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कालपी का ऐतिहासिक किला और 23 मई 1858 का वह बलिदानी दिवस

डॉ॰ राकेश कुमार आर्यराकेश कुमार आर्य, संपादक : उगता भारत
जब जब भी मई का महीना आता है तो प्रत्येक राष्ट्रभक्त भारतवासी के मन मस्तिष्क में 1857 की क्रांति के नायकों से जुड़ी वीर गाथाएं अनायास ही उभर आती हैं । 10 मई 1857 को उत्तर प्रदेश के मेरठ से इस क्रांति का शुभारंभ करने वाले क्रांतिवीर कोतवाल धनसिंह गुर्जर , महर्षि दयानंद , तात्या टोपे , रानी लक्ष्मीबाई , बहादुर शाह जफर और अन्य अनेकों ऐसे क्रांतिकारी बलिदानी रह-रहकर हमारे मन मस्तिष्क को आंदोलित और मथित करने लगते हैं जिन्होंने उस समय देश की अंतश्चेतना का प्रतिनिधित्व करते हुए संपूर्ण देश को क्रांति से मथ डाला था । प्रतिक्रांति के फलस्वरूप चाहे वह क्रांति असफल भी हो गई हो , परंतु उसका अंतिम फल तो 1947 में मिली आजादी ही रही । जिसे हम अमृत कलश भी कह सकते हैं । यदि इस बीच कांग्रेस और उस जैसे सेकुलर दल बीच में ना आए हुए होते निश्चित रूप से देश 1857 की भांति अखंड रूप में ही हमें प्राप्त होता।
1857 की क्रांति के लिए भारत के जिन ऐतिहासिक नगरों को उस समय विशेष से प्रसिद्धि और ख्याति इतिहास में प्राप्त हुई उनमें से एक सौभाग्यशाली शहर कालपी भी माना जाता है।
कालपी का यह ऐतिहासिक दुर्ग आज भी अपने अतीत की गौरवपूर्ण कहानी को कह रहा है , जो उस समय क्रांतिकारियों का गढ़ बन गया था और जहां से बैठकर क्रांतिकारी पूरे देश की क्रांति को सुनियोजित ढंग से आगे बढ़ाने की नीति और रणनीति पर विचार विमर्श किया करते थे। क्रांतिकारियों ने अपना नियंत्रण कक्ष इसी दुर्ग में स्थापित किया था, इतना ही नहीं यहीं पर अपने अस्त्र शस्त्रों को भी उन्होंने सुरक्षित रूप से रखा था। इसी दुर्ग में बैठकर नानासाहब , रानी लक्ष्मीबाई और कुँवरसिंह जैसे क्रांतिकारियों ने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए थे । इस प्रकार क्रांति के गढ़ के रूप में स्थापित हुए इस किले को आज की सरकार को क्रांतिकारियों के महत्वपूर्ण स्थल अथवा तीर्थ के रूप में विकसित कर नई पीढ़ी को एक अच्छा संदेश देना चाहिए।
तात्या टोपे ने यहीं बैठ कर देश के अन्य राजे रजवाड़ों के लिए एक ऐतिहासिक पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने सभी राजाओं से अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़ा होने का आवाहन किया था । उन्होंने लिखा था कि हमारा उद्देश्य किसी एक को राजा बनाना नहीं है अपितु विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंककर देश की आजादी को प्राप्त करना है । इसके अतिरिक्त अंग्रेज जिस प्रकार देसी नरेशों का अस्तित्व मिटाने पर लगे हैं , उससे मुक्ति प्राप्त करना भी हम सब का सामूहिक उद्देश्य है । यदि समय रहते इस पर सावधान रहकर काम नहीं किया गया तो देश की स्वतंत्रता को प्राप्त करना असंभव हो जाएगा। नाना साहब के सेनापति के रूप में तात्या टोपे ने यह पत्र उस समय देशी राजाओं के लिए लिखा था। जिसे बाबा देवगिरी के माध्यम से सभी राजाओं के पास पहुंचाया गया था।
इस पत्र का बड़ा सकारात्मक प्रभाव हमारे राजाओं पर पड़ा । जैसे ही पत्र राजाओं के पास पहुंचा , वैसे ही देखते ही देखते सेना एकत्र होने लगी । बात साफ है कि सभी के भीतर राष्ट्रवाद की भावना बलवती हो रही थी और सभी अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ कर अपने देश की आजादी को प्राप्त करना उचित मान रहे थे।
क्रांति की ज्वाला को बलवती करने के लिए सभी देशभक्त क्रांतिकारियों ने अपनी अपनी भूमिका सुनिश्चित कर ली । जालौन के तहसीलदार नारायण राव ने कार्यालय तथा मुहम्मद इशहाक ने भोजन आदि की व्यवस्था सँभाली। नाना साहब के भाई बालासाहब तथा भतीजे राव साहब भी आ गये। सभी क्रांतिकारियों ने यमुना के पवित्र जल को हाथ में लेकर उससे आचमन करते हुए यह संकल्प लिया कि अंतिम सांस तक देश रक्षा के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
देश की क्रांति को अंग्रेजों ने चाहे मात्र सैनिक उपद्रव कहकर हल्का करने का प्रयास किया हो , परंतु क्रांतिकारियों की गतिविधियां और उनके बारे में मिले ऐतिहासिक अभिलेखों से अब यह पूर्णतया स्पष्ट हो चुका है कि यह देश को आजाद कराने के लिए चलाया गया क्रांतिकारी आंदोलन था।
अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्रांतिकारियों ने दुर्ग में तोपों की ढलाई का काम आरंभ कर दिया। जालौन से आये कसगरों ने स्थानीय शोरा, कोयला तथा मिर्जापुर से प्राप्त गन्धक से बारूद और बम बनाये। अपनी युद्ध नीति के अंतर्गत जिले में अंग्रेजों का प्रवेश रोकने के लिए यमुना में चलने वाली 200 नौकाओं का नियन्त्रण क्रान्तिकारियों ने अपने हाथ में ले लिया। अब वहाँ 10,000 सैनिक तथा 12 तोपें युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार थीं। कालपी के स्थानीय लोगों ने भी हमारे क्रांतिकारियों और उनके सैनिकों का भरपूर स्वागत सत्कार कर अपनी राष्ट्रवादी भावना का परिचय दिया । जैसी भी आवश्यकता हमारे क्रांतिकारियों या किसी सैनिक को पड़ती थी स्थानीय नागरिक उनकी भरपूर मदद करने के लिए आगे आते थे ।
अप्रैल 1858 के महीने में जब रानी लक्ष्मीबाई ने इस किले में प्रवेश किया तो उनके पीछे अंग्रेज सर ह्यूरोज़ अपने सैनिकों के साथ लगा हुआ था। हमारे क्रांतिकारी और रानी लक्ष्मीबाई के सैनिकों सहित स्थानीय नागरिक अंग्रेज सेना और अंग्रेज अधिकारी सर ह्यूरोज़ को रोकने के लिए कटिबद्ध हो गए।
रानी के सम्मान को सब ने अपना सम्मान समझ लिया और सब ने यह प्रतिज्ञा कर ली कि यदि अंग्रेजों ने रानी को हाथ लगाने का प्रयास किया तो चाहे कितने ही बलिदान क्यों न देने पड़ जाए , पर अंग्रेजों को इस बार ऐसा सबक सिखा देंगे कि वह शताब्दियों तक हमारे पराक्रम को भूलेंगे नहीं । सात मई, 1858 को वहाँ हुए भीषण संघर्ष में 500 क्रान्तिकारी बलिदान हुए। इसके बाद सब लौटकर फिर कालपी आ गये। नाना साहब ने अब निर्णायक संघर्ष की तैयारी प्रारम्भ कर दी।
क्रांतिकारियों ने 84 गुम्बज नामक भवन से यमुना तक खाइयाँ खोदने का कार्य आरंभ किया , जिससे अंग्रेजों को आगे बढ़ने से रोका जा सके। राष्ट्रभक्ति का रंग जिस प्रकार कालपी के इस स्थान पर बिखर गया था उस।में रोमांच झलक रहा था । जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति देश भक्ति के भावों से भर जाता था। इधर हमारे क्रांतिकारी खड़े थे तो दूसरी और अंग्रेजों की सेना भी तैयार खड़ी थी। ह्यूरोज ने 22 मई को 20 घण्टे तक अपनी पूर्ण शक्ति का परिचय देते हुए और भारतीय क्रांतिकारियों को भून भूनकर समाप्त करने के उद्देश्य से लगातार दुर्ग पर गोले बरसाये। दूध करने के लिए हमारे क्रांतिकारियों के पास यद्यपि अस्त्र शस्त्र की कमी थी परंतु अंग्रेजों के गोले खाने के लिए भारतीय क्रांतिकारियों की छातियों की कमी नहीं थी । सबकी छातियाँ ही गोला बन गई थीं और अंग्रेजों से कहे जा रही थीं कि जितने चाहो गोले बरसाओ लेकिन ये छातियां सामने से हटने वाली नहीं है। भारी संघर्ष के बाद 23 मई, 1858 की प्रातः ब्रिटिश सेना कालपी में प्रवेश पाने में सफल हो गयी।
युद्ध में बड़ी संख्या में क्रान्तिवीर बलिदान हुए। यमुना की धारा रक्त से लाल हो गयी। दुर्ग में अंगे्रजों को नानासाहब और लक्ष्मीबाई का महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार, छह हाथी, तोप, गोले, 500 बैरल बारूद, ब्रासगन, मोर्टार, ब्रास पाउडर गन, 9,000 कारतूस तथा भारी मात्रा में पारम्परिक शस्त्र मिले।
हमारे क्रांतिकारियों ने फिर शिवाजी और महाराणा उदय सिंह के बताए रास्ते का अनुकरण किया और जब देखा कि अब अंग्रेज सेना किले के भीतर प्रवेश करने में सफल हो गई है तो वे गुप्त मार्गों से किले के बाहर निकलने में सफल हो गए। अंग्रेजों ने किले में प्रवेश पाने के पश्चात हमारे क्रांतिकारियों के नेता तात्या टोपे , रानी लक्ष्मी बाई और नाना साहब को ढूंढने का अभियान चलाया , परंतु उन्हें कहीं भी हमारे क्रांतिकारी हाथ नहीं लगे।
जब देश आजाद हुआ तो आवश्यकता थी कि कालपी के इस दुर्ग जैसे उन ऐतिहासिक स्थलों को इस प्रकार विकसित किया जाता कि जहां जाकर हमें अपने क्रांतिकारी आंदोलनों और इतिहास का भाव बोध होता । दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि यहां ‘चाचा बापू’ की समाधियां चमकाने पर तो बल दिया गया लेकिन क्रांतिकारियों के बलिदानों के इन पवित्र स्थलों को उपेक्षा की भट्टी में फेंक दिया गया । आज भी यह किला अपने अंतर में अनेकों बलिदानियों की वीरगाथा को समेटे हुए जर्जर अवस्था में चुप खड़ा आंसू बहा रहा है । संभवतः इसी प्रतीक्षा में है कि कोई देशभक्त राष्ट्रवादी कभी तो इधर आएगा जो तेरे आंसुओं को पोंछने का काम करेगा और यहां पर बलिदानी क्रांतिकारियों का स्मारक बना कर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित कर तेरे ऐतिहासिक महत्व का सम्मान करेगा ???

महान क्रांतिकारी शहीद ऊधम सिंह का बलिदान दिवस

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* आज के दिन ही दी गई थी 1940 में फांसी
* आज ही के दिन 1974 में ब्रिटेन ने सौंपे थे उनकी अस्थियों के अवशेष
* दुखद है कि आज तक भी नहीं मिला इतिहास में उचित सम्मान
Image may contain: 1 person, beard and textपंजाब के ऐतिहासिक नगर अमृतसर का जलियांवाला (जलियां नामक एक माली का) बाग भारत के क्रांतिकारी स्वतंत्रता आंदोलन का गौरवमयी स्मारक है। यहां देश के 2000 उन स्वतंत्रता सेनानियों का स्मारक है, जिन्हें पंजाब के तत्कालीन मुख्य प्रशासक ओडायर और लैफ्टिनेन्ट गवर्नर डायर (दोनों नाम और व्यक्ति अलग अलग हैं) ने अपनी पाशविकता का शिकार बनाया था। जी हां, हम 13 अप्रैल 1919 की बैशाखी के दिन घटित उसी जलियांवाला बाग हत्याकांड की चर्चा कर रहे हैं, जिस के ‘लाल-गारे’ से क्रांतिकारी शहीद ऊधम सिंह के जीवन का निर्माण हुआ था। सचमुच यह ‘लाल-गारा’ भारत की अस्मिता और गौरव की हत्या करके बनाया गया था। भारत की इसी अस्मिता और गौरव की रक्षा इस घटना के 21 वर्ष पश्चात भारत की माटी के लाल ऊधम सिंह ने लंदन में 12 जून 1940 को इस बाग के हत्याकांड के मुख्य हीरो ‘ओडायर’ की हत्या करके की थी।
Image may contain: 1 person, beard and textएक उपेक्षित क्रांतिकारी
सरदार ऊधम सिंह भारतीय क्रांतिकारी स्वतंत्रता आंदोलन के एक उपेक्षित पात्र हैं। जिस नौजवान ने अपना जीवन और पूरा यौवन देश के लिए दे दिया उसके साथ इतिहास का दण्ड अभी तक जारी है। उसकी क्रांतिकारी विचारधारा को अब तक समुचित स्थान इतिहास में नही दिया गया है। शोक! महाशोक!!
नाथूराम गोडसे के 150 बयानों का अध्ययन करने पर मालूम होता है कि इस महान क्रांतिकारी का क्यों हुआ? जब जल्लिआंवाला बाग़ के आरोपी जनरल डायर को ब्रिटेन जाकर मारे जाने पर महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार से कहा था कि "इस सिरफिरे की वजह से हमारे रिश्तों में फर्क नहीं आना चाहिए।" 
इस क्रांतिकारी महायोद्घा का जन्म पंजाब की पटियाला रियासत के सुनाम नामक गांव में सरदार टहल सिंह के परिवार में दूसरी संतान के रूप में हुआ। बड़े भाई का नाम साधू सिंह था। जब ऊधम सिंह मात्र दो वर्ष के थे तो सन 1901 में जननी जन्मदात्री माता का देहांत हो गया था। तब पिता टहल सिंह अपने दोनों बेटों को सुनाम से अमृतसर ले आए। परंतु पिता का स्वास्थ्य भी अच्छा नही रहता था, आर्थिक स्थिति भी अत्यंत खराब हो चुकी थी। इसलिए चिकित्सा के लिए भी कोई साधन नही थे, फलस्वरूप ऊधम सिंह जब पांच वर्ष के हुए तो सन 1907 में पिता का साया भी साथ छोड़कर चला गया। यह वही अवस्था होती है जब पिता अपनी संतान की ऊंगली पकड़कर उसे विद्यालय की सीढ़ियां चढ़ाता है, परंतु यहां तो उल्टा हो रहा था पिता की उंगली छूट रही थी। दोनों अनाथ भाई इधर उधर घूम घूमकर अपना जीवन यापन करने लगे। कठिनाइयों और विषमताओं का दौर अभी समाप्त नही हो रहा था। एक भजनोपदेशक भाई चंचल सिंह ने उन्हें एक अनाथाश्रम में डलवा दिया जहां बच्चों को पढ़ाई के साथ साथ दस्तकारी भी सिखाई जाती थी। दोनों भाई जीवन पथ पर आगे बढ़ रहे थे-परंतु 19 वर्ष के तरूण भाई साधूसिंह का स्वास्थ्य अचानक बिगड़ा और सन 1917 में एक दिन वह भी भाई का साथ छोड़कर चले गये।
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अब ऊधम सिंह नितांत अकेले थे। ईश्वर की छत्रछाया और मजबूत इच्छा शक्ति से बना आत्मबल ही अब उनके मित्र थे। मजबूत इरादे के धनी इस युवक ने अपने इन दोनों मित्रों का दामन पकड़ा और फिर उठकर चल दिया-क्रांति पथ की ओर। क्योंकि उसे एक महान दायित्व का निर्वाह करना था अब उसकी मां भारत माता थी, पिता भारतीय राष्ट्र था तो भाई देश के करोडा़ें नौजवान थे। इस उदात्त भावना के वशीभूत होकर ऊधम सिंह बैठे-बैठे अनंत में खो जाते और भविष्य की योजनाओं को सिरे चढ़ाने के सपने संजोते रहते। क्योंकि उस समय स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था और उससे उन जैसा क्रांतिकारी नौजवान भला कैसे अछूता रह सकता था?
नियति ने मार्ग दिखा दिया
Image may contain: 1 person, textतभी पंजाब के मुख्य प्रशासक जनरल ओडायर ने रौलट एक्ट के खिलाफ भारतीयों के उबलते खून को शांत करने के लिए कड़ाई बरतने के संकेत देते हुए 13 अप्रैल 1919 को बैशाखी के दिन पंजाब के अमृतसर में भारतीयों को कोई सभा न करने देने की चेतावनी दी। इसी क्रम में पंजाब के दो नेता डा. सत्यपाल और श्री किचलू को गिरफ्तार कर लिया गया। जनता इससे उत्तेजित हो गयी और गांधीजी की अपील पर नियत दिन को जलियांबाला बाग में जाकर सभा करने लगी। तब जनरल ओडायर ने बाग को आकर घेर लिया और उसने 1650 चक्र गोलियां चलाईं, जिससे 2000 लोगों की मौके पर ही मौत हो गयी, तथा 3600 के लगभग लोग घायल हो गये। घायलों ने बाग से भागने का प्रयास किया तो उनमें से कितनों ने ही अमृतसर के गली मौहल्लों में भागते भागते अपने प्राण गंवा दिये। इस प्रकार अमृतसर की गली गली में लाशें फैल गयीं थीं। इस जघन्य हत्याकाण्ड में ओडायर के साथ साथ लेफ्टिनेंट गर्वनर डायर भी था।
क्रांतिकारी ज्वाला से धधकता ऊधम सिंह इस घटना का साक्षी था। वह एक स्वयंसेवी नवयुवक के रूप में वहां उपस्थित था, परंतु निहत्था था। इस घटना की जघन्यता इस नवयुवक के खून को अंदर तक खौलाकर रख दिया था। वह बाबा टलनाम नामक स्थान से होकर रात में गुजर रहा था तभी पेशावर की रत्नादेवी नामक एक महिला के रूदन पूर्ण विलाप की चीख उनके कानों में पड़ी। नवयुवक के पूछने पर महिला ने बताया कि वह और उसका पति बैशाखी स्नान के लिए अमृतसर आए थे-परंतु पति जलियांवाला बाग की इस घटना में शहीद हो चुके हैं-अब मैं उनकी लाश को लेने के लिए व्याकुल हूं। नवयुवक ऊधम सिंह ने बहन की सहायता का संकल्प लिया और उससे कहा कि तुम मेरे साथ चलो, पर शर्त ये है कि तुम रोओगी नही। महिला ने हां कह दिया और ना रोने का व्रत लिया।
तब दोनों गोरे सिपाहियों को झांसा देकर किसी तरह से बाग में घुसने में सफल हो गये। बड़े प्रयत्न से और बड़ा जोखिम लेकर रात्रि के अंधेरे में लाशों के ढेर में किसी प्रकार वे दोनों वांछित लाश को पहचानने में सफल हो गये। लेकिन धर्मपरायण रत्नादेवी ने जैसे ही पति की खून से लथपथ लाश देखी तो उसकी चीख निकल गयी। वह भूल गयी कि उसने ऊधम सिंह को क्या वचन दिया था? उसकी चीख को सुनते ही गोरे सिपाहियों ने गोली चला दी, जो ऊधम सिंह के बाजू में आकर लगी, पर उस शेर ने अपनी पगड़ी उतारी और बाजू को कसकर बांध लिया। इस बहन के पति की लाश को उठाकर किसी तरह बाहर ले आया और उसे रत्नादेवी को अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया। पर उसने इस हत्याकांड के हीरो अंग्रेज जनरल ओडायर को मारने का संकल्प ले लिया।
दो बार विदेश यात्रा की
अंग्रेज ओडायर ने 14 अप्रैल को भी जलियांबाला बाग पर विमानों से बमबारी की थी। जब उसे इस घटना की जांच कर रही हंटर कमेटी के समक्ष प्रस्तुत किया गया था तो उसने बड़े गर्व से कहा था कि मैंने गोलियां बड़ी सावधानी से इस प्रकार चलवाई थीं कि कोई भी गोली खाली ना जाए और प्रत्येक गोली से कोई न कोई भारतीय मरना ही चाहिए।
इस प्रकार की अंग्रेजों की मानसिकता से भारतीयों को मुक्ति दिलाने के लिए भारत मां का यह अमर सपूत ऊधम सिंह भारत से अफ्रीका और अफ्रीका से अमरीका चला गया। वहां उन्होंने क्रांतिकारी साथियों को खोजना आरंभ किया। उनकी बहादुरी की चर्चा भगत सिंह व चंद्रशेखर जैसे क्रांतिकारियों के कानों तक भी जा पहुंची थी, उन्होंने इसलिए इन्हें स्वदेश बुला लिया। ऊधम सिंह के साथ अमरीका से 25 साथी भारत आए, जिनमें एक अमेरिकन युवती भी थी, जिसे स्वदेश लौटने के लिए ऊधम सिंह ने भी कहा था परंतु वह गयी नही और उनके साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में लग गयी। वह युवती इस महान क्रांतिकारी की त्याग और तपस्यामयी राष्ट्र
भक्ति से अत्यंत प्रभावित थी।
1928 में एक बार लाहौर के पास वह युवती और भगत सिंह के दो अन्य क्रांतिकारी साथी एक तांगे में बैठकर कहीं जा रहे थे तभी वहां अचानक पुलिस आई और उसने वह तांगा रोक लिया। भगत सिंह वस्तु स्थिति को ताड़ गये उन्होंने उस युवती से तथा अपने साथियों से अजनबी बने रहने का संकेत किया और उन तीनों ने ऐसा ही किया भी कि वे भगत सिंह को नही जानते। इसलिए पुलिस भगत सिंह को उनकी एक संदूक के साथ पकड़कर थाने ले गयी। वहां संदूक खोला गया तो उसमें 400 कारतूस मिले। जिन्हें लेकर ऊधम सिंह को 4 साल की सजा सुनाई गयी। 1932 में भारत मां का ये शेर सजा काटकर बाहर आया। तब उन्होंने फिर विदेश का रास्ता पकड़ा। इस बार वे लंदन गये और अपने शिकार ओडायर की तलाश में रहने लगे। दिन रात ये अपने शिकार का काम तमाम करने के लिए योजनाएं बनाते और उन्हीं में व्यस्त रहते। डूब जाते अपनी योजना को सिरे चढ़ाने की योजनाओं में।
अंतत: 1940 में वह घड़ी आई ही गयी। जब 13 मार्च 1940 की शाम को कैक्सन हॉल की कांफ्रेंस में ओडायर के द्वारा एक सभा को संबोधित करने की सूचना उन्हें मिली। वह उस हॉल में जाकर पीछे की ओर बैठ गये। सभा में ओडायर भारत के विषय में भी बोला और जलियांबाला बाग के हत्याकांड की चर्चा भी उसने की। अपने भाषण में वह भारतीयों को कायर तक कह गया था। इसके भाषण की समाप्ति 4 बजकर 30 मिनट पर हुई थी। जैसे ही वह मंच से उठकर चला तो ऊधम सिंह ने अपने रिवाल्वर को अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों में और महत्वपूर्ण कार्य के लिए अंतिम बार बड़े प्यार से देखा और ओडायर के निकट आकर 6 गोलियां उस पर दाग दीं। दो गोली उस क्रूर अंग्रेज को सदा के लिए शांत करती हुई भारत के जलियांबाला बाग के शहीदों को अपना अंतिम लेकिन गौरवमयी सलाम करती हुई निकल गयीं।
कई क्रूर अंग्रेजों को भी घायल किया
ऊधम सिंह की गोलियों ने लार्ड जैटलैण्ड, लार्ड लेमिंगटन और मि. लुईडेन को भी घायल किया था। लुईडेन पंजाब का गवर्नर रहा था। ऊधम की गोली ने इसकी बांह तोड़ दी थी। लार्ड लेमिंगटन बंबई का गवर्नर रहा था, जिसे एक बार दुर्गा भाभी भी मारने के लिए बंबई गयी थीं। आज उसे भी लहुलुहान कर ऊधम सिंह ने भाभी की दुआएं ले ली थीं। जबकि जैटलैण्ड भारतमंत्री रहा था। वह भी बड़ा क्रूर था आज उसे भी घायल कर ऊधम सिंह ने भारत के शेरत्व का परिचय दिया था। इस प्रकार एक शिकार की ओट में ऊधम सिंह ने कई शिकारों को भारत का सही परिचय दे दिया था। सारी सभा में सन्नाटा छा गया, तभी एक अंग्रेज महिला ऊधम सिंह के सामने आ गयी। उस पर भारत मां के इस अमर सपूत ने हमला नही किया और संकट के क्षणों में भी भारत के जीवन मूल्यों का परिचय दिया।
मुकदमे के पश्चात जीवन होम
अंग्रेजों ने औपचारिकता के लिए ऊधम सिंह के विरूद्घ मुकदमा चलाया। जब उनसे उनका नाम पूछा गया तो मां भारती के इस सच्चे आराधक ने अपना नाम ‘राम मुहम्मद सिंह आजाद’ बताया। परंतु बाद में तहकीकात करने से पता चला कि उनका वास्तविक नाम ऊधम सिंह है, जो कि पहले भारत में भी जेल काट चुका है। ‘ओल्ड वेली सेंट्रल क्रिमिनल मार्ट’ नामक न्यायालय में चले मुकदमे में सारी जूरी के जज ऊधम सिंह के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त थे। उनके सामने फिर भी उन्होंने बड़ी निर्भीकता से कह दिया कि उन्हें अपने किये का कोई पाश्चाताप नही है। क्योंकि भारत मां के साथ और मेरे देशवासियों के साथ अब से पूर्व जो कुछ किया गया है उसकी प्रतिक्रिया में ही मैंने यह कार्य किया है। ओडायर के साथ जो कुछ किया गया है वह वास्तव में उसी के योग्य था। उन्होंने अंग्रेजों से पूछा था कि क्या लार्ड जैटलैण्ड अभी तक नही मरे? मैंने उन्हें यहां (अपने पेट से कपड़ा उठाकर) गोली मारी थी। ।इस प्रकार की निर्भीकता को देखकर ऊधम सिंह को जजों ने प्राणदण्ड देने का फैसला किया और 12 जून 1940 को फांसी की सजा सुना दी गई और 31 जुलाई 1940 को उन्हें ‘पेंटनविले जेल’ में फाँसी दे दी गयी।
इस प्रकार भारत मां का एक अमर सपूत, भारत मां का एक अमर क्रांतिकारी भारत मां के सम्मान के लिए उसके गौरव के लिए तथा मां की महिमा के लिए अपना आत्मोत्सर्ग दे गया। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए थे। ऊधमसिंह की अस्थियाँ सम्मान सहित भारत लायी गईं। उनके गाँव में उनकी समाधि बनी हुई है।स्वतंत्रा पूर्व उन जैसे लोगों को अंग्रेज और उनके कुछ स्वामिभक्त चाटुकार भारतीय उग्रवादी कहा करते थे और उनके प्रयासों को तथा राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत कार्यों को कम करके आंकते थे। पर आज तो हम आजाद हैं, हम पर किसी का शासन नही है, तब भी हम अपने क्रांतिकारी और इस देश के कोहिनूरों को कम करके क्यों आंक रहे हैं? भारत का युवा इन महान क्रांतिकारियों की जीवनियों से क्यों वंचित रखा जा रहा है? इतिहास की गौरवमयी कोख में छिपे इन अनमोल हीरों को जनसाधारण से आखिर क्यों छिपाया जा रहा है ?
कौन देगा धधकते हुए इन प्रश्नों का उत्तर?
यह भारत ऊधम सिंह का भारत तब तक नही बनेगा जब तक हम अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए शत्रु को उसके घर तक जाकर मारने के लिए तैयार नही होंगे, तब तक हमारा देश ेविश्व-बिरादरी में दब्बू ही बना रहेगा। चीन हमारी सीमा में घुसकर 19 किलोमीटर तक सड़क बना ले ( यह घटना संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन अर्थात मनमोहन सिंह सरकार के समय की है )और हमें पता तक भी नही चले, इसे देखकर शहीद ऊधम सिंह की आत्मा स्वर्ग में भी तड़फ रही होगी, और यह देखकर तो और भी दुखी हो रही होगी कि इस देश पर शासन भी एक सरदार का है। इस देश को सरदार तो चाहिए, पर मनमोहन सिंह नही अपितु ऊधम सिंह चाहिए। आओ, चलो बनाएं फिर ऊधम सिंह के सपनों का भारत। इसके लिए इतिहास के छुपे इन अनमोल हीरों को आज की युवा पीढ़ी के सामने उनके वास्तविक स्वरूप में लाना ही पड़ेगा, अन्यथा मां भारती के ऋण से कभी उऋण नही हो पाएंगे।

आजादी के असली नायक कौन : काँग्रेस या गुमनाम कर दिये गये सेनानी व शहीद ?


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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
नेताजी सुभाषचंद्र बोस के रहस्यात्मकता से गायब हो जाने के पश्चात बने जाँच आयोगों की तथाकथित सार्थकता, गंभीरता व सत्यता का विश्लेषण करने की जरुरत है। जिसके अंतर्गत काँग्रेस और इसके पुरोधाओं के असली कुरूप व निकृष्ट चरित्र का यथासंभव किंतु ऐतिहासिक सबूतों सहित तथ्यात्मक पोस्टमार्टम ही किया जाना है। 
देश आजाद होने के बाद संसद में कई बार माँग उठती है कि कथित विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए सरकार कोशिश करेे मगर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू इस माँग को प्रायः दस वर्षों तक टालने में सफल रहते हैं। भारत सरकार इस बारे में ताईवान सरकार (फारमोसा का नाम अब ताईवान हो गया है) से भी सम्पर्क नहीं करती।
अन्त में जनप्रतिनिगण जस्टिस राधाविनोद पाल की अध्यक्षता में गैर-सरकारी जाँच आयोग के गठन का निर्णय लेते हैं। तब जाकर नेहरूजी 1956 में भारत सरकार की ओर से जाँच-आयोग के गठन की घोषणा करते हैं।
लोग सोच रहे थे कि जस्टिस राधाविनोद पाल को ही आयोग की अध्यक्षता सौंपी जायेगी। विश्वयुद्ध के बाद जापान के युद्धकालीन प्रधानमंत्री सह युद्धमंत्री जनरल हिदेकी तोजो पर जो युद्धापराध का मुकदमा चला था, उसकी ज्यूरी (वार क्राईम ट्रिब्यूनल) के एक सदस्य थे- जस्टिस पाल।
मुकदमे के दौरान जस्टिस पाल को जापानी गोपनीय दस्तावेजों के अध्ययन का अवसर मिला था, अतः स्वाभाविक रुप से वे उपयुक्त व्यक्ति थे जाँच-आयोग की अध्यक्षता के लिए मगर नेहरूजी को आयोग की अध्यक्षता के लिए सबसे योग्य व्यक्ति शाहनवाज खान नजर आते हैं।

शाहनवाज खान- उर्फ, लेफ्टिनेण्ट जनरल एस.एन. खान। कुछ याद आया? जी हाँ बॉलीवुडी शाहरूख़ खान की माँ लतीफ़ फातमा का पिता यानि शाहरूख़ खान का नाना तथा आईएनए / आजाद हिन्द फौज का तथाकथित मेजर जनरल शाहनवाज़ खान .
मेजर जनरल शाहनवाज़ खान, आजाद हिन्द फौज के भूतपूर्व सैन्याधिकारी, जो शुरु में नेताजी के दाहिने हाथ थे, मगर इम्फाल-कोहिमा फ्रण्ट से उनके विश्वासघात की खबर आने के बाद नेताजी ने उन्हें रंगून मुख्यालय वापस बुलाकर उनका कोर्ट-मार्शल करने का आदेश दे दिया था।
उनके बारे में यह भी बताया जाता है कि कि लाल-किले के कोर्ट-मार्शल में उन्होंने खुद यह स्वीकार किया था कि आई.एन.ए./आजाद हिन्द फौज में रहते हुए उन्होंने गुप्त रुप से ब्रिटिश सेना को मदद ही पहुँचाने का काम किया था। यह भी जानकारी मिलती है कि बँटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गये थे, मगर नेहरूजी उन्हें भारत वापस बुलाकर अपने मंत्रीमण्डल में उन्हें सचिव का पद देते हैं।
विमान-दुर्घटना में नेताजी को मृत घोषित कर देने के बाद शाहनवाज खान को नेहरू मंत्रीमण्डल में मंत्री पद (रेल राज्य मंत्री) प्रदान किया जाता है।
आजादी के असली नायक कौन? काँग्रेस या गुमनाम कर दिये गये सेनानी व शहीद ? भाग - 2
Image may contain: 2 people, people sitting and indoor1970 में (11 जुलाई) एक दूसरे आयोग का गठन करना पड़ता है। यह इन्दिराजी का समय है। इस आयोग का अध्यक्ष जस्टिस जी.डी. खोसला को बनाया जाता है।
जस्टिस घनश्याम दास खोसला के बारे में तीन तथ्य जानना ही काफी होगा:
1. वे नेहरूजी के मित्र रहे हैं;
2. वे जाँच के दौरान ही श्रीमती इन्दिरा गाँधी की जीवनी लिख रहे थे, और
3. वे नेताजी की मृत्यु की जाँच के साथ-साथ तीन अन्य आयोगों की भी अध्यक्षता कर रहे थे।
सांसदों के दवाब के चलते आयोग को इस बार ताईवान भेजा जाता है। मगर ताईवान जाकर जस्टिस खोसला किसी भी सरकारी संस्था से सम्पर्क नहीं करते- वे बस हवाई अड्डे तथा शवदाहगृह से घूम आते हैं। कारण यह है कि ताईवान के साथ भारत का कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं है।
हाँ, कथित विमान-दुर्घटना में जीवित बचे कुछ लोगों का बयान यह आयोग लेता है, मगर पाकिस्तान में बसे मुख्य गवाह कर्नल हबिबुर्रहमान खोसला आयोग से मिलने से इन्कार कर देते हैं।
खोसला आयोग की रपट पिछले शाहनवाज आयोग की रपट का सारांश साबित होती है।
अब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री हैं, दो-दो जाँच आयोगों का हवाला देकर सरकार इस मामले से पीछा छुड़ाना चाह रही थी, मगर न्यायालय के आदेश के बाद सरकार को तीसरे आयोग के गठन को मंजूरी देनी पड़ती है।
इस बार सरकार को मौका न देते हुए आयोग के अध्यक्ष के रुप में (अवकाशप्राप्त) न्यायाधीश मनोज कुमार मुखर्जी की नियुक्ति खुद सर्वोच्च न्यायालय ही कर देता है।
जहाँ तक हो पाता है, कांग्रेसियों की सरकार मुखर्जी आयोग के गठन और उनकी जाँच में रोड़े अटकाने की कोशिश करती है, मगर जस्टिस मुखर्जी जीवट के आदमी साबित होते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी वे जाँच को आगे बढ़ाते रहते हैं।
आयोग सरकार से उन दस्तावेजों (“टॉप सीक्रेट” पी. एम. ओ. फाईल 2/64/78-पी.एम.) की माँग करता है, जिनके आधार पर 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संसद में बयान दिया था, और जिनके आधार पर कोलकाता उच्च न्यायालय ने तीसरे जाँच-आयोग के गठन का आदेश दिया था। प्रधानमंत्री कार्यालय और गृहमंत्रालय दोनों साफ मुकर जाते हैं- ऐसे कोई दस्तावेज नहीं हैं,,होंगे भी तो हवा में गायब हो गये!
आप यकीन नहीं करेंगे कि जो दस्तावेज खोसला आयोग को दिये गये थे, वे दस्तावेज तक मुखर्जी आयोग को देखने नहीं दिये जाते, ‘गोपनीय’ एवं ‘अति गोपनीय’ दस्तावेजों की बात तो छोड़ ही दीजिये। प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, सभी जगह से नौकरशाहों का यही एक जवाब-
“भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को आयोग को नहीं दिखाने का“प्रिविलेज” उन्हें प्राप्त है!”
भारत सरकार के रवैये के विपरीत ताईवान सरकार मुखर्जी आयोग द्वारा माँगे गये एक-एक दस्तावेज को आयोग के सामने प्रस्तुत करती है। चूँकि ताईवान के साथ भारत के कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं हैं, इसलिए भारत सरकार किसी प्रकार का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दवाब ताईवान सरकार पर नहीं डाल पाती है।
हाँ, रूस के मामले में ऐसा नहीं है। भारत का रूस के साथ गहरा सम्बन्ध है, अतः रूस सरकार का स्पष्ट मत है कि जब तक भारत सरकार आधिकारिक रुप से अनुरोध नहीं भेजती, वह आयोग को न तो नेताजी से जुड़े गोपनीय दस्तावेज देखने दे सकती है और न ही कुजनेत्स, क्लाश्निकोव- जैसे महत्वपूर्ण गवाहों का साक्षात्कार लेने दे सकती है। आप अनुमान लगा सकते हैं- आयोग रूस से खाली हाथ लौटता है।
Image may contain: one or more people and outdoorक्या आप मान सकते हैं कि आजाद भारत मे एक जगह ऐसी भी है,जहां भारत माता की जय और वंदेमातरम कहने पर सजा दी जाती है,प्रताणित किया जाता है ?
जी हाँ , यह बात सौ फीसदी सही है,दुरूस्त है। राष्ट्रवादी मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी के उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले मे बेलथरा रोड तहसील के G.m.inter College मे यह सब होता है।
बलिया ज़िला जहा से कभी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिह जी सांसद हुआ करते थे !
G.m.inter College मे पढ रहे सैकड़ो छात्रों का ऐसा आरोप है कि इस काॅलेज मे अगर कोई छात्र भारत माता की जय घोष करता है तो उसको यहा के शिक्षकों और प्रिंसीपल द्वारा सजा दी जाती है,शिक्षक उन विद्यार्थियों को मारते-पीटते है और उनके नंबर प्रेक्टीकल परिक्षा मे काट दिये जाते है!
छात्रों द्वारा वंदेमातरम कहने पर उनको मुर्गा बना दिया जाता है,उनको कक्षा से बाहर कर दिया जाता है, वंदेमातरम कहने पर कई छात्रों को तो परिक्षा मे बैठने तक नही दिया गया!काॅलेज मे प्रति दिन होने वाली प्रार्थना तक नही करने दी जाती है,क्योकि काॅलेज की इमारत का डिजाइन मस्जिद के आकार मे बना है।
जब कुछ पत्रकारों ने काॅलेज के मुख्य अध्यापक से इस विषय मे जानना चाहा तो उनका कहना था कि वंदेमातरम और भारत माता की जय के बारे मे कोई सरकारी आदेश नही आया है,इस लिए हम सजा देते है और रही बात काॅलेज मे प्रार्थना करने की तो यह इस्लाम में हराम है इसलिए यह सब यहां मनाही है।
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बंगाल भारतीय जनता पार्टी नेता चंद्रकुमार बोस ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर तीखा हमला करते हुए कह.....


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कांग्रेस का हाथ आतंकवादियों के साथ आज पूरे देश में ये कथन सत्य होता दिख रहा है. कांग्रेस के नेता मणिशंकर ऐय्यर पाकि....

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भाजपा के प्रमुख बड़े नेताओं में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सबसे पहले आते है। कश्मीर में धारा 370 को खत्म करने या उस पर .....
कुछ स्थानिय अखबारों में यह खबर छपने के बाद D.M. ने फौरी तौर पर जांच के आदेश दिए तो जांच करने गये अधिकारी मुख्य अध्यापक के साथ काॅलेज मे दोपहर का भोजन करने मे मशगूल थे ।
योगी जी आप तो राष्ट्रवादी है,आप के उत्तर प्रदेश में यह कैसा तालिबानी फरमान जारी किया गया है।
उत्तर प्रदेश को अफगानिस्तान बनने से बचा लो,वर्ना यह तालिबानी संस्कृति उत्तर प्रदेश को नेस्तनाबूत करके रख देगी !!
मंगल पांडे को फाँसी❓
तात्या टोपे को फाँसी❓
रानी लक्ष्मीबाई को अंग्रेज सेना ने घेर कर मारा❓ 
भगत सिंह को फाँसी❓
सुखदेव को फाँसी❓
राजगुरु को फाँसी❓
चंद्रशेखर आजाद का एनकाउंटर अंग्रेज पुलिस द्वारा❓
सुभाषचन्द्र बोस को गायब करा दिया गया❓
भगवती चरण वोहरा बम विस्फोट में मृत्यु❓
रामप्रसाद बिस्मिल को फाँसी❓
अशफाकउल्लाह खान को फाँसी❓
रोशन सिंह को फाँसी❓
लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज में मृत्यु❓
वीर सावरकर को कालापानी की सजा❓
चाफेकर बंधू (३ भाई) को फाँसी❓
मास्टर सूर्यसेन को फाँसी❓

ये तो कुछ ही नाम है जिन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम और इस देश की आजादी में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया❓


कई वीर ऐसे है हम और आप जिनका नाम तक नहीं जानते ❓

स्वयंसेवकों का भारतमाता के लिए बलिदान

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
बैठा कुछ पुरानी क्लिपिंग्स में यादों को टटोल रहा था कि पाञ्चजन्य साप्ताहिक की क्लिपिंग हाथ लग गयी, सोंचा कहीं ख़राब न हो जाए, ब्लॉग पर डाल दिया जाए। ताकि मूर्खों के समूह संघ की मूर्खता जगजाहिर कर संघ को देशद्रोही कहने वालों पर तमाचा पड़ सके। सम्भव हो, कि आम स्वयंसेवक से लेकर संघचालक जी को नागवार गुजरे। गुजरनी भी चाहिए। वैसे सबकी अपनी अलग सोंच हैं, मेरी अलग।
Image result for जनता की सहायता करता आरएसएस जिसका जब मन चाहा बोल दिया "संघ देशद्रोही है", "ब्रिटिशर्स से मिले हुए थे", "गोडसे संघ से जुड़ा हुआ था"  आदि आदि लांछन लगाते रहते हैं। संघ बस एक विज्ञप्ति दे संतोष कर बैठ जाते हैं। कभी संघ को कलंकित करने वालों के अब से पूर्व यानि मोदी सरकार बनने पर, ("केवल एक अपवाद को छोड़कर जब आजतक चैनल द्वारा विवादित बयान देने पर झंडेवालान स्थित वीडियोकोन टावर पर आजतक के विरुद्ध जबरदस्त प्रदर्शन किया था। तब समस्त मीडिया ने "संघ का मीडिया पर हमला"  खूब उछाल कर संघ को बदनाम करने का षड्यंत्र किया था।") खुलकर बोलना प्रारम्भ किया है।
 संघ ने किसी एनजीओ से कहीं अधिक जनहित में कार्य किए हैं, जिन पर ग्रंथ रचित किये जा सकते हैं। एनजीओ तो किसी काम को करने से पूर्व वित्तीय सहायता करने को तलाशते हैं, लेकिन संघ किसी भी विपत्ति के समय देरी किये बिना किसी भेदभाव के अपने स्वयंसेवकों को जनता एवं सरकार की सहायतार्थ घटना स्थल पर जाने का आदेश दे देता है। जब निक्कर धारी संघी अपनी सेवाएँ अर्पित कर रहा होता है, किसी को कष्ट नहीं होता, हर कोई निक्करधारियों से हाथ मिलाता नज़र आता है। परन्तु राजनीती आते ही संघ राष्ट्र-विरोधी और न जाने कितने नामों से अलंकृत करते रहते हैं। संघ विरोधी संघ की चाहे जितनी आलोचना कर लें, लेकिन कभी जेएनयू की तरह देश-विरोधी नारे लगाते नहीं देखा होगा। अगर देखा हो, बताने का कष्ट करें। मेरे ज्ञान में वृद्धि होगी।
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बिना भेदभाव के जनता सेवा करते निक्करधारी 
एक नज़र डालते हैं, इस साम्प्रदायिक संघ पर 
साल 1925 में दशहरे के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी. सांप्रदायिक हिंदूवादी, फ़ासीवादी और इसी तरह के अन्य शब्दों से पुकारे जाने वाले संगठन के तौर पर आलोचना सहते और सुनते हुए भी संघ परिवार को कई दशक हो चुके हैं.
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सुनामी में पीड़ितों की सहायता करते निक्करधारी 
दुनिया में शायद ही किसी संगठन की इतनी आलोचना की गई होगी जितनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की की गई होगी. वह भी बिना किसी आधार के. संघ के ख़िलाफ़ लगा हर आरोप आख़िर में पूरी तरह कपोल-कल्पना और झूठ साबित हुआ है. ऐसे कई मौके आये हैं जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बिना किसी भेदभाव के अपने मूल कर्तव्यों का पालन करते हुए लोगों की सहायता की है चाहे वह भूकंप का समय हो या फिर भयंकर बाढ़ का.
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संकट के समय जनसेवा में लिप्त स्वयंसेवक 
जब साल 1962 में देश पर चीन का आक्रमण हुआ था. तब भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था.
संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर साल 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रखी. उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे. विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे.
Image result for  आरएसएस राहत कार्य सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा. स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी - सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता. जवाहर लाल नेहरू को साल 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ा.
परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए. निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- "यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है और विशेष रूप से साल 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया."
Image result for जनता की सहायता करता आरएसएस कश्मीर के महाराजा हरि सिंह विलय का फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेष में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार तो - हम क्या करें वाली मुद्रा में - मुंह बिचकाए बैठी थी. सरदार पटेल ने गुरु गोलवलकर से मदद मांगी.
Image result for  आरएसएस राहत कार्य गुरुजी श्रीनगर पहुंचे, महाराजा से मिले. इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दिया.
पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया था. शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके. घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक थे. युद्ध के दौरान कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया था.
दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी. 21 जुलाई साल 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गई. संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त साल 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया और पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया.
संघ के स्वयंसेवक साल 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे. गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन शुरू किया, जिसका परिणाम जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाए जाने में निकला. हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ.
साल 1975 से साल 1977 के बीच आपातकाल के ख़िलाफ़ संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में संघ की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए ताज़ा है. सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाना शुरु किया. आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं -नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम संघ कार्यकर्ताओं ने संभाला. जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से चल सकी थीं.
साल 1955 में बना भारतीय मज़दूर संघ शायद विश्व का पहला ऐसा मज़दूर आंदोलन था, जो विध्वंस के बजाए निर्माण की धारणा पर चलता था. कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही शुरू किया था. आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन है.
जहां बड़ी संख्या में ज़मींदार थे उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैं. संघ के स्वयंसेवक शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी बने.
भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना. विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है.
केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं. संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैं.
अकेला सेवा भारती देश भर के दूरदराज़ के और दुर्गम इलाक़ों में सेवा के एक लाख से ज़्यादा काम कर रहा है. लगभग 35 हज़ार एकल विद्यालयों में 10 लाख से ज़्यादा छात्र अपना जीवन संवार रहे हैं. सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से अनाथ हुए 57 बच्चों को गोद लिया है जिनमें 38 मुस्लिम और 19 हिंदू बच्चे हैं.
साल 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चंक्रवात से लेकर भोपाल की गैस त्रासदी तक, साल 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक - संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है.
प्रस्तुत है पाञ्चजन्य का लेख  
27 नवम्बर/इतिहास-स्मृति
कोटली के अमर बलिदानी
‘हंस के लिया है पाकिस्तान, लड़ के लेंगे हिन्दुस्तान’ की पूर्ति के लिए नवनिर्मित पाकिस्तान ने 1947 में ही कश्मीर पर हमला कर दिया। देश रक्षा के दीवाने संघ के स्वयंसेवकों ने उनका प्रबल प्रतिकार किया। उन्होंने भारतीय सेना, शासन तथा जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह को इन षड्यन्त्रों की समय पर सूचना दी। इस गाथा का एक अमर अध्याय 27 नवम्बर, 1948 को कोटली में लिखा गया, जो इस समय पाक अधिकृत कश्मीर में है।
युद्ध के समय भारतीय वायुयानों द्वारा फेंकी गयी गोला-बारूद की कुछ पेटियां शत्रु सेना के पास जा गिरीं। उन्हें उठाकर लाने में बहुत जोखिम था। वहां नियुक्त कमांडर अपने सैनिकों को गंवाना नहीं चाहते थे, अतः उन्होंने संघ कार्यालय में सम्पर्क किया। उन दिनों स्थानीय पंजाब नैशनल बैंक के प्रबंधक श्री चंद्रप्रकाश कोटली में नगर कार्यवाह थे। उन्होंने कमांडर से पूछा कि कितने जवान चाहिए ? कमांडर ने कहा - आठ से काम चल जाएगा। चंद्रप्रकाश जी ने कहा - एक तो मैं हूं, बाकी सात को लेकर आधे घंटे में आता हूं।
चंद्रप्रकाश जी ने जब स्वयंसेवकों को यह बताया, तो एक-दो नहीं, 30 युवक इसके लिए प्रस्तुत हो गये। कोई भी देश के लिए बलिदान होने के इस सुअवसर को गंवाना नहीं चाहता था। चंद्रप्रकाश जी ने बड़ी कठिनाई से सात को छांटा; पर बाकी भी जिद पर अड़े थे। अतः उन्हें ‘आज्ञा’ देकर वापस किया गया। सबने अपने आठों साथियों को सजल नेत्रों से विदा किया।
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संघ विषयों पर विशेषज्ञ या शोधकर्ता तो नहीं, लेकिन यदाकदा संघ सम्बन्धी समाचार से अवगत होने पर अपने नोट पैड पर सुरक्षित करता रहता हूँ। लगभग ह...
nigamrajendra28.blogspot.com
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस पर अक्सर देश विरोधी होने का आरोप लगता है। इस तरह के घृर्णित आरोप लगाने वालों को संघ की प्रार्थना के भावार्...
nigamrajendra28.blogspot.com
सैनिक कमांडर ने उन आठों को पूरी बात समझाई। भारतीय और शत्रु सेना के बीच में एक नाला था, जिसके पार वे पेटियां पड़ी थीं। शाम का समय था। सर्दी के बावजूद स्वयंसेवकों ने तैरकर नाले को पार किया तथा पेटियां अपनी पीठ पर बांध लीं। इसके बाद वे रेंगते हुए अपने क्षेत्र की ओर बढ़ने लगे; पर पानी में हुई हलचल और शोर से शत्रु सैनिक सजग हो गये और गोली चलाने लगे। इस गोलीवर्षा के बीच स्वयंसेवक आगे बढ़ते रहे।
इसी बीच श्री चंद्रप्रकाश और श्री वेदप्रकाश को गोली लग गयी। उस ओर ध्यान दिये बिना बाकी छह स्वयंसेवक नाला पारकर सकुशल अपनी सीमा में आ गये और कमांडर को पेटियां सौंप दी। अब अपने घायल साथियों को वापस लाने के वे फिर नाले को पार कर शत्रु सीमा में पहुंच गये। उनके पहुंचने तक उन दोनों वीर स्वयंसेवकों के प्राण पखेरू उड़ चुके थे। स्वयंसेवकों ने उनकी लाश को अपनी पीठ पर बांधा और लौट चले। यह देख शत्रुओं ने गोलीवर्षा तेज कर दी। इससे एक स्वयंसेवक और मारा गया।
उसकी लाश को भी पीठ पर बांध लिया गया। तब तक एक अन्य गोली ने चौथे स्वयंसेवक की कनपटी को बींध दिया। वह भी मातृभूमि की रक्षा हित बलिदान हो गया। इस दल के वापस लौटने का दृश्य बड़ा कारुणिक था। चार बलिदानी स्वयंसेवक अपने चार घायल साथियों की पीठ पर बंधे थे। जब उन्हें चिता पर रखा गया, तो ‘भारत माता की जय’ के निनाद से आकाश गूंज उठा। नगरवासियों ने फूलों की वर्षा की।
इन स्वयंसेवकों का बलिदान रंग लाया। उन पेटियां से प्राप्त सामग्री से सैनिकों का उत्साह बढ़ गया। वे भूखे शेर की तरह शत्रु पर टूट पड़े। कुछ ही देर में शत्रुओं के पैर उखड़ गये और चिता की राख ठंडी होने से पहले ही पहाड़ी पर तिरंगा फहराने लगा। सेना के साथ प्रातःकालीन सूर्य ने भी अपनी पहली किरण चिता पर डालकर उन स्वयंसेवकों को श्रद्धांजलि अर्पित की।