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अब एनआरआई समर्थकों का भी मोहभंग

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्ली में विधानसभा चुनाव को लेकर चुनावी हलचल तेज है। आम आदमी पार्टी के संयोजक और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुद जोर-शोर से चुनाव प्रचार में लगे हैं, लेकिन इस बार हैरानी की बात यह है कि 2013 और 2015 के विधानसभा चुनाव में जी-जान लगा देने वाले एनआरआई कार्यकर्ता पूरी तरह से गायब हैं। सवाल उठता है कि अन्ना आंदोलन से लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार बनने तक अपना तन-मन-धन लगा देने वाले एनआरआई कार्यकर्ता आखिर गायब क्यों है?
असल में जनता से झूठे वादे कर सत्ता हथियाने वाले दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अब पूरी दुनिया में बेनकाब हो चुके हैं। अन्ना आंदोलन का दुरुपयोग कर मुख्यमंत्री बने नौटंकीबाज की पोल-पट्टी अब पूरी तरह खुल चुकी है। व्यवस्था परिवर्तन के नारे के साथ कुर्सी संभालने वाले केजरीवाल ने जिस तरह से रंग बदले हैं उससे लोगों का मोहभंग हुआ है। शिकागो में रहने वाले आम आदमी पार्टी के पूर्व एनआरआई सह-संयोजक डॉ मुनीश रायजादा का कहना है कि विदेशों में रह रहे अप्रवासी भारतीय लोगों ने अपनी अच्छी-खासी नौकरियों को और पेशे को दरकिनार करते हुए अरविंद केजरीवाल की हर तरह से मदद की, लेकिन केजरीवाल ने पार्टी के सारे सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने एनआरआई विंग को ही भंग कर दिया।
रायजादा का कहना है कि आम आदमी पार्टी का गठन वित्तीय पारदर्शिता, आतंरिक लोकतंत्र और राइट टू रिजेक्ट व राइट टू रिकॉल के सिद्धांतों पर हुआ था। साथ ही आंतरिक जांच सिस्टम भी लागू हुआ था। ये पार्टी के मजबूत स्तम्भ की तरह थे, लेकिन पिछले पांच वर्षों के दौरान अरविंद केजरीवाल ने इन सबको तिलांजलि दे दी है। वह अब ऐसी राजनीति में लिप्त हो गए, जिसे खत्म करने के लिए ही पार्टी का गठन किया गया था। उन्होंने पार्टी को एक तरह से अपनी जागीर समझ लिया है। ऐसा माहौल बना दिया कि उनके बराबर कोई दूसरा खड़ा न हो सके।
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Image may contain: 10 people, textरायजादा ने कहा है कि वह अगले सप्ताह 51 एनआरआई कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली पहुंच रहे हैं। उनके साथ वो लोग शामिल होंगे जो आम आदमी पार्टी के अपने मूल विचारधारा से यू-टर्न लेने से नाराज हैं। पार्टी वेबसाइट से चंदे का विवरण हटा लेने से नाराज एनआरआई कार्यकर्ता दिल्ली में केजरीवाल के खिलाफ कैंपेन में शामिल होकर घर-घर जाकर लोगों से केजरीवाल को चंदा नहीं देने की अपील करेगा।
डॉक्टर रायजादा ने अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी पर एक छः एपिसोड की वेब सिरीज़ भी बनाई है- ट्रांसपेरेंसी: पारदर्शिता।
डॉ. रायजादा ने वेब सिरीज़ के ट्रेलर के साथ दो गाने, ‘बोल रे दिल्ली बोल’ और ‘कितना चंदा जेब में आया’ भी रिलीज़ किया।
पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मिटाने का दावा करने वाले केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी की वेबसाइट से चंदा देने वाले लोगों की लिस्ट हटा दी। चंदे को लेकर दूसरी पार्टियों पर सवाल उठाने वाली उनकी पार्टी ने वेबसाइट रीलांच के बाद से दानदाताओं की लिस्ट के ऑप्शन को हटा दिया।
केजरीवाल की फितरत में है धोखा देना
दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी सुविधा की राजनीति करने के लिए जाने जाते हैं। केजरीवाल ने समय-समय पर कई संगठनों और व्यक्तियों का सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल किया और आगे बढ़ते गए। जिस किसी ने भी उनकी सोच या कार्यशैली का विरोध किया, केजरीवाल ने उनका साथ छोड़ दिया। कई लोग जो केजरीवाल के साथ घुटन महसूस करते थे उन्होंने पार्टी खुद ही छोड़ दी। कई ऐसे भी हैं जिन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया या फिर उन्हें ‘सबक’ सिखाया गया।

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अरुणा रॉय का साथ छोड़ा
अरविंद केजरीवाल का मन आईआरएस की नौकरी से ज्यादा अपनी संस्था ‘परिवर्तन’ में ही लगा रहता था। इसी दौरान उनको मैगसासे अवार्ड मिला और उसके धन से दिसबंर 2006 में एक नई संस्था पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन बनाया। इसके बाद सितंबर 2010 में अरुणा रॉय के नेतृत्व में स्वयंसेवी संस्थाओं के ग्रुप नेशनल कैंपेन फॉर पीपल राइट टू इनफॉरमेशन की लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बने। यहां से केजरीवाल को एक नये आंदोलन की रुपरेखा समझ में आयी और अरुणा राय को छोड़कर अन्ना हजारे के साथ महाआंदोलन की तैयारी करने लगे।

Image may contain: 2 peopleImage result for anna hazareअन्ना हजारे का साथ लेना और फिर दरकिनार कर देना
अन्ना हजारे के नेतृत्व में जनलोकपाल की ऐतिहासिक लड़ाई हुई, जिनके अनशन के सामने पूरी सरकार ने घुटने टेक दिए। पर, स्वार्थ का राजनीतिक फल खाने के लिए केजरीवाल ने अन्ना को ही ठेंगा दिखला दिया। केजरीवाल ने सारे आंदोलन को अपने हाथ में ले लिया। केजरीवाल ने कहना शुरु कर दिया कि राजनीति का कीचड़ साफ करना है तो कीचड़ में उतरना ही पड़ेगा। अन्ना के विरोध के बाद भी केजरीवाल ने 26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी का गठन कर दिया। अब अन्ना और केजरीवाल के सुर नहीं मिलते, अन्ना केजरीवाल पर धोखा देने तक का आरोप लगा चुके है। मार्च 2013 में एक अंग्रेजी न्यूज चैनेल को दिए अपने इंटरव्यू में केजरीवाल ने कहा कि अन्ना और मेरे बीच विश्वास की कमी हो गई थी जिसकी वजह से हम दोनों के रास्ते अलग हो गये।

Image may contain: 7 peopleशांति भूषण को किनारे किया
पार्टी के वयोवृद्ध और संस्थापक नेता शांति भूषण ने केजरीवाल की तानाशाही के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द की और आंतरिक लोकतंत्र का सवाल उठाया। उन्होंने पैसे लेकर टिकट बांटने के आरोप भी लगाए। बदले में केजरीवाल ने उन्हें अपना दुश्मन मान लिया और बुरा-भला कहते हुए पार्टी के दरवाजे शांति भूषण के लिए बंद कर दिए। जबकि पार्टी को खड़ा करने में इन्होंने अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई भी लगाई थी।

Image result for yogendra yadavयोगेन्द्र यादव हुए तानाशाही के शिकार
अन्ना आंदोलन से लेकर आप के गठन तक में थिंक टैंक का हिस्सा रहे योगेन्द्र यादव। आप को शून्य से शिखर तक लाने में इनके राजनीतिक विश्लेषण का भरपूर इस्तेमाल किया गया। लेकिन जैसे ही इन्होंने केजरीवाल की मनमानी का विरोध किया, तो केजरीवाल ने उनके लिए गाली-गलौच करने से भी गुरेज नहीं की। बाद में बे-इज्जत कर पार्टी से भी निकाल दिया।

Image may contain: 1 personकेजरीवाल ने शांति भूषण, प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव तीनों को पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर बाहर का रास्ता दिखाया था। 28 मार्च 2015 को हुई दिल्ली के कापसहेड़ा में नेशनल कांउसिल की मीटिंग में जो हुआ उससे साफ पता चलता है कि केजरीवाल कितने तानाशाही प्रवृति के हैं। मीटिंग में प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, अजीत झा और प्रोफेसर आनंद कुमार को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर निकाल दिया गया। इन्हें बाउंसर्स की मदद से उन्हें घसीटकर बाहर निकाल दिया गया।
प्रोफेसर आनन्द कुमार भी हुए बाहर
टीम केजरीवाल में थिंकटैंक का हिस्सा रहे प्रोफेसर आनन्द कुमार ने जब पार्टी और सरकार में एक व्यक्ति एक पद की बात उठायी तो अरविन्द केजरीवाल भड़क गये। पार्टी के संयोजक पद से इस्तीफे का दांव खेलकर केजरीवाल ने प्रोफेसर आनन्द कुमार, योगेंद्र यादव और प्रशान्त भूषण को एक झटके में पार्टी से निकाल दिया।

जनरल वीके सिंह की नहीं हुई पूछ
अन्ना आंदोलन में खुलकर अरविन्द केजरीवाल के साथ रहे जनरल वीके सिंह को केजरीवाल ने पार्टी बनाने के बाद नहीं पूछा। अपनी उपेक्षा से नाराज रहे वीके सिंह अन्ना के साथ जुड़े रहे। केजरीवाल की स्वार्थपरक राजनीति देखने के बाद जनरल वीके सिंह ने बीजेपी का साथ देने का फैसला किया।

शाजिया इल्मी भी साइडलाइन
शाजिया इल्मी पत्रकारिता से अन्ना आंदोलन में आईं। आम आदमी पार्टी के चर्चित चेहरों में से एक थीं। जब शाजिया ने महसूस किया कि खुद केजरीवाल ने उन्हें लोकसभा चुनाव में हराने का काम किया ताकि उनका कद ऊंचा ना हो सके, तो उन्होंने केजरीवाल पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी। अब शाजिया बीजेपी में हैं।

मेधा पाटकर का नहीं कोई मान
आम आदमी पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव लड़ चुकीं मेधा पाटेकर ने अपनी उपेक्षा से नाराज होकर अरविन्द केजरीवाल का साथ छोड़ दिया। मेधा ने केजरीवाल को मकसद से भटका हुआ बताया। दरअसल आम चुनाव में करारी हार के बाद केजरीवाल की सोच स्वार्थवश दिल्ली की सियासत तक सिमट गयी। फिर मेधा जैसे समाजसेवी उनके लिए यूजलेस और सियासी नजरिए से जूसलेस हो गयीं थीं।

जस्टिस संतोष हेगड़े भी हटे
जनलोकपाल का ड्राफ्ट जिन तीन लोगों ने मिलकर तैयार किया था उनमें से एक हैं जस्टिस संतोष हेगड़े। अन्ना आंदोलन में सक्रिय जुड़े रहे। पर, राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगने के बाद केजरीवाल ने हेगड़े को भी किनारा करना शुरू कर दिया। उपेक्षित और अलग-थलग महसूस करने के बाद जस्टिस हेगड़े ने टीम अन्ना से दूरी बना ली। वो इतने खिन्न हो गये कि केजरीवाल के शपथग्रहण समारोह में बुलाए जाने के बाद भी नहीं पहुंचे।

श्री श्री रविशंकर ने कहा जय श्री राम
श्री श्री रवि शंकर ने अन्ना आंदोलन को अपना समर्थन दिया था। अरविन्द केजरीवाल के राजनीतिक दल बनाने को भी उन्होंने गलत नहीं बताया था। पर, केजरीवाल ने अपनी गतिविधियों से उनको नाराज कर दिया। श्री श्री रविशंकर ने कहा कि केजरीवाल ने दिखा दिया कि वो अन्य राजनेताओं से अलग नहीं हैं। सस्ती लोकप्रियता, उनकी अतिमहत्वाकांक्षा और तानाशाही ने लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। केजरीवाल और श्री श्री में ट्विटर पर भी खुली जंग हुई।

एडमिरल रामदास ने भी कहा राम-राम
आम आदमी पार्टी में आंतरिक लोकपाल पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल रामदास तब भौंचक रह गये जब उन्हें उनके पद से हटा दिया गया। एडमिरल रामदास ने कहा कि मैं यह जानकर चकित हूं कि अब पार्टी को मेरी जरूरत नहीं रही। आंदोलन से लेकर राजनीतिक दल बनने तक एडमिरल रामदास ने अरविन्द केजरीवाल का साथ दिया, लेकिन मौका मिलते ही उन्होंने उनसे इसलिए किनारा कर लिया क्योंकि लोकपाल के तौर पर उन्होंने किसी किस्म के समझौते से इनकार कर दिया था।

जेएम लिंग्दोह को दिया त्याग
पूर्व निर्वाचन आयुक्त लिंग्दोह की भूमिका जनलोकपाल बिल को तैयार करने में रही। लिंग्दोह उन चंद लोगों में शामिल रहे जिन्होंने खुलकर जनलोकपाल के लिए समर्थन दिया। राजनीतिक दल बना लेने के बाद केजरीवाल ने उन्हें भी त्याग दिया। दरअसल लिंग्दोह जैसे लोगों के रहते केजरीवाल के लिए पार्टी और सरकार में तानाशाही चलाना मुश्किल होता।

Image result for स्वामी अग्निवेशस्वामी अग्निवेश ने किया किनारा
एक समय अन्ना आंदोलन का चेहरा बन चुके थे अग्निवेश। सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। पर, बाद में अरविन्द केजरीवाल ने उनसे किनारा कर लिया। स्वामी अग्निवेश को पार्टी बनाने से पहले ही केजरीवाल ने त्याग दिया था। टीम केजरीवाल ने उन्हें कांग्रेस का दलाल साबित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।

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अंजलि दमानिया
महाराष्ट्र से आप की कार्यकर्ता और केजरीवाल की प्रमुख सहयोगी अंजलि दमानिया ने 11 मार्च 2015 को केजरीवाल का साथ छोड़ दिया। जिस तरह से प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को निकालने के लिए केजरीवाल ने स्टिंग ऑपरेशन और अप्रजातंत्रिक हरकतें की थी उससे सभी दुखी थे, उनमें से एक अंजलि दमानिया भी थी।

मधु भादुड़ी
आप के संस्थापक सदस्यों में से एक मधु भादुड़ी ने 3 फरवरी 2014 को दिल्ली विधान सभा चुनावों के बाद आप छोड़ दिया। वो आप की विदेश नीति बनाने वाली समिति की सदस्य थी। उन्होंने इस्तीफा देते समय कहा कि आप में महिलाओं का सम्मान नहीं होता है। मेरा मात्र एक ही मुद्दा है कि महिलाऐं भी मुनष्य हैं और उनके साथ भी मनुष्य जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। पार्टी की मानसिकता खाप पंचायत जैसी है, इसमें महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं हैं। उनका केजरीवाल पर सीधा आरोप था कि यह पार्टी वोट के लिए बदल चुकी है और केवल चुनाव जीतना चाहती है

विनोद कुमार बिन्नी निकाले गए
दिल्ली में सरकार बनने के बाद सबसे पहले अरविन्द केजरीवाल की तानाशाही का विरोध विनोद कुमार बिन्नी ने ही किया था। बिन्नी ने खुलकर केजरीवाल के खिलाफ आरोप लगाए। इस वजह से उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। बिन्नी तब से अरविन्द केजरीवाल के साथ थे जब अन्ना आंदोलन शुरू भी नहीं हुआ था।

मुफ्ती शमून कासमी को किया किनारे
अन्ना हजारे को धोखा देने की वजह से अरविन्द केजरीवाल से खफा हो गये मुफ्ती शमून कासमी। उन्होंने केजरीवाल पर अन्ना के कंधे पर रखकर बंदूक चलाने का आरोप लगाया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में मौलाना की शरण में जाने के लिए भी कासमी ने केजरीवाल की निन्दा की और तभी कह दिया कि जरूरत पड़ी तो ये आदमी कांग्रेस से भी हाथ मिला सकता है। कासमी का दावा था कि केजरीवाल की सत्ता के लिए भूख सबसे पहले उन्होंने ही पहचानी।

कैप्टन गोपीनाथ ने छोड़ी पार्टी
भारत में कम कीमत के हवाई यातायात में प्रमुख भूमिका निभाने वाले जी आर गोपीनाथ को भी पार्टी छोड़नी पड़ी। पार्टी छोड़ते हुए गोपीनाथ ने अरविन्द केजरीवाल की कार्यप्रणाली की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पार्टी केजरीवाल के नेतृत्व में रास्ते से भटक गयी है।

एसपी उदय कुमार नहीं कर सके एडजस्ट
विज्ञान के क्षेत्र में बड़े सम्मान से लिया जाने वाला नाम है एसपी उदयकुमार। उनके आम आदमी पार्टी में जुड़ने को बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा गया था। लेकिन केजरीवाल के साथ वे भी एडजस्ट नहीं कर सके। उन्होंने दक्षिणी राज्यों की उपेक्षा की वजह से पार्टी छोड़ दी। ये उपेक्षा तो होनी ही थी क्योंकि वहां कोई राजनीतिक लाभ केजरीवाल के लिए नहीं था।

तानाशाही से खिन्न मयंक गांधी ने भी साथ छोड़ा
योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और अन्य साथियों को जिस तरह से केजरीवाल ने साजिश के साथ बाहर निकाला था, उसका खुलासा मयंक गांधी अपने ब्लॉग में किया। वह जानते थे कि उनकी पारदर्शिता की मांग से एक न एक दिन उन्हें भी केजरीवाल बाहर का रास्ता दिखा ही देंगे। 11 नवंबर 2015 को मयंक गांधी ने भी केजरीवाल की तानाशाही प्रवृति से तंग आकर इस्तीफा दे दिया.

एमएस धीर- धैर्य ने दिया जवाब
आप सरकार में स्पीकर रहे एमएस धीर का अरविन्द केजरीवाल से ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने पार्टी ही छोड़ दी। सिखों के प्रति केजरीवाल की कथनी और करनी में अंतर बताते हुए उन्होंने पार्टी छोड़ी। उन्होंने नेतृत्व पर सिख दंगे में मारे गये लोगों के परिजनों को इंसाफ दिलाने में विफल रहने का आरोप उन्होंने लगाया।

अजित झा हो गए आजिज
प्रोफेसर आनन्द कुमार के साथ अजित झा ने भी पार्टी के भीतर लोकतंत्र की आवाज उठायी। आंदोलन और पार्टी में सक्रिय रहे। केजरीवाल ने चर्चित फोन टेप कांड में अजित झा के लिए भी अपशब्द कहे थे। योगेंद्र यादव, आनन्द कुमार, प्रशांत भूषण के साथ-साथ इन्हें भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

कपिल मिश्रा ने छोड़ा साथ
आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता कपिल मिश्रा को अरविंद केजरीवाल पर भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाने के कारण पार्टी से निकाल दिया गया। कपिल मिश्रा उन पर सत्येंद्र जैन से दो करोड़ रुपये की घूस लेने का आरोप लगा चुके हैं। कपिल मिश्रा के मुताबिक उन्होंने अपनी आंखों से ये होते देखा। ऐसे संगीन आरोप वाले कपिल मिश्रा का यह भी कहना है कि केजरीवाल ने बीस करोड़ रुपये से अधिक की हेराफेरी की है।

कुमार विश्वास बने शिकार
अरविंद केजरीवाल ने राज्यसभा टिकट बंटवारे के साथ ही कुमार विश्वास को किनारे लगा दिया। आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक कुमार विश्वास ने कहा कि उन्हें सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर तमाम मुद्दों पर सच बोलने की सजा दी गई। कुमार विश्वास ने कहा, ‘अरविंद ने मुझसे एक बार कहा था कि सर जी, आपको मारेंगे, पर शहीद नहीं होने देंगे। मैं अपनी शहादत स्वीकार करता हूं।’ केजरीवाल पर हमला बोलते हुए कुमार ने यह भी कहा कि उनसे असहमत होकर पार्टी में जीवित रहना संभव नहीं है।

आशुतोष के अरमानों पर फिरा पानी
पत्रकारिता छोड़कर राजनीति में आने वाले आशुतोष ने भी हाल ही में आम आदमी पार्टी को अलविदा कह दिया। उसके पहले आशुतोष ने ट्वीट कर ये आरोप लगाया कि पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान पार्टी नेताओं ने उनसे उनकी जाति का इस्तेमाल करने को कहा था। उन्होंने लिखा, ’23 साल के पत्रकारिता करियर में मुझे कभी अपनी जाति का इस्तेमाल नहीं करना पड़ा, लेकिन जब मैं आम आदमी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ा, तब मुझे जाति का इस्तेमाल करने को कहा गया।’ साफ है आशुतोष को पता चल गया था कि आम आदमी पार्टी जाति आधारित राजनीति को बढ़ावा देती है। फिर भी वो चार साल तक पार्टी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते रहे, लेकिन फैसला तब जाकर किया जब राज्यसभा सांसद बनने के उनके अरमानों पर अरविंद केजरीवाल ने पानी फेर दिया।

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शाहीन बाग़ का आंदोलन शुरू तो हुआ था सीएए विरोध के नाम पर लेकिन जिन भी नेताओं और पार्टिय.....
आशीष खेतान भी हुए परेशान
पार्टी के सीनियर लीडर आशीष खेतान ने भी आम आदमी पार्टी से इस्तीफा दे दिया। केजरीवाल के रवैये से परेशान होकर उन्होंने कहा कि अब वे लीगल प्रैक्टिस करेंगे। पार्टी में साइड लाइन होने के बाद से ही आशीष खेतान नाराज चल रहे थे।

Image result for एच एस फुल्काएच एस फुल्का का भी हुआ मोहभंग
पार्टी के वरिष्ठ नेता हरविंदर सिंह फुल्का ने भी हाल में इस्तीफा दे दिया। पेशे से वकील फुल्का दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच बढ़ती नजदीकी पर कई बार नाराजगी जता चुके हैं। एचएस फुल्का ने कई बार यह जिक्र किया था कि केजरीवाल सरकार ने 1984 के हिंसा पीड़ितों के लिए उम्मीद के मुताबिक काम नहीं किया। ना पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिलवाया ना नौकरी दी।

केजरीवाल ने आंदोलन और राजनीति में जिन लोगों का साथ लिया उनको अपनी सोच मनवाने के लिए मजबूर करते रहे, जो मजबूर नहीं हुए उन्होंने साथ छोड़ दिया और जो मजबूर हैं आज उनके साथ हैं।(एजेंसीज इनपुट्स सहित)

लोगों से मिलकर लौटे NC के 2 सांसद, कांग्रेस के ‘लोकतंत्र की हत्या’ वाले आरोप की निकली हवा

अकबर लोने, हसनैन मसूदी
मोहम्मद अकबर लोन और जस्टिस (रिटायर्ड) हसनैन मसूदी ख़िलाफ़ काफ़ी मुखर रहे हैं
जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने और राज्य के पुनर्गठन का निर्णय लिए जाने के बाद विपक्षी दलों ने जम कर राजनीति की। कांग्रेस ने तो इसे अंतरराष्ट्रीय मसला तक बता दिया। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद के साथ कई विपक्षी नेतागण श्रीनगर पहुँचे लेकिन उन्हें एयरपोर्ट से ही वापस दिल्ली भेज दिया गया। राज्यपाल सत्यपाल मलिक का कहना है कि ये नेता राजनीति करने यहाँ आए थे और इससे माहौल बिगड़ सकता था।
इसके बाद विपक्षी दलों ने यह कहना शुरू कर दिया कि जम्मू कश्मीर में सबकुछ ठीक नहीं है। हालाँकि, बसपा सुप्रीमो मायावती ने इन नेताओं को फटकार लगाते हुए केंद्र सरकार को समय देने की बात कही। नवीन पटनायक की बीजद, चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और जगन रेड्डी की वाईएसआरसीपी सही कई विपक्षी दलों ने अनुच्छेद 370 पर संसद में सरकार का साथ भी दिया था। लेकिन, क्या आपको पता है कि जम्मू कश्मीर में कुछ विपक्षी नेता न सिर्फ़ घूम रहे हैं बल्कि लोगों से मिल भी रहे हैं।

ये नेतागण केंद्र सरकार और भाजपा के ख़िलाफ़ बयान भी दे रहे हैं लेकिन उन्हें पुलिस ने गिरफ़्तार नहीं किया। इससे विपक्षी पार्टियों के आरोपों की पोल भी खुल जाती है। मोदी सरकार पहले से ही कहती आ रही है कि जम्मू कश्मीर को 2 परिवारों के चंगुल से मुक्त कराना है।
अब्दुल्ला परिवार की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के 2 सांसदों ने जम्मू कश्मीर का दौरा किया और अब वे दिल्ली लौट आए हैं। दोनों नेताओं ने पूरी सक्रियता से घाटी में लोगों से मुलाक़ातें की। एनसी के वरिष्ठ नेताओं मोहम्मद अकबर लोन और जस्टिस (रिटायर्ड) हसनैन मसूदी ने कश्मीर का दौरा किया।
दोनों नेताओं ने एनसी के श्रीनगर स्थित मुख्यालय में बैठकें की और सिविल सोसाइटी से संवाद किया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, केंद्र सरकार कुछ स्थानीय नेताओं के माध्यम से जनता से संवाद कर हालात को सामान्य बनाए रखने की जुगत में लगी है। इसके लिए स्थानीय नेताओं की मदद ली जा रही है। हालाँकि, यह भी याद होना चाहिए कि अकबर लोन कभी पाकिस्तान का समर्थन कर चुके हैं और विधानसभा में भारत-विरोधी नारेबाजी भी कर चुके हैं।

जवाहर लाल नेहरू : बूथ कैप्चरिंग का मास्टरमाइंड

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जवाहर लाल नेहरू देश में हुए प्रथम आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से पराजित घोषित हो चुके कांग्रेसी प्रत्याशी मौलाना अबुल कलाम आजाद को किसी भी कीमत पर जबरजस्ती जिताने के आदेश दिये थे। उनके आदेश पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं गोविन्द वल्लभ पन्त ने रामपुर के जिलाधिकारी पर घोषित हो चुके परिणाम बदलने का दबाव डाला और इस दबाव के कारण प्रशासन ने जीते हुए हिन्दू महासभा के प्रत्याशी विशन चन्द्र सेठ की मतपेटी के वोट मौलाना अबुल के पेटी के डलवाकर दुबारा मतगणना करवाकर मौलाना अबुल को जीता दिया। ये रहस्योदघाटन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सुचना निदेशक शम्भुनाथ टंडन ने अपने एक लेख मे किया है। 
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उन्होंने अपने लेख "जब विशन सेठ ने मौलाना आजाद को धुल चटाई थी भारतीय इतिहास की एक अनजान घटना " में लिखा है की भारत मे नेहरु ही बूथ कैप्चरिंग के पहले मास्टर माइंड थे। उस ज़माने में भी बूथ पर कब्जा करके परिणाम बदल दिये जाते थे और देश के प्रथम आम चुनाव मे सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही कांग्रेस के 12 हारे हुए प्रत्याशियों को जिताया गया।  देश के बटवारे के बाद लोगो मे कांग्रेस और खासकर नेहरु के प्रति बहुत गुस्सा था लेकिन चूँकि नेहरु के हाथ मे अंतरिम सरकार की कमान थी इसलिए नेहरु ने पूरी सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके जीत हासिल थी। 
देश के बटवारे के लिए हिंदू महासभा ने नेहरु और गाँधी की तुष्टीकरण की नीति को जिम्मेदार मानते हुए देश मे उस समय जबरजस्त आन्दोलन चलाया था और लोगो मे नेहरु के प्रति बहुत गुस्सा था, इसलिए हिंदू महासभा ने कांग्रेस के दिग्गज नेताओ के विरुद्ध हिंदू महासभा के दिग्गज लोगो को खड़ा करने का निश्चय किया था। इसीलिए नेहरु के विरुद्ध फूलपुर से संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी और मौलाना अबुल के विरुद्ध रामपुर से भईया विशन चन्द्र सेठ को लडाया गया। नेहरु को भी अंतिम राउंड मे जबरदस्ती 2000 वोट से जिताया गया | वही सेठ विशन चन्द्र के पक्ष मे भारी मतदान हुआ और मतगणना के पश्चात प्रशासन ने बकायदा लाउडस्पीकरों से सेठ विशन चंद को 10000 वोट से विजयी घोषित कर दिया। और फिर रामपुर मे हिंदू महासभा के लोगो ने विशाल विजयी जुलुस भी निकाला। फिर जैसे ही ये समाचार वायरलेस से लखनऊ फिर दिल्ली पहुची तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की अप्रत्याशित हार के समाचार से नेहरु तिलमिला और तमतमा उठे। उन्होंने तुरंत उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं गोविन्द वल्लभ पन्त को चेतावनी भरा संदेश दिया कि "मै मौलाना की हार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नही कर सकता, अगर मौलाना को जबरजस्ती नही जिताया गया तो आप अपना इस्तीफा शाम तक दे दीजिए।" 
Image result for gb pantफिर पन्त जी ने आनन फानन मे सुचना निदेशक (जो इस लेख के लेखक है) शम्भू नाथ टंडन को बुलाया और उन्हें रामपुर के जिलाधिकारी से सम्पर्क करके किसी भी कीमत पर मौलाना अबुल को जिताने का आदेश दिया. . फिर जब शम्भु नाथ जी के कहा की सर इससे दंगे भी भडक सकते है तो इस पर पन्त जी ने कहा की परवाह नहीं नेहरु जी का हुकम है।  फिर रामपुर के जिलाधिकारी को वायरलेस पर मौलाना अबुल को जिताने के आदेश दे दिये गए। फिर रामपुर के सीटी कोतवाल ने सेठ विशनचन्द्र के पास गया और कहा कि आपको जिलाधिकारी साहब बुला रहे है जबकि वो अपने विजयी जुलुस में लोगो की बधाईयाँ स्वीकार कर रहे थे। 
और जैसे ही जिलाधिकारी ने उनसे कहा कि मतगणना दुबारा होगी तो सेठ विशन चन्द्र ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि मेरे सभी कार्यकर्ता जुलुस मे गए है ऐसे मे आप बिना मतगणना एजेंट के दुबारा कैसे मतगणना कर सकते है ? उनको मिले मतों में उनके ही सामने मौलाना आज़ाद के बक्से में डालने पर विशन सेठ चीखते-चिल्लाते रहे, लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गयी और जिलाधिकारी के साफ साफ कहा कि सेठ जी हम अपनी नौकरी बचाने के लिए आपकी बलि ले रहे है क्योंकि ये नेहरु का आदेश है। 
शम्भु नाथ टंडन जी ने आगे लिखा है कि चूँकि उन दिनों प्रत्याशियो के नामो की अलग अलग पेटियां हुआ करती थी और मतपत्र पर बिना कोई निशान लगाये अलग अलग पेटियों मे डाले जाते थे इसलिए ये बहुत आसान था कि एक प्रत्याशी के वोट दूसरे की पेटी मे मिला दिये जाए। देश मे हुए प्रथम आम चुनाव की इसी खामी का फायदा उठाकर नेहरु ने इस देश की सत्ता पर काबिज हुआ था और उस नेहरु ने इस देश मे जो भ्रष्टाचार के बीज बोये थे वो आज उसके खानदान के "काबिल" वारिसों के अच्छी तरह देखभाल करने की वजह के एक वटवृक्ष बन चूका है।
अटल जी उस समय प्रधानमंत्री पद से हट चुके थे। तब उन्होंने स्व. विशनचंद सेठ की स्मृति में प्रकाशित स्मृति ग्रंथ 'हिंदुत्व के पुरोधा' नामक पुस्तक का विमोचन किया था। 18 नवंबर 2005 को विमोचित किये गये उक्त स्मृति ग्रंथ में उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग के अवकाश प्राप्त उपनिदेशक शम्भूनाथ टण्डन ने एक लेख लिखकर उक्त घटना का रहस्योदघाटन किया था। इस स्मृति ग्रंथ का प्रकाशन अखिल भारतीय खत्री महासभा दिल्ली ने कराया था। अपने लेख का शीर्षक विद्वान लेखक ने बहुत ही सार्थक और गंभीर शब्दावली का प्रयोग करके यूं दिया था-''जब भईये विशन सेठ ने मौलाना आजाद को धूल चटाई थी, भारत के इतिहास की एक अनजान घटना।'' इस घटना से सिद्ध होता है कि भारत में लोकतंत्र को ठोकतंत्र में और जनतंत्र को गनतंत्र में परिवर्तित करने की कुचालें पहले दिन से ही चल गयी थी। 
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नेहरू ने इन कुचालों को कहीं स्वयं चलाया तो कहीं इनका समर्थन किया अथवा अपनी मौन सहमति प्रदान की। पाठकों को स्मरण होगा कि उनके समय में जब जीप घोटाला हुआ तो उन्होंने उस घोटाले में लिप्त कांग्रेसी नेताओं का बचाव करने में ही बचाव समझा था। उन्होंने चीनी आक्रमण के समय अपने रक्षामंत्री कृष्णा मेनन का भी बचाव किया था। कुल मिलाकर उनके भीतर भी वही अहंकार का भाव रहता था जो गांधी जी के भीतर रहता था कि मैंने जो किया, या जो सोच लिया वही उत्तम है। श्री टंडन ने अपने उक्त आलेख में स्पष्ट किया था कि कैसे नेहरूकाल से ही मतों पर नियंत्रण करने की दुष्प्रवृत्ति देश के राजनीतिज्ञों में पैर पसार चुकी थी। कालांतर में इस दुष्प्रवृत्ति ने विस्तार ग्रहण किया और ये बूथ कैप्चरिंग तक पहुंच गयी। जो लोग ये कहकर नेहरू का बचाव करते हैं कि उनके समय में यह बीमारी इतनी नही थी, ये तो बाद में अधिक फैली। उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि नेहरू का काल बीजारोपण का काल था। आम या बबूल का पौधा तो पिता या पितामह ही लगाते हैं और अक्सर उनके फल पुत्र या पौत्र प्राप्त करते हैं। अत: नेहरू ने अपने काल में बीजारोपण किया उसी के कटु फल हमें आज तक चखने पड़ रहे हैं। इंदिरा गांधी के काल में नेहरू द्वारा रखी गयी आधारशिला पर फटाफट भवन निर्माण हुआ और राजनीतिक भ्रष्टाचार के सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण कार्य हर कांग्रेसी सरकार में चलता रहा। आज यह दुर्ग अत्यंत सुदृढ़ता प्राप्त कर गया है, इसकी जड़ें 'स्विस बैंकों' तक चली गयीं हैं। इसे तोडऩे के लिए मोदी सरकार को भागीरथ प्रयास करना पड़ रहा है। पहले आम चुनाव में हिंदू महासभा ने मुस्लिम तुष्टीकरण का पक्षघर मानते हुए पं. नेहरू और मौलाना आजाद के विरूद्घ हिंदू नेताओं को खड़ा करने का निश्चय किया था। इसका कारण था कि हिंदू महासभा ब्रिटिश काल के अंतर्गत अंतिम चुनाव (1945-46) के राष्ट्रीय असेम्बली के चुनाव में हिंदू महासभा ने कांग्रेस को यह कहकर अपना समर्थन दिया था कि वह देश का बंटवारा स्वीकार नही करेगी और किसी प्रकार का तुष्टीकरण भी नही करेगी। पर कांग्रेस वचन देकर भी अपने वचन से मुकर गयी थी। उसने देश का बंटवारा करा दिया। इसलिए हिंदू महासभा ने कांग्रेस को पहले आम चुनाव में घेरने की तैयारी की। मौलाना आजाद को यदि बिशन चंद सेठ एक चुनौती दे रहे थे तो फूलपुर से संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी नेहरू को चुनौती दे रहे थे। नेहरू और मौलाना का गठबंधन मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का एक मुंह बोलता प्रमाण था और लोगों में उस समय ऐसे किसी भी गठबंधन के विरूद्घ एक आक्रोश व्याप्त था। इसलिए लोगों ने मौलाना आजाद के विरूद्घ मतदान किया और बिशनचंद सेठ को 8 हजार मतों से विजयी बनाकर उन्हें हरा दिया था। श्री टंडन ने उक्त लेख में यह भी स्पष्ट किया है कि अधिकारियों ने मतगणना के बाद लाउडस्पीकरों से बिशनचंद सेठ के पक्ष में चुनाव परिणाम भी घोषित कर दिया था। पर इस चुनाव परिणाम पर मौलाना के 'बेताज के बादशाह दोस्त' नेहरू के तोते उड़ गये। उन्होंने दिल्ली दरबार में 'शाही पैगाम' जारी किया और रामपुर की पुनर्मतगणना कराकर चुनाव परिणाम मौलाना आजाद के पक्ष में घोषित करने के लिए यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. गोविन्दवल्लभ पंत को निर्देशित किया। लेखक का कहना है कि मौलाना की हार की सूचना मिलते ही नेहरू बौखला उठे थे। जबकि सेठ समर्थक कार्यकर्ता अपने नेता का विजय जुलूस निकाल रहे थे। तब पं. नेहरू ने पं. पंत को चेतावनी भरे शब्दों में संदेश दिया कि उन्हें मौलाना की हार किसी भी कीमत पर सहन या स्वीकार नही होगी। गोविन्द वल्लभ पंत ने तुरंत 'दिल्ली दरबार' के आदेश का क्रियान्वयन करना सुनिश्चित किया। जिलाधिकारी ने पुन: मतगणना के लिए बिशनचंद सेठ को भी बुला भेजा। लेखक के अनुसार सेठ जी ने उक्त पुन: मतगणना के आदेश का कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि मेरे सारे कार्यकर्ता विजय जुलूस में जा चुके हैं और अब तो मुझे मतगणना के लिए एजेंट तक भी नही मिल सकते। तब जिलाधिकारी ने कह दिया कि कोई बात नही, मतगणना आपके सामने कर दी जाएगी। तब एडी.एम ने सेठजी के सामने ही मतपत्रों का जखीरा समेट कर मौलाना के मतपत्रों में मिला दिया। सेठ जी ने चिल्लाकर कहा कि यह क्या कर रहे हो? तब अधिकारियों ने कह दिया कि हम अपनी नौकरी बचाने के लिए तुम्हें हरवा रहे हैं। श्री टंडन ने लिखा है कि चूंकि उन दिनों प्रत्याशियों के नामों की अलग-अलग पेटियां हुआ करती थीं और मतपत्र बिना कोई निशान लगाये अलग अलग पेटियों में डाले जाते थे। अत: यह आसान था कि एक प्रत्याशी के मत दूसरे प्रत्याशी के मतों मे मिला दिये जाते थे। इसी का लाभ उठाकर सेठ जी को हराया गया और मौलाना को विजयी बनाया गया। 1957 और 1962 के चुनावों में यद्यपि सेठ जी कांग्रेसी प्रत्याशी को हराकर संसद पहुंचे परंतु पहले चुनाव में तो नेहरू वह दुष्कृत्य करने में सफल हो ही गये जिसके कटुफल देश को आज तक चखने पड़ रहे हैं। इससे नेहरू की लोकतांत्रिक छवि पर भी दाग लगा और देश को लोकतंत्र की हत्या का दंश पहले ही आम चुनाव में झेलना पड़ गया।
जब देश में हुए पहले चुनाव में ही कांग्रेस ने लोकतन्त्र की हत्या कर दी गयी हो, आज किस मुँह से कांग्रेस लोकतन्त्र की दुहाई देती है?