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कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में मंदिरों, मठों, ट्रस्टों ने जमकर किया सहयोग

सोमनाथ मंदिर
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
राष्ट्रीय संकट के समय हम अक्सर कथित उदारवादी और सेक्युलर ब्रिगेड से सुना करते हैं कि भला होता जो मंदिर की जगह अस्पताल बनाए गए होते। मंदिरों पर हुए खर्च को किन्हीं बेहतर जगह खर्च करने की दुहाई दी जाती है। सामान्य दिनों में अस्पतालों के साथ-साथ विद्यालय बनाने के पक्ष में भी दलीलें होतीं हैं। अस्पताल, स्कूल चाहिए किसकी कीमत पर? मंदिरों की कीमत पर।
किसी ने अपने शांतिदूत वोटबैंक आज तक यह पूछने का साहस नहीं किया कि जब कभी देश पर कोई विपत्ति आई है, मंदिरों ने अपनी तिजोरियां खोल दीं, लेकिन किसी मस्जिद अथवा दरगाह ने नहीं। अभी मोदी सरकार द्वारा खातों में रूपए डालने की बात बोले रात भी नहीं बीती की सुबह होते ही कागज न दिखाने वालों ने अपनी-अपनी बेगमों को बैंक भेज दिया। दूसरे, इनके शांतिदूतों ने दिल्ली निजामुद्दीन से लेकर समस्त भारत में संक्रामक बीमारी कोरोना का आतंक मचाने के साथ-साथ डॉक्टरों और पुलिस पर थूकना, हॉस्पिटल में नर्सों के सामने नंगा होना, अभद्र इशारे करना और गालियां देना आदि आदि। 
जबकि तथ्य यह है कि मंदिर बनाना और अस्पताल या विद्यालय बनाना बिल्कुल अलग-अलग गतिविधि नहीं है, दोनों ही जनकल्याण के लिए ही हैं। इसके बावजूद भी सोची समझी रणनीति के तहत हिन्दुओं को मंदिर बनाने के ‘गिल्ट’ में डुबो देने की कोशिशें जारी रहती हैं। हालाँकि, सामाजिक सरोकारों के प्रति सामान्य परिस्थिति में निभाई जा रही अपनी महती भूमिका के अतिरिक्त संकटकालीन स्थिति में आपदा के समय मंदिर हमेशा ही सरकारों तथा सामाजिक संगठनों को दान और सहयोग करने में सबसे आगे रहते हैं। वुहान वायरस महामारी भी इस मामले में कोई अपवाद नहीं।
संकट की इस घड़ी में अब तक देश भर से कई सारे मंदिर आगे आ कर कोरोना वायरस संक्रमण के खिलाफ लड़ाई में अपने अंशदान की घोषणा कर चुके है। कोरोना संक्रमण, और उसको फैलने से रोकने के लिए लगाए गए इस लॉकडाउन जैसी विषम स्थिति में देश के मंदिर न सिर्फ नगद के रूप में बल्कि भोजन आदि कल्याणकारी गतिविधियों के मार्फत से भी देश को इस संकट के समय सहयोग करते देखे जा सकते हैं। इसके बावजूद भी मंदिरों को अपनी भूमिका के एवज में कभी न्यायोचित क्रेडिट नहीं दिया जाता। इस कारण मंदिरों के खिलाफ एक झूठे प्रोपेगण्डे को पर्याप्त जगह मिल जाती है, जिसमें मंदिरों पर सामाजिक हित में पर्याप्त भूमिका न निभाने का आरोप लगाया जाता है। जबकि यह सच्चाई से कोसों दूर की बात है।
अपने पाठकों के लिए, जो अब तक इस संकटकालीन परिस्थिति में अपने-अपने सहयोग की घोषणा कर चुके हैं। किसी भी प्रकार से यह लिस्ट सम्पूर्ण नहीं है क्योंकि बहुत सारे बड़े-बड़े मंदिर जिनका ट्रस्ट सरकार के पास है, और उनके फंड्स का क्या करना है वो सरकार तय करती है। ऐसे मंदिर इस लिस्ट में शामिल नहीं हैं, आने वाले समय में शायद सरकारें इन मंदिरों के सहयोग पर कुछ निर्णय लें। साथ ही इस लिस्ट में उन छोटे छोटे सैंकड़ों हजारों मंदिरों के भी नाम नहीं आ सकते थे जो कोरोना वायरस के खिलाफ जारी लड़ाई में अपने-अपने उपलब्ध संसाधनों के जरिए अपनी-अपनी यथोचित भूमिका के निर्वहन में लगे हुए हैं।

Sai Baba of Shirdi - Wikipedia
शिरडी साईं बाबा संस्थान : महाराष्ट्र के प्रसिद्ध शिरडी साईं बाबा मंदिर ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रिलीफ फंड में 51 करोड़ रूपए दान किए।
Patanjali to infuse 3,438 cr in Ruchi Soya to fix dues | Deccan Heraldबाबा रामदेव और पतंजलि ट्रस्ट : योग गुरु बाबा रामदेव ने घोषणा की है कि वे प्रधानमंत्री राहत कोश में 25 करोड़ का सहयोग करेंगे इसके साथ ही साथ पतंजलि और रूचि सोया के सभी एम्प्लॉई अपने एक दिन का वेतन भी प्रधानमंत्री कोष में दान करेंगे जो कुलमिलाकर 1.5 करोड़ बैठता है। इसके अतिरिक्त योग गुरु ने अपने हरिद्वार स्थित दोनों संस्थानों और कोलकाता, मोदी नगर-यूपी, सोलन-हिमाचल प्रदेश स्थित आश्रमों को कोरोना रोगियों के इलाज के लिए देने की घोषणा की। इन सभी स्थानों में 1500 रोगियों को आइसोलेशन में रखा जा सकता है। यहाँ जिन्हें भर्ती किया जाएगा उनके लिए भोजन की व्यवस्था भी पतंजलि करेगा।
महावीर हनुमान मंदिर, पटना : पटना स्थित महावीर हनुमान मंदिर ने कोरोना से लड़ने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री राहत कोष में 1 करोड़ रुपए दान किए।
Shri Kanchi Kamakoti Peetam, Kanchipuram - Home | Facebookअम्बाजी मंदिर : अम्बा जी माता मंदिर ट्रस्ट, ‘आरासुरी अम्बा जी माता देवस्थानम ट्रस्ट’ ने 1 करोड़ 1 रुपए का दान किया
स्वामीनारायण मंदिर: गुजरात भर में फैले 7 स्वामीनारायण मंदिरों ने कुलमिलाकर 1.88 करोड़ रुपए का सहयोग किया। इसके अलावा कोरोना संक्रमित मरीजों को आइसोलेशन में रखने के लिए तकरीबन 500 बेड का भी इंतजाम स्वामीनारायण ट्रस्ट ने किया है।
सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट : सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट ने गुजरात के मुख्यमंत्री राहत कोष में 1 करोड़ रुपए दान किए।
कांची मठ : कांची कामकोटि पीठम ने 21 मार्च को जारी किए स्टेटमेंट में प्रधानमंत्री राहत कोष तथा तमिलनाडु के मुख्यमंत्री राहत कोष में 10-10 रुपए के अंशदान की घोषणा की।
Vaishno Devi Chalisa | वैष्णो देवी चालीसा | Hindi ...
माता वैष्णों देवी मंदिर : जम्मू-कश्मीर स्थित माता वैष्णों देवी मंदिर के गैर राजपत्रित स्टॉफ ने जहाँ राज्य के राहत कोष में एक दिन की सैलरी देने का निर्णय लिया, वहीं ट्रस्ट के राजपत्रित स्टॉफ ने अपनी दो दिनों की सैलरी राज्य के राहत कोष में दान की। इसके अतिरिक्त बोर्ड के वाइस चेयरमैन मुर्मू के निर्देश पर कटरा बस्ती में जरूरतमंदों के बीच राशन किटों का भी वितरण किया गया। इसके अलावा श्राइन बोर्ड ने अपने आशीर्वाद काम्प्लेक्स को जिला प्रशासन के लिए सौंप दिया है जो 600 बेडों के अस्पताल के लिए काम आ सकता है।
Mahakal Photo Editor - Mahakal Photo Frame for Android - APK Downloadमहाकालेश्वर मंदिर उज्जैन : महाकालेश्वर मंदिर ट्रस्ट ने कुल 5 लाख रुपए, 2.5 लाख प्रधानमंत्री राहत कोष और 2.5 लाख मुख्यमंत्री राहत कोष में दान किए।
माँ महामाया मंदिर ट्रस्ट, विलासपुर छत्तीसगढ़ : मंदिर ने मुख्यमंत्री सहायता कोष में 5 लाख 11 रुपए दान किए और रेड क्रॉस सोसाइटी को कोरोना के खिलाफ अभियान में 1 लाख 11 हजार दान किए।
श्री नित्य चिंताहरण गणपति मंदिर ट्रस्ट : रतलाम मध्य प्रदेश के गणपति मंदिर ट्रस्ट ने भूखों को खाना खिलाने के लिए 1 लाख 11 हजार का दान किया।
इसके अलावा सिद्ध विनायक मंदिर रक्त संकलन करने में अपना योगदान देगा।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार गाजियाबाद के एमएमजी अस्पताल में नर्सों के साथ बदतमीजी करने के मामले में तबलीगी जमात .....

नेहरु करना चाहते थे जन्मभूमि से बेदखल फिर भी विराजमान रहे रामलला

अयोध्या, नेहरू, राम
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
राम जिसका महत्व और महानता रावण तक भलीभांति जानता था, लेकिन तुष्टिकरण की पुजारी कांग्रेस मुग़ल आक्रांताओं का चोला औढ़ देश की जनता को भ्रमित कर अयोध्या में रामजन्म स्थल पर राम मन्दिर का विरोध कर, रावण को भी बहुत पीछे छोड़ दिया।   
शायद राम होने की नियति यही है! बार-बार अपनी ही जमीन से बेदखल होना है। हर दौर में खुद को साबित करते रहना। अयोध्या से उन्हें दूर करने की साजिश पुरानी है। साजिशकर्ता कभी मंथरा होती है तो कभी नेहरू। 
हिन्दू हिन्दू कहकर कांग्रेस हिन्दुओं को पागल बनाती रही, लेकिन पार्टी में विराजमान हिन्दू भी हिन्दू विरोधी गतिविधियों में साथ देते रहे। फिर जब सोमनाथ मंदिर के जीणोंद्वार किये जाने का नेहरू ने विरोध किया था, जब जीणोंद्वार बाद प्रवेश पूजन में तत्कालीन प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के जाने का भी विरोध किया था, लेकिन राजन बाबू ने नेहरू के विरोधों को दरकिनार कर मंदिर के प्रवेश में सम्मिलित हुए थे। 
और हिन्दू महासभा नेता कमलेश तिवारी की हत्या समस्त हिन्दू मन्दिरों का विरोध कर रहे हिन्दुओं के लिए ऑंखें खोलने से कम नहीं, मुसलमान अपने मौहम्मद के विरुद्ध कुछ सुनने को तैयार नहीं, और हिन्दू हैं कि अपने देवी-देवताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहते हैं। 
नेहरू यानी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में ​विस्तार से उन घटनाओं का ब्यौरा दिया है, जब गर्भगृह से राम की मूर्ति हटाने पर नेहरू अमादा थे। लेकिन, केरल के रहने वाले आईसीएस अधिकारी केकेके नायर, जो उस समय फैजाबाद के जिलाधिकारी थे ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
हेमंत शर्मा लिखते हैं, “उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम नेताओं और देवबंद के उलेमाओं ने नेहरू को तार भेजकर उनका ध्यान अयोध्या की ओर दिलाया। नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत और राज्य के गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को तत्काल मस्जिद से मूर्तियों को हटाने के निर्देश दिए।लगातार केंद्र से संदेश लखनऊ आते और वैसे ही तार लखनऊ से फैजाबाद भेजे जाते कि मूर्तियॉं तुरंत हटाई जाएँ। 24 और 25 दिसंबर 1949 को लखनऊ में इस मुद्दे पर दिन भर उच्च स्तरीय बैठक होती रही। तय किया गया कि मूर्तियों को गर्भगृह से बाहर ले जाकर राम चबूतरे पर रखा जाएगा। पर फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट केकेके नायर इस बात पर अड़े रहे कि मूर्ति हटाने की घोषणा से मात्र से खून-खराबा होगा।”
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव भगवान सहाय ने इस संबंध में फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नायर को 23 दिसंबर को निर्देश दिए। जवाब में 26 दिसंबर को नायर ने लिखा, “मैं आज भी इसकी कल्पना नहीं कर पा रहा कि मूर्ति को वहॉं से कैसे हटाया जाए। यदि इस कार्य को धार्मिक रीति के अनुसार किया जाना है तो मुझे कोई ऐसा योग्य हिन्दू पुजारी नहीं मिलेगा, जो इस काम के लिए अपने जीवन और मोक्ष को दॉंव पर लगाने का इच्छुक हो। यदि ऐसा किसी भी तरह या किसी के द्वारा भी किया जाना है तो इसके परिणामस्वरुप हिन्दुओं के सभी वर्गों के विरोध का सामना सरकार को करना पड़ सकता है। मुझे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि क्या सरकार उस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।”
इससे पहले की इस पर सरकार कोई प्रतिक्रिया देती अगले ही दिन नायर ने मुख्य सचिव को फिर एक चिट्ठी दाग दी। इस बार उन्होंने लिखा, “यदि सरकार किसी भी कीमत पर मूर्ति हटाने का फैसला लेती है तो मैं अनुरोध करूँगा कि मुझे कार्यमुक्त किया जाए और मेरा कार्यभार किसी ऐसे अधिकारी को दिया जाए, जिसे इस समाधान में वह अच्छाई दिखती हो जो मुझे दिखाई नहीं देती। जहॉं तक मेरा सवाल है मेरा विवेक मुझे ऐसा करने की इजाजत नहीं देता।”
नायर की चिट्ठियों से राज्य सरकार दबाव में आ गई। घबराए सहाय ने उन्हें फोन कर कहा कि वे मौके पर जैसा ठीक समझें करें। लेकिन, नेहरू लगातार अपनी चिंता जताते रहे। जब नायर सरकार की सुनने को तैयार नहीं थे तो नेहरू ने 26 नवंबर 1949 को पंत को एक तार भेजा। इसमें कहा, “अयोध्या में हुई घटनाओं से मैं परेशान हूँ। मैं गंभीरतापूवर्क उम्मीद करता हूँ कि आप इस विषय पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगे। वहॉं आपत्तिजनक उदाहरण रखे जा रहे हैं जिनके परिणाम घातक होंगे।”
मूर्तियॉं तो नहीं हटीं। पर नेहरू के प्रयास जारी रहे। 15 फरवरी 1950 को उन्होंने पंत को एक पत्र लिख अयोध्या के हालात पर जानकारी मॉंगी। साथ ही कश्मीर पर इसके कारण पड़ने वाले हालात को लेकर चिंता जताई। 5 मार्च 1950 को किशोरीलाल को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा, “उत्तर प्रदेश सरकार ने हिम्मत से काम लिया, लेकिन जो हुआ वो कम था। फैजाबाद के अधिकारियों ने या तो बदमाशी की या फिर हालात को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।”
यहॉं तक कि नेहरू अयोध्या भी जाना चाहते थे। पर पंत उन्हें टालते गए। यहॉं यह जानना जरूरी है कि पंत को नेहरू पसंद नहीं करते थे। पंत देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभाई पटेल के करीबी माने जाते थे। लिहाजा, नेहरू ने पटेल से भी पंत पर दबाव डलवाने की कोशिश की। 9 जनवरी 1950 को पटेल ने इस संबंध में पंत को पत्र भी लिखा। लेकिन, उन्होंने मूर्तियॉं हटाने के लिए कोई निर्देश देने की बजाए मुख्यमंत्री पंत की ओर से उठाए गए कदमों की तारीफ की। साथ ही इस समस्या के लिए अपनी पार्टी में बढ़ती गुटबंदी को भी जिम्मेदार ठहराया।
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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने अयोध्या के रामजन्मूभि पर राम मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया था। राजीव गांधी को ....


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पुरातत्व बताता है कि अयोध्या सिर्फ हिंदुओं की मान्यता नहीं है। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात कोरी आस्था नहीं ह....

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इतिहासविद् और लेखिका मीनाक्षी जैन ने अयोध्या विवाद पर दो किताबें Rama and Ayodhya (2013) और The Battle for Rama: Case of the Temple at Ay...

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार अयोध्या मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 40 दिन तक चलने के बाद खत्म हो गई है। सुप्रीम क...

शर्मा ने ​अपनी किताब में जिन घटनाओं और चिट्ठियों का जिक्र किया है, उनसे जाहिर होता है कि नेहरू मूर्तियॉं हटाकर धर्मनिरपेक्ष दिखना चाहते थे। लेकिन, नायर के अड़ने और पंत तथा पटेल के नरम रुख अपनाने के कारण वे अपने इस मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाए।
इलाहबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर जब रामजन्म स्थान की 

आखिर क्या है राहुल गाँधी की नागरिकता?


ये तस्वीर यूपी चुनाव के वक्त की है, जब राहुल गांधी ने
लखनऊ के सेंट जोसेफ कैथड्रल में
प्रार्थना के बाद प्रचार की शुरुआत की थी।
आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
एक कहावत है :-
सच्चाई छुप नहीं सकती,
कभी बनावट के असूलों से,
खुशबू आ नहीं सकती 
कभी कागज के फूलों से।
राहुल गाँधी कभी कहते हैं कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है, तो कभी अपने आपको जनेऊ धारी हिन्दू बतातें हैं,लेकिन गुजरात से राजस्थान पहुँचते-पहुँचते जनेऊधारी हिन्दू से कौल ब्राह्मण बन गए और गोत्र दत्तात्रेय भी हो गया। बात यहीं नहीं रुकी, राहुल गांधी ने एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान कहा, 'हिंदुत्व का सार क्या है? गीता क्या कहती है? वह ज्ञान हर किसी के साथ है, ज्ञान आपके चारों ओर है। प्रत्येक जीवित चीज के पास ज्ञान है। हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि वह हिंदू हैं लेकिन हिंदुत्व की नींव के बारे में नहीं जानते। मोदी किस प्रकार के हिंदू हैं?'    
राहुल कितने हिन्दू है वह, नवम्बर 29, 2017  को राहुल गाँधी द्वारा सोमनाथ मन्दिर के दर्शन करने पर चरितार्थ हो गया है। मन्दिर में ऐसे बैठ रहे हैं जैसे किसी मस्जिद में नमाज पढ़ रहे हैं। 
जो पार्टी 10 वर्ष सत्ता में रहते, हिन्दू धर्म को कलंकित करती रही हो, इस्लामिक आतंकवाद को चार चाँद लगाने बेगुनाह हिन्दू साधु-संत और साध्वियों को जेलों में डाल, उन पर अत्याचार करने से नहीं चुकी, आज उसी पार्टी का अध्यक्ष मन्दिरों के चक्कर काट रहा हैं। अब इसको कांग्रेस की दोगली नीति न कहा जाए तो क्या कहा जाए? स्वामी असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित से आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने को कबूलवाने के लिए जो अमानवीय अत्याचार किए गए थे, यदि उसका एक प्रतिशत भी इस पार्टी के कार्यकाल में गिरफ्तार इस्लामिक आतंकवादी के साथ किया होता, देश में सारे छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता और पार्टियाँ आसमान को सिर पर उठा लेते, लेकिन इन बेगुनाहों के साथ किए जा रहे अमानवीय अत्याचारों पर समस्त पार्टियाँ गूंगी बहरी और सूरदास बनी रहीं, आज किस मुँह से अपने आप को हिन्दू कहते हैं? 
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राहुल गांधी, उनके परिवारजन, कांग्रेसी किसी भी धर्म को माने या ना माने यह उनका व्यक्तिगत विषय है, परंतु यह भी उतना ही अत्यंत दुखद है कि वह धर्म के नाम पर घृणित राजनीति कर रहा है। श्री भगवान सोमनाथ मंदिर में जो भी उसकी गैर हिंदू रजिस्टर में एंट्री हुई है यह उसका व्यक्तिगत विषय है, परंतु उसके बाद जिस तरह से कांग्रेसियों के बयान आये है वह निंदनीय व् दुखद है जिसमें राहुल गांधी को जनेऊ धारी हिन्दू बताया गया है। मेरा यह मानना है कि धर्म के नाम पर केवल राजनीति ना हो, राहुल गांधी यदि सनातनी हिंदू है तो केवल रविवार को सिर्फ तीन बार जनता के सामने गायत्री मंत्र का उच्चारण स्वयं करें, इन दिनों में वह गायत्री मन्त्र अच्छी तरह सीख सकता है, अगर यदि संभावना न हो तो अगले रविवार को कर दें मतलब गायत्री मन्त्र का उच्चारण सीख कर और उसके साथ किसी भी हिन्दू ग्रन्थ रामायण या महाभारत या कोई भी वेद पुराण की किसी छोटी सी घटना का जो की उसको याद हो सके स्वयं वर्णन करें, कंठस्थ बगैर किसी मोबाइल एप्प की सहायता के बिना।  इससे सिद्ध हो जायेगा की राहुल गाँधी इलेक्शन टाइम में ही सिर्फ मंदिरो में जा कर हिन्दू धर्म का मज़ाक उड़ा रहा है या उसकी हिन्दु धर्म में आस्था व् श्रद्धा है।    
गुजरात के सोमनाथ मंदिर में राहुल गांधी ने खुद को गैर-हिंदू के रूप में दर्ज करवाया। इसके साथ ही यह बहस चल पड़ी है कि आखिर राहुल गांधी का धर्म क्या है? अगर वो हिंदू नहीं तो किस धर्म को मानते हैं? ईसाई, इस्लाम या फिर कुछ और? कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गांधी नास्तिक हैं? अब राजस्थान चुनावों में अपना दत्तात्रेय गोत्र बताना कितना हास्यप्रद लगता है। दरअसल राहुल गांधी के धर्म का विवाद नया नहीं है। उनके राजनीति में आने से पहले से ही ये सवाल खड़े होते रहे हैं। 
Image result for सोनिया एंटोनिया माइनो (सोनिया गांधी) की प्रधानमंत्री पद के लिए पात्रता !
सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कई बार यह दावा किया है कि राहुल गांधी ईसाई हैं और वो दोहरी पहचान रखते हैं। स्वामी तो यहां तक दावा करते हैं कि 10 जनपथ में सोनिया गांधी ने एक चर्च बनवा रखा है और रविवार के दिन वहां पर बाइबिल के उपदेश पढ़े जाते हैं और पूरा गांधी परिवार इसमें शामिल होता है। इसके अलावा कुछ और घटनाएं भी हो चुकी हैं जिनसे यह पता चलता है कि संभवत: सोनिया गांधी के आने के बाद से गांधी परिवार कैथोलिक ईसाई धर्म से जुड़ चुका है। वो 5 बड़ी बातें जिनके आधार पर यह बात की जा  रही है।

1. राहुल गांधी की है दोहरी पहचान

2014 में यह खबर आई थी कि कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में राहुल गांधी की सारी पढ़ाई ‘राउल विंसी’ के तौर पर हुई है। वहां पर वो 1994 से 95 तक छात्र रहे थे। यूनिवर्सिटी की एलुमनी बुक में भी उनका यही नाम दर्ज है। कॉलेज की प्रिंसिपल ने डॉक्टर एलिसन रिचर्ड की तरफ से जारी एक चिट्ठी में भी राउल विंसी को कॉलेज में एमफिल का छात्र बताया गया है। हालांकि दलील दी जाती है कि ऐसा सुरक्षा कारणों से किया गया होगा। अवलोकन करिए:--
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार कई राज्यों के विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव प्रचार में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा जाति ...




सोमनाथ मन्दिर में राहुल गाँधी आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जो बात लंबे समय से अटकलबाजियों की शक्ल में रही उस पर मुह...
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लेकिन सुब्रह्मण्यम स्वामी इस दलील को सही नहीं मानते। उनके मुताबिक राहुल गांधी के सर्टिफिकेट पर भी राउल विंसी नाम ही दर्ज है। उनका कहना है कि सुरक्षा के लिए नाम बदलने की दलील सही नहीं है, क्योंकि राहुल जब ट्रिनिटी कॉलेज में पढ़ते थे तो यह बात पूरे देश को पता थी, वहां रहने वाले भारतीय मूल के लोग भी जानते थे।

2. अमेरिका में राजदूत ने बोला सच

राजीव गांधी से शादी के बाद सोनिया गांधी ने नया नाम जरूर ले लिया था, लेकिन उन्होंने औपचारिक तौर पर कभी धर्मांतरण नहीं किया। यहां तक कि उन्होंने भारत की नागरिकता लेने में भी कई साल की देरी लगाई थी। 2011 में अमेरिका में भारतीय उच्चायुक्त मीरा शंकर ने वहां पर एक प्रोग्राम में दावा किया था कि सोनिया गांधी ईसाई हैं। उनका ये भाषण वहां के भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर अपलोड भी किया गया था, लेकिन कुछ दिनों के अंदर ही भाषण के उस हिस्से को गायब करवा दिया गया। सवाल यह है कि अगर राजदूत ने कुछ गलत भी कहा था तो उस पर औपचारिक स्पष्टीकरण देने के बजाय लीपापोती क्यों की गई?

3. न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी सच्चाई

अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने 27 फरवरी 1988 में एक रिपोर्ट छापी थी, जिसमें उन्होंने सोनिया गांधी को रोमन कैथोलिक बताया था। इस रिपोर्ट में अखबार ने चर्च के हवाले से इस बात की पुष्टि की थी कि सोनिया गांधी ने खुद और अपने बेटे-बेटी को हिंदू या मुसलमान होने से बचाकर रखा है। सोनिया गांधी की तारीफ में छपे इस लेख में उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत का गुणगान किया गया था। यह लेख जब छपा था तो भारत में काफी हंगामा हुआ था। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इसका कभी खंडन नहीं किया। यह लेख आज भी अखबार की वेबसाइट पर पढ़ा जा सकता है।

4. ईसाई मिशनरी से खुला समर्थन

उत्तर प्रदेश चुनाव के वक्त यह बात सामने आई थी कि जहां कहीं भी राहुल गांधी की रैलियां होती थीं, वहां के लिए बसें भरकर भेजने में ईसाई मिशनरी भी जुटी हुई थीं। उत्तर प्रदेश में कई मिशनरी स्कूल और अस्पताल चलते हैं। राहुल गांधी की रैलियों में इन मिशनरीज पूरा हाथ बंटाया था। यह माना जाता है कि 10 साल के यूपीए शासन में देश में ईसाई मिशनरियों को खुलेआम धर्मांतरण की छूट दे दी गई थी।

5. शुरू से ही हिंदू विरोधी मानसिकता

विकीलीक्स के खुलासे में यह बात पता चली थी कि अमेरिकी डिप्लोमेट से बातचीत में राहुल गांधी ने कहा था कि भारत में इस्लामी आतंकवाद से बड़ा खतरा हिंदू आतंकवाद है। यह आरोप लगता रहा है कि राहुल गांधी ने ऐसे ही तमाम दूसरे विदेशी राजदूतों और पत्रकारों के जरिए हिंदू धर्म को लेकर दुष्प्रचार किया। उन्होंने एक बार कहा था कि जो लोग मंदिर जाते हैं वो लड़कियां छेड़ते हैं। इस बयान पर उनका काफी विरोध भी हुआ था।

स्वामी का दावा- ‘राहुल गांधी ब्रिटिश नागरिक हैं’

जबकि दूसरी ओर  बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने यह बड़ा दावा किया है। ‘राहुल गांधी ब्रिटिश नागरिक हैं’। उन्होंने इस बारे में गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक चिट्ठी लिखकर जांच का अनुरोध किया है। साथ ही वो दस्तावेज भी भेजे हैं जिनके आधार पर स्वामी ने ये दावा किया है। इससे पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी ने नवंबर 2016 में भी इस बारे में बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उनका दावा है कि खुद राहुल ने 2003 में खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। राहुल ने तब लंदन में एक प्राइवेट कंपनी रजिस्टर कराई थी और उसमें उन्होंने अपना लंदन का स्थानीय पता लिखा था और नागरिकता के कॉलम में खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। स्वामी इस मुद्दे को समय-समय पर उठाते रहे, लेकिन राजनीतिक कारणों से मामला अब तक दबा रहा है। इस मामले में शिकायत लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन तक पहुंच चुकी है।

भारतीय नागरिकता दिखावे के लिए!

Subramanian-Swamys-letter-to-PM-on-Nov-12-2015-on-Rahul-Gandhi s-British-citizenship-and-British-company-page-001ब्रिटेन के कंपनी कानून विभाग से हासिल किए गए दस्तावेजों के मुताबिक 21 अगस्त 2003 में बैकॉप्स लिमिटेड नाम की कंपनी ब्रिटेन में रजिस्टर कराई गई थी। इस कंपनी के डायरेक्टर और कंपनी सेक्रेटरी का नाम राहुल गांधी बताया गया। इसमें राहुल गांधी का जन्मदिन सही बताया गया है। लेकिन पते में लंदन का एक पता लिखा गया और नागरिकता ब्रिटिश बताई गई। यह कंपनी 2009 में लोकसभा चुनाव से पहले बंद कर दी गई। लेकिन इस दौरान राहुल ने ब्रिटिश कानून के मुताबिक इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किया। स्वामी ने अपनी बात साबित करने के लिए 2006 का रिटर्न भी पेश किया है। रिटर्न और 2009 में कंपनी को बंद करने के अपने आवेदन में भी राहुल ने खुद को ब्रिटिश नागरिक ही बताया था। जबकि 2004 से ही भारतीय संसद के सदस्य बन चुके थे।
Subramanian-Swamys-letter-to-PM-on-Nov-12-2015-on-Rahul-Gandhi s-British-citizenship-and-British-company-page-002

राहुल गांधी ब्रिटेन में वोटर भी रहे

CT76OuwU8AAVXxWइतना ही नहीं राहुल गांधी का ब्रिटेन के नागरिक के तौर पर वहां की वोटर लिस्ट में था। इस बारे में भी दस्तावेज पेश किए गए है। वहां के चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अलग-अलग सालों में राहुल गांधी का नाम देखा जा सकता है। स्वामी के इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर सांसद महेश गिरी ने पिछले साल मार्च में स्पीकर सुमित्रा महाजन को औपचारिक शिकायत भेजी थी, जिसे स्पीकर ने संसद की आचार समिति के पास विचार के लिए भेज दिया। आचार समिति इस सिलसिले में राहुल गांधी को कारण बताओ नोटिस भी जारी कर चुकी है।

कैसे सामने आए ये सारे दस्तावेज?

Subramanian-Swamys-letter-to-PM-on-Nov-12-2015-on-Rahul-Gandhi s-British-citizenship-and-British-company-page-008सुब्रह्मण्यम स्वामी ने बताया है कि उन्होंने ये सारे कागजात लंदन में रहकर खुद जुटाए हैं। उन्हें इनकी सच्चाई पर कोई शक नहीं है। क्योंकि सारे दस्तावेज आधिकारिक स्रोतों से मिले हैं।

अब क्या चाहते हैं सुब्रह्मण्यम स्वामी?

स्वामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि राहुल गांधी की भारतीय नागरिकता रद्द की जाए और उनकी लोकसभा की सदस्यता भी खत्म कर दी जाए। क्योंकि कोई भारतीय कानून के मुताबिक कोई भारत के साथ दूसरे देश की नागरिकता एक ही समय पर नहीं रख सकता है। स्वामी इस बारे में लोकसभा स्पीकर को भी पत्र लिखने वाले हैं।

स्वामी के दावे पर क्या कह रही है कांग्रेस?

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कांग्रेस सुब्रह्मण्यम स्वामी के दावों को अब तक खारिज करती रही है। दो साल पहले जब उन्होंने इस बारे में प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी तब राहुल के घर पर अहमद पटेल, रणदीप सिंह सुरजेवाला, सीपी जोशी और शकील अहमद की बैठक हुई थी। उसके बाद एक बयान जारी करके कहा गया कि पैदा होने के दिन से ही राहुल भारत के नागरिक हैं और उन्होंने कभी किसी दूसरे देश का पासपोर्ट नहीं लिया। कांग्रेस ने स्वामी के आरोपों को राजनीतिक करार दिया, लेकिन उन्होंने दस्तावेजों और आरोपों पर कोई साफ जवाब नहीं दिया। यह भी नहीं बताया कि 2003 और 2009 के बीच राहुल क्यों खुद को ब्रिटिश नागरिक बताते रहे, जबकि वो भारतीय संसद के सदस्य भी थे। इसी दिन शाम को सोनिया और प्रियंका गांधी ने लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन के घर पर जाकर उनसे मुलाकात की थी। इस बातचीत का ब्यौरा तो सामने नहीं आया है, लेकिन अटकलें हैं कि यह मुलाकात भी स्वामी के खुलासे के सिलसिले में हो सकती है।