Showing posts with label rakesh kumar arya. Show all posts
Showing posts with label rakesh kumar arya. Show all posts

महात्मा गांधी के लिए महाराणा प्रताप और शिवाजी नहीं बल्कि औरंगजेब आदर्श था

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य
लेखक 
डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक ‘उगता भारत’ व राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

06 दिसम्बर 2017 को बीबीसी ने एक लेख ‘औरंगजेब और मुगलों की तारीफ क्यों करते थे- महात्मा गांधी’ – शीर्षक से प्रकाशित किया। इस लेख में बीबीसी ने बताया कि गांधी जी के औरंगजेब और मुगल शासकों के प्रति बहुत ही नेक विचार थे। वह उनके धर्मनिरपेक्ष विचारों के प्रशंसक थे और यह भी मानते थे कि उनके शासनकाल में भारत में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी। लोग सुख -चैन के साथ परस्पर मिलकर रहते थे । कहीं भी कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं था। सर्वत्र शांति थी । 
यही कारण था कि गांधीजी मुगलों या तुर्कों के भारतवर्ष में शासन को विदेशियों का शासन नहीं मानते थे और ना ही उनके शासनकाल को गुलामी का काल मानते थे। गांधीजी उसे ‘स्वराज’ का प्रतीक मानते थे । उनके लिए औरंगजेब बहुत ही आदर्श, सहिष्णु और उदार शासक था , जबकि अंग्रेज उतने उदार नहीं थे। यही कारण था कि वह अंग्रेजों के शासन को भारत की गुलामी का काल मानते थे और मुगलों को इस ‘पाप’ से मुक्त कर देते थे। गांधीजी के ऐसे विचारों को समझ कर स्पष्ट हो जाता है कि उनके ऐसे विचारों की ‘काली छाया’ वर्तमान इतिहास पर भी पड़ी है। जिसने मुगलों का गुणगान और महाराणा प्रताप जैसे राष्ट्रभक्त लोगों की उपेक्षा करने का ‘पाप’ किया है।
1 नवंबर, 1931 की सुबह लंदन के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के पेम्ब्रोक कॉलेज में आयोजित एक कार्यक्रम में गांधीजी का एक भाषण रखा गया था। जिसके बारे में बीबीसी ने अपने उपरोक्त लेख में बताया है कि गांधी के सहयोगी महादेव देसाई के अनुसार इस बैठक में गांधी खुलकर बोल रहे थे। बोलते-बोलते एक स्थान पर उन्होंने कहा, “मैं यह जानता हूँ कि हर ईमानदार अंग्रेज़ भारत को स्वतंत्र देखना चाहता है, लेकिन उनका ऐसा मानना क्या दुःख की बात नहीं है कि ब्रिटिश सेना के वहां से हटते ही दूसरे देश उस पर टूट पड़ेंगे और देश के अंदर आपस में भी भारी मार-काट मच जाएगी ? …आपके बिना हमारा क्या होगा, इसकी इतनी अधिक चिंता आप लोगों को क्यों हो रही है ? आप अंग्रेज़ों के आने से पहले के इतिहास को देखें, उसमें आपको हिंदू-मुस्लिम दंगों के आज से ज्यादा उदाहरण नहीं मिलेंगे. …औरंगज़ेब के शासन-काल में हमें दंगों का कोई हवाला नहीं मिलता।”
इसका अभिप्राय है कि गांधी जी ने मुगलों और तुर्कों के शासनकाल में होने वाले हिंदुओं के सामूहिक नरसंहारों और लोगों के सामूहिक धर्मांतरण को न तो सांप्रदायिक दंगा माना और न ही मुस्लिम शासकों का हिंदुओं पर किसी प्रकार का अत्याचार माना । उन्होंने इस प्रकार का प्रदर्शन किया कि जैसे मुगलों व तुर्कों के शासनकाल में यदि ऐसा होता भी रहा तो वह सब कुछ क्षम्य था।
उसी दिन दोपहर को कैम्ब्रिज में ही ‘इंडियन मजलिस’ की एक सभा में गांधी ने और स्पष्ट रूप से कहा- ‘जब भारत में ब्रिटिश शासन नहीं था, जब वहाँ कोई अंग्रेज़ दिखाई नहीं देता था, तब क्या हिंदू, मुसलमान और सिख आपस में बराबर लड़ ही रहे थे ?
हिंदू और मुसलमान इतिहासकारों द्वारा दिए गए विस्तृत और सप्रमाण विवरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि तब हम अपेक्षाकृत अधिक शांतिपूर्वक रह रहे थे और ग्रामवासी हिंदुओं और मुसलमानों में तो आज भी कोई झगड़ा नहीं है। उन दिनों तो उनके बीच झगड़े का नामो-निशान तक नहीं था।”
स्वर्गीय मौलाना मुहम्मद अली, जो खुद एक हद तक इतिहासकार थे, मुझसे अक्सर कहा करते थे कि “अगर अल्लाह ने मुझे इतनी ज़िंदगी बख्शी तो मेरा इरादा भारत में मुसलमानी हुक़ूमत का इतिहास लिखने का है। उसमें दस्तावेज़ी सबूतों के साथ यह दिखा दूंगा कि अंग्रेज़ों ने गलती की है। औरंगज़ेब उतना बुरा नहीं था जितना बुरा अंग्रेज़ इतिहासकारों ने दिखाया है, मुग़ल हुक़ूमत इतनी खराब नहीं थी जितनी खराब अंग्रेज़ इतिहासकारों ने बताई है।”
गांधी जी ने मुगल काल के इतिहास को इस प्रकार परिभाषित करके स्पष्ट किया कि वह मुगल काल में जितने भर भी अत्याचार हिंदुओं पर होते रहे , उन्हें अत्याचार नहीं मानते। मुगलों और तुर्कों ने भारत की संस्कृति और धर्म को चाहे जितना नष्ट करने का प्रयास किया हो और चाहे जितने धर्मांतरण करके उन्होंने मुस्लिमों की संख्या बढ़ाने का काम भारत में किया हो , वे सब गांधी जी के लिए स्वीकार करने योग्य थे । उन्होंने हिंदू स्त्रियों और मुगलों व तुर्कों के द्वारा किए गए अमानवीय अत्याचारों को भी क्षमा के योग्य माना । इसके अतिरिक्त भारत पर उनके बलात शासन को भी गाँधीजी ने ‘वैध और स्वराज कहकर महिमामंडित किया।

गांधी जी ने अपने उपरोक्त भाषण में यह भी स्पष्ट किया कि भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता या हिंदू मुस्लिम दंगों का इतिहास बहुत अधिक पुराना नहीं है ।”यह झगड़ा तो तब शुरू हुआ जब हम ग़ुलामी की शर्मनाक स्थिति में पड़े।”
गांधी जी ने मुगलों वे टीपू सुल्तान जैसे शासकों के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर हिंदू विरोधी दिखाने के प्रयासों की आलोचना अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ में भी की है । जिसमें उन्होंने तत्कालीन विदेशी इतिहासकारों को इस दुर्भावना के लिए जिम्मेदार ठहराया है।
गांधी जी स्वयं चरखा चलाते थे और इस चरखा चलाने के ढोंग व पाखंड का सच उस समय चाहे लोग न जानते हो पर आज सभी जानते हैं कि वह जिस बकरी का दूध पीते थे वह भी बादाम खाती थी। जिस बापू या ‘महात्मा’ की बकरी भी बादाम खाती हो , उसके लिए आश्रम में वे सारी ‘सुविधाएं उपलब्ध’ रहती थीं या कहिए की सारी सुविधाएं उपलब्ध होने में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं आती थी जो आज के आश्रम वाले ‘ बापुओं’ के लिए उपलब्ध होती हैं। यही कारण था कि उन्होंने ‘महात्मा’ रहकर भी वह सारी सुख सुविधाएं भोगीं , जिन्हें एक साधारण व्यक्ति नहीं भोग पाता । गांधी जी ने औरंगजेब को अपने समरूप मानते हुए उसकी इस बात के लिए प्रशंसा की कि वह भी ‘टोपियां सीकर’ अपना जीवन यापन करता था अर्थात गांधीजी का चरखा चलाना और औरंगजेब का टोपी सीकर गुजारा करना दोनों समान थे । स्वाभाविक है कि यदि इस सब के पीछे गांधी जी का यह आदर्श नायक औरंगजेब भी वही काम करता था जो गांधीजी करते थे तो उसे गांधीजी क्यों बुरा मानते ?
उपरोक्त लेख से हमें पता चलता है कि 21 जुलाई, 1920 को ‘यंग इंडिया’ में लिखे अपने प्रसिद्ध लेख ‘चरखे का संगीत’ में गांधी ने कहा था, “पंडित मालवीयजी ने कहा है कि जब तक भारत की रानी-महारानियां सूत नहीं कातने लगतीं, और राजे-महाराजे करघों पर बैठकर राष्ट्र के लिए कपड़े नहीं बुनने लगते, तब तक उन्हें संतोष नहीं होगा. उन सबके सामने औरंगज़ेब का उदाहरण है, जो अपनी टोपियां खुद ही बनाते थे।”
इसी प्रकार 20 अक्तूबर, 1921 को गुजराती पत्रिका ‘नवजीवन’ में उन्होंने लिखा, “जो धनवान हो वह श्रम न करे, ऐसा विचार तो हमारे मन में आना ही नहीं चाहिए। इस विचार से हम आलसी और दीन हो गए हैं. औरंगज़ेब को काम करने की कोई ज़रूरत नहीं थी, फिर भी वह टोपी सीता था। हम तो दरिद्र हो चुके हैं, इसलिए श्रम करना हमारा दोहरा फर्ज है।”
ठीक यही बात वह 10 नवंबर, 1921 के ‘यंग इंडिया’ में भी लिखते हैं, “दूसरों को मारने का धंधा करके पेट पालने की अपेक्षा चरखा चलाकर पेट भरना हर हालत में ज्यादा मर्दानगी का काम है. औरंगज़ेब टोपियां सीता था , क्या वह कम बहादुर था ?”
टोपी सीकर हिंदुओं पर अत्याचार करने वाला औरंगजेब गांधी जी को ‘बहादुर’ दिखाई देता था।
उड़ीसा के कटक में एक सभा को संबोधित करते हुए गांधी जी ने संकेत किया था कि – ‘अंग्रेज़ों के शासनकाल में भारतीय मानसिक रूप से ग़ुलाम हो गए और उनकी निर्भीकता और रचनात्मकता जाती रही. जबकि मुग़लों के शासन में भारतीयों की स्वतंत्र चेतना और सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर कभी आंच नहीं आई।”
24 मार्च, 1921 को आयोजित इस कार्यक्रम में महात्मा गांधी के शब्द थे, “अंग्रेज़ों से पहले का समय ग़ुलामी का समय नहीं था. मुग़ल शासन में हमें एक तरह का स्वराज्य प्राप्त था. अकबर के समय में प्रताप का पैदा होना संभव था और औरंगज़ेब के समय में शिवाजी फल-फूल सकते थे. लेकिन 150 वर्षों के ब्रिटिश शासन ने क्या एक भी प्रताप और शिवाजी को जन्म दिया है ? कुछ सामंती देशी राजा जरूर हैं, पर सब-के-सब अंग्रेज़ कारिंदे के सामने घुटने टेकते हैं, और अपनी दासता स्वीकार करते हैं।”
ऐसा कहते समय गांधीजी यह भूल गए थे कि महाराणा प्रताप और शिवाजी को समाप्त करने के हर संभव प्रयास उस समय के मुगल शासकों ने किए थे। वह यह भी भूल गए थे कि महाराणा प्रताप और शिवाजी के बनाने में मुगलिया शासन का योगदान नहीं था , बल्कि इन दोनों महान देशभक्तों की देशभक्ति और उनकी शूरवीरता ही इसके लिए उत्तरदायी थी । वे देश की मूल चेतना के प्रतीक थे जो इस बात के लिए कुलबुला रही थी कि देश आजाद हो। इस प्रकार वे उस समय हमारी स्वाधीनता की लड़ाई के नायक थे । गांधीजी में इतना साहस नहीं था कि वे स्वाधीनता के इन महानायकों को इस प्रकार की उपाधि से विभूषित कर पाते। गांधी जी यह भी भूल गए कि महाराणा प्रताप और शिवाजी की इसी क्रांतिकारी सोच व स्वाधीनता प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा की विचारधारा को अर्थात क्रांतिकारी विचारधारा को गांधीजी के समकालीन नेताजी सुभाष चंद्र बोस तथा वीर सावरकर और उनके अन्य साथियों ने यथावत अपनाया हुआ था। जैसे प्रताप और शिवाजी मुगलकाल में भारत की मूल चेतना के प्रतीक बनकर खड़े हुए थे , वैसे ही हमारी इसी मूल चेतना के प्रतीक बनकर हमारे ये क्रांतिकारी अंग्रेजों के काल में मुगलों के काल से भी अधिक तीव्र गति से उठ खड़े हुए थे और अंत में इन्हीं के बलिदान, त्याग व तपस्या के कारण देश स्वतंत्र हुआ था।
जब तक हमारे देश के वर्तमान इतिहास पर गांधी जी के मुगलों व औरंगजेब संबंधी इन विचारों की ‘काली छाया’ पड़ी रहेगी तब तक हमारे महाराणा प्रताप , शिवाजी , सुभाष व सावरकर जैसे अनेकों क्रांतिकारी देशभक्तों के महान कार्यों को उनके विचारों की यह काली छाया दबाए रखेगी। निश्चित रूप से अब समय आ गया है जब हम गांधीजी के इन विचारों की इतिहास पर पड़ने वाली ‘काली छाया’ का पर्दाफाश करें और अपने इतिहास को सही रूप में स्थापित कर वर्तमान पीढ़ी को पढ़ने के लिए प्रस्तुत करें।

डॉ राकेश कुमार आर्य द्वारा लिखित : 'गुर्जर वंश का गौरवशाली इतिहास'- पुस्तक का विमोचन

Image may contain: 1 person, sitting and standing, text that says 'Dr. RAKESH KUMAR ARYA'Image may contain: 1 personImage may contain: 1 personग्रेटर नोएडा। यहां पर एक वेबीनार के माध्यम से इतिहासकार डॉ राकेश कुमार आर्य द्वारा लिखित दो पुस्तकों 'गुर्जर वंश का गौरवशाली इतिहास' और 'भारत के स्वर्णिम इतिहास के कुछ पृष्ठ' - का विमोचन किया गया । उक्त में से प्रथम पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व मंत्री एवं गन्ना विकास संस्थान उत्तर प्रदेश के चेयरमैन श्री नवाब सिंह नागर द्वारा किया गया । जबकि दूसरी पुस्तक का विमोचन 'अपना दल' के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व सुप्रसिद्ध समाजसेवी नेपाल सिंह कसाना द्वारा किया गया। कार्यक्रम में पुस्तकों के लेखक डॉक्टर आर्य द्वारा इतिहास में गुर्जरों के गौरवशाली कालखंड को गुर्जर कालखंड के नाम से स्थापित करने की मांग की गई।पुस्तक के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री नवाब सिंह नागर ने कहा कि इतिहास को तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया जाना लेखक का प्रथम उद्देश्य होता है । जिससे कि हमारी युवा पीढ़ी को इतिहास के सही तथ्यों की जानकारी हो सके। उन्होंने कहा कि श्री आर्य द्वारा इस पुस्तक में तथ्यात्मक आधार पर जो जानकारी दी गई है वह निश्चय ही नई पीढ़ी के लिए उपयोगी होगी । जिससे हमारी युवा पीढ़ी अपने अतीत को समझेगी और उसके गौरवशाली अध्यायों से प्रेरणा लेकर अपने वर्तमान को सुधारकर उज्जवल भविष्य के लिए संघर्ष करेगी। जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री नेपाल सिंह कसाना ने कहा कि श्री डॉ आर्य ने दोनों पुस्तकों के माध्यम से भारत के अतीत पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है । उन्होंने कहा कि लेखक ने गुर्जर वंश के विषय में व्याप्त भ्रांतियों का सफलतापूर्वक निवारण करने का प्रयास किया है। जिससे हूण और कुषाणों के बारे में लोगों को सही जानकारी मिल सकेगी। साथ ही प्रतिहार वंश के शासकों के द्वारा किए गए पुरुषार्थ पूर्ण पराक्रम और देशभक्ति की जानकारी भी इस पुस्तक के माध्यम से प्राप्त होगी ।जिसके लिए डॉक्टर आर्य का यह प्रयास बहुत ही सराहनीय है।पुस्तक के विषय में परिचयात्मक भाषण देते हुए 1857 की क्रांति के अमर शहीद को धनसिंह कोतवाल शोध संस्थान मेरठ के चेयरमैन डॉ तस्वीर चपराना ने अपनी भूमिका में स्पष्ट किया कि लेखक ने गुर्जर वंश के कई विलुप्त अध्यायों को बहुत ही शानदार ढंग से प्रस्तुत किया है । उन्होंने कहा कि नागभट्ट प्रथम नागभट्ट द्वितीय और गुर्जर सम्राट मिहिर भोज जैसे शासकों के समय में जिस प्रकार शुद्धि आंदोलन चलाकर देश की संस्कृति की रक्षा की गई , उसके साथ-साथ अन्य कई ऐसे ही अध्यायों पर लेखक ने महत्वपूर्ण प्रकाश डालकर पुस्तक को उपयोगी बनाने का सराहनीय प्रयास किया है।
कार्यक्रम में अपने प्रकाशकीय संबोधन में डायमंड पॉकेट बुक्स के चेयरमैन श्री नरेंद्र वर्मा ने भी विचार व्यक्त किए। जबकि लेखकीय संबोधन में अपने विचार व्यक्त करते हुए पुस्तकों के लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि हमारे इतिहास का न केवल विकृतिकरण किया गया है बल्कि विलोपीकरण भी किया गया है । जिससे इतिहास के अनेकों सत्य और तथ्य छुपा दिए गए हैं । फलस्वरूप हमारा सारा इतिहास निराशाजनक दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि आज भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता है। जिसके लिए भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।
भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति के राष्ट्रीय संरक्षक श्री देवेंद्र सिंह आर्य ने कहा कि इतिहास का अर्थ मरे गिरे लोगों का विवरण तैयार करना नहीं है, बल्कि अतीत के गौरव को वर्तमान पीढ़ी के सामने गौरवमयी ढंग से प्रस्तुत करना है । जिसके लिए प्रस्तुत पुस्तकों का लेखन कार्य सचमुच प्रशंसनीय है।
कार्यक्रम में समाज शास्त्र के सहायक प्रोफेसर डॉक्टर राकेश राणा और वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी राकेश छोकर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से इस बात पर विस्तृत प्रकाश पड़ता है कि गुर्जर समाज ने राष्ट्र निर्माण में सदा बढ़-चढ़कर योगदान दिया है । कार्यक्रम के संयोजक के रूप में समाजसेवी सत्येंद्र आर्य व सुनील नागर ने भी अपने विचार व्यक्त किये । इस अवसर पर कार्यक्रम का सफल संचालन वरिष्ठ समाजसेवी बिट्टू कसाना जावली द्वारा किया गया।
ज्ञात रहे कि उक्त कार्यक्रम दिन में 5:00 बजे से 6:00 तक संपन्न हुआ जबकि 'पुस्तक समीक्षा' के रूप में वैबीनार के माध्यम से ही दूसरा कार्यक्रम रात्रि 9:00 बजे से 10:00 बजे तक संपन्न हुआ । उक्त कार्यक्रम की अध्यक्षता भी श्री नेपाल सिंह कसाना द्वारा ही की गई । जबकि कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अखिल भारत हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित नंदकिशोर मिश्र और मुख्य वक्ता के रूप में लोनी के युवा विधायक नंदकिशोर गुर्जर रहे।
बाबा पंडित नवल किशोर मिश्र ने कहा कि गुर्जरों का इतिहास बहुत ही गौरव पूर्ण रहा है । उन्होंने कहा कि प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से गुर्जरों के राष्ट्र निर्माण में योगदान पर व्यापक प्रकाश पड़ता है। जिन अध्यायों को कम्युनिस्ट सोच के इतिहासकारों ने जानबूझकर मिटाने का राष्ट्रीय अपराध किया है उन्हें श्री आर्य के द्वारा सफलतापूर्वक स्थापित कर राष्ट्र की बहुत बड़ी सेवा की गई है । जबकि विधायक श्री गुर्जर ने गुर्जरों के गौरवमयी इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनेक युद्धों में गुर्जरों ने विदेशी आक्रमणकारियों का जमकर प्रतिरोध किया । यदि गुर्जर उस समय देश की रक्षा न कर रहे होते तो निश्चय ही भारत बहुत जल्दी गुलाम हो गया होता और फिर कभी भी स्वतंत्र नहीं होता । श्री गुर्जर ने कहा कि इतिहास के साथ की गई छेड़छाड़ एक गंभीर अपराध है । जिसका अब सही स्वरूप हमारे सामने लाया जाना आवश्यक है । श्री गुर्जर ने कहा कि डॉ राकेश कुमार आर्य द्वारा किया गया कार्य निश्चय ही एक मील का पत्थर साबित होगा।
इस सत्र में इतिहासकार डॉ सुशील भाटी ने गुर्जर वंश के हूण , कुषाण और प्रतिहार वंश के शासकों के महान कार्यों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रस्तुत पुस्तक जिस प्रकार लिखी गई है उससे इतिहास के एक लंबे कालखंड का यथार्थ स्वरूप हमारे सामने प्रकट हो सका है , जिसके लिए डॉक्टर आर्य धन्यवाद के पात्र हैं।