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नागपुर हिंसा में हुआ जितना नुकसान, सबकी भरपाई दंगाइयों की संपत्ति से होगी: CM फडणवीस ने किया ऐलान, कहा- ‘बुलडोजर चलेगा, कोई (दंगाई) नहीं बचेगा’; Blind firing के आदेश देकर पुलिस को नहीं भेजा जाता?


नागपुर में औरंगजेब की कब्र हटाने की माँग को लेकर भड़की हिंसा के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सख्त रुख अपनाया है। देवेंद्र फडणवीस ने शनिवार (22 मार्च 2025) को कहा कि दंगों में हुए नुकसान की भरपाई दंगाइयों से ही होगी।

कश्मीर से जो नकाब में पत्थरबाज़ी करने को आज कहीं भी होने वाले दंगे में देखने को मिल रहा है। ऐसे में सरकार को भी चाहिए कि नकाबपोशों पर पुलिस को blind firing के आदेश देकर इन जेहादियों से लड़ने के लिए भेजना चाहिए। Blind firing के खिलाफ बोलने वालों, चाहे जो भी हो, के भी खिलाफ भी सख्त कार्यवाही करनी होगी। Blind firing से ही पता चलेगा कि बाहरी कौन और स्थानीय कौन? इन दंगाइयों से पूछना चाहिए कि किस आका ने दंगा में पत्थरबाज़ी, पेट्रोल बम बनाने के लिए कितने पैसे दिए? पत्थर सप्लाई किसने किए?   

मुख्यमंत्री ने कहा, “जितना नुकसान हुआ, उसकी कीमत वसूल करेंगे। अगर पैसे नहीं दिए तो उनकी संपत्ति बेच दी जाएगी।” मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुलडोजर एक्शन पर सवाल उठने पर कहा, “महाराष्ट्र में अपने तरीके से कार्रवाई होगी, जहाँ जरूरत पड़ी, बुलडोजर चलेगा। किसी को बख्शा नहीं जाएगा।”

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि अब तक 104 आरोपितों की पहचान हो चुकी है। इनमें से 92 गिरफ्तार किए जा चुके हैं। पकड़े गए लोगों में 12 नाबालिग भी हैं। इस दौरान उन्होंने बताया कि नागपुर हिंसा को लेकर सोशल मीडिया से 68 भड़काऊ पोस्ट हटाई गईं और ऐसे लोगों को भी सह-अभियुक्त बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि हिंसा में मालेगाँव से कुछ पार्टियों के सपोर्ट की बात सामने आई है।

मुख्यमंत्री ने महिला पुलिसकर्मी से छेड़छाड़ के आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि उसके साथ छेड़छाड़ नहीं बल्कि उस पर पत्थरबाजी हुई। देवेंद्र फडणवीस ने दावा किया कि 80% नागपुर शांत है और कर्फ्यू धीरे-धीरे हटेगा। इस बीच, नए सीसीटीवी लगाने की तैयारी भी चल रही है। इस मौके पर उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 30 मार्च को नागपुर की यात्रा पर आ रहे हैं और उनके कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया गया है। बता दें कि पीएम मोदी 30 मार्च 2025 को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय पहुँचेंगे।

इश बीच, नागपुर के डिप्टी कमिश्नर लोहित मतानी ने बताया कि माइनॉरिटीज डेमोक्रेटिक पार्टी के हामिद इंजीनियर और NNTV चलाने वाले मोहम्मद शहजाद को हिंसा भड़काने के आरोप में पकड़ा गया है।

मस्जिद से उकसाने के दावे को ‘भ्रामक’ बताने का क्या आधार, नहीं बता पाई बहराइच पुलिस: जानिए चश्मदीदों के बयान और उसकी मीडिया रिपोर्टिंग को लेकर क्या कहता है कानून

                                 बहराइच दंगे के घायल विनोद मिश्रा और वहाँ की मस्जिद (फोटो: राहुल पाण्डेय)
उत्तर प्रदेश के बहराइच में माँ दुर्गा की प्रतिमा की विसर्जन के दौरान 13 अक्टूबर 2024 को जुलूस पर हमले किए गए थे। इस हमले में कई लोग घायल हो गए थे। वहीं, राम गोपाल मिश्रा नाम के एक शख्स की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना में घटना अन्य हिंदू भी घायल हो हुए थे। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हमले के लिए मुस्लिम भीड़ को मस्जिद से उकसाया गया था।

इस जुलूस में शामिल 70 वर्षीय बुजुर्ग विनोद मिश्रा उन पीड़ितों में हैं, जिन्हें इस हमले में गंभीर चोटें आई थीं। विनोद मिश्रा ने दावा किया था कि मस्जिद से उकसाए जाने के बाद मुस्लिम भीड़ ने हिंदू श्रद्धालुओं पर हमला किया था। उन्होंने कहा, “पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो हिंदू तितर-बितर हो गए। तब, मस्जिद से अल्लाह-हू-अकबर बोला गया और उसके बाद आवाज आई कि जो जहाँ मिले उसे मार दो काट दो।”

उन्होंने आगे कहा, “उधर से 200-300 की संख्या में भीड़ बाँस बल्लम, अवैध असलहे, तमंचे जैसे औजार लेके दौड़ी। सामने हमारी गाड़ी थी। उसे हम इस पार लेकर आने। हमने गाड़ी स्टार्ट की हुई थी ये सोचकर ये सब लोग हमें जानते-पहचानते हैं हमें कुछ नहीं करेंगे। लेकिन वो 5-7 की संख्या में आए और फरसा से वार कर दिया।”

घटना को याद करते हुए विनोद मिश्रा ने आगे कहा, “हमने हाथ उठाया तो वहाँ गहरा घाव हो गया और कुर्ता खून से सराबोर हो गया। हम लहूलुहान थे और उन्होंने तब तक गाड़ी का तार काट दिया। हम इतने में वहाँ से भागने लगे। जब भागे तो उन्होंने लाठी चला दी। हमारी पीठ पर काफी चोट के निशान हैं और हाथ भी टूट गया। बाद में पता चला कि गाड़ी में भी आग लगा दी गई है।”

बहराइच पुलिस ने सोशल मीडिया पर उनके दावे को ‘भ्रामक‘ करार दिया था। बहराइच पुलिस ने ऑपइंडिया की X पोस्ट पर जवाब देते हुए लिखा था, “ऐसे भ्रामक तथ्य जिनके सम्बन्ध में अभी कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं हुआ है, उन्हें बिना जानकारी के प्रसारित न करें । इससे जनपद की कानून व्यवस्था बिगड़ने की प्रबल सम्भावना है जिस पर विधिक कार्यवाही अमल पर लायी जाएगी।”

विनोद मिश्रा के बाद सामने आए दिव्यांग सत्यवान मिश्रा ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि उस दिन मस्जिद से ऐलान हुआ था, “जो हिन्दू जहाँ मिले, उसको काट दो।” उन्होंने बताया है कि इसी ऐलान के बाद मुस्लिमों की भीड़ ने अब्दुल हमीद के घर के आगे मौजूद हिंदू श्रद्धालुओं पर हमला किया था। कट्टरपंथी भीड़ कह रही थी, “ऐ हिन्दुओं, यहाँ से भाग जाओ वरना गोलियों से भून दूँगा।”

इतना ही नहीं, पद्माकर दीक्षित नाम के एक व्यक्ति ने भी इसी तरह का दावा किया है। ऑपइंडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे लोग मूर्ति के साथ आगे बढ़ रहे थे, तभी एक पत्थर आकर लगा। इससे माँ दुर्गा की प्रतिमा का हाथ टूट गया। इस बीच मस्जिद से ऐलान हुआ, “अल्लाह हु अकबर। जो मिले उनको काट दो।” पद्माकर के अनुसार, मुस्लिम भीड़ कह रही थी कि जितना हिंदू मारेंगे, उतना सवाब मिलेगा।

जिस स्टोरी बहराइच पुलिस ने भ्रामक और तथ्यहीन बताया था, उसे कई मीडिया हाउस ने छापा था। ये स्टोरी हमले में घायल विनोद मिश्रा के बयान के आधार पर की गई थी। आजतक से लेकर दैनिक जागरण ने मस्जिद से ऐलान वाली बात पर अपनी खबरें लिखी थीं। दैनिक जागरण की खबर को भी बहराइच पुलिस ने भ्रामक बताते हुए कानूनी कार्रवाई की बात कही थी।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट पर बहराइच पुलिस ने जवाब देते हुए कहा था, “इस समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित सूचना के संबंध में कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं होने के बावजूद इसके प्रसारण का संज्ञान लिया गया है तथा इन्हें विधिक कार्रवाई हेतु नोटिस निर्गत की जा रही है।”

ऑपइंडिया ने पूछे 3 सवाल, बहराइच पुलिस का गोलमोल जवाब

बहराइच में मस्जिद से भीड़ को उकसाने को लेकर ऑपइंडिया द्वारा की गई कवरेज पर पुलिस द्वारा सवाल उठाने के बाद कुछ ऐसे सवाल थे, जो एक मीडिया हाउस को जानना जरूरी था। इसको लेकर ऑपइंडिया ने बहराइच पुलिस से तीन सवाल पूछे थे, जिनका पुलिस ने जवाब भी दिया। इन सवाल और जवाबों को हम यहाँ रख रहे हैं।
प्रश्न 1. क्या विनोद मिश्रा हिंसा के पीड़ित, चश्मदीद हैं? क्या पुलिस ने उनका बयान दर्ज किया है?
उत्तर: बहराइच (महसी) के डिप्टी एसपी रवि खोखर ने बताया कि विनोद मिश्रा ने अभी तक पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई है। जब वो शिकायत दर्ज करवाएँगे, उसके बाद उस पर जाँच होगी।
प्रश्न 2. क्या मस्जिद से उकसाने को लेकर उन्होंने जो दावे किए हैं, उसकी पुलिस ने जाँच की है? यदि की है तो उसका निष्कर्ष क्या निकला है? नहीं की है तो क्या उनके दावों को जाँच में शामिल किया है?
उत्तर: बहराइच की एसपी वृंदा शुक्ला के आधिकारिक फोन नंबर पर ऑपइंडिया ने कॉल किया तो फोन उठाने वाले PRO ने कहा कि मस्जिद से हमले वाली बात गलत है। यह आरोप भ्रमित करने वाला है।
प्रश्न 3. मस्जिद से हमले वाली मीडिया रिपोर्ट्स को बहराइच पुलिस सोशल मीडिया पर भ्रामक बता रही है, इसका आधार क्या है?
उत्तर: बहराइच की एसपी वृंदा शुक्ला के आधिकारिक नंबर पर की गई कॉल को उठाने वाले PRO ने कहा कि इस मामले को लेकर उनका स्टैंड पहले जैसा है।

चश्मदीद के बयान को लेकर क्या कहता है कानून

किसी घटना के पीड़ित/चश्मदीद के बयान पर मीडिया रिपोर्टिंग की जा सकती है या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह का कहना है कि मीडिया किसी भी पीड़ित या चश्मदीद का बयान ले सकती है जब तक कि कानूनी या प्रशासनिक रूप से किसी आदेश के अंतर्गत ऐसे बयान या मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक ना लगी हो। उन्होंने कहा कि सभी बड़े घोटालों का भंडाफोड़ प्रेस द्वारा ही किया गया है।
चश्मदीद को लेकर भारत में कानून भी है। इसको लेकर हमारा कानून क्या कहता है, इस पर रीना सिंह कहती हैं कि मीडिया में दिए गए बयान की कानूनी अहमियत सीमित होती है और अदालत में दिए गए शपथ-पत्रीय बयान को ही मुख्य साक्ष्य माना जाता है। गवाहों की सुरक्षा के लिए गवाह संरक्षण योजना और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश भी गवाहों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।
रीना सिंह कहती हैं कि संविधान के अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को साक्ष्य प्रदान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इसका मतलब ये है कि किसी आरोपित के ख़िलाफ़ गवाह बनने के लिए किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उसे दोषी ठहरा सके। भारतीय कानूनों में चश्मदीद गवाह का बयान बहुत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन उसकी वैधता और विश्वसनीयता अदालत में दी गई गवाही और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ी होती है।
इस अधिनियम के अनुसार, गवाह का बयान महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है। यदि गवाह का बयान सुसंगत और विश्वसनीय है तो उसे निर्णायक साक्ष्य माना जा सकता है। अदालत गवाह से उसकी गवाही लेने के लिए उसे समन भेज सकती है। गवाह के बयान को दोनों पक्षों द्वारा जाँचा और परखा जाता है। यह प्रक्रिया गवाह की विश्वसनीयता की पुष्टि करती है और यदि बयान में विरोधाभास है तो उसका खुलासा करती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 186 (गवाहों के बयान) के अनुसार, पुलिस जाँच के दौरान गवाहों का बयान दर्ज कर सकती है। पुलिस गवाह को उसके निवास स्थान पर जाकर भी बयान दर्ज कर सकती है और ये जरूरी नहीं है कि गवाह थाने आकर ही बयान दे। दरअसल, BNSS (भारतीय न्याय संहिता) में गवाहों की सुरक्षा, गवाही देने की प्रक्रिया हैं।
वहीं, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 179 (गवाह को समन) में कहा गया है कि पुलिस गवाह को नोटिस या समन देकर थाने बुला सकती है। हालाँकि, महिला गवाहों के लिए विशेष प्रावधान है कि उन्हें उनके निवास स्थान पर ही बयान देने की अनुमति होती है और उन्हें थाने आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
इसी तरह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 183 (न्यायिक बयान) के अनुसार, मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान को न्यायिक बयान के रूप में दर्ज किया जाता है। यह बयान बाद में जाँच के दौरान और अदालती कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह विशेषकर तब आवश्यक होता है जब बयान के बाद गवाह की जान को खतरा हो या गवाह पर दबाव हो।
रीना सिंह कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में गवाहों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया है। कोर्ट ने गवाहों को धमकाने या प्रभावित करने के मामलों में सख्त कार्रवाई का आदेश दिया है, ताकि गवाह बिना किसी डर के न्यायालय में बयान दे सकें। भारतीय कानून गवाहों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा पर जोर देता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम और बीएनएसएस जैसे कानूनों के तहत गवाहों के कुछ अधिकार हैं।
गोपनीयता का अधिकार: गवाह को धमकी मिलने पर उसकी पहचान को गुप्त रखा जा सकता है।
सुरक्षा का अधिकार: अगर गवाह को बयान देने के बाद खतरा हो तो उसे पुलिस या राज्य द्वारा सुरक्षा प्रदान की जा सकती है।
स्वतंत्र बयान देने का अधिकार: गवाह को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से बयान देने का अधिकार है और उसे किसी भी प्रकार के दबाव या धमकी से बचाने का प्रावधान है।
अब जबकि, बहराइच पुलिस ने ऑपइंडिया की खबर को भ्रामक बता दिया तो हमने रीना सिंह से चश्मदीद के मीडिया में दिए गए बयान के बारे में भी उनसे जानना चाहा। उन्होंने कहा कि चश्मदीद का पुलिस के समक्ष दिया गया बयान जाँच का विषय है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 398 में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य सरकार गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दृष्टि से राज्य के लिए एक गवाह संरक्षण योजना/डब्ल्यूपीएस तैयार और अधिसूचित करेगी। कानून की नजर में चश्मदीद (Eyewitness) के मीडिया में दिए गए बयान की बहुत सीमित और अक्सर अप्रत्यक्ष अहमियत होती है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (बीएनएसएस) के अनुसार, मीडिया में दिया गया बयान कुछ स्थितियों में संदर्भ या संकेत के रूप में उपयोग किया जा सकता है, लेकिन यह न्यायालय के लिए स्वीकार्य साक्ष्य (admissible evidence) नहीं माना जाता। यह न्यायालय में मान्य साक्ष्य के रूप में तब तक स्वीकार्य नहीं होता, जब तक कि उसे पुलिस द्वारा या अदालत के समक्ष विधिवत दर्ज नहीं किया जाता।
रीना सिंह कहती हैं कि मीडिया में दिया गया बयान बाहरी प्रभाव में हो सकता है, इसलिए उसे न्यायालय की निष्पक्ष प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जाता। गवाह पर दबाव, डर या पक्षपात के चलते ऐसे बयान दिए जा सकते हैं। मीडिया में दिया गया बयान संकेतक (indicator) या प्राथमिक जानकारी के रूप में पुलिस या अदालत के ध्यान में लाया जा सकता है।
बकौल रीना सिंह, “अगर यह बयान मामले की जाँच या अदालत में महत्वपूर्ण हो सकता है तो पुलिस या अदालत उस गवाह को समन भेजकर उसका बयान दर्ज कर सकती है। अदालत में दिए गए बयान के दौरान गवाह के बयान को प्रतिपरीक्षण के माध्यम से सत्यापित किया जा सकता है। मीडिया में दिए गए बयानों को प्रतिपरीक्षण का मौका नहीं मिलता, इसलिए इसे पूर्ण रूप से सत्य नहीं माना जा सकता।”
मीडिया में दिए गए बयान को अक्सर गैर-स्वीकृत साक्ष्य (hearsay evidence) के रूप में माना जाता है, क्योंकि यह अदालत में दिए गए साक्ष्य से प्रमाणित नहीं होता है। न्यायालय में मान्य गवाही वही होती है जो अदालत के सामने, शपथ के तहत दी गई हो और जिसका प्रतिपरीक्षण (cross-examination) किया जा सके।
अगर कोई पीड़ित या चश्मदीद मीडिया में इस तरह का बयान देता है तो पुलिस को खुद उस तक पहुँचना चाहिए या फिर उसके थाने आने का इंतजार करना चाहिए? इस सवाल पर रीना सिंह कहती हैं, “भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 181 के तहत पुलिस गवाहों का बयान दर्ज कर सकती है। इस प्रक्रिया में पुलिस गवाह से मिलने उसके निवास स्थान पर जा सकती है और वहीं पर उसका बयान दर्ज कर सकती है।”
रीना सिंह कहती हैं कि गवाह को थाने आने की आवश्यकता नहीं होती है, जब तक कि पुलिस द्वारा उसे समन या नोटिस न भेजा गया हो। पुलिस गवाह को जाँच में सहयोग देने के लिए थाने आने का नोटिस या समन भेज सकती है। यह केवल तब किया जाता है जब पुलिस को उसकी मौजूदगी आवश्यक लगे। वर्तमान में भारतीय कानून के तहत पुलिस का यह उत्तरदायित्व है कि वह गवाह तक पहुँचे और उसका बयान ले, न कि थाने आने का इंतजार करे।

‘बहराइच के दरिंदों का हो गया इलाज’: जिस अब्दुल हमीद के घर हुई रामगोपाल मिश्रा की हत्या, उसके 2 बेटों का नेपाल बॉर्डर पर उत्तर प्रदेश STF ने किया एनकाउंटर; कांग्रेस का विलाप शुरू

                               एनकाउंटर में घायल सरफराज और तालिब (साभार: ऑपइंडिया)
उत्तर प्रदेश के बहराइच में दुर्गा पूजा के मूर्ति विसर्जन के दौरान रामगोपाल मिश्रा की गोली मारकर हत्या करने के आरोपित रिंकू उर्फ सरफराज खान और तालिब उर्फ सबलू का एनकाउंटर कर दिया गया है। एनकाउंटर में दोनों आरोपितों के पैरों में गोली लगी है। इससे वे घायल हो गए हैं। सूत्रों के अनुसार, यह मुठभेड़ नानपारा कोतवाली के बाइपास में हुई है। 

घायल आरोपियों को इलाज के लिए नानपारा सीएचसी में भर्ती किया गया है। सीएचसी के बाहर पुलिस का पहरा बढ़ा दिया गया है। सीएचसी ने दोनों आरोपितों को बहराइच मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया है। कहा जाता है कि गोपाल मिश्रा पर गोली सरफराज ने ही चलाई थी। तालिब और सरफराज भाई बताए जा रहे हैं। दोनों आरोपित नेपाल भागने की फिराक में थे।

उत्तर प्रदेश के ADG (Law & Order) अमिताभ यश ने बताया कि पुलिस ने पाँच आरोपित पकड़े हैं। वहीं, एनकाउंटर में दो को गोली लगी है। रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपितों के नेपाल भागने की की सटीक सूचना मिलने पर दोपहर करीब 2 बजे STF और बहराइच पुलिस ने नानपारा कोतवाली क्षेत्र में हांडा बसेहरी नहर के पास आरोपितों को घेर लिया।

पुलिस ने आरोपितों को सरेंडर करने के लिए कहा तो वे पुलिस पर फायरिंग की। इसके बाद पुलिस और STF ने भी जवाबी कार्रवाई की, जिसमें सरफराज और तालिब को पैरों में गोली लगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बहराइच हिंसा के आरोपियों के पुलिस मुठभेड़ में घायल होने की जानकारी दी गई है।

बहराइच की एसपी वृंदा शुक्ला का कहना है, “जब पुलिस टीम हत्या में इस्तेमाल हथियार की बरामदगी के लिए नानपारा इलाके में गई थी तो मोहम्मद सरफराज उर्फ ​​रिंकू और मोहम्मद तालिब उर्फ ​​सबलू ने हत्या में इस्तेमाल हथियार को वहाँ लोड करके रखा रखा हुआ था, जिसका इस्तेमाल उन्होंने पुलिस पर फायरिंग करने के लिए किया।”

उन्होंने आगे कहा, “आत्मरक्षा में पुलिस ने जवाबी फायरिंग की, जिसमें दोनों घायल हो गए। उनका इलाज चल रहा है और वे जीवित हैं। हमने अन्य तीन आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया है। सभी 5 को आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार कर लिया गया है। उन सभी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी… अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।”

पुलिस ने सरफराज के भाई फहीम, पिता अब्दुल हमीद और एक अन्य को भी पकड़ा है। इससे एक दिन पहले सरफराज की गोली चलाते हुए तस्वीर सामने आई थी। इससे पहले राम गोपाल मिश्रा की हत्या मामले में पहली गिरफ्तारी भी आज गुरुवार (17 अक्टूबर 2024) को ही हुई। आरोपित की पहचान राजा उर्फ मोहम्मद दानिश उर्फ जहीर/सहीर खान के तौर पर हुई है।

बताया जा रहा है कि जहीर नेपाल जाने की फिराक में था, लेकिन उसे माहसी खंड में राजी क्रॉसिंग पर गिरफ्तार कर लिया गया। बहराइच हिंसा मामले में अब तक 11 एफआईआर दर्ज हुई हैं, इसमें 6 नामजद और 1304 अज्ञात लोगों को आरोपित बनाया गया है। वहीं, राम गोपाल की हत्या मामले में 10 लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ है।

मोहम्मद दानिश उर्फ ​​साहिर/जहीर खान इन्हीं आरोपितों में से एक था। उसके अलावा अब्दुल हामिद, सरफराज, फहीम भी इस मामले में आरोपित हैं। गौरतलब है कि 13 अक्टूबर को दुर्गा विसर्जन के दौरान हुई हिंसा मामले में अब तक 55 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इन लोगों की पहचान सीसीटीवी फुटेज के आधार पर हुई है।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने एनकाउंटर पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि सरकार शुरू से ही फर्जी एनकाउंटर करा रही है। वे सिर्फ अपनी विफलता को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। मृतक रामगोपाल मिश्रा के पैर के नाखूनों को उखाड़ने के सवाल पर राय ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार दंगा कराना चाहती है।

पीस कमेटी की बैठक में गए मुस्लिम बुजुर्ग, पथराव के लिए आए जवान: रिपोर्ट में दावा- डासना मंदिर पर हमले की रची गई थी साजिश

भाजपा MLA ने डासना मंदिर के हमलावरों की सम्पत्तियाँ कुर्क कर के माँगी NSA के तहत कार्रवाई (फोटो साभार: ऑपइंडिया आर्काइव/वायरल वीडियो-X)
4 अक्टूबर 2024 की रात इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने गाजियाबाद के डासना मंदिर को घेर लिया था। लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट में इसके पीछे बड़ी साजिश का दावा किया गया है। बताया गया है कि मुस्लिम बुजुर्गों को पीस कमेटी की बैठक में भेजा गया। दूसरी ओर मुस्लिम जवानों को डासना मंदिर की तरफ भेज दिया गया।

मंदिर पर हमले के पीछे साजिश की आशंका लोनी से बीजेपी विधायक नंद किशोर गुर्जर ने भी जताई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लिखे पत्र में उन्होंने इसे हिंदू आस्था पर प्रहार बताया है।

नन्द किशोर गुर्जर ने सोमवार (7 अक्टूबर 2024) को लिखे पत्र में कहा कि 4 अक्टूबर 2024 को जुमे के दिन मुस्लिम भीड़ ने मंदिर पर हमला करने की कोशिश की। इस घटना के बाद पूरे देश में हिन्दू समाज के भीतर आक्रोश फैल गया है। उन्होंने इसे हिन्दुओं के नरसंहार की तैयारी करार दिया और आरोप लगाया कि इस हमले के पीछे बाहरी तत्वों की मिलीभगत है। उनके अनुसार, विपक्षी दलों, खासकर कॉन्ग्रेस, सपा और AIMIM से जुड़े स्लीपर सेल ने इस हिंसा को उकसाया।

जुमे की दिन हुई इस घटना को हिन्दुओं के नरसंहार की तैयारी बताया है। इस मंदिर पर पहले भी हमले की कोशिश हो चुकी है। आगे उनका दावा है कि घटना के बाद पूरे देश का हिन्दू समाज आक्रोशित है। हिंसा में बाहरी लोगों की मिलीभगत बताते हुए भाजपा MLA ने इसके पीछे विपक्षी पार्टियों की साजिश बताया है। उनका दावा है कि कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी और ओवैसी की AIMIM पार्टी से जुड़े स्लीपर सेल ने इस हिंसा को हवा दी है।

अपने पत्र में उन्होंने सीएम योगी को डासना मंदिर का पौराणिक महत्व बताते हुए कहा कि यहाँ भगवान परशुराम और पांडवों ने तपस्या की थी। यहाँ 4 अक्टूबर को मुस्लिम भीड़ जमा हो कर आपत्तिजनक नारे लगाती यही और पथराव करते हुए हमले की कोशिश करती है। बीजेपी विधायक के मुताबिक पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए न सिर्फ मंदिर और उसमें मौजूद मूर्तियों को खंडित होने से बचाया बल्कि अंदर मौजूद कई श्रद्धालुओं के जीवन की भी रक्षा की।

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उत्तर प्रदेश : अशांति फ़ैलाने वाले मोहम्मद जुबैर पर UP में FIR: आरोप- मुस्लिमों को भड़का कर डासना मंद

भाजपा विधायक ने पत्र में आगे लिखा कि डासना मंदिर पर हमले के बाद जिन लाखों हिन्दुओं की आस्था पर चोट पहुँची है वो महापंचायत की बात कह रहे हैं। अंत में उन्होंने हमलावरों को चिन्हित करते हुए उनकी सम्पत्तियों को कुर्क करने और उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई की माँग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि “सर तन से जुदा” के नारे लगाने वाले लोग प्रदेश में दंगे भड़काने की साजिश कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दलों पर भारत में तालिबानी शासन लागू करने की कोशिश का भी आरोप लगाया।

राजस्थान : ट्रॉली में भर-भर कर जब्त हुए पत्थर, ईदगाह बवाल में छतों पर थी पूरी तैयारी: अब तक 65 के खिलाफ FIR, 51 गिरफ्तार

         जोधपुर हिंसा, आरोपितों के घरों की छतों पर मिले भारी मात्रा में पत्थर (फोटो साभार : अमर उजाला/भास्कर)
राजस्थान के जोधपुर में शुक्रवार (21 जून 2024) को बवाल हो गया। तनाव को देखते हुए रविवार (23 जून 2024) को प्रशासन ने हिंसा के आरोपितों के खिलाफ तलाशी अभियान चलाया और ड्रोन से इलाके की छानबीन की, जिसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों की आँखें खुली की खुली रह गई, क्योंकि कई छतों पर भारी मात्रा में पत्थर मिले हैं, जिनका इस्तेमाल हिंसा के दौरान पत्थरबाजी में हुआ था।

जिन स्थानों से पत्थरों का जखीरा बरामद हो, उसे जमींदोज़ ही नहीं बल्कि जब तक इन्हे मिलने वाली हर सरकारी सुविधा से वंचित नहीं किया जाएगा, तब तक ये उपद्रवी और इनके समर्थक सुधरने वाले नहीं। ये हाल है अपने आपको गरीब, मजलूम और डरा हुआ बताने वालों का। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीते शुक्रवार को जोधपुर के सूरसागर थाना इलाके में स्थित एक ईदगाह का गेट हिंदू मोहल्ले की तरफ खोले जाने का विरोध हुआ, तो मुस्लिमों ने जमकर पथराव किए। इस पथराव में कई गाड़ियाँ टूट गई, तो एक दुकान को भी आग के हवाले कर दिया गया। हिंसा की इन घटनाओं में एक महिला की आँख की रोशनी चली गई। इस मामले में अब तक 65 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है, जिसमें से 51 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। इस बीच, पूरे इलाके में तनाव बरकरार है।

इस तनाव के बीच, पुलिस प्रशासन ड्रोन के जरिए पूरे क्षेत्र में स्थिति पर नियंत्रण बनाए हुए हैं। इस बीच सामने आया कि लोगों ने घरों पर पथराव करने के लिए पत्थर जमा कर रखे थे। पुलिस के अनुसार यह पत्थर करीब दो ट्रॉली थे। इस खुलासे के बाद चर्चा शुरू हो गई है कि विवाद को लेकर लोगों ने पहले ही पथराव करने की प्लानिंग कर रखी थी। इस दौरान जोधपुर के 5 थाना क्षेत्रों में धारा 144 लागू होने के कारण क्षेत्र रविवार को सन्नाटा छाया रहा। वहीं पुलिस बलों ने पूरी स्थिति पर नियंत्रण रखा।

पुलिस के अनुसार चिन्हित मकान पर करीब दो ट्रॉली पत्थर बरामद हुआ है। इस मामले में पुलिस ने घरों के लोगों को नामजद किया है और उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी हैं। घरों के ऊपर पत्थर मिलने की घटना से चर्चा तेज हो गई है कि लोगों ने इस विवाद को देखते हुए पहले से ही पथराव करने की प्लानिंग बना ली थी।

सूरसागर क्षेत्र में पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ की घटना को देखते हुए पुलिस आयुक्त ने पूरे इलाके में पुलिस तैनात कर धारा 144 लागू कर दी। इसको लेकर अब तक पुलिस 51 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन के अधिकारी पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। इसके अलावा ड्रोन के जरिए पूरे इलाके की छानबीन की जा रही हैं। हिंसा के इस मामले में अब तक 51 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं, तो 65 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है।

मी लॉर्ड! भीड़ का चेहरा भी होता है, मजहब भी होता है… यदि यह सच नहीं तो ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारों के साथ हिन्दुओं की शोभा यात्राओं पर हमला करने वाले कौन?

राजस्थान हाईकोर्ट के जज फरजंद अली को लगता है कि हमलावर भीड़ का मजहब नहीं होता
क्या भीड़ का कोई मजहब नहीं होता? क्या भीड़ को कपड़ों से नहीं पहचाना जा सकता? क्या भीड़ में शामिल लोगों के इरादे समान नहीं होते? हम ये सवाल इसीलिए पूछ रहे हैं क्योंकि राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में हिन्दुओं की शोभा यात्रा पर हुए हमले के 18 मुस्लिम आरोपितों को राजस्थान उच्च न्यायालय ने जमानत दे दी है। इस दौरान हाईकोर्ट के जज फरजंद अली ने कहा कि भीड़ का कोई मजहब नहीं होता, कई बार निर्दोष फँस जाते हैं और असली अपराधी भाग निकलते हैं।

इस पर बहस ज़रूरी है, क्योंकि हमला हिन्दुओं की शोभा यात्रा पर हुआ था और हमलावर इस्लामी कट्टरपंथी थे। अगर हम दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल तक के पैटर्न की बात करें तो आरोपित सिर्फ तमाशा देखने के लिए घटनास्थल के पास आए होंगे, ऐसे तो नहीं लगता। खैर, जज साहब का कहना है कि कई लोग उत्सुकतावश तो कई डर से भी घटना को देखने जाते हैं। जस्टिस फरजंद अली ने कह दिया कि आरोपितों को जेल में रखे जाने का कोई कारण नहीं है। मामले को समझने से पहले जानिए  चारभुजा नाथ के बारे में, जिनकी यात्रा निकाली जा रही थी। 

मेवाड़-मारवाड़ के आराध्य  चारभुजा नाथ, जिनकी निकलती है यात्रा

मेवाड़ और मारवाड़ के आराध्य देवता हैं – चारभुजा नाथ, जिनका मुख्य मंदिर कुम्भलगढ़ तहसील के गढ़बोर गाँव में स्थित है। राजस्थान के  राजसमंद में स्थित ये मंदिर ऐतिहासिक है, प्राचीन है। इसकी कथा महाभारत तक जाती है। सन् 1444 में राजा गंग सिंह ने यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। इस गाँव का नाम गढ़बोर इसीलिए है, क्योंकि यहाँ ‘बोर’ राजपूतों ने मंदिर का निर्माण कार्य करवाया। पांडवों ने अपने अंतिम दिनों में हिमालय की यात्रा से पहले यहाँ दर्शन किया था, ऐसी भी मान्यता है।
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में ‘देवझूलनी’ एकादशी के दिन यहाँ भव्य मेला लगता है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। सोने-चाँदी की पालकी में ठाकुर जी को बिठा कर उनकी यात्रा निकाली जाती है। गाजे-बाजे और रंग-गुलाल के साथ उत्सव का माहौल होता है। नृत्य-संगीत और श्रृंगार-इत्र वाला माहौल रहता है। 1000 गुर्जर परिवार इस मंदिर के पुजारी हैं। हर अमावस्या पुजारी बदलता है। इस दौरान पुजारी को कठिन तप एवं साधना के नियमों का पालन करना पड़ता है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे तक यहाँ दर्शन-पूजन कर चुकी हैं। भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भज स्वरूप को समर्पित इस मंदिर में जब किसी पुजारी की पाली आती है तो वो सगे-संबंधियों की मौत होने के बाद भी अपनी अवधि पूरा होने तक नहीं उठ सकते। कइयों की बारी 48-50 साल बाद आती है, यानी जीवन में एक मौका। इस दौरान उन्हें हर प्रकार के व्यसन से दूर मंदिर में ही रहना पड़ता है
इससे इतना तो आप समझ ही गए होंगे कि ये मंदिर न सिर्फ वैष्णव, बल्कि पूरे हिन्दू समाज, खासकर राजस्थान के हिन्दू समाज के लिए बड़ी महत्ता रखता है। मंदिर में कई जगह स्वर्ण-पत्र जड़े हुए हैं, सोने के दरवाजे में चाँदी के पत्र जड़े हुए हैं। मंदिर के पास एक छतरी में गरुड़ जी की 5 मूर्तियाँ हैं। मंदिर के सामने विशाल नक्कारखाना है। राजस्थान में अन्य स्थानों पर भी समय-समय पर  चारभुजा नाथ की यात्रा निकाली जाती है, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। चित्तौड़गढ़ में उनकी ही यात्रा निकाली जा रही थी, जिस पर हमला हुआ।

चित्तौड़गढ़ में हिन्दुओं की शोभा यात्रा पर हमला

आइए, अब जानते हैं कि चित्तौड़गढ़ में हुआ क्या था। घटना मंगलवार (19 मार्च, 2024) की है।  चारभुजा नाथ यात्रा पर हमला किया गया, जिसमें श्याम छिपा नामक एक व्यक्ति की मौत हो गई। मौके पर ही उनकी दुकान थी। घटना राशमी थाना क्षेत्र के पहुना गाँव की है, जहाँ दशमी के अवसर पर चारभुजा नाथ की यात्रा निकाली जाती है। इस दौरान ढोल बजाते हुए ग्रामीण गाँव के विभिन्न हिस्सों से होकर निकलते हैं। लेकिन, कस्बे के मुख्य बाजार स्थित दरगाह पर पहुँचते ही शोभा यात्रा पर हमला हो गया।
इस घटना में नवीन जैन समेत कई लोग घायल भी हुए थे। वहीं 55 वर्षीय श्याम छिपा को भीलवाड़ा रेफर किया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका था। दरगाह के सामने से जैसे ही शोभा यात्रा निकली, वहाँ मौजूद मुस्लिम इससे आपत्ति जताने लगे। भले ही सड़क सार्वजनिक संपत्ति हो, ये कई जगह देखने को मिलता है कि इस्लामी संरचनाओं के सामने से शोभा यात्रा निकलते ही हमले होते हैं। चित्तौड़गढ़ में भी पत्थरबाजी शुरू हो गई। एक दर्जन से भी अधिक लोग घायल हुए, पुलिस को स्थिति सँभालनी पड़ी।
इसी क्रम में पुलिस ने 18 आरोपितों को चिह्नित करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया था। न सिर्फ गाली-गलौज और पत्थरबाजी हुई, बल्कि श्रद्धालुओं को पीटा भी गया और आगजनी भी की गई। गाड़ियों और दुकानों में आग लगा दी गई। रात के समय हुए इस हमले का वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया था। वीडियो में इस्लामी टोपी पहने लोग हंगामा करते हुए स्पष्ट दिख रहे हैं। उस समय रमजान का पाक महीना चल रहा था। राजस्थान में सरकार बदल गई लेकिन इस्लामी कट्टरपंथियों का हौसला वही रहा।

जज फरजंद अली ने 18 आरोपितों को जमानत देते हुए क्या कहा

24 वर्षीय बाबू मोहम्मद सहित अन्य आरोपितों ने हाईकोर्ट का रुख किया था, क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका ख़ारिज कर दी थी। वहीं इस मामले में राजस्थान सरकार समेत पीड़ित हिन्दुओं को भी पक्षकार बनाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उनका इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है और उन्हें झूठा फँसाया गया है। इन्होंने दावा किया कि मौत का कारण हार्ट अटैक था और मृतक के शरीर में कोई जख्म नहीं था। साथ ही इस मामले में SC/ST एक्ट हटाने की अपील भी की गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ‘लंबे समय’ से जेल में हैं। ‘लंबे समय’, मतलब 2 महीना। जबकि पुलिस का स्पष्ट कहना था कि पूर्व से रची हुई साजिश के तहत हिन्दुओं के शांतिपूर्ण शोभा यात्रा पर हमला किया गया, वो भी खतरनाक हथियारों के साथ। जज साहब ने ये तक कह दिया कि इस हिंसा में कौन-कौन लोग शामिल थे इस संबंध में कुछ नहीं कहा जा सकता। यानी, हमला दरगाह के सामने हुआ और पीड़ित हिन्दू श्रद्धालु थे, फिर भी जज साहब को शक था कि कौन लोग इसमें शामिल थे।
जज फरजंद अली ने कहा कि भीड़ में निर्दोषों और हमलावरों को अलग-अलग चिह्नित करना बड़ा मुश्किल है, अपराधी भाग जाते हैं और निर्दोष फँस जाते हैं। आरोपितों के दोषी होने से लेकर उन पर SC/ST एक्ट के तहत मामला चलाने तक, अदालत हर मामले में संशय में दिखी। चूँकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में घुटने पर जख्म की बात है, ऐसे में मीलॉर्ड को ये भी नहीं लगता कि मौत हमले के कारण हुई है। उन्हें ये हार्ट अटैक का संभावित मामला लगता है क्योंकि खून नहीं निकल रहा था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा गया कि आरोपित अगर सुनवाई में नियमित रूप से उपस्थित रहते हैं तो ये अदालत के ऊपर है कि वो उन्हें अपने परिवार के साथ खाने, सोने और रहने की अनुमति देती है या नहीं। जज साहब ने इसके बाद निजी मुचलकों पर इन्हें जमानत दे दी, निचली अदालत ने फैसला पलट दिया। भारत में न्याय कुछ इसी तरह होता है। भीड़ का नहीं, हमलावरों का मजहब देखा जाता है। हाँ, अगर नूपुर शर्मा हों आरोपित तो सुप्रीम कोर्ट तक से कड़ी टिप्पणी की जाती है।

मीलॉर्डस, आपको कितने उदाहरण चाहिए ‘भीड़ का मजहब’ होने के?

चित्तौड़गढ़ में  चारभुजा नाथ शोभा यात्रा निकाल रहे हिन्दुओं पर हमला करने वाले भीड़, जो दरगाह से निकली, उसका मजहब था। आइए, राजस्थान की ही बात कर लेते हैं अधिक दूर जाने से पहले। राजस्थान के करौली में अप्रैल 2022 में दंगे भड़के थे। नव-संवत्सर पर बाइक रैली आयोजित की गई थी, जिस पर हमला हुआ। हटवारा बाजार में जिस भीड़ ने इस रैली पर पत्थरबाजी की, उनका मजहब था। इसके बाद गाड़ियों, दुकानों और घरों में आगजनी हुई थी।
इसके अगले ही महीने जोधपुर में परशुराम जयंती के मौके पर शोभा यात्रा निकली और जालोरी गेट चौराहे पर झंडा लगाया गया, उस दौरान भी जिस भीड़ ने हिन्दू युवक के साथ मारपीट की और झंडा लगाने का विरोध किया, उस भीड़ का मजहब था। उससे 1 वर्ष पहले, यानी जुलाई 2021 में झालावाड़ में हिंसा भड़की, तब भी भीड़ का मजहब था। टोंक में अक्टूबर 2019 में दशहरा की रैली पर मालपुरा कस्बे में जिन लोगों का पथराव किया, उनका भी मजहब था।
जज साहब को समझना चाहिए कि पिछले 1400 वर्षों से हिंसक भीड़ का मजहब है। ज्यादा पीछे क्यों जाना, इसी साल रामनवमी के दौरान अप्रैल में जगह-जगह हिन्दुओं की शोभा यात्राओं पर हमले हुए। ये हमले करने वाले जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई, पारसी या फिर यहूदी नहीं थे। लेकिन, इन भीड़ का मजहब था। मुर्शिदाबाद में जहाँ हमले हुए, वहाँ दो तिहाई जनसंख्या जिनकी है उनका एक खास मजहब है। पिछले साल भी कुछ ऐसा ही हुआ था, हर साल होता है।
मार्च 2023 में उत्तर दिनाजपुर के दालखोला में रामनवमी की शोभा यात्रा पर हुए हमले के मामले में NIA को जाँच सौंपनी पड़ी। फरवरी 2024 में जिन 16 लोगों को NIA ने गिरफ्तार किया, उनका भी मजहब था। दिल्ली में फरवरी 2020 में जो दंगे हुए थे, उस दौरान जिस भीड़ ने 51 वर्षीय विनोद कुमार पर ‘अल्लाह-हू-अकबर’ का नारा लगाते हुए उन्हें मार डाला, उस भीड़ का भी मजहब था। उनके बेटे मोनू को भी गंभीर चोटें आई थीं। वो मोहल्ला आज भी जिस डर में जीता है, उसके पीछे एक भीड़ का खौफ है और उस भीड़ का मजहब है।
CAA के खिलाफ देश भर में जो दंगे हुए, हर एक दंगे में भीड़ का मजहब था। तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि जो लोग आग लगा रहे हैं और TV पर उनके जो दृश्य आ रहे हैं, ये आग लगाने वाले कौन हैं ये उनके कपड़ों से ही पता चल जाता है। नूपुर शर्मा के बयान (जो उन्होंने हदीथ से उद्धरण दिया था) को पैगंबर मुहम्मद का अपमान बता कर पश्चिम बंगाल के नदिया में रेलवे स्टेशन को क्षतिग्रस्त करने वाली भीड़ का भी मजहब था। लेकिन, जज साहब को ये सब नहीं दिखता।

इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा को लेकर न्यायपालिका नरम क्यों?

नूपुर शर्मा को सुप्रीम कोर्ट के जजों ने पूरे देश में आग लगाने के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया, जबकि ये काम वही मजहब वाली भीड़ कर रही थी। उसी मजहब के लोगों ने उदयपुर में कन्हैया लाल तेली और अमरावती में उमेश कोल्हे का गला रेता। उसी भीड़ ने नरसिंहानंद सरस्वती के खिलाफ भी ‘सर तन से जुदा’ का पोस्टर लेकर सड़कों को जाम किया। इसी भीड़ को हमने पाकिस्तान में मंदिरों को ध्वस्त करते, लंदन की सड़कों पर आतंकी संगठन हमास का समर्थन करते और बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के पंडालों पर हमला करते हुए देखा है।
काशी विश्वनाथ मंदिर,  अयोध्या का  राम मंदिर और मथुरा के श्रीकृष्ण मंदिर को सैकड़ों वर्ष पूर्व ध्वस्त किए जाने के पीछे यही मानसिकता थी, मजहब वाली। आज जो ‘लव जिहाद’ की घटनाएँ हो रही हैं, उसके पीछे भी वही मानसिकता है। अगर न्यायपालिका ने समय रहते इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ कड़ा रख नहीं अपनाया तो इसका खामियाजा उन्हें भी और पूरे देश को भुगतना पड़ेगा। जजों को तो आरोपितों को जमानत देने की बजाय उल्टा सरकारों को आदेश देना चाहिए कि वो हिन्दू पर्व-त्योहारों पर सुरक्षा मुहैया कराए।
हिन्दू धर्म-ग्रंथों का अपमान करने वालों पर कार्रवाई नहीं होती और दंगे करने वालों को जमानत मिल जाती है, इससे उस मजहब वाली भीड़ को प्रोत्साहन मिलता है। ISIS भी इसी भीड़ की तरह ‘अल्लाह-हू-अकबर’ का नारा लगाते हुए गला रेतता है और वीडियो बनाता है। साल बदलते हैं, स्थान बदलता है – मानसिकता वही रहती है। जब क्रिया की प्रतिक्रिया होती है या फिर आत्मरक्षा में बल प्रयोग करता है पीड़ित पक्ष, तो इसे ‘हिन्दू आतंकवाद’ बता कर प्रचारित किया जाता है।

कौन हैं राजस्थान हाईकोर्ट के जज फरजंद अली

राजस्थान हाईकोर्ट के जज फरजंद अली सितंबर 1992 से लॉ की प्रैक्टिस बतौर वकील करते रहे हैं। उन्हें अक्टूबर 2021 में राजस्थान उच्च न्यायालय का जज नियुक्त किया गया था। कॉन्ग्रेस सरकार ने उन्हें 2019 में अपना सरकारी जज बनाया था। जज नियुक्त होने के बाद उन्होंने अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जियारत की थी। नवंबर 2023 में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मेवाराम जैन को ED ने समन भेजा था तो उन्होंने इस इस समन को रद्द किया था।
इतना ही नहीं, जज फरजंद अली ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन SFJ (सिख फॉर जस्टिस) के 2 खालिस्तानियों को जमानत भी दे दी थी। जजों की नियुक्ति जज ही करते हैं, उनकी नियुक्ति भी तत्कालीन CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले पैनल ने की थी। न्यायपालिका में सुधार समय की ज़रूरत है, समय-समय पर सरकारों के प्रयासों पर न्यायपालिका ही अड़ंगा लगाती आई है। कॉलेजियम सिस्टम विवादित है, लेकिन चल रहा है। यही स्थिति रही तो कल को देश के सारे दंगाई सड़क पर खुला घूम रहे होंगे।
(साभार:अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com)


सनातन के संयम की अग्नि परीक्षा कब तक? राम मंदिर से सुलग रहे मुस्लिम बाबा बागेश्वर के दरबार से पहले हिंसा पर उतरे, ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा लगाते हुए किया हमला: नेपाल में कर्फ्यू, भारत में अलर्ट

      बागेश्वर सरकार के कार्यक्रम से पहले नेपाल में मुस्लिमों का उपद्रव (फोटो साभार: FB/Namaste Bhaktapur)
नेपाल के सुनसरी जिले में सांप्रदायिक हिंसा के बाद सीमा से सटे भारतीय इलाकों में अलर्ट है। सुनसरी के रामनगर भुटाहा में कर्फ्यू लगाया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेन्द्र शास्त्री के कार्यक्रम का प्रचार कर रहे हिंदू संगठन के सदस्यों पर हमले के बाद माहौल बिगड़ा है। इसके बाद जीवन मेहता नाम के एक हिंदू युवक की बुरी तरह पिटाई की गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद से ही कट्टरपंथी भड़के हुए थे। अभी तक इस मामले में मुस्लिम समुदाय के दो लोगों को गिरफ्तार किए जाने की सूचना है।

अब चर्चा है कि आखिर मुस्लिम कट्टरपंथी और इनके समर्थक नेता/पार्टियां सनातन के संयम की कब तक अग्नि परीक्षा लेते रहेंगे? आखिर कब तक जेहादी सनातन/हिन्दू पर जानलेवा हमले करते रहेंगे? क्या जेहादी और इनको समर्थन दे रहे नेता और पार्टियां सनातन के संयम की ज्वालामुखी के फटने का इंतज़ार कर रहे हैं? इन लोगों को इतना भी ज्ञान नहीं कि सनातन/हिन्दू भ्रमित करने वाले सेकुलरिज्म को कुचलने की ओर अग्रसर है। अब और अधिक सनातन/हिन्दू इस भ्रमित जाल में नहीं फंसने को तैयार। भारत का वास्तविक इतिहास बड़ी तेजी खुलना शुरू हो चुका है। सेकुलरिज्म को अपनाने से पहले इसका अर्थ इन छद्दम सेक्युलरिस्ट्स को समझना होगा। दंगों में हमेशा बेगुनाह मरता रहा है, किसी जेहादी और इनको समर्थन देने वाले नेता/पार्टियों के घर के पक्षी तक को कुछ नहीं होता। कर्फ्यू में परेशान जनमानस होता है, उसकी चिंता करो। 

आजकल चुनावी दौर चल रहा है, हर नेता/पार्टी आपसे वोट मांगने आने पर उनसे प्रश्न करिए कि जिस तरह जाति के आधार पर हिन्दुओं को विभाजित किया जाता रहा है, अगर 'माँ का दूध पीया है तो इसी तरह दूसरे धर्मों पर बोलकर दिखाओ' तुरंत साम्प्रदायिक तत्व कहकर धमकाने का प्रयास किया जाएगा। हिन्दू फिर एक ही मंदिर में जाता है, अंतिम संस्कार भी एक ही शमशान घाट पर होता है, लेकिन अन्य मजहबों में नहीं। मस्जिदें, चर्च और कब्रस्तान अलग है। क्या इसी का नाम सेकुलरिज्म है? 

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बागेश्वर सरकार का कार्यक्रम 17 अप्रैल को सुनसरी के चतरा में होना है। इस कार्य्रकम का प्रचार कर रहे विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं पर हमला किया गया, जिसके बाद हालत तनावपूर्ण हो गए। नेपाली प्रशासन ने पीस कमेटी की मीटिंग बुलाई थी, लेकिन उसमें मुस्लिम समुदाय के जनप्रतिनिधियों ने हिस्सा नहीं लिया। नेपाल में तनाव को देखते भारत की सीमाओं पर चौकसी बढ़ा दी गई है।

इस विवाद की शुरुआत 4 अप्रैल 2024 (गुरुवार) को हुई। जीवन मेहता नाम का युवक हरिनगर इलाके के रामनगर के एक स्कूल से अपनी बहन को घर ले जाने के लिए बाइक से गया था। यहाँ पर लगभग 150-200 की तादाद में मुस्लिमों की भीड़ जमा हो गई। इन सभी ने जीवन मेहता को बेरहमी से मारा। जान बचाने के लिए जीवन मेहता स्कूल में घुस गया, लेकिन भीड़ ने वहाँ भी उसे नहीं छोड़ा। हमलावरों में बच्चे, बूढ़े और जवान सभी उम्र के लोग शामिल थे।

घटना के एक चश्मदीद ने ऑपइंडिया को बताया कि भीड़ ने जीवन मेहता को स्कूल से निकाल कर रामनगर भुटहा बाजार में दौड़ा-दौड़ा कर मारा। आरोप है कि इस दौरान पुलिस-प्रशासन सब कुछ देखते हुए भी मूकदर्शक बना रहा। बताया जा रहा है कि भीड़ ने जीवन मेहता को पुलिस से छीनने का भी प्रयास किया। उसे अस्पताल ले जाने के दौरान भी रास्ते में रुकावट डाली गई। जीवन मेहता को सुनसरी जिले के सरकारी अस्पताल के ICU वार्ड में भर्ती करवाया गया। मारने वाली भीड़ का नेतृत्व फय्याज अंसारी कर रहा था।

फय्याज अंसारी के अब्बा गफ्फार हरिनगर गाँवपालिका का अध्यक्ष है। हरिनगर गाँवपालिका भारत से सटा हुआ मुस्लिम बाहुल्य इलाका है। इस घटना के विरोध में अगले दिन शुक्रवार (5 अप्रैल 2024) को हिंदुओं ने प्रदर्शन किया। सड़क जाम कर के हमलावरों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की। प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पर भी मुस्लिम भीड़ ने हमला किया। हमलावरों की तादाद 500 के आसपास थी। हिंसक भीड़ ‘नारा ए तकबीर’ और ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगा रही थी। दोनों पक्षों की भिड़ंत में दर्जनों लोग घायल हो गए।

हिन्दू सम्राट सेना के अध्यक्ष राजेश यादव ने ऑपइंडिया को बताया कि प्रशासन ने हवाई फायरिंग कर भीड़ को तितर-बितर किया। इस फायरिंग में 2 हिन्दू युवकों को गोली लग गई। दोनों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। फिलहाल दोनों की हालात खतरे से बाहर बताई जा रही है। हिंसक भीड़ ने ब्रह्मदेव मेहता नाम के एक नेपाली पत्रकार पर भी हमला किया। उन्हें पत्थरों और लाठियों से पीटा गया। ब्रह्मदेव का कैमरा छीन कर मोबाइल को तोड़ दिया गया। पत्रकार पर हमले का मास्टरमाइंड सज्जाद को बताया जा रहा है। सज्जाद अंसारी गाँवपालिका अध्यक्ष गफ्फार का दायाँ हाथ बताया जाता है।

इस हिंसा के बाद सुनसरी जिले के हिन्दू समुदाय एकजुट हो गए। उन्होंने प्रदर्शन करते हुए हमलावरों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की। पुलिस वीडियो फुटेज के आधार पर हमलावरों को चिन्हित करने का काम कर रही है। हिंसा को काबू करते हुए 17 पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं, जिनका इलाज चल रहा है। एक चश्मदीद ने ऑपइंडिया को बताया कि कुछ स्थानीय मुस्लिम पत्रकार अपने ही समुदाय को प्रताड़ित बताने का प्रोपेगेंडा चला रहे हैं।पीड़ित के तौर पर हिन्दुओं के बजाय मुस्लिमों को बता रहे हैं। इन पत्रकारों में ताबिल अंसारी, नसीम, अजमल नेपाली और मोहसीम अंसारी के नाम प्रमुख बताए गए। इन सभी पर हिन्दुओं के ही खिलाफ भ्रामक खबरें फैलाने का आरोप है।

घटना के एक चश्मदीद ने ऑपइंडिया को बताया कि मामले की शुरुआत अयोध्या में राममंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के समय से हुई थी। तब हरिनगर के ही गौतमपुर इलाके में वार्ड नंबर 3 में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने हिन्दू युवकों द्वारा लगाए गए भगवा ध्वज को नोंच कर फेंक दिया था। इस दौरान प्रशासन और ग्रामीणों ने दोनों पक्षों को समझा कर मामले को दबा दिया था। इस घटना के विरोध में जीवन मेहता ने एक वीडियो जारी किया था। वीडियो में जीवन मेहता ने भगवा झंडा के अपमान पर मुस्लिमों की आलोचना की थी। इसके बाद से ही वे मुस्लिमों के निशाने पर थे।


मुरादाबाद को मुस्लिम बहुल बनाने के लिए 30,000 बांग्लादेशी को घुसाया… फिर दंगों में 83 मौतें: केंद्र+राज्य की कांग्रेस सरकार का No Action – 496 पन्नों की रिपोर्ट

        मुरादाबाद के 1980 दंगों से पहले साजिशन बसाए गए थे अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए (चित्र साभार- ऑर्गेनाइजर)
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 8 अगस्त 2023 को साल 1980 में हुए मुरादाबाद दंगों की जाँच रिपोर्ट पेश की। इस दंगे में कम से कम 83 लोगों की हत्या हुई थी और 112 अन्य घायल हो गए थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश एमपी सक्सेना के एक सदस्यीय पैनल ने इन दंगों पर 496 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की है। जस्टिस सक्सेना की इस रिपोर्ट में दंगों के असल कारणों और उससे हुए नुकसान का जिक्र किया गया था।

तब केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों में ही कांग्रेस की सरकार थी। इस रिपोर्ट में हिंसा के दौरान वहाँ मौजूद न सिर्फ मुस्लिम और हिन्दुओं बल्कि तब तैनात पुलिस अधिकारियों का भी हवाला दिया गया है। दंगे के दौरान दर्ज हुए 6 हिंदुओं की गवाही का भी इस रिपोर्ट में उल्लेख है।

मुरादाबाद दंगों की रिपोर्ट के हर बयान में यह साफ़ है कि नरसंहार की योजना पहले से ही बनाई गई थी। 1980 में हुए इन दंगों के चश्मदीदों में से एक संतोष सरन ने अपनी लिखित गवाही में कहा है कि हिंसा की वजह वोट बैंक और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति थी।

दंगे 13 अगस्त 1980 में भड़के थे। अपनी गवाही में संतोष सरन ने खुलासा किया है कि दंगे भड़कने से पहले 30,000 से अधिक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को सोची समझी साजिश के तहत लाकर बसाया गया था। इन्हें मुरादाबाद के मुस्लिम बहुल गाँवों में रखा गया था।

दंगों की प्रमुख वजह संतोष सरन ने जिले की डेमोग्राफी बदलने की साजिश बताया। सरन के अनुसार 1947 में मिली आजादी के समय मुरादाबाद मुस्लिम बहुल था। तब शहर की आबादी में 52 प्रतिशत मुस्लिम और 48% हिन्दू थे। लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद कई मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे, जिस वजह से आज़ादी के बाद मुरादाबाद हिन्दू बहुल हो गया था। तब यहाँ 52 हिन्दू और 48 प्रतिशत मुस्लिम हो गए थे।

चश्मदीद सरन ने बताया कि कांग्रेस शासन में धीरे-धीरे मुरादाबाद में अवैध बांग्लादेशी मुस्लिमों की लगातार घुसपैठ करवाई गई। इस वजह से एक बार फिर शहर की जनसांख्यिकी बदल गई। इन्हीं अवैध घुसपैठियों को स्थानीय मुस्लिमों ने हिंदुओं के खिलाफ भड़काया।

आरोप यह भी है कि तत्कालीन राज्य और केंद्र की कांग्रेस सरकार ने इन अवैध घुसपैठियों पर कोई एक्शन नहीं लिया। चश्मदीद के मुताबिक कालांतर में इन्हीं अवैध मुस्लिम घुसपैठियों का दबदबा बढ़ता गया और मुरादाबाद में सांप्रदायिक हिंसा होना बहुत आम बात हो गई।

पिछली रिपोर्ट में एक अन्य चश्मदीद दयानंद गुप्ता की गवाही का जिक्र किया गया था। दयानंद के मुताबिक हिंसा की शुरुआत 13 अगस्त 1980 को मुरादाबाद के ईदगाह से हुई थी। इस दौरान मुस्लिम भीड़ ने पुलिस अधिकारियों और दलित समुदाय के वाल्मीकि लोगों पर बेवजह हमला किया था। इसके अलावा न्यायमूर्ति सक्सेना के नेतृत्व में हुई जाँच की रिपोर्ट में भाजपा, RSS व अन्य हिन्दू संगठनों को क्लीन चिट दी गई है।

इसी रिपोर्ट में हिंसा के लिए मुस्लिम लीग के कुछ राजनैतिक लोगों की सांप्रदायिक राजनीति को जिम्मेदार ठहराया गया था और बताया गया कि दंगो की वजह बना सांप्रदायिक उन्माद मुस्लिम लीग और कांग्रेस नेताओं द्वारा रची गई साजिश का परिणाम था। ‘मुरादाबाद में ईद की नमाज के दौरान ईदगाह में सुअर घुसने’ के आरोपों को भी इस रिपोर्ट में पूरी तरह से खारिज किया गया है।

साल 1980 के मुरादाबाद दंगों पर जस्टिस सक्सेना की 496 पन्नों की रिपोर्ट मई 1983 में ही तैयार कर दी गई थी। हालाँकि इतने साल बीत जाने के बाद भी इस रिपोर्ट को एक विभाग से दूसरे सरकारी विभाग तक घुमाया जाता रहा। इसी के साथ पिछले लगभग 4 दशकों में इस जाँच रिपोर्ट को कोई न कोई बहाना बना कर कम से कम 14 बार दबाया गया था।

अवलोकन करें:-

उत्तर प्रदेश : 43 साल बाद सामने आई मुरादाबाद दंगों की सच्चाई: हिंदुओं का हो कत्लेआम इसलिए नमाज में

योगी सरकार से पहले पहले किसी भी सरकार ने इसे सार्वजानिक नहीं किया। आखिरकार योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में UP में चल रही भाजपा सरकार ने 43 साल पुराने इस मामले को खोलने का फैसला लिया है। इसी साल मई में राज्य कैबिनेट ने न्यायमूर्ति एमपी सक्सेना आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करने का फैसला किया और मंगलवार 8 अगस्त को यह रिपोर्ट यूपी विधानसभा में पेश हुई।

उत्तर प्रदेश : 43 साल बाद सामने आई मुरादाबाद दंगों की सच्चाई: हिंदुओं का हो कत्लेआम इसलिए नमाज में भेजा सूअर, मुस्लिम लीग के नेता थे साजिशकर्ता

                         योगी और मुरादाबाद दंगा (साभार: File Photo/Vartha Bharati)
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साल 1980 में हुए दंगे में आयोग ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को क्लीन चिट दे दिया है और इसे मुस्लिम लीग की साजिश बताया है। बताते चलें कि यह वही मुस्लिम लीग (Muslim League) है, जिसे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने सेक्युलर बताया था।

लगभग 43 साल पहले ईद की नमाज के बाद भड़के दंगों का असली गुनहगार मुस्लिम लीग का डॉ. शमीम अहमद खान था। चुनावों में लगातार हार मिलने के बाद उसने मुस्लिमों की सहानुभूति हासिल करने के लिए दंगे भड़काने की साजिश रची थी। हालाँकि, साल 1989 में वह जनता दल से विधायक बनने में कामयाब हो गया।

मुरादाबाद दंगे की जाँच करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एमपी सक्सेना ने अपनी रिपोर्ट में दिए सुझाव दिया था कि मुस्लिमों को ‘वोट का खजाना’ समझने वालों को हतोत्साहित करना जरूरी है। इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि पाकिस्तान से वीजा लेकर आए लोगों को समय सीमा पूरी होने पर तुरंत वापस भेजा जाए।

जाँच रिपोर्ट में यह सामने आई है कि शमीम अहमद खान ने वाल्मीकि, सिख और पंजाबी समाज को फँसाने के लिए 13 अगस्त 1980 को ईद की नमाज के बीच सुअरों को धकेल दिया गया था। इसके बाद यह अफवाह फैला दी गई कि बच्चे एवं महिलाओं सहित मुस्लिमों की हत्या की जा रही है।

इसके कारण ईदगाह समेत 20 जगहों पर दंगा भड़क गया था। इस दौरान हिंदुओं और पुलिस पर हमले किए गए थे। मुरादाबाद से होते हुए यह हिंसा जल्द ही जिले के ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ संभल, अलीगढ़, बरेली और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) तक फैल गई। कांग्रेस शासित उत्तर प्रदेश में यह हिंसा 1981 की शुरुआत तक जारी रहीं।

इस दंगे की रिपोर्ट को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 43 साल बाद सार्वजनिक कर दिया है। इस रिपोर्ट को योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 8 अगस्त 2023 को विधानसभा में पेश की थी। रिपोर्ट सामने आने के बाद सियासत का दौर शुरू हो गया है।

मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के मुख्यमंत्रित्व में कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने इसकी जाँच डीएम बीडी अग्रवाल को सौंपा था। बाद में न्यायिक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने तीन साल बाद अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। उसके बाद किसी दल की सरकार ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की कोशिश नहीं की।

अलग-अलग सरकारों में इसे 14 बार मंत्रिमंडल के सामने रखकर इसे सदन में पेश करने की मंजूरी माँगी गई थी। हालाँकि, तुष्टिकरण की राजनीति के कारण इस माँग को खारिज कर दिया गया। इस बीच यह रिपोर्ट कुछ वर्षों के लिए गायब भी हो गई। इसे तमाम प्रयास के बाद रिकॉर्ड रूम से खोजा गया।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस दंगे में कोई भी सरकारी अधिकारी, कर्मचारी या हिंदू उत्तरदायी नहीं था। इनमें भाजपा या संघ की भी संलिप्तता नहीं थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि दंगों में आम मुस्लिम के बजाय शमीम के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग और डॉक्टर हामिद हुसैन उर्फ डॉक्टर अज्जी के समर्थक और भाड़े पर बुलाए गए लोग ही शामिल थे।

आयोग ने दंगों के दौरान पीएसी, पुलिस और जिला प्रशासन पर लगे आरोप भी खारिज कर दिए। जाँच में यह भी पाया गया कि इस दौरान हुईं ज्यादातर मौतें पुलिस फायरिंग में नहीं, बल्कि भगदड़ से हुई थीं। बताते चलें कि इस दंगे में 84 लोग मारे गए थे और 112 लोग घायल हुए थे।