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हिंदुओं की हत्या 83.3% फिर भी नूहं दंगों में मुस्लिमों को पीड़ित बता रहा वामपंथी और विदेशी मीडिया; काशी और मथुरा के लिए डर बैठाने का षड्यंत्र

                                                                                                 साभार   
31 जुलाई को हरियाणा के मेवात के नूहं में इस्लामी भीड़ द्वारा हिंदुओं पर हुए हमले में अब तक 6 लोगों की मौत की खबर है। आतंक का शिकार हुए लोगों में 5 हिंदू व एक मुस्लिम है। घायलों में भी हिंदुओं की संख्या मुस्लिमों की अपेक्षा कहीं अधिक है। यही नहीं, आगजनी और तोड़फोड़ भी हिंदुओं के वाहनों और संपत्तियों में ही हुई। इसके बाद भी देश के वामपंथी मीडिया गिरोह से लेकर विदेशी मीडिया तक मुस्लिमों को ही पीड़ित दिखाने की कोशिश में जुटा हुआ है।

चर्चा यह भी है कि मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा दंगे करने का मुख्य कारण काशी और मथुरा मस्जिदों के विरुद्ध आने वाले कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध हिन्दुओं के दिल में डर बैठाने का षड्यंत्र है। जिसे हर सनातनी प्रेमी को समझना होगा और छद्दम धर्म-निरपेक्षों से सावधान रहना होगा। 

इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा लगाई गई हिंसा की आग में मौत का शिकार बने लोगों में 2 होमगार्ड के जवान, 1 मिठाई की दुकान में काम करने वाला हिंदू, यात्रा में शामिल होने गए 2 हिंदू, 1 गुरुग्राम की मस्जिद का मौलाना शामिल है।

नीरज (होमगार्ड) 

31 जुलाई को नूहं में मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर हमले के बाद गुरुग्राम से पुलिस टीम भेजी गई थी। इस टीम में नीरज भी शामिल थे। नूहं के रास्ते में ही इस्लामिक भीड़ ने पुलिस टीम पर पथराव और फायरिंग कर दी। दंगाइयों का सामना करते हुए नीरज ने बलिदान दिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में नीरज के शरीर पर गंभीर और बड़े पैमाने पर चोट मिली हैं। इसका मतलब है कि इस्लामवादियों ने उन पर बेरहमी से हमला किया था।
मूल रूप से गुरुग्राम के रहने वाले नीरज के पिता चिरंजीलाल ने कारगिल युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उनका कहना है कि उन्हें गर्व है कि नीरज कर्तव्य निभाते हुए बलिदान हुए। वहीं, नीरज की पत्नी ने इस हिंसा को रोकने की अपील की है। वह नहीं चाहतीं कि कोई और महिला विधवा हो।

गुरुसेवक (होमगार्ड)

नीरज की तरह गुरुसेवक भी हिंसा रोकने नूहं जा रहे थे। वह उसी वाहन में थे, जिसमें नीरज थे। इस्लामी भीड़ के हमले में वह भी बलिदान हो गए। गुरुसेवक की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में उनके लीवर पर चोट की बात सामने आई है। इसका मतलब है कि इस्लामी भीड़ ने उन पर इतना भयंकर हमला किया था कि उनके लीवर तक को नुकसान पहुँच गया। गुरुसेवक मूल रूप से फतेहाबाद के टोहाना खंड के फतेहपुरी गाँव में रहते थे। वह अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे।

शक्ति (मिठाई की दुकान में काम करते थे)

शक्ति सैनी मेवात के मुस्लिम बाहुल्य गाँव भाड़स के रहने वाले थे। वह शोएब मिष्ठान भंडार नामक मिठाई की दुकान में काम करते थे। ऑपइंडिया से बातचीत में शिवसेना शिंदे गुट के नेता रितुराज ने इस बात की आशंका जताई थी कि हमले के दौरान शक्ति दुकान में ही मौजूद थे। भीड़ दुकान से उनका अपहरण कर कहीं और ले गई। इसके बाद हत्या कर बड़कली चौराहे में फेंक दिया।

अभिषेक (जल चढ़ाने गए थे नूहं)

पानीपत के रहने वाले अभिषेक भी उन लोगों में से एक हैं, जो इस्लामी भीड़ के हमले में काल के गाल में समा गए। वह बजरंग दल के प्रखंड संयोजक थे। दंगाइयों ने पहले अभिषेक को गोली मारी। इसके बाद तलवार से गला काटकर उनका सिर पत्थर से कुचल दिया। अभिषेक जिस बस से जा रहे थे, उसी बस में महिलाएँ भी थीं। वह महिलाओं को बचाने आगे आए थे। इसी दौरान हमलावरों ने गोली चला दी, जो अभिषेक को जा लगी। गोली लगते ही अभिषेक जमीन पर गिर पड़े।
वहाँ मौजूद अभिषेक के चचेरे भाई महेश ने मदद के लिए लोगों को पुकारा, लेकिन आसपास कोई नहीं था। महेश अपने घायल भाई अभिषेक को कहीं सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कोशिश कर रहे थे। इस बीच भीड़ में से एक हमलावर बाहर आया और उसने तलवार चलाकर अभिषेक की गर्दन काट दी और भाग गया। इसके बाद महेश को भी वहाँ से भागना पड़ा। लगभग 1 घंटे बाद पुलिस आई और अभिषेक को अस्पताल पहुँचाया गया। तब तक अभिषेक की मौत हो चुकी थी।

प्रदीप (जल चढ़ाने गए थे नूहं)

31 जुलाई 2023 को नल्हड़ मंदिर पर हुए हमले में प्रदीप कुमार बच गए थे। पुलिस उन्हें बचाकर पुलिस लाइन ले आई थी। लेकिन घर लौटते समय वह कट्टरपंथियों की भीड़ का निशाना बन गए। 1 अगस्त की रात करीब 2 बजे पुलिस उन्हें थाने की सीमा तक छोड़कर चली गई थी। प्रदीप अपने दोस्त कपिल व हिंदू संगठन की महिलाओं के साथ घर वापस आ रहे थे। इसी दौरान 200-300 लोगों की भीड़ ने घेर कर उन पर पत्थरबाजी शुरू की। इसके बाद प्रदीप को खींचकर कार से बाहर निकाल लिया। इसके बाद पीट-पीटकर मार डाला।
प्रदीप के साथ रहे कपिल त्यागी इस बात को लेकर हैरान हैं कि मुस्लिम भीड़ को उनकी सटीक मुखबिरी कैसे हुई। जबकि वह सीधे पुलिस लाइन से निकले थे। मृतक प्रदीप कुमार गुरुग्राम में बजरंग दल के पदाधिकारी थे। वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के जिला बागपत के रहने वाले बताए जा रहे हैं। गुरुग्राम में वो छोटा-मोटा काम करके अपना और अपने परिवार का गुजारा करते थे।

मौलाना हाफिज साद (एक मात्र मुस्लिम मृतक)

मौलाना हाफिज साद गुरुग्राम की मस्जिद में रहता था। नूहं में भड़की हिंसा की आग गुरुग्राम तक पहुँच गई थी। इसी दौरान 31 जुलाई और 1 अगस्त की दरमियानी रात सेक्टर 57 में स्थित एक निर्माणाधीन और विवादास्पद मस्जिद (जिस पर कोर्ट से रोक भी लगी है) में हमला कर आग लगा दी गई। इस हमले में हाफिज साद की मौत हो गई।
                                 नूहं दंगों के कारण 6 की गई जान: 5 हिंदू, 1 मुसलमान
ऊपर की फोटो याद रखें। वामपंथी मीडिया जो प्रोपेगेंडा फैला रहा है, यह तस्वीर उसकी काट है। नूहं में हिंसा के आँकड़ों को देखें तो मरने वालों में 83.3% हिंदू हैं। इसके बाद भी हिंदुओं को हिंसक, अहिष्णु समेत तमाम तरह की उपमाएँ देने वाला वामपंथी-लिबरल मीडिया गिरोह और भारत के खिलाफ दुष्प्रचार फैलाने का हर वक्त रास्ता ढूँढ़ने वाला विदेशी मीडिया मुस्लिमों को पीड़ित बता रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि हिंदुओं की शांतिपूर्ण धार्मिक यात्रा पर पथराव, आगजनी और गोलीबारी इस्लामवादियों ने ही की। वहीं, हिंदू निहत्थे थे।
गुरुग्राम की मस्जिद में आग लगाने वाले कौन थे, इसकी पुष्टि अब तक नहीं हुई है। चूँकि मस्जिद निर्माणाधीन थी, ऐसे में हो सकता है कि यह कृत्य भी इस्लामवादियों की भीड़ ने ही किया हो। या फिर हिंसा भड़काने के लिए जानबूझकर की गई हरकत भी हो सकती है।

मुसलमानों के खून से सना हुआ है ईसाई राष्ट्रवाद… लेकिन विदेशी मीडिया साध लेता है चुप्पी

ईसाई, मुस्लिम, विदेशी मीडिया
आजकल विदेशी मीडिया को भारत के आंतरिक मामलों में बहुत दिलचस्पी रहती है। साल 2014 के बाद तो इसमें इजाफा हो गया है। हिन्दू राष्ट्रवाद को आधार बनाकर भारत को मुस्लिम अथवा अल्पसंख्यक विरोधी बताने का झूठा प्रचार किया जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी या वर्तमान सरकार संबंधी किसी भी खबर में हिन्दू नेशनलिस्ट (राष्ट्रवादी) शब्द लगाना एक शौक बन गया है। हालाँकि, राष्ट्रवादी होना कोई गुनाह नहीं है, यह एक गर्व की बात है। किसी भी भारतीय को हिन्दू होने में भी कोई शर्म नहीं है। समस्या हिन्दू राष्ट्रवाद की व्याख्या को लेकर है, जो इस तरह से होती है, जैसे भारत में मुसलमानों पर अत्याचार किया जाता है और इसके जिम्मेदार हिन्दू राष्ट्रवादी हैं।
वॉशिंगटन पोस्ट ने अभी कुछ दिनों पहले लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनैतिक करियर में यह (दिल्ली हिंसा) दूसरा मौक़ा है, जब किसी सांप्रदायिक हिंसा के दौरान वे शासन संभाल रहे हैं। गार्डियन तो एक कदम आगे निकल गया। अख़बार ने प्रधानमंत्री मोदी को विभाजनकारी बता दिया। जबकि, तथ्य कुछ अलग ही हालात बयान करते हैं। लगभग हर अमेरिकी राष्ट्रपति का हाथ विश्व भर के मुसलमानों के नरसंहार में शामिल रहा है। पाकिस्तान, ईराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना लगभग 5 लाख निर्दोष मुस्लिम नागरिकों की हत्या कर चुकी है। इसमें घायलों की संख्या शामिल नहीं है। इस दौरान कितने ही निर्दोष मुसलमानों को अनाथ और बेघर कर दिया, इसके कोई आँकड़ें तक नहीं हैं।
अमेरिकी सेना 1980 से कई मुस्लिम देशों पर हमला कर चुकी है। इसमें ईरान, लीबिया, लेबनान, कुवैत, इराक, सोमालिया, बोस्निया, सऊदी अरेबिया, अफगानिस्तान, सूडान, कोसोवो, यमन, पाकिस्तान और सीरिया शामिल है। कई देशों में तो आज भी इस देश की सेना डेरा जमाए हुए है, जोकि किसी देश की संप्रभुता के खिलाफ है। आतंकवाद को जड़ से मिटाने को लेकर कोई एतराज नहीं है। मगर साल 2018 में एक खबर प्रकाशित हुई जोकि शर्मनाक ही नहीं बल्कि मानवता को झकझोर देने वाली थी। अमेरिकी सेना ने 2010 से 2016 के बीच 6,000 से अधिक मुस्लिम अफगान लड़कों के साथ शारीरिक उत्पीड़न किया था। ताज्जुब की बात है कि किसी भी अमेरिकी अखबार और न्यूज चैनल ने इस अमानवीय कृत्य पर कोई प्रतिक्रिया तक नहीं की।
इतना कुछ हो गया और हो रहा है, फिर भी क्या कभी विदेशी अखबार अथवा न्यूज चैनल ने कहा कि अमेरिका की ‘क्रिस्चियन नैशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी’ ने निर्दोष मुस्लिम नागरिकों की हत्या कर दी। अब एक नजर न्यूयॉर्क टाइम्स की दिसंबर 2019 खबर पर डालते हैं। जिसके अनुसार 25 साल की एक अफगान मुस्लिम महिला अपने नवजात बच्चे को अस्पताल दिखाने ले जा रही थी। वह महिला न तो कोई आतंकवादी थी, और न ही किसी अपराध के लिए दोषी करार दी गई थी। उसकी बदकिस्मती थी कि अचानक से एक ड्रोन हमले में उसकी कार को बम से उड़ा दिया गया। अखबार ने इसे एक मामूली घटना से जोड़कर देखा। अमेरिकी राष्ट्रपति और सरकार के प्रतिनिधियों को इस जघन्य अपराध के लिए माफ कर दिया गया। जबकि भारत में कोई लॉ-एंड-आर्डर संबंधी मामूली घटना के लिए भी अमेरिकी पत्रकारों का नजरिया धार्मिक अथवा साम्प्रदायिक हो जाता है।
इस प्रकार के एक नहीं बल्कि हज़ारों उदाहरण हैं। अमेरिका में 2011 के आतंकी हमले के बाद सरकार और बहुसंख्यक ईसाई जनता दोनों इस्लाम विरोधी हो गए थे। अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों द्वारा मुसलमानों को अमेरिकी हवाई अड्डों पर पूछताछ के लिए रोका जाता था। ऐसी ही एक दास्तां अमेरिकी मुस्लिम मोहम्मद फ़िरोज़ की है। उसे लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे से न्यूयॉर्क की यात्रा करनी थी। जॉन एफ केनेडी हवाई अड्डे पर पहुँचते ही उसे सुरक्षा अधिकारियों ने गिरफ्तार कर लिया। उसका सामान जब्त कर लिया और चार घंटों की पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया गया। यह खबर ब्रिटेन के इंडिपेंडेंट अखबार ने प्रकाशित की थी, जिसके अनुसार यह एक सामान्य प्रक्रिया थी। दरअसल, अमेरिकी अखबारों को कभी नजर नहीं आता कि उनके देश में मुसलमानों के साथ कैसा दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है।
पश्चिमी मीडिया को भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर बोलना आसान रहता है। भारत में दो समुदायों के व्यक्तियों का आपसी झगड़ा भी उनके संपादकीय पृष्ठ का हिस्सा बन जाता है। जबकि उनके अपने देश के ईसाई बहुसंख्यक मस्जिदों पर हमले और मुसलमानों को धमकियाँ देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। साल 2016 में लॉस एंजलिस के रहने वाले मार्क फएगीं ने ट्वीट किया कि ‘गंदे इस्लामी जानवरों की अमेरिका में कोई जगह नहीं है’। ऐसे ही साल 2019 में कैलिफोर्निया की एक मस्जिद में आगजनी की गई। वॉशिंगटन पोस्ट ने हमलावर के लिए बताया कि वह न्यूजीलैंड के आतंकी हमले से नाराज़ था। यानी वह एक ईसाई था।
हिंसा का कोई भी प्रारूप जायज़ नहीं कहा जा सकता। आतंकवाद से भारत अमेरिका से भी ज्यादा पीड़ित है। हमने भी वैश्विक स्तर पर आतंकवाद को समाप्त करने का अभियान चलाया हुआ है। मगर, हमारी नीतियों में आम नागरिकों के प्रति हिंसा शामिल नहीं है। अगर बात आंतरिक क़ानूनी व्यवस्था की है तो भारत सरकार उसे ठीक करने के लिए सक्षम है। दूसरी बात, भारत में विश्व के सभी धर्मों के अनुयायी रहते हैं। यह हमारी संस्कृति की विशेषता है कि हमने सभी धर्मों का स्वागत किया है। भारतीय संविधान में धार्मिक अधिकारों को लिखित रूप से स्वीकार्यता दी गई है। मैं भारत का नागरिक हूँ और हिन्दू धर्म में मेरी आस्था है, यही हिन्दू-राष्ट्रवाद है। किसी व्यक्तिगत झगड़े को हिन्दू-राष्ट्रवाद के नाम पर भारत और हिन्दू दोनों को बदनाम नहीं किया जा सकता। इसलिए अंत में, पश्चिमी मीडिया खासकर अमेरिका को ईसाई राष्ट्रवाद का हिंसात्मक चेहरा दुनिया को आगे रखने का साहस करना चाहिए।

पीएम मोदी के खिलाफ विदेशी मीडिया की साजिश


बालाकोट का मुस्लिम क्षेत्रों पर असर 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आखिर भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के किन लोगों को डर सता रहा है? स्पष्ट है जो लोग हिन्दुत्व विरोधी, पाकिस्तान और आतंकवाद समर्थक हैं, खुलकर मोदी का विरोध कर रहे हैं। आज(मई 12) दिल्ली में चुनाव के दौरान whatsapp पर निम्न सन्देश मिला:-     
Bhaio Aam admi ko vote dene se musalman bhaio ka vote kat jaega
Jis trh hindu ek sath mil kr BJP ko vote kr rhe h isi trah hm musalmano ko bhi chahiye ki ek sath mil kr sirf congress ko vote de
Bade election m Congress 🤚
Chote election m Aam aadmi
 Kyuki AAP ke sirf 12 candidates all over India h to koi faeda nai he apna keemti vote waste karne ka Congress se Gadbandhan bhi nahi kiya Bawajood Congress ne Unki demand maan li thi Delhi ke Coalition ke liye . khaali apne Selfish aur bewakoofi ki wah se . 
Congress ko vote kren
Is msg ko aage musalman bhaio ko forward kre 
मई 12 को मतदान के दिन 10 बजे का
 मटिया महल का माहौल 
जिसे पढ़कर आभास हुआ कि पुरानी दिल्ली के मुस्लिम क्षेत्र, विशेषकर मटिया महल, चाँदनी चौक और बल्ली मरान विधानसभा क्षेत्र, में कर्फ्यू जैसा माहौल क्यों था? कांग्रेस को झोड़ मतदान केंद्र पर पोलिंग एजेंट और सड़क से मेज-कुर्सी भाजपा का कोई नामोनिशान नहीं दिखा। प्रेसिडिंग अधिकारी से मालूम हुआ कि "सुबह तो था, अब कहाँ है ये पार्टी को मालूम होगा?" आज मुस्लिम क्षेत्र में ऐसी हालात तत्कालीन भारतीय जनसंघ(वर्तमान भाजपा) के समय तक में नहीं देखी। जबकि उन दिनों संघ और जनसंघ का कोई अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ नहीं था। और आज दोनों का अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ हैं। कहाँ गए अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के पदाधिकारी और कार्यकर्ता? 
आज की स्थिति को देख पूर्व में लिखे भाजपा और संघ के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के विरुद्ध मेरे शत-प्रतिशत सत्यापित हो गए। इन प्रकोष्ठों का अपने कार्यकाल से ही विरोध करता हूँ, पदाधिकारियों तक से प्रत्यक्ष रूप में चुनाव में दोगली नीति पर प्रश्नचिन्ह लगाता रहा हूँ। परन्तु आज तो मेरे प्रश्नचिन्हों को भी प्रमाणित कर दिया। कोई पोलिंग एजेंट नहीं कोई टेबल नहीं, क्या है ये सब तमाशा? ये लोग पार्टी को भ्रमित कर रहे हैं, जिस पर भाजपा शीर्ष नेतृत्व को मंथन करना होगा। 
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चाँदनी चौक से भाजपा उम्मीदवार डॉ हर्षवर्धन के कार्यक्रम की सुचना में भयंकर चूक। ऐसा…


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राजनेता चाहे जिस तरह की राजनीति खेले, लेकिन जनता उनसे दस कदम आगे ही चलती है। आज नेता समाज जिस तरह तुष्टिकरण नीति अपन...


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आगामी रमजान में रोजा रखने वालों के लिए RSS की मुस्लिम शाखा उत्तर प्रदेश में इफ़्तार पार्टी आयोजित करेगी। लेकिन इस इफ...


अब विदेशी मीडिया भी पीछे नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सिर्फ देश में ही अंग्रेजी मीडिया का एक वर्ग ने अभियान नहीं चला रखा है बल्कि विदेशी मीडिया भी एक साजिश के तहत अभियान चला रखा है। एक खास साजिश के तहत देश के उदारवादियों के आधार पर विदेशी मीडिया ने मोदी और हिंदुओं को तानाशाह, हिंसक और घृणा फैलाने वाले के रूप में स्थापित करने का अभियान चलाया हुआ है। टाइम मैगजीन में मोदी को डिवाइडर इन चीफ बताना उसी साजिश का हिस्सा है। इससे पहले द न्ययॉर्क टाइम्स, द गार्जियन और वाशिंगटन पोस्ट में भी मोदी के खिलाफ भ्रम फैलाने वाली स्टोरी प्रकाशित हो चुकी है।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने मोदी के कैंपेन को बताया था डरावना
टाइम मैगजीन से पहले न्ययॉर्क टाइम्स ने 17 अप्रैल 2019 के अपने संस्करण में मोदी के खिलाफ स्टोरी प्रकाशित की थी। उस स्टोरी में जहां मोदी के चुनावी कैंपेन को डरावना बताया था वहीं बहुसंख्यक हिदुओं को मुसलमान और पाकिस्तान के लिए खतरनाक बताया है।
द गार्जियन ने मोदी को बताया था हिंदू तालिबान
पीएम मोदी के सत्ता में आने के करीब डेढ़ साल बाद ही द गार्जियन ने भारत में मोदी सरकार को हिंदू तालिबान का शासन बताया था। अनीश कपूर ने अपने लेख के शीर्षक में ही लिखा था भारत में हिंदू तालिबान का शासन चल रहा है। उन्होंने मोदी को तालिबान बताया था।
मोदी को दमनकारी नेता के रूप में किया गया प्रोजेक्ट
मोदी को लेकर विदेशी मीडिया शुरू से ही एकांगी और पूर्वाग्रह से ग्रसित रहा है। अपने पूर्वाग्रह के कारण ही विदेशी मीडिया मोदी को दमनकारी मान चुका है। अब तो दमनकारी ठहराने के लिए प्रश्न भी वैसे गढ़े और पूछे जाने लगे हैं। दो दिन पहले ही एक पत्रकार ने  अमेरिका की राष्ट्रपति उम्मीदवार तुलसी गावार्ड से मोदी की दमनकारी नीति पर सवाल पूछा है।  
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार देश से लेकर विदेश तक में कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस लोकसभा चुनाव में किस....

हनुमान को आतंकी बताया, स्वास्तिक का गलत प्रचार
विदेशी मीडिया शुरू से ही स्वास्तिक को लेकर गलत धारणा फैलाता रहा है। निकी हैली की स्वास्तिक वाली तस्वीर को हटाकर रायटर ने अपनी अज्ञानता ही प्रदर्शित किया है। मोदी के साथ हिंदुओं को अपमानित करना जारी है। वाशिंगटन पोस्ट ने हिंदू देवता हनुमान के चेहरे को हिंदूवादी आतंकी के रूप में स्थापित किया है।देश के अधिकांश लोग न तो टाइम मैगजीन पढ़ते हैं न ही न्यूयॉर्क टाइम और ना वाशिंगटन पोस्ट या द गार्जियन। विदेशी मीडिया देश और मोदी के खिलाफ जो साजिश रच रहा है उसका परिणाम दीर्घ अवधि के लिए घातक साबित हो सकता है। भले कम समय के लिए भारतीय जनमानस पर इसका असर न हो।