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‘हिंदुत्व=बोको हराम=ISIS’: संयोग नहीं सलमान खुर्शीद का प्रयोग, घूम-फिर कर मुस्लिम तुष्टिकरण की मूल कक्षा में लौटी कॉन्ग्रेस

भागवत गीता में लिखा है "विनाश काले विपरीत बुद्धि", भगवान श्रीकृष्ण की बात कांग्रेस और समस्त भाजपा विरोधियों पर चरितार्थ हो रही है। तुष्टिकरण नीति से केवल मुसलमानों को ही नहीं, समस्त देशवासियों को कितना नुकसान हुआ है, छद्दम धर्म-निरपेक्ष यानि सेक्युलरिस्ट नहीं जानते। दूसरे, 60 के दशक की एक फिल्म का गीत "रात भर का मेहमाँ अंधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा..."जो आज भी चर्चित है। कांग्रेस और उसकी विचारधारा वाली अन्य पार्टियों ने हिन्दुत्व को जितना नुकसान पहुंचा सकते थे, पहुंचा दिया। लेकिन समय बड़ी तेजी से बदल रहा है, जिसे ये हिन्दू विरोधी या समझ नहीं पा रहे या फिर देख नहीं पा रहे। यह उनके दृष्टिकोण की गलती है, किसी हिन्दू की नहीं। 

सोशल मीडिया पर वायरल चित्र हिन्दुइस्म और हिन्दुत्व 
दर्शा रहा है 
इन हिन्दू विरोधियों ने अपनी कुर्सी की खातिर हिन्दुओं को जाति में बांट दिया, लेकिन मुसलमानों को नहीं, क्यों? जबकि इन में ही इतने अधिक वर्ग हैं, उन्हें आज तक उजागर करने का साहस नहीं। इन वर्गों में इतनी कटुता है कि एक-दूसरे की मस्जिदों में नमाज नहीं पढ़ सकते, किसी दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न नहीं कर सकते। 
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं रहे। जाहिर है विवाद भी अब नजदीक ही रहेंगे। आने वाले चुनाव कैसे लड़े जाएँगे, उसकी झलक लगभग चार महीनों से मिल रही थी पर अब सरगर्मियों ने गियर बदल लिया है। सरगर्मियों को दूसरे गियर में ले जाते हुए अखिलेश यादव ने देश की आज़ादी के लिए महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ जिन्ना को क्रेडिट दिया। बाद में उनके सहयोगी ओम प्रकाश राजभर ने उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए देश के विभाजन के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को जिम्मेदार बताते हुए जिन्ना की क्लीन चिट दे दी।

यह सब करने के बाद अखिलेश यादव ने अपने 400 सीटों वाली जीत पर सौवीं बार ठप्पा लगाया ही था कि कांग्रेस पार्टी की ओर से सलमान खुर्शीद ने माहौल पर कब्जा करने के चक्कर में हिंदुत्व, बोको हराम और ISIS को एक जैसा बता डाला। 

सलमान खुर्शीद ने जो कहा उस पर आश्चर्य व्यक्त करने का अभिनय तो किया जा सकता है पर आश्चर्य व्यक्त नहीं किया जा सकता। कम से कम वे, जिन्होंने खुर्शीद के राजनीतिक व्यक्तित्व और धार्मिक सोच को लंबे अरसे तक देखा है, उन्हें किसी तरह का आश्चर्य नहीं होना चाहिए। खुर्शीद के पिछले लगभग दस वर्षों के भी सार्वजनिक आचरण को याद किया जाए तो ऐसे कई मौके आए हैं जब उन्होंने अपने ज्ञान, शिक्षा वगैरह का लबादा उतार फेंका और कई बार इस धारणा को पुख्ता किया कि मॉडर्न, मॉडरेट और इंटेलेक्चुअल मुस्लिम नहीं होते। कोई आश्चर्य नहीं कि पिछले लगभग तीन दशकों में वैश्विक स्तर बनी इस धारणा का जो भारतीय स्वरूप है उसे पुख्ता करने में तमाम लोगों के साथ-साथ सलमान खुर्शीद का बड़ा योगदान रहा है।

पहले लिखी गई अपनी किताब में उन्होंने 1984 के सिख नरसंहार के बारे में क्या लिखा है, यह अधिकतर लोग पहले से जानते हैं। सरकार द्वारा प्रतिबंधित सिमी का मुक़दमा लड़ना हो, बाटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए अपनी नेता सोनिया गाँधी के रोने की बात हो या कश्मीर से निकाले गए हिंदुओं की, खुर्शीद को कभी अपनी धार्मिक और राजनीतिक सोच के सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर किसी तरह का असमंजस नहीं रहा। ऐसे में उनका हिंदुत्व को बोको हराम या ISIS जैसा न केवल मानना बल्कि उसे सार्वजनिक तौर पर कहना उन्हें और उनकी सोच को पूरी तरह से प्रस्तुत करते हैं। साथ ही अन्य कांग्रेसी नेताओं द्वारा उनका समर्थन या विरोध न किया जाना भी यह बताता है कि इस तरह की सोच के सार्वजनिक प्रदर्शन का उद्देश्य क्या है।

वैसे देखा जाए तो हाल के वर्षों में नेताओं की स्थाई सोच और उस सोच के सार्वजनिक प्रदर्शन में पहले से दिखने वाला अंतर लगातार घटता जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि पिछले लगभग डेढ़ दशक में इसके कारण आई पारदर्शिता ने भारतीय राजनीति को नए तरह से देखने की सहूलियत दे दी है। लोग सीधे तौर पर देखने और दिखने लगे हैं। अखिलेश यादव या राजभर जिन्ना के बारे में क्या कहते हैं या खुर्शीद हिंदुत्व के बारे में क्या सोचते हैं, वह भारत भर के सामने है। ऐसे में इन नेताओं को इस बात का क्रेडिट मिलना चाहिए। जिस उद्देश्य के लिए वे ऐसा कह रहे हैं या कह रहे हैं, वह पूरा हो या न हो, पर इस प्रयास में ये लोग उस राजनीतिक ध्रुवीकरण को पुख्ता कर रहे हैं जिसका विरोध करने का अभिनय करते रहते हैं। 

भारतीय राजनीति का चरित्र ऐसा रहा है कि नेताओं की बातों और उनके कार्य को अधिकतर चुनावी राजनीति से जोड़ कर देखा जाता रहा है। चूँकि नेताओं द्वारा ये बातें चुनाव के आस-पास कही जा रही हैं इसलिए इन्हें चुनाव के परिप्रेक्ष्य में देखा और समझा जाएगा पर जहाँ तक स्थाई सोच के परिप्रेक्ष्य में देखने की बात है, इसके दीर्घकालिक परिणाम का अनुमान लगाना या समझना आम हिंदू के लिए असंभव नहीं है। पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव के समय बनी राहुल गाँधी की नव हिंदू की छवि अब लगभग ख़त्म हो चुकी है। ऐसे में कांग्रेस घूम-फिर कर अपनी मूल कक्षा में जा पहुँची है। उसे पता चल चुका है कि आम हिंदू के मन में कांग्रेस की अच्छी छवि स्थापित करना मेहनत का काम है। हाँ, मुस्लिम तुष्टिकरण के अपने पुराने राजनीतिक दर्शन पर वापस जाकर वो जो कुछ करेगी उस पर हिंदू और हिंदू मतदाता की क्या राय है, यह आने वाले समय में पता चल जाएगा। 

वैदिक व्यवस्था और भारतीय राजनीति

 

डॉ राकेश कुमार आर्य,

सम्पादक, उगता भारत 
माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: और भारत की राजनीति

भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति ने वेद और वैदिक संस्कृति को अछूत बनाकर रख दिया है । संविधान भी वेद की छाया से दूर रखने का हरसंभव प्रयास किया गया है। जिससे पता चलता है कि भारत की संविधान सभा में भी ऐसे लोग नहीं थे जो वेद को सृष्टि का आदी संविधान मानते थे , उन लोगों का चिंतन वैदिक नहीं था । राष्ट्र और राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्यों की हमारे संविधान में ऐसी विशद और सुन्दर विवेचना या व्यवस्था नहीं की गई जिससे लोग मुमूर्षु के स्थान पर मुमुक्षु बनने का प्रयास करते और सृष्टि के संचालन में अपने स्थान पर खड़े होकर महत्वपूर्ण और सकारात्मक सहयोग प्रदान करते।

देश के शासन की उल्टी चाल और उल्टी दिशा पकड़ लेने से धर्मनिरपेक्षता नाम का एक ऐसा महारोग देश में पैदा किया गया, जिसने देश की सामाजिक ,राजनीतिक और आर्थिक अवस्था का सत्यानाश कर दिया । अथर्ववेद के मन्त्र 12 /1 / 12 “ माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: ” के अर्थ को हमने न तो समझा और न उसके अनुसार अपने राष्ट्रीय जीवन स्वरूप को कोई दिशा प्रदान की। जिससे हम सभी देशवासियों का अपने राष्ट्र, भारत माता, राष्ट्रवाद, पृथ्वी और पृथ्वी पर रहने वाले जीवधारियों के प्रति वह समरस संबंध स्थापित नहीं हो पाया जिसकी सृष्टि के आदि संविधान वेद ने हमसे अपेक्षा की थी। यही कारण है कि आज सारे भूमंडल की व्यवस्था गड़बड़ा चुकी है । हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि भारत के सुधरने से विश्व सुधरेगा और भारत के बिगड़ने से विश्व बिगड़ेगा ।

वेद का सन्देश है- “यत् ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं, यास्ते ऊर्जस्तन्व: संबभूवु:, तासु नो धे”

यभि न: पवस्व, माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:, पर्जन्य: पिता स उ न: पिपर्तु”, अर्थात “हे पृथ्वी, यह जो तुम्हारा मध्यभाग है और जो उभरा हुआ ऊधर्वभाग है, ये जो तुम्हारे शरीर के विभिन्न अंग ऊर्जा से भरे हैं, हे पृथ्वी मां, तुम मुझे अपने उसी शरीर में संजो लो और दुलारो कि मैं तो तुम्हारे पुत्र के जैसा हूं, तुम मेरी मां हो और पर्जन्य का हम पर पिता के जैसा साया बना रहे।”
अपनी धरती माता को हमने राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया ।इसका अभिप्राय है कि संपूर्ण वसुधा ही हमारे लिए राष्ट्र है। राष्ट्र की इतनी उत्कृष्ट और उत्तम परिभाषा संसार के किसी भी संविधान या वेद से इतर किसी ग्रंथ में उपलब्ध नहीं होगी। जिसमें संपूर्ण वसुधा को मातृवत सम्मान दिया जाए और अपने आपको प्रत्येक व्यक्ति उसका पुत्र समझकर प्रस्तुत कर दे। स्वतंत्रता के पश्चात सत्ता जिन लोगों के हाथों में गई उन्होंने वेद की इतनी सहज ,सरल और निर्मल विचारधारा को भी सांप्रदायिक करार दे दिया और वेद की तथाकथित सांप्रदायिक शिक्षाओं से दूरी बनाने में ही देश ,समाज और संसार का भला समझा । अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का इससे अधिक निकृष्ट उदाहरण भारत से अलग संसार के किसी अन्य देश में मिलना असंभव है।
स्वतंत्रता के पश्चात सत्ता संभालने वाले हमारे तथाकथित राजनेता यह भूल गए कि भारत माता या धरती माता के प्रति ऐसा पवित्र संबंध रखने के कारण ही भारतवासियों ने दीर्घकाल तक विदेशी शत्रुओं के आक्रमणों का सामना किया था। उन्होंने यह कदापि उचित नहीं समझा था कि संसार के राक्षस लोग धरती माता और उसकी संतानों को परेशान करने का अधिकार पत्र प्राप्त करें और लोगों पर अत्याचार करें।

हमारे पूर्वजों ने हमेशा इस बात को ध्यान में रखा कि ईश्वर ने यह भूमि आर्यों को प्रदान की है और आर्यों का यह पवित्र जीवनव्रत है कि वे राक्षसों का संहार और सज्जनों का परिरक्षण करने के लिए संकल्पित हैं।
जो लोग सांप्रदायिक थे उन लोगों ने देश का सांप्रदायिकता के आधार पर विभाजन कराकर अपना मनचाहा देश ले लिया। उसके पश्चात भी उनकी सांप्रदायिक राजनीति को सांप्रदायिक कहने का साहस कांग्रेस ,कम्युनिस्ट और सभी धर्मनिरपेक्ष दलों ने कभी नहीं किया । यही कारण है कि देश को तोड़ने वाली राजनीतिक शक्तियां आज भी सक्रियता के साथ काम कर रही हैं।

बात पश्चिमी बंगाल के चुनावों की करें तो वहां पर अब्बास सिद्दीकी और असदुद्दीन ओवैसी दोनों खुल्लम-खुल्ला मुस्लिमपरस्त राजनीति कर रहे हैं। इन दोनों मुस्लिमपरस्त राजनीतिज्ञों को जिस प्रकार तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल अपने -अपने पाले में लाने का प्रयास करते रहे हैं या कर रहे हैं उन सारी गतिविधियों और कार्यशैली की यदि छानबीन व पड़ताल करने पर पता चलता है कि ये सारे लोग देश विरोधी सोच को और भी अधिक हवा देने का कार्य कर रहे हैं।

हम सब यह जानते हैं कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का नाम ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन है। जिससे किसी भी प्रकार से ऐसी राजनीति की अपेक्षा नहीं की जा सकती जो पंथनिरपेक्ष हो और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती हो। असदुद्दीन ओवैसी के भड़काऊ बयान देश के समाचार पत्रों में अक्सर स्थान पाते रहते हैं । इसके अतिरिक्त वह अपने प्रत्याशी उन्हीं स्थानों पर उतारते हैं जहां पर मुस्लिम अधिक होते हैं, इससे भी स्पष्ट पता चलता है कि उनकी सोच पूर्णतया सांप्रदायिक है। अब्बास सिद्दीकी और असदुद्दीन ओवैसी जैसे लोग कभी भी वेद की उपरोक्त व्यवस्था के अंतर्गत भारत माता को माता मानने या इस देश की भूमि के साथ माता और पुत्र का संबंध स्थापित करने के समर्थक ना तो हैं और ना हो सकते हैं। क्योंकि राष्ट्रमाता के प्रति ऐसी सहज, सरल और निर्मल विचारधारा रखने में भी उनकी सांप्रदायिक मान्यताएं आड़े आ जाती हैं। ये लोग जिन्ना के वंशज हैं या कहिए कि उसके मानस पुत्र हैं । जिस कारण वह मां भारती के टुकड़े तो कर सकते हैं पर इसकी संतानों के साथ समन्वय बनाकर चलने की कभी पहल नहीं कर सकते। ये लोग ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ के समर्थक हो सकते हैं परंतु देश को जोड़ने वाले लोगों का साथ कभी नहीं दे सकते।
सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि देश को तोड़ने वाली शक्तियों के साथ कांग्रेस आज भी बड़ी निर्लज्जता के साथ खड़ी है और उसने इतिहास से कोई शिक्षा न लेकर पश्चिम बंगाल में पीरजादा सिद्दीकी के साथ समन्वय या गठबंधन करने को प्राथमिकता दी है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी अब देश में उन स्थानों को ढूंढने और चुनने लगे हैं जहां मुस्लिम अधिक हैं। राहुल गांधी यह जानते हैं कि देश की वर्तमान परिस्थितियों में देश का जनमानस उन्हें नकार चुका है। अभी हाल ही में गुजरात में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों में कांग्रेस का लोगों ने जिस प्रकार सूपड़ा साफ किया है उससे इस बात में अब कोई संदेह नहीं रह गया है कि लोग स्थानीय स्तर पर भी कांग्रेस को नकार रहे हैं। ऐसे में अपनी राजनीति को बचाने के लिए कांग्रेस के नेता अपनी परंपरागत देश विरोधी सोच को स्पष्टता के साथ प्रकट करने लगे हैं।
याद रहे कि कांग्रेस भी देश के भूभाग को राष्ट्रमाता या भारत माता कहने में सदा संकोच करती रही है। इसका कारण केवल एक ही है कि कांग्रेस के नेता प्रारंभ से ही भारतीय और भारतीयता से असहमति और विरोध रखने वाले रहे हैं। उनसे वेद, वैदिक संस्कृति और वैदिक देश के बारे में सोचने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कांग्रेस के बारे में हमें यह भी याद रखना चाहिए कि वह कभी आंध्र प्रदेश में मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के साथ भी काम कर चुकी है। मजलिस ने 2012 में हैदराबाद में चारमीनार के निकट एक मंदिर के जीर्णोद्धार से असंतुष्ट होकर कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था। केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ भी कांग्रेस का गठबंधन है। जी हां, यह वही मुस्लिम लीग है जिसने कभी देश का विभाजन कराया था । कांग्रेस को इस मुस्लिम लीग के साथ भी गठबंधन करने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है, क्योंकि वह उसे आज भी धर्मनिरपेक्ष मानती है। राहुल गांधी पिछले लोकसभा चुनाव में जिस वायनाड सीट से लोकसभा चुनाव जीत कर आए हैं, वहां पर वह मुस्लिम लीग के समर्थन से ही अपनी जीत को साकार कर सके थे । ऐसे में राहुल गांधी के ऊपर मुस्लिम लीग का आशीर्वाद है – इससे इनकार नहीं किया जा सकता। जैसा काम मुस्लिम लीग के साथ मिलकर कांग्रेस कर रही है वैसा ही देश के कम्युनिस्ट भी करते रहे हैं और कर रहे हैं। वह भी तमिलनाडु में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ रहे हैं।

हमारे वेदों ने जिस प्रकार पृथ्वी से हम सभी पृथ्वी वासियों का रक्त संबंध स्थापित किया है, वह अपने आप में अनुपम और बहुत ही विलक्षण है। यह उतना ही पवित्र है जितना हमारे माता-पिता से हमारा संबंध पवित्र होता है । जैसे हम उनके प्रति अपने कर्तव्य धर्म से बंधे हुए हैं, वैसा ही कर्तव्य धर्म हमारे ऋषियों ने हमें अपनी पृथ्वी माता के प्रति सिखाया और बताया है। पृथ्वी माता के प्रति इसी अगाध श्रद्धा और रक्त संबंध से प्रेरित होकर हम कभी भी अपनी भारत माता का अपमान सहन नहीं करते। उसके प्रति हमारा आदर और सत्कार का यह भाव हमें सृष्टि के पहले दिन से प्राप्त हुआ है । जिसे अपने देश का मौलिक संस्कार स्वीकार कर हम आज तक भी अपने साथ बनाए हुए हैं। यद्यपि पिछले 70 -75 वर्ष में हमें इस अनुपम और विलक्षण सत्कार भाव से दूर रखने का हरसंभव प्रयास देश के धर्मनिरपेक्ष दलों के द्वारा शासकीय स्तर पर भी किया गया है।
12/01/09 “यस्यामाप: परिचरा समानी: अहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति, सा नो भूमिर्भूरिधारा पयोदुहा अथो उक्षतु वर्चसा” विद्वानों ने इस मंत्र का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा है कि ऋषि इस विचार से अभिभूत है कि कैसे इस भूमि पर दिन-रात जल की प्रभूत धाराएं बिना किसी प्रमाद के लगातार बहती रहकर उसे वर्चस्व से सम्पन्न कर रही हैं। सूक्त में ऋषि ने सचमुच भूमि के साथ मां का नाता जोड़ लिया है और उससे वैसे ही दूध की कामना कर रहा है जैसे कोई शिशु अपनी मां से दूध की कामना करता है-
“सा नो भूमिर्विसृजतां माता पुत्रय मे पय:” (१२.१.१०), अर्थात यह भूमि मेरे लिए वैसे ही दूध (पय:) की धारा प्रवाहित करे, जैसे मां अपने पुत्र के लिए करती है !
अब समय आ गया है जब राजनीति से उन लोगों को दूर किया जाए जो तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इस देश के टुकड़े करने की किसी भी प्रकार की सोच को या तो समर्थन देते हैं या समर्थन देने का अप्रत्यक्ष प्रयास करते हैं। केन्द्र सरकार को अब वेदों की शिक्षाओं को उनके सहज, सरल और निर्मल स्वरूप में विद्यालयों के माध्यम से भी बच्चों में राष्ट्रीय संस्कार स्थापित करने हेतु पढ़ाये जाने की व्यवस्था करनी चाहिए । जिससे राष्ट्र और भारत माता के प्रति बच्चों में संस्कार बचपन से ही स्थापित किये जा सकें और सिद्दीकी और ओवैसी जैसे लोग राजनीति में आकर अपनी राजनीतिक भाषा को शुद्ध कर सकें।
कांग्रेस, कम्युनिस्ट और सभी धर्मनिरपेक्ष दलों की कार्यशैली को सुधारकर सुव्यवस्थित करने के लिए भी यह आवश्यक है कि अब देश के नागरिक ही अपनी भारत माता के प्रति अपने कर्तव्य धर्म को समझते हुए उनका राजनीतिक बहिष्कार करें। यह कार्य तभी संभव होगा जब वेद की शिक्षाएं हमारे पाठ्यक्रमों में शामिल की जाएंगी।

आखिर क्या है राहुल गाँधी की नागरिकता?


ये तस्वीर यूपी चुनाव के वक्त की है, जब राहुल गांधी ने
लखनऊ के सेंट जोसेफ कैथड्रल में
प्रार्थना के बाद प्रचार की शुरुआत की थी।
आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
एक कहावत है :-
सच्चाई छुप नहीं सकती,
कभी बनावट के असूलों से,
खुशबू आ नहीं सकती 
कभी कागज के फूलों से।
राहुल गाँधी कभी कहते हैं कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है, तो कभी अपने आपको जनेऊ धारी हिन्दू बतातें हैं,लेकिन गुजरात से राजस्थान पहुँचते-पहुँचते जनेऊधारी हिन्दू से कौल ब्राह्मण बन गए और गोत्र दत्तात्रेय भी हो गया। बात यहीं नहीं रुकी, राहुल गांधी ने एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान कहा, 'हिंदुत्व का सार क्या है? गीता क्या कहती है? वह ज्ञान हर किसी के साथ है, ज्ञान आपके चारों ओर है। प्रत्येक जीवित चीज के पास ज्ञान है। हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि वह हिंदू हैं लेकिन हिंदुत्व की नींव के बारे में नहीं जानते। मोदी किस प्रकार के हिंदू हैं?'    
राहुल कितने हिन्दू है वह, नवम्बर 29, 2017  को राहुल गाँधी द्वारा सोमनाथ मन्दिर के दर्शन करने पर चरितार्थ हो गया है। मन्दिर में ऐसे बैठ रहे हैं जैसे किसी मस्जिद में नमाज पढ़ रहे हैं। 
जो पार्टी 10 वर्ष सत्ता में रहते, हिन्दू धर्म को कलंकित करती रही हो, इस्लामिक आतंकवाद को चार चाँद लगाने बेगुनाह हिन्दू साधु-संत और साध्वियों को जेलों में डाल, उन पर अत्याचार करने से नहीं चुकी, आज उसी पार्टी का अध्यक्ष मन्दिरों के चक्कर काट रहा हैं। अब इसको कांग्रेस की दोगली नीति न कहा जाए तो क्या कहा जाए? स्वामी असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित से आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने को कबूलवाने के लिए जो अमानवीय अत्याचार किए गए थे, यदि उसका एक प्रतिशत भी इस पार्टी के कार्यकाल में गिरफ्तार इस्लामिक आतंकवादी के साथ किया होता, देश में सारे छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता और पार्टियाँ आसमान को सिर पर उठा लेते, लेकिन इन बेगुनाहों के साथ किए जा रहे अमानवीय अत्याचारों पर समस्त पार्टियाँ गूंगी बहरी और सूरदास बनी रहीं, आज किस मुँह से अपने आप को हिन्दू कहते हैं? 
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राहुल गांधी, उनके परिवारजन, कांग्रेसी किसी भी धर्म को माने या ना माने यह उनका व्यक्तिगत विषय है, परंतु यह भी उतना ही अत्यंत दुखद है कि वह धर्म के नाम पर घृणित राजनीति कर रहा है। श्री भगवान सोमनाथ मंदिर में जो भी उसकी गैर हिंदू रजिस्टर में एंट्री हुई है यह उसका व्यक्तिगत विषय है, परंतु उसके बाद जिस तरह से कांग्रेसियों के बयान आये है वह निंदनीय व् दुखद है जिसमें राहुल गांधी को जनेऊ धारी हिन्दू बताया गया है। मेरा यह मानना है कि धर्म के नाम पर केवल राजनीति ना हो, राहुल गांधी यदि सनातनी हिंदू है तो केवल रविवार को सिर्फ तीन बार जनता के सामने गायत्री मंत्र का उच्चारण स्वयं करें, इन दिनों में वह गायत्री मन्त्र अच्छी तरह सीख सकता है, अगर यदि संभावना न हो तो अगले रविवार को कर दें मतलब गायत्री मन्त्र का उच्चारण सीख कर और उसके साथ किसी भी हिन्दू ग्रन्थ रामायण या महाभारत या कोई भी वेद पुराण की किसी छोटी सी घटना का जो की उसको याद हो सके स्वयं वर्णन करें, कंठस्थ बगैर किसी मोबाइल एप्प की सहायता के बिना।  इससे सिद्ध हो जायेगा की राहुल गाँधी इलेक्शन टाइम में ही सिर्फ मंदिरो में जा कर हिन्दू धर्म का मज़ाक उड़ा रहा है या उसकी हिन्दु धर्म में आस्था व् श्रद्धा है।    
गुजरात के सोमनाथ मंदिर में राहुल गांधी ने खुद को गैर-हिंदू के रूप में दर्ज करवाया। इसके साथ ही यह बहस चल पड़ी है कि आखिर राहुल गांधी का धर्म क्या है? अगर वो हिंदू नहीं तो किस धर्म को मानते हैं? ईसाई, इस्लाम या फिर कुछ और? कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गांधी नास्तिक हैं? अब राजस्थान चुनावों में अपना दत्तात्रेय गोत्र बताना कितना हास्यप्रद लगता है। दरअसल राहुल गांधी के धर्म का विवाद नया नहीं है। उनके राजनीति में आने से पहले से ही ये सवाल खड़े होते रहे हैं। 
Image result for सोनिया एंटोनिया माइनो (सोनिया गांधी) की प्रधानमंत्री पद के लिए पात्रता !
सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कई बार यह दावा किया है कि राहुल गांधी ईसाई हैं और वो दोहरी पहचान रखते हैं। स्वामी तो यहां तक दावा करते हैं कि 10 जनपथ में सोनिया गांधी ने एक चर्च बनवा रखा है और रविवार के दिन वहां पर बाइबिल के उपदेश पढ़े जाते हैं और पूरा गांधी परिवार इसमें शामिल होता है। इसके अलावा कुछ और घटनाएं भी हो चुकी हैं जिनसे यह पता चलता है कि संभवत: सोनिया गांधी के आने के बाद से गांधी परिवार कैथोलिक ईसाई धर्म से जुड़ चुका है। वो 5 बड़ी बातें जिनके आधार पर यह बात की जा  रही है।

1. राहुल गांधी की है दोहरी पहचान

2014 में यह खबर आई थी कि कैंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में राहुल गांधी की सारी पढ़ाई ‘राउल विंसी’ के तौर पर हुई है। वहां पर वो 1994 से 95 तक छात्र रहे थे। यूनिवर्सिटी की एलुमनी बुक में भी उनका यही नाम दर्ज है। कॉलेज की प्रिंसिपल ने डॉक्टर एलिसन रिचर्ड की तरफ से जारी एक चिट्ठी में भी राउल विंसी को कॉलेज में एमफिल का छात्र बताया गया है। हालांकि दलील दी जाती है कि ऐसा सुरक्षा कारणों से किया गया होगा। अवलोकन करिए:--
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार कई राज्यों के विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव प्रचार में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा जाति ...




सोमनाथ मन्दिर में राहुल गाँधी आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जो बात लंबे समय से अटकलबाजियों की शक्ल में रही उस पर मुह...
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लेकिन सुब्रह्मण्यम स्वामी इस दलील को सही नहीं मानते। उनके मुताबिक राहुल गांधी के सर्टिफिकेट पर भी राउल विंसी नाम ही दर्ज है। उनका कहना है कि सुरक्षा के लिए नाम बदलने की दलील सही नहीं है, क्योंकि राहुल जब ट्रिनिटी कॉलेज में पढ़ते थे तो यह बात पूरे देश को पता थी, वहां रहने वाले भारतीय मूल के लोग भी जानते थे।

2. अमेरिका में राजदूत ने बोला सच

राजीव गांधी से शादी के बाद सोनिया गांधी ने नया नाम जरूर ले लिया था, लेकिन उन्होंने औपचारिक तौर पर कभी धर्मांतरण नहीं किया। यहां तक कि उन्होंने भारत की नागरिकता लेने में भी कई साल की देरी लगाई थी। 2011 में अमेरिका में भारतीय उच्चायुक्त मीरा शंकर ने वहां पर एक प्रोग्राम में दावा किया था कि सोनिया गांधी ईसाई हैं। उनका ये भाषण वहां के भारतीय दूतावास की वेबसाइट पर अपलोड भी किया गया था, लेकिन कुछ दिनों के अंदर ही भाषण के उस हिस्से को गायब करवा दिया गया। सवाल यह है कि अगर राजदूत ने कुछ गलत भी कहा था तो उस पर औपचारिक स्पष्टीकरण देने के बजाय लीपापोती क्यों की गई?

3. न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी सच्चाई

अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने 27 फरवरी 1988 में एक रिपोर्ट छापी थी, जिसमें उन्होंने सोनिया गांधी को रोमन कैथोलिक बताया था। इस रिपोर्ट में अखबार ने चर्च के हवाले से इस बात की पुष्टि की थी कि सोनिया गांधी ने खुद और अपने बेटे-बेटी को हिंदू या मुसलमान होने से बचाकर रखा है। सोनिया गांधी की तारीफ में छपे इस लेख में उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत का गुणगान किया गया था। यह लेख जब छपा था तो भारत में काफी हंगामा हुआ था। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इसका कभी खंडन नहीं किया। यह लेख आज भी अखबार की वेबसाइट पर पढ़ा जा सकता है।

4. ईसाई मिशनरी से खुला समर्थन

उत्तर प्रदेश चुनाव के वक्त यह बात सामने आई थी कि जहां कहीं भी राहुल गांधी की रैलियां होती थीं, वहां के लिए बसें भरकर भेजने में ईसाई मिशनरी भी जुटी हुई थीं। उत्तर प्रदेश में कई मिशनरी स्कूल और अस्पताल चलते हैं। राहुल गांधी की रैलियों में इन मिशनरीज पूरा हाथ बंटाया था। यह माना जाता है कि 10 साल के यूपीए शासन में देश में ईसाई मिशनरियों को खुलेआम धर्मांतरण की छूट दे दी गई थी।

5. शुरू से ही हिंदू विरोधी मानसिकता

विकीलीक्स के खुलासे में यह बात पता चली थी कि अमेरिकी डिप्लोमेट से बातचीत में राहुल गांधी ने कहा था कि भारत में इस्लामी आतंकवाद से बड़ा खतरा हिंदू आतंकवाद है। यह आरोप लगता रहा है कि राहुल गांधी ने ऐसे ही तमाम दूसरे विदेशी राजदूतों और पत्रकारों के जरिए हिंदू धर्म को लेकर दुष्प्रचार किया। उन्होंने एक बार कहा था कि जो लोग मंदिर जाते हैं वो लड़कियां छेड़ते हैं। इस बयान पर उनका काफी विरोध भी हुआ था।

स्वामी का दावा- ‘राहुल गांधी ब्रिटिश नागरिक हैं’

जबकि दूसरी ओर  बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने यह बड़ा दावा किया है। ‘राहुल गांधी ब्रिटिश नागरिक हैं’। उन्होंने इस बारे में गृह मंत्री राजनाथ सिंह को एक चिट्ठी लिखकर जांच का अनुरोध किया है। साथ ही वो दस्तावेज भी भेजे हैं जिनके आधार पर स्वामी ने ये दावा किया है। इससे पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी ने नवंबर 2016 में भी इस बारे में बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उनका दावा है कि खुद राहुल ने 2003 में खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। राहुल ने तब लंदन में एक प्राइवेट कंपनी रजिस्टर कराई थी और उसमें उन्होंने अपना लंदन का स्थानीय पता लिखा था और नागरिकता के कॉलम में खुद को ब्रिटिश नागरिक बताया था। स्वामी इस मुद्दे को समय-समय पर उठाते रहे, लेकिन राजनीतिक कारणों से मामला अब तक दबा रहा है। इस मामले में शिकायत लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन तक पहुंच चुकी है।

भारतीय नागरिकता दिखावे के लिए!

Subramanian-Swamys-letter-to-PM-on-Nov-12-2015-on-Rahul-Gandhi s-British-citizenship-and-British-company-page-001ब्रिटेन के कंपनी कानून विभाग से हासिल किए गए दस्तावेजों के मुताबिक 21 अगस्त 2003 में बैकॉप्स लिमिटेड नाम की कंपनी ब्रिटेन में रजिस्टर कराई गई थी। इस कंपनी के डायरेक्टर और कंपनी सेक्रेटरी का नाम राहुल गांधी बताया गया। इसमें राहुल गांधी का जन्मदिन सही बताया गया है। लेकिन पते में लंदन का एक पता लिखा गया और नागरिकता ब्रिटिश बताई गई। यह कंपनी 2009 में लोकसभा चुनाव से पहले बंद कर दी गई। लेकिन इस दौरान राहुल ने ब्रिटिश कानून के मुताबिक इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किया। स्वामी ने अपनी बात साबित करने के लिए 2006 का रिटर्न भी पेश किया है। रिटर्न और 2009 में कंपनी को बंद करने के अपने आवेदन में भी राहुल ने खुद को ब्रिटिश नागरिक ही बताया था। जबकि 2004 से ही भारतीय संसद के सदस्य बन चुके थे।
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राहुल गांधी ब्रिटेन में वोटर भी रहे

CT76OuwU8AAVXxWइतना ही नहीं राहुल गांधी का ब्रिटेन के नागरिक के तौर पर वहां की वोटर लिस्ट में था। इस बारे में भी दस्तावेज पेश किए गए है। वहां के चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अलग-अलग सालों में राहुल गांधी का नाम देखा जा सकता है। स्वामी के इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर सांसद महेश गिरी ने पिछले साल मार्च में स्पीकर सुमित्रा महाजन को औपचारिक शिकायत भेजी थी, जिसे स्पीकर ने संसद की आचार समिति के पास विचार के लिए भेज दिया। आचार समिति इस सिलसिले में राहुल गांधी को कारण बताओ नोटिस भी जारी कर चुकी है।

कैसे सामने आए ये सारे दस्तावेज?

Subramanian-Swamys-letter-to-PM-on-Nov-12-2015-on-Rahul-Gandhi s-British-citizenship-and-British-company-page-008सुब्रह्मण्यम स्वामी ने बताया है कि उन्होंने ये सारे कागजात लंदन में रहकर खुद जुटाए हैं। उन्हें इनकी सच्चाई पर कोई शक नहीं है। क्योंकि सारे दस्तावेज आधिकारिक स्रोतों से मिले हैं।

अब क्या चाहते हैं सुब्रह्मण्यम स्वामी?

स्वामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि राहुल गांधी की भारतीय नागरिकता रद्द की जाए और उनकी लोकसभा की सदस्यता भी खत्म कर दी जाए। क्योंकि कोई भारतीय कानून के मुताबिक कोई भारत के साथ दूसरे देश की नागरिकता एक ही समय पर नहीं रख सकता है। स्वामी इस बारे में लोकसभा स्पीकर को भी पत्र लिखने वाले हैं।

स्वामी के दावे पर क्या कह रही है कांग्रेस?

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कांग्रेस सुब्रह्मण्यम स्वामी के दावों को अब तक खारिज करती रही है। दो साल पहले जब उन्होंने इस बारे में प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी तब राहुल के घर पर अहमद पटेल, रणदीप सिंह सुरजेवाला, सीपी जोशी और शकील अहमद की बैठक हुई थी। उसके बाद एक बयान जारी करके कहा गया कि पैदा होने के दिन से ही राहुल भारत के नागरिक हैं और उन्होंने कभी किसी दूसरे देश का पासपोर्ट नहीं लिया। कांग्रेस ने स्वामी के आरोपों को राजनीतिक करार दिया, लेकिन उन्होंने दस्तावेजों और आरोपों पर कोई साफ जवाब नहीं दिया। यह भी नहीं बताया कि 2003 और 2009 के बीच राहुल क्यों खुद को ब्रिटिश नागरिक बताते रहे, जबकि वो भारतीय संसद के सदस्य भी थे। इसी दिन शाम को सोनिया और प्रियंका गांधी ने लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन के घर पर जाकर उनसे मुलाकात की थी। इस बातचीत का ब्यौरा तो सामने नहीं आया है, लेकिन अटकलें हैं कि यह मुलाकात भी स्वामी के खुलासे के सिलसिले में हो सकती है।