा सके। राजनीतिक बदला लेने की नीयत से शिक्षकों के वेतन में देरी, स्कूलों के विकास पर ध्यान देने की बजाए उसे ख़राब साबित करने में ही सरकार लग गई।
हालत इतनी दयनीय हो गयी है, पुरानी दिल्ली में कुछ नगर निगम स्कूल केवल मतदान या फिर किसी निजी कार्यक्रम के लिए रह गए हैं। होने वाले कार्यक्रम और इस्तेमाल हो रही बिजली का खर्च कौन वसूल रहा है? और किसकी इजाजत से यह सब हो रहा है? जबकि 3 दशक पूर्व तक दो शिफ्टों में चलने वाले इन स्कूलों में हजारों बच्चे शिक्षा ग्रहण करते थे, आखिर किस कारण ये स्कूल बंद हो गए? क्यों नहीं हुआ इन स्कूलों का सुधार, कौन है इसका जिम्मेदार?
गायब होता गणित और विज्ञानं 
आज दिल्ली के एक तिहाई से भी कम सरकारी स्कूलों में विज्ञान की पढ़ाई होती है। इसके पीछे संसाधन की कमी का बहाना दे दिया जाता है और दो तिहाई स्कूलों में बच्चों को सामाजिक विज्ञान या वाणिज्य विषय लेकर पढ़ने के लिए विवस करदिया है।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 80 के दशक में 'गरीबी हटाओ' का नारा खूब बिका, इतना बिका की आज भी हर पार्टी 'गरीबी' के नाम को भ....
दिल्ली की शिक्षा से विज्ञान के साथ-साथ गणित भी गायब है। साल 2020 में सीबीएसई ने 10वीं की परीक्षा में बेसिक मैथ को एक आसान विकल्प के रूप में दिया तो देश के 30 प्रतिशत बच्चों ने इसे चुना। वहीं दिल्ली के रिकॉर्ड 73 प्रतिशत बच्चों ने बेसिक मैथ चुना ताकि वे गणित में फेल न हो सकें, वहीं दिल्ली सरकार ने सर्कुलर निकाल कर शिक्षकों को कहा कि वे बच्चों को समझाकर बेसिक मैथ लेने को राजी करें।

उत्तर प्रदेश के स्कूलों का हाल : डीएम के सामने इंग्लिश टीचर ही नहीं पढ़ सकीं चंद लाइनें

यूपी के स्कूलों का हाल, डीएम के सामने इंग्लिश टीचर ही नहीं पढ़ सकीं चंद लाइनें, VIDEOउत्तर प्रदेश में शिक्षा के गिरते स्तर को बयां करने वाली एक घटना सामने आई है। पिछले दिनों एक स्कूल में जब डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (डीएम) अचानक स्कूल में चेकिंग के लिए पहुंचे तो उन्होंने वहां पर इंग्लिश टीचर से एक बुक पढ़ने के लिए कहा तो वह एक भी लाइन नहीं पढ़ सकीं। ये मामला यूपी के उन्नाव जिले में सिकंदरपुर सरोसी का है। इस घटना से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इस घटना के बाद इंग्लिश टीचर को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड करने की सिफारिश कर दी गई
स्कूल का निरीक्षण करने पहुंचे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट देवेंद्र कुमार पांडेय ने कहा, 'महिला टीचर को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया जाना चाहिए। वह एक इंग्लिश टीचर है। इसके बाद भी वह एक लाइन इंग्लिश में नहीं पढ़ सकतीं।' इंग्लिश टीचर के इंग्लिश न पढ़ पाने की वजह से डीएम काफी उखड़ गए। जब महिला टीचर ने अपनी सफाई पेश करने की कोशिश की तो अधिकारी ने कहा, 'ये क्या है, आप बीए पास हैं, या नहीं हैं? मैंने आपसे बुक से ट्रांसलेट करने के लिए नहीं कहा, मैंने किताब से कुछ लाइन आपसे पढ़ने के लिए कहा और आप ऐसा भी नहीं कर सकीं।'

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट देवेंद्र कुमार पांडेय नवम्बर 29 को सिकंदरपुर सरोसी में स्कूल के निरीक्षण के लिए अचानक पहुंच गए। उन्होंने पहले क्लास में मौजूद बच्चों से इंग्लिश की किताब में से कुछ लाइनें पढ़ने के लिए कहा। जब बच्चे पढ़ते समय अटकने लगे तो उन्होंने महिला टीचर से किताब की कुछ लाइनें पढ़ने को कहा। अधिकारी ये देखकर खफा हो गए कि टीचर भी उन लाइनों को ढंग से नहीं पढ़ पा रही हैं। इसके बाद डीएम ने बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) को टीचर को सस्पेंड करने के लिए कहा। बीएसए प्रदीप कुमार पांडेय ने कहा, 'जब डीएम अपनी रिपोर्ट दे देंगे उसके बाद इस मामले में आगे कार्रवाई की जाएगी।'
ये कोई पहला अवसर नहीं, जब किसी अध्यापिका को अयोग्य पाया जा रहा है। पिछले कई वर्षों से सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो आते रहे हैं, जहाँ अध्यापक/अध्यापिका इंग्लिश में दिन एवं महीना भी ठीक नहीं लिखते पाए गए। लेकिन उस समय तक सोशल मीडिया इतना प्रभावी नहीं था। इतना ही नहीं, टीचर तो टीचर प्रिंसिपल तक को यह नहीं मालूम कि उनके प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री का नाम क्या है। टीचर का कक्षा में आराम से सोना एवं मसाज करवाने तक के वीडियो सोशल मीडिया पर आते रहे हैं, परन्तु कोई कार्यवाही नहीं हुई। ऐसे में प्रश्न होता है कि आखिर किस अनपढ़ नेता/अधिकारी के आग्रह पर ऐसे टीचरों की नियुक्ति हुई? जिस दिन गंभीरता से उत्तर प्रदेश, बिहार, और मध्य प्रदेश के कुछ प्रांतों में स्कूलों की जाँच करने पर आधे से अधिक टीचर सड़क पर आ जाएंगे। 
इससे दो दिन पहले उत्तर प्रदेश के ही सोनभद्र का स्कूल भी गलत खबरों के कारण चर्चा में आया था। उस समय प्राइमरी स्कूल में एक लीटर दूध को बाल्टी भर पानी में मिलाकर बच्चों को पिलाने का मामला सामने आया था। हालांकि इसके बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया गया था