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चुनावी बांड्स पर फैसला, अदालत में इंडी गठबंधन का फैसला प्रतीत होता है; सरकार को पलट देना चाहिए

सुभाष चन्द्र

चुनावी बॉन्ड हर तिमाही की शुरुआत में सरकार की ओर से 10 दिनों की अवधि के लिए बिकी के लिए उपलब्ध कराए जाते रहे हैं। इसी बीच उनकी खरीदारी की जाती थी। सरकार की ओर से चुनावी बॉन्ड की खरीद के लिए जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के पहले 10 दिन तय किए गए हैं।

क्या है चुनावी बॉन्ड?
चुनावी बॉन्ड एक तरह का वचन पत्र है। इसकी खरीदारी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं पर किसी भी भारतीय नागरिक या कंपनी की ओर से की जा सकती है। यह बॉन्ड नागरिक या कॉरपोरेट कंपनियों की ओर से अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को दान करने जरिया है।
लेखक 
क्या चुनावी बॉन्ड में निवेश करने पर कुछ रिटर्न मिलता है?

चुनावी बॉन्ड में निवेश करने वाले को आधिकारिक तौर पर कोई रिटर्न नहीं मिलता था। यह बॉन्ड एक रसीद के समान था। आप जिस पार्टी को चंदा देना चाहते हैं, उसके नाम से इस बॉन्ड को खरीदा जाता था और इसका पैसा संबंधित राजनीतिक दल मुहैया करा दिया जाता था। 
क्या चुनावी बॉन्ड में निवेश करने वाले को कर में छूट मिलती है?
राजनीतिक पार्टी को सीधे चंदा देने की जगह चुनावी बॉन्ड के जरिए चंदा देने से, दी गई राशि पर इनकम टैक्स की धारा 80जीजीसी और 80जीजीबी के तहत यह छूट देने का प्रावधान है।

Electoral Bonds की योजना भाजपा की निजी योजना नहीं थी बल्कि सरकार द्वारा 2017 के बजट में संसद से पास हुई योजना थी, बजट के प्रावधान थे जिन्हें राष्ट्रपति से मंजूरी मिली थी लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी प्रशांत भूषण की संस्था “Common Cause”, CPIM), कांग्रेस नेता जया ठाकुर ने और साथ में थी ADR (The Association for Democratic Reforms)

यानी एक तरह विपक्ष का इंडी गठबंधन खड़ा था मोदी सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में और यह गठबंधन सब जानते हैं आजकल “George Soros” की फंडिंग पर काम कर रहा है जिसका मकसद मोदी को उखाड़ फेंकना है कल(15 फरवरी) के फैसले में सुप्रीम कोर्ट एक तरह इंडी गठबंधन का हिस्सा बन कर खड़ा हो गया

चीफ जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने बजट में पास किए गए Electoral Bonds को असंवैधानिक कह कर अपनी शक्तियों का अतिक्रमण किया है और सही मायने में कहा जाए तो पायजामे से बाहर निकल कर फैसला किया है सुप्रीम कोर्ट के पास शक्ति केवल कानून में कमी बताने की होनी चाहिए, उसे खारिज करने की शक्ति नहीं होनी चाहिए

CJI चंद्रचूड़ ने कहा है कि “राजनीतिक पार्टियों को आर्थिक मदद से उसके बदले में कुछ और प्रबंध करने की व्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है काले धन को काबू पाने का एकमात्र तरीका इलेक्टोरल बांड नहीं हो सकता इसके और भी विकल्प हैं”

चंद्रचूड़ ने एक तरह यह स्वीकार किया है कि Electoral Bonds के जरिए सरकार ने काले धन पर लगाम लगाने की कोशिश की थी अलबत्ता यह बात अलग है कि चंद्रचूड़ इसे केवल एकमात्र उपाय नहीं समझते चंद्रचूड़ फैसला देते हुए यह मान कर चले हैं कि पार्टियों को चंदा देकर लोग अपना काम निकलवा लेते हैं अगर ऐसा है तो यह करने वाली केवल सरकार नहीं होती बल्कि महुआ मोइत्रा जैसे लोग भी होते हैं

यह बात फिर जजों के फैसलों पर भी लागू हो सकती है और उन पर भी आरोप लग सकता है कि मोदी सरकार को “अस्थिर” करने के लिए जजों को George Soros या अन्य किसी जगह से पैसा दिया गया और फैसले को प्रभावित कर मोदी को परेशान करने की कोशिश की गई फिलहाल यह कोशिश किसान आंदोलन करा कर भी की जा रही है

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि जनता को जानने का अधिकार है किसी पार्टी को कहां से कितना फंड मिला लेकिन Electoral Bonds योजना में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जिससे RTI का उल्लंघन हो रहा था यदि RTI का उल्लंघन हो रहा था तो आप इसे RTI के दायरे में लाने के आदेश दे सकते थे मगर योजना को ही “असंवैधानिक” कह देना आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं हो सकता

मीलॉर्ड, आप दुनिया को प्रवचन देते फिरते हो पारदर्शिता का लेकिन खुद अपनी Assets & Liability Returns नहीं भरते और न RTI में उपलब्ध कराई जाती हैआप अगर समझते हैं कि प्राइवेट parties का पैसा सरकार के फैसलों को प्रभावित कर सकता है तो आपके फैसलों को भी पैसे वाले लोग प्रभावित कर सकते हैं अगर ऐसा न होता तो साढ़े 32 साल की सजा पाया लालू यादव आपकी मेहरबानी से बाहर न घूम रहा होता और 3200 करोड़ का घोटाला करके चंदा कोचर की गिरफ़्तारी को आप लोग गलत साबित न करते। सर तन से जुदा करने वाले अपराधियों को अब तक फांसी नहीं हुई, क्यों? स्थिति विपरीत होने पर कोर्ट क्या इसी तरह ढील बरती जा रही होती। 

मोदी सरकार ने कुछ छुपाने की कोशिश नहीं की थी इस Electoral Bonds scheme में, उन्हें जितना पैसा मिला, वह बताया गया लेकिन आपने गलत intention से योजना को पटक दिया सरकार को चाहिए वह अध्यादेश लाकर आपके फैसले को पलट दे और ऐसा करने का अधिकार आपने ही बताया है सरकार के पास है

कब-कब बिक्री के लिए मुहैया होता था चुनावी बॉन्ड ?
चुनावी बॉन्ड हर तिमाही की शुरुआत में सरकार की ओर से 10 दिनों की अवधि के लिए बिकी के लिए उपलब्ध कराए जाते रहे हैं। इसी बीच उनकी खरीदारी की जाती थी। सरकार की ओर से चुनावी बॉन्ड की खरीद के लिए जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के पहले 10 दिन तय किए गए हैं। लोकसभा चुनाव के वर्ष में सरकार की ओर से 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि तय किए जाने का प्लान था।

चुनावी बॉन्ड का मकसद क्या था?
चुनावी बॉन्ड की शुरुआत करते हुए सरकार ने दावा किया था इससे राजनीतिक फंडिंग के मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी। इस बॉन्ड के जरिए अपनी पसंद की पार्टी को चंदा दिया जा सकता था।

चुनावी बॉन्ड से राजनीतिक दलों को कैसे मिलता था लाभ?
कोई भी भारतीय नागरिक, कॉरपोरेट और अन्य संस्थाएं चुनावी बॉन्ड खरीद सकते थे और राजनीतिक पार्टियां इस बॉन्ड को बैंक में भुनाकर रकम हासिल कर लेते थे। बैंक चुनावी बॉन्ड उसी ग्राहक को बेचते थे, जिनका केवाईसी वेरिफाइड होता था। बॉन्ड पर चंदा देने वाले के नाम का जिक्र नहीं होता था।

अडानी के बाद जार्ज सोरोस गैंग ने ANI पर किया हमला, 2024 तक कांग्रेस और लेफ्ट लिबरल गैंग के माध्यम से भारतीय संस्थाओं पर होते रहेंगे हमले

भारत का बढ़ता कद, भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, पीएम मोदी की देश और दुनिया में बढ़ती लोकप्रियता से अमेरिका और पश्चिमी देशों के पैरों के तले से जमीन खिसक गई है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के एजेंट जार्ज सोरोस भारत को कमजोर करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है। सूत्रों के अनुसार, ये वही CIA है जिसने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के लगभग डेढ़ साल बाद Pentagon को दी अपनी रपट में मोदी को विश्व का सबसे खतरनाक प्रधानमंत्री बताया था। नरेंद्र मोदी को 2024 में सत्ता से बाहर करने के लिए उसने 2022 में राहुल गांधी का लंदन में कार्यक्रम करवाया, उसके बाद भारत जोड़ो यात्रा हुई, बीबीसी डॉक्यूमेंट्री आई, भारत की एक बड़ी कंपनी अडानी समूह के खिलाफ हिंडनबर्ग रिपोर्ट आई और अब भारत की प्रमुख वीडियो वायर एजेंसी ANI के खिलाफ ईयू-डिसइन्फोलैब (Disinfolab EU) की ‘बैड सोर्सेस’ रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में ANI पर प्रोपेगेंडा खबरें चलाने की अफवाह फैलाई जा रही है। भारत को कमजोर करने के लिए अब जार्ज सोरोस गैंग भारतीय संस्थाओं को कमजोर करने की साजिश में जुट गई है।

ईयू-डिसइन्फोलैब की रिपोर्ट, ANI के तमाम सोर्सेस फर्जी हैं

यूरोपीय संघ (ईयू) के एक नॉन-प्रॉफिट समूह ईयू-डिसइन्फोलैब ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि ANI की खबरें फर्जी हैं और फर्जी सूत्रों के हवाले से खबर चलाकर प्रोपेगेंडा फैलाती है। जार्ज सोरोस गैंग की साजिश कितनी गहरी उसे इस बात से समझा जा सकता है कि ANI की प्रमुख मीडिया एजेंसी है जिसके जरिये इसकी फीड और खबरों को देशभर के छोटे-बड़े मीडिया संस्थान सब्सक्राइब करते हैं। समाचार एजेंसी एएनआई देश के इंफार्मेशन इकोसिस्टम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पूरे भारत में सैकड़ों मीडिया हाउस को सामग्री प्रदान करती है। अब इस पर सरकारी मुखपत्र होने का आरोप लगाकर बदनाम किया जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ANI फर्जी स्रोतों के आधार पर गढ़ी गई प्रोपेगेंडा खबरें चलाती है।

पीएम मोदी के सामने बेवश पश्चिम देश और अमेरिका बौखलाया

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और पश्चिमी देश अपना हित साधने के लिए सरकार भी खरीद लेती थी और तमाम तरह की साजिश रचने में सफल हो जाती थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 90 के दशक में हुए इसरो जासूसी कांड है। उस वक्त भारतीय वैज्ञानिक नंबी नारायण के नेतृत्व में भारत लिक्विड प्रोपेलेंट इंजन बनाने में सफल होने के करीब पहुंच गया था लेकिन CIA ने कांग्रेस सरकार और नेताओं को खरीद कर नंबी नारायण को जेल में डलवा दिया और भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम 20-30 साल पीछे चला गया। इसरो जासूसी कांड में जब नंबी नारायण को गिरफ्तार किया गया था तो उस वक्त केरल में कांग्रेस की सरकार थी। सीबीआई की जांच में सामने आया है कि नंबी नारायण की अवैध गिरफ्तारी में केरल सरकार के तत्कालीन बड़े अधिकारी भी शामिल थे। हाईकोर्ट में सीबीआई ने कहा कि नंबी नारायण की गिरफ्तारी संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा थी।

जार्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित है डिसइन्फोलैब ईयू

यह डिसइन्फोलैब ईयू अमेरिकी अरबपति जार्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित है और ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से 25 हजार डॉलर के सीड मनी के साथ शुरू हुआ है।

ANI के खिलाफ रिपोर्ट आई नहीं कि लेफ्ट लिबरल सक्रिय हो गए

अब अगर इस पैटर्न को समझें तो भारत और अन्य जगहों पर अपने एजेंट को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने सक्रिय कर दिया है। अपने आकाओं के निर्देश पर लेफ्ट लिबरल गैंग के सदस्य मोहम्मद जुबैर भी सक्रिय हो गए। उन्होंने ट्वीट किया- दो दिन पहले ब्रिटेन सरकार ने हाउस ऑफ कॉमन्स में बीबीसी का पुरजोर बचाव किया था। दक्षिण एशिया की अग्रणी मल्टीमीडिया समाचार एजेंसी (ANI) द्वारा इसकी सूचना नहीं दी गई, लेकिन उन्होंने 18 बार ‘बॉब ब्लैकमैन’ की खबर को चलाया, जिन्होंने बीबीसी की आलोचना की थी। इससे साबित होता है मोहम्मद जुबैर आईएसआई का एजेंट है।

ईयू डिसइन्फोलैब बीबीसी, रॉयटर्स पर कभी रिपोर्ट नहीं बनाती

दिलचस्प बात यह है कि ईयू डिसइन्फोलैब और फॉरबिडन स्टोरीज ने एएनआई की विश्वसनीयता पर हमला किया है, यह आरोप लगाते हुए कि यह खराब स्रोतों का उपयोग करके पाकिस्तान/चीन के खिलाफ फर्जी खबरें चला रहा है। लेकिन ईयू डिसइन्फोलैब ने बीबीसी, रॉयटर्स और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मीडिया हाउस द्वारा ‘खराब स्रोतों’ के समान उपयोग को जानबूझकर अनदेखा कर दिया है। उस पर यह कभी रिपोर्ट नहीं बनाती जबकि ANI पर यह उसकी तीसरी रिपोर्ट है। वह 2019 से एएनआई के पीछे पड़ी है। इसी से समझा जा सकता है ईयू डिसइन्फोलैब की साजिश कितनी गहरी है।

प्रशांत भूषण को मिला टूल, एएनआई को बता दिया मोदी की न्यूज एजेंसी

एएनआई पर रिपोर्ट आते ही लेफ्ट लिबरल प्रशांत भूषण को भी पीएम मोदी पर हमला करने का टूल मिल गया। उन्होंने क्या लिखा यह भी देखिए- मोदी की न्यूज एजेंसी एएनआई का सच। हास्यास्पद है कि जब भी कोई रिपोर्ट आती है वे इसे पीएम मोदी से जोड़ देते हैं। अडानी मोदी की कंपनी अब एएनआई मोदी की न्यूज एजेंसी।

दुनियाभर में UPI की धाक, इसीलिए कुलबुलाए हुए हैं जार्ज सोरोस!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल विजन से डिजिटल भुगतान के मामले में भारत दुनिया भर में सबसे आगे है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) तक ने यूपीआई को लेकर भारत को सराहा है। देश की बात करें तो यूपीआई से होने वाले पेमेंट के आंकड़े में महीने-दर-महीने तेजी देखने को मिल रही है। इस पेमेंट सिस्टम की लोकप्रियता के चलते सरकार लगातार इसके विस्तार पर फोकस कर रही है और अब UPI वैश्विक ब्रांड के तौर पर पहचान बनाता जा रहा है। पीएम मोदी के मजबूत भारत के संकल्प में भारतीय पेमेंट सिस्टम UPI मील का पत्थर साबित हो रही है। UPI करीब 50 से अधिक देशों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी है। अब UPI अमेरिका के चौखट तक पहुंच गया है और Visa एवं MasterCard को टक्कर दे रही है। इससे जहां अमेरिका तिलमिलाया हुआ है वहीं उसके डीपस्टेट एजेंट जार्ज सोरोस कुलबुलाए हुए हैं। क्योंकि Visa और MasterCard की दुनिभायर में बादशाहत है और अरबों का बिजनेस है। लेकिन UPI जिस तेजी से दुनियाभर में बढ़ रही है उससे उनके कारोबार में कमी आई है। ऐसे में उन्हें डर है UPI कहीं Visa और MasterCard का कारोबार खत्म न कर दे।

सोरोस भारत में चाहता है कमजोर और गठबंधन सरकार

सोरोस और उनके जैसे लोग भारत में एक कमजोर और गठबंधन सरकार को पसंद करते हैं, जिससे वे अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उसे चला सकें। एक स्थिर, पूर्ण बहुमत वाली सरकार से वे डरते हैं और इसीलिए उसे हटाना चाहते हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि राहुल गांधी 2022 में जब ब्रिटेन में थे उसी समय सोरोस भी ब्रिटेन में था। यह डीपस्टेट का षड़यंत्र है जिसमें कांग्रेस सहित लेफ्ट लिबरल मिले हुए हैं।

सोरोस ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में उठाया था अडानी मुद्दा 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि सोरोस ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अडानी मुद्दा क्यों उठाया? सोरोस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर क्रोनी कैपटलिज्म को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि मोदी और अडानी करीबी सहयोगी हैं। उनका भाग्य आपस में जुड़ा हुआ है। सोरोस ने यह टिप्पणी 16 फरवरी 2023 को जर्मनी में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन से पहले टेक्निकल यूनिवर्सिटी आफ म्यूनिख में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए की। सोरोस ने कहा कि अडानी एंटरप्राइजेज ने शेयर बाजार में धन जुटाने की कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा। सोरोस का यह बयान हिंडनबर्ग रिपोर्ट के करीब तीन हफ्ते बाद आया है। इससे आप समझ सकते हैं कि बीबीसी डॉक्यूमेंट्री और हिंडनबर्ग रिपोर्ट के पीछे कौन लोग हैं। ये वही लोग हैं जो भारत को कमजोर करना चाहते हैं।

सोरोस ने दावोस में उठाया था कश्मीर मुद्दा

सोरोस को आखिर भारत से इतना लगाव क्यों है, यह एक सहज सवाल मन में आता है। जनवरी 2020 में जॉर्ज सोरोस ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) के कार्यक्रम में कश्मीर और नागरिकता संशोधन कानून को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी पर बड़ा हमला बोला था। उसने कहा कि देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आए पीएम मोदी कश्मीर में प्रतिबंध लगाकर वहां लोगों को दंडित कर रहे हैं और लाखों मुसलमानों से नागरिकता छीनने का काम कर रहे हैं। कितना झूठ फैलाया जा रहा है यह देख लीजिए। कश्मीर में किस मुसलमान की नागरिकता गई है बल्कि अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद कश्मीर खुशहाली की ओर बढ़ रहा है। लेकिन दुख की बात यह है कि देश के कुछ नेता और राजनीतिक दल सोरोस की बातों में सुर में सुर मिलाते दिख जाते हैं और जनता को यह सब दिख रहा है।

मोदी के राष्ट्रवाद से भी सोरोस को है दिक्कत

सोरोस कहते हैं कि नरेंद्र मोदी हिंदू राष्ट्रवादियों का देश बना रहे हैं। यह कहकर वह हिंदू और मुसलमानों के बीच विवाद उत्पन्न करने की साजिश रचते हैं। और देश में मौजूद विपक्षी दल और लेफ्ट लिबरल को भी पीएम मोदी पर हमला करने का टूल मिल जाता है।

सोरोस ने राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए 100 करोड़ डॉलर देने का किया ऐलान

सोरोस ने साल 2020 में वैश्विक विश्वविद्यालय की शुरूआत करने के लिए 100 करोड़ डॉलर देने की बात कही थी। उसने कहा था कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना ‘राष्ट्रवादियों से लड़ने’ के लिए की जाएगी। सोरोस ने ‘अधिनायकवादी सरकारों’ और जलवायु परिवर्तन को अस्तित्व के लिए खतरा बताया था। सोरोस ने कहा था कि राष्ट्रवाद अब बहुत आगे निकल गया है। सबसे बड़ा और सबसे भयावह झटका भारत को लगा है, क्योंकि वहां लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नरेंद्र मोदी भारत को एक हिन्दू राष्ट्रवादी देश बना रहे हैं।

सोरोस ने पीएम मोदी पर दिया विवादित बयान, देशवासी देंगे मुंहतोड़ जवाब

जॉर्ज सोरोस ने भारत को लेकर विवादित बयान दिया है। जार्ज सोरोस ने कहा कि अडानी मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारतीय संसद में जवाब देना होगा। उसने कहा कि अडानी के कारोबारी साम्राज्य में मची उथल-पुथल से शेयर बाजार में बिकवाली आई है और इससे निवेश के अवसर के रूप में भारत में विश्वास हिला है। उसने कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे कमजोर होंगे और इससे देश में लोकतांत्रिक पुनरुद्धार (Democratic Revival) के द्वार खुलेंगे। किसी विदेशी ताकत द्वारा भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर इस तरह खुलकर वार शायद पहली बार किया गया है। इसे कोई भी देशवासी बर्दाश्त नहीं कर सकता। भारत और पीएम मोदी को कमजोर करने की इस साजिश का देश के 140 करोड़ देशवासी मुंहतोड़ जवाब देंगे।

भारत में विदेशी ताकतों के हितों का संरक्षण चाहता है जार्ज सोरोस

जार्ज सोरोस हिंदुस्तान में विदेशी ताकत के तहत एक ऐसी व्यवस्था बनाना चाहता है जो हिंदुस्तान नहीं, बल्कि विदेशी ताकतों के हितों का संरक्षण करेगी। जॉर्ज सोरोस का यह ऐलान कि वो हिंदुस्तान में मोदी को झुका देंगे, हिंदुस्तान की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार को ध्वस्त करेंगे। इससे उसकी नापाक मंसूबे ही जाहिर होते हैं और इसका मुंहतोड़ जवाब हर देशवासी देगा।

सोरोस-हर्ष मंदर-गांधी लॉबी हिंदू विरोधी खेल में जुटी

वर्ष 2002 से जार्ज सोरोस-हर्ष मंदर-गांधी लॉबी द्वारा पीएम मोदी के खिलाफ खेल खेला जा रहा है। लेकिन अब यह हिंदू विरोधी खेल में बदल गया है। कांग्रेस द्वारा समर्थित वैश्विक एक्टिविस्ट, दानदाता, फंड देने वाले और विदेशों में बसे लेफ्ट लिबरल भारतीय का गुट अब पीएम मोदी को रोकना चाहता है। डीपस्टेट अब इस बात से घबराया हुआ है कि भारत का विकास शक्ति संतुलन को वापस एशिया में स्थानांतरित कर देगा जैसा कि 1760 के दशक से पहले था। चूंकि पीएम मोदी भारत के विकास के साथ ही सनातन संस्कृति को भी गौरव प्रदान कर रहे हैं तो अब लेफ्ट लिबरल गैंग हिंदुओं को बदनाम करने के षडयंत्र में जुट गई है।

2009 में सोरोस पहले भारत पहुंचे फिर मनमोहन सिंह दूसरी बार पीएम बने

22 मई 09 – मनमोहन सिंह ने दूसरी बार पीएम पद की शपथ ली। जार्ज सोरोस 09 मई को भारत पहुंचे। शशि थरूर 9 मई को मंत्री बनने से 2 दिन पहले सोरोस से मिले थे। मनमोहन की बेटी 9 मई को जार्ज सोरोस के ओपन सोसायटी फाउंडेशन (ओएसएफ) में शामिल हुई। वहीं सोरोस ने स्थिर सरकार का हवाला देते हुए रैली को उचित ठहराया। साल 2009 में बड़े पैमाने हुए किसान आंदोलन के दौरान हुई हिंसक घटनाओं के बावजूद सोरोस ने इसे सही ठहराया था।

कांग्रेस व सोरोस 2002 से पीएम मोदी के खिलाफ रच रहे षडयंत्र

कांग्रेस पार्टी गुजरात में 2002 में गोधरा दंगा के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ षडयंत्र रच रहा है। 2005 में इस साजिश में शामिल लोगों के नामों पर गौर करें तो पाएंगे- अब्दुल एम मुजाहिद (ISI), फाई (ISI), हर्ष मंदर (सोनिया सहयोगी), राजू राजगोपाल (सोनिया सहयोगी), जॉन प्रभुदास शामिल थे। ये सभी उस वक्त तत्कालीन गुजरात सीएम नरेंद्र मोदी को वीजा नहीं मिले, इसके लिए काम कर रहे थे।

नरेंद्र मोदी से 2002 से हारते रहे हैं सोरोस

यह स्पष्ट है कि सोरोस जैसे लोग लंबे समय से भारत में कांग्रेस और वाम एजेंडा का प्रबंधन कर रहे थे। कांग्रेस सोरोस के सहारे मोदी को गुजरात की सत्ता से हटाने की साजिश 2002 से करती आ रही है। और सोरोस 2002 से मोदी से हारते रहे हैं। और अब दो बार से पीएम मोदी को केंद्र सरकार से हटाने में भी हार चुके हैं। चूंकि मोदी दो बार सफल हुए, सोरोस अपने शातिर विचारों में सफल नहीं हो पाए इसीलिए अब उन्हें खुद मैदान में सामने आना पड़ा। लेकिन भारतीय जनमानस विदेशी ताकत की नापाक हरकत को समझ चुके हैं। 2024 कांग्रेस के साथ ही सोरोस के अंत की इबारत भी लिखेगी।

जार्ज सोरोस दर्जनों देशों में कर चुके सत्ता परिवर्तन का खेल

देशों में आंदोलन खड़ा करके सत्ता परिवर्तन कराने के खेल में माहिर हो चुके जार्ज सोरोस ने हाल के वर्षों में यूक्रेन, किर्गिस्तान, जॉर्जिया, जॉर्जिया, फिलीपींस, चेकोस्लोवाकिया, ट्यूनीशिया, मिस्र, लेनन, सीरिया में सत्ता परिवर्तन करा चुके हैं। किस देश में किस क्रांति से सत्ता परिवर्तन हुआ है, नीचे देखिए-
नारंगी क्रांति – यूक्रेन
ट्यूलिप क्रांति – किर्गिस्तान
गुलाब क्रांति – जॉर्जिया
पीली क्रांति – फिलीपींस
मखमली क्रांति – चेकोस्लोवाकिया
अरब वसंत – ट्यूनीशिया, मिस्र, लेनन, सीरिया

इन क्रांतियों को गैर-सरकारी संगठनों द्वारा अंजाम दिया गया जिन्हें सोरोस द्वारा वित्त पोषित किया गया। इन देशों में सोरोस विरोधी सरकार को हटाकर सोरोस समर्थक सरकार स्थापित किया गया। सोरोस समर्थक सरकार एक कठपुतली सरकार के रूप में काम करती है। ये कठपुतली नेता विदेशी ताकतों के हित के लिए अपने देश को नष्ट कर देते हैं।

देशवासी 2024 में सोरोस को सबक सिखाएंगे

सोरोस सत्ता परिवर्तन का खेल अब भारत में करना चाहता है। भारतीय लोगों के लिए समय आ गया है कि वे इन पश्चिमी वैश्विकतावादी अभिजात वर्ग को सबक सिखाएं जो भारतीय लोकतंत्र को नियंत्रित करना चाहते हैं। जो भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करना चाहते हैं। जो भारत के विकास के पथ को रोकना चाहते हैं। जो आत्मनिर्भर होते भारत को फिर से दूसरों पर आश्रित देखना चाहते हैं। जो एक मजबूत भारत नहीं देखना चाहते। जो पीएम मोदी को कमजोर करना चाहते हैं। इन सभी शक्तियों को आज मुंहतोड़ जवाब देने की घड़ी आ गई है।

देश ने मोदी को दिल में बसाया, 2024 सोरोस के सपनों का अंत होगा

सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं भारतीय मतदाताओं को प्रभावित करने वाला यह सोरोस कौन होता है। भारतीय मतदाता निश्चित रूप से 2024 में मोदी जी को फिर से वापस लाएगा! 2024 सोरोस के सपनों का अंत होगा। देशों में शासन परिवर्तन के उसके मंसूबे का अंत भारत में होगा। भारत में ऐसा कुछ करने की कोशिश करना मुश्किल है। अब देश ने मोदी को दिल में बसा लिया है।

हिन्दुओं के विरुद्ध विषैले भाषण देने वालों पर चुप्पी साधने वाले प्रशांत भूषण सहित 76 वकीलों ने धर्म संसद के भाषण पर CJI को लिखा

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के 76 वकीलों ने 17 और 19 दिसंबर को दिल्ली (हिंदू युवा वाहिनी द्वारा) और हरिद्वार (यति नरसिंहानंद) में धर्म संसद के दौरान दिए गए भाषणों को लेकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) एनवी रमना को पत्र लिखा है। उन्होंने पत्र में कथित आरोप लगाया है कि धर्म संसद के दो अलग-अलग आयोजनों में अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया है। इस पर संज्ञान लिया जाए।

पत्र लिखने वालों में प्रशांत भूषण, सलमान खुर्शीद और दुष्यंत दवे भी शामिल हैं। उन्होंने भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 120बी, 121ए, 124ए, 153ए, 153बी, 295ए और 298 के तहत ‘दोषी व्यक्तियों’ के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की है।

पत्र में कहा गया है कि इन भाषणों में ना केवल अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया है, बल्कि खुलेआम एक पूरे समुदाय की हत्या के लिए आह्वान किया गया है। इस प्रकार ये भाषण न केवल हमारे देश की एकता और अखंडता के लिए गंभीर खतरा हैं, बल्कि लाखों मुस्लिम नागरिकों के जीवन को भी खतरे में डालते हैं।

भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना को पत्र लिखकर उनसे इन भाषणों पर स्वत: संज्ञान लेने की माँग की गई थी, जबकि पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपितों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी थी। इसके बावजूद इन वकीलों ने दिल्ली और हरिद्वार के आयोजनों में किए गए कथित घृणास्पद भाषण को लेकर सर्वोच्च न्यायालय को पत्र लिखा।

यहाँ हैरान करने वाली बात यह है कि जिस तेजी से वकीलों ने शीर्ष न्यायालय का रुख किया है और उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए उन्हें इन चुनिंदा घटनाओं के योग्य माना, यह उनके विवेक पर प्रश्न खड़े करता है।

जब ‘धर्म संसद‘ में दिए गए भाषणों के वीडियो इंटरनेट पर वायरल हो रहे थे, उसी दौरान सोशल मीडिया पर एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) के रैलियों में भड़काऊ भाषण के वीडियो भी सामने लगे।

वायरल वीडियो में एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी को कहते सुना जा सकता है, “मैं पुलिस वालों को बता देना चाहता हूँ कि वो याद रखें कि न तो योगी हमेशा मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे और न ही मोदी हमेशा प्रधानमंत्री। हम मुस्लिम समय को देख कर चुप हैं। पर ध्यान रहे कि हम कुछ भूलने वाले नहीं हैं। हमें तुम्हारा अन्याय याद रहेगा। अल्लाह अपनी ताकत से तुम्हे बर्बाद करेगा। इंशाल्लाह हम याद रखेंगे और समय भी बदलेगा। तब तुम्हे बचाने कौन आएगा जब योगी अपने मठ और मोदी हिमालय में चले जाएँगे? याद रहे, हम नहीं भूलने वाले।”

मुख्य जस्टिस जी 

एक बार ओवैसी की सुन लीजिये, "असहिष्णुता" क्या होती है, समझ आ जायेगा -

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने डाबर के करवा चौथ के विज्ञापन पर पूरी हिन्दू कौम को "असहिष्णु" कह दिया था जिसकी वजह से कंपनी को अपना विज्ञापन वापस लेना पड़ गया -

हिन्दू समुदाय को जलील करने वाले डाबर ने अपने विज्ञापन में 2 समलैंगिक शादी शुदा लड़कियों को करवा चौथ का व्रत करते दिखाया था जैसे हिन्दुओं की महिलाएं व्रत करती ही नहीं और 

समलैंगिक लड़कियां ही हिंदुत्व की प्रतिनिधि हैं   -इस पर ऐतराज को चंद्रचूड़ जी ने करार दिया था --

"असहिष्णुता" है --अब एक बार चंद्रचूड़ जी ओवैसी का बयान सुन लें तो समझ आएगा कि 

"असहिष्णुता" किस चिड़िया का नाम है -- 

ओवैसी ने खुलेआम पुलिस वालों को  धमकी दे कर दरअसल पूरे हिन्दू समाज को धमकी दी है कि मोदी योगी हमेशा सत्ता में नहीं रहेंगे और जब योगी मठ में और मोदी हिमालय पर चले जायेंगे तो तुम्हे बचाने कौन आएगा --हम मुसलमान तुम्हारे जुल्म भूलने वाले नहीं हैं -ऐसा नहीं है ओवैसी और उसके लोग पहली बार ऐसी धमकी दे रहे हैं -छोटे ओवैसी ने भी कहा था, 15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो तो हम 100 करोड़ हिन्दुओं को ख़त्म कर सकते हैं। 

कुछ दिन पहले वारिस पठान ने कहा था कि हम 15 करोड़ आज 100 करोड़ पर भारी हैं - 

ओवैसी की अनर्गल बातें और तमाम मोदी विरोधियों का उसके खिलाफ अपशब्द बोलना आपकी 

(सुप्रीम कोर्ट) की 7 साल से दी हुई "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" का परिणाम है जिसकी वजह से लोग अराजकता फैलाने में आगे रहते हैं --

एक काम तो आप ओवैसी से पूछिए जो मोदी और योगी ने मुसलमानों के खिलाफ किया हो, किसी योजना में भेदभाव किया हो --अरे, श्री राम का मंदिर भी बनवा रहे हैं तो आपकी आज्ञा मिलने के बाद ही बनवा रहे हैं --मगर ओवैसी उसे भी जुल्म कहता है - ओवैसी की बातों पर आपको स्वतः संज्ञान ले कर उसे जेल में डालना चाहिए और उसकी पार्टी को बैन करने के आदेश देने चाहिए -ऐसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देश में आग लगाने का काम कर रही है जिसके लिए अदालत भी जिम्मेदार है --

याद रखिये, आज अगर ओवैसी मोदी और योगी के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर रहा है, तो वो कल को आपको भी निशाना बना सकता है। 

ओवैसी को वैसे याद रखना चाहिए कि 2019 चुनाव से पहले, कांग्रेस के नेताओं ने भी सभी जांच एजेंसियों के अधिकारियों ऐसे ही धमकी दी थी कि हमारी सरकार आई तो आप लोगों मुश्किल में आ जाओगे -ओवैसी का यह आपत्तिजनक बयान 12 दिसंबर को कानपुर की एक सभा में दिया गया था। लेकिन जिन वकीलों ने ‘धर्म संसद’ मामले में शीर्ष अदालत से हस्तक्षेप करने के लिए तेजी दिखाई। उन्होंने ओवैसी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को पत्र नहीं लिखा। बहुसंख्यकों के खिलाफ किए गए कई अन्य नफरत भरे भाषणों इसी तरह आसानी से नजरअंदाज कर दिया गया और उनको शीर्ष अदालत के समक्ष लाना योग्य नहीं माना।

क्या आपने कभी इन पश्चिमी philosophers को पढ़ा है:

1. लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910):

"हिन्दू और हिन्दुत्व ही एक दिन दुनिया पर राज करेगी, क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है"।

2. हर्बर्ट वेल्स (1846 - 1946):

" हिन्दुत्व का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा । तभी एक दिन पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित हो जाएगी, उसी दिन ही दिलशाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी । सलाम हो उस दिन को "।

3. अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 - 1955):

"मैं समझता हूँ कि हिन्दूओ ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो यहूदी न कर सके । हिन्दुत्व मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है"।

4. हस्टन स्मिथ (1919):

"जो विश्वास हम पर है और इस हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो हिन्दुत्व है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी"।

5. माइकल नोस्टरैडैमस (1503 - 1566):

" हिन्दुत्व ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर हिन्दू राजधानी बन जाएगा"।

6. बर्टरेंड रसेल (1872 - 1970):

"मैंने हिन्दुत्व को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है । हिन्दुत्व पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में हिन्दुत्व के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि हिन्दू ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा "।

7. गोस्टा लोबोन (1841 - 1931):

" हिन्दू ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार ही के विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ"।

8.  बरनार्ड शा (1856 - 1950):

"सारी दुनिया एक दिन हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगी । अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी। पश्चिम एक दिन हिन्दुत्व स्वीकार कर लेगा और हिन्दू ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा "।

9. जोहान गीथ (1749 - 1832):

"हम सभी को अभी या बाद मे हिन्दू धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है ।मुझे कोई हिन्दू कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा, मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ ।"

Supreme Court से विनम्र निवेदन

तुम हमें वोट दो; हम तुम्हें-

... लैपटॉप देंगे ..

....सायकल देंगे

...स्कूटी देंगे ..

... हराम की बिजली देंगे ..

.... लोन माफ कर देंगे

..कर्जा डकार जाना, माफ कर देंगे 

... ये देंगे .. वो देंगे ... वगैरह, वगैरह। 

क्या ये खुल्लम खुल्ला रिश्वत नहीं?

क्या इससे चुनाव प्रक्रिया बाधित नहीं हो रही !!

क्या इन सब प्रलोभनों से चुनाव निष्पक्ष होंगे?

कोई चुनाव आयोग है भी कि नहीं इस देश में !

आयोग की कोई गाइडलाइंस है भी या नहीं?

वोट के लिए क्या आप कुछ भी प्रलोभन  दे सकते हैं?

ये जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा है इसकी जवाबदेही होनी चाहिये,

रोकिए  ये सब .. 

वर्ना बन्द कीजिये ये चुनाव के नाटक .. और मतदान ।

हम मध्यमवर्गीय तंग आ गए हैं, क्या हम इन सबके लिए  भर-भर कर टैक्स  चुकाते रहें?

डिफाल्टर की कर्जमाफी... फोकट की स्कूटी...

हराम की बिजली...

हराम का घर...

दो रुपये किलो गेंहू...

एक रुपया किलो चावल...

चार से छह रुपये किलो दाल...

और कितना चूसोगे टेक्स दाताओं को? 

क्योंकि! वे तुम्हारे आका हैं!

गरीब हैं, थोकिया वोट बैंक हैं, इसलिए फोकट खाना, घर, बिजली, कर्जा माफी दिए जा रहे हैं, 

बाकी लोग किस बात की  सजा भोगें ? 

जबकि  होना ये चाहिये कि हमारे टैक्स से सर्वजनहिताय काम हों, 

देश के विकास का काम हों,

रेल मार्ग, सड़कें, पुल दुरुस्त हों,

रोजगारोन्मुखी कल कारखानें हों,

विकास की खेती लहलहाती हो,

तो सबको टैक्स चुकाना अच्छा लगता.. ।

लेकिन आप तो  देश के एक बहुत बड़े भाग को शाश्वत गरीब ही बनाए रखना चाहते हो। उसके लिए रोजगार सृजन के अनूकूल परिस्थिति बनाने की बजाए आप तथाकथित सोशल वेलफेयर की खैराती योजनाओं के माध्यम से अपना अक्षुण्ण वोट बैंक स्थापित कर रहे हो।

चुनाव आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय से निवेदन हैं कि कर्मशील देश के बाशिन्दों को तुरंत कानून लाकर कुछ भी फ्री देने पर बंदिश लगाई जाए ताकि देश के नागरिक निकम्मे व निठल्ले न बने।

पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटलजी कहा करते थे कि जनता को सिर्फ न्याय,शिक्षा व चिकित्सा के अलावा और कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलनी चाहिए। तभी देश का विकास संभव है।

अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों को राहत देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

जम्मू में अवैध रोहिंग्या प्रवासियों के डिटेन्शन और उन्हें वापस म्याँमार भेजने के निर्णय के विरुद्ध दायर की गई याचिका में अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया है। यह याचिका एडवोकेट प्रशांत भूषण द्वारा दाखिल की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर अवैध रोहिंग्याओं के पक्ष में अंतरिम राहत प्रदान करना संभव नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अवैध प्रवासियों के डिपोर्टेशन से संबंधित पूरी प्रक्रिया का पालन करने के बाद ही रोहिंग्याओं को म्याँमार भेजा जाए।

चीफ जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमनियम की बेंच ने मोहम्मद सलीमुल्लाह की याचिका पर निर्णय देते हुए कहा कि कोर्ट जम्मू में अवैध प्रवासियों के लिए बने सेंटर्स में डिटेन किए गए रोहिंग्या प्रवासियों को छोड़ने का निर्णय नहीं दे सकता बल्कि नियत प्रक्रिया के अनुसार उनके डिपोर्टेशन की अनुमति देता है। अवैध रोहिंग्या प्रवासियों को बचाने की याचिका में सलीमुल्लाह की ओर से प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए।

23, मार्च को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान रोहिंग्याओं की म्याँमार में स्थिति से संबंधित इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) के निर्णय का हवाला दिया था जबकि यह तथ्य सर्वविदित है कि आईसीजे का निर्णय आमतौर पर भारतीय न्याय व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि रोहिंग्याओं का डिपोर्टेशन अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं 

भारत सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि डिपोर्टेशन कानून के द्वारा निर्मित नियत प्रक्रिया के अनुसार ही होगा अतः यह संविधान के अनुच्छेद 21 का किसी भी प्रकार से उल्लंघन नहीं करेगा। मेहता ने यह भी कहा कि रोहिंग्याओं के लिए ‘रिफ़्यूजी’ के स्थान पर ‘अवैध प्रवासी’ शब्द उपयोग किया जाना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से हरीश साल्वे इस केस में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि चूँकि भारत ने अवैध प्रवासियों से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है अतः ‘non-refoulment (यह अवैध प्रवासियों को उनके मूल स्थान पर वापस भेजने से संबंधित है)’ का सिद्धांत भारत पर लागू नहीं होता है।
चीफ जस्टिस ने कहा कि कोर्ट यह मानता है कि म्याँमार में रोहिंग्याओं की स्थिति अच्छी नहीं है लेकिन इस मुद्दे पर कुछ भी करना न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। उन्होंने यह भी कहा कि म्याँमार में अवैध रोहिंग्या प्रवासियों के साथ म्याँमार में क्या होगा, उसे सुप्रीम कोर्ट नहीं रोक सकता है। 

‘रोहिंग्या को तुरंत रिहा करें, प्रत्यर्पित करने से केंद्र सरकार को रोकें’: प्रशांत भूषण

सुप्रीम कोर्ट से जम्मू-कश्मीर में हिरासत में लिए गए रोहिंग्या को तुरंत रिहा करने और उन्हें प्रत्यर्पित करने के आदेश को लागू करने से केंद्र सरकार को रोकने की गुहार लगाई गई है। इस संबंध में पिछले साल कोर्ट की अवमानना मामले में दोषी पाए गए वकील प्रशांत भूषण के माध्यम से गुरुवार (मार्च 11, 2021) को एक याचिका दायर की गई। इस याचिका में जम्मू में हिरासत में लिए गए अवैध रोहिंग्या प्रवासियों को रिहा करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की माँग की गई है। कथित तौर पर यह याचिका रोहिंग्या मोहम्मद सलीमुल्ला ने दायर की है और एडवोकेट चेरिल डीसूजा (Cheryl Dsouza) ने इसे तैयार किया है।

आखिर प्रशांत को उन रोहिंग्यों से, जिन्हे कोई मुस्लिम देश तक अपने देश में रखने को तैयार नहीं, क्या लगाव है? क्या वह अवैध रूप से किसी भी देश में रह सकते हैं? यदि नहीं, फिर किस आधार पर रोहिंग्यों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा रहे हो? प्रशांत भूषण उन वकीलों में से है, जो आतंकवादियों की फांसी रुकवाने आधी रात को कोर्ट खुलवाते हैं? 

रिपोर्ट्स के अनुसार, बताया गया है कि यह जनहित याचिका भारत में रह रहे अवैध प्रवासियों (याचिका की भाषा में शरणार्थी) को प्रत्यर्पित करने से बचाने के लिए दायर की गई है। यह भी कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के साथ ही अनुच्छेद 51 (सी) के तहत प्राप्‍त अधिकारों की रक्षा के लिए यह याचिका दाखिल की गई है।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश की गई है कि वह संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) को इस मामले में हस्तक्षेप करने के निर्देश जारी करें। साथ ही शिविरों में रखे गए रोहिंग्या की सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने की माँग की गई है।

याचिका में कहा गया है कि एक सरकारी सर्कुलर की वजह से रोहिंग्या खतरे का सामना करना पड़ रहा है। यह सर्कुलर अवैध रोहिंग्या प्रवासियों की पहचान का निर्देश अधिकारियों को निर्देश देता है। शीर्ष अदालत में लंबित एक मामले में हस्तक्षेप अर्जी दायर कर गृह मंत्रालय को निर्देश देने का आग्रह किया है कि वह अनौपचारिक शिविरों में रह रहे रोहिंग्याओं के लिए विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) के जरिए तीव्र गति से शरणार्थी पहचान-पत्र जारी करें।

याचिका कहती है कि भारत में शरणार्थियों के लिए कानून न होने से रोहिंग्याओं को अवैध प्रवासी माना जाता है, जिन्हें फॉरेनर्स एक्ट 1946 और फॉरेनर्स ऑर्डर 1948 के तहत कभी भी भेजा जा सकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि मुस्लिम पहचान की वजह से सरकार रोहिंग्या के साथ भेदभाव करती है।

2017 में दायर हुई थी याचिका

इसी मामले में एक आवेदन साल 2017 में दायर किया गया था। उसमें रोहिंग्या सहित अन्य शरणार्थियों के निर्वासन के खिलाफ अधिकार की सुरक्षा की माँग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि सरकार रोहिंग्या लोगों म्यांमार प्रत्यर्पित करने का प्रस्ताव देकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रही है।
जम्मू-कश्मीर में रह रहे अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए चल रही कवायद के तहत, कई रोहिंग्याओं को विदेशी अधिनियम की धारा 3(2) ई के तहत होल्डिंग सेंटर भेजा गया था। इनके पास पासपोर्ट अधिनियम की धारा 3 के तहत आवश्यकतानुसार वैध यात्रा के दस्तावेज नहीं थे।

दिल्ली दंगा : आरोपितों को बचाने वाले महमूद प्राचा को दिल्ली पुलिस ने किया एक्सपोज़

                                                                                                  साभार: PTI,Telegraph India
सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण द्वारा दिल्ली पुलिस की छापेमारी पर सवाल खड़े किए जाने के बाद पुलिस ने बिन्दुवार तरीके से हर प्रश्न का जवाब दिया है। भूषण ने यह सवाल ISIS पोस्टर बॉय के वकील महमूद प्राचा के विरुद्ध की गई पुलिस की रेड पर खड़े किए थे।

पिछले दिसंबर में महमूद प्राचा के दफ्तर और आवास पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा की गई खोजबीन के संबंध में भूषण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। 

इस कॉन्फ्रेंस में भूषण ने न्यायालय के आदेश पर की जा रही इस जाँच को ‘दुर्भावनापूर्ण’ बताया था और दिल्ली पुलिस की मंशा के अलावा जाँच पर भी कई सवाल खड़े किए थे। भूषण का आरोप था कि दिल्ली पुलिस प्राचा के कंप्यूटर की हार्ड डिस्क सीज़ करना चाहती थी और वारंट में इस कार्रवाई की अनुमति नहीं थी। भूषण के मुताबिक़ दिल्ली पुलिस ने महमूद प्राचा को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का नाम लेकर धमकाया भी था।

प्रशांत भूषण के इन कथित आरोपों का जवाब देते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा कि वह आदेश की अनदेखी करके खुद के खिलाफ अदालत की अवमानना के एक और मामले की ज़मीन तैयार रहे हैं। 

प्रशांत भूषण द्वारा जाँच पर लगाए गए आरोप और दिल्ली पुलिस द्वारा दिया गया उन सवालों का जवाब

भूषण के मुताबिक़ पुलिस जिस ईमेल की तलाश कर रही थी, उसे प्राचा ने पहले ही कमिश्नर सहित तमाम अधिकारियों को भेज दिया था। यह खोजबीन प्राचा से जुड़ी निजी जानकारी व प्राचा और उसके क्लाइंट्स के बीच हुई बातचीत की जानकारी लेने के लिए की गई थी, जिसे क़ानूनी आधार पर सुरक्षित रखा गया था। भूषण के इन आरोपों का जवाब देते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा कि इस खोजबीन का उद्देश्य प्राचा के कंप्यूटर में मौजूद तमाम सबूतों को अदालत के सामने पेश करना था, ताकि उस पर लगाए गए आरोपों को साबित किया जा सके। इन ट्वीट्स में तुष्टिकरण से दुःखी लोगों का गुस्सा फूटना जायज है:-
प्रशांत भूषण का एक और बड़ा आरोप, जिसके मुताबिक़ दिल्ली पुलिस प्राचा की निजी जानकारी व प्राचा और उसके क्लाइंट्स के बीच हुई बातचीत की जानकारी लेना चाहती थी। इस पर दिल्ली पुलिस ने कहा कि ऐसी कोई भी बातचीत जो आपराधिक गतिविधि की साज़िश रचने के लिए की गई थी, उसे क़ानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा गया था। चाहे वकील को उस साज़िश की जानकारी हो या नहीं। दिल्ली पुलिस के बयान के मुताबिक़, “क़ानून आपराधिक गतिविधियों का षड्यंत्र रचने या उसमें शामिल होने पर सुरक्षा प्रदान नहीं करता है।” 
प्रशांत भूषण का कहना था कि जाँच अधिकारियों को सीआरपीसी की धारा 91 के तहत प्राचा को समन भेजना चाहिए था, जिससे वह मामले से संबंधित दस्तावेज़ पेश कर सकें। इसका जवाब देते हुए दिल्ली पुलिस ने कहा कि एक आरोपित को अपना पक्ष रखने के लिए कई मौके दिए जाते हैं। 
दिल्ली पुलिस ने कहा, “सच ये है कि ऐसे लोग जो अदालत में रोज़ दाँव पेंच का इस्तेमाल करते हैं, उनके लिए यह स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है कि क़ानून से ऊपर कोई नहीं है। प्राचा ने दिल्ली पुलिस की इस जाँच से बचने के लिए अपने हर संपर्कों का इस्तेमाल किया। जाँच के दौरान सहयोग करने की जगह प्राचा ने जाँच में बाधा डालने का हर सम्भव प्रयास किया और चश्मदीदों को डराने का प्रयास किया। उसने आरोपितों को निर्दोषों के रूप में पेश करने का प्रयास किया और निर्दोषों को गंभीर आरोपों के तहत दोषी साबित करने का प्रयास किया। वह झूठे बयान देकर और झूठे चश्मदीदों को पेश करके न्यायिक प्रक्रिया को भ्रमित करने का भी आरोपित है। एक वकील का काम लोगों को इस बात का सुझाव देना नहीं है कि वह कैसे अपराध करें।” 
सर्च वारंट पर लगाए गए आरोपों के जवाब में दिल्ली पुलिस ने कहा कि यह न्यायालय के लिए प्रशांत भूषण के मन में घृणा है। इसका मतलब साफ़ है कि वह देश की सबसे बड़ी अदालत का ज़रा भी सम्मान नहीं करते हैं। 

महमूद प्राचा के खिलाफ जाँच

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने महमूद प्राचा के दफ्तर में छापेमारी की थी। प्राचा पर फ़र्ज़ी हलफ़नामा बना कर दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों के मासूमों को गलत बयान देने के लिए उकसाने का आरोप है। पुलिस ने उसके पास मौजूद दस्तावेज़ और उसकी लॉ फर्म की आधिकारिक ईमेल के आउटबॉक्स की जाँच की थी। इसके बाद प्राचा को भारतीय दंड संहिता की धारा 182, 193, 420, 468, 471, 472, 473, 120B के तहत गिरफ्तार किया गया था। 
अवलोकन करें:-
छापेमारी के दौरान महमूद प्राचा ने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के साथ बदतमीजी की थी और जाँच रोकने का प्रयास किया था। इसके बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की काउंटर इंटेलिजेंस यूनिट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 186, 353 और 34 के तहत निज़ामुद्दीन पुलिस थाने में एफ़आईआर दर्ज कराई थी।