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उत्तर प्रदेश : ‘आर्य समाज का विवाह सर्टिफिकेट मान्य नहीं’: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया संस्था के मंदिरों की जाँच का आदेश, प्रशासन से कहा – इनकी गतिविधियाँ खँगालें


इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गौतमबुद्धनगर और गाजियाबाद के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में विवाह प्रमाण पत्र प्रदान देने वाले आर्य समाज के मंदिरों, सोसायटियों, ट्रस्टों और संस्थाओं की जाँच का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट ने इनके कामकाज और उसके तरीकों की गहन एवं विवेकपूर्ण जाँच करने के लिए कहा है।

दरअसल, न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने यह आदेश पारित किया है। कोर्ट को कई मामलों में पुलिस सत्यापन से पता चला कि बाल विवाह निरोधक अधिनियम और हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए आर्य समाज के मंदिरों द्वारा विवाह किए जा रहे हैं और साथ में प्रमाण पत्र भी जारी किए जा रहे हैं।

ऐसे जोड़ों द्वारा दायर याचिकाओं के साथ दिए गए आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेज जाली पाए गए हैं। यहाँ तक ​​कि नोटरीकृत शपथ पत्र भी फर्जी पाए गए हैं। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि विवाह पंजीकरण अधिकारी ने बिना सत्यापन के फर्जी और अमान्य विवाह प्रमाणपत्र के आधार पर विवाह पंजीकृत कर दिया।

कोर्ट ने कहा, “इस तरह की शादियाँ मानव तस्करी, यौन शोषण और जबरन श्रम को बढ़ावा देती हैं। बच्चे सामाजिक अस्थिरता, शोषण, जबरदस्ती और शिक्षा में व्यवधान के कारण भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक आघात सहते हैं। इसके अलावा ये मुद्दे अदालतों पर बोझ डालते हैं। इसलिए, दस्तावेज़ सत्यापन और ट्रस्टों/सोसायटी की जवाबदेही के लिए एक मजबूत प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है।”

विवाह प्रमाण-पत्र जारी करने वाली 15 ऐसी समितियों/ट्रस्टों/मंदिरों के नामों पर गौर करते हुए न्यायालय ने पाया कि पुलिस सत्यापन के बाद अधिकांश मामलों में यह पाया गया कि या तो समितियाँ धोखाधड़ी कर रही थीं या मुख्यालय से संबद्ध नहीं थीं या विवाह बाल विवाह निषेध अधिनियम और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 का उल्लंघन करके संपन्न किए गए थे।

यहाँ तक ​​कि पार्टियों द्वारा दिए गए विवरण और दस्तावेज भी जाली थे। इसको देखते हुए कोर्ट ने गौतमबुद्धनगर और गाजियाबाद के पुलिस आयुक्तों को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 और बाल विवाह निषेध अधिनियम 1929 के प्रावधानों का उल्लंघन करके विवाह संपन्न कराने में शामिल ट्रस्टों की गहन और विवेकपूर्ण जाँच करने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ताओं ने अपने जीवन की सुरक्षा के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने अपनी याचिका में दलील दी थी कि वे बालिग हैं और उन्होंने आर्य समाज मंदिर में विवाह किया था। मंदिर द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र के आधार पर उन्होंने रजिस्ट्रार के समक्ष विवाह पंजीकरण के लिए आवेदन किया था।

अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने न्यायालय में कहा कि यह विवाह प्रमाण-पत्र आर्य समाज मंदिर ग्रेटर नोएडा द्वारा जारी किया गया प्रतीत होता है। इसमें पुजारी का नाम-पता, मंदिर का पता, गवाहों का विवरण और यह घोषणा नहीं है। इसमें यह भी नहीं बताया गया है कि विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार किया गया है या नहीं। इसलिए प्रमाण-पत्र जाली हो सकता है।

जाली आर्य समाज प्रमाण पत्रों के साथ न्यायालय के समक्ष सुरक्षा की माँग को लेकर लगातार मामले दायर किए जा रहे हैं। इसको देखते हुए कोर्ट ने गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर के सहायक महानिरीक्षक पंजीकरण (स्टाम्प और पंजीकरण) को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा है। इसके साथ ही 1 अगस्त 2023 से 1 अगस्त 2024 के बीच उनके अधिकार क्षेत्र में विवाह के सभी विवरणों को रिकॉर्ड में रखने के लिए भी कहा है।

इसके अलावा महानिरीक्षक स्टाम्प, उत्तर प्रदेश को उसी अवधि के लिए यूपी राज्य में पंजीकृत विवाहों की संख्या को जिलेवार दर्ज करने का निर्देश जारी किया है। हालांँकि, न्यायालय के समक्ष सुझाव रखे गए थे, लेकिन राजधानी लखनऊ के 5 मीराबाई मार्ग पर स्थित आर्य समाज प्रतिनिधि सभा की ओर से कोई भी व्यक्ति कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ।

इसको देखते हुए कोर्ट ने लखनऊ के पुलिस आयुक्त को निम्नलिखित पहलुओं की जाँच करने का निर्देश दिया है-

(i) आर्य समाज प्रतिनिधि सभा के कार्य और गतिविधियों की प्रकृति के बारे में;

(ii) विवाह संपन्न कराने के लिए समितियों को अधिकृत करने की योग्यता;

(iii) ऐसी समितियों की सूची, जो उत्तर प्रदेश राज्य में उनके प्राधिकरण और पर्यवेक्षण के तहत विवाह संपन्न करा रही हैं;

(iv) पूर्ण पता और टेलीफोन नंबर के साथ समिति के पदाधिकारियों की सूची

न्यायालय ने पाया कि आर्य समाज विवाह मान्यता अधिनियम 1937 और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 का उल्लंघन करते हुए फर्जी प्रमाण पत्र जारी करने पर नियंत्रण जरूरी है।

मानसी मामले में कोर्ट का यह निर्देश

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्देश में मानसी व अन्य सहित 42 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आया है। अगली सुनवाई में इन संस्थाओं द्वारा शादी करवाने के लिए ली जाने वाली फीस, विवाह कराने वाले पंजित/पुजारी का नाम-पता आदि की जानकारी कोर्ट के सामने प्रस्तुत करने के लिए कहा है। इन याचिकाओं में याचियों का कहना था कि परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी की गई है।
मानसी मामले में कहा गया है कि उसकी और उसके पति की जान को खतरा है। याचिकाकर्ता मानसी ने सिविल लाइन्स के नवाब यूसुफ रोड पर स्थित रजिस्टर्ड आर्य समाज संस्थान से शादी कर कोर्ट में विवाह का प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया था। इसी मामले को लेकर जज ने यह निर्देश दिया है। यह संस्थान आर्य प्रतिनिधि लखनऊ से संबद्ध होने का दावा करती है।

पहले भी इलाहाबाद हाई कोर्ट उठा चुका है सवाल

इससे पहले जून 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रयागराज के कृष्णानगर स्थित आर्य समाज को निर्देश दिया था कि वह दो महीने की अवधि यानी 20 जून 2023 तक ऐसे विवाह न कराए, जहाँ प्रस्तावित दूल्हा और दुल्हन के परिवारों की सहमति न हो। आर्य समाज ने एक ऐसे व्यक्ति को विवाह प्रमाणपत्र जारी किया था, जिसके खिलाफ लड़की के परिवार ने मामला दर्ज कराया था।
उसमें आरोप लगाया गया था कि लड़के ने लड़की को बहला-फुसलाकर भगाया है और उससे जबरन शादी कर ली है। वहीं, आर्य समाज द्वारा जोड़े को जारी किए गए विवाह प्रमाणपत्र में यह नहीं बताया गया था कि लड़की की उम्र का सत्यापन कैसे किया गया। लड़की के परिवार का दावा था कि वह नाबालिग थी। हालाँकि, आरोपित ने दावा किया था कि लड़की वयस्क है।
इसके पहले जून 2022 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐसी जाँच का आदेश दिया था। उस समय जस्टिस अश्विनी मिश्रा और जस्टिस रजनीश कुमार की खंडपीठ ने प्रयागराज के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को निर्देश दिया था कि वे प्रयागराज के कीडगंज स्थित आर्य समाज के प्रधान संतोष कुमार शास्त्री के माध्यम से विवाह प्रमाण पत्र जारी करने के तरीके और कार्यप्रणाली की जाँच करें।
पीठ ने यह भी कहा था कि इस बात की जाँच की जानी चाहिए क्या शादी संपन्न कराए जा रहे हैं या सिर्फ विवाह प्रमाण पत्र जारी किए जा रहे हैं। संतोष कुमार शास्त्री को पिछले पाँच वर्षों में उनके द्वारा किए गए सभी विवाहों के रजिस्टर पेश करने का भी निर्देश दिया गया था, खासकर अगस्त 2016 में उनके खिलाफ विशिष्ट प्रतिबंध आदेश पारित होने के बाद से।
तब पीठ ने कहा था, “बाहरी कारणों से काम कर रहे एक संगठित रैकेट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है, जिसमें दूसरों की भागीदारी/सहायता संभव है।” दरअसल, इस मामले में याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष दावा किया था कि उसने निजी प्रतिवादी के साथ विवाह किया है और इसलिए उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करना अनुचित है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी उठाया था मामला

इसी तरह का एक मामला साल 2022 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में आया था। केस एक मध्य प्रदेश की मुस्लिम लड़की के अपहरण का था, जिसका आरोप एक हिन्दू लड़के पर था। लड़की को पुलिस ने बरामद कर लिया था, जिसने अपने अम्मी-अब्बू के साथ जाने से मना कर दिया था। लड़की लगातार उस लड़के के साथ जाने की जिद पर अड़ी थी, जिस पर उसके अपहरण का आरोप था।
लड़की ने बाद में गाजियाबाद के आर्य समाज मंदिर में धर्म परिवर्तन कर लिया। लड़की के परिजनों ने अवैध धर्मांतरण बताकर लड़की को लड़के के घर जाने से रोकने की माँग की थी। इस बहस में जस्टिस रोहित आर्य को एक बार कहते सुना गया कि ‘बिलकुल सही बात है।’ दो जजों में एक जज कह रहा था, “ये तमाशा हम स्वीकार नहीं करेंगे। ये अभी जेल जाएगा। तुम काजी के पास जाओ और मुस्लिम बन जाओ। वही ज्यादा अच्छा है। फ्रॉड कर के उसका धर्मांतरण कर दिया, ये कोई तरीका है? किसी मुस्लिम को हिन्दू बना रहे हो, मज़ाक बात है?”
इसी बहस के बीच में 5:30वें मिनट पर जस्टिस रोहित आर्य ने SSP को कुल पुलिस फ़ोर्स उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मामले में कुछ फ्रॉड की आशंका दिखाई दे रही है। इसी क्रम में उन्होंने लड़की को हिन्दू बनाने वाले गाजियाबाद के आर्य समाज मंदिर को मात्र एक ट्रस्ट डीड बना कर रखने वाला बताया। जज ने आर्य समाज मंदिर के वकील से पहले मंदिर की प्रमाणिकता साबित करने को कहा।

आर्य समाज मंदिर में शादी के प्रावधान

दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज में शादियँ हिंदू रीति-रिवाज से ही होती हैं और अग्नि के सात फेरे दिलवाए जाते हैं। इसके बाद एक मैरिज सर्टिफिकेट जारी किया जाता है। आर्य समाज से होने वाली शादियों को आर्य समाज मैरिज वैलिडेशन 1937 और हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के तहत मान्यता देने की बात होती है।
इसमें दूल्हे की उम्र 21 साल से अधिक और दुल्हन की उम्र 18 साल से अधिक होनी चाहिए। इसमें दो अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग भी शादी कर सकते हैं। यहाँ शादी करने वाले जोड़े को पहले रजिस्ट्रेशन कराना होता है। दोनों पक्षों को हलफनामा देना होता है। इसके बाद दोनों के दस्तावेजों को देखने के बाद उनकी शादी आर्य समाज मंदिर में कराई जाती है।
अगर लड़का-लड़की एक ही धर्म का है तो शादी हिंदू एक्ट के तहत मानी जाती है। अगर जोड़ा अलग-अलग धर्म का होता है तो आर्य समाज मैरिज वैलिडेशन एक्ट के तहत उसे मान्यता दी जाती है। हालाँकि, कानूनी तौर पर शादी को तभी वैध माना जाता है जब शादी को एसडीएम कोर्ट में रजिस्ट्रेशन कराया जाता है। 

मुरादाबाद को मुस्लिम बहुल बनाने के लिए 30,000 बांग्लादेशी को घुसाया… फिर दंगों में 83 मौतें: केंद्र+राज्य की कांग्रेस सरकार का No Action – 496 पन्नों की रिपोर्ट

        मुरादाबाद के 1980 दंगों से पहले साजिशन बसाए गए थे अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए (चित्र साभार- ऑर्गेनाइजर)
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 8 अगस्त 2023 को साल 1980 में हुए मुरादाबाद दंगों की जाँच रिपोर्ट पेश की। इस दंगे में कम से कम 83 लोगों की हत्या हुई थी और 112 अन्य घायल हो गए थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश एमपी सक्सेना के एक सदस्यीय पैनल ने इन दंगों पर 496 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की है। जस्टिस सक्सेना की इस रिपोर्ट में दंगों के असल कारणों और उससे हुए नुकसान का जिक्र किया गया था।

तब केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों में ही कांग्रेस की सरकार थी। इस रिपोर्ट में हिंसा के दौरान वहाँ मौजूद न सिर्फ मुस्लिम और हिन्दुओं बल्कि तब तैनात पुलिस अधिकारियों का भी हवाला दिया गया है। दंगे के दौरान दर्ज हुए 6 हिंदुओं की गवाही का भी इस रिपोर्ट में उल्लेख है।

मुरादाबाद दंगों की रिपोर्ट के हर बयान में यह साफ़ है कि नरसंहार की योजना पहले से ही बनाई गई थी। 1980 में हुए इन दंगों के चश्मदीदों में से एक संतोष सरन ने अपनी लिखित गवाही में कहा है कि हिंसा की वजह वोट बैंक और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति थी।

दंगे 13 अगस्त 1980 में भड़के थे। अपनी गवाही में संतोष सरन ने खुलासा किया है कि दंगे भड़कने से पहले 30,000 से अधिक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को सोची समझी साजिश के तहत लाकर बसाया गया था। इन्हें मुरादाबाद के मुस्लिम बहुल गाँवों में रखा गया था।

दंगों की प्रमुख वजह संतोष सरन ने जिले की डेमोग्राफी बदलने की साजिश बताया। सरन के अनुसार 1947 में मिली आजादी के समय मुरादाबाद मुस्लिम बहुल था। तब शहर की आबादी में 52 प्रतिशत मुस्लिम और 48% हिन्दू थे। लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद कई मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे, जिस वजह से आज़ादी के बाद मुरादाबाद हिन्दू बहुल हो गया था। तब यहाँ 52 हिन्दू और 48 प्रतिशत मुस्लिम हो गए थे।

चश्मदीद सरन ने बताया कि कांग्रेस शासन में धीरे-धीरे मुरादाबाद में अवैध बांग्लादेशी मुस्लिमों की लगातार घुसपैठ करवाई गई। इस वजह से एक बार फिर शहर की जनसांख्यिकी बदल गई। इन्हीं अवैध घुसपैठियों को स्थानीय मुस्लिमों ने हिंदुओं के खिलाफ भड़काया।

आरोप यह भी है कि तत्कालीन राज्य और केंद्र की कांग्रेस सरकार ने इन अवैध घुसपैठियों पर कोई एक्शन नहीं लिया। चश्मदीद के मुताबिक कालांतर में इन्हीं अवैध मुस्लिम घुसपैठियों का दबदबा बढ़ता गया और मुरादाबाद में सांप्रदायिक हिंसा होना बहुत आम बात हो गई।

पिछली रिपोर्ट में एक अन्य चश्मदीद दयानंद गुप्ता की गवाही का जिक्र किया गया था। दयानंद के मुताबिक हिंसा की शुरुआत 13 अगस्त 1980 को मुरादाबाद के ईदगाह से हुई थी। इस दौरान मुस्लिम भीड़ ने पुलिस अधिकारियों और दलित समुदाय के वाल्मीकि लोगों पर बेवजह हमला किया था। इसके अलावा न्यायमूर्ति सक्सेना के नेतृत्व में हुई जाँच की रिपोर्ट में भाजपा, RSS व अन्य हिन्दू संगठनों को क्लीन चिट दी गई है।

इसी रिपोर्ट में हिंसा के लिए मुस्लिम लीग के कुछ राजनैतिक लोगों की सांप्रदायिक राजनीति को जिम्मेदार ठहराया गया था और बताया गया कि दंगो की वजह बना सांप्रदायिक उन्माद मुस्लिम लीग और कांग्रेस नेताओं द्वारा रची गई साजिश का परिणाम था। ‘मुरादाबाद में ईद की नमाज के दौरान ईदगाह में सुअर घुसने’ के आरोपों को भी इस रिपोर्ट में पूरी तरह से खारिज किया गया है।

साल 1980 के मुरादाबाद दंगों पर जस्टिस सक्सेना की 496 पन्नों की रिपोर्ट मई 1983 में ही तैयार कर दी गई थी। हालाँकि इतने साल बीत जाने के बाद भी इस रिपोर्ट को एक विभाग से दूसरे सरकारी विभाग तक घुमाया जाता रहा। इसी के साथ पिछले लगभग 4 दशकों में इस जाँच रिपोर्ट को कोई न कोई बहाना बना कर कम से कम 14 बार दबाया गया था।

अवलोकन करें:-

उत्तर प्रदेश : 43 साल बाद सामने आई मुरादाबाद दंगों की सच्चाई: हिंदुओं का हो कत्लेआम इसलिए नमाज में

योगी सरकार से पहले पहले किसी भी सरकार ने इसे सार्वजानिक नहीं किया। आखिरकार योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में UP में चल रही भाजपा सरकार ने 43 साल पुराने इस मामले को खोलने का फैसला लिया है। इसी साल मई में राज्य कैबिनेट ने न्यायमूर्ति एमपी सक्सेना आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करने का फैसला किया और मंगलवार 8 अगस्त को यह रिपोर्ट यूपी विधानसभा में पेश हुई।

दिल्ली : बंगला विवाद : एलजी ने चीफ सेक्रेटरी से 15 दिन में मांगी रिपोर्ट, अब तक विपक्ष से लेकर उपराज्यपाल क्यों ऑंखें बंद कर बैठे रहे?


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बहुरुपिया हैं। टाइम्‍स नाउ नवभारत के ‘ऑपरेशन शीशमहल’ ने केजरीवाल के चेहरे पर से सादगी का मुखौटा हटा दिया है। जनता के सामने सादगी की प्रतिमूर्ति बनकर आने वाले केजरीवाल ने अपने सरकारी आवास के रेनोवेशन पर 45 करोड़ रुपये खर्च किया है। इसे सुनकर हर कोई हैरान है। किसी को भरोसा नहीं हो रहा है कि बड़ा बंगला, गाड़ी और सुरक्षा नहीं लेने की बात करने वाले केजरीवाल जनता के पैसे पर एक शीशमहल में रहते हैं। इस मामले में अब केजरीवाल की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। दिल्ली के एलजी वीके सक्सेना ने मीडिया में आई खबर का संज्ञान लेते हुए रेनोवेशन में हुई वित्तीय अनियमितता की जांच का आदेश दिया है और 15 दिनों में रिपोर्ट देने को कहा है।

ज्वलन्त प्रश्न यह है कि जब कारवां लूट रहा था, विपक्ष से लेकर उपराज्यपाल तक क्यों आंखें बंद किये बैठे रहे? शराब घोटाला हो, स्कूल घोटाला हो या फिर अन्य विपक्ष क्या कर रहा था? अब केजरीवाल का दोषी पाए जाने पर बंगले पर खर्च हुए धन की भरपाई कौन करेगा? चुनाव समाप्त होते ही मामला ठंठे बस्ते में चला जाएगा।  

 

एलजी ऑफिस की ओर से जारी बयान के मुताबिक एलजी वीके सक्सेना के प्रिंसिपल सेक्रेटरी ने मुख्य सचिव को लेटर लिखकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आवास के रेनोवेशन में कथित घोर अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेजों और फाइलों को सुरक्षित रखने और प्रोटेक्टिव कस्टडी में लेने का निर्देश दिया है। इन दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर मुख्य सचिव पीडब्ल्यूडी विभाग में अधिकारियों और मंत्रियों की भूमिका की जांच करेंगे। इस मामले में जांच की जाएगी कि क्या रेनोवेशन के लिए मंजूरी देने में नियमों की अनदेखी की गई है?

इससे पहले बीजेपी ने केजरीवाल पर सरकारी आवास के रेनोवेशन में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाया था। साथ ही बीजेपी ने कहा था कि उपराज्यपाल की छानबीन से बचने के लिए विभिन्न मदों में किए गए व्यय को 10 करोड़ रुपये से नीचे रखा गया। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि दिल्ली सरकार के सामान्य वित्तीय नियमों के अनुसार 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक की परियोजना से संबंधित फाइल उपराज्यपाल के पास भेजी जानी होती है जबकि विभागीय प्रमुख या मंत्री को उससे कम के खर्च को मंजूरी देने का अधिकार है। इसलिए खर्च को 9.99 करोड़ रुपये तक सीमित रखा गया।

केजरीवाल के सरकारी आवास के रेनोवेशन में भ्रष्टाचार से संबंधित खुलासा होने बाद पोस्टर वार भी शुरू हो चुका है। दिल्ली के कई इलाकों में केजरीवाल के खिलाफ पोस्टर लगाए गए हैं। जिसमें लिखा गया है-केजरीवाल के घर का रेनोवेशन 45 करोड़ का, घर का इंटीरियर 11 करोड़ का… ये पैसा तो है मेरे टैक्स का…। ये पोस्टर अब सोशल मीडिया में भी वायरल हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि बेईमान केजरीवाल के शीश महल की सजावट पर 45 करोड़ खर्च करने के खिलाफ दिल्ली की जनता में भारी आक्रोश है। ना गाड़ी लूंगा, ना बंगला लूंगा, ना सुरक्षा लूंगा, ऑटो में लटक कर चलूंगा की बात करने वालों ने अपनी राजनीति का 8 साल में पैमाना ही बदल दिया।