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‘The Kashmir Files’ की सफलता के बाद राहुल गाँधी छोड़ दें राजनीति, विवेक की अगली फिल्म होगी ‘गोधरा फाइल्स’: KRK ने तीनों खान को भी दी नसीहत

                         'द कश्मीर फाइल्स' की सफलता के बाद राहुल गाँधी छोड़ दें राजनीति : KRK की नसीहत
बॉलीवुड ने यदाकदा कई फिल्में दी हैं, जिन्होंने इतिहास रचा, जैसे जय संतोषी माँ और नानक नाम जहाज है, शायद आज की पीढ़ी को इन फिल्मों के इतिहास नहीं मालूम होगा। जिस-जिस सिनेमा घर पर इस फिल्म का प्रदर्शन होता था, बाहर हार-फूल वालों की दुकान लग जाती थी। हालाँकि कुछ समय बाद अभिनेता दारा सिंह ने भक्ति में शक्ति फिल्म बनाई, चर्चित भी हुई, इस फिल्म में मुग़ल आक्रांता अकबर द्वारा ज्वाला माता की निकल रही जोत को शांत करने की हर नीचता नाकाम होने के बाद नंगे पांव जाकर पूजा करने को मजबूर होना पड़ा था। लेकिन फिल्म किस्सा कुर्सी का को जरुरत से ज्यादा कटिंग के बाद प्रदर्शन की इजाजत दी गयी।  

कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की काफी चर्चा हो रही है। हर कोई इसे मार्मिक बता रहे हैं। लोगों को ये फिल्म रूला रही है। सोशल मीडिया पर फिल्म को लेकर काफी लोग लिख रहे हैं। इस बीच अभिनेता कमाल राशिद खान (KRK) ने फिल्म के बहाने राजनीति का जिक्र किया। राहुल गाँधी की राजनीति का।

केआरके का कहना है कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ की सफलता ये बताती है कि राहुल गाँधी राजनीति में कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं। केआरके ने कहा कि इसलिए बेहतर है कि राहुल गाँधी को राजनीति छोड़ देनी चाहिए। राजनीति के मौजूदा दौर को देखते हुए केआरके ने ये टिप्पणी की है।

केआरके ने ट्वीट में लिखा, “द कश्मीर फाइल्स की सफलता इस बात का प्रमाण है कि राहुल गाँधी सफल नहीं हो सकते, इसलिए बेहतर है कि उन्हें राजनीति छोड़ देनी चाहिए। क्योंकि विकास शिक्षा रोजगार आदि का आज की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। राहुल गाँधी बीजेपी को हराने के लिए ध्रुवीकरण करने में सक्षम नहीं हैं।”

केआरके ने अपने एक अन्य ट्वीट में कहा कि अगर कश्मीर फाइल्स 2014 से पहले बनती है तो यह एक आपदा होती। लेकिन आज यह ब्लॉकबस्टर है। एक बार फिर साबित कर दिया कि हर अच्छी कहानी सही समय पर अच्छी होती है। 95 प्रतिशत अभिनेता किसी विशेष कहानी के समय के बारे में नहीं जानते हैं और इसी वजह से 95 प्रतिशत फिल्में फ्लॉप हो जाती हैं।

उन्होंने इस फिल्म को हिट या सुपहिट नहीं, बल्कि ब्लॉकबस्टर बताया और इसके लिए फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री को ‘शुभकामनाएँ’ भी दीं। इसके साथ उन्होंने ये भी दावा किया कि विवेक की अगली फिल्म ‘गोधरा कांड’ पर होगी।

अवलोकन करें:-

The Kashmir Files : कश्मीरी पंडितों से नेहरू ने कहा था – शेख अब्दुल्ला का साथ दो, या जहन्नुम में जाओ

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The Kashmir Files : कश्मीरी पंडितों से नेहरू ने कहा था – शेख अब्दुल्ला का साथ दो, या जहन्नुम में जाओ
‘द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)’ फिल्म अग

इससे पहले कमाल राशिद खान ने इस फिल्म पर ‘मुग़ल ए आज़म’ न होने का तंज कसा था। यद्यपि बाद में उस पर कपिल शर्मा ने सफाई भी दी थी। फिल्म को रोकने की याचिका को भी बॉम्बे हाईकोर्ट ख़ारिज कर चुका है।

आर्यन खान शाहरुख खान का बेटा, फिर मिर्च नवाब मलिक को क्यों लग रही है?

जब भी बॉलीवुड में ड्रग का मुद्दा चर्चा में आता है, लिबरल गैंग एकदम बॉलीवुड के पक्ष में खड़ा हो जाता है, लेकिन एक लम्बे समय से इसी बॉलीवुड में यौन शोषण का मुद्दा #metoo चर्चा में है, कोई नहीं बोलता, क्यों महिला यौन शोषण पर इन लोगों की आवाज़ क्यों नहीं निकलती? और जहाँ तक नवाब मलिक की बात है कि जब समीर के विरुद्ध उनके पास इतने सबूत हैं तो मंत्री होते हुए कार्यवाही क्यों नहीं की? क्यों अब तक चुप्पी साधे हुए थे?
एनसीबी (NCB) ने आर्यन खान को ड्रग मामले में गिरफ्तार किया तो परंपरागत और सोशल मीडिया पर युद्ध सा छिड़ गया। आर्यन खान के समर्थन और एनसीबी के विरोध में कई लोग उठ खड़े हुए। तर्क, कुतर्क और बालसुलभ बातों से मीडिया स्पेस भर गया। गिरफ्तारी के पीछे के कारणों को लेकर लगाए गए कुछ कयास और जारी किए गए कुछ बयानों को पढ़कर लगा जैसे उनका उद्देश्य ही एनसीबी की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाना और आम लोगों में भ्रम पैदा करना था। हाल के वर्षों में केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों के खिलाफ माहौल बना कर भ्रम पैदा करना लिबरल इकोसिस्टम के टूलकिट का ऐसा हिस्सा है जिसे बार-बार आजमाया जाता रहा है।

आर्यन के बहाने NCB पर हमला: नवाब मलिक सहित लिबरल गिरोह की सोची-समझी चाल, कानूनी कार्रवाई को दिया राजनीतिक रंग

मुंबई क्रूज ड्रग्स पार्टी केस में एनसीबी ने एक्टर शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को गिरफ्तार किया है, लेकिन इस मुद्दे पर परिवार से ज्यादा महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार के मंत्री और राकांपा नेता नवाब मलिक को ज्यादा मिर्ची लग रही है। वे शुरू से ही इस मामले में एनसीबी अधिकारी समीर वानखेड़े को निशाना बना रहे हैं। इसको लेकर आज सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है कि आखिर नवाब मलिक किस हैसियत से जांच को लेकर रोज ट्विटर पर सवाल पर सवाल उठा रहे हैं। यूजर्स का कहना है कि असल में नवाब मलिक एनसीबी और समीर वानखड़े को इसलिए निशाना बना रहे हैं क्योंकि एनसीबी ने मलिक के दामाद को ड्रग्स के मामले में गिरफ्तार किया था। उनके दामाद समीर खान को 9 महीने बाद इस साल सितंबर में जमानत पर रिहा किया गया था।

यह बताया गया कि केंद्र सरकार या भारतीय जनता पार्टी दरअसल आर्यन खान को नहीं बल्कि उनके बहाने शाहरुख खान के खिलाफ कार्रवाई कर रही है। ऐसे बयान के पीछे के कारण तो इसे जारी करने वाले बयानबाजों को ही पता होंगे पर सबकुछ धड़ल्ले से कहा गया। जैसे शाहरुख खान की वर्तमान केंद्र सरकार से कोई दुश्मनी है और सरकार इसी कारण से शाहरुख़ खान को परेशान कर रही है। यह तब जब शाहरुख़ खान की केंद्र सरकार से ही नहीं, भाजपा के साथ भी कभी किसी तरह का सार्वजनिक विवाद नहीं रहा। फिर भी कुछ टीवी न्यूज़ चैनल, उनके संपादक और संवाददाताओं ने अपनी चिर परिचित नीति के तहत एनसीबी की कार्रवाई का खुलकर विरोध और आर्यन खान का समर्थन किया।

आगे चलकर कहा गया कि शाहरुख खान को इसलिए टारगेट किया जा रहा है क्योंकि वे मुसलमान हैं। इस तरह के तर्क हमेशा से अजीब लगते रहे हैं पर समय-समय पर यह दोहरा कर इसे सच बनाने का प्रयास जारी है। कुछ तो अपने कुतर्क मार्ग पर चलकर वहाँ पहुँच गए जहाँ से यह कहते सुने गए कि; चूँकि शाहरुख़ खान सदी के सबसे लोकप्रिय भारतीय हैं इसलिए उनके बेटे के साथ ऐसा व्यवहार न तो कानून सम्मत है और न ही संविधान सम्मत।

भारत का कानून या सरकार शाहरुख़ खान की लोकप्रियता के आधार पर आचरण करें, यह कहना वैसा ही है जैसे यह कहा जाए कि अमिताभ बच्चन के कर्ज बैंकों द्वारा केवल इसलिए माफ़ कर देने चाहिए थे क्योंकि उन्हें सदी का महानायक माना जाता रहा है।

ऐसा लगता है जैसे मीडिया में आर्यन और शाहरुख़ खान के समर्थन में दिए गए बयान और कुतर्क वगैरह का असर होता दिखाई न दिया तो राजनीतिक हस्तक्षेप का सहारा लिया गया। अब महाराष्ट्र सरकार के मंत्री नवाब मलिक ने इसे ड्रग मामले में की गई सामान्य कानूनी कार्रवाई से आगे ले जाकर खुद और एनसीबी अधिकारी समीर वानखेड़े के बीच का मामला बना दिया है। नतीजा यह हुआ है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब राज्य के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के दिनों से भी नीचे चली गई है। नवाब मलिक को वानखेड़े से चाहे जो समस्या हो पर आर्यन खान मामले में उनका व्यक्तिगत हस्तक्षेप किसी भी तरह से संवैधानिक नहीं है।

वानखेड़े के विरुद्ध वे रोज कोई न कोई ऐसा बयान जारी करते हैं जो लगते तो व्यक्तिगत हमले हैं पर उनका उद्देश्य एनसीबी के साथ-साथ केंद्र सरकार के अन्य विभागों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना जान पड़ता है। ऐसा महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार के मंत्री और सत्ताधारी दलों के अन्य नेता पहले भी कर चुके हैं। आज नवाब मलिक जो कर रहे हैं वो केंद्र सरकार के विरुद्ध खड़े होने के अनिल देशमुख के अजेंडे का ही विस्तार है। पूर्व गृहमंत्री देशमुख अपने दिनों में लगभग रोज केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कोई न कोई जाँच का आदेश देते ही रहते थे। यह बात और है कि बाद में उनका और उनके पुलिस अफसरों का क्या बना वह सबके सामने है।

पिछले कुछ वर्षों से केंद्रीय जाँच एजेंसियों के विरुद्ध कुछ राज्य सरकारों ने जिस तरह की राजनीति की है वह कई स्तरों पर संघीय ढाँचे को क्षति पहुँचाने वाली रही है। चंद्रबाबू नायडू और ममता बनर्जी का अपने राज्य में सीबीआई को न घुसने देने की घोषणा इसी राजनीति का हिस्सा थी। अपने मंत्रियों की गिरफ्तारी पर ममता बनर्जी द्वारा सीबीआई का घेराव इसी वर्ष किया गया। नवाब मलिक आज जो कर रहे हैं वह इसी राजनीति का नवीनतम संस्करण है। उन्हें वानखेड़े से जो भी समस्या है, उसका खुलासा जब होगा तब होगा पर फिलहाल उनके आचरण ने एनसीबी की एक विशुद्ध कानूनी कार्रवाई को राजनीतिक लड़ाई बना दिया है। यह बात वर्तमान विपक्ष द्वारा केंद्र सरकार के विरुद्ध शुरू की गई राजनीतिक प्रवृत्ति को पुख्ता ही नहीं करेगी बल्कि अन्य राज्य सरकारों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करेगी।

मलिक एक मंत्री की हैसियत से यह सब कर रहे हैं पर आश्चर्य यह है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अपने मंत्री के ऐसे आचरण पर प्रतिक्रिया नहीं देते। मुख्यमंत्री ठाकरे की यही चुप्पी अनिल देशमुख की अति सक्रियता के समय भी थी। ठाकरे तो चुप हैं ही पर शरद पवार की चुप्पी और महत्वपूर्ण है। वर्तमान भारतीय राजनीति के सबसे वरिष्ठ नेता पिछले लगभग दो वर्षों से चुप होकर अपने दल के नेताओं को निकृष्ट राजनीतिक आचरण करते हुए लगातार देख रहे हैं पर हस्तक्षेप नहीं करते। उनका ऐसा राजनीतिक आचरण महाराष्ट्र की वर्तमान राजनीति पर उनकी लगातार ढीली होती पकड़ का नतीजा है या फिर केंद्र सरकार से अलग-अलग स्तर पर टकराव का, यह देखना दिलचस्प रहेगा।