प्रशांत भूषण के देश विरोधी खुलेआम बयान देने पर Bar Council of India क्यों खामोश है? क्यों नहीं इस पर कोई कार्यवाही की गयी? क्या Bar Council of India प्रशांत के इस बयान को अप्रयत्क्ष अपना समर्थन दे रही है?
यह शिकायत मैंने Bar Council of India ( bciinfo21@gmail.com) को भेजी है और उसकी प्रतिलिपि Delhi Police Commissioner को cpdelhi@delhipolice.gov.in भेजते हुए लिखा है “सूचनार्थ तथा इस विषय में दिल्ली पुलिस के वैधानिक अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले किसी भी पहलू पर विचार करने हेतु, यदि उपलब्ध सामग्री एवं साक्ष्य से कोई संज्ञेय अपराध प्रथम दृष्टया प्रकट होता हो”
![]() |
| लेखक चर्चित YouTuber |
सेवा में,
अध्यक्ष महोदय,
बार काउंसिल ऑफ इंडिया
नई दिल्ली।
विषय: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के ‘सत्ता परिवर्तन’ संबंधी व्यापक रूप से प्रसारित वक्तव्य की जाँच तथा कानून के अनुसार उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु अभ्यावेदन।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं आपका ध्यान वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रशांत भूषण के उस कथित वक्तव्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ, जिसमें मीडिया में प्रकाशित एवं टेलीविजन पर प्रसारित समाचारों के अनुसार उन्होंने कहा कि “यह सत्ता परिवर्तन की लड़ाई है और हम इसे हासिल करेंगे” अथवा इसी आशय की बात कही।
किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की आलोचना करना, नीतियों का विरोध करना और चुनावों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की माँग करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। परंतु यदि किसी वक्तव्य का वास्तविक आशय लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक प्रक्रिया के स्थान पर हिंसा, विद्रोह अथवा असंवैधानिक तरीकों से निर्वाचित सरकार को हटाने के लिए लोगों को उकसाना हो, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है और इसकी निष्पक्ष जाँच आवश्यक है।
श्री प्रशांत भूषण एक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे संविधान, कानून के शासन तथा न्यायपालिका की गरिमा के प्रति विशेष जिम्मेदारी का निर्वहन करें। यदि किसी अधिवक्ता द्वारा ऐसे आचरण या वक्तव्य का प्रमाण मिलता है जो कानून और संवैधानिक व्यवस्था के प्रतिकूल हो, तो केवल उनके पेशेवर पद या प्रतिष्ठा के कारण उस पर विचार करने से बचा नहीं जाना चाहिए।
मैं यह अभ्यावेदन किसी व्यक्ति की सरकार की आलोचना करने अथवा शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन का समर्थन करने के अधिकार को सीमित करने के उद्देश्य से नहीं दे रहा हूँ। मेरी चिंता यह है कि कहीं उक्त वक्तव्य में हिंसा, विद्रोह या असंवैधानिक कार्रवाई के लिए उकसाने का कोई तत्व तो नहीं है। इसका निर्णय मीडिया की सुर्खियों या किसी पूर्वधारणा के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे वक्तव्य, उसकी प्रामाणिक रिकॉर्डिंग, संदर्भ और उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच के बाद किया जाना चाहिए।
अतः आपसे विनम्रतापूर्वक अनुरोध है कि:
उक्त वक्तव्य की पूरी, बिना काट-छाँट वाली रिकॉर्डिंग अथवा प्रमाणित प्रतिलेख प्राप्त कर उसके संदर्भ सहित जाँच कराई जाए।
यह निर्धारित किया जाए कि क्या उपलब्ध सामग्री से अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 के अंतर्गत पेशेवर अथवा अन्य कदाचार के संबंध में प्रथम दृष्टया कार्यवाही का आधार बनता है।
यदि जांच में कदाचार प्रमाणित होता है, तो कानून के अनुसार उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। जहां कानून अनुमति देता हो, वहाँ गंभीरता के अनुरूप निलंबन अथवा अधिवक्ताओं की सूची से नाम हटाने जैसी कार्रवाई पर भी विचार किया जाए।
यदि सामग्री से किसी संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया संकेत मिलता हो, तो उसे उचित कानूनी कार्रवाई के लिए संबंधित कानून-प्रवर्तन प्राधिकारी के संज्ञान में लाया जाए।
मुझे इस अभ्यावेदन पर की गई कार्रवाई अथवा लिए गए निर्णय से अवगत कराने की कृपा की जाए।
मेरा स्पष्ट मत है कि संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध हिंसा या असंवैधानिक कार्रवाई के लिए उकसाने के आरोप, यदि साक्ष्यों से समर्थित हों, तो उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए। साथ ही, प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष जाँच, अपना पक्ष रखने और कानून के अनुसार निर्णय पाने का अधिकार भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
मुझे आशा है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया इस अभ्यावेदन पर निष्पक्षता, गंभीरता और कानून के अनुरूप विचार करेगी।
धन्यवाद,
भवदीय,
सुभाष चंद्र











