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‘कट्टरपंथी रच रहे हत्या की साजिश, बताते हैं काफिर’: ज्ञानवापी में सर्वे का आदेश देने वाले जज के लिए NIA ने माँगी सुरक्षा, घर के पास से धराया था PFI एजेंट; सरकार को उपद्रवियों और इनके समर्थकों को भी आजीवन कारावास देनी चाहिए

                                        जिस जज ने दी ज्ञानवापी में सर्वे की अनुमति, उन्हें मिल रही धमकी
वाराणसी स्थित ज्ञानवापी ढाँचे के सर्वे का आदेश देने वाले जज को धमकी मिल रही है, जिसके बाद NIA ने उसके लिए सुरक्षा की माँग की है। न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने 2022 में ज्ञानवापी के ढाँचे की मूल प्रकृति का पता लगाने के ASI द्वारा इसके वैज्ञानिक सर्वे की अनुमति दी थी। मुस्लिम इसे मस्जिद बताते हैं, जबकि मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने यहाँ मंदिर ध्वस्त कर उसके ऊपर मस्जिद खड़ी कर दी थी। इसके भीतर कलश और त्रिशूल से लेकर कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी मिली हैं।

NIA कोर्ट के स्पेशल जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि जज रवि कुमार दिवाकर की सुरक्षा अपर्याप्त है और इसे बढ़ाने की ज़रूरत है। 3 सप्ताह पहले भी अदनान खान नामक शख्स ने उन्हें धमकी दी है, जिसे लेकर FIR भी दर्ज की जा चुकी है। NIA ने कहा है कि इस्लामी कट्टरपंथी उनकी हत्या की साजिश रच रहे हैं। इसे एक बेहद संवेदनशील मामला बताते हुए कहा गया है कि अगर अदनान की गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई गई तो कोई बड़ी घटना हो सकती है।

रवि कुमार दिवाकर बरेली में एडिशनल सेशन जज हैं। वो उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को भी जून 2022 में पत्र लिख कर निवेदन किया था कि उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए। 13 मई, 2022 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें सुरक्षा देने को कहा था, लेकिन इसे अब अपर्याप्त बताया जा रहा है। दिवाकर ने कहा था कि इस्लामी कट्टरपंथी अल्पसंख्यक समाज का ब्रेनवॉश कराने में लगे हैं और उन्हें ‘काफिर’ बताते हैं। वर्तमान में उन्हें 2 पुलिसकर्मी मिले हुए हैं, लेकिन आतंकी हमलों से निपटने के लिए उनके पास उचित हथियार तक नहीं हैं।

उत्तर प्रदेश ATS ने 3 जून, 2024 को अदनान खान के खिलाफ FIR भी दर्ज की थी। वो जस्टिस रवि कुमार दिवाकर को धमकाने के लिए इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करता है। जून 2022 में उन्हें ‘इस्लामिक आगाज़ मूवमेंट’ की तरफ से धमकी भरा पत्र भेजा गया था। इसके उनके परिवार की हत्या की धमकी के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी निशाना बनाया गया था। अप्रैल 2024 में दिवाकर ने बरेली के SSP को भी पत्र लिख कर कहा था कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय नंबरों से फोन कॉल आ रहे हैं। लखनऊ स्थित उनके आवास से PFI के एक एजेंट की गिरफ़्तारी भी हुई थी।

मी लॉर्ड! कहीं अरविन्द केजरीवाल को जमानत सुप्रीम कोर्ट के लिए ही सिरदर्द न बन जाए? आखिर किस दबाव में घोटाले को नज़रअंदाज़ कर चुनाव प्रचार पर जोर दिया गया?


सुप्रीम कोर्ट ने 10 मई 2024 को दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को 1 जून तक अंतरिम जमानत दे दी। अरविंद केजरीवाल को यह जमानत लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी के प्रचार के लिए दिया गया है। प्रवर्तन निदेशालय ने केजरीवाल की अंतरिम जमानत का विरोध किया था कहा था कि इससे गलत परंपरा होगी। जिसका मी लॉर्ड पर बिलकुल भी असर नहीं हुआ। क्योकि 
मी लॉर्ड तो पहले से ही मन बनाए बैठे थे। जो गंभीर जाँच का विषय है और इस जाँच का अधिकार मुख्य मी लॉर्ड को है। 

मी लॉर्ड ने केजरीवाल से पूछना चाहिए कि गिरफ्तार होने पर इस्तीफा क्यों नहीं दिया? लोक सभा की कितनी सीटों पर आपकी पार्टी चुनाव लड़ रही है? आखिर किस प्रभाव या दबाव के चलते मी लॉर्ड को चुनाव प्रचार के लिए केजरीवाल को Interim relief देनी पड़ी? चर्चा यह भी है कि केजरीवाल अपनी जमानत अवधि को किसी न किसी बहाने आगे बढ़ाने की योजना पर काम शुरू कर दिया है। उस स्थिति में मी लॉर्ड क्या करेंगे? केजरीवाल पर लगे आरोपों पर क्यों नहीं विचार किया गया? उनको दरकिनार कर चुनाव प्रचार को प्राथमिकता दी? क्या इसी पद्धति पर मी लॉर्ड अपने निर्णय देते रहेंगे? सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को बनाए रखने में मुख्य न्यायधीश को इस विषय को अति गंभीरता से लेना होगा। 

  

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने अंतरिम बेल से संबंधित सुनवाई करते हुए कहा कि शराब नीति मामले में केस अगस्त 2022 में दर्ज किया गया था और अरविंद केजरीवाल को लगभग डेढ़ साल बाद मार्च 2024 में गिरफ्तार किया गया। शीर्ष अदालत ने पूछा कि आखिर डेढ़ साल तक ED कहाँ थी।

हालाँकि, ईडी के विरोध के बावजूद अरविंद केजरीवाल को न्यायालय से अंतरिम जमानत मिल गई है, लेकिन इसको लेकर सोशल मीडिया पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं। वैसे भारत में न्यायपालिका पर सवाल उठाने के रिवाज नहीं है, लेकिन जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने जो तर्क दिया था वो उचित था। ईडी का संदेह भी सच साबित होता दिख रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में दर्ज अपने हलफनामे में प्रवर्तन निदेशालय ने तर्क दिया था कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। केंद्रीय एजेंसी ने कहा कि चुनाव प्रचार का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही कानूनी या संवैधानिक अधिकार है।

ED की आशंका आखिरकार सच साबित होती दिख रही है। अब राष्ट्रद्रोह में जेल में बंद खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह ने चुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से सात दिनों के लिए अंतरिम जमानत की माँग की है। वह खडूर साहिब लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता है। हालाँकि, हाई कोर्ट ने असम के डिब्रूगढ़ जेल में बंद अमृतपाल की याचिका खारिज कर दी है।

NSA के तहत जेल में ‘बंद वारिस पंजाब दे’ नाम के खालिस्तान समर्थक अमृतपाल की याचिका भले खारिज हो गई हो, लेकिन इससे एक नया रिवाज पैदा होने का खतरा पैदा हो गया है। इस देश में ऐसे दर्जनों नेता हैं, जिन पर विभिन्न मामलों में केस दर्ज है और कुछ नेता पुलिस एवं न्यायिक हिरासत में हैं। ऐसे में वे भी अपने लिए छूट की माँग कर सकते हैं। इनमें से प्रमुख नाम झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का नाम प्रमुख है।

अपने हलफनामे में ED ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कहा था, “अभिसाक्षी की जानकारी में अभी तक किसी भी राजनीतिक नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी गई है। ये (अरविंद केजरीवाल) तो चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार भी नहीं हैं। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को भी चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी जाती है, अगर वह हिरासत में है।”

जाहिर सी बात है कि जब उम्मीदवार नहीं होने के बावजूद सिर्फ चुनाव प्रचार के लिए अरविंद केजरीवाल अंतरिम जमानत की माँग कर सकते हैं तो कई ऐसे नेता हैं तो खुद उम्मीदवार हैं। ऐसे में वे अरविंद केजरीवाल की जमानत को प्रमुखता से उदाहरण के रूप में पेश करके अपने लिए भी ऐसी माँग कर सकते हैं। ऐसी में न्यायालय के सामने एक अलग तरह का धर्मसंकट खड़ा हो सकता है।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ भी जमीन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जाँच चल रही है। ईडी ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में 31 जनवरी 2024 को ईडी ने गिरफ्तार किया था। उन्होंने 2 फरवरी को अपनी गिरफ्तारी को गलत बताते हुए याचिका दाखिल की थी। हालाँकि, यह याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी। लेकिन, अरविंद केजरीवाल का हवाला देखकर सोरेन भी सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

हेमंत सोरेन और दिल्ली शराब घोटाले में बंद आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया भी न्याय में समानता के सिद्धांत का तर्क देकर अपने लिए अंतरिम जमानत की माँग कर सकते हैं। दरअसल, जमानत देना न्यायालय का विशेषाधिकार है और वह कई मामलों को ध्यान में रखते हुए किसी आरोपित को जमानत देता है। इनमें जिस धारा के आरोपित बंद है उसमें जमानत के लिए क्या प्रावधान हैं, जमानत पर निकलने के बाद वह लापता तो नहीं हो जाएगा, सबूतों के साथ छेड़छाड़ तो नहीं करेगा, गवाहों को धमकाएगा तो नहीं, गवाहों की हत्या तो नहीं करेगा, किसी अन्य आपराधिक मामले को अंजाम तो नहीं देगा… आदि कई ऐसे बिंदु होते हैं।

अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं और शक्तिशाली भी हैं। ऐसे में इन बिंदुओं पर न्यायिक सिद्धांत के तहत नजर डालना महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि अगर चुनाव प्रचार के नाम पर जमानत मिलती है तो ऐसी याचिकाओं की लंबी लाइन लग जाएगी, क्योंकि भारत में लगभग हर साल कहीं ना कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। इनमें पंचायत से लेकर लोकसभा के चुनाव तक शामिल हैं।

कोर्ट में ED ने भी तर्क दिया था, “पिछले 5 वर्षों में लगभग 123 चुनाव हुए हैं। यदि चुनावी प्रचार के उद्देश्य से अंतरिम वैधानिकता है तो किसी भी राजनेता को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और ना ही किसी राजनेता को अनुमति नहीं दी जा सकती है, क्योंकि चुनाव पूरे साल होता है।” ED ने तर्क दिया था कि संघीय ढाँचे में हर चुनाव महत्वपूर्ण है। किसी को कम या अधिक महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

एजेंसी ने यह भी तर्क दिया था कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। ED ने कहा कि एक राजनेता एक सामान्य नागरिक से विशेष दर्जे का दावा नहीं कर सकता। समन से बचने के लिए केजरीवाल ने 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव का यही बहाना बनाया था।

इन सब तमाम बिंदुओं को मिलाते हुए सोशल मीडिया पर लोग न्याय में समानता की बात लोग कर रहे हैं। लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि चुनाव प्रचार के लिए किसी आरोपित को, जो जेल में बंद है, उसे जमानत किस आधार पर दी जा सकती है। क्या अरविंद केजरीवाल की जगह कोई आम आदमी होता तो उसे यह सुविधा मिलती?

अधिकांश लोग किसी ना किसी पार्टी अथवा नेता के फॉलोअर होते हैं। अगर जेल में बंद। ऐसा ही कोई व्यक्ति तर्क दे कि उसे पार्टी अथवा नेता का प्रचार करना है तो क्या उसे यही सुविधा मिलेगी? इसका जवाब हाँ भी हो सकता है और ना भी। इसलिए देश में दशकों से न्यायिक सुधार की माँग भी की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में थोड़ा कदम बढ़ाए भी था, लेकिन वो फलीभूत नहीं हो पाया।

पेंडिंग पड़े हैं 4.5 करोड़ केस: जिस केस में अधिकतम सजा 7 साल, वह आज के सुप्रीम कोर्ट जजों के जन्म से पहले से चल रहा

अदालतों में लंबित केसों का जल्द निपटारा करने के उद्देश्य से देश में अनेकों नई अदालतें गठित की गयी थीं, लेकिन दूसरों को ज्ञान बांझने वाली न्यायिक प्रणाली स्वयं पुरानी आदतों को नहीं छोड़ पा रही है। 
देश की वर्तमान न्यायिक व्यवस्था को लेकर तमाम तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं और इसमें बदलाव की माँग भी उठती है। इस व्यवस्था के कारण देश की न्यायपालिका केसों के बोझ तले दबकर अंतिम साँसें गिन रही है। आश्चर्य कि बात यह है कि अदालतों में आज भी इतने पुराने केस पेेंडिंग हैं कि सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान 27 न्यायाधीशों का उस समय जन्म नहीं हुआ था।

इतना ही नहीं ट्रायल कोर्ट में किसी पुराने दस्तावेज की नक़ल लेने में ही महीनो लग रहे हैं, कोई पूछने वाला नहीं, जबकि फाइल हाथ में ही है, फिर विलम्भ क्यों?

ये मुकदमें आज भी कोर्ट में विचाराधीन हैं। ये मामले देश को सन 1950 में गणतंत्र घोषित करने के तीन के साल के भीतर पुलिस और आम जनता द्वारा दायर किए गए थे। इस वक्त में देश में लगभग 4.50 करोड़ से अधिक मामले पेंडिंग हैं और महाराष्ट्र के रायगढ़ पुलिस द्वारा दर्ज किया गया सबसे पुराना मामला है।

सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीशों में दिनेश माहेश्वरी सबसे उम्रदराज हैं। उनका जन्म 15 मई 1958 को हुआ था। उन्हें साल 2004 में सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। वे जनवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में हुए। जस्टिस माहेश्वरी इस साल 14 मई को रिटायर हो जाएँगे।

सबसे पुराना आपराधिक मामला

सबसे पुराना क्रिमिनल केस महाराष्ट्र की रायगढ़ पुलिस ने महाराष्ट्र निषेध अधिनियम की धारा 65E के तहत 18 मई 1953 को दर्ज किया गया था। इसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के सबसे उम्रदराज न्यायाधीश के जन्म से भी यह मामला 5 साल पुराना है।
केस दर्ज के होने के बाद रायगढ़ जिले के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, उरण ने आरोपित के खिलाफ उसी साल गैर-जमानती वारंट भी जारी कर दिया। तब से यह मामला चल रहा है। अब इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 9 फरवरी 2023 को तारीख दी गई है। अब आरोपित अभी जीवित है या उसका निधन हो गया है, स्पष्ट नहीं है।
इस केस में आरोपित पर 1949 के अधिनियम की धारा 65E (अफीम के अलावा किसी भी भी नशीले पदार्थ को बेचने, खरीदने या रखने) के तहत आरोप लगाया गया था। केस में दोषी साबित होने पर कम-से-कम से 3 साल जेल और 25,000 रुपए जुर्माना और अधिकतम 5 साल जेल और 50,000 रुपए जुर्माना का प्रावधान है।
रायगढ़ में ही 25 मई 1956 को धारा 381 (क्लर्क या नौकर द्वारा मालिक की संपत्ति चोरी) के तहत एक और आपराधिक मामला दायर किया गया था। इसमें शंकर सोनू मालगुंडे को आरोपित बनाया गया था। यह मामला भी न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, उरण के समक्ष सुनवाई के लिए लिस्ट हुआ है। इस केस में दोषी पाए जाने पर 7 साल की कैद की सजा का प्रावधान है।

सबसे पुराना दीवानी मामला

अगर वर्तमान के सबसे पुराने सिविल (दीवानी) केस की बात करें तो यह पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में दर्ज किया गया था। पारिवारिक संपत्ति के बँटवारे से जुड़ा ये मामला 3 अप्रैल 1952 को मालदा की दीवानी अदालत में दायर किया गया था। इसमें सबसे हैरानी की बात यह है कि इसकी सुध 66 साल बाद ली गई।
साल 2018 मालदा दीवानी जज (सीनियर डिवीज़न) को सूचित किया गया कि प्रतिवादी नंबर 4 की मौत हो गई है। वह अपने पीछे अपनी विधवा और तीन बच्चों- दो बेटों और एक बेटी को छोड़ गया है। इसके बाद जज ने कानूनी उत्तराधिकारी को पार्टी बनाने का आदेश दिया। इसके बाद से मामला वहीं लटका हुआ है।
इसी तरह दूसरा सबसे पुराना दीवानी मामला भी मालदा के इसी कोर्ट से जुड़ा हुआ है। यह केस पिछले 70 सालों से भी अधिक समय से लंबित है। इस मामले में पार्वती रॉय नाम की महिला ने बिप्रचरण सरकार नाम के व्यक्ति के खिलाफ 18 जुलाई 1952 को मुकदमा दर्ज कराया था।
इस मामले में साल 2018 में मध्यस्थता की एक पहल की गई थी। इस मध्यस्था को लेकर क्या हुआ, किसी को नहीं पता। तब से सिविल जज इसके परिणामों पर रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं।

सबसे पुराना मामला

देश के सभी उच्च न्यायालयों में लंबित केसों में सबसे पुराने केस की बात की जाए तो यह कलकत्ता उच्च न्यायालय के हिस्से में जाता है। कोर्ट के रिकॉर्ड में सबसे पुराना दीवानी मामला दर्ज है। यह साल 1951 से लंबित है। वहीं, इस हाईकोर्ट का सबसे पुराना आपराधिक मामला 1969 से लंबित है।
देश के कुल 25 उच्च न्यायालयों में कुल लगभग 60 लाख लंबित मामले हैं, जिनमें दीवानी और आपराधिक दोनों शामिल हैं। इनमें से 51,846 दीवानी मुकदमे और 21,682 आपराधिक मुकदमे 30 साल से अधिक पुराने हैं।
वहीं, ट्रायल कोर्ट में दर्ज 79,587 आपराधिक मुकदमे 30 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। वे मुकदमे जो 1975 या उससे पहले दर्ज किए गए थे और आज भी पेंडिंग हैं, ऐसे मुकदमों की संख्या 216 है। ट्रायल कोर्ट में दर्ज 3.23 करोड़ आपराधिक मामलों में 71 प्रतिशत पाँच साल या उससे कम पुराने हैं।
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अगर दीवानी मुकदमों के लेकर बात करें तो ट्रायल कोर्ट में ऐसे 36,223 मुकदमे लंबित हैं, जो 30 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। ऐसे मुकदमें जो साल 1965 या उससे पहले दायर किए गए थे और अभी भी लंबित हैं, ऐसे मुकदमों की संख्या 31 है। ट्रायल कोर्ट में पेंडिंग कुल 1.09 करोड़ दीवानी मामलों में 73 प्रतिशत केस पाँच से भी कम पुराने हैं।

एक्टिविस्ट बने पूर्व जजों से क्यों नहीं पूछे जाते सवाल : आलोचकों और देश विरोधी गठबंधन को जस्टिस रंजन गोगोई का जवाब

आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
कांग्रेस अब तक अपने मतलब के हिसाब से इतिहास बनाती और बिगाड़ती आई है। लेकिन दुर्भाग्य है कि कांग्रेस को अपना ही इतिहास याद नहीं रहता। हद तो तब हो जाती है, जब संविधान, संवैधानिक संस्थाओं और लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाली कांग्रेस संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देने लगती है। जब उसके मन के मुताबिक कोई फैसले नहीं होते हैं, तो अपने नापाक गठजोड़ के माध्यम से जजों को बेवजह विवाद में घसीटकर उन्हें बदनाम करने की कोशिश करती है। पूर्व प्रधान न्यायाधीश और राज्यसभा सदस्य रंजन गोगोई ने बुधवार को ऐसे ही गठजोड़ पर करारा हमला किया। उन्होंने कहा कि ‘एक्टिविस्ट न्यायाधीशों’ और उन लोगों से सवाल क्यों नहीं पूछे जाते जो सेवानिवृत्ति के बाद वाणिज्यिक मध्यस्थता के कामकाज करते हैं
एक्टिविस्ट जज किसके साथ काम कर रहे हैं?
गोगोई ने इशारों – इशारों में गठजोड़ पर हमला करते हुए एक बड़ा सवाल किया, “ये एक्टिविस्ट जज किसके साथ काम कर रहे हैं? ये सब कहने के लिए उन्हें कौन प्लेटफॉर्म दे रहा है? इस पर कोई सवाल नहीं पूछा गया।”
बाकी लोगों से सवाल क्यों नहीं पूछे जाते- गोगोई
सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों को मिलने वाले कामकाज के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में गोगोई ने कहा कि उनकी तीन श्रेणियां होती हैं ”एक्टिविस्ट न्यायाधीश”, वाणिज्यिक मध्यस्थता का कामकाज लेने वाले और अन्य प्रकार के कामकाज लेने वाले। गोगोई ने कहा, ”तीसरी श्रेणी वालों को ही विवादों में क्यों घसीटा जाता है? दो अन्य श्रेणी के लोगों से सवाल क्यों नहीं पूछे जाते?” गोगोई एक कानूनी समाचार पोर्टल के सहयोग से नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी फाउंडेशन के पूर्व छात्रों के परिसंघ द्वारा आयोजित वेबिनार में बोल रहे थे।
किसी मकसद की बात न थोपें- गोगोई
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है, लेकिन एक ईमानदार, बौद्धिक और सार्थक आलोचना होनी चाहिये। उन्होंने कहा, ”व्यवस्था (न्यायिक) आलोचना के खिलाफ नहीं है और इसमें सुधार के लिए गुंजाइश है, लेकिन जहां तक किसी निर्णय का संबंध है तो उसपर ईमानदार, बौद्धिक और सार्थक बहस होनी चाहिये। किसी मकसद की बात न थोपें। यह विनाशकारी है …।”
राज्यसभा मनोनयन पर विपक्ष ने उठाया था सवाल
गोगोई के इस बयान को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राज्यसभा में उनके मनोनयन की कांग्रेस सहित विभिन्न सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने आलोचना की थी। कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि ‘सरकार के इस निर्लज्ज कृत्य ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को हड़प लिया है।’ पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के अनुसार, ‘जस्टिस गोगोई ने मुख्य न्यायाधीश रहते हुए रिटायरमेंट के बाद पद ग्रहण करने को संस्था पर धब्बे जैसा बताया था।’ माकपा ने इसे न्यायपालिका को कमजोर करने का शर्मनाक प्रयास करार दिया था।
पूर्व जज, वकील, पत्रकार और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ पर हमला
जस्टिस रंजन गोगोई ने अपने बयाने के माध्यम से पूर्व जज, वकील, पत्रकार और राजनीतिज्ञों के उस गठजोड़ की ओर इशारा किया है, जो समय-समय पर अपनी साजिशों को अंजाम देते रहते हैं। मोदी सरकार के खिलाफ साजिशें करते रहते हैं। वर्ष 2018 में जब 5 जजों ने पहली बार तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी तब कुछ एजेंडा पत्रकार जैसे शेखर गुप्ता और वकील जैसे इन्दिरा जय सिंह प्रेस कॉन्फ्रेंस होने से पहले वहां मौजूद थे। सवाल उठता है कि यह प्रेस कॉन्फ्रेंस जब अचानक से हुई तो उन्हें पहले से कैसे पता था और वे उस स्थान पर कैसे मौजूद थे? ये सभी सवाल एक ही इशारा करते हैं और वह है गठजोड़ का। पूरे प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, शेखर गुप्ता को न्यायाधीशों के पीछे खड़े देखा गया। जब पत्रकारों ने जयसिंह से कुछ सवाल किए, तो उन्होंने कहा था कि वह देश के एक नागरिक के तौर पर आई हैं।
विपक्ष ने की राजनीतिकरण की कोशिश
रिपोर्ट के अनुसार उसी दिन बाद में, सीपीआई नेता डी राजा ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चेलमेश्वर के आवास का दौरा किया था। इससे स्पष्ट था कि विपक्ष ने इस मामले का राजनीतिकरण करने की भरपूर कोशिश की थी।
गठजोड़ दीमक की तरह देश को खोखला कर रहा है
हालांकि, रंजन गोगोई भी उन जजों में शामिल थे लेकिन अब गोगोई ने ही  जजों, वकीलों और पत्रकारों की मिलीभगत पर अब बोलना शुरू किया है। जस्टिस गोगोई का जजों पर सवाल उठाना दिखाता है कि किस तरह रिटायरमेंट के बाद वे इस गठजोड़ के जाल में फंस जाते हैं जो पूरे भारत में दीमक की तरह फैला हुआ है और देश को अंदर से खोखला कर रहा है।
राम मंदिर पर फैसले के खिलाफ भड़काने की कोशिश
रंजन गोगोई ने यह भी खुलासा किया कि “कुछ लोग” राम मंदिर के फैसले में भी देरी करवाना चाहते थे। यहां तक रामंदिर के पक्ष में फैसले आने के बाद कई पूर्व नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों ने एक समुदाय विशेष को न्यायपालिका के खिलाफ खुलेआम भड़काने की कोशिश की थी। 
PIL डाल कर कोर्ट का समय नष्ट किया जाता है
यह तो सभी ने देखा है कि किस तरह से बार-बार प्रशांत भूषण और हर्ष मंदर जैसे लोगों द्वारा PIL डाल कर न सिर्फ कोर्ट का समय नष्ट किया जाता है, बल्कि किसी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर भी स्टे लगवाया जाता है। इसी तरह से देश में जारी गठजोड़ जजों को भी प्रभावित करते हैं और उन्हें अपना ऐक्टिविस्ट बना लेते हैं या वे स्वयं बन जाते है। रंजन गोगोई ने जिस तरह से वकीलों और जजों की किसी मामले को लेकर दोस्ती के बारे में सवाल किया है वह भी जजों के Conflict of Interest को दिखाता है।
देश विरोधी गठजोड़ से न्यायपालिका की मुक्ति का समय 
जिस तरह से जस्टिस रंजन गोगोई ने आलोचकों को जवाब दिया है और अपना स्टैंड लिया है, साथ ही लगातार खुलासे कर रहे हैं, उससे स्पष्ट हो गया है कि अब मोदी सरकार को पूर्व जज, वकील, पत्रकार और राजनीतिज्ञों के इस गठजोड़ को खत्म करने के लिए कदम उठाना होगा। ताकि न्यायपालिका को इस देश विरोधी गठजोड़ से मुक्ति मिल सके।
जज और फैसला मनमाफिक ना हो तो कांग्रेस करने लगती है साजिश
जस्टिस ए के सीकरी को बेवजह विवाद में घसीटकर कांग्रेस ने अपनी उस मानसिकता को उजागर कर दिया कि वो जज भी अपने माफिक चाहती है और इंसाफ भी। दरअसल जस्टिस सीकरी उस हाई पावर्ड कमेटी में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के प्रतिनिधि थे जिसमें आलोक वर्मा को सीबीआई डायरेक्टर पद से हटा दिया गया था। आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी जांच में कई संगीन आरोप सही पाए गए।


जस्टिस सीकरी सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के बाद सबसे सीनियर जज थे। उन्हें साल 2018 में केंद्र सरकार ने सी-सैट यानी कॉमनवेल्थ सचिवालय पंचाट ट्रिब्यूनल का प्रेसिडेंट/मेंबर नामित किया था। लेकिन कांग्रेस और उसके समर्थक मीडिया ने आरोप लगाया कि वर्मा को हटाने के फैसले के लिए ही जस्टिस सीकरी को ईनाम दिया गया।
हालांकि जस्टिस काटजू समेत कई हस्तियों ने कांग्रेस के आरोपों को बकवास बताया लेकिन जस्टिस सीकरी ने खुद ही इस पद के लिये मना कर दिया।

कांग्रेस ने किस तरह उसके हित में फैसले देने वाले न्यायाधीशों को इनाम दिया था।
सिख विरोधी दंगों में क्लीनचिट देने वाले जस्टिस को भेजा राज्यसभा
जस्टिस गोगोई से पहले भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश राज्यसभा के सांसद रह चुके हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि जस्टिस गोगोई जहां नामित सदस्य के तौर पर राज्यसभा सांसद बने हैं, वहीं पहले वाले जज कांग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे थे। इससे पहले कांग्रेस ने पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा को वर्ष 1998 में राज्यसभा के लिए भेजा था। जस्टिस मिश्रा वर्ष 1998 से 2004 तक राज्यसभा के सांसद थे। 

हिन्दुस्तान की खबर के अनुसार जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सांसद बनाए जाने पर सवाल उठे थे। उस समय कहा गया था कि 1984 के सिख विरोधी दंगों की जांच रिपोर्ट में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को क्लीनचिट देने का उन्हें इनाम दिया गया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों की जांच के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 26 अप्रैल 1985 में रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाया था। जस्टिस मिश्रा ने अपनी रिपोर्ट में कांग्रेस को क्लीनचिट दी थी। जस्टिस मिश्रा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का चेयरमैन भी बनाया गया था।
जगन्नाथ मिश्रा को क्लीनचिट देने वाले जस्टिस को बनाया सांसद
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बहरुल इस्लाम का मामला तो काफी दिलचस्प है। शायद यह पहला मामला है कि कोई व्यक्ति राज्यसभा सांसद बनने के बाद जज बना हो। जस्टिस बहरुल इस्लाम पहले राज्यसभा सांसद बने फिर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज बने। बहरुल इस्लाम 1962 में असम से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा के लिए चुने गए।

कांग्रेस पार्टी ने उन्हें दूसरी बार 1968 में फिर राज्यसभा भेजा, लेकिन कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें 1972 में तत्कालीन असम और नागालैंड हाईकोर्ट (गुवाहाटी हाईकोर्ट) का जज बना दिया गया।
विकीपीडिया के अनुसार जस्टिस इस्लाम 1980 में रिटायर होने के बाद सक्रिय राजनीति में चले गए, लेकिन इंदिरा गांधी ने हाई कोर्ट के जज के रूप में रिटायर होने के 9 महीने बाद फिर से उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया। एक रिटायर जज का फिर से जज बनाने का फैसला अपनेआप में अकेला था।
ऑपइंडिया के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में उन्होंने बिहार के उस समय के कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के खि‍लाफ जालसाजी और भ्रष्टाचार के मामले में क्लीन चिट देते हुए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने से मना कर दिया था। 1983 में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद उन्हें तीसरी बार कांग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेज दिया।