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इतिहास के झरोखे से : डॉ राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए नेहरू ने बोला था झूठ

राजेंद्र प्रसाद, नेहरू, पटेलआर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे और संविधान सभा के अध्यक्ष भी थे। लेकिन, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि डॉक्टर राजन भारत के राष्ट्रपति बनें। लेकिन नेहरू के विरोध के बावजूद वो 1950, 1952 और 1957 में लगातार तीन बार देश के राष्ट्रपति चुने गए (पहली बार संविधान सभा द्वारा)। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने जब दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की, तब नेहरू ने आपत्ति जताई। नेहरू चाहते थे कि एक बार 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाला व्यक्ति दूसरी बार राष्ट्रपति न बने। ये अलग बात है कि खुद नेहरू 1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहे।
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को दूसरी बार राष्ट्रपति बनाने के लिए जब हस्ताक्षर अभियान चल रहा था, तब नेहरू उनसे मिलने पहुँचे। उन्होंने ‘एक पुराने दोस्त होने के नाते’ उनसे आग्रह किया कि वो दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव न लड़ें। हालाँकि, डॉक्टर प्रसाद ने उन्हें किसी प्रकार का भरोसा नहीं दिया। वो चुप रहे। कांग्रेस की संसदीय समिति की बैठक हुई। इस बैठक में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की उम्मीदवारी का सिर्फ़ एक व्यक्ति ने विरोध किया और वो थे जवाहरलाल नेहरू। पार्लियामेंट्री बोर्ड के 6 सदस्यों में से नेहरू अकेले व्यक्ति थे, जो राजेंद्र प्रसाद को फिर से राष्ट्रपति बनाए जाने के ख़िलाफ़ थे।
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हालाँकि, मोरारजी देसाई भी ऐसा नहीं चाहते थे लेकिन बीमार होने के कारण वो उस बैठक में हिस्सा नहीं ले रहे थे। आज तक देश के इतिहास में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के अलावा कोई दूसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन पाया। 1957 में जवाहरलाल नेहरू डॉ एस राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। इसी तरह वो 1952 में चक्रवर्ती राजगोपालचारी के पक्ष में थे। लेकिन उन्हें दोनों बार निराशा हाथ लगी। 1949 में जब देश के प्रथम राष्ट्रपति के लिए बीतचीत शुरू हुई, तब नेहरू ने राजगोपालचारी के पक्ष में गोलबंदी शुरू की। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने एक बयान जारी कर जनता को प्रोपेगंडा से बचने की सलाह दी और कहा कि ‘राजाजी’ और उनके बीच राष्ट्रपति बनने के लिए कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है।
दरअसल, नेहरू ऐसा राष्ट्रपति चाहते थे, जो प्रधानमंत्री के इशारे पर काम करे। और यही बात आज तक कांग्रेस की है। वास्तव में डॉ राधाकृष्णन के बाद से राष्ट्रपति पद की गरिमा का हनन होता रहा। 
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे। 1950 में राष्ट्रपति भी इसी सभा को चुनना था। ऐसे में, नेहरू ने प्रसाद को चिट्ठी लिखी कि वो इसके लिए राजाजी का नाम आगे करें। उन्होंने लिखा कि वल्लभभाई पटेल भी इसके लिए अपनी सहमति दे चुके हैं। डॉक्टर प्रसाद दुःखी हुए। वो इस बात से निराश हुए कि नेहरू उन्हें ‘आदेश’ दे रहे हैं। उनका मानना था कि वो तो इन सब में पड़ने के लिए तैयार ही नहीं थे लेकिन जब उन्हें संविधान सभा का अध्यक्ष बनाया गया है तो उनकी विदाई भी सम्मानजनक तरीके से होनी चाहिए। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू और पटेल को एक लम्बा-चौड़ा पत्र भेजा
लेकिन, यहाँ एक बात पता चलती है कि जवाहर लाल नेहरू ने झूठ बोला था। उन्होंने राजगोपालचारी को राष्ट्रपति बनाने के लिए सरदार पटेल की सहमति नहीं ली थी। नेहरू ने बिना पटेल की अनुमति के उनका नाम घसीट दिया था। डॉक्टर प्रसाद की चिट्ठी आने के बाद ये भेद खुला और पटेल इस बात से नाराज़ हुए कि नेहरू ने उनका नाम बिना पूछे इस्तेमाल किया। जब पोल खुल गई तो नेहरू ने डॉक्टर प्रसाद को फिर से पत्र लिख कर बताया कि उन्होंने उनसे जो कुछ भी कहा था, उसका पटेल से कुछ लेना-देना नहीं है। नेहरू ने लिखा कि उन्होंने पूरी तरह अपने बात सामने रखी थी। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि इसके लिए पटेल से उन्होंने कोई चर्चा नहीं की है।'
इस सन्दर्भ में भारत में हुए प्रथम चुनाव का किस्सा स्मरण हो रहा है, यानि नेहरू अपनी जिद पूरी करने किसी भी सीमा जाने में गुरेज नहीं करते थे। रामपुर से नेहरू के लाडले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद मैदान में और आज़ाद के विरुद्ध थे, हिन्दू महासभा के विशन सेठ। विशन ने आज़ाद को 6000 वोटों से पराजित करना, नेहरू को रास नहीं आया। तुरंत, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लब पंत को फोन कर चुनाव परिणाम पलटने को कहा, परिणामस्वरूप पंत ने भी साम दाम दंड भेद अपनाकर विशन को उनके विजयी जलूस से अगवा करवाकर, मतगणना पर लाकर, उन्ही के सामने उनकी वोटें आज़ाद की वोटों में मिलवाकर लगभग 3000 वोटों से जितवा पार्लियामेंट पहुंचवा दिया। कहा जाए, नेहरू ने आने स्वार्थ के लिए लोकतन्त्र और मान-मर्यादा को तार-तार करने का कोई अवसर नहीं गंवाया।      
नाराज़ डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को नेहरू ने माफ़ी माँगते हुए लिखा कि वो उनका पूरा सम्मान करते हैं और उनकी भावनाओं को चोट पहुँचाने का कोई इरादा नहीं था। नेहरू को यूके और अमेरिका के 6 दिनों के दौरे पर जाना था। वो चाहते थे कि उससे पहले राजाजी के पक्ष में फ़ैसला हो जाए, तो वो निश्चिंत होकर विदेश दौरे पर जा सकें। संविधान सभा की बैठक में जब उन्होंने ये बातें रखी, तो कई नेताओं ने इस पर आपत्ति जताई। कुछ ने तो इसका कड़ा विरोध किया। माहौल इतना गर्म हो गया कि सरदार पटेल को मामला थामना पड़ा। उन्होंने शांति की अपील करते हुए कहा की कांग्रेस हमेशा की तरह मतभेदों से ऊपर उठ कर निर्णय लेगी।

सरदार पटेल ने तब तक डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को लेकर मन बना लिया था। डॉक्टर प्रसाद के राष्ट्रपति बनने से जुड़े एक सवाल के जवाब में पटेल ने कहा- “अगर दूल्हा पालकी छोड़ कर ना भागे तो शादी नक्की।” पटेल का इशारा था कि अगर डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ख़ुद से पीछे हट कर राजाजी के लिए रास्ता नहीं छोड़ते हैं तो उन्हें राष्ट्रपति बनने से कोई नहीं रोक सकता। वो इस तरह से डॉक्टर प्रसाद के सीधे-सादे व्यवहार का भी जिक्र कर रहे थे। चुनाव हुआ और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को 5,07,400 वोट मिले। उनकी जीत पक्की जान कर कांग्रेस के 65 सांसदों और 479 विधायकों ने वोट देने की भी जहमत नहीं उठाई।
इसी तरह 1957 में नेहरू डॉ एस राधाकृष्णन के पक्ष में गोलबंदी कर रहे थे लेकिन कांग्रेस डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को लेकर एकमत थी। राधाकृष्णन ने उपराष्ट्रपति के रूप में इस्तीफा देने का मन बना लिया था लेकिन उन्हें किसी तरह मनाया गया। नेहरू ने तब कहा था कि वो 1947 के बाद से अब तक इतने खिन्न नहीं थे, जितने अब हैं। नेहरू और डॉ प्रसाद के बीच हिन्दू कोड बिल को लेकर भी मतभेद थे। राजन बाबू हिन्दू कोड बिल के विरुद्ध थे। लेकिन संसद द्वारा तीन बार जब बिल को पारित करने पर राजन बाबू की बात आज भी चरितार्थ हो रही है। देखिए कितनी हिन्दू विवाहितों के तलाक हो रहे हैं। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने काशी में ब्राह्मणों के पाँव धोए थे। नेहरू ने इस पर आपत्ति जताई थी। नेहरू तो यह भी नहीं चाहते थे कि डॉक्टर प्रसाद सोमनाथ मंदिर का शिलान्यास करने जाएँ। परन्तु राजन बाबू नेहरू के विरोधों को दरकिनार कर सोमनाथ मन्दिर का शिलान्यास करने गए। 

नेहरु करना चाहते थे जन्मभूमि से बेदखल फिर भी विराजमान रहे रामलला

अयोध्या, नेहरू, राम
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
राम जिसका महत्व और महानता रावण तक भलीभांति जानता था, लेकिन तुष्टिकरण की पुजारी कांग्रेस मुग़ल आक्रांताओं का चोला औढ़ देश की जनता को भ्रमित कर अयोध्या में रामजन्म स्थल पर राम मन्दिर का विरोध कर, रावण को भी बहुत पीछे छोड़ दिया।   
शायद राम होने की नियति यही है! बार-बार अपनी ही जमीन से बेदखल होना है। हर दौर में खुद को साबित करते रहना। अयोध्या से उन्हें दूर करने की साजिश पुरानी है। साजिशकर्ता कभी मंथरा होती है तो कभी नेहरू। 
हिन्दू हिन्दू कहकर कांग्रेस हिन्दुओं को पागल बनाती रही, लेकिन पार्टी में विराजमान हिन्दू भी हिन्दू विरोधी गतिविधियों में साथ देते रहे। फिर जब सोमनाथ मंदिर के जीणोंद्वार किये जाने का नेहरू ने विरोध किया था, जब जीणोंद्वार बाद प्रवेश पूजन में तत्कालीन प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के जाने का भी विरोध किया था, लेकिन राजन बाबू ने नेहरू के विरोधों को दरकिनार कर मंदिर के प्रवेश में सम्मिलित हुए थे। 
और हिन्दू महासभा नेता कमलेश तिवारी की हत्या समस्त हिन्दू मन्दिरों का विरोध कर रहे हिन्दुओं के लिए ऑंखें खोलने से कम नहीं, मुसलमान अपने मौहम्मद के विरुद्ध कुछ सुनने को तैयार नहीं, और हिन्दू हैं कि अपने देवी-देवताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहते हैं। 
नेहरू यानी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में ​विस्तार से उन घटनाओं का ब्यौरा दिया है, जब गर्भगृह से राम की मूर्ति हटाने पर नेहरू अमादा थे। लेकिन, केरल के रहने वाले आईसीएस अधिकारी केकेके नायर, जो उस समय फैजाबाद के जिलाधिकारी थे ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
हेमंत शर्मा लिखते हैं, “उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम नेताओं और देवबंद के उलेमाओं ने नेहरू को तार भेजकर उनका ध्यान अयोध्या की ओर दिलाया। नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत और राज्य के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को तत्काल मस्जिद से मूर्तियों को हटाने के निर्देश दिए।लगातार केंद्र से संदेश लखनऊ आते और वैसे ही तार लखनऊ से फैजाबाद भेजे जाते कि मूर्तियॉं तुरंत हटाई जाएँ। 24 और 25 दिसंबर 1949 को लखनऊ में इस मुद्दे पर दिन भर उच्च स्तरीय बैठक होती रही। तय किया गया कि मूर्तियों को गर्भगृह से बाहर ले जाकर राम चबूतरे पर रखा जाएगा। पर फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट केकेके नायर इस बात पर अड़े रहे कि मूर्ति हटाने की घोषणा से मात्र से खून-खराबा होगा।”
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने इस संबंध में फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नायर को 23 दिसंबर को निर्देश दिए। जवाब में 26 दिसंबर को नायर ने लिखा, “मैं आज भी इसकी कल्पना नहीं कर पा रहा कि मूर्ति को वहॉं से कैसे हटाया जाए। यदि इस कार्य को धार्मिक रीति के अनुसार किया जाना है तो मुझे कोई ऐसा योग्य हिन्दू पुजारी नहीं मिलेगा, जो इस काम के लिए अपने जीवन और मोक्ष को दॉंव पर लगाने का इच्छुक हो। यदि ऐसा किसी भी तरह या किसी के द्वारा भी किया जाना है तो इसके परिणामस्वरुप हिन्दुओं के सभी वर्गों के विरोध का सामना सरकार को करना पड़ सकता है। मुझे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि क्या सरकार उस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।”
इससे पहले की इस पर सरकार कोई प्रतिक्रिया देती अगले ही दिन नायर ने मुख्य सचिव को फिर एक चिट्ठी दाग दी। इस बार उन्होंने लिखा, “यदि सरकार किसी भी कीमत पर मूर्ति हटाने का फैसला लेती है तो मैं अनुरोध करूँगा कि मुझे कार्यमुक्त किया जाए और मेरा कार्यभार किसी ऐसे अधिकारी को दिया जाए, जिसे इस समाधान में वह अच्छाई दिखती हो जो मुझे दिखाई नहीं देती। जहॉं तक मेरा सवाल है मेरा विवेक मुझे ऐसा करने की इजाजत नहीं देता।”
नायर की चिट्ठियों से राज्य सरकार दबाव में आ गई। घबराए सहाय ने उन्हें फोन कर कहा कि वे मौके पर जैसा ठीक समझें करें। लेकिन, नेहरू लगातार अपनी चिंता जताते रहे। जब नायर सरकार की सुनने को तैयार नहीं थे तो नेहरू ने 26 नवंबर 1949 को पंत को एक तार भेजा। इसमें कहा, “अयोध्या में हुई घटनाओं से मैं परेशान हूँ। मैं गंभीरतापूवर्क उम्मीद करता हूँ कि आप इस विषय पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगे। वहॉं आपत्तिजनक उदाहरण रखे जा रहे हैं जिनके परिणाम घातक होंगे।”
मूर्तियॉं तो नहीं हटीं। पर नेहरू के प्रयास जारी रहे। 15 फरवरी 1950 को उन्होंने पंत को एक पत्र लिख अयोध्या के हालात पर जानकारी मॉंगी। साथ ही कश्मीर पर इसके कारण पड़ने वाले हालात को लेकर चिंता जताई। 5 मार्च 1950 को किशोरीलाल को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा, “उत्तर प्रदेश सरकार ने हिम्मत से काम लिया, लेकिन जो हुआ वो कम था। फैजाबाद के अधिकारियों ने या तो बदमाशी की या फिर हालात को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।”
यहॉं तक कि नेहरू अयोध्या भी जाना चाहते थे। पर पंत उन्हें टालते गए। यहॉं यह जानना जरूरी है कि पंत को नेहरू पसंद नहीं करते थे। पंत देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभाई पटेल के करीबी माने जाते थे। लिहाजा, नेहरू ने पटेल से भी पंत पर दबाव डलवाने की कोशिश की। 9 जनवरी 1950 को पटेल ने इस संबंध में पंत को पत्र भी लिखा। लेकिन, उन्होंने मूर्तियॉं हटाने के लिए कोई निर्देश देने की बजाए मुख्यमंत्री पंत की ओर से उठाए गए कदमों की तारीफ की। साथ ही इस समस्या के लिए अपनी पार्टी में बढ़ती गुटबंदी को भी जिम्मेदार ठहराया।
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पुरातत्व बताता है कि अयोध्या सिर्फ हिंदुओं की मान्यता नहीं है। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात कोरी आस्था नहीं ह....

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इलाहबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर जब रामजन्म स्थान की 

देश का एकलौता सांसद जिसने 9 वर्षों से नहीं ली सैलरी, बोले-पैसे कमाने के लिए नहीं होती राजनीति

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारतीय राजनीति में ऐसी मिसाल कम ही देखने को मिलती हैं, जिनमें नेता जो कहें, उन पर खुद भी अमल करें। लेकिन एक नेता ने अपने कहे पर अमल करके राजनीति में नई मिसाल कायम की है। बीजेपी सांसद वरुण गांधी अमीर सांसदों द्वारा अपना वेतन छोड़ने की मांग करते रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि वे केवल दूसरे सांसदों को वेतन नहीं लेने की सलाह देते हैं बल्कि वे खुद भी वेतन नहीं ले रहे हैं। ZEE NEWS की रिपोर्ट के अनुसार, वरुण गांधी ने पिछले 9 साल से सांसद के रूप में मिलने वाले वेतन को गरीब और जरूरतमंदों में बांट रहे हैं। वेतन का एक पैसा भी वह अपने लिए इस्तेमाल नहीं करते हैं। वरुण गांधी सुल्तानपुर से सांसद हैं। वे अक्सर संसद सत्रों में जनहित के मुद्दों पर बहस नहीं होने और सांसदों के वेतन व भत्ते में होने वाले इजाफे पर चिंता जाहिर करते रहते हैं।
वरुण की गतिविधियों को देख सत्ता गलियारों में हमेशा से यह चर्चा रही है कि इन में अपने पिता संजय गाँधी के संस्कार बोलते हैं। क्योकि वरुण ही शायद ऐसे सांसद हैं, जो सांसदों के वेतन, वेतन वृद्धि एवं मिलने वाली पेंशन का विरोध करते रहे हैं। इतना जरूर है कि यदि भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने वरुण को थोड़ा भी आगे करने का प्रयत्न किया, संभव है मोदी-योगी-अमित को अपने प्रोग्राम किर्याविन्त करने में सहायक सिद्ध हों।
इतिहास पर दृष्टि डालने पर ऐसी ही घटना भारत के प्रथम महामहिम डॉ राजेन्द्र प्रसाद की मिलती है, जो अपने खर्चे से अधिक मिले शेष वेतन को प्रति माह राष्ट्रीय सुरक्षा फण्ड में देते थे। फिर चर्चित क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की, जिन्होंने अपने 6 वर्षीय राज्य सभा सांसद के रूप में मिले वेतन को अपने कार्यकाल की समाप्ति पर वापस कर दिया यानि बिना वेतन के सांसद।   
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई है। भारत में हर नागरिक को आवाज उठानी चाहिए,...

उन्होंने इस साल के शुरू में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन से अपील की थी कि आर्थिक रूप से सम्पन्न सांसदों द्वारा 16वीं लोकसभा के बचे कार्यकाल में अपना वेतन छोड़ने के लिए आंदोलन शुरू करें। लोकसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र में वरुण गांधी ने कहा था कि भारत में असमानता प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। भारत में एक प्रतिशत अमीर लोग देश की कुल संपदा के 60 प्रतिशत के मालिक हैं। भारत में 84 अरबपतियों के पास देश की 70 प्रतिशत संपदा है। यह खाई हमारे लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।
उन्होंने पत्र में लिखा था, ‘स्पीकर महोदया से मेरा निवेदन है कि आर्थिक रूप से सम्पन्न सांसदों द्वारा 16वीं लोकसभा के बचे कार्यकाल में अपना वेतन छोड़ने के लिए आंदोलन शुरू करें। ऐसी स्वैच्छिक पहल से हम निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता को लेकर देशभर में एक सकारात्मक संदेश जाएगा।’ वरुण गांधी ने इस बात पर खुद ही शुरू से अमल कर रहे हैं। वह पिछले 9 वर्षों से सांसद के तौर पर वेतन के रूप में मिलने वाले पैसे का अपने ऊपर इस्तेमाल नहीं करते हैं, बल्कि वेतन की पूरी रकम को गरीबों पर खर्च कर देते हैं।
इसमें कोई दो राय भी नहीं कि किसी भी सदन में निर्वाचित या चुनाव लड़ने वाला आर्थिक रूप से कमजोर नहीं होता। किसी न किसी व्यापार से आते हैं। लेकिन जब जनसेवा के नाम पर वेतन और मुफ्त सेवाओं पर खर्च होने वाला धन देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। ऊपर से निर्वाचित होने पर मिलने वाली पेंशन एक बोझ बन रही हैं, जिस पर किसी जनसेवक ने मन्थन करने का साहस तक नहीं किया। शायद यही कारण है बजट का घाटे में होना। महंगाई पर कोई लगाम नहीं। आखिर तेल तो तिलों में से ही निकलेगा।  
अभी हाल ही में उन्होंने एक ऐसे ही जरूरतमंद रामजी गुप्ता को ढाई लाख रुपये की आर्थिक मदद की थी। रामजी गुप्ता को कैंसर से जूझ रहे अपने पिता के इलाज के लिए पैसे की जरूरत थी और उन्होंने इसके लिए वरुण गांधी से आर्थिक मदद की अपील की। वरुण गांधी ने रामजी गुप्ता की जरूरत को देखते हुए उन्होंने तत्काल ढाई लाख रुपये की मदद महैया कराई। इससे पहले वरुण गांधी ने सुल्तापुर के एक किसान को 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता मुहैया कराई थी।
जानकारी के मुताबिक, बीजेपी सांसद 13 जिलों के जरूरतमंद किसानों को मदद पहुंचा चुके हैं। सुल्तानपुर में वह दो दर्जन गरीब लोगों का घर भी अपने पैसों से बनवा चुके हैं। इस मदद के पीछे वरुण गांधी तर्क देते हैं कि वह राजनीति में पैसा कमाने के लिए नहीं बल्कि जनता की सेवा के लिए आए हैं। उन्होंने कहा कि राजनीति के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोगों की मदद की जा सकती है।