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जमाती झगड़े पर केरल हाई कोर्ट : मस्जिद में नमाज पढ़ने और कब्रिस्तान में दफनाने से नहीं रोक सकते

फोटो साभार: लॉबिट
हिन्दुओं को जातिवाद के नाम पर विभाजित कर गन्दी सियासत करने वालों को केरल हाई कोर्ट के निर्णय को गंभीरता से देखना चाहिए। यह निर्णय है आंखें खोलने का यानि हिन्दुओं को जातियों में बाँटने वाले यह नहीं देख रहे कि इतनी जातियां होने के बावजूद मुसलमान सिर्फ इस्लाम के नाम पर एक हैं, वरना नफरत इतनी की दूसरे की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने और कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़नाने के लिए कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, लालू यादव, मायावती, चंद्रशेखर "रावण", राजभर और चिराग पासवान आदि जैसे जाति के नाम पर पार्टियां बनाकर अपना कल्याण करने वालों को शर्म आनी चाहिए कि जिनकी वोटों की खातिर हिन्दुओं को जाति के नाम बांट गन्दी सियासत करते हो, उनमें इतने मन-मुटाव होने के बावजूद इस्लाम के नाम पर एक हैं। 
केरल हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि मुस्लिमों की कोई भी जमात, किसी भी मस्जिद में नमाज पढ़ सकती है और किसी भी कब्रिस्तान में लाशों को दफना सकता है। ऐसा करने से कोई उन्हें रोक नहीं सकता।

न्यायमूर्ति एसवी भट्टी और न्यायमूर्ति बसंत बालाजी की खंडपीठ ने यह फैसला वक्फ ट्रिब्यूनल के एक मामले में सुनवाई के दौरान दी। अदालत एर्नाकुलम में वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा जारी एक आदेश के खिलाफ जमात द्वारा दायर एक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

ट्रिब्यूनल (तत्काल में प्रतिवादी) के समक्ष मूल मुकदमे में वादी उक्त जमात (जमा-आठ) के सदस्य थे, लेकिन केरल नदावुथुल मुजाहिदीन संप्रदाय द्वारा आयोजित एक धार्मिक प्रवचन में भाग लेने के कारण उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया था।

इसके बाद ट्रिब्यूनल ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि वादी को समान रूप से प्रतिवादी की मस्जिद में नमाज पढ़ने और परिवार के सदस्यों के लाशों को कब्रिस्तान में दफनाने का अधिकार है। इसके बाद इस मामले को हाईकोर्ट में लाया गया।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “मस्जिद इबादत की जगह होती है और हर मुस्लिम मस्जिद में नमाज अता करता है। पहले प्रतिवादी (जामा-आठ) को जमात के सदस्य या किसी अन्य मुस्लिम को नमाज़ पढ़ने से रोकने का कोई अधिकार नहीं है। लाशों को दफनाना भी एक नागरिक अधिकार है। वादी अनुसूची संपत्ति में स्थित कब्रिस्तान एक सार्वजनिक कब्रिस्तान है। प्रत्येक मुस्लिम नागरिक अधिकारों के अनुसार सभ्य तरीके से दफन होने का हकदार है।”

पुनरीक्षण याचिकाकर्ता की ओर से उच्च न्यायालय के समक्ष पेश हुए अधिवक्ता पी जयराम ने कहा कि जमात और मुजाहिदीन संप्रदाय की धार्मिक मान्यताएँ और प्रथाएँ कई मामलों में भिन्न हैं। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल के आदेश से सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ेगी। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 15 और 25 उल्लंघन भी बताया।

दूसरी ओर, वादी की ओर से पेश अधिवक्ता अब्दुल अज़ीज़ ने तर्क दिया कि वादी को नमाज़ अदा करने या अपने मृतकों को दफनाने से रोकना, केवल इसलिए कि वे मुजाहिदीन संप्रदाय के एक तकरीर में शामिल हुए थे, अवैध था।