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झूठी और भ्रामक खबर : पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर झूठी खबर और भ्रामक सूचनाओं को फैलाकर दो संप्रदायों में तनाव फैलाने का मामला दर्ज किया गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा के प्रवक्ता नवीन कुमार ने 13 अप्रैल को लक्ष्मी नगर थाने में दुआ के खिलाफ तहरीर दी थी। जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच को सौंपा गया था। जांच में साक्ष्य पाए जाने के बाद क्राइम ब्रांच ने दुआ के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया।
नवीन कुमार ने अपनी शिकायत में विनोद दुआ पर भ्रामक सूचना फैला कर ‘सार्वजनिक गड़बड़ी पैदा करने’ और यूट्यूब पर ‘द विनोद दुआ शो’ के माध्यम से ‘फर्जी खबरें प्रसारित करने का आरोप लगाया है।

शिकायत में विनोद दुआ पर दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान ‘गलत रिपोर्टिंग’ करने का भी आरोप लगाया गया है। इसके अलावा शिकायत में ये भी कहा गया है कि विनोद दुआ ने कहा था कि केंद्र सरकार ने हिंसा को रोकने के लिए कुछ नहीं किया। प्रधानमंत्री को ‘कागजी शेर’ बताने का भी विनोद दुआ पर आरोप लगााया गया है।
विनोद दुआ के ऊपर आईपीसी की धारा 290 (लोगों के बीच अशांति पैदा करना), 505 (समाज में अशांति पैदा करने वाला बयान देना) और 505 (2) (अपमानजनक टिप्पणी वाले प्रकाशित सामग्रियों को बेचना) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

‘भारतीय अपने अधिकारों से अनजान हैं’: विनोद दुआ का उकसाने वाला विवादित बयान

विनोद दुआविवादित पत्रकार और मी टू के आरोपित विनोद दुआ ने सोमवार (जून 1, 2020) को अपने डेली शो में भारतीयों को उसी तरह से हिंसा और दंगा करने के लिए उकसाया, जैसा कि फिलहाल अमेरिका में हो रहा है। बता दें कि अमेरिका में एक अश्वेत व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस के हाथों हुई हत्या के बाद दंगे और हिंसा अब भी जारी हैं।
वीडियो की शुरुआत में विनोद दुआ कहते हैं, “हमारे यहाँ धर्म को लेकर नफरत है और उधर नस्ल को लेकर नफरत है।” वीडियो में 9 मिनट तक वो ये कहते नजर आते हैं कि कैसे एक अश्वेत आदमी की हत्या के खिलाफ ‘विरोध’ करने के लिए भीड़ सड़कों पर उतरी।
विनोद दुआ ने आगे कहा, “अमेरिका में 40 शहरों में कर्फ्यू हैं। लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। उनमें से कुछ हिंसक भी हो गए। अमेरिका में सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की बड़ी मौजूदगी ने उनके अंदर की सहानुभूति और मानवता का परिचय दिया है।” फिर आह भरते हुए वो कहते हैं, “लेकिन भारतीय अपने अधिकारों से अनजान हैं।”
अमेरिकी दंगों से प्रेरणा लेते हुए, उन्होंने कहा कि जब प्रवासी श्रमिकों को अपने मूल गाँव जाने के लिए हजार किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था, तो भारतीय नागरिक समाज ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
विरोध प्रदर्शन के नाम पर सड़कों पर उतरी हिंसक भीड़ को सही ठहराने को लिए विनोद दुआ ने दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट करने वालों को ‘मानवाधिकार के धर्मयोद्धा’ की संज्ञा दी। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि ट्रम्प को बेसमेंट में शिफ्ट हो जाना चाहिए।
आगे विनोद दुआ ने इस बात का हवाला देते हुए कि कैसे अमेरिका में लोगों ने राष्ट्रपति को राष्ट्रपति भवन में ही बंधक बना दिया है, उन्होंने कहा, “हम यहाँ भी ऐसे लोगों को देखना चाहेंगे। हमारे पास 130 करोड़ लोग हैं। अमेरिका के पास इतनी आबादी भी नहीं है।” इसके साथ ही शो के अंत में भी वो इसी बात को दोहराते नजर आए कि भारत में लोग अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ अपने आक्रोश को प्रदर्शित करने में विफल रहे।
पिछले दिनों 46 वर्षीय अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की मिनिपोलिस में पुलिस अधिकारी के हाथों मौत हो गई। कथित तौर मिनिपोलिस में पुलिस अधिकारी ने फ्लॉयड की गर्दन पर लगभग 9 मिनट तक अपना घुटना रखा। जॉर्ज फ्लॉयड इस दौरान घुटना हटाने की गुहार लगाता रहा। उसने यह भी कहा कि वह साँस नहीं ले पा रहा है। लेकिन पुलिस अधिकारी नहीं पिघला और फ्लॉयड की मौत हो गई। इसके बाद लोगों का गुस्सा पुलिस के प्रति भड़क गया और हिंसक रुप ले लिया।
शनिवार को यह विरोध प्रदर्शन पूरे देश में फैल गया। जिसके कारण कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया। फिलाडेल्फिया में प्रदर्शनकारियों ने मियामी में राजमार्ग यातायात को बंद करने के दौरान एक मूर्ति को गिराने की कोशिश भी की।
हिंसा और दंगे के दौरान ANTIFA से जुड़े वामपंथियों और दंगाइयों ने एक बेघर इंसान के पास जो भी था, उसे जला दिया। इसका वीडियो भी सामने आया था, जिसमें आप देख सकते है कि किस तरह दंगाइयों ने बेघर इंसान के गद्दे को आग में डाल दिया जिसके बाद लाचार और बेबस गद्दे का मालिक राख में बदलती अपनी चीजों को किसी तरह बचाने की असहाय कोशिश करता है। वीडियो में सुना जा सकता है कि वह आदमी अपने सामानों को जलता हुआ देख किस तरह चिल्लाते हुए कह रहा है – “मैं यहाँ रहता हूँ।” दंगे को दौरान ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारे भी लगाए गए।

पुलिस जल्लाद, लॉकडाउन काफी नहीं, लोग फूटकर सड़कों पर आ जाएँ : विनोद दुआ

विनोद दुआ
विनोद दुआ का दोहरा रवैया 
कोरोना महामारी के बीच मीडिया गिरोह की हरकतें अब बिलकुल बर्दाशत करने लायक नहीं रह गई हैं। बीते दिनों सिर्फ़ प्रधानमंत्री की अपीलों का अनुसरण करने वाले लोगों को ये गिरोह उल-जुलूल बातें कहते नजर आए थे। मगर अब तो इन्होंने हद कर दी है कि ये देश की स्थिति जानते हुए लॉकडाउन का विरोध कर रहे हैं। उसके खिलाफ़ लोगों को भड़का रहे हैं और उन्हें बाहर आने की वजह दे रहे हैं। जी हाँ, जिस समय सरकार, प्रशासन, स्वास्थ्यकर्मी, सुरक्षाकर्मी हर कोई देश के नागरिकों से घरों में रहने की अपील कर रहा है। बार-बार उन्हें कोरोना से बचाए रखने की कोशिश कर रहा हैं। उस बीच मीडिया गिरोह के बुजुर्ग सदस्य विनोद दुआ अपनी अनर्गल बातों व फालतू के तर्कों को वीडियो के माध्यम से ला लाकर समाज में जहर फैलाने के लिए अग्रसर हैं।
सब जानते-समझते-परखते हुए कि जिस तरह देश में कोरोना मामले बढ़ रहे थे, उस समय देश में लॉकडाउन व सोशल डिस्टेंसिंग का फैसला लेना कितना आवश्यक था और इस फैसले को लेने में देरी की जाती तो हालात बदतर हो सकते थे। बावजूद इसके विनोद दुआ ने अपने तथाकथित बुद्धिजीवि होने का प्रमाण पेश किया है। एचडब्ल्यू न्यूज नेटवर्क पर स्थिति का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कई वीडियोज़ में सरकार और पुलिस पर सवाल उठाए हैं।
लॉकडाउन के बाद सामने आई वीडियोज़ में वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ हर तथ्य से लोगों को भड़का रहे हैं। सरकार को संवेदनहीन बता रहे हैं और देश की पुलिस को अंग्रेजों के समय वाली पुलिस जैसी पुलिस बता रहे हैं। इसके अलावा अपनी ताजा वीडियो (एपिसोड 261) की शुरुआत में ही लॉकडाउन के मामले में नागरिकों के सामने सविनय अवज्ञा करने की भी बात कर रहे हैं।

उन्होंने अपने एपिसोड नंबर 253 में जहाँ पुलिस को जल्लाद कहकर अमानवीय बताया है। वहीं ये भी पूछा है कि अगर लॉकडाउन से पहले लोगों को तैयारी के लिए कम समय दिया जाएगा तो वो पैनिक नहीं होंगे तो क्या करेंगे? वीडियो के अंत तक उनका कहना है कि सरकार ने जो 1500 करोड़ रुपए दिए हैं उससे देश का काम नहीं चलेगा। क्योंकि वो चवन्नी-अठन्नी हैं। इसके लिए 5-6 लाख करोड़ रुपयों की आवश्यकता है। ताकि लोगों को सड़कों पर उतरने से रोका जा सके।
वे अपनी वीडियो के जरिए लोगों को विकल्प दे रहे हैं कि या तो वे लॉकडाउन को मानने से अंदर ही अंदर इंकार कर दें। जैसे सिविल नाफरमानी। क्योंकि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए लॉकडाउन काफी नहीं है। या फिर ये लोग फूटकर सड़कों पर आ जाएँ क्योंकि आखिर वे कब तक एनजीओ या सरकारी संगठन के दिए खाने को खाकर जिंदा रहेंगे। इसके अलावा वो इस समय में भी लोगों को बेरोजगारी के नाम पर वीडियो में डराते हैं। साथ ही कहते हैं सरकार और स्वयं सेवी संस्था इस समय जो भी कर रहे हैं। उससे काम नहीं चलने वाला। यानी वे सबके प्रयासों को खारिज कर देते हैं।
हैरानी की बात है न कि आखिर लंबे समय से पत्रकार के रूप में पहचाने जाने वाला ये शख्स ऐसी बातें कैसे कर सकता है। इसका काम तो इस घड़ी में लोगों से अपील करने का होना चाहिए था कि वे खुद को सुरक्षित रखें। जहाँ से जो मदद मिले उसका फायदा उठाएँ… फिर आखिर वे यह सब क्यों कर रहे हैं?
ये जहर इतना ही नहीं है। विनोद दुआ ने अपनी इन वीडियोज में सरकार प्रशासन सब पर सवाल उठाए हैं। खुद को देश के नागरिकों का हितैषी स्थापित करते हुए उन्हें जमकर भड़काया है। अपने कुतर्कों से उन्हें गुमराह करने की कोशिश की है। वीडियोज की शुरुआत से लेकर अंत तक में विनोद दुआ एक भी बार देश के नागरिकों को कोरोना से बचे रहने की बात कहते नजर नहीं आते। बल्कि सरकार के ख़िलाफ़ बोलते, उनके फैसलों की निंदा करते और लोगों को उकसाते नजर आते हैं।
विश्लेषण की शुरुआत में वे अपनी दिक्कत इस बात पर दिखाते हैं कि आखिर प्रधानमंत्री हर ऐलान रात के 8 बजे क्यों करते हैं और जब करते हैं तो फिर वो फैसला 12 बजे से क्यों लागू होना होता है? जैसे नोटबंदी, जीएसटी आदि। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री सिर्फ़ 4 घंटे का समय देते हैं। इससे लोगों को दिक्कत होती हैं। इसके बाद दुआ किसानों की स्थिति बताकर विषय को गंभीर मोड़ देने की कोशिश करते हैं। वे सवाल करते हैं कि गेहूँ बाजार तक कैसे पहुँचेगा और अगर पहुँच भी गया तो लोग उसे कैसे खरीदेंगे। वे सरकार से पूछते नजर आते हैं कि आखिर इस देश में जो लॉकडाउन कर दिया गया है। उसे सिर्फ़ पुलिस के भरोसे क्यों किया गया।
विनोद को शायद यह भी नहीं मालूम कि दिल्ली में ही कई स्थानों पर जनता पुलिस के साथ मिलकर लॉक डाउन पालन करने के लिए सडकों पर है। इतना ही नहीं कुछ क्षेत्रों में पुलिस से पहले लोग अपनी जरुरत की चींजे खरीदने बाहर आये लोगों को बिना मास्क के होने पर वापस भेजते देखे जाते हैं, दुकान पर उचित दूरी बनाए रखने में आम नागरिक पुलिस को सहयोग करते देखे जा सकते हैं। बहस होने की स्थिति में ही पुलिस को हस्ताक्षेप करते देखा गया है। सरकार अथवा पुलिस की आलोचना करो, करनी भी चाहिए, लेकिन वक़्त की नजाकत को भी समझना चाहिए। ये वो समय है जब हर नागरिक को, चाहे वह किसी भी क्षेत्र से हो, इस समय सरकार और पुलिस के साथ खड़े होकर इस वैश्विक कोरोना को हराना होगा।    
ये वो समय है जब सरकार और देश की जनता अच्छे से जानती है कि इस समय कुछ भी किसी के भी हाथ नहीं है। मगर फिर भी सरकार स्थिति सुधारने के लिए प्रयासरत है। हर देश के पास इस समय लॉकडाउन के अलावा कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि इस महामारी की दवाई तैयार होने तक यही एक रास्ता है कि इसकी चेन तोड़ी जाए। जो बिना दूरी बनाए संभव नहीं है।
अवलोकन करें:-
सरकार मानती है कि इस समय देश का गरीब वर्ग दिक्कत में है। जिसके लिए वह इंतजाम कर रही है। बड़े-बड़े धनवान सामने आ रहे हैं। ऐसे में जनता के मन में ये डालना कि आखिर कब तक वे एनजीओ आदि की मदद पर खाना खाएँगे, उन्हें भड़काना नहीं, तो क्या है? खुद सोचिए, इस संवेदनशील स्थिति में, सरकार के कदमों पर सवाल उठाना कहाँ तक जरूरी है? और कहा तक जरूरी है पुलिस को जल्लाद बताना, जो अपनी जान को खतरे में डालकर नागरिकों की सुरक्षा में तैनात है।