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वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश का बड़ा बयान : "हर वक्त मोदी को 'खलनायक' की तरह पेश करने से कुछ हासिल नहीं होगा"

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमन्त्री मोदी के शासन का मॉडल 'पूरी तरह नकारात्मक गाथा' नहीं है और उनके काम के महत्व को स्वीकार नहीं करना और हर समय उन्हें खलनायक की तरह पेश करके कुछ हासिल नहीं होने वाला है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बुधवार(अगस्त 21, 2019) को कहा- “यह वक्त है कि हम मोदी के काम और 2014 से 2019 के बीच उन्होंने जो किया उसके महत्व को समझें, जिसके कारण वह सत्ता में लौटे। इसी के कारण 30% मतदाताओं ने उनकी सत्ता में वापसी करवाई।” लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा को 37.4% वोट मिले, जबकि सत्तारूढ़ NDA को कुल मिलाकर 45% वोट हासिल हुए थे।
रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर यह बयान जयराम रमेश ने राजनीतिक विश्लेषक कपिल सतीश कोमीरेड्डी की किताब ‘मालेवॉलेंट रिपब्लिक: ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ द न्यू इंडिया’ का विमोचन करते हुए दिए।
जयराम रमेश ने कहा- “वह (मोदी) ऐसी भाषा में बात करते हैं जो उन्हें लोगों से जोड़ती है। जब तक हम यह न मान लें कि वह ऐसे काम कर रहे हैं, जिन्हें जनता सराह रही है और जो पहले नहीं किए गए, तब तक हम इस व्यक्ति का मुकाबला नहीं कर पाएँगे।”
इसके आगे कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर आप हर समय उन्हें (मोदी को) खलनायक की तरह पेश करने जा रहे हैं, तो आप उनका मुकाबला नहीं कर पाएँगे। UPA के दौरान मनमोहन सिंह सरकार में ग्रामीण विकास और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय संभालने वाले जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि वह किसी से प्रधानमंत्री की सराहना या तारीफ करने के लिए नहीं कह रहे है बल्कि वे चाहते हैं कि राजनीतिक वर्ग कम से कम उन बातों को माने जो वह शासन में लेकर आए खासतौर से ‘शासन के अर्थशास्त्र’ के संदर्भ में।

‘शासन की राजनीति पूरी तरह अलग है’

जयराम रमेश ने कहा- “मैं आपको बता दूँ कि जब शासन के अर्थशास्त्र की बात आती है, तो यह पूरी तरह नकारात्मक गाथा नहीं है, शासन की राजनीति पूरी तरह अलग है। मोदी के शासन मॉडल से जिस प्रकार के सामाजिक संबंध सृजित हुए हैं वे भी पूर्णत: भिन्न हैं।” अपने बयान के तर्क में जयराम रमेश ने मोदी सरकार की कुछ उपलब्धियों, जैसे- प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUJ) का उदाहरण देते हुए बताया कि वह कैसे प्रधानमंत्री मोदी के लिए सफल साबित हुई।

‘हम सबने मोदी की योजनाओं का मजाक उड़ाया, लेकिन ..’


नरेंद्र मोदी की जनता के बीच पकड़ का उदाहरण देते हुए जयराम रमेश ने कहा- “साल 2019 में राजनीतिक विमर्श में हम सभी ने उनकी एक या दो योजनाओं का मजाक उड़ाया लेकिन सभी चुनावी अध्ययनों में यह सामने आया कि पीएमयूजे अकेली ऐसी योजना रही जो उन्हें करोड़ों महिलाओं से जोड़ पाई। इसने उन्हें ऐसा राजनीतिक खिंचाव दिया जो उनके पास 2014 में नहीं था।” उन्होंने कहा कि पिछले दशक में ऐसा कुछ हुआ जिसने मोदी को 2009 के आम चुनाव में राष्ट्रीय राजनीति में एक मामूली नेता से ऐसा व्यक्ति बना दिया, जिसने लगातार चुनाव जीते।
मनमोहन सिंह सरकार में ग्रामीण विकास और पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय संभालने वाले रमेश ने साफ किया कि वह किसी से प्रधानमंत्री की सराहना या तारीफ करने के लिए नहीं कह रहे है बल्कि चाहते हैं कि राजनीतिक वर्ग कम से कम उन बातों को माने जो वह शासन में लेकर आए खासतौर से 'शासन के अर्थशास्त्र' के संदर्भ में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ने कहा, 'मैं आपको बता दूं कि जब शासन के अर्थशास्त्र की बात आती है तो यह पूरी तरह नकारात्मक गाथा नहीं है, शासन की राजनीति पूरी तरह अलग है' उन्होंने यह भी कहा कि उनके शासन मॉडल से जिस प्रकार के सामाजिक संबंध सृजित हुए हैं वे भी पूरी तरह से अलग हैं 
अपनी बात को साबित करने के लिए रमेश ने पीएमयूजे का उदाहरण दिया कि वह कैसे प्रधानमंत्री के लिए सफल साबित हुई कर्नाटक से राज्यसभा सदस्य ने कहा, 'साल 2019 में राजनीतिक विमर्श में हम सभी ने उनकी एक या दो योजनाओं का मजाक उड़ाया लेकिन सभी चुनावी अध्ययनों में यह सामने आया कि पीएमयूजे अकेली ऐसी योजना रही जो उन्हें करोड़ों महिलाओं से जोड़ पायी इसने उन्हें ऐसा राजनीतिक खिंचाव दिया जो उनके पास 2014 में नहीं था
यदि कांग्रेस जयराम रमेश, जनार्दन द्विवेदी आदि बुद्धिजीवियों के परामर्श पर चलती, कांग्रेस की इतनी बुरी दुर्दशा नहीं होती। सोनिया और राहुल गाँधी दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, चिदंबरम और सलमान खुर्शीद जैसे मंदबुद्धि वाले नेताओं पर ही आश्रित रही, जिनका काम केवल सोनिया के हिन्दू विरोधी अभियान को इस्लामिक आतंकवाद को बचाने की खातिर बेकसूर हिन्दू साधु, संत और साध्वियों को जेल में डाल "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम पर हिन्दुओं को कलंकित करने के लिए एक के बाद एक योजना बनाकर देश को भ्रमित कर परिवार से मालपुए खाते रहे। 
दूसरे, राहुल के सलाहकारों ने राहुल से "आलू से सोना" बनाने की बात तो कहलवा दी, लेकिन इस बात को जमीन पर नहीं उतारा, जिस कारण राहुल एक मजाक बनकर रह गए। सलाहकारों को चाहिए था, कि अमेठी या रायबरेली में एक आलू के चिप्स बनाने की फैक्ट्री चालू करवा देते। अमेठी छोड़ वायनाड जाने की जरुरत ही नहीं पड़ती और अमेठी से एक बार फिर स्मृति ईरानी को पराजित कर सकते थे। लेकिन चाटुकारों ने ऐसा नहीं होने दिया। 
कांग्रेस की हिन्दू विरोधी वीडियो देखिए:-   
कांग्रेस की भूमिका पर जयराम रमेश से खास बातचीत

लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत के बाद निकाय चुनाव में भाजपा की हार

क्या लोगों का मन भाजपा के प्रति बदल रहा है या मुद्दे कुछ और हैं?
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
लोकसभा चुनाव में मिले प्रचंड बहुमत के रथ पर सवार भाजपानीत सरकार कर्नाटक के बाद राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में हारी है। लोकसभा चुनाव में अपार बहुमत पाने वाली पार्टी के लिए निःसंदेह यह अप्रत्याशित है कि वह लोकसभा चुनाव के बाद एक महीने से भी कम समय में हुए निकाय चुनावों में हार जाए। लेकिन ऐसा हुआ है। अब सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ है? लोगों का मन क्या इतना जल्दी बदल गया है या फिर मुद्दे कुछ और हैं?
वैसे भी निकाय चुनावों को लोकसभा चुनाव से जोड़ना ही गलत है, क्योकि लोकसभा में वोट पड़ता है नरेन्द्र मोदी के नाम पर, जबकि स्थानीय चुनावों में वोट पड़ता है, उम्मीदवार के जनसम्पर्क पर। दूसरे, लोकसभा चुनाव की लहर स्थानीय चुनावों में नहीं होती, उसका कारण है, कि स्थानीय नेता हकीकत में मोदी-योगी और अमित के कन्धों पर ही बैठकर शेर होते हैं। धरातल पर वही नेता कमर्ठ कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर केवल चापलूसों पर आश्रित रहते हैं, किसी कार्यक्रम की उस चापलूसों के साथ फोटो व्हाट्सअप कर शीर्ष नेतृत्व की आँखों में धुल झोंकने का काम करते हैं। 
स्वतन्त्रता प्राप्ति से आज तक स्थानीय नेताओं से लेकर शीर्ष स्तर तक क्षेत्र, प्रदेश एवं देश की बात करते हैं, लेकिन समस्याओं पर वही ढाक के तीन पात। हर चुनाव में देख लो, वही पुराने-खिसे पिटे मुद्दे, महंगाई से कहीं कोई राहत नहीं, महँगी होती शिक्षा, भ्रष्टाचार पर कोई लगाम नहीं, टूटी सड़कें, लोगों को पीने का पानी नहीं, आर.ओ.का पानी पीने को विवश हैं, जबकि आर.ओ. बिमारियों की जड़ है। मिलावटी खाद्य पदार्थ, ऊपर से आरक्षण की मार, कहाँ तक गिनती गिनी जाए।
जिस तरह चुनावों में लोग दान देते हैं, उसी भांति रिश्वत भी लोग दान समझ कर ही देते हैं। जिस नेता को देखो संस्कृति की बात करता है, परन्तु इतना भी नहीं जानते कि दान किन परस्थितियों और कारणों में दिया जाता है, लेकिन भ्रष्टाचार में आए दान राशि को अपनी कमाई मान लेते हैं। चुनावों में अपनी तिजोरियाँ भर लेते हैं।   
लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने की क्या वजह रही? 
इन बिंदुओ पर कुछ फैक्ट्स रखे जायें इससे पहले लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत की वजह की संभावनाओं पर गौर करना जरूरी हो जाता है। विपक्ष भले ही कई मुद्दों के साथ जनता के बीच गई हो लेकिन वह जनता में अपने मुद्दों के प्रति विश्वास नहीं जगा पाई कि वह जो कह रही है उसे सत्ता में आने पर सही तरीके से अमलीजामा भी पहनाएगी। इसके इतर मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व ने इस लोकसभा चुनाव को व्यक्ति केंद्रित कर दिया था। चुनाव के हद तक व्यक्ति केंद्रित होने से मोदी के सामने ऐसा कोई मजबूत राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं था जिसकी लोकप्रियता आम जनता के बीच मोदी को टक्कर दे सके। लोगों के मुद्दे गौण हो गए। भाजपानीत गठबंधन के लगभग हर उम्मीदवार मोदी के नाम पर ही वोट माँग रहे थे। लोगों के बीच यह संदेश गया कि केंद्र में मज़बूत सरकार होनी चाहिए और मोदी फिलहाल सबसे अच्छे नेता हैं।
भाजपा के लिए ऐसी राजनीति किस नए रूप में फायदेमंद रहा? 

ऐसा मानने की वजह से भाजपा उस सीट पर भी आगे रही जहाँ राजनीतिक जातीय समीकरण उसके पक्ष में नहीं थे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय राजनीति में अब जातिगत वोटों के ध्रुवीकरण के दिन लद जाने की घोषणा कर दी जाए। भाजपानीत गठबंधन के यहाँ भी, ऐसे अधिकतर क्षेत्रों में जाति ही थी लेकिन वह जाति भाजपा गठबंधन की थी। उदाहरण के लिए बिहार के बहुचर्चित सीट मधेपुरा को देखें तो यहाँ के यादव बहुल सीट पर भाजपानीत गठबंधन के तरफ से जेडीयू के दिनेश चंद्र यादव ही महागठबंधन के शरद यादव से जीते। बिहार के ही बहुचर्चित बेगूसराय सीट जो की सवर्ण बहुल सीट है वहां से भाजपा के सवर्ण जाति से आए गिरिराज सिंह ने सवर्ण कन्हैया कुमार को हराकर जीत दर्ज की।
हालाँकि ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ इन स्थापित मान्यताओं से अलग परिणाम आये हैं जैसे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की सीट गुना। सिंधिया वंश की पारंपरिक सीट रही गुना में करीब 3 दशक बाद सिंधिया पैलेस के बाहर का कोई प्रत्याशी जीता है। ठीक ऐसा ही कुछ राहुल गाँधी की पारंपरिक सीट उत्तर-प्रदेश के अमेठी का भी है।
भारतीय राजनीति में क्या वोटों के जातिगत ध्रुवीकरण के दिन गए? 

लेकिन जब उत्तर-प्रदेश में बने महागठबंधन को मिले वोटों को देखते हैं तो यह मजबूती से दिखता है की भारतीय राजनीति में जाति एक बड़ा मजबूत फैक्टर है। उत्तर-प्रदेश में सपा के उम्मीदारों को 2014 के मुकाबले हर सीट पर दो से ढाई लाख वोट ज्यादा मिले हैं। इसी तरह बसपा के उम्मीदवारों को हर सीट पर दो से साढ़े तीन लाख तक ज्यादा वोट मिला है जो इन पार्टियों का अपने जाति का कोर वोट है और आंकड़े इन वोटों का ट्रांसफर होता हुआ भी दिखा रहा है।
बस समस्या ये रही की बीजेपी को मिले वोट परसेंट इनके महागठबंधन को मिले वोट परसेंट से ज्यादा रहे। ऐसी स्थिति में जाति के समीकरण भी काम नहीं करते हैं, जिससे ऐसा लगता है की इस चुनाव में जाति की दीवार टूट सी गयी है। दूसरी तरफ, यह कहा जाता है की सवर्ण वोट बीजेपी का कोर वोट है। इस बात को इस लोकसभा चुनाव में सीएसडीएस का आंकड़ा भी बल देता है। सीएसडीएस का आंकड़ा बताता है की पूरे देश में इस बार 61 फीसदी सवर्ण बीजेपी के साथ गए।

निकाय चुनाव का समीकरण कैसा है? 
निकाय चुनाव का समीकरण कैसा है?अब बात करते हैं निकाय चुनाव की। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कर्नाटक और राजस्थान के निकाय चुनाव में जीत से थोड़ी-बहुत राहत मिली है। कांग्रेस ने इसके लिए जनता का आभार भी जताया है। कर्नाटक निकाय चुनाव में कांग्रेस ने 509 वार्डों में जीत हासिल की है जबकि बीजेपी को सिर्फ 366 में जीत मिली। हालाँकि इस जीत के साथ ही कांग्रेसी नेताओं ने ईवीएम पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। जैसा कि अपने ट्वीट में सलमान खुर्शीद ने कहा है 'फिर से सवाल! कर्नाटक में बैलट पेपर से चुनाव हुए और वहां कांग्रेस की शानदार जीत हुई।'
वहीं राजस्थान में 10 जिलों के स्थानीय निकाय उपचुनाव में 16 वार्डों के लिए चुनाव हुआ था। इस उपचुनाव में भी कांग्रेस ने 16 वार्डों में से 8 सीटों पर जीत हासिल की जबकि राजस्थान की सभी लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा केवल 5 सीटें ही हासिल कर पाई।
क्या लोगों का मन भाजपा के प्रति बदल रहा है या मुद्दे कुछ और हैं? लेकिन सारा कुछ ईवीएम के बहाने ही मढ़ा जाना आंधी की तरफ पीठ कर लेने से इसके गुजर जाने की कल्पना करने जैसा ही होगा। ईवीएम के इतर भी बातें हैं। निकाय चुनावों में स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं इसलिए निकाय चुनाव में लोग अक्सर स्थानीय आधार पर वोट देते हैं। निकाय रिजल्ट यह बता रहा है की जनता अपना वोट क्षेत्रीय चुनाव में क्षेत्रीय मुद्दे और लोकल रिलेशन पर कर रही है जबकि राष्ट्रीय चुनाव में वह राष्ट्रीय मुद्दों पर वोट कर रही है। ऐसा ट्रेंड दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखने को मिला था जिसमें अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने क्लीन स्वीप किया था जबकि उसके पहले हुए लोकसभा चुनाव में इसका सूपड़ा साफ़ हो गया था। ठीक ऐसा ही उदाहरण छत्तीसगढ़ का भी था जब विधानसभा चुनाव में भाजपा हार गयी थी जबकि कुछ समय बाद हुए लोकसभा चुनाव में