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शोएब जमई मुस्लिमों का प्रतिनिधि और अधिवक्ता सुबुही खान को अपनी बात रखने का भी हक़ नहीं?

शोएब जमई 'मुस्लिम पक्ष' हो गया और सुबुही खान नहीं, क्यों?
अधिवक्ता सुबुही खान ने लाइव टीवी शो में इस्लामी कट्टरपंथी शोएब जमई को पीट दिया। हिंसा किसी भी चीज का जवाब नहीं हो सकता है, लेकिन एक पढ़ी-लिखी महिला ने जब मजबूर होकर किसी को शो से भागने के लिए कहा, तो इसके पीछे ज़रूर वाजिब कारण रहा होगा। यहाँ एक मुस्लिम महिला के अधिकारों की चिंता किसी को नहीं है लेकिन एक इस्लामी कट्टरपंथी के लिए आँसू बहाए जा रहे हैं। शोएब जमई जैसे गुंडे को अगर दो-चार हाथ या लात पड़ भी गए तो इसमें हंगामा करने का क्या मतलब है?

शोएब जमई तो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुस्लिमों को मिला कर हिन्दुओं पर शासन करने की बातें कर रहा था, क्या इसके लिए उस पर हेट स्पीच का मामला नहीं चलना चाहिए? जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को कहा है कि पुलिस हेट स्पीच का स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करे, तो क्या उसमें इस्लामी कट्टरपंथियों की गिनती नहीं होती? शोएब जमई के लिए आँसू बहाने वालों को बताना चाहिए कि क्या वो उसकी विचारधारा का समर्थन करते हैं?

उदाहरण के लिए ‘ज़ेहरा कैलीग्राफी’ नामक कंपनी के CEO का ट्वीट देखिए। उसने दावा कर दिया कि मुस्लिम पक्ष की बात नहीं सुनी गई और उन्हें जलील किया गया। ज़ेहरा खुद एक महिला हैं, ऐसे में उन्हें इसका जवाब देना चाहिए कि क्या सुबुही खान मुस्लिम नहीं हैं? सुबुही खान का पक्ष ‘मुस्लिम पक्ष’ क्यों नहीं हो सकता और शोएब जमई कैसे मुस्लिमों का प्रतिनिधि बन गया? इसके लिए तो न कोई मतदान हुआ है, न ऐसी कोई घोषणा हुई है।

फिर तो मुस्लिम समाज को मतदान कर के आपस में ये निर्णय ले लेना चाहिए कि उनका आधिकारिक प्रतिनिधि कौन है और कौन नहीं। अब पत्रकार से यूट्यूबर बने अजीत अंजुम को देख लीजिए। वो शोएब जमई को ऐसे सलाह दे रहे हैं जैसे वो उनके घर के आदमी हों। अजीत अंजुम ने कह दिया कि शोएब जमई पब्लिसिटी के लिए हो रहे स्टंट का हिस्सा बन कर अपने कौम का नुकसान कर रहे, कुछ महीने उन्हें घर में बैठना चाहिए।

अजीत अंजुम ने शायद इतनी सहानुभूति और चिंता तो अपने बेटे के लिए भी नहीं जताई होगी। लोग अजीत अंजुम को कह रहे हैं कि वो शोएब जमई को भी अपनी तरह यूट्यूब चैनल बनाने की सलाह दे दें। फिर दोनों मिल कर भी प्रोपेगंडा कर सकते हैं। जहाँ अजीत अंजुम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ झूठ फैलाएँगे, वहीं शोएब जमई ISIS जैसे आतंकी संगठनों की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए हिन्दू विरोधी बातें करेंगे।

अगर सुबुही खान को मुस्लिमों या मुस्लिम महिलाओं का पक्ष रखने की अनुमति नहीं है तो फिर किसे है? राजस्थान के उदयपुर में दर्जी कन्हैया लाल तेली का सिर कलम करने वाले दोनों हत्यारों को? दुनिया भर के मुस्लिम युवाओं को कट्टर बनाने के लिए वीडियो बनाने वाले इस्लामी मुबल्लिग ज़ाकिर नाइक को? या फिर पाकिस्तान में बैठे उन आतंकियों को, जो अल्लाह और जिहाद के नाम पर खून बहाते हैं? या फिर सीधे ISIS को, जिसके नाम में ही इस्लाम है।

शोएब जमई का समर्थन करने वाले वही लोग हैं, जिन्होंने कन्हैया लाल तेली और महाराष्ट्र के अमरावती के उमेश कोल्हे की हत्या की निंदा नहीं की थी। ये वही लोग हैं, जो ‘द केरल स्टोरी’ फिल्म की निंदा करते हैं, क्योंकि हिन्दू लड़कियों के साथ ‘लव जिहाद’ करने वाले कट्टरपंथियों का वो समर्थन करते हैं। शोएब जमई के पक्ष में बयान देने वाले वही लोग हैं, जो महिला विरोधी हैं। ये नहीं चाहते कि एक मुस्लिम महिला को खुल कर अपनी बात रखने का अधिकार मिले।

अवलोकन करें:-

चल निकल यहाँ से, तेरे बाप को भी मारूँगी… सुबुही खान ने बताया न्यूज शो में ही शोएब जमई को क्यों पीट

शोएब जमई लगातार नफरत भरी बातें कर रहा है। वो हिंसा भरे बयान दे रहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश को मिला कर मुस्लिम PM बनाने के उसके बयान को क्या देशद्रोह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए क्या? ऐसे देशद्रोही के लिए लिबरल गिरोह के लोग सहानुभूति जता रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो ये कि न्यूज़ डिबेट्स में ऐसे व्यक्ति को बुलाया ही नहीं जाना चाहिए। किसी को नफरत फैलाने के लिए मंच देने का क्या तुक है भला? 

‘एक मोहल्ला, एक होलिका’ का ज्ञान देने वाले ईद पर ‘एक मोहल्ला, एक बकरा’ वाली सलाह देंगे? लिबरल गिरोह एक्टिव

होली आ गई है। होली, मतलब रंग-गुलाल का त्योहार। हिन्दू त्योहार। अब चूँकि त्योहार हिन्दुओं का है, इसीलिए इस पर हंगामा मचाया जाना और इसके प्रति घृणा फैलाई जानी तो स्वाभाविक है। ऐसा करने वाले वामपंथी होते हैं, जिनका साथ कट्टर इस्लामी लोग बखूबी देते हैं।  हिन्दू त्योहारों के खिलाफ प्रोपेगंडा में मीडिया, बुद्धिजीवी और सेलेब्रिटीज का एक पूरा का पूरा गठबंधन शामिल रहता है। होली, दीपावली, करवाचौथ, दशहरा और शिवरात्रि आदि हिन्दू त्योहारों को लेकर भी समय-समय पर ज्ञान दिए जाते रहे हैं। समय रहते हिन्दुओं को चेतना होगा, हिन्दू त्योहारों पर विधवा विलाप कर ज्ञान बांटने वालों का उनके परिवार सहित सामाजिक बहिष्कार करना होगा। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्ती के बावजूद होली पर व्यवधान डालने वाले भूल रहे हैं कि जिस दिन हिन्दू का संयम टूटा तब कोई गंगा-जमुनी तहजीब, संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग रोने वाला गैंग आकर छातियां न पीटे। 

ये कोई नई बात भी नहीं है। होली को लेकर पहले भी ज्ञान दिया जाता रहा है। जैसे, होली आते ही सब ‘वॉटर एक्टिविस्ट’ बन जाते हैं और पानी बचाने की बातें करने लगते हैं। ऐसे सेलेब्रिटी जो अपने घर में स्विमिंग पूल में नहा-नहा कर रोज हजारों लीटर पानी बर्बाद करते हैं, वो भी होली पर पानी बचाने का ज्ञान देते नजर आते हैं। कभी ‘सूखी होली’ खेलने को कहा जाता है तो कभी केवल फूलों का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।

जब रंग ही गायब हो जाए तो होली कैसी? अब ‘दैनिक जागरण’ के एक विज्ञापन को देखिए। ये स्पष्ट नहीं है कि ये विज्ञापन कब का है, लेकिन ये होलिका दहन को लेकर ही है। ‘दैनिक जागरण की पहल’ के नाम पर अख़बार ‘एक मोहल्ला, एक होलिका’ नाम से एक विज्ञापन लेकर आ गया। इसमें उसने लिखा, “इस बार होली पर प्रयास करें कि थोड़ी दूर पर अलग-अलग होलिका जलाने की जितना जगह हो सके, एक मोहल्ले में एक ही होलिका जलाएँ। इससे प्रदूषण घटेगा, अपमापन बढ़ेगा।” साथ ही कुछ ‘दिशानिर्देश’ भी दिए गए।

ईद-क्रिसमस पर जम कर बधाइयाँ देने वाली मीडिया होली पर जम कर हिन्दुओं को नीचा दिखाती है। ‘दैनिक जागरण’ ने भी हिन्दुओं को ये सलाह दिया – यातायात बाधित न करें, इससे हमें और आपको ही परेशानी होगी, हाईटेंशन व अन्य तारों को बचाएँ, लकड़ी की जगह उपलों का प्रयोग करें, ताकि बचे रहें हमारे पेड़, ऐसा कोई सामान न जलाएँ जिससे पर्यावरण में प्रदूषण पैदा हो। क्या ईद-क्रिसमस पर ऐसे ज्ञान निकलते हैं?

अब जरा सोचिए। क्या ईद पर मीडिया लोगों को ये सलाह देती है कि एक मोहल्ले में एक ही बकरा काटें, क्योंकि जीव-जंतुओं की हत्या करना ठीक नहीं है? क्या ऐसे सलाह दिए जाते हैं कि जानवरों के खून को सड़क पर न बहाया जाए और बचे हुए मांस के टुकड़ों को सड़क पर न फेंका जाए? इससे तो बीमारी पैदा ही होती ही है। इस्लामी मुल्कों में सड़क पर खून की नदियाँ बहती दिखती हैं। ऐसे ही, ईद पर कभी ये ज्ञान नहीं दिया जाता कि सड़क जाम कर के नमाज न पढ़ें, इससे तो सचमुच यातायात बाधित होता है।

इसी तरह क्रिसमस और ईसाई नववर्ष के मौके पर कभी ये ज्ञान नहीं दिया जाता कि पटाखे न जलाएँ। दीवाली खत्म होते ही इस तरह का ज्ञान देने की तारीख़ एक्सपायर हो जाती है। क्रिसमस पर कभी आर्टिफिसियल पेड़ों को घर पर न लाने की सलाह नहीं दी जाती। कभी ये नहीं कहा जाता कि पार्टियों में पानी और भोजन बर्बाद न करें। उलटा और खुल कर जश्न मनाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि सारे पर्यावरण का ठेका हिन्दुओं ने ही ले रखा है जो प्रकृति की पूजा करते हैं।

क्या हम ‘दैनिक जागरण’ से ये पूछ सकते हैं कि अख़बारों के लिए कागज कैसे बनता है? इसके लिए पेड़ काटे जाते हैं या नहीं? क्या ‘दैनिक जागरण’ लोगों को ये सलाह देते हुए खबर प्रकाशित करेगा कि आप अखबर न खरीदें, क्योंकि इसके लिए जो कागज आता है वो पेड़ काट कर बनाया जाता है। लेकिन नहीं, जिन्हें ‘एक मोहल्ला, एक बकरा’ और ‘एक मोहल्ला, एक क्रिसमस ट्री’ लिखने की हिम्मत नहीं है, वो एक मोहल्ला, एक होलिका’ लिख रहे हैं।

होलिका दहन एक ऐसा त्योहार है, जिसे भक्त प्रह्लाद के राक्षसों के अत्याचार के बावजूद ज़िंदा बच जाने की कहानी कहता है। अब देखिए, एक यूट्यूबर और कथित महिला एक्टिविस्ट ने तो होलिका दहन को ही महिला विरोधी त्योहार बताते हुए पूछ दिया कि एक सभ्य समाज में स्त्री को ज़िंदा जलाना कहाँ तक उचित है? ऐसी बातें वही करते हैं, जिन्हें न तो हमारे पर्व-त्योहारों के पीछे का कॉन्सेप्ट पता है और न इसका इतिहास और इसकी कथा।

होलिका दहन के बारे में हिन्दुओं को पता है कि होलिका अपने मासूम भतीजे प्रह्लाद को ज़िंदा जलाने के लिए आग में बैठ गई थी, लेकिन वो जल गई और भक्त प्रह्लाद बच गए। अगर होलिका जलाना स्त्री-विरोधी है तो क्या हर साल रावण को दशहरा के मौके पर जलाए जाने को पुरुष विरोधी बता कर आंदोलन खड़ा कर दिया जाना चाहिए? स्त्रियों की जहाँ पूजा होती है, उस हिन्दू धर्म में इस तरह के पाश्चात्य वोक एक्टिविज्म की ज़रूरत ही नहीं है।

होली रंगों का त्योहार है। रंग और पानी के बिना इसे हम क्यों मनाए? ऐसे ही, महाशिवरात्रि पर दूध बचाने का ज्ञान दिया जाता है। दीवाली पर कहा जाता है कि दीये मत जलाओ और पटाखे मत उड़ाओ। दुर्गा पूजा कर हिन्दुओं को ये कह कर नीचा दिखाया जाता है कि भारत में बलात्कार होते हैं। गणेश चतुर्थी के मौके पर प्रतिमा जल में न विसर्जित करने को कहा जाता है। अर्थात, जितने हिन्दू त्योहार उतने ही किस्म के नए-नए ज्ञान।

त्योहार हमेशा से वैसे ही मनाए जाने चाहिए जैसा हमारे शास्त्रों पर वर्णित है और जैसे हमारे पूर्वज पूरे उत्साह के साथ मनाते रहे हैं। हिन्दू त्योहारों में न तो हिंसा के लिए कोई जगह है और न ही किसी और को नुकसान पहुँचाया जाता है। उत्सव के दौरान सब जश्न में डूबे रहते हैं, एक-दूसरे से मिलते हैं और ईश्वर की पूजा-अर्चना करते हैं। इसमें लिबरल गिरोह के ज्ञान के लिए कोई जगह नहीं है। गया की ज़रूरत जिन्हें है, उन्हें देने में इनकी हालत पस्त हो जाती है क्योंकि वो ‘सिर तन से जुदा’ कर देते हैं।

इसीलिए, खूब अच्छे से होली मनाइए। रंग लगाइए एक-दूसरे को। पानी में रंग घोल कर एक-दूसरे पर उड़ेलिए। हाँ, बस हमें ऐसे रंगों का प्रयोग नहीं करना है जिससे हमारा नुकसान हो जाए। ब्रज में फूलों की होली खेलिए, काशी में चिताभस्म की होली खेलिए और मोहल्ले में अबीर-गुलाल सबका प्रयोग कर के होली खेलिए। पकवान खाइए, पूजा-पाठ कीजिए और ज्ञान देने वाले को दिखा-दिखा कर ये सब कीजिए। कोई ‘दैनिक जागरण’ या फिर कोई ‘निर्देश सिंह’ ये डिसाइड नहीं कर सकते कि हिन्दू अपने त्योहार कैसे मनाएँ।

आर्यन खान शाहरुख खान का बेटा, फिर मिर्च नवाब मलिक को क्यों लग रही है?

जब भी बॉलीवुड में ड्रग का मुद्दा चर्चा में आता है, लिबरल गैंग एकदम बॉलीवुड के पक्ष में खड़ा हो जाता है, लेकिन एक लम्बे समय से इसी बॉलीवुड में यौन शोषण का मुद्दा #metoo चर्चा में है, कोई नहीं बोलता, क्यों महिला यौन शोषण पर इन लोगों की आवाज़ क्यों नहीं निकलती? और जहाँ तक नवाब मलिक की बात है कि जब समीर के विरुद्ध उनके पास इतने सबूत हैं तो मंत्री होते हुए कार्यवाही क्यों नहीं की? क्यों अब तक चुप्पी साधे हुए थे?
एनसीबी (NCB) ने आर्यन खान को ड्रग मामले में गिरफ्तार किया तो परंपरागत और सोशल मीडिया पर युद्ध सा छिड़ गया। आर्यन खान के समर्थन और एनसीबी के विरोध में कई लोग उठ खड़े हुए। तर्क, कुतर्क और बालसुलभ बातों से मीडिया स्पेस भर गया। गिरफ्तारी के पीछे के कारणों को लेकर लगाए गए कुछ कयास और जारी किए गए कुछ बयानों को पढ़कर लगा जैसे उनका उद्देश्य ही एनसीबी की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाना और आम लोगों में भ्रम पैदा करना था। हाल के वर्षों में केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों के खिलाफ माहौल बना कर भ्रम पैदा करना लिबरल इकोसिस्टम के टूलकिट का ऐसा हिस्सा है जिसे बार-बार आजमाया जाता रहा है।

आर्यन के बहाने NCB पर हमला: नवाब मलिक सहित लिबरल गिरोह की सोची-समझी चाल, कानूनी कार्रवाई को दिया राजनीतिक रंग

मुंबई क्रूज ड्रग्स पार्टी केस में एनसीबी ने एक्टर शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को गिरफ्तार किया है, लेकिन इस मुद्दे पर परिवार से ज्यादा महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार के मंत्री और राकांपा नेता नवाब मलिक को ज्यादा मिर्ची लग रही है। वे शुरू से ही इस मामले में एनसीबी अधिकारी समीर वानखेड़े को निशाना बना रहे हैं। इसको लेकर आज सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है कि आखिर नवाब मलिक किस हैसियत से जांच को लेकर रोज ट्विटर पर सवाल पर सवाल उठा रहे हैं। यूजर्स का कहना है कि असल में नवाब मलिक एनसीबी और समीर वानखड़े को इसलिए निशाना बना रहे हैं क्योंकि एनसीबी ने मलिक के दामाद को ड्रग्स के मामले में गिरफ्तार किया था। उनके दामाद समीर खान को 9 महीने बाद इस साल सितंबर में जमानत पर रिहा किया गया था।

यह बताया गया कि केंद्र सरकार या भारतीय जनता पार्टी दरअसल आर्यन खान को नहीं बल्कि उनके बहाने शाहरुख खान के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। ऐसे बयान के पीछे के कारण तो इसे जारी करने वाले बयानबाजों को ही पता होंगे पर सबकुछ धड़ल्ले से कहा गया। जैसे शाहरुख खान की वर्तमान केंद्र सरकार से कोई दुश्मनी है और सरकार इसी कारण से शाहरुख़ खान को परेशान कर रही है। यह तब जब शाहरुख़ खान की केंद्र सरकार से ही नहीं, भाजपा के साथ भी कभी किसी तरह का सार्वजनिक विवाद नहीं रहा। फिर भी कुछ टीवी न्यूज़ चैनल, उनके संपादक और संवाददाताओं ने अपनी चिर परिचित नीति के तहत एनसीबी की कार्रवाई का खुलकर विरोध और आर्यन खान का समर्थन किया।

आगे चलकर कहा गया कि शाहरुख खान को इसलिए टारगेट किया जा रहा है क्योंकि वे मुसलमान हैं। इस तरह के तर्क हमेशा से अजीब लगते रहे हैं पर समय-समय पर यह दोहरा कर इसे सच बनाने का प्रयास जारी है। कुछ तो अपने कुतर्क मार्ग पर चलकर वहाँ पहुँच गए जहाँ से यह कहते सुने गए कि; चूँकि शाहरुख़ खान सदी के सबसे लोकप्रिय भारतीय हैं इसलिए उनके बेटे के साथ ऐसा व्यवहार न तो कानून सम्मत है और न ही संविधान सम्मत।

भारत का कानून या सरकार शाहरुख़ खान की लोकप्रियता के आधार पर आचरण करें, यह कहना वैसा ही है जैसे यह कहा जाए कि अमिताभ बच्चन के कर्ज बैंकों द्वारा केवल इसलिए माफ़ कर देने चाहिए थे क्योंकि उन्हें सदी का महानायक माना जाता रहा है।

ऐसा लगता है जैसे मीडिया में आर्यन और शाहरुख़ खान के समर्थन में दिए गए बयान और कुतर्क वगैरह का असर होता दिखाई न दिया तो राजनीतिक हस्तक्षेप का सहारा लिया गया। अब महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नवाब मलिक ने इसे ड्रग मामले में की गई सामान्य कानूनी कार्रवाई से आगे ले जाकर खुद और एनसीबी अधिकारी समीर वानखेड़े के बीच का मामला बना दिया है। नतीजा यह हुआ है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब राज्य के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के दिनों से भी नीचे चली गई है। नवाब मलिक को वानखेड़े से चाहे जो समस्या हो पर आर्यन खान मामले में उनका व्यक्तिगत हस्तक्षेप किसी भी तरह से संवैधानिक नहीं है।

वानखेड़े के विरुद्ध वे रोज कोई न कोई ऐसा बयान जारी करते हैं जो लगते तो व्यक्तिगत हमले हैं पर उनका उद्देश्य एनसीबी के साथ-साथ केंद्र सरकार के अन्य विभागों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना जान पड़ता है। ऐसा महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार के मंत्री और सत्ताधारी दलों के अन्य नेता पहले भी कर चुके हैं। आज नवाब मलिक जो कर रहे हैं वो केंद्र सरकार के विरुद्ध खड़े होने के अनिल देशमुख के अजेंडे का ही विस्तार है। पूर्व गृहमंत्री देशमुख अपने दिनों में लगभग रोज केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कोई न कोई जाँच का आदेश देते ही रहते थे। यह बात और है कि बाद में उनका और उनके पुलिस अफसरों का क्या बना वह सबके सामने है।

पिछले कुछ वर्षों से केंद्रीय जाँच एजेंसियों के विरुद्ध कुछ राज्य सरकारों ने जिस तरह की राजनीति की है वह कई स्तरों पर संघीय ढाँचे को क्षति पहुँचाने वाली रही है। चंद्रबाबू नायडू और ममता बनर्जी का अपने राज्य में सीबीआई को न घुसने देने की घोषणा इसी राजनीति का हिस्सा थी। अपने मंत्रियों की गिरफ्तारी पर ममता बनर्जी द्वारा सीबीआई का घेराव इसी वर्ष किया गया। नवाब मलिक आज जो कर रहे हैं वह इसी राजनीति का नवीनतम संस्करण है। उन्हें वानखेड़े से जो भी समस्या है, उसका खुलासा जब होगा तब होगा पर फिलहाल उनके आचरण ने एनसीबी की एक विशुद्ध कानूनी कार्रवाई को राजनीतिक लड़ाई बना दिया है। यह बात वर्तमान विपक्ष द्वारा केंद्र सरकार के विरुद्ध शुरू की गई राजनीतिक प्रवृत्ति को पुख्ता ही नहीं करेगी बल्कि अन्य राज्य सरकारों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करेगी।

मलिक एक मंत्री की हैसियत से यह सब कर रहे हैं पर आश्चर्य यह है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अपने मंत्री के ऐसे आचरण पर प्रतिक्रिया नहीं देते। मुख्यमंत्री ठाकरे की यही चुप्पी अनिल देशमुख की अति सक्रियता के समय भी थी। ठाकरे तो चुप हैं ही पर शरद पवार की चुप्पी और महत्वपूर्ण है। वर्तमान भारतीय राजनीति के सबसे वरिष्ठ नेता पिछले लगभग दो वर्षों से चुप होकर अपने दल के नेताओं को निकृष्ट राजनीतिक आचरण करते हुए लगातार देख रहे हैं पर हस्तक्षेप नहीं करते। उनका ऐसा राजनीतिक आचरण महाराष्ट्र की वर्तमान राजनीति पर उनकी लगातार ढीली होती पकड़ का नतीजा है या फिर केंद्र सरकार से अलग-अलग स्तर पर टकराव का, यह देखना दिलचस्प रहेगा।

इस्लामी कट्टरता की बात करने पर वीर सांघवी लिबरपंथियों ने कर दी डिजिटल लिंचिंग

मीडिया के अभिजात्य वर्ग में वीर सांघवी एक ऐसा नाम हैं जिनकी शिक्षा और पत्रकारिता जगत में उपस्थिति को लेकर इंकार नहीं किया जा सकता। कल इन्हीं वीर सांघवी ने मुनव्वर फारूकी के “शर्मनाक उत्पीड़न” और तांडव को लेकर हुए “बेवजह के विवाद” पर एक लेख लिखा।

अपने लेख “हानिरहित हास्य और निर्मित क्रोध (Of harmless humour and manufactured anger)” पर उन्होंने भाजपा को लेकर बात की। इसमें उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधने के लिए ‘सत्तावादी’, ‘आपातकाल’ और ‘अत्याचार’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया।

अब यदि आप मेरी तरह सोचते हैं तो शायद आप ये सब पढ़कर बिलकुल हैरान नहीं हुए होंगे। आखिर सच तो यही है कि इस वर्ग का एक भी दिन कैसे बीत सकता है, बिना ये कहे कि सरकार ने इनकी अभिव्यक्ति के अधिकार को इनसे छीन लिया है।

लेकिन क्या आप इस बात पर विश्वास करेंगे कि वीर सांघवी के इस आर्टिकल से लिबरल गिरोह उन पर भड़क गया है।

है न हैरानी की बात? आइए बताएँ कि वीर सांघवी के इस लेख से वामपंथियों को क्या दिक्कत हो गई।

दरअसल, वामपंथियों के लिए यहाँ तक के विचार स्वीकार्य है जब तक कोई भाजपा सरकार को अत्याचारी बताए। लेकिन ये उन्हें बर्दाश्त नहीं है कि कोई मौलवियों के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करे। उदाहरण के लिए नीचे ट्वीट देखिए।

वीर सांघवी का ट्वीट करीब 200 दफा कोट हुआ है और हर किसी ने उन पर अपनी नाराजगी सिर्फ़ एक वजह से दिखाई कि आखिर उन्होंने अपने आर्टिकल में मौलवी का अपमान कैसे किया। वीर सांघवी की टाइमलाइन पर देख सकते हैं कि वह उन चंद लोगों को रीट्वीट कर रहे हैं जिन्होंने उनके लेख के समर्थन में कहा, जबकि उनके फॉलोवर्स की संख्या 4.2 मिलियन है। यानी उनके अधिकतर साथी उनके पक्ष में नहीं है।

अब दूसरे शब्दों में यदि समझें तो हिंदू विरोधी नफरत घृणा की हद तक भारतीय लिबरल-सेकुलरों में हर पराकाष्ठा को पार कर चुकी है। ये वर्ग अब मुस्लिम समुदाय के किसी सदस्य की जरा भी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकता। तब भी नहीं, जब आप भाजपा की आलोचना करते हुए उन्हें हिंदू कट्टरवादी कहें और केवल समझाने के लिए उनके समकक्ष मुस्लिम चरमपंथियों को रख दें।

लिबरल गिरोह आपको इतनी अनुमति भी नहीं देता कि आप ये समझें कि मुस्लिम चरमपंथियों का कोई अस्तित्व भी है। ये नए तरह के वामपंथी हैं, ये सिर्फ़ हिंदू कट्टरता के लिए भाजपा को इल्जाम देना चाहते हैं और उन्हें ही सबसे बड़ा और एकलौता भक्षक के तौर पर पेश करता चाहते हैं। उन्हें ये स्वीकार्य ही नहीं है कि उनकी तुलना किसी और से हो।

आखिर वीर संघवी ने अपने लेख में भाजपा की तुलना करते हुए ऐसा क्या लिख दिया कि सब वामपंथी इतना भड़क गए। उन्होंने लिखा:

यह एक रणनीति है जिसमें कई मुस्लिम कट्टरपंथियों ने सफलतापूर्वक महारत हासिल की है। सबसे प्रसिद्ध उदाहरण लें: सलमान रुश्दी के ‘satanic verses’ पर विवाद। उस क़िताब पर प्रतिबंध लगाने वाले लोगों में से किसी ने भी इसे नहीं पढ़ा था। उन्हें इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि क्या इसने इस्लाम का मजाक उड़ाया है। लेकिन उन्होंने किसी भी तरह से विरोध प्रदर्शन किया और उपन्यास को बैन कर दिया।”

इसमें लिखा, “एक अयातुल्ला खुमैनी (Ayatollah Khomeini,) जिन्होंने सलमान रुश्दी या किताब के बारे में पहले कभी सुना भी नहीं था, उन्होंने यह कह दिया कि किताब में पैगंबर का मजाक उड़ाया गया। खुमैनी ने तुरंत एक फ़तवा जारी किया जिसमें उनके चाटुकारों ने रुश्दी को मारने की बात कही।”

समझें? हिंदुओं से घृणा का स्तर कितना अधिक व्यापक है कि यदि भाजपा की तुलना अयातुल्ला खुमैनी (Ayatollah Khomeini,) से भी हो जाए तो नाराजगी दिखने लगती है। मानो जैसे बेचारे अयातुल्ला ने ऐसा भी क्या कर दिया कि उसकी तुलना ‘फासीवादी’ भाजपा से की जाए।

ये हकीकत है भारतीय लिबरलों की। आप यदि ये भी सोचें कि अयातुल्लाह खुमैनी से बद्तर सरकार को आपने चुना है तो भी आपकी बात बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

ध्यान दीजिए कि अगर भारतीय लिबरलों के लिए असली लिबरल वीर सांघवी जैसे पत्रकार नहीं हैं तो कौन है जो भाजपा पर भी निशाना साधे और मुस्लिमों के हित के लिए भी बोले? बता दें कि इस सूची में सबसे ताजा उदाहरण AIUDF के मुखिया बदरुद्दीन अजमल का हो सकता है।

कल ही की बात है कि AIUDF के मुखिया बदरुद्दीन अजमल ने एक रैली में कहा है कि भाजपा के पास देश की 3,500 मस्जिदों की सूची है। अगर यह केंद्र में फिर से सत्ता में आते हैं , तो वे उन सभी मस्जिदों को ध्वस्त कर देंगे।

अजमल ने राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा, “यदि भाजपा असम चुनाव फिर से जीतती है, तो वे महिलाओं को ‘बुर्का’ पहनकर बाहर नहीं निकलने देंगे, दाढ़ी नहीं बढ़ाने देंगे, इस्लामी टोपी नहीं पहनेंगे देंगे और मस्जिदों में ‘अज़ान’ भी नहीं होने देंगे।”। क्या आप इस तरह से रह पाएँगे?”