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‘हिन्दुओं को नापसंद करने के चलते मुसलमानों के पाले में खड़े होना बड़ी भूल होगी’ – डॉ भीमराव आंबेडकर

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर स्थित दीक्षाभूमि में बाबा साहब डॉ. भीम राव आंबेडकर ने विधिवत बौद्ध धर्म स्वीकार किया। इसी दिन महाराष्ट्र के चंद्रपुर में आंबेडकर ने सामूहिक धर्म परिवर्तन का एक कार्यक्रम भी किया और अपने 385000 अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएँ दिलवाईं, जिनका सार ये था कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद किसी हिंदू देवी देवता और उनकी पूजा में विश्वास नहीं किया जाएगा। हिंदू धर्म के कर्मकांड नहीं होंगे और ब्राह्मणों से किसी किस्म की कोई पूजा अर्चना नहीं करवाई जाएगी। 

इसके अलावा उन्होंने मनुष्य की समानता और नैतिकता को अपनाने संबंधी प्रतिज्ञा ली थी, मगर आज के ‘नवबौद्ध’ उनके मूल्यों से कोसों दूर हैं। आंबेडकर के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले ‘नवबौद्धों’ में समानता और अहिंसा का कोई रूप नजर नहीं आता। हाल ही में उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई घटना को लेकर भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद उर्फ ‘रावण’ का हंगामा सबने देखा।

जय भीम-जय मीम गिरोह ने इस्लाम पर बाबा साहब के विचारों को पढ़ा भी है क्या?

गौर करने वाली बात यह है कि ‘जय भीम जय मीम’ का नारा देने वाले ‘नवबौद्ध’ रावण के लिए बाकी किसी और जाति की तो छोड़िए, दलित भी एक समान नहीं हैं। वो दलितों को भी एक नजर से नहीं देखते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हाथरस में हुई घटना को लेकर ‘रावण’ की नौटंकी तो हम सबने देखी, लेकिन क्या उसी राज्य के बलरामपुर में एक और दलित लड़की के साथ हुए बलात्कार पर रावण का बयान, ट्वीट या विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। नहीं न… क्योंकि यहाँ आरोपित ‘मीम’ थे और हाथरस में आरोपित ठाकुर थे।

इसलिए हाथरस पर ‘संवेदनाओं’ और ‘एकजुटता’ को बोरियों में भर-भर कर उड़ेला गया, लेकिन वही बोरियाँ बलरामपुर की दलित पीड़िता के लिए खाली हो जाती है। खुद को आंबेडकर का अनुयायी बताने वाले ‘नवबौद्ध’ यहाँ पर इसलिए चुप हो जाते हैं, ताकि उनका ‘जय भीम जय मीम’ वाला संतुलन बना रहे और मुस्लिम तुष्टीकरण होता रहे।

राजस्थान में भी दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर 'जय भीम जय मीम' का नारा देने वाले खामोश रहते हैं, क्योंकि वहां भी आरोपी 'जय मीम' ही होने के साथ-साथ कांग्रेस की सरकार है। अभी लगभग तीन दिन पूर्व ही वेतन मांगने पर शराब के ठेकेदार ने दलित को डीप फ्रीजर में जिन्दा मार दिया, किसी भी दलित प्रेमी की आवाज़ तक नहीं निकली और ना ही किसी मीडिया की।  

इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के 18 वर्षीय दलित छात्र राहुल की मुस्लिम लड़की के साथ प्रेम प्रसंग होने की वजह से मोहम्मद अफरोज और मोहम्मद राज ने अपने तीन अन्य साथियों के साथ मिलकर उस पर बर्बरतापूर्वक हमला किया। राहुल घायल अवस्था में ही अस्पताल पहुँचा जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

बलरामपुर और दिल्ली के आदर्श नगर की घटना ने दलित हितैषी कथित बुद्धिजीवियों को नंगा ही नहीं किया बल्कि उदित राज, मायावती और चंद्रशेखर जैसे कथित दलित हितैषी नेताओं की भी पोल खोल कर रख दी है। वे मौन हैं क्योंकि इस मामले में आरोपित न तो सवर्ण हैं और न ही बीजेपी से उनका कोई वास्ता। जय भीम-जय मीम के नाम पर दलितों के साथ होने वाले छलावे को यह मामला बेनकाब करता है। इसलिए सबने चुप्पी साध रखी है।

इन घटनाओं पर इनकी प्रतिक्रियाओं का अंतर यह भी बताता है कि कैसे मौकापरस्त गिरोह हमारे सामने किसी भी मामले को अपने एजेंडे के अनुसार पेश करता है। अपने नजरिए को ही अंतिम सत्य बताकर हम पर थोपने की कोशिश करता है। हाथरस मामले पर जिस सक्रियता से राणा अय्यूब जैसे कट्टरपंथी, दलित विचारक और उनके हितैषी बन बैठे थे, वह सभी इन घटनाओं पर मौन हो गए।

न किसी ने इस वाकये की निंदा की और न ही दलितों के भविष्य को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। कारण शायद सिर्फ़ एक ही था कि हाथरस में आरोपित सवर्ण निकल आया था, जो इनके एजेंडे के लिए फिट था और दिल्ली में आरोपित मुस्लिम थे, इसलिए ये इनकी राजनीति के लिए फिट नहीं बैठता है।

बाबा साहब ने इस बारे में चेताया था

देश में उथल-पुथल मचा रहे वामपंथियों और बात-बात पर हर किसी को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाने वाले यह बताएँ कि क्या किसी ने बाबा साहब को उस शिद्दत से पढ़ा भी है, उनके विचार समझने की कोशिश भी की है, जो कि आज के भारत के निर्माण में जरूरी भी है और समसामयिक भी। बाबा साहब अस्पृश्यता एवं जन्माधारित विशेषाधिकारों पर चल रही समाज व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे।

उन्होंने हिन्दू समाज रचना के विविध पहलुओं का गंभीर चिन्तन करने के साथ भारत में मुस्लिम राजनीति का भी विस्तृत अध्ययन किया था। डॉ. आंबेडकर ने भारत पर मुसलमानों के क्रूर तथा रक्तरंजित आक्रमणों का गहराई से अध्ययन किया था। उन चाटुकारों तथा दिशाभ्रमित वामपंथी इतिहासकारों को फटकारते हुए उन्होंने लिखा है, “यह कहना गलत है कि ये सभी आक्रमणकारी केवल लूट या विजय के उद्देश्य से आए थे।”

बाबा साहब आंबेडकर ने अनेक उदाहरण देते हुए बताया कि इनका उद्देश्य हिन्दुओं में मूर्ति पूजा तथा बहुदेववाद को नष्ट कर भारत में इस्लाम की स्थापना करना था। इस संदर्भ में उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक, अलाउद्दीन खिलजी, फिरोज तुगलक, शाहजहाँ, औरंगजेब और महमूद गजनवी की विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने बताया कि हिन्दू मंदिरों को तोड़कर उस पर मस्जिद बनाए गए। बाबा साहब दलितों की जितनी दूरी ब्राह्मणों से रखने के पक्ष में थे, उससे कहीं ज्यादा दूरी वो दलितों को इस्लाम से रखने के पक्ष में थे। 

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’
आंबेडकर इस्लाम में महिलाओं की स्थिति को लेकर चिंतित थे। वो बहु विवाह प्रथा के खिलाफ थे। आंबेडकर बहु विवाह प्रथा को महिला मुद्दों के साथ जोड़कर देखते थे। वो मानते थे कि इससे स्त्रियों को कष्ट होता है। उनका मानना था कि इस प्रथा में उनका शोषण और दमन होता है। हिन्दू समाज में जितनी कुरीतियाँ हैं, वो सभी मुस्लिमों में हैं ही, साथ ही कुछ ज्यादा भी हैं। मुस्लिम महिलाओं के ‘पर्दा’ प्रथा पर आंबेडकर ने कड़ा प्रहार करते हुए इसकी आलोचना की थी। उनका इशारा बुर्का और हिजाब जैसी चीजों को लेकर था। इन चीजों की आज भी जब बात होती है तो घूँघट को कुरीति बताने वाले लोग चुप हो जाते हैं।

इस्लाम में भाईचारा है, लेकिन कहाँ तक?

डॉ आंबेडकर ने साफ-साफ बताया, “मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इस्लाम विश्व को दो भागों में बाँटता है, जिन्हें वे दारुल-इस्लाम तथा दारुल हरब मानते हैं। जिस देश में मुस्लिम शासक है, वह दारुल इस्लाम की श्रेणी में आता है। और जिस किसी देश में जहाँ मुसलमान रहते हैं परन्तु उनका राज नहीं है, वह दारुल-हरब होगा। इसके अनुसार उनके लिए भारत दारुल हरब है। इस तरह वे मानव मात्र में और भाईचारे में बिल्कुल भरोसा नहीं रखते हैं। यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।”
इसके अलावा उन्होंने जिहाद पर चर्चा करते हुए कहा था कि हिजरत के अलावा मुस्लिम कानून की एक और निषेधाज्ञा जिहाद है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। ऐसे कई उदाहरण भी हैं कि उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में संकोच नहीं किया। इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं।
साभार:
‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

सिर्फ इस्लाम मानने वालों तक सीमित है भाईचारा

आंबेडकर के शब्दों में इस्लाम का भ्रातृत्व सिद्धांत मानव जाति का भ्रातृत्व नहीं है। यह मुसलमानों तक सीमित भाईचारा है। समुदाय के बाहर वालों के लिए उनके पास शत्रुता व तिरस्कार के सिवाय कुछ भी नहीं है। उनके अनुसार इस्लाम एक सच्चे मुसलमान को कभी भी भारत को अपनी मातृभूमि मानने की स्वीकृति नहीं देगा। मुसलमानों की भारत को दारुल इस्लाम बनाने की महत्वाकांक्षा हमेशा रही है। डा. अम्बेडकर ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था, “इस्लाम में राष्ट्रवाद का कोई चिंतन नहीं है। इस्लाम में राष्ट्रवाद की अवधारणा ही नहीं है। वह राष्ट्रवाद को तोड़ने वाला मजहब है।”

आखिर क्यों बाबा साहब बौद्ध धर्म की ओर ही गए

आंबेडकर ने इस्लाम और ईसाइयत को विदेशी मजहब माना। वह धर्म के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं मानते थे, लेकिन धर्म भी उनको भारतीय संस्कृति के अनुकूल स्वीकार्य था। इसी वजह से उन्होंने ईसाइयों और इस्लाम के मौलवियों का आग्रह ठुकरा कर बौद्ध धर्म अपनाया क्योंकि बौद्ध भारत की संस्कृति से निकला एक धर्म है।

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’
बाबा साहब के विचारों को समझने की जरूरत

1945 में डॉ. आंबेडकर की पुस्तक “थाट्स ऑन पाकिस्तान” प्रकाशित हुई, जिसने उनके प्रखर देशभक्त विचारों से अवगत कराया। भारत की राजनीतिक एकता को मूर्तरुप देने का जैसा शानदार कार्य सरदार पटेल ने अंजाम दिया, उसी कोटि का कार्य राष्ट्र की सामाजिक एकता को शक्तिशाली बनाते हुए बाबा साहब डॉक्टर आंबेडकर ने किया।

लेकिन दुखद है कि अलगाववाद की नीति अपनाने वाले भारत में ही रहने वाले कई लोग और वामपंथी ताकतें हमेशा इस देश को और इस एकता को खंडित करने में जुटे रहे हैं। कोरोना महामारी के बीच भी उनके यह प्रयास जारी हैं। जरूरी है कि बाबा साहब को ही नहीं उनके विचारों को भी व्यापक तरीके से तरजीह देते हुए उसे समझा जाए, अपनाया जाए।

उल्लेखनीय है कि बौद्ध धर्म को अहिंसा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। सम्राट अशोक ने भी शस्त्र त्याग कर बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा ली थी। लेकिन उसी बौद्ध धर्म और आंबेडकर के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले आज के ‘नवबौद्ध’ की सेना हिंसा और लोगों को भड़काने के अलावा कुछ नहीं करती है। चाहे वो हालिया हाथरस मामला हो या फिर सीएए के नाम पर दंगा भड़काने का। दलित परिवार को पीटने का आरोप हो या फिर स्वास्थ्यकर्मी पर हमला करने का। इन सभी कृत्यों में भीम आर्मी के नेता, कार्यकर्ता आगे रहते हैं।

                               साभार : 'पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया'

आज के भीमवादी और कांग्रेस उसी नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे हैं, जो बाबा साहब आंबेडकर का बहुप्रतीक्षित सपना था। एनडीए सरकार ने बाबा साहब आंबेडकर के एक लंबे समय से लंबित सपने को पूरा किया है, जिसकी अनुभूति वह अपने जीवनकाल में महसूस नहीं कर सके। सीएए पारित होने के साथ ही भीम आर्मी पार्टी और कांग्रेस समेत कई विरोधी दल एवं देश के बड़े वर्ग ने इस कानून का उग्र विरोध किया।

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’
उनका कहना था कि यह डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान के खिलाफ है, क्योंकि यह धर्मनिरपेक्षता और समानता का उल्लंघन करता है। ऐसी स्थिति में गौर करने वाली बात है कि यदि आज आंबेडकर जीवित होते तो इस अधिनियम पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती? 

दरअसल 1947 में देश के बँटवारे के बाद पाकिस्तान में हिन्दू और दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार होगा, यह दूरदृष्टा एवं मनीषी डॉ. आंबेडकर को उसी वक्त पूर्वाभास हो गया था। बाबा साहब आंबेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’ में विभाजन के कई महत्वपूर्ण अनछुए सवाल उठाए हैं। डॉ. आंबेडकर ने कहा था जब तक पाकिस्तान से एक-एक हिन्दू भारत वापस नहीं आ जाएगा तब तक विभाजन की प्रक्रिया शायद समाप्त नहीं होगी।

तो क्या आंबेडकर जानते थे कि जो गरीब पिछड़े, अनुसूचित जाति के हिन्दू पाकिस्तान में रह गए हैं वह इस्लामिक पाकिस्तान से एक दिन वापस जरूर भारत में शरण लेंगे? बाबा साहब को शायद इस बात का भान था कि जिन्ना ने भारत-पाकिस्तान का विभाजन कराते वक्त भले ही यह कहा हो पाकिस्तान इस्लामिक मुल्क न होकर धर्मनिरपेक्ष मुल्क होगा। लेकिन शायद ही उसके बातों पर किसी को भरोसा रहा हो और बाबा साहब की आशंका इस बात की तस्दीक भी करती है।

उन्होंने सभी दलितों को भी, जो पाकिस्तान में फँस गए थे, कहा था कि मुसलमानों या मुस्लिम लीग पर भरोसा करना उनके लिए घातक होगा। उनको किसी भी तरीके से भारत आ जाना चाहिए। उन्होंने तब सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि निजाम के राज हैदराबाद में रह रहे दलितों को भी चेतावनी देते हुए कहा था कि उच्चवर्गीय हिंदुओं को नापसंद करने के चलते मुसलमानों के पाले में खड़े होना एक बड़ी भूल होगी। कॉन्ग्रेस पार्टी और पंडित जवाहर लाल नेहरू की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति को लेकर उन्होंने कहा था कि वह पागलपन की हद तक मुस्लिमों के साथ हैं और अनुसूचित जातियों के लिए उनके हृदय में कोई स्थान नहीं है।

अब सोचने वाली बात है कि जिस मुस्लिम के लिए आंबेडकर ने दलितों को इतना ज्यादा चेताया था, आज भीमवादी उसी मुस्लिम के साथ गठजोड़ बनाकर घूम रहे हैं। क्या यही है उनका आंबेडकर वाला भारत? डॉ. आंबेडकर के बयानों को देखने के बाद तो यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि दलित-मुस्लिम गठबंधन बनाने की कोशिश करने वाला कोई भी नेता या पार्टी आंबेडकर की विरासत के साथ धोखा कर रही है।

खुद को ‘दलितों का मसीहा’ कहने वाली मायावती और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण भी सीएए के विरोध में और मुस्लिम के गले में हाथ डाले बैठे हैं। कारण वही वोट बैंक। अब इनके जैसे नेता भी जब डॉ. आंबेडकर का हवाला देकर इस कानून का विरोध कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि यदि डॉ. आंबेडकर का वश चलता तो वह देश के बँटवारे के वक्त ही इस समस्या को खत्म कर देते और ओवैसी जैसे नेता पाकिस्तान में होते, क्योंकि डॉ. आंबेडकर के लिए वोट बैंक नहीं, बल्कि देश महत्वपूर्ण था।

बाबा साहब का नाम बेच कर अपनी राजनीतिक फसल काटने वाले दलितों के तथाकथित हितैषियों ने यदि कभी मन से बाबा साहब के विचारों को पढ़ा और समझा होता तो ‘जय भीम-जय मीम’ गठजोड़ की बात ही नहीं करते। इनकी मानें तो मुगल आततायियों ने भारत में केवल ब्राह्मण-ठाकुर और अगड़ी जाति वाले लोगों को ही चुन-चुन कर मारा। उनकी यातनाओं के शिकार केवल और केवल अगड़ी जाति की बेटियाँ और महिलाएँ हुईं। 

मुगलों ने तो जैसे अनुसूचित जातियों के लोगों को गोद में खिलाया हो, मुगलों ने सदैव ही दलित महिलाओं का सम्मान किया हो, शायद यही वजह है जो आजकल के ‘नवबौद्ध’ जिनका वास्तविक ‘बौद्ध धर्म’ के विचारों से कोई सरोकार नहीं होता वो उसी मुगल के वंशजों को अपना हितैषी और हिन्दू धर्मावलंबियों को अपना दुश्मन समझते हैं। 

आए दिन किसी भी मंच पर भारतीय संविधान लहराते हुए पहुँच जाने वाले और अपनी हर दो पंक्ति में तीन बार बाबा साहब का नाम लेने वाले दलितों के स्वयंभू नेता कभी भी मुस्लिमों के प्रति बाबा साहब के विचारों का ज़िक्र तक नहीं करते। वो विभाजन और पाकिस्तान निर्माण पर बात करना भी नहीं चाहते। सम्भवतः उन्हें इस बारे में ज्यादा ज्ञान ना हो या फिर वो इस बारे के बात करके अपनी राजनीतिक दुकान बंद नहीं करवाना चाहते।

खुद को बौद्ध धर्मावलंबी बताना और ‘नमो बुद्धाय’ का नारा देने के पीछे उनकी एक ही मनसा नजर आती है वो है हिन्दू धर्म व ब्राह्मण-क्षत्रिय एवं अगड़ी जातियों से घृणा। इस घृणा के खेल में वो इतने आगे निकल गए कि आज पूरा विश्व जिस इस्लामिक आतंकवाद से त्रस्त है, उसके हितैषी बनने में भी इन्हें कोई गुरेज नहीं। बौद्ध धर्म के मूल समानता व अहिंसावादी विचारों, जिसका जिक्र डॉ. आंबेडकर ने भी किया था, उसको ही अपना आदर्श मान कर यदि ये आगे बढ़ते तो शायद समाज मे आज इतनी वैमनस्यता नहीं होती, किन्तु अपने राजनीतिक हित को साधने हेतु ये उससे कोशों दूर निकल चुके हैं। आंबेडकर को इन्होंने ‘एक हिन्दू से बौद्ध में धर्मांतरित व्यक्ति’ के अलावा कुछ समझा ही नहीं।

मौजूदा परिपेक्ष्य में देखें तो उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु और कई राज्यों में दलितों पर हुए अत्याचार, जिसमें आरोपित ‘मीम’ हो, उन विभत्स घटनाओं में भी आधुनिक दलित हितैषियों को साँप सूँघ जाता है, इनके मुँह से संवेदना के दो शब्द भी नहीं निकलते। वहीं आरोपित यदि अगड़ी जाति का हो तो इनके लिए सामाजिक वैमनस्यता फैलाने, दंगे भड़काने और अपनी राजनैतिक ज़मीन तैयार करने का एक सुनहरा मौका बन जाता है।

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हाथरस कांड में नक्सल कनेक्शन सामने आना, राजनैतिक गिद्धों द्वारा मामले को तूल देना और नक्सली भाभी का भीम आर्मी से कनेक्शन सामने आना इस बात को दर्शाता है कि बाबा साहब के नाम पर राजनीतिक फसल काटने वाले लोग इस क्रम में इतने नीचे गिर चुके हैं कि आज के परिपेक्ष्य में डॉ. आंबेडकर के विचारों का इनसे कोई सरोकार नहीं। आज ‘जय भीम-जय मीम’ का नारा लगाने वाले शायद इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि बाबा साहब मजहबी कट्टरता और पाकिस्तान को जन्म देने वाले ‘द्विराष्ट्रवाद’ के विचार के कितने बड़े विरोधी थे।

पूना पैक्ट : समझौते के बावजूद मैं उन्हें महात्मा(गाँधी) कहने से इंकार करता हूँ : डॉ भीमराव अंबेडकर

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 

महात्मा गाँधी का नाम आज तक केवल वोट ब्रह्महस्त की तरह छद्दम सेक्युलरिस्ट से लेकर अपने आपको धर्म-निरपेक्ष कहे जाने वाले नेताओं द्वारा खूब इस्तेमाल कर जनता को पागल बनाया जा रहा है। तुष्टिकरण विरोधी ही तुष्टिकरण के जन्मदाता महात्मा गाँधी को पूज रहे हैं। अगर गाँधी तुष्टिकरण को नहीं अपनाते कोई नाथूराम गोडसे नहीं मारता। गाँधी हत्या का मुख्य कारण ही तुष्टिकरण था। यही वजह थी कि नाथूराम गोडसे द्वारा माइक से पढ़कर कोर्ट में दर्ज करवाए 150 बयानों को सार्वजनिक होने से प्रतिबंधित किया गया था। 
आज 1947 में हुए कत्लेआम और 1984 में सिख नरसंहार पर सब खूब चीखते चिल्लाते हैं, लेकिन गाँधी हत्या के बाद चितपावन ब्राह्मणों के हुए नरसंहार पर किसी में बोलने का साहस नहीं। जबकि स्वतंत्र भारत का सबसे भयानक नरसंहार वही था।  

जब-जब स्वतन्त्रता संग्राम तेजी पकड़ता था, महात्मा गाँधी द्वारा कोई न कोई आंदोलन कर जनता का ध्यान हटाने का प्रयास किया जाता था। जब उद्दम सिंह ने जलियांवाला बाग़ के खलनायक जनरल डायर को ब्रिटेन जाकर मारा था, तब महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार को क्या कहा था, क्या गाँधी का गुणगान करने वाला कोई नेता राष्ट्र को बताएगा? आखिर गाँधी की असलियत को कब तक जनता से छुपाया जाता रहेगा?

पिछली यूपीए सरकार के कार्यकाल में एक RTI द्वारा यह पूछे जाने पर : 1. महात्मा गाँधी को कब राष्ट्रपिता किया गया?; 2. नोटों पर गाँधी की फोटो किसके कहने पर लगाई जाती है? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर था "पता नहीं"। 

अधिकारिक तौर पर 'राष्ट्रपिता' की घोषणा नहीं

यह तो सभी जानते हैं कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया जाता है, लेकिन बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि उन्हें यह उपाधि किसने दी थी? महात्मा गांधी को पहली बार सुभाष चंद्र बोस ने 'राष्ट्रपिता' कहकर संबोधित किया था। 4 जून 1944 को सिंगापुर रेडिया से एक संदेश प्रसारित करते हुए 'राष्ट्रपिता' महात्मा गांधी कहा था।

बताया जाता है कि नेताजी और महात्मा गांधी एक-दूसरे का भरपूर सम्मान करते थे, लेकिन इसके साथ दोनों के बीच कुछ मुद्दों को लेकर मतभेद भी थे। बताया जाता है कि नेता जी महात्मा गांधी के इस विचार से सहमत नहीं थे कि अहिंसा के रास्ते पर चलकर ही स्वतंत्रता पाई जा सकती है। नेताजी का मानना था कि अहिंसा एक विचारधारा हो सकती है, लेकिन इसका किसी पंथ की तरह पालन नहीं किया जा सकता है। नेताजी का मानना था कि राष्ट्रीय आंदोलन को हिंसा मुक्ता होना ही चाहिए, लेकिन जरूरत पड़ने पर हथियार उठाने से पीछे नहीं हटा जा सकता है। वहीं इसके उलट महात्मा गांधी का मानना था कि अहिंसा ही देश को स्वतंत्र कराने का एकमात्र रास्ता है। महात्मा गांधी कई अहिंसा आंदोलनों से अंग्रेजों को कई मोर्चों पर झुका चुके थे।

भले ही देश भर के लोग महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता' के तौर पर जानते हों, लेकिन भारत सरकार आधिकारिक तौर पर महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता' घोषित नहीं कर सकती है। संविधान के आगे भारत सरकार भी मजबूर है। तभी तो गृह मंत्रालय ने लखनऊ की बाल आरटीआई कार्यकर्ता ऐश्वर्या पाराशर को दिए सूचना में कहा है कि सरकार महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता' घोषित करने के संबंध में कोई अधिसूचना जारी नहीं कर सकती है। 

हकीकत यह है कि महात्मा गाँधी अपने आपमें ही एक विवादित थे। यदि महात्मा गाँधी के चरखे और अहिंसा के कारण भारत को आज़ादी मिली है, फिर किस आधार पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस को "जिन्दा या मुर्दा" ब्रिटिश सरकार के सुपुर्द करने के अनुबंध पर क्यों हस्ताक्षर किए थे? है किसी महात्मा गाँधी भक्त के पास जवाब? 


सितंबर 24, 1932 में आज ही के दिन महात्मा गाँधी और बीआर अंबेडकर (B.R. Ambedkar) के बीच भारी मतभेद और लम्बे विवाद के बाद ऐतिहासिक पूना पैक्ट (Poona Pact) का समझौता हुआ था। सितंबर 19, 1932 की सुबह बॉम्बे (जिसे अब मुंबई के रूप में जाना जाता है) में लोग भारी मात्रा में पहले से ही इंडियन मर्चेंट्स चैंबर हॉल के सामने बरामदे में मौजूद थे। उनकी प्राथमिकता आज के दिन सिर्फ और सिर्फ एक थी: महात्मा गाँधी का जीवन बचाना, जो लम्बी अवधि से अनशन पर हैं और उनके पास 24 घंटे से भी कम समय है।

हफ़्ते भर से गाँधी जी, जो कि राजद्रोह के आरोपों में पुणे की जेल में बंद रहे, और बीआर अंबेडकर (B.R. Ambedkar) के बीच तनाव जारी है। वही आंबेडकर, जो भारत की ‘बड़ी आबादी’ यानी, तथाकथित ‘अछूत’ वर्ग, जिन्हें आज अनुसूचित जाति (SC) कहा जाता है, के लिए संविधान में पृथक निर्वाचन अधिकार की माँग पर डटे थे। मगर गाँधी जी का तर्क था कि ऐसा कोई कानून तथाकथित अछूतों को न्याय दिलाने की मुहीम को कमजोर ही करेगा।

ब्रिटिश सरकार का साम्प्रदायिक पंचाट था विवाद का कारण 

इस पूरे घटनाक्रम की नींव में था औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार का ‘साम्प्रदायिक पंचाट’! अगस्त 16, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मेकडोनाल्ड ने साम्प्रदायिक पंचाट या ‘साम्प्रदायिक निर्णय’ (Communal Award or Macdonald Award) की घोषणा की थी। 

यह अंग्रेजों द्वारा भारत में अपनाई गई ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का ही एक दूसरा उदाहरण था। इस निर्णय में मुस्लिम, सिख आदि की तरह ब्रिटिश सरकार ने तथाकथित अछूत वर्ग को भी हिंदुओं से अलग समुदाय की मान्यता दी।

लेकिन महात्मा गाँधी ने अछूतों को हिंदुओं से पृथक समुदाय की मान्यता का कड़ा विरोध किया था लेकिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैकडोनल्ड ने गोलमेज सम्मेलन में डॉ बीआर अंबेडकर द्वारा प्रस्तुत किए गये तथ्यों और तर्कों को उचित मानते हुए अछूतों को पृथक निर्वाचक मण्डल सहित दो मतों का अधिकार प्रदान किया।

महात्मा गाँधी द्वारा इस सिद्धांत का विरोध किया गया था। लेकिन उन्होंने मुस्लिमों या सिखों के लिए समान प्रावधानों पर कोई आपत्ति नहीं जताई। उन्होंने 18 अगस्त को तत्कालीन ब्रिटिश पीएम, रेम्जे मैकडोनाल्ड को लिखा, “मुझे अपनई जिंदगी को दाँव पर लगाकर इस निर्णय का विरोध करना है। मैं उनके जरा से भी वैधानिक अलगाव के खिलाफ हूँ….।”

महात्मा गाँधी ने इस बात को 09 सितंबर तक भी दोहराया, लेकिन अंग्रेजों ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। दलितों के हितैषी बीआर अंबेडकर (B.R. Ambedkar) ने कहा कि वह गाँधी की खातिर एक ‘जायज माँग’ का बलिदान नहीं करेंगे, खासकर जब कोई वैकल्पिक प्रस्ताव पेश नहीं किया गया था।

दरअसल, अंबेडकर ने महात्मा गाँधी पर आरोप लगाया कि वो हिन्दुओं और डालतिओं के बीच की खाई को और चौड़ी कर रहे हैं। जबकि, महात्मा गाँधी का मानना था कि दलितों को पृथक समुदाय और निर्वाचन देना भारतीय समाज को और अधिक टुकड़ों में बाँट देगा। उनका मानना था कि छुआछूत हिन्दू धर्म का अंग नहीं है और हिन्दुओं में अस्पृश्यता कलंक है लेकिन निकट भविष्य में यह ख़त्म हो जाएगी, लेकिन पृथक निर्वाचन इस घाव को हमेशा हरा रखेगा और अछूतों अस्तित्व को खतरे में ही डालेगा।


महात्मा गाँधी का अनशन 

आखिर में गाँधी ने अगले दिन, सितम्बर 20, 1932 को पूना की यरवदा जेल में अछूतों को मिले ‘पृथक निर्वाचन मण्डल’ तथा दो मतों के अधिकार के विरोध में आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया।

अचानक सभी समाचार पत्र महात्मा गाँधी के गिरते स्वास्थ्य की दैनिक बुलेटिन से भर गए। कॉन्ग्रेस नेताओं ने अंबेडकर को समझौता करने के लिए उकसाया। अंबेडकर ने कॉन्ग्रेस से कहा, ”अगर मुझे फाँसी पर भी चढ़ा दिया जाए तब भी मैं लोगों के साथ विश्वासघात कर अपने पवित्र कर्तव्य से नहीं डिग सकता।”

अंबेडकर को कॉन्ग्रेस के नेताओं ने एक द्विस्तरीय प्रणाली का प्रस्ताव दिया: एक प्राथमिक चुनाव, जहाँ केवल दलित वोट देंगे और एक माध्यमिक चुनाव, जहाँ हर कोई पात्र होगा। 22 सितंबर की सुबह, अंबेडकर ने पुणे की यात्रा की और दोपहर में गाँधी से मिले।

महात्मा गाँधी के सचिव महादेव देसाई के नोट्स के अनुसार, अंबेडकर ने गाँधी जी से कहा, “मैं अपने समुदाय के लिए राजनीतिक शक्ति चाहता हूँ। हमारे जीवित रहने के लिए यह बेहद आवश्यक है।”

लेकिन इसमें एक अड़चन थी। अंबेडकर चाहते थे कि प्राथमिक चुनाव प्रणाली एक दशक के बाद स्वत: समाप्त हो जाए, और 15 साल बाद तथाकथित दबे-कुचले वर्ग के बीच जनमत संग्रह पर सशर्त सीटें आरक्षित कर दी जाएँ। कई हिंदू नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया था और गाँधी खुद पाँच साल बाद जनमत संग्रह चाहते थे।

23 सितंबर को फिर बातचीत हुई। अपनी किताब ‘डॉ अंबेडकर और अस्पृश्यता’ में, लेखक क्रिस्टोफ जाफरलॉट ने लिखा कि अगली सुबह, देवदास गाँधी (महात्मा गाँधी के चौथे और सबसे छोटे पुत्र) ने तिलमिलाकर कहा, “पिता मर रहे हैं।” उन्होंने अपनी किताब में जिक्र किया कि अंबेडकर के समक्ष उनकी आँखों में आँसू थे।

महाराष्ट्र के लगभग सभी प्रमुख अखबार गाँधी का समर्थन और अंबेडकर का विरोध कर रहे थे। गाँधी जी के घटते बढ़ते ब्लड प्रेशर से लेकर उनकी गिरती हालत समाचार की बड़ी खबर होती।

पूना पैक्ट 

अंबेडकर ने अंत में कहा कि अगर वे गाँधी के जीवन के लिए समझौता नहीं करते तो दलितों को पूर्वग्रह से जूझना पड़ेगा। आखिरकार, पूना समझौते पर 24 सितंबर को शाम 5 बजे 23 लोगों ने हस्ताक्षर किए। मदन मोहन मालवीय ने इसे हिंदुओं और गाँधी की ओर से और अंबेडकर ने अछूत वर्गों की ओर से हस्ताक्षर किए। इस समझौते में दलितों के लिए अलग निर्वाचन और दो वोट का अधिकार खत्म हो गया। अंग्रेजों द्वारा दी गई 80 सीटों के बजाय अछूत वर्गों को 148 सीटें मिलीं।

                                                                          पूना पैक्ट के समय की तस्वीर (चित्र साभार: भारत ज्ञान)

कहा जाता है कि अंबेडकर ने गाँधी जी की इस हठ को बेमन से स्वीकार किया था और इस समझौते पर राजी हुए थे। बीआर अंबेडकर ने इस समझौते पर हस्ताक्षर करते समय गाँधी जी से कहा था, “यदि आप अछूत वर्गों के कल्याण के लिए पूरी तरह से खुद को समर्पित करते हैं, तो आप हमारे नायक बन जाएँगे।”

हालाँकि, अंबेडकर के हृदय में गाँधी जी को लेकर नफरत उनकी मृत्यु के बाद भी जीवित रही। अंबेडकर ने पूना पैक्ट वार्ता के दौरान गाँधी के रुख को एक राजनेता का रुख कहा। बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में अंबेडकर ने कहा था, “एक राजनीतिज्ञ के रूप में, वह कभी महात्मा नहीं थे। मैं उन्हें महात्मा कहने से इंकार करता हूँ।”

चमचा युग की शुरुआत --कांशी राम 

पूना पैक्ट का अछूत समाज के बड़े नेताओं ने विरोध किया था। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक काँशीराम ने पूना पैक्ट के बाद के युग को चमचा युग कहा और समझौते के 50 साल पूरे होने पर सितंबर 23, 1982 को अपनी एक किताब प्रकाशित की। इस किताब का नाम था – ‘एन एरा ऑफ स्टूजेज’ यानी ‘चमचा युग।’ काँशीराम ने लिखा था कि पूना पैक्ट की वजह से ही दलित अपने वास्तविक प्रतिनिधि चुनने से वंचित कर दिए गए।

पूना पैक्ट को लेकर महात्मा गाँधी की हठ कितनी सही या गलत थी, इस बात का विश्लेषण करने के लिए शायद मेरा कद बहुत छोटा है लेकिन यह कई समकालीन नेताओं ने माना था कि यह निश्चित ही औपनिवेशिक ब्रिटिश साम्राज्य की भारत और इसकी अखंडता में सेंध लगाने का ही एक उपक्रम था। और यदि तथाकथित अछूत वर्ग को पृथक निर्वाचन देने की बात बनी रहती तो पाकिस्तान की ही तरह भारत का शायद एक और हिस्सा टूट चूका होता।

महात्मा गाँधी ने कहा था कि आज नहीं तो कल हिन्दू अपने विषयों से उबार आएँगे और समय के साथ यह एक बड़े स्तर तक साकार भी हो रहा है। आज भारत के राष्ट्रपति के पद पर एक अनुसूचित जाति का व्यक्ति है। राजनीति से लेकर कई प्रमुख संस्थाओं में, बिना किसी पृथक निर्वाचन के ही, अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व है।

यह नहीं कहा जा सकता कि अस्पृश्यता भारत के समाज से पूर्ण रूप से गायब हो गई हो, लेकिन यह जन चेतना लोगों के बीच जरुर पैदा हुई है कि हिन्दुओं के बीच अस्पृश्यता एक कलंक है और इससे आज नहीं तो कल, लेकिन हिन्दू ही मिलजुलकर उबरेंगे।

पूना पैक्ट का नतीजा 

पूना पैक्ट के अंबेडकर के लिए भी व्यक्तिगत तौर पर कई सकारात्मक परिणाम हुए। इसने पूरे भारत में वंचित वर्गों के नेतृत्व को सशक्त रूप से उनके नाम कर दिया। उन्होंने न केवल कॉन्ग्रेस, बल्कि पूरे देश को ही नैतिक रूप से दबे हुए वर्गों के उत्थान के लिए जिम्मेदार ठहराया। इतिहास में पहली बार वंचित वर्गों को एक राजनीतिक ताकत बनाने में भी अंबेडकर सफल रहे।

अंबेडकर ने खुद स्वीकार किया था कि वह एक पूर्ण समाधान नहीं बल्कि अल्पकालीन और त्वरित कोई फैसला चाहते थे। उनका कहना था कि वह इन्तजार नहीं करना चाहते थे लेकिन उन्हें गाँधी और कॉन्ग्रेस की जिंदगी के लिए यह फैसला लेना पड़ा।

बाबासाहब अंबेडकर आजादी से पहले ही भाँप गए थे वहाबियों के खतरे को, चंद कांग्रेसी नेताओं ने दबा दी थी उनकी आवाज

भीमराव, अंबेडकर, बाबासाहब
विश्व के साथ भारत भी कोरोना महामारी से जूझ रहा है और पूरा देश लॉकडाउन में है। इसी बीच आज भारत के महान सपूत बाबासाहब डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर की जयंती भी है। महामारी के दौरान कुछ समुदायों के प्रतिनिधियों की गैरजिम्मेदारी और सुनियोजित लापरवाही के कारण बिगड़ी स्थिति और इससे उठते अनेक ऐसे प्रश्न हैं, जिनके उत्तर तलाशते समय हमें अतीत के ऐतिहासिक तथ्यों पर भी ध्यान देना चाहिए।
इससे पूर्व नागरिकता संशोधन विधेयक(सीएए) के अनर्गल व निराधार विरोध और उपद्रव से भी इसी प्रकार के प्रश्न उठे थे। दूसरे सीएए के निराधार विरोध और उपद्रव में अराजक अम्बेडकर संविधान का शोर मचाते थे, लेकिन उन्होंने जो कहा उसे कोई नहीं मानता। यानि स्वांग रचकर जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है। भारतीय समाज, राजनीति, दर्शन और तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक समस्याओं पर बाबा साहब के अध्ययन, लेखन और साहित्य में अनेक ऐसे तथ्य हैं, जो अलगाववाद और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध इस प्रकार की घटनाओं के विश्लेषण में सहायक हैं।
धार्मिक व अन्य प्रकार के सभी स्थलों पर एकत्रीकरण के प्रतिबंध के बावजूद जिस प्रकार देश के अनेक भागों में सरकार और प्रशासन के आदेशों को धता बताकर लॉकडाउन का उल्लंघन करते हुए मस्जिदों में सामूहिक नमाज पढ़ने, तबलीगी जमात के मरकज में शामिल लोगों को छिपाने, अल्पसंख्यक समुदाय की बस्तियों, संस्थाओं व धार्मिक क्षेत्रों में गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त विदेशी मुसलमान नागरिकों को शरण देने, फलों-सब्जियों व अन्य खाद्य पदार्थों में थूकने जैसी घिनौनी हरकतें; और सबसे बढ़कर इस समुदाय के अग्रणी लोगों द्वारा तबलीगी जमात का बचाव करने तथा दूसरे समुदायों के हर मामले पर अतिरंजित रूप से मुखर रहने वाले आमिर खान और नसीरुद्दीन शाह टाइप लोगों की इस मामले में चुप्पी, यह सोचने पर विवश करती है कि ऐसी घातक मानसिकता की जड़ें कहाँ हैं?
इसके उत्तर के लिए हमें अतीत की उस मानसिकता का भी अध्ययन करना होगा, जो भारत विभाजन का जिम्मेदार था। हमें यह भी याद रखना होगा कि भारत विभाजन की माँग की सुगबुगाहट और तबलीगी जमात की स्थापना का काल लगभग एक ही है। भारत विभाजन की नींव 1920 से 1932 के बीच रखी गई थी, जबकि तबलीगी जमात 1927 में बना था। तबलीगी जमात की स्थापना का घोषित उद्देश्य मुसलमानों को पक्का मुसलमान बनाना और दावत-ओ-तबलीग यानी धर्मांतरण है।
कांग्रेस की शह पर एक धर्मनिरपेक्ष हिन्दू बहुल देश में तबलीगी जमात बेरोकटोक अपना काम करता रहा, देश के मुसलमानों को कट्टरता के उसी जाल में फाँसने के लिए लगा रहा, जो उसने विभाजन के बाद पाकिस्तान में किया। यह कहना गलत नहीं होगा कि तबलीगी जमात मुसलमानों को उस अंधे युग में ले जाना चाहता है, जहाँ कट्टरता, कठोरता और मजहबी शुद्धता के नाम पर शेष समुदाय से अलगाव व द्वेष जैसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दी जाएँ। अल्पसंख्यकों के बीच यही स्थितियाँ तब भी बनाई गई थीं, जब भारत विभाजन की पटकथा लिखी गई थी।
बाबासाहब संभवत: उन गिने-चुने लोगों में से थे, जो स्वतंत्रता से पहले ही चल रहे वहाबी आंदोलन के खतरे को भाँपकर भारत के भविष्य को लेकर चिंतित थे। इसीलिए बाबासाहब ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ पुस्तक में लिखा है, ”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है। यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस्लाम मुसलमानों और गैर-मुसलमानों में भेद करता है। इस्लाम मानव का सार्वभौमिक बंधुत्व नहीं, उनका भाईचारा केवल मुसलमान के साथ है। जो इनके समुदाय का नहीं है, उनके लिए इसमें केवल घृणा और शत्रुता ही है।”
विभाजन की त्रासदी से दुखी बाबासाहब समस्या को समझते ही नहीं थे, बल्कि उसका समाधान भी प्रस्तुत करते थे। यह अलग बात है कि तत्कालीन कांग्रेस के कुछ प्रभावी नेताओं की दुर्भावना के कारण उनके व्यवहारिक और उपयोगी विचारों को अनुसुना कर दिया गया। कांग्रेस में ही बड़ी संख्या में लोग वहाबियत और इसके कारण भारत के विरुद्ध हो रहे षडयंत्र व खतरों को समझते थे, पर चूँकि उस समय भी कांग्रेस में लोकतंत्र का केवल दिखावा था, जबकि पार्टी के नीति नियंता चंद नेता ही थे, इसलिए लगता है कि ऐसे राष्ट्रवादी कांग्रेसजनों की आवाजें भी दबाई गईं।
बाबासाहब ने इसी पुस्तक में लिखा है, “सांप्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अंतर को समझना कठिन है… वास्तव में अधिकांश कांग्रेसजनों की धारणा है कि इन दोनों में कोई अंतर नहीं है और कांग्रेस के अंदर के राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति सांप्रदायिक मुसलमानों की फ़ौज की चौकी की तरह है।”
बाबासाहब कहते थे कि उनके जीवन का प्रत्येक क्षण भारत के लिए है तो यह उनके राष्ट्रवादी व्यक्तित्व का परिचायक था, भारत माता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। इसी प्रतिबद्धता के कारण देश के टुकड़े होने से दुखी थे और बचे हुए भारत को सुरक्षित, सुंदर और विश्व में अग्रणी देखना चाहते थे। उन्होंने ने इसी पुस्तक में लिखा है:
“मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर है। मुसलमानों की दृष्टि में काफिर सम्मान के योग्य नहीं होता है, उसकी कोई सामाजिक स्थिति भी नहीं होती है। अत: जिस देश में काफिरों का शासन हो, वह स्थान मुसलमानों के लिए दारुल-हर्ब है। ऐसी स्थिति में यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं बचती कि मुसलमान गैर-मुस्लिम के शासन को स्वीकार नहीं कर पाएँगे। इसलिए भारत और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की पूर्ण अदला-बदली ही क्षेत्र में शांति व सौहार्द रख सकती है।”
आज जब तबलीगी जमात और उसके समर्थकों की देशव्यापी अवज्ञा व उपद्रव देखने को मिल रहा है तो मुसलमानों को लेकर बाबासाहब के विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। विशेषकर मुस्लिम समाज के प्रगतिशील समाज को बाबासाहब के विचारों पर चिंतन-मनन कर अपने समुदाय को विकृतियों से बचाकर देश की मुख्यधारा में बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
बहरहाल, अतीत की भूल को सुधारना तो संभव नहीं है, किंतु उससे सबक लेकर वर्तमान और भविष्य का निर्माण अवश्य किया जा सकता है। ऐसे में आवश्यकता है कि देश की जनता के समक्ष बाबासाहब के विचारों को समग्र रूप में पहुँचाया जाए, जिससे कि छद्म धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़े राजनैतिक दल, बुद्धिजीवी, इतिहासकार और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग संदर्भहीन और चयनात्मक ढंग से बाबा साहब के विचार पेशकर समाज को भड़काने और समस्या उत्पन्न करने के कुत्सित प्रयासों में सफल न हो सकें।

काश ! डॉक्टर अंबेडकर और सावरकर की दी हुई सलाह को नेहरू मान लेते

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डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक , उगता भारत
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विनायक दामोदर सावरकर और संविधान निर्माता डॉ. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ऐसे ही तो व्यक्तित्व थे जो नेहरू जी को समय-समय पर सावधान करते थे कि चीन के प्रति अतिरेक मत दिखाओ और ना ही पाकिस्तान पर किसी प्रकार का विश्वास करो। दोनों ने नेहरु जी को इस बात के लिए भी सचेत किया था कि चीन के पंचशील सिद्धांत पर किसी प्रकार का विश्वास नहीं करना चाहिए और उन्हें चाहिए कि तिब्बत को चीन का अंग कभी स्वीकार न करें। दुर्भाग्यवश नेहरु जी ने इन दोनों महान नेताओं की इन बातों पर कभी भी संज्ञान नहीं लिया और 'हिंदी चीनी भाई भाई' के नारे में बहते चले गए। इतना ही नहीं कभी किसी आकस्मिकता के लिए अपनी सामरिक तैयारियों की ओर भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया।
डॉ. आंबेडकर ने 'हिंदू कोड बिल' को लेकर कानून मंत्री के रूप में 1951 में जब अपना त्यागपत्र दिया तो उस समय उन्होंने नेहरू की विदेश नीति पर भारी प्रशन चिन्ह खड़े किए थे। 26 अगस्त 1954 को राज्यसभा सदस्य के रूप में भी उन्होंने देश के तत्कालीन नेतृत्व की विदेश नीति को कटघरे में खड़ा किया था और विशेष रूप से चीन के प्रति प्रधानमंत्री नेहरू की नीतियों की आलोचना की थी । नेहरू जी ने इस प्रकार की सभी आलोचनाओं को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालने का काम किया।
डॉ. आंबेडकर ने अपने त्यागपत्र के जो कारण गिनाए थे उनमें से एक कारण उन्होंने यह भी गिनाया था कि वर्तमान नेतृत्व की विदेश नीति बहुत ही लचर है । जिससे वह पूर्णतया असहमत हैं ।उनका मानना था कि इस प्रकार की लचर नीति का देश को भविष्य में बहुत ही घातक परिणाम भुगतना पड़ सकता है । वह मानते थे कि चीन और पाकिस्तान एक दिन भारत से विश्वासघात करेंगे। इसलिए इनके प्रति वर्तमान नेतृत्व को आंख खोलकर देखना चाहिए और किसी भी प्रकार के अतिरेक में बहकर निर्णय न लेते हुए पूर्ण सावधानी बरतकर निर्णय लिए जाएं । डॉक्टर अंबेडकर का स्पष्ट मानना था कि भविष्य में यह दोनों देश भारत के साथ किसी भी प्रकार का विश्वासघात कर सकते हैं इतिहास में यह स्पष्ट कर दिया कि डॉक्टर अंबेडकर का चिंतन हो समय व्यावहारिक था क्योंकि इन दोनों देशों ने ही भारत पर अभी तक युद्ध ठोकने का काम किया है यदि यह दोनों देश भारत के साथ मित्रता का व्यवहार करते तो निश्चय ही उसका लाभ न केवल दक्षिण एशिया को बल्कि सारे विश्व को भी मिलता , क्योंकि तब शांति का उपासक भारत वास्तव में संसार को शांति का पाठ पढ़ा रहा होता ।
दूसरी ओर सावरकर ने 26 जनवरी 1954 के ‘केसरी’ में छपे एक लेख में कहा, 'पिछले 6 वर्षों में चीन ने अपना सैन्य-बल बढ़ाकर तिब्बत को हड़प लिया है। अब चीन और रूस की सीमा सीधे भारत से आ लगी है। ब्रिटिशों ने हिंदुस्तान की रक्षा के लिए अफगानिस्तान, तिब्बत, नेपाल, सिक्किम, भूटान, ब्रह्मदेश आदि बफर राज्य निर्माण कर रखे थे। वे हमारे साथ रहना चाहते थे, लेकिन अब वे भी छितर रहे हैं।'
सावरकर देश के सजग प्रहरी थे, उन्होंने सोते हुए नेतृत्व को जगाने का काम किया । परंतु नींद में ऊंघते हुए नेतृत्व ने देश के उस सजग प्रहरी की बात को भी रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। भारत और चीन के बीच 29 अप्रैल 1954 को यह समझौता हुआ। ये सिद्धांत ही अगले कई वर्षों तक भारत की विदेश नीति की रीढ़ रहे। ये पांच सिद्धांत थे, एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करना। एक-दूसरे पर आक्रमण न करना। आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना। समान और परस्पर लाभकारी संबंध और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व।
दिखने में तो यह सिद्धांत बड़े आकर्षक हैं परंतु चीन ने कभी भी किसी भी देश के साथ इस प्रकार के सिद्धांतों का पालन नहीं किया । उसने साम्राज्यवाद और विस्तारवाद को अपनाया और देशों की संप्रभुताओं के साथ खिलवाड़ करना आरंभ किया। उन घटनाओं से भारत के तत्कालीन नेतृत्व को सावधान होना चाहिए था। जब भारत का तत्कालीन नेतृत्व शांति की बातें कर रहा था और चीन की ओर से आंखें बंद किए बैठा था तब डॉक्टर अंबेडकर ने सावधानी भरे शब्दों में लखनऊ विश्वविद्यालय और काठमांडु में हुए विश्व धम्म सम्मेलन में कहा था कि 'हमें मार्क्स नहीं, बुद्ध चाहिए।'
उनका आशय स्पष्ट था कि नेहरू जी को मार्क्सवादी चीन की बातों में फंसना नहीं चाहिए क्योंकि वह फंसते-फंसते चीन के क्रूर मार्क्सवाद से प्रभावित होते जा रहे हैं , जिससे शांतिप्रिय भारत की बुद्धवादी नीतियों को ग्रहण लगना निश्चित है। यद्यपि सावरकर जी और भी अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण रखने वाले नेता थे। वह इतिहास के मर्मज्ञ विद्यार्थी थे इसलिए वह यह भी जानते थे कि बुद्ध को अपनाना भी हमारे लिए घातक रहा है , इसलिए उन्होंने और भी अधिक स्पष्ट शब्दों में नेहरू जी को सावधान करते हुए कहा था, 'हमें बुद्ध नहीं, युद्ध चाहिए।'
सावरकर जी का आशय था कि राक्षसों से ना तो भयभीत होना चाहिए और ना ही उन्हें इस आशा से दूध पिलाना चाहिए कि वे हमारे लिए भविष्य में काम आएंगे ? समय रहते उन्हें कुचलने की तैयारी करनी चाहिए और दाव लगते ही कुचल डालना चाहिए। आत्मरक्षा के लिए आंखें बंद करने की प्रवृत्ति मरणशील जातियों का लक्षण है । इसलिए भारत को अपनी जीवन्तता का परिचय देते हुए चीन जैसे देश के प्रति आंखें बंद करके नहीं बैठना चाहिए अर्थात बुद्धवादी होकर शांति का उपदेश नहीं देना चाहिए बल्कि आवश्यक हो तो युद्ध के माध्यम से अर्थात सामरिक तैयारियां करने की ओर ध्यान देकर अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के लिए तैयारी करनी चाहिए।
काश ! नेहरू जी इन दोनों नेताओं की व्यावहारिक बातों पर और सलाहों पर ध्यान देते तो आज देश के लिए चीन इतना बड़ा सिर दर्द नहीं बना होता । तब हमारे लिए ना कश्मीर समस्या होती ना पीओके की कोई समस्या होती है , ना ही अरुणांचल प्रदेश में चीन कब्जा करने में सफल होता और ना ही आज हमें नेपाल आंखें दिखा रहा होता।