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26 जनवरी पर ‘मोदी के तिरंगे’ को ब्लॉक करो; ‘लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहराने पर 7.40 करोड़ रूपए का इनाम’

                                                                                                                        प्रतीकात्मक तस्वीर
देश भर में 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाएगा और उससे पहले एक बार फिर भारत विरोधी ताकतों ने साजिश शुरू कर दी है। खालिस्तान समर्थक ग्रुप (Khalistani Supporters) सिख फॉर जस्टिस (SFJ) की ओर से नई धमकी दी गई है कि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर तिरंगे की जगह खालिस्तानी झंडा फहराया जाएगा। यह ऐलान SFJ प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नू द्वारा किया गया है। फेसबुक पर गुरपतवंत सिंह पन्नू द्वारा साझा किए गए एक नए प्रोपेगेंडा वीडियो में, प्रतिबंधित संगठन ने गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में भारतीय तिरंगे के बजाय खालिस्तानी झंडा फहराने वाले शख्स को ‘इनाम’ के रूप में $1 मिलियन डॉलर (7.39 करोड़ रुपए) देने की घोषणा की है।
                                                                                                               फोटो साभार: सोशल मीडिया

वीडियो में पन्नू को यह कहते हुए सुना गया, “यह सिखों और हिंद की बात है। इस बार दिल्ली में कहीं भी तिरंगा नहीं फहराने दिया जाएगा। खालिस्तानी जनमत संग्रह के जरिए पंजाब को भारतीय कब्जे से मुक्त कराने का अभियान 2022 के विधानसभा चुनावों के बराबर जारी रहेगा।” वह वीडियो में भारतीय झंडे भी जलाते नजर आए।

                                                                                                            फोटो साभार: सोशल मीडिया

इसको लेकर खालिस्तानी ग्रुप सिख फॉर जस्टिस वीडियो कैंपने समेत सोशल मीडिया पर प्रचार अभियान चला रहा है। इसलिए सिख फॉर जस्टिस की तरफ से एक पोस्टर भी जारी किया गया है, जिसमें पीएम मोदी की तस्वीर भी है। उस पर लिखा गया है कि 26 जनवरी को पीएम मोदी के तिरंगे को ब्लॉक करके खालिस्तानी झंडा फहराया जाएगा। इसमें किसानों की मौत को लेकर भी धमकी दी गई है। पन्नू की ताजा धमकी के बाद तमाम सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट मोड में हैं। साथ ही 26 जनवरी की वजह से राजधानी दिल्ली में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

भारत में सिखों को भड़काने का ऐसा ही प्रयास पिछले साल भी किया गया था। उउस समय SJ ने गणतंत्र दिवस पर इंडिया गेट पर खालिस्तान झंडा फहराने के लिए $2.5 लाख के नकद इनाम की घोषणा की थी। 

हाल ही में ‘सिख फॉर जस्टिस’ ने पंजाब के बठिंडा फ्लाईओवर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काफिला रोके जाने की जिम्मेदारी ली थी। साथ ही इस संगठन ने फोन कॉल कर के सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को धमकाया भी था। संगठन ने अधिवक्ताओं को धमकी देते हुए कहा था कि इस मामले को वो सुप्रीम कोर्ट में न लड़ें। उसने दावा किया कि हुसैनवाला फ्लाईओवर पर 5 जनवरी, 2022 को उसने ही पीएम मोदी के काफिले को 20 मिनट तक रोका था। 

‘किसान यूनियन के नेता लाल किले पर मौजूद थे, जिनके चेहरे ढके थे’: दीप सिद्धू

दिल्ली पुलिस ने गणतंत्र दिवस के दंगों के मुख्य अभियुक्तों के बारे में जानकारी देने वालों के लिए इनाम की घोषणा की है, जिसमें अभिनेता से कार्यकर्ता बना खालिस्तानी समर्थक दीप सिद्धू भी शामिल है। वहीं दूसरी तरफ, सिद्धू ने अपने फेसबुक पेज पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए एक और वीडियो जारी किया है। सिद्धू ने आरोप लगाया कि किसान यूनियन के नेता लाल किले में मौजूद थे, जो उन नेताओं के द्वारा किए गए दावों के विपरीत है।

उसने कहा कि उसके पास उन नेताओं के वीडियो सबूत हैं जो लाल किले में मौजूद थे और उनके चेहरे ढके हुए थे। सिद्धू ने आगे आरोप लगाया कि उन नेताओं ने स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की, जिसके बाद उसे कदम उठाना पड़ा। उसने दावा किया कि अगर वह उत्तेजित प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित नहीं करता, तो चीजें हाथ से निकल जातीं, लेकिन अब हर कोई उन्हें बलि का बकरा बना रहा है और कह रहा है कि उन्होंने लोगों को लाल किले की ओर बढ़ने के लिए उकसाया।

अब चर्चा यह भी है कि जब उन्हें 26 जनवरी घटना की जानकारी है, फिर पुलिस से साझा करने की बजाए क्यों छुपे हुए हो, निर्दोष हो तो सामने क्यों नहीं आते?

दो फरवरी को उसके द्वारा जारी किए गए पहले दो वीडियो में, दीप सिद्धू ने अंग्रेजी में बात की। उसने कहा कि वह सितंबर में विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ था और उस समय कांग्रेस, AAP और BJP सहित सभी राजनीतिक दलों ने उससे संपर्क किया था, लेकिन उसने किसी भी संबद्धता से इनकार किया।

दीप सिद्धू ने कहा कि कांग्रेस ने उसका वीडियो अपलोड किया था जो नवंबर में वायरल हो गया था, लेकिन बाद में बरखा दत्त के साथ उनके साक्षात्कार के बाद उन पर हुए अटैक के कारण इसे हटा दिया गया। सिद्धू ने अप्रत्यक्ष रूप से यह कहते हुए खालिस्तानियों के प्रति अपने झुकाव को सही ठहराने की कोशिश की कि एक लोकतांत्रिक देश में लोगों को दोनों पक्षों को सुनना चाहिए।

मुझे बलि का बकरा बनाया गया 

दीप सिद्धू ने कहा कि हालाँकि उसने लाल किले की स्थिति को नियंत्रित कर लिया था और घटना के समय वह एकमात्र ज्ञात चेहरा था, लेकिन उसे यूनियन नेताओं, विपक्षी दलों और सरकार सहित सभी ने बलि का बकरा बना दिया। उसने आगे आरोप लगाया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने लाल किले की ओर मार्च के लिए किसी को उकसाया।

सिद्धू ने दावा किया कि उसके पास यह दिखाने के लिए सबूत है कि वह सुबह 9 बजे मार्च में शामिल हुआ था, इससे पहले नहीं, जैसा कि सभी लोग बोल रहे हैं। जब उसने शुरू किया, तब तक लोग लाल किले तक पहुँच चुके थे। सिद्धू ने कहा कि वकील होने और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने के बावजूद मुकुल रोहतगी और हरीश साल्वे जैसे प्रसिद्ध वकीलों के साथ उन्हें अपने खिलाफ दर्ज मामलों के कारण पुलिस से भागना पड़ा है।

यूनियन नेता कर रहे छवि ख़राब 

दूसरे वीडियो में, सिद्धू ने दावा किया कि यूनियन के नेता अपने ‘आईटी सेल’ का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि उनकी गलत छवि को दिखाया जा सके। उसने कहा कि जब भी वह अपने पक्ष की बात रखना चाहता है तो आईटी सेल सक्रिय हो जाता है और उनकी बातों को दबा दिया जाता है। उसने कहा कि वह हरियाणा में विरोध स्थल के करीब रह रहा है और कभी भी वहाँ पहुँच सकता है। उसने किसान नेताओं को चुनौती दी कि वे उनके साथ इस बारे में चर्चा करें कि वे किस तरह से आंदोलन को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं।

वीडियो का एक हिस्सा है, जहाँ उसने अपनी पूँछ पर आग के साथ भगवान हनुमान के साथ अपनी तुलना करने की कोशिश की, लेकिन वीडियो का वह हिस्सा एडिट किया गया था, और इसमें केवल जलती हुई पूँछ और ‘हनु’ नाम का संदर्भ शामिल है जिसके बाद वीडियो ट्रिम कर दिया गया था।

दीप सिद्धू ने गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा पर लीपापोती करने की कोशिश की। उसने दावा किया कि जब वह लाल किले की ओर बढ़ रहा था, तब सड़क पर कोई हिंसा नहीं हुई थी। उसने आरोप लगाया कि हिंसा के नाम पर मीडिया जो कुछ भी दिखा रहा है वह केवल छोटी-मोटी घटनाएँ हैं। उसने पुलिस कर्मियों पर किसी भी हमले को पूरी तरह से इनकार किया, जिसमें सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हो गए। जिन पर दंगाइयों ने तलवारों, डंडों और ट्रैक्टरों से हमला किया था।

मै नाराज हूँ रवीश कुमार से 

NDTV का, विशेष रूप से पत्रकार रवीश कुमार का नाम लेते हुए, सिद्धू ने कहा कि उसने सोचा था कि रवीश एक समझदार पत्रकार हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने उसे अपने शो में पेश किया, वह निराशाजनक था। उन्होंने सिर्फ इसलिए कहा क्योंकि रवीश अपने प्राइम टाइम शो में उनके नाम का इस्तेमाल करना चाहते थे, उन्होंने सिद्धू से बात करने और कहानी का अपना पक्ष जानने की कोशिश नहीं की। उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्होंने बरखा दत्त के साथ साक्षात्कार के बाद मीडिया को साक्षात्कार देना बंद कर दिया, क्योंकि वहाँ उसे गलत तरीके से दिखाया गया था।

मै साबित कर सकता हूँ किसने उकसाया 

3 फरवरी को जारी किए गए दूसरे वीडियो में सिद्धू ने दावा किया कि उसके पास इस बात का सबूत है कि प्रदर्शनकारियों को किसने उकसाया था। उसने कहा कि वह जल्द ही अपने सभी वीडियो पब्लिश करेगा, जिसमें 26 जनवरी को सुबह 4 बजे रिकॉर्ड किए गए वीडियो भी शामिल हैं। उसने दावा किया कि उसने केवल एक-दूसरे का समर्थन करने की बात की, और संगठन के नेता उकसाने लगे थे। उसने आगे कहा कि लोग चाहे वे दिल्ली से कितने भी दूर हों, गाँवों और शहरों से विरोध प्रदर्शन में शामिल हों।

लाल किला पर निशान साहेब पर कुछ गलत नहीं 

सिद्धू ने दावा किया कि लाल किला देश में सभी का है, और खाली पोल पर निशान साहब को फहराने में कोई बुराई नहीं है। हालाँकि, सिद्धू ने अपने वीडियो में यह उल्लेख नहीं किया कि खाली पोल हर 15 अगस्त को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए रिजर्व है। सिद्धू यह स्वीकार करने में भी असफल रहा कि धार्मिक ध्वज फहराने के लिए पोल के शीर्ष पर गए व्यक्ति द्वारा राष्ट्रीय ध्वज कैसे फेंका गया। वह आगे यह स्वीकार करने में असफल रहा कि सिख पवित्र चिन्ह वाले दो झंडे, एक त्रिकोणीय और दूसरा आयताकार झंडा लाल किले के गुंबद पर फहराया गया था।

दिल्ली पुलिस : दीप सिद्धू के नाम पर रखा 1 लाख रूपए का इनाम

गणतंत्र दिवस पर प्रदर्शनकारी किसानों द्वारा आयोजित ट्रैक्टर परेड के दौरान जमकर बवाल किया गया। उपद्रवियों ने जमकर तोड़फोड़ की और लाल किले (Red Fort) पर अपना झंडा तक फहरा दिया था। दिल्ली पुलिस अब उपद्रवियों पर शिकंजा कसने के लिए पूरी तरह से तैयार है। उपद्रव करने वाले 12 लोगों की तस्वीरें जारी की गई हैं और 8 आरोपितों पर इनाम घोषित कर दिया गया है। और अब तक गिरफ्तार आरोपियों को बचाने के लिए पंजाब की कांग्रेस सरकार किस आधार पर वकीलों की फ़ौज खड़ी कर रहे हैं, क्या यह कांग्रेस का दोगलापन नहीं ?

कांग्रेस के इशारे पर नाचने वालों को इन बिंदुओं पर विचार करना होगा:-

1. महात्मा गाँधी के वध के बाद चितपावन ब्राह्मणों का नर संहार किसके राज में हुआ था? जो स्वतन्त्र भारत का सबसे भयंकर नरसंहार था। 

2. गौ-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून से पार्लियामेंट स्ट्रीट किसके राज में लाल हुई थी?

3. किस पार्टी के राज में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलन को किसने कुचला था?

4. चली 300 गोलियों से 29 किसान किस पार्टी के राज में मरे थे?

5. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या उपरांत सिख नरसंहार किस पार्टी के राज में हुआ था?

6. इस्लामिक आतंकवादियों को संरक्षण देने "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम पर निर्दोष साधु/संत और साध्वियों को जेलों में डाल हिन्दुओं को किसके राज में बदनाम किया जा रहा था?

7. नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में सड़क पर आने का आव्हान किसने किया था?

8. आपातकाल में विपक्षियों को जेलों में किसके राज में डाला गया था?

9. आपातकाल में सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों को वार्षिक इन्क्रीमेंट एवं पदों उन्नत्ति के लिए नसबंदी केस लाने के लिए किस पार्टी के राज में किया गया था? आदि हज़ारों प्रश्न हैं, जिन पर मंथन करना अत्यंत जरुरी है, हर बात के लिए मोदी विरोध उचित नहीं। जनहितों में जिन मुद्दों पर विरोध करना चाहिए, उसमें से एक भी मुद्दे पर किसी में सड़क पर आने का साहस नहीं। क्योकि उस लूट में देश की समस्त पार्टियां शामिल है। इतना ही नहीं, जनता में भी उन मुद्दों पर प्रश्न करने का साहस नहीं।  

इन 8 लोगों की तलाश 

दिल्ली पुलिस गणतंत्र दिवस पर उपद्रव करने वालों की सरगर्मी से तलाश कर रही है। पुलिस ने 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा के 8 आरोपितों पर इनाम घोषित किया है। दीप सिद्धू समेत 4 आरोपितों पर 1-1 लाख रुपए का इनाम और 4 अन्य आरोपितों पर 50-50 हजार रुपए का इनाम घोषित किया गया है। जानकारी के मुताबिक दीप सिद्धू, जुगराज सिंह, गुरजोत सिंह और गुरजंत सिंह पर 1-1 लाख रुपए का इनाम घोषित किया गया है। जजबीर सिंह, बूटा सिंह, सुखदेव सिंह और इकबाल सिंह पर 50-50 हजार रुपए इनाम का ऐलान किया है।

एसआईटी की कर रही है जाँच 

दिल्ली पुलिस ने उपद्रव में शामिल कई आरोपितों की भी पहचान कर उन पर इनाम की घोषणा की है। जाँच के दौरान दिल्ली पुलिस के पास करीब 5 हजार वीडियो आ चुके हैं। जिनमें से पुलिस उपद्रवियों की पहचान कर रही है। दिल्ली दंगों को लेकर अब तक पुलिस 44 एफआईआर दर्ज कर चुकी है, वहीं 122 लोगो की गिरफ्तारी हुई है। हालाँकि, दिल्ली में हुए इस उपद्रव को लेकर अभी भी किसी मुख्य आरोपित की गिरफ्तारी नही हो पाई है। दिल्ली में हुई इस हिंसा की जाँच क्राइम ब्रांच भी कर रही है।

 इधर केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शन के बीच नई दिल्ली की सीमाओं पर कड़ी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर कई स्तरों पर बैरिकेड लगाए हैं और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती की गई है। इसे लेकर पुलिस से कई प्रकार के सवाल भी पूछे जा रहे हैं।

मंगलवार (फरवरी 02, 2021) को पत्रकारों को संबोधित करते हुए, दिल्ली के पुलिस आयुक्त एसएन श्रीवास्तव ने कहा कि वह ये देखकर आश्चर्यचकित हैं कि 26 जनवरी के दिन जब पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया और प्रदर्शनकारियों द्वारा बैरिकेड्स तोड़कर हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया गया, उन पर कम सवाल उठाए गए। 

दिल्ली हिंसा पर पुलिस की रिपोर्ट मानने से किया इनकार, तलवार से हमले को बताया ‘आत्मरक्षा’ : सौरभ भारद्वाज, आप नेता

आम आदमी पार्टी के गठन से ही इसके ऊपर आरोपों की भरमार चल रही है, लेकिन मुफ्त की रेवड़ियां के लालच में दिल्लीवासियों ने दिल्ली की सत्ता इस पार्टी के हाथ में थमा दी। 

जेएनयू में टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ, दिल्ली में हुई हिन्दू विरोधी दंगाइयों के साथ और अब गणतंत्र दिवस पर दंगाइयों के साथ खड़े होकर केजरीवाल पार्टी ने फिर सिद्ध कर दिया है कि इसे जनहित की बजाए हुड़दंगों के साथ खड़ी है। 
26 जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा पर आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता सौरभ भारद्वाज ने पुलिस वर्जन को मानने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा, “मैं पुलिस के वर्जन को नहीं मानूँगा। मैं सिर्फ इसलिए भरोसा नहीं कर लूँगा कि पुलिस कह रही है तो सही कह रही है। पुलिस का वर्जन सरकारी वर्जन होता है। जो सरकार कहेगी वो पुलिस करेगी।”

इतना ही नहीं, सौरभ भारद्वाज ने उस शख्स का भी समर्थन किया, जिसने अलीपुर SHO प्रदीप पालीवाल पर तलवार से हमला किया था। उनका कहना था कि उस शख्स ने आत्मरक्षा के लिए SHO पर हमला किया था। अलीपुर SHO पर तलवार से हमला किए जाने के बारे में सवाल पूछने पर उन्होंने कहा, “जहाँ तक मुझे पता चला है, किसानों के ऊपर हमले किए, पुलिस की मौजूदगी में हमले हुए। पुलिस ने घेर-घेर कर निहत्थे किसानों को पीटा। ऐसी बहुत वारदातें हैं और इन वारदातों में हो सकता है कि एक वारदात ऐसा भी हुआ हो कि किसी को 15 लोग घेर कर मार रहे हों तो उसने ‘आत्मरक्षा’ के लिए कुछ किया हो। पूरी की पूरी वीडियो देखी जानी चाहिए और उसके बाद ही फैसला करना चाहिए।”

अलीपुर SHO पर हमला किए जाने के मामले में पुलिस ने शुक्रवार (जनवरी 29, 2021) को 44 उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है। ट्रैक्टर रैली के दौरान भड़की हिंसा को लेकर दिल्ली के पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने कहा कि शांतिपूर्ण रैली की शर्त थी, लेकिन किसानों ने तय रूट की अनदेखी की। उन्होंने कहा कि जो हिंसा हुई, वह नियम और कानूनों की अनदेखी करने के कारण हुई। उन्होंने प्रेस को सम्बोधित करते हुए कहा कि कई पुलिसकर्मी जख्मी हुए लेकिन उन्होंने संयम बरते रखा।

ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा में तीन सौ से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए। ये पुलिसकर्मी लाल किला, आईटीओ और नांगलोई समेत बाकी जगह पर हुई हिंसा के दौरान घायल हुए। इनमें से कुछ घायल पुलिसकर्मियों ने घटना का आँखों देखा मंजर बयान किया।

हिंसा के दौरान गंभीर रूप से घायल हुए उत्तरी दिल्ली के वजीराबाद थाने के एसएचओ पीसी यादव ने आपबीती सुनाते हुए बताया, “हम लाल किले में तैनात थे जब कई लोग वहाँ घुस गए। हमने उन्हें लाल किले की दीवार से हटाने की कोशिश की, लेकिन वे आक्रामक हो गए। हम किसानों के खिलाफ बल प्रयोग नहीं करना चाहते थे, इसलिए हमने यथासंभव संयम बरता।”

वहीं डीसीपी नॉर्थ, दिल्ली के ऑपरेटर संदीप ने बताया, “कई हिंसक लोग अचानक लाल किला पहुँच गए। नशे में धुत किसान या वे जो भी थे, उन्होंने हम पर अचानक तलवार, लाठी-डंडों और अन्य हथियारों से हमला कर दिया। स्थिति बिगड़ रही थी और हिंसक भीड़ को नियंत्रित करना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो रहा था।” 

तथाकथित किसानों का आतंक : खालिस्तान जिंदाबाद कहते हुए तिरंगा जलाया

किसानों के नाम पर हुए हुड़दंग को कौन नहीं जानता था, सभी अच्छी तरह परिचित थे कि मोदी विरोधी कभी तीन तलाक, नागरिकता संशोधक कानून तो कभी किसानों के नाम पर हुड़दंग कर जनता को गुमराह कर रहे हैं, लेकिन जनहित में असली मुद्दों को नज़रअंदाज़ करते हैं, क्योकि जनप्रतिनिधि बन उस लूट में ये सभी भागीदार हैं। 

जिस तरह संसद कैंटीन की वर्षों से चल रही सब्सिडी समाप्त हुई है, अगर उसी तरह जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली मोटी पेंशन बंद हो गयी, सरकारी खजाने में धन की कमी नहीं होने पाएगी, फिर जिस दिन इन जनसेवकों ने इनकम टैक्स रिटर्न भर आयकर देना शुरू कर दिया, खजाना खाली नहीं होने पायेगा। एक ही वर्ष में सरकारी खजाने में हज़ारों करोड़ धन की प्राप्ति होने महंगाई पर भी बहुत फर्क पड़ेगा। जिस दिन जिस पार्टी ने इन मुद्दों को उजागर कर जनता से वोट मांगेगी, उनका विरोधी भी उन्हें वोट देने में संकोच नहीं करेगा। जनता को नहीं मालूम कि निगम पार्षद से लेकर एक सांसद पर प्रति माह मुफ्त में करोड़ों खर्च हो रहे हैं। है किसी भी पार्टी में हिम्मत इन मुद्दों पर धरना अथवा प्रदर्शन करने की?  
26 जनवरी को तथाकथित किसानों की ओर से हुए हिंसक ट्रैक्टर रैली प्रदर्शन की कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। जहाँ एक तरफ कल पुलिसकर्मियों के साथ किसानों की बर्बरता देखने को मिली। वहीं अब इंटरनेट पर एक बीमार बुजुर्ग के साथ तथाकथित प्रदर्शनकारियों द्वारा की गई बदसुलूकी की वीडियो भी सामने आई है, जिसको देखकर आपके भी रूह काँप जाएँगे।

रिपब्लिक के पत्रकार रवि मिश्रा ने आज (27 जनवरी, 2021) ट्विटर पर एक बुजुर्ग व्यक्ति की वीडियो शेयर की है। जो रो-रो कर किसानों के सामने अपनी व्यथा बता रहा है। हालाँकि, किसान उसकी बातों से पसीज नहीं रहे बल्कि उसके आँसू को एक प्रोपेगैंडा बता रहे है।

यूजर ने बताया कि यह वीडियो यूपी गेट का है। जहाँ पर स्थानीय लोग किसान प्रदर्शन से परेशान हो गए हैं। वहीं एक बुजुर्ग अपनी गाड़ी छोड़ सड़क पर बैठ कर रोने को मजबूर हो गए। वीडियो में बुजुर्ग आदमी सड़क पर बैठे हैं और वहाँ से उठते हुए कहते हैं, “ये बोलते है आगे जाओगे तो मारूँगा। अरे क्या गुनाह किया है? हम यहाँ से निकले नहीं? ये हमारे रास्ते में आ गए।”

वहीं बूढ़े व्यक्ति की बात सुनकर प्रदर्शन में मौजूद एक व्यक्ति कहता है, “मत सुनो, सब ऐसे ही लोग है जो हमें बदनाम करने वाले है।” उसकी बातों को सुन बुजुर्ग व्यक्ति कहता है, “अरे बदनाम करने वालों मैं तो मरने वाला हूँ।”

इसके बाद बुजुर्ग व्यक्ति बताता है कि, आगे आने पर ये लोग बोलते है कि मारूँगा। भगा दिया इन्होंने। ये टोपीधारी था। मैं बीमार आदमी हूँ। मैं तो बस डॉक्टर को दिखाने जा रहा हूँ। हार्ट पेशेंट हूँ। मैं तो पंत हॉस्पिटल जा रहा था। ये लोग गाड़ी के सामने आ गए जैसे कोई झगड़ा करने आए हो। क्या कसूर है हमारा। हम निकल नहीं सकते? सड़क किसी के बाप की है?

वहीं सोशल मीडिया पर एक और वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें कुछ लोग भारतीय तिरंगे को जलाते हुए देखे जा सकते हैं। वीडियो में पीछे अमेरिका का झंडा है। उक्त व्यक्ति खालिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए तिरंगे का अपमान कर रहे है। साथ ही पंजाब रेफरेंडम 2020 जिंदाबाद, दिल्ली बनेगा खालिस्तान नारे भी लगा रहे है।

हालाँकि यह दोनों वायरल वीडियो कब की है, यह फिलहाल नहीं पता लग पाया है।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली में हुई हिंसा के बाद एक्शन मोड में आई दिल्ली पुलिस ने 37 नेताओं पर एफआईआर दर्ज की है। इनमें राकेश टिकैत, डाॅ दर्शनपाल, जोगिंदर सिंह, बूटा, बलवीर सिंह राजेवाल और राजेंद्र सिंह के नाम शामिल हैं। समयपुर बादली में दर्ज एफआईआर नंबर 39 में नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर और स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव का नाम भी शामिल है। इससे पहले पुलिस ने इस संबंध में डकैती, लूट आपराधिक साजिश की कई धाराओं में केस दर्ज किया था। पूरे मामले पर क्राइम ब्रांच द्वारा जाँच की जाएगी।

पुलिस का कहना है कि 300 से ज्यादा पुलिसकर्मी हिंसा में घायल हुए। अधिकांश को आईटीओ और लाल किले पर दंगों में चोट आई। अब पुलिस इन किसान नेताओं को पूछताछ के लिए समन भेजेगी। सुप्रीम कोर्ट में भी इस संबंध में याचिका दर्ज हुई है। इसमें हिंसा की जाँच और घटना के लिए जिम्मेदार प्रत्येक व्यक्ति व संगठन के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग है।

26 जनवरी परेड वाले मंदिर ‘केदारनाथ’ और ‘राम मंदिर’ पर किसान दंगाइयों का आतंक, गुंबद तोड़ा

दंगाइयों ने राम मंदिर की झाँकी को भी नहीं छोड़ा
राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस के मौके पर ‘किसान’ दंगाइयों ने तिरंगा के अपमान के साथ ही राम मंदिर और केदारनाथ मंदिर को निशाना बनाते हुए राम मंदिर की झाँकी के कुछ हिस्सों को तोड़ दिया। दंगाइयों ने अयोध्या श्रीराम मंदिर की झाँकी के लिए बनाए गए राम मंदिर के गुम्बद को निशाना बनाकर उसे तोड़ डाला। ये दोनों झाँकी कल गणतंत्र दिवस की परेड में दिखाई गई थीं।

समाचार चैनल ‘आज तक’ की एक रिपोर्ट में एक व्यक्ति इस बात की जानकारी दे रहा है। विकास का कहना है कि कल राम मंदिर की झाँकी एकदम सही हालत में यहाँ पर मौजूद थी, लेकिन दंगाइयों ने सुरक्षाकर्मियों के सामने ही केदारनाथ मंदिर की झाँकी को निशाना बनाया और राम मंदिर की प्रतिमा के ऊपर के गुंबद को तोड़ दिया। विकास ने कहा कि सुरक्षाकर्मियों ने किसी तरह से मंदिर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त होने से बचाया।

वहीं, गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में हुई हिंसा में एक्शन लेते हुए दिल्ली पुलिस ने करीब 200 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया है। इन पर हिंसा करने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और पुलिसकर्मियों पर हमला करने का आरोप लगा है।

मंगलवार को हुए इन ‘किसान दंगों’ में अब तक कुल 22 FIR दर्ज की जा चुकी हैं। पुलिस ने कहा कि वे सत्यापन करने के बाद गिरफ्तारी कर रहे हैं। दंगों में 230 से ज्यादा लोगों के घायल होने की खबर है।

राष्ट्रीय राजधानी में लाल किले और किसान विरोध स्थलों पर कई स्थानों पर सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। मंगलवार के दिन ट्रैक्टर परेड के लिए निर्धारित मार्ग से दूर, सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने सीमाओं पर बैरिकेड्स को तोड़ दिया और पुलिस के साथ भिड़ गए। उन्होंने कई जगहों से दिल्ली में प्रवेश किया और गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर धावा बोलते हुए तिरंगे का भी अपमान किया।

गणतंत्र दिवस की सुबह से ही किसानों का प्रदर्शन उग्र होता गया। इस बीच, दिल्ली के DDU मार्ग पर एक व्यक्ति की ट्रैक्टर पलटने के कारण मौत हो गई। आईटीओ के पास पूरे चौक पर सैकड़ों की संख्या में किसान ट्रैक्टर लेकर खड़े रहे। जिसे लेकर समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक और फेक न्यूज़ फैला दी और पोल खुलने पर अपना ट्वीट चुपके से डिलीट भी कर दिया।

‘वंदे मातरम’ से होगा गणतंत्र दिवस का समापन


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
गणतंत्र दिवस के अवसर पर होने वाले तीन दिवसीय समारोह के अंतिम दिन विजय चौक पर आयोजित होती आई बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी में बदलाव की खबर है। बताया जा रहा है कि अब बीटिंग रिट्रीट समारोह ‘वंदे मातरम’ की धुन के साथ समाप्त होगा। बता दें इससे पहले तक समारोह का समापन महात्मा गाँधी के पसंदीदा ईसाई गीत ‘एबाइड विद मी’ के साथ होता रहा है जिसे स्कॉटिश हेनरी फ्रांसिस लाइट ने लिखा था।
डेक्कन हेरॉल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने बताया है कि वे केवल इस समारोह में नई धुनों को शामिल कर रहे हैं। जो कि एक सामान्य बदलाव है। लेकिन कुछ मीडिया रिपोर्ट का कहना है कि इस बदलाव से स्वदेशी और देशभक्ति की भावना बलवती होगी।
क्या होता है Beating Retreat में?
बीटिंग रिट्रीट का आयोजन राजधानी दिल्ली में रायसीना हिल स्थित विजय चौक पर मिलिट्री बैंड द्वारा गणतंत्र दिवस समारोह के तीसरे दिन 29 जनवरी की शाम को आयोजित किया जाता है। यह 26 जनवरी को शुरू हुए समारोह के समाप्‍त होने का सूचक है। इस दौरान थलसेना, वायुसेना और नौसेना के बैंड सैन्य-धुन बजाते हैं। समारोह के दौरान प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, रक्षा मंत्री और तीनों सेनाओं के प्रमुखों सहित देश-विदेश के गणमान्य अतिथि मौजूद रहते हैं। लेकिन इस बार चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ यानि सीडीएस भी मौजूद रहेंगे।
कहाँ से आयी यह परम्परा?
बीटिंग रिट्रीट की परंपरा इंग्लैंड से आई है। इसका असल नाम “वॉच सेटिंग” है और सूरज डूबने के समय यह समारोह होता है। 18 जून 1690 में इंग्‍लैंड के राजा जेम्‍स टू ने अपनी सेनाओं को उनके ट्रूप्‍स के वापस आने पर ड्रम बजाने का आदेश दिया था। सन 1694 में विलियम थर्ड ने रेजीमेंट के कैप्‍टन को ट्रूप्‍स के वापस आने पर गलियों में ड्रम बजाकर उनका स्‍वागत करने का नया आदेश जारी किया था।
 बीटिंग रिट्रीट समारोह प्राचीन काल से चली आ रही उस परंपरा का हिस्सा है जब युद्ध के मैदान में सेनाएँ दिन ढलने के बाद सैन्य-धुन पर अपने-अपने बैरक में लौट जाती थी। इसलिए गणतंत्र दिवस के दौरान जब तीनों सेनाओं की टुकड़ियाँ, हथियार और दूसरे सैन्य साजो सामान जब 26 जनवरी के बाद बैरक में लौटेंगे तो तीन दिन बाद यानि 29 जनवरी को दिन ढलने के समय बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी का आयोजन किया जाता है।
पिछले साल अलग-अलग रेजीमेंट की 18 मिलिट्री बैंड, 15 पाइप और ड्रम बैंड ने हिस्सा लिया था। वहीं इस साल इंटर सर्विस गार्ड की कमान विंग कमांडर विपुल गोयल संभालेंगे। वायुसेना मार्च की अगुवाई फ्लाइट लेफ्टिनेंट श्रीकांत शर्मा और तीन अन्य अधिकारी करेंगे। वायुसेना बैंड की टुकड़ी में 72 संगीतकार और तीन ड्रम मेजर होंगे

गणतंत्र दिवस पर दिखी बिना ब्लाउज वाली महिलाओं की झांकी

26 जनवरी को देशभर में 70वें गणतंत्र दिवस का आयोजन बड़े ही धूम-धाम से किया गया.इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में बहुत कुछ पहली बार हुआ है. लेकिन परेड के बाद से ही एक विवाद शुरू हो गया हैं. सूत्रों की माने तो इस बार गणतंत्र दिवस परेड में कुल 16 राज्यों की झांकी राजपथ पर नजर आई थी. लेकिन इसी बीच तमिलनाडु की झांकी को लेकर विवाद शुरू हो गया है. दरअसल तमिलनाडु राज्य की झांकी में महिलाओं को बिना ब्लाउज के सिर्फ साड़ी में दिखाया गया था.
इस झांकी में महात्मा गांधी की मदुरै यात्रा को दिखाया गया था जिसमे महिलाओं को बिना ब्लाउज सिर्फ साड़ी में दिखाया गया था. आपको बता दें साल 1921 में महात्मा गांधी मदुरै यात्रा पर गए थे और इसके बाद उन्होंने कपड़े त्याग दिए थे और सिर्फ एक धोती पहनने का फैसला किया था. उन्होंने इतना बड़ा फैसला वहां के किसानों की दयनीय हालत को देखकर लिया था. अब इस बारे में बात करते हुए राजनीतिक दल द्रविड़ इयक्का तमिझर पेरावई के महासचिव सुबा वीरापांडियन ने कहा कि, ‘इस यात्रा के बाद महात्मा गांधी ने सिर्फ एक धोती पहनने का फैसला किया था. यह महात्मा गांधी और तमिलनाडु के लिए अहम घटना थी, लेकिन 1921 में महिलाएं इस तरह कपड़े नहीं पहनती थीं, जैसा झांकी में दिखाया गया है. त्रावणकोर क्षेत्र में महिलाएं इस तरह का पहनावा पहनती थीं. मगर महिलाओं के ब्लाउज पहनने पर बैन को 19वीं शताब्दी में ही खत्म कर दिया गया था.’
इतना ही नहीं वीरापांडियन ने ये भी कहा कि, ‘ऐसा नहीं होना चाहिए था, वह भी तब जब राजपथ पर देश के गौरव यानी परेड को पूरी दुनिया देख रही थी.’ वीरापांडियन के अलावा असंगठित मजदूर संघ की सलाहकार आर गीता ने भी इस बारे में बात करते हुए कहा कि, ‘बिना ब्लाउज के महिलाओं को दिखाने से बचा जा सकता था.’

यूँ ही नहीं भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता !

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारत में हर दिन कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है। विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और आस्थाओं को मानने वाले लोग अपने त्यौहारों को पूरे उल्लास के साथ मनाते हैं, लेकिन 26 जनवरी एक ऐसा दिन है, जो देश का राष्ट्रीय पर्व है। देश के सभी धर्म और जाति के लोग इस दिन को राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत होकर मनाते हैं। 
कितना जानते हैं आप अपने देश के बारे में?
देश आज अपना 70वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। इसी दिन 1950 में भारत सरकार अधिनियम एक्ट (1935) को हटाकर भारत का संविधान लागू किया गया था। देश को 200 साल बाद गुलामी से आजादी मिली। एक समय पर सोने की चिड़िया कहलाए जाने वाले हमारे देश की बहुत सी बातें ऐसी हैं जिनसे हमें गर्व महसूस होता है। 
देखिए गौरवमयी भारतीय संस्कृति, जिसे धूमिल करने का मुगलों से लेकर अंग्रेज़ों ने भरसक असफल प्रयास किये गए।   
भारत का अंग्रेजी में नाम ‘इंडिया’ इंडस नदी से बना है, जिसके आस पास की घाटी में आरंभिक सभ्यताएं निवास करती थी। आर्य पूजकों में इस इंडस नदी को सिंधु कहा।
ईरान से आए आक्रमणकारियों ने सिंधु को हिंदु की तरह प्रयोग किया। ‘हिंदुस्तान’ नाम सिंधु और हिंदु का संयोजन है, जो कि हिंदुओं की भूमि के संदर्भ में प्रयुक्त होता है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और विश्व का सातवां सबसे बड़ा देश तथा प्राचीन सभ्यताओं में से एक है।
सांप सीढ़ी का खेल तेरहवीं शताब्दी में कवि संत ज्ञान देव द्वारा तैयार किया गया था इसे मूल रूप से मोक्षपट कहते थे। इस खेल में सीढियां वरदानों का प्रतिनिधित्व करती थीं जबकि सांप अवगुणों को दर्शाते थे। इस खेल को कौडियों तथा पांसे के साथ खेला जाता था। आगे चल कर इस खेल में कई बदलाव किए गए, परन्तु इसका अर्थ वहीं रहा अर्थात अच्छे काम लोगों को स्वर्ग की ओर ले जाते हैं जबकि बुरे काम दोबारा जन्म के चक्र में डाल देते हैं।
विश्व का प्रथम ग्रेनाइट मंदिर तमिलनाडु के तंजौर में बृहदेश्वर मंदिर है। इस मंदिर के शिखर ग्रेनाइट के 80 टन के टुकड़ों से बने हैं। यह भव्य मंदिर राजाराज चोल के राज्य के दौरान केवल 5 वर्ष की अवधि में (1004 ए डी और 1009 ए डी के दौरान) निर्मित किया गया था।
शतरंज की खोज भारत में की गई थी।
बीज गणित, त्रिकोण मिति और कलन का अध्ययन भारत में ही आरंभ हुआ था।
'स्थान मूल्य प्रणाली' और 'दशमलव प्रणाली' का विकास भारत में 100 बी सी में हुआ था।
दुनिया का सबसे ऊंचा क्रिकेट का मैदान हिमाचल प्रदेश के चायल नामक स्थान पर है। इसे समुद्री सतह से 2444 मीटर की ऊंचाई पर भूमि को समतल बना कर 1893 में तैयार किया गया था।
भारत में विश्व भर से सबसे अधिक संख्या में डाक खाने स्थित हैं।
भारतीय रेल देश का सबसे बड़ा नियोक्ता है। यह दस लाख से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
विश्व का सबसे प्रथम विश्वविद्यालय 700 बी सी में तक्षशिला में स्थापित किया गया था। इसमें 60 से अधिक विषयों में 10,500 से अधिक छात्र दुनियाभर से आकर अध्ययन करते थे। नालंदा विश्वविद्यालय चौथी शताब्दी में स्थापित किया गया था जो शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की महानतम उपलब्धियों में से एक है।
आयुर्वेद मानव जाति के लिए ज्ञात सबसे आरंभिक चिकित्सा शाखा है। शाखा विज्ञान के जनक माने जाने वाले चरक में 2500 वर्ष पहले आयुर्वेद का समेकन किया था।
भारत 17वीं शताब्दी के आरंभ तक ब्रिटिश राज्य आने से पहले सबसे सम्पन्न देश था। क्रिस्टोफर कोलम्बस भारत की सम्पन्नता से आकर्षित हो कर भारत आने का समुद्री मार्ग खोजने चला और उसने गलती से अमेरिका को खोज लिया।
भास्कराचार्य ने खगोल शास्त्र के कई सौ साल पहले पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने में लगने वाले सही समय की गणना की थी। उनकी गणना के अनुसार सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी को 365.258756484 दिन का समय लगता है।
भारतीय गणितज्ञ बुधायन द्वारा 'पाई' का मूल्य ज्ञात किया गया था और उन्होंने जिस संकल्पना को समझाया उसे पाइथागोरस का प्रमेय करते हैं। उन्होंने इसकी खोज छठवीं शताब्दी में की, जो यूरोपीय गणितज्ञों से काफी पहले की गई थी।
वर्ष 1896 तक भारत विश्व में हीरे का एक मात्र स्रोत था।
बेलीपुल विश्व में सबसे ऊंचा पुल है। यह हिमाचल पर्वत में द्रास और सुरु नदियों के बीच लद्दाख घाटी में स्थित है। इसका निर्माण अगस्त 1982 में भारतीय सेना द्वारा किया गया था। भारत ने अपने आखिरी 100000 वर्षों के इतिहास में किसी भी देश पर हमला नहीं किया है।
निश्चेतक का उपयोग भारतीय प्राचीन चिकित्सा विज्ञान में भली भांति ज्ञात था। शारीरिकी, भ्रूण विज्ञान, पाचन, चयापचय, शरीर क्रिया विज्ञान, इटियोलॉजी, आनुवांशिकी और प्रतिरक्षा विज्ञान आदि विषय भी प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पाए जाते हैं।
सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है। लगभग 2600 वर्ष पहले सुश्रुत और उनके सहयोगियों ने मोतियाबिंद, कृत्रिम अंगों को लगना, शल्य क्रिया द्वारा प्रसव, अस्थिभंग जोड़ना, मूत्राशय की पथरी, प्लास्टिक सर्जरी और मस्तिष्क की शल्य क्रियाएं आदि की।
भारत से 90 देशों को सॉफ्टवेयर का निर्यात किया जाता है।
भारत में 4 धर्मों का जन्म हुआ - हिन्दु, बौद्ध, जैन और सिक्ख धर्म और जिनका पालन दुनिया की आबादी का 25 प्रतिशत हिस्सा करता है। जैन धर्म और बौद्ध धर्म की स्थापना भारत में क्रमश: 600 बी सी और 500 बी सी में हुई थी। इस्लाम भारत का और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है।
भारत में 3,00,000 मस्जिदें हैं जो किसी अन्य देश से अधिक हैं, यहां तक कि मुस्लिम देशों से भी अधिक।
सिक्ख धर्म का उद्भव पंजाब के पवित्र शहर अमृतसर में हुआ था। यहां प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर की स्थापना 1577 में गई थी।
वाराणसी, जिसे बनारस के नाम से भी जाना जाता है, एक प्राचीन शहर है जब भगवान बुद्ध ने 500 बी सी में यहां आगमन किया और यह आज विश्व का सबसे पुराना और निरंतर आगे बढ़ने वाला शहर है।
योग कला का उद्भव भारत में हुआ है और यह 5,000 वर्ष से अधिक समय से मौजूद है।
गणतंत्र दिवस ही नहीं और भी बहुत कुछ हुए थे 
इस तारीख पर 
इतिहास की बात करें तो इस दिन भारत का संविधान लागू हुआ। भारत को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजादी तो मिल गई थी, लेकिन 26 जनवरी 1950 को भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित हुआ।
इस दिन राजधानी में राजपथ पर होने वाले मुख्य आयोजन में भारत की सांस्कृतिक झलक के साथ ही सैन्य शक्ति और परंपरागत विरासत की झांकी पेश की जाती है।
देश दुनिया के इतिहास में 26 जनवरी की तारीख पर दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा :-
1930 : ब्रिटिश शासन के अंतर्गत भारत में पहली बार स्वराज दिवस मनाया गया।
1931 : 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' के दौरान ब्रिटिश सरकार से बातचीत के लिए महात्मा गांधी को रिहा किया गया। 
1949 : भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ और इसे संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सौंपा गया 
1950 : अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न के रूप में अपनाया गया।
1957 : जम्मू और कश्मीर के भारत की तरफ के हिस्से को औपचारिक रूप से भारत का हिस्सा बनाया गया। 
1963 : माथे पर मुकुट जैसी कलगी और खूबसूरत पंखों वाले मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया।
1972 : दिल्ली के इंडिया गेट पर राष्ट्रीय स्मारक अमर जवान ज्योति का अनावरण।
1982 : पर्यटकों को रेल के सफर के दौरान शाही और विलासितापूर्ण अनुभव का आनंद दिलाने के लिए भारतीय रेल ने पैलेस ऑन व्हील्स सेवा शुरू की।
2001 : गुजरात के भुज में 7.7 तीव्रता का भीषण भूकंप, हजारों लोग मारे गए।
2008 : गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने परेड की सलामी ली.

Image result for गुरुकुलआखिर कहाँ खो गए भारत के 7लाख 32हज़ार गुरुकुल एवं विज्ञान की 20से अधिक शाखाएं?
बात आती है की भारत में विज्ञान पर इतना शोध किस प्रकार होता था, तो इसके मूल में है भारतीयों की जिज्ञासा एवं तार्किक क्षमता, जो अतिप्राचीन उत्कृष्ट शिक्षा तंत्र एवं अध्यात्मिक मूल्यों की देन है। “गुरुकुल” के बारे में बहुत से लोगों को यह भ्रम है की वहाँ केवल संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी जो की गलत है। भारत में विज्ञान की 20 से अधिक शाखाएं रही है जो की बहुत पुष्पित पल्लवित रही है जिसमें प्रमुख 1. खगोल शास्त्र 2. नक्षत्र शास्त्र 3. बर्फ़ बनाने का विज्ञान 4. धातु शास्त्र 5. रसायन शास्त्र 6. स्थापत्य शास्त्र 7. वनस्पति विज्ञान 8. नौका शास्त्र 9. यंत्र विज्ञान आदि इसके अतिरिक्त शौर्य (युद्ध) शिक्षा आदि कलाएँ भी प्रचुरता में रही है। संस्कृत भाषा मुख्यतः माध्यम के रूप में, उपनिषद एवं वेद छात्रों में उच्चचरित्र एवं संस्कार निर्माण हेतु पढ़ाए जाते थे।
थोमस मुनरो सन 1813 के आसपास मद्रास प्रांत के राज्यपाल थे, उन्होंने अपने कार्य विवरण में लिखा है मद्रास प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण आंद्रप्रदेश, पूर्ण तमिलनाडु, पूर्ण केरल एवं कर्णाटक का कुछ भाग ) में 400 लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। उत्तर भारत (अर्थात आज का पूर्ण पाकिस्तान, पूर्ण पंजाब, पूर्ण हरियाणा, पूर्ण जम्मू कश्मीर, पूर्ण हिमाचल प्रदेश, पूर्ण उत्तर प्रदेश, पूर्ण उत्तराखंड) के सर्वेक्षण के आधार पर। 
जी.डब्लू.लिटनेर ने सन 1822 में लिखा है, उत्तर भारत में 200 लोगो पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। माना जाता है की मैक्स मूलर ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे अधिक शोध किया है, वे लिखते है “भारत के बंगाल प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण बिहार, आधा उड़ीसा, पूर्ण पश्चिम बंगाल, आसाम एवं उसके ऊपर के सात प्रदेश) में 80 सहस्त्र (हज़ार) से अधिक गुरुकुल है जो की कई सहस्त्र वर्षों से निर्बाधित रूप से चल रहे है”।
उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के आकडों के कुल पर औसत निकलने से यह ज्ञात होता है की भारत में 18 वी शताब्दी तक 300 व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल था। एक और चौकानें वाला तथ्य यह है की 18 शताब्दी में भारत की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ थी, 300 व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल के अनुसार भारत में 7 लाख 32 सहस्त्र गुरुकुल होने चाहिए। अब रोचक बात यह भी है की अंग्रेज प्रत्येक दस वर्ष में भारत में भारत का सर्वेक्षण करवाते थे उसे के अनुसार 1822 के लगभग भारत में कुल गांवों की संख्या भी लगभग लाख 32 सहस्त्र थी, अर्थात प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल। 16 से 17 वर्ष भारत में प्रवास करने वाले शिक्षाशास्त्री लुडलो ने भी 18 वी शताब्दी में यहीं लिखा की “भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं जिसमें गुरुकुल नहीं एवं एक भी बालक ऐसा नहीं जो गुरुकुल जाता नहीं”।
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गुरू गोविन्द सिंह के तेजस्वी व्यक्तित्व ने एक बैरागी साधू माधवदास को बन्दा बहादुर…

राजा की सहायता के अपितु, समाज से पोषित इन्ही गुरुकुलों के कारण 18 शताब्दी तक भारत में साक्षरता 97% थी, बालक के 5 वर्ष, माह, 5 दिवस के होते ही उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता था। प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक विद्यार्जन का क्रम 14 वर्ष तक चलता था। जब बालक सभी वर्गों के बालको के साथ निशुल्कः 20 से अधिक विषयों का अध्यन कर गुरुकुल से निकलता था। तब आत्मनिर्भर, देश एवं समाज सेवा हेतु सक्षम हो जाता था।
इसके उपरांत विशेषज्ञता (पांडित्य) प्राप्त करने हेतु भारत में विभिन्न विषयों वाले जैसे शल्य चिकित्सा, आयुर्वेद, धातु कर्म आदि के विश्वविद्यालय थे, नालंदा एवं तक्षशिला तो 2000 वर्ष पूर्व के है परंतु मात्र 150-170 वर्ष पूर्व भी भारत में 500-525 के लगभग विश्वविद्यालय थे। थोमस बेबिगटन मैकोले (टी.बी.मैकोले) जिन्हें पहले हमने विराम दिया था जब सन 1834 आये तो कई वर्षों भारत में यात्राएँ एवं सर्वेक्षण करने के उपरांत समझ गए की अंग्रेजो पहले के आक्रांताओ अर्थात यवनों, मुगलों आदि भारत के राजाओं, संपदाओं एवं धर्म का नाशकरने की जो भूल की है, उससे पुण्यभूमि भारत कदापि पददलित नहीं किया जा सकेगा, अपितु संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश करे तो इन्हें पराधीन करने का हेतु सिद्ध हो सकता है। इसी कारण “इंडियन एज्यूकेशन एक्ट” बना कर समस्त गुरुकुल बंद करवाए गए। हमारे शासन एवं शिक्षा तंत्र को इसी लक्ष्य से निर्मित किया गया ताकि नकारात्मक विचार, हीनता की भावना, जो विदेशी है वह अच्छा, बिना तर्क किये रटने के बीज आदि बचपन से ही बाल मन में घर कर ले और अंग्रेजो को प्रतिव्यक्ति संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का नाश का परिश्रम न करना पड़े।
उस पर से अंग्रेजी कदाचित शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं होती तो इस कुचक्र के पहले अंकुर माता पिता ही पल्लवित होने से रोक लेते परंतु ऐसा हो न सका। हमारे निर्यात कारखाने एवं उत्पाद की कमर तोड़ने हेतु भारत में स्वदेशी वस्तुओं पर अधिकतम कर देना पड़ता था एवं अंग्रेजी वस्तुओं को कर मुक्त कर दिया गया था। कृषकों पर तो 90% कर लगा कर फसल भी लूट लेते थे एवं “लैंड एक्विजिशन एक्ट” के माध्यम से सहस्त्रो एकड़ भूमि भी उनसे छीन ली जाती थी, अंग्रेजो ने कृषकों के कार्यों में सहायक गौ माता एवं भैसों आदि को काटने हेतु पहली बार कलकत्ता में कसाईघर चालू कर दिया, लाज की बात है वह अभी भी चल रहा है। सत्ता हस्तांतरण के दिवस (15-8-1947) के उपरांत तो इस कुचक्र की गोरे अंग्रेजो पर निर्भरता भी समाप्त हो गई, अब तो इसे निर्बाधित रूप से चलने देने के लिए बिना रीढ़ के काले अंग्रेज भी पर्याप्त थे, जिनमें साहस ही नहीं है भारत को उसके पूर्व स्थान पर पहुँचाने का |
“दुर्भाग्य है की भारत में हम अपने श्रेष्ठतम सृजनात्मक पुरुषों को भूल चुके है। इसका कारण विदेशियत का प्रभाव और अपने बारे में हीनता बोध की मानसिक ग्रंथि से देश के बुद्धिमान लोग ग्रस्त है” – डॉ.कलाम, “भारत 2020: सहस्त्राब्दी”

आप सोच रहे होंगे उस समय अमेरिका यूरोप की क्या स्थिति थी, तो सामान्य बच्चों के लिए सार्वजानिक विद्यालयों की शुरुआत सबसे पहले इंग्लैण्ड में सन 1868 में हुई थी, उसके बाद बाकी यूरोप अमेरिका में अर्थात जब भारत में प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल था, 97% साक्षरता थी तब इंग्लैंड के बच्चों को पढ़ने का अवसर मिला। तो क्या पहले वहाँ विद्यालय नहीं होते थे? होते थे परंतु महलों के भीतर, वहाँ ऐसी मान्यता थी की शिक्षा केवल राजकीय व्यक्तियों को ही देनी चाहिए बाकी सब को तो सेवा करनी है।