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कपिल मिश्रा का सिर काटने पर 1 लाख रूपए का ऐलान : अजहरुद्दीन अंसारी

क्या दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल अपने पूर्व मंत्री और वर्तमान में भाजपा नेता कपिल मिश्रा को आयी धमकी को गंभीरता से लेंगे? दिल्ली में किसी न किसी कारण शांतिदूत हिन्दुओं की हत्या कर रहे हैं, नागरिकता संशोधक कानून की आड़ में हिन्दू विरोधी दंगे, हिन्दू और हिन्दुत्व के विरुद्ध नारेबाजी आदि आदि होने पर भी चुप्पी साधे रहना उनकी निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। नाराजगी केन्द्र में मोदी सरकार से थी, हिन्दू और हिन्दुत्व को अपमानित करना किसी षड़यंत्र का स्पष्ट प्रमाण है। 

क्या भाजपा विरोधियों के शांतिदूत फ़्रांस की आग भारत में लगाएंगे?  
भाजपा नेता कपिल मिश्रा को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक के जरिए जान से मार डालने की धमकी दी गई है। अजहरुद्दीन नामक व्यक्ति ने उनके एक फेसबुक पोस्ट पर टिप्पणी की है कि जो भी कपिल मिश्रा का सिर काट कर ले आएगा, उसे वो 1 लाख रुपए का इनाम देगा। साथ ही उसने कपिल मिश्रा के लिए गाली का भी प्रयोग किया। दिल्ली के पूर्व मंत्री ने ट्विटर पर अजहरुद्दीन की टिप्पणी का स्क्रीनशॉट डाल कर उसकी पोल खोली।

साथ ही उन्होंने धमकी देने वाले अजहरुद्दीन के फेसबुक प्रोफाइल का लिंक और उसकी तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “ये कमेंट मेरे फेसबुक पर किया गया हैं। मेरा सिर काटने पर एक लाख का ईनाम घोषित करने वाला ये आदमी दिल्ली में ही रहता है।” अजहरुद्दीन अपने फेसबुक टाइमलाइन पर भी अक्सर भाजपा विरोधी पोस्ट डालता रहता है। अजहरुद्दीन अंसारी ने अपना निवास स्थान दिल्ली ही डाल रखा है।

कपिल मिश्रा द्वारा उसकी करतूतों को शेयर किए जाने के बाद गुस्साए लोगों ने पुलिस से उसके खिलाफ कार्रवाई की माँग की। कई लोगों ने अजहरुद्दीन की तस्वीर शेयर कर दिल्ली पुलिस को टैग किया और उसकी गिरफ़्तारी की माँग की। लोगों ने याद दिलाया कि आजकल फ्रांस में जो कुछ भी हो रहा है, उसे देखते हुए ऐसे तत्वों पर कड़ी कार्रवाई की ज़रूरत है क्योंकि ये कुछ भी कर सकते हैं। कई लोगों ने कपिल मिश्रा के प्रति समर्थन जताया।

कपिल मिश्रा ने सोशल मीडिया पर फ्रांस का समर्थन किया और हो रही आतंकी घटनाओं की निंदा की थी। साथ ही राजस्थान में जब पुजारी की हत्या हुई थी तो उन्होंने धन इकट्ठा कर के पीड़ित परिवार की मदद की थी। वो दिल्ली के आदर्श नगर में मार डाले गए राहुल राजपूत के भी परिजनों से मिले थे। इन कारणों से वो हमेशा से इस्लामी कट्टरवादियों की आलोचना का शिकार बनते रहे हैं। उन्होंने दिल्ली दंगे के पीड़ितों के लिए भी डोनेशन अभियान चलाया था। 

बाबासाहब अंबेडकर आजादी से पहले ही भाँप गए थे वहाबियों के खतरे को, चंद कांग्रेसी नेताओं ने दबा दी थी उनकी आवाज

भीमराव, अंबेडकर, बाबासाहब
विश्व के साथ भारत भी कोरोना महामारी से जूझ रहा है और पूरा देश लॉकडाउन में है। इसी बीच आज भारत के महान सपूत बाबासाहब डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर की जयंती भी है। महामारी के दौरान कुछ समुदायों के प्रतिनिधियों की गैरजिम्मेदारी और सुनियोजित लापरवाही के कारण बिगड़ी स्थिति और इससे उठते अनेक ऐसे प्रश्न हैं, जिनके उत्तर तलाशते समय हमें अतीत के ऐतिहासिक तथ्यों पर भी ध्यान देना चाहिए।
इससे पूर्व नागरिकता संशोधन विधेयक(सीएए) के अनर्गल व निराधार विरोध और उपद्रव से भी इसी प्रकार के प्रश्न उठे थे। दूसरे सीएए के निराधार विरोध और उपद्रव में अराजक अम्बेडकर संविधान का शोर मचाते थे, लेकिन उन्होंने जो कहा उसे कोई नहीं मानता। यानि स्वांग रचकर जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है। भारतीय समाज, राजनीति, दर्शन और तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक समस्याओं पर बाबा साहब के अध्ययन, लेखन और साहित्य में अनेक ऐसे तथ्य हैं, जो अलगाववाद और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध इस प्रकार की घटनाओं के विश्लेषण में सहायक हैं।
धार्मिक व अन्य प्रकार के सभी स्थलों पर एकत्रीकरण के प्रतिबंध के बावजूद जिस प्रकार देश के अनेक भागों में सरकार और प्रशासन के आदेशों को धता बताकर लॉकडाउन का उल्लंघन करते हुए मस्जिदों में सामूहिक नमाज पढ़ने, तबलीगी जमात के मरकज में शामिल लोगों को छिपाने, अल्पसंख्यक समुदाय की बस्तियों, संस्थाओं व धार्मिक क्षेत्रों में गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त विदेशी मुसलमान नागरिकों को शरण देने, फलों-सब्जियों व अन्य खाद्य पदार्थों में थूकने जैसी घिनौनी हरकतें; और सबसे बढ़कर इस समुदाय के अग्रणी लोगों द्वारा तबलीगी जमात का बचाव करने तथा दूसरे समुदायों के हर मामले पर अतिरंजित रूप से मुखर रहने वाले आमिर खान और नसीरुद्दीन शाह टाइप लोगों की इस मामले में चुप्पी, यह सोचने पर विवश करती है कि ऐसी घातक मानसिकता की जड़ें कहाँ हैं?
इसके उत्तर के लिए हमें अतीत की उस मानसिकता का भी अध्ययन करना होगा, जो भारत विभाजन का जिम्मेदार था। हमें यह भी याद रखना होगा कि भारत विभाजन की माँग की सुगबुगाहट और तबलीगी जमात की स्थापना का काल लगभग एक ही है। भारत विभाजन की नींव 1920 से 1932 के बीच रखी गई थी, जबकि तबलीगी जमात 1927 में बना था। तबलीगी जमात की स्थापना का घोषित उद्देश्य मुसलमानों को पक्का मुसलमान बनाना और दावत-ओ-तबलीग यानी धर्मांतरण है।
कांग्रेस की शह पर एक धर्मनिरपेक्ष हिन्दू बहुल देश में तबलीगी जमात बेरोकटोक अपना काम करता रहा, देश के मुसलमानों को कट्टरता के उसी जाल में फाँसने के लिए लगा रहा, जो उसने विभाजन के बाद पाकिस्तान में किया। यह कहना गलत नहीं होगा कि तबलीगी जमात मुसलमानों को उस अंधे युग में ले जाना चाहता है, जहाँ कट्टरता, कठोरता और मजहबी शुद्धता के नाम पर शेष समुदाय से अलगाव व द्वेष जैसी स्थितियाँ उत्पन्न कर दी जाएँ। अल्पसंख्यकों के बीच यही स्थितियाँ तब भी बनाई गई थीं, जब भारत विभाजन की पटकथा लिखी गई थी।
बाबासाहब संभवत: उन गिने-चुने लोगों में से थे, जो स्वतंत्रता से पहले ही चल रहे वहाबी आंदोलन के खतरे को भाँपकर भारत के भविष्य को लेकर चिंतित थे। इसीलिए बाबासाहब ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ पुस्तक में लिखा है, ”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है। यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस्लाम मुसलमानों और गैर-मुसलमानों में भेद करता है। इस्लाम मानव का सार्वभौमिक बंधुत्व नहीं, उनका भाईचारा केवल मुसलमान के साथ है। जो इनके समुदाय का नहीं है, उनके लिए इसमें केवल घृणा और शत्रुता ही है।”
विभाजन की त्रासदी से दुखी बाबासाहब समस्या को समझते ही नहीं थे, बल्कि उसका समाधान भी प्रस्तुत करते थे। यह अलग बात है कि तत्कालीन कांग्रेस के कुछ प्रभावी नेताओं की दुर्भावना के कारण उनके व्यवहारिक और उपयोगी विचारों को अनुसुना कर दिया गया। कांग्रेस में ही बड़ी संख्या में लोग वहाबियत और इसके कारण भारत के विरुद्ध हो रहे षडयंत्र व खतरों को समझते थे, पर चूँकि उस समय भी कांग्रेस में लोकतंत्र का केवल दिखावा था, जबकि पार्टी के नीति नियंता चंद नेता ही थे, इसलिए लगता है कि ऐसे राष्ट्रवादी कांग्रेसजनों की आवाजें भी दबाई गईं।
बाबासाहब ने इसी पुस्तक में लिखा है, “सांप्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अंतर को समझना कठिन है… वास्तव में अधिकांश कांग्रेसजनों की धारणा है कि इन दोनों में कोई अंतर नहीं है और कांग्रेस के अंदर के राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति सांप्रदायिक मुसलमानों की फ़ौज की चौकी की तरह है।”
बाबासाहब कहते थे कि उनके जीवन का प्रत्येक क्षण भारत के लिए है तो यह उनके राष्ट्रवादी व्यक्तित्व का परिचायक था, भारत माता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। इसी प्रतिबद्धता के कारण देश के टुकड़े होने से दुखी थे और बचे हुए भारत को सुरक्षित, सुंदर और विश्व में अग्रणी देखना चाहते थे। उन्होंने ने इसी पुस्तक में लिखा है:
“मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर है। मुसलमानों की दृष्टि में काफिर सम्मान के योग्य नहीं होता है, उसकी कोई सामाजिक स्थिति भी नहीं होती है। अत: जिस देश में काफिरों का शासन हो, वह स्थान मुसलमानों के लिए दारुल-हर्ब है। ऐसी स्थिति में यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं बचती कि मुसलमान गैर-मुस्लिम के शासन को स्वीकार नहीं कर पाएँगे। इसलिए भारत और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की पूर्ण अदला-बदली ही क्षेत्र में शांति व सौहार्द रख सकती है।”
आज जब तबलीगी जमात और उसके समर्थकों की देशव्यापी अवज्ञा व उपद्रव देखने को मिल रहा है तो मुसलमानों को लेकर बाबासाहब के विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। विशेषकर मुस्लिम समाज के प्रगतिशील समाज को बाबासाहब के विचारों पर चिंतन-मनन कर अपने समुदाय को विकृतियों से बचाकर देश की मुख्यधारा में बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
बहरहाल, अतीत की भूल को सुधारना तो संभव नहीं है, किंतु उससे सबक लेकर वर्तमान और भविष्य का निर्माण अवश्य किया जा सकता है। ऐसे में आवश्यकता है कि देश की जनता के समक्ष बाबासाहब के विचारों को समग्र रूप में पहुँचाया जाए, जिससे कि छद्म धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़े राजनैतिक दल, बुद्धिजीवी, इतिहासकार और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग संदर्भहीन और चयनात्मक ढंग से बाबा साहब के विचार पेशकर समाज को भड़काने और समस्या उत्पन्न करने के कुत्सित प्रयासों में सफल न हो सकें।

संविधान की मूल प्रति पर भगवान राम-सीता का चित्र

अयोध्या में भव्य राममंदिर के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आधारशिला रखे जाने से संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देने वालों की निकलने वाली चीख-चिल्लाट का मुख्य कारण है कि इतने वर्षों से अपने आपको जनसेवक कहलवाने वाले दंगे आदि करवाकर देश में साम्प्रदायिकता फैलाकर मासूम जनता को गुमराह करते रहे, लेकिन अब निकट भविष्य में अपनी दुकान बंद होते देख रहे हैं। इन्हे जनता से कोई सरोकार नहीं विपरीत इसके दंगे करवाकर लाशों पर अपनी तिजोरियां भरना ही इनकी जनसेवा है।   
अयोध्या में भव्य राममंदिर निर्माण से पहले केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान की मूल प्रति में छपे एक स्केच को शेयर किया है। यह स्केच यानी तस्वीर भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण 14 वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या वापस लौटते समय की है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान के मूल पन्नों की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, ‘भारत के संविधान की मूल प्रति में मौलिक अधिकारों से जुड़े अध्याय के आरम्भ में एक स्केच है जो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या वापसी का है।


रविशंकर प्रसाद इलाहाबाद हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक राम जन्मभूमि न्यास का पक्ष अदालत में पेश करते रहे है। संविधान की मूल प्रति में मौजूद ये स्केच छद्म सेकुलरों के मुंह पर तमाचा है। संविधान तैयार करते समय इसमें भारत की हजारों साल पुरानी संस्कृति को प्रदर्शित करने के लिए कई स्केच शामिल किए गए हैं। इस स्केच को नंदलाल बोस ने बनाया था। संविधान की मूल कॉपी में भगवान राम के साथ भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर भी है।

संविधान के मंदिर की मर्यादा पर लगता प्रश्न

सत्रहवीं लोकसभा अस्तित्व में आ चुकी है। इस बार की लोकसभा में जहाँ कई नए चेहरे चुनाव जीत कर आए हैं वहीं कई अतिविवादित लोगों को भी देश की जनता ने निर्वाचित किया है। बहरहाल,जनभावनाओं का सम्मान करते हुए तथा निर्वाचन आयोग द्वारा लोकसभा को प्रेषित की गई निर्वाचित सांसदों की नई सूची के अनुसार पिछले दिनों नव निर्वाचित सांसदों ने शपथ ली। परन्तु अफ़सोस की बात यह है कि इस बार सांसदों का लोकसभा की सदस्यता ग्रहण करना जितना विवादित व शर्मनाक रहा उससे निश्चित रूप से देश के संविधान का मंदिर समझी जाने वाली भारतीय संसद अत्यंत शर्मिंदा हुई। सबसे पहला विवाद तो भोपाल से चुनी गई भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर की शपथ को लेकर हुआ जबकि उन्होंने अपना नाम प्रज्ञा सिंह ठाकुर लेने के बजाए संस्कृत में शपथ लेते हुए कुछ इन शब्दों में शपथ की शुरुआत की -"मैं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर स्वामी पूर्ण चेतनानंद अवधेशानंद गिरि लोकसभा सदस्य के रूप में शपथ लेती हूँ "। प्रज्ञा सिंह ठाकुर द्वारा अपना उक्त पूरा नाम लिए जाने पर विपक्षी सदस्यों द्वारा टोका टाकी शुरू कर दी गई और उनके इस नाम का विरोध किया गया।  विपक्षी सदस्य  प्रज्ञा सिंह ठाकुर  द्वाराअपने  नाम के साथ अपने गुरु का  नाम जोड़े जाने का विरोध कर रहे थे। जबकि लोकसभा के अधिकारियों ने उनसे अपने नाम के साथ अपने पिता का नाम जोड़ने का अनुरोध किया। ग़ौरतलब है कि मध्य प्रदेश के भिण्ड ज़िले में जन्मी प्रज्ञा ठाकुर के पिता का नाम सी पी ठाकुर है जबकि अवधेशानंद गिरि उनके अध्यात्मिक गुरु हैं।
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एक तरफ प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी संविधान
की नमन कर रहे हैं, दूसरी तरफ इन्ही के सांसद
संसद में क्या कर रहे हैं?
लोकसभा में विवादों का सिलसिला यहीं नहीं थमा बल्कि इसके अगले दिन भी संविधान का यह मंदिर धर्म का अखाड़ा बनता दिखाई दिया। जिस संसद में केवल जयहिंद या भारत माता की जय के नारों की गूँज सुनाई देनी चाहिए थी अथवा अनुशासनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो निर्वाचित माननीयों द्वारा केवल शपथ पत्र में दिए गए निर्धारित वाक्यों व शब्दों मात्र का ही उच्चारण किया जाना चाहिए। उसी संसद में राधे राधे ,जय मां दुर्गा ,जय श्री राम,अल्लाहु अकबर तथा हर हर महादेव के नारे सुनाई दिए। अफ़सोस की बात तो यह है कि संसद में इस प्रकार का उत्तेजनात्मक वातावरण पैदा करने वाले बेशर्म माननीयों को उस समय बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर में राजनीतिज्ञों की असफलता का वह  कुरूप चेहरा भी याद नहीं आया जिसने कि लगभग 150 मासूम बच्चों की जान ले ली।
ऐसे सभी अनुशासनहीन सांसद देश के संविधान की धज्जियाँ उड़ाने में व्यस्त थे। कल्पना की जा सकती है कि जब शपथ ग्रहण के दौरान ही अर्थात संसद के पहले व दूसरे दिन ही इनके तेवर ऐसे हैं तो आने वाले पांच वर्षों में इनसे क्या उम्मीद की जानी चाहिए। शिकायत इस बात को लेकर भी है कि जिस समय माननीयों द्वारा शपथ ग्रहण के दौरान इस प्रकार की असंसदीय नारेबाज़ी की जा रही थी अर्थात अनुशासन की   धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं उस समय लोकसभा के प्रोटेम स्पीकर भी असहाय दिखाई दे रहे थे तथा उन्होंने भी सदस्यों के इस असंसदीय व्यवहार की न तो आलोचना की न ही उन्होंने इसे रोकने का अनुरोध किया।
पश्चिम बंगाल में हुआ इस बार का लोकसभा चुनाव अन्य राज्यों के चुनाव की तुलना में सबसे अधिक विवादित व हिंसक रहा। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में चुनाव को ऐसा रूप दे दिया था गोया भाजपा भगवान श्री राम की पक्षधर है और वहां की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस राम विरोधी है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान भी न सिर्फ़ जय श्री राम के नारों का भरपूर प्रयोग किया बल्कि कई जगह अपने जुलूसों में भगवान राम व रामायण के  विभिन्न पात्रों को भी भगवा वेशभूषा में प्रस्तुत किया। गोया पूरे चुनाव को धार्मिक रंग देने की कोशिश की गई। विपरीत इसके अयोध्या में राममन्दिर निर्माण के लिए कोर्ट पर आश्रित हैं, इतने ही रामभक्त हैं तो कोर्ट में जिन लोगों ने झूठे आरोपपत्र और खुदाई में मिले सबूत छुपाने के दुस्साहस किया है, उन्हें सजा दिलवाने का प्रयास करेंगे। शायद नहीं, क्योकि वो लोग इनके राजनैतिक मित्र हैं। निश्चित रूप से इसी रणनीति के परिणामस्वरूप भाजपा को पश्चिम बंगाल में 18 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। जय श्री राम के नारों की गूंज संसद में उस समय भी बार बार सुनाई दे रही थी जबकि पश्चिम बंगाल के भाजपाई सांसद लोकसभा की सदस्य्ता की शपथ ले रहे थे। हुगली से भाजपा के सांसद लॉकेट चटर्जी ने तो शपथ लेने के बाद जय श्री राम ,जय मां दुर्गा,जय माँ काली के भी जयकारे जय हिन्द व भारत माता की जय के साथ लगवा दिए।
उधर गोरखपुर के निर्वाचित सांसद रवि किशन का नाम आते ही सदन हर-हर महादेव के नारों से गूंजने लगा. शपथ के बाद रविकिशन ने भी उत्साह में आकर हर-हर महादेव, जय पार्वती तथा गोरखनाथ की जय के नारे लगवाए. उसके बाद उन्होंने लोकसभा के सदस्यता रजिस्टर पर अपने हस्ताक्षर किये. यहां तक की सांसद हेमा मालिनी ने भी शपथ के अंत में राधे-राधे का जयघोष किया. पिछले लोकसभा में अनेक विवादित बयानों के लिए अपनी पहचान बनाने वाले साक्षी महाराज ने संस्कृत भाषा में शपथ ली और अंत में जय श्री राम का उद्घोष किया. परन्तु जब वे शपथ ले चुके, उस समय संसद में मंदिर वहीँ बनाएंगे के नारे भी गूंजने लगे।              
जय श्री राम और वन्दे मातरम जैसे नारों की गूँज केवल उसी समय नहीं सुनाई दी जबकि कई भाजपाई सांसद शपथ ले रहे थे बल्कि यह जयकारे उस समय भी लगाए गए जबकि हैदराबाद के एम् आई एम् के सांसद असदुद्दीन ओवैसी का नाम शपथ लेने हेतु पुकारा गया।
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साफ़तौर से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि नशे में चूर नवनिर्वाचित सत्तारूढ़ सांसदों द्वारा विपक्षी सांसदों को छेड़ा या चिढ़ाया जा रहा हो । जैसे ही ओवैसी शपथ लेने के लिए आगे बढ़े, उसी समय संसद में जय श्री राम और वन्दे मातरम के नारे गूंजने लगे।  देश की संसद को ‘धर्म संसद ‘ बनते देख ओवैसी भी स्वयं को विवादों से नहीं बचा सके। उन्होंने भी अल्लाहु अकबर का नारा लोकसभा में उछाल दिया।  ओवैसी को देखकर जय श्री राम का नारा लगाने वालों से ओवैसी ने इशारों से और अधिक नारा लगाने के लिए भी कहा।  परन्तु साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मुझे देखकर ही भाजपा के लोगों को जय श्री राम की याद आती है।  यदि ऐसा है तो यह अच्छी बात है और मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं है।  परन्तु अफ़सोस इस बात का है कि उन्हें बिहार में हुई बच्चों की मौत याद नहीं आ रही है।  ऐसी ही स्थिति संभल से निर्वाचित सांसद शफ़ीक़ुर रहमान बर्क़ के शपथ के दौरान भी पैदा हुई।  उन्होंने भारतीय संविधान को तो ज़िंदाबाद कहा परन्तु वन्दे मातरम कहने पर ऐतराज़ जताया।  उनकी इस बात से असहमति जताते हुए सत्ताधारी भाजपा सदस्यों ने शेम शेम के नारे लगाए।  केवल सोनिया गाँधी की शपथ के दौरान न केवल कांग्रेस सदस्यों बल्कि सत्ताधारी व  विपक्षी समस्त सांसदों ने तालियां बजाकर सोनिया गाँधी द्वारा हिंदी में शपथ लिए जाने का ज़ोरदार स्वागत किया।17 वीं लोकसभा की शुरुआत के पहले ही दिनों में जब माननीयों की अनुशासनहीनता के ऐसे रंग ढंग दिखाई दे रहे हों तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सद्भावनापूर्ण अपील पर कितने खरे उतरेंगे जो उन्होंने संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद केंद्रीय कक्ष में दिए गए अपने पहले भाषण में की थी।  देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया प्रज्ञा ठाकुर जैसी उस सांसद के निर्वाचन पर ही आश्चर्यचकित है जो कि ना केवल मालेगाँव बम ब्लास्ट की आरोपी रही हैं बल्कि शहीद हेमंत करकरे को श्राप दिए जाने तथा नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताये जाने जैसे अतिविवादित बयानों के लिए भी सुर्ख़ियों में रही हैं।  आने वाले पांच वर्षों में यह सांसद देश के समक्ष अनुशासन की कैसी मिसाल पेश करेंगे, इसका ट्रेलर शुरुआती दिनों में ही देखा जा चुका है। निश्चित रूप से यदि यह माननीय इसी तरह बेलगाम रहे तो देश के संविधान के  मंदिर की मर्यादा पर ज़रूर प्रश्न चिन्ह लग सकता है। 

सवर्णों को आरक्षण: संविधान संसोधन बिल पारित होने पर प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौकरियों और शिक्षा में सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से पिछड़े तबके को 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करने वाला विधेयक मंगलवार को लोकसभा में पारित होने पर इसे देश के इतिहास में ”ऐतिहासिक क्षण” करार दिया. लोकसभा में यह विधेयक पारित होने के बाद किए गए ट्वीट में मोदी ने कहा कि इसने एक ऐसे प्रभावी उपाय को हासिल करने की प्रक्रिया को गति दी है जिससे समाज के सभी वर्गों के लिए न्याय सुनिश्चित होगा. मोदी ने कहा, ”यह सुनिश्चित करना हमारा प्रयास है कि हर गरीब व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति या संप्रदाय का हो, गरिमापूर्ण जीवन जिये और उसे हर संभव मौके मिलें.” 
प्रधानमंत्री ने इस विधेयक का समर्थन करने वाली हर पार्टी के सांसदों का शुक्रिया अदा किया. उन्होंने कहा, ”हम निश्चित तौर पर ‘सबका साथ, सबका विकास’ के सिद्धांत को लेकर प्रतिबद्ध हैं.” यह विधेयक बुधवार को राज्यसभा में पेश किया जाएगा. बता दें कि सवर्णों को आरक्षण देने के लिए केंद्र सरकार ने लोकसभा की लड़ाई जीत ली है. लोकसभा में मंगलवार को सरकार ने संविधान संशोधन बिल पेश कर दिया था. इस मुद्दे पर बहस के बाद रात 9.55 बजे वोटिंग हुई. वोटिंग में 326 सांसदों ने हिस्‍सा लिया. इसमें संविधान संशोधन विधेयक के पक्ष में 323 वोट पड़े. 3 सांसदों ने इसका विरोध किया. बि‍ल लोकसभा में पास हो गया. शाम 5 बजे से शुरू हुई बहस के बाद रात 9.55 बजे इस विधेयक पर वोटिंग हुई.
इसके राज्यसभा में जाने की संभावना है जहां उच्च सदन की बैठक एक दिन और बढ़ा दी गयी है. लोकसभा में विपक्ष सहित लगभग सभी दलों ने ‘‘संविधान (124 वां संशोधन) , 2019’’ विधेयक का समर्थन किया. साथ ही सरकार ने दावा किया कि कानून बनने के बाद यह न्यायिक समीक्षा की अग्निपरीक्षा में भी खरा उतरेगा क्योंकि इसे संविधान संशोधन के जरिये लाया गया है.
अवलोकन करें:--

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THE purpose of implementing the reservations in Independent India was to…

लोकसभा में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी सरकार बनने के बाद ही गरीबों की सरकार होने की बात कही थी और इसे अपने हर कदम से उन्होंने साबित भी किया. उनके जवाब के बाद सदन ने 3 के मुकाबले 323 मतों से विधेयक को पारित कर दिया. चर्चा का जवाब देते हुए गहलोत ने कहा कि बहुत सारे सदस्यों ने आशंका जताई है कि 50 फीसदी आरक्षण की सीमा है तो यह कैसे होगा? जो पहले के फैसले किए गए वो संवैधानिक प्रावधान के बिना हुए थे.
उन्होंने कहा कि नरसिंह राव की सरकार को संवैधानिक प्रावधान के बिना 10 फीसदी आरक्षण का आदेश जारी किया था, जो नहीं करना चाहिए था. मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की नीति और नीयत अच्छी है. इसलिए संविधान में प्रावधान करने के बाद हम आरक्षण देने का काम करेंगे. ऐसे में इस तरह की (उच्चतम न्यायालय में निरस्त होने की) शंका निराधार है.
इस दौरान सदन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, गृह मंत्री राजनाथ सिंह मौजूद थे. सदन में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मौजूद थे. गहलोत ने कहा कि पूरे विचार-विमर्श के बाद यह कदम उठाया गया है. हम देर से लाए, लेकिन अच्छी नीयत से लाए. इसलिए आशंका करने की जरूरत नहीं है. मंत्री के जवाब के बाद सदन ने 3 के मुकाबले 323 मतों से विधेयक को मंजूरी दे दी.

‘तीन तलाक पर कुरान की चलेगी, कानून या संविधान की नहीं’--पश्चिम बंगाल सरकार के राज्यमंत्री सिद्दिकुल्ला चौधरी

केंद्र सरकार ने तीन तलाक को अपराध मानने वाले अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। पश्चिम बंगाल सरकार के राज्यमंत्री सिद्दिकुल्ला चौधरी ने गुरुवार (20 सितंबर) को कहा कि कुरान शरीफ ही सर्वोपरि है और ये उससे टकरानेवाले किसी भी संवैधानिक प्रावधान और कानून से ऊपर है ! राज्य में कई मुस्लिम संगठनों ने इस अध्यादेश का विरोध करने का फैसला किया है। जबकि कई अल्पसंख्यक नेताओं ने कहा है कि वह धार्मिक मामलों में किसी किस्म का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे !
चौधरी ने कहा, ‘‘हमारे लिए, हमारी पवित्र किताब, कुरान शरीफ सर्वोपरि है और कोई संवैधानिक प्रावधान और कानून कुरान से मेल नहीं खाता है तो हमारे धर्मग्रंथ की बात ही मानी जाएगी न कि कानून और संविधान की ! भाजपा धर्म का कार्ड खेलकर संविधान से खेल रही है। इस अध्यादेश का मुस्लिमों पर कोई असर नहीं होनेवाला है। कोई भी इस कानून को नहीं मानेगा लेकिन धर्म और हमारी पवित्र कुरान को जरूर मानेगा !” बता दें कि चौधरी जमायत ए इस्लामी हिंद के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। वह पहले ही सुप्रीम कोर्ट के द्वारा तुरंत तीन तलाक पर दिए गए फैसले को असंवैधानिक करार दे चुके हैं !
राज्य मंत्री ने आगे कहा, ‘‘भाजपा चाहें जो भी पैंतरे आजमा ले, वे हिंदुओं और मुस्लिमों को प्रभावित करने में कामयाब नहीं होंगे। 2019 में उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। ये अध्यादेश केवल हिन्दू वोटों को जीतने का तरीका भर है, ये कामयाब नहीं होनेवाला है। हिन्दू और मुस्लिम उन्हें सत्ता से बाहर कर देंगे !” चौधरी ने कहा कि भाजपा नीत केंद्र सरकार को महिलाओं के साथ बढती हिंसा पर भी चिंतित होना चाहिए।
चौधरी ने कहा, ‘‘हर रोज, महिलाओं और लडकियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हो रही हैं। हर रोज महिलाओं को जलाया जा रहा है और क्रूरता हो रही है। केंद्र सरकार क्या कर रही है ? वे इस बारे में कुछ नहीं कर रहे हैं। लेकिन सस्ती वोट बैंक की राजनीति करने के लिए वे मुस्लिमों की भावनाओं को आहत कर रहे हैं !” हालांकि मुस्लिम संगठन इस अध्यादेश का विरोध करने की तैयारी कर रहे हैं।
वहीं आॅल इंडिया अल्पसंख्यक यूथ फोरम के महासचिव मोहम्मद कमरूज्जमां ने कहा, ‘‘भारत बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिन भाजपा के द्वारा लाया गया ये अध्यादेश मुस्लिमों के मूल अधिकारों के साथ ही संविधान का भी उल्लंघन करता है। हम जल्दी ही इस मामले में बैठक बुलाएंगे और आगे की रणनीति तैयार करेंगे !”