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समाजवादी पार्टी के लिए आतंकी थे ‘मासूम मुस्लिम’, योगी बने निर्दोष हिंदुओं का सुरक्षा कवच


सत्ता का इस्तेमाल कैसे होगा, ये पूरी तरह उस इंसान की सोच पर निर्भर करता है जो कुर्सी पर बैठा है। कानून वही रहता है, सिस्टम वही रहता है लेकिन फैसले बदल जाते हैं। उत्तर प्रदेश में यही फर्क साफ दिखाई देता है। जब MY समीकरण वाली राजनीति हावी होती है तब फैसले तुष्टिकरण की तरफ झुकते हैं। जब वही कुर्सी भगवा पहनने वाले मुख्यमंत्री के हाथ में होती है तो जोर कानून-व्यवस्था और न्याय पर दिखाई देता है।

अब इसे सीधे-सीधे एक उदाहरण से समझिए। साल 2015 में दादरी में अखलाक की भीड़ द्वारा हत्या हो गई। उस वक्त यूपी में अखिलेश यादव की सरकार थी। क्या हुआ? करीब दो दर्जन हिंदू युवकों को पकड़कर जेल में डाल दिया गया। केस चलता रहा, सालों निकल गए लेकिन आज तक ये साफ नहीं हो पाया कि अखलाक को मारा किसने। बाद में ये भी सामने आया कि उसके घर में गौमांस पकाया गया था। इसके बावजूद जिन युवकों को पकड़ा गया, वे लगातार अदालतों के चक्कर काटते रहे। अब जाकर योगी सरकार ने उसी मामले में 18 हिंदू युवकों पर से मुकदमे हटाने के लिए कोर्ट में अर्जी दी है।

अब जरा 2012 की तरफ चलते हैं। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने और समाजवादी पार्टी की असली सोच सामने आने लगी। पार्टी 2012 के चुनावी घोषणा-पत्र में कह चुकी थी कि आतंकवाद के मामलों में पकड़े गए ‘कथित मासूम मुस्लिम युवकों’ को छोड़ा जाएगा। बात सिर्फ छोड़ने तक ही नहीं थी, ऐसे लोगों को मुआवजा देने तक की बात सपा की सरकार ने की। हुआ भी यही, सरकार बनते ही अप्रैल 2012 में 19 मुस्लिम आरोपितों को रिहा करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।

ये कोई छोटे-मोटे टटपुँजिये आतंकी नहीं थे, इनमें वलीउल्लाह जैसे दरिंदे शामिल थे। वही वलीउल्लाह जिसने 2006 में वाराणसी के संकटमोचन मंदिर में बम धमाका किया था। उस हमले में 7 लोग मारे गए थे और बाकी धमाकों को जोड़ दें तो कुल 18 लोगों की जान गई थी। जाँच एजेंसियों ने बताया कि वह बांग्लादेश के आतंकी संगठन हूजी से जुड़ा था और ट्रेनिंग लेकर भारत आया था। बाद में अदालत ने उसे फाँसी की सजा सुनाई। लेकिन उससे पहले समाजवादी सरकार उसे भी ‘मासूम’ मानकर छोड़ने की तैयारी में थी।

 यही कहानी गोरखपुर सीरियल ब्लास्ट के आरोपी तारिक कासमी की थी। उसे भी मासूम बताकर रिहा करने की कोशिश हुई। वह जेल में ही मर गया जबकि कोर्ट ने उसे दोषी माना था। फिर नाम आया सितारा बेगम का जिसने पाकिस्तानी जासूस वकास अहमद को छिपने की जगह दी थी। उसे भी छोड़ने की बात चल रही थी। ऊपर से पार्टी नेताओं द्वारा सार्वजनिक मंचों से तुष्टिकरण के लिए बयान दिए जा रहे थे। कहा जा रहा था कि ‘मुसलमान बेटियाँ ही हमारी बेटियाँ हैं’। ऐसे में सवाल उठना लाजमी था कि सरकार की प्राथमिकता आखिर है क्या? सत्ता, कानून, न्याय या बस तुष्टिकरण।

हालात ऐसे हो गए कि अदालतों तक को अखिलेश सरकार को फटकार लगानी पड़ी। 2012 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कहा कि ये तय करना सरकार का काम नहीं है कि कौन आतंकी है और कौन मासूम। अदालत ने तंज कसते हुए यहाँ तक कह दिया कि आज इन्हें छोड़ रहे हो, कल इन्हें पद्म भूषण भी दे दोगे। इसके बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा।

अब दूसरी तरफ देखिए दादरी केस में फँसे हिंदू युवकों की हालत। किसी ने घर बेच दिया, किसी ने जमीन। परिवार के परिवार टूट गए। इसी केस में रवि नाम का एक युवक जेल में ही मारा गया। उसकी जमीन बिक गई, परिवार सड़क पर आ गया और पत्नी विधवा हो गई। रवि की माँ ने ऑपइंडिया को बताया कि उसके बेटे को जेल में भयानक यातनाएँ दी गईं। यहाँ तक आरोप लगा कि ये सब माफिया आजम खान के कहने पर हुआ। यानी एक तरफ आतंकी वलीउल्लाह को छोड़ने की कोशिश और दूसरी तरफ रवि की जान की कोई कीमत नहीं थी।

अब योगी सरकार ने इस मामले में कदम उठाया है। दस साल पुराने केस में 18 हिंदुओं पर से मुकदमे हटाने के लिए कोर्ट में अर्जी दी गई है। 18 दिसंबर को सुनवाई है। अगर अदालत ने अर्जी मान ली, तो ये 18 युवक सालों बाद सामान्य जिंदगी जी पाएँगे। उनके सिर से केस का बोझ हटेगा। फर्क साफ है कि योगी सरकार ने संवैधानिक तरीके से कोर्ट का रास्ता चुनकर हिंदुओं को न्याय दिलाने पर जोर दिया है जबकि अखिलेश यादव के दौर में सत्ता की प्राथमिकता आतंकवाद के मामलों में आरोपियों को ‘मासूम’ बताकर बचाने की दिखाई देती थी।

योगी आदित्यनाथ ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता का मतलब तुष्टिकरण नहीं बल्कि जिम्मेदारी होता है। दशकों तक जिस प्रदेश में सरकारें वोट बैंक के दबाव में फैसले लेती रहीं, वहाँ योगी ने सत्ता की दिशा ही बदल दी। उनके शासन में प्राथमिकता किसी खास वर्ग को खुश करने की नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और न्याय को केंद्र में रखने की दिखाई देती है।

योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उन्होंने सत्ता को अपराधियों और दबाव समूहों की ढाल बनने से रोका। पहले जहाँ सरकारें संवेदनशील मामलों में कदम उठाने से बचती थीं, वहीं योगी ने बिना झिझक साफ संदेश दिया कि कानून सबके लिए बराबर है। चाहे राजनीतिक दबाव हो या वोट की चिंता, योगी सरकार ने यह दिखाया कि राज्य चलाने के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ सीधी रखनी पड़ती है। ‘माफिया को मिट्टी में मिला देंगे’ जैसे संदेश उनकी न्याय के प्रति स्पष्ट सोच को दिखाते हैं।

आज योगी आदित्यनाथ का शासन इस बात का उदाहरण बन चुका है कि मजबूत इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीयत हो तो सत्ता का इस्तेमाल सही दिशा में किया जा सकता है। यूपी में बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं है, यह मानसिकता का बदलाव है। जहाँ तुष्टिकरण की जगह न्याय और डर की जगह भरोसा लेने लगा है।