मुंबई में विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A. के मंच पर उस समय स्थिति असहज हो गई, जब मंच पर कपिल सिब्बल पहुँच गए। एक तो सिब्बल पूर्व कॉन्ग्रेसी हैं, जो अब समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद हैं। दूसरी तरफ, वो ‘बिन बुलाए मेहमान’ के तौर पर पहुँचे और वो भी सीधे मंच पर। उनकी मौजूदगी से कॉन्ग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने नाराजगी जताई, जिसे संभालने के लिए कई नेताओं को बातचीत करनी पड़ी।
मुंबई : ‘बिन बुलाए मेहमान’ बने कपिल सिब्बल, I.N.D.I.A. के मंच पर हो गया क्लेश
मुंबई में विपक्षी दलों के गठबंधन I.N.D.I.A. के मंच पर उस समय स्थिति असहज हो गई, जब मंच पर कपिल सिब्बल पहुँच गए। एक तो सिब्बल पूर्व कॉन्ग्रेसी हैं, जो अब समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद हैं। दूसरी तरफ, वो ‘बिन बुलाए मेहमान’ के तौर पर पहुँचे और वो भी सीधे मंच पर। उनकी मौजूदगी से कॉन्ग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने नाराजगी जताई, जिसे संभालने के लिए कई नेताओं को बातचीत करनी पड़ी।
उत्तर प्रदेश : इलाहाबद हाई कोर्ट के परिसर से 3 महीने में मस्जिद हटाओ, वरना तोड़ा जाएगा : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट परिसर में बनी मस्जिद को 3 महीने के अंदर हटाने का आदेश दिया है। साथ ही कहा है कि मस्जिद बनाने के लिए वक्फ बोर्ड राज्य सरकार राज्य सरकार से दूसरी जगह जमीन माँग सकता है। इससे पहले साल 2017 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोर्ट परिसर में बनी मस्जिद हटाने का आदेश दिया था।
सोमवार (13 मार्च 2023) को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस सीटी कुमार की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मस्जिद हटाने वाले फैसले के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। साथ ही कोर्ट ने मस्जिद हटाने के लिए 3 महीने का समय दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि यदि मस्जिद को 3 महीने के अंदर नहीं हटाया गया तो इलाहाबाद हाई कोर्ट समेत अन्य अधिकारी मस्जिद को तोड़ कर सकते हैं। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता चाहें तो मस्जिद बनाने के लिए राज्य सरकार से दूसरी जगह जमीन माँग सकते हैं।
मस्जिद हटाने का फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि मस्जिद एक सरकारी पट्टे (लीज) वाली जमीन में बनी है। इस लीज को साल 2002 में ही रद्द किया जा चुका है। इसके बाद साल 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह जमीन सरकारी है। इसलिए कोई भी इस जमीन को लेकर किसी भी प्रकार का दावा नहीं कर सकता।
मस्जिद की ओर से पेश हुए पूर्व कॉन्ग्रेस नेता और वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि मस्जिद 1950 के दशक से बनी हुई है। इसलिए ऐसे ही हटाने के लिए नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, “साल 2017 में सरकार बदल गई और सब कुछ बदल गया। नई सरकार के गठन के 10 दिन बाद एक जनहित याचिका दायर की जाती है। दूसरी जमीन मिलने तक हमें मस्जिद कहीं शिफ्ट करने में समस्या होगा।”
वहीं इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि यह पूरी तरह धोखाधड़ी का मामला है। उन्होंने कहा, “नवीनीकरण के लिए दो बार आवेदन किए गए। लेकिन, इस बारे में नहीं बताया गया कि मस्जिद का निर्माण किया गया है और इसका इस्तेमाल जनता के लिए किया जा रहा है। बल्कि यह कहते हुए नवीनीकरण की माँग की गई थी कि आवासीय उद्देश्यों के लिए इसकी आवश्यकता है। सिर्फ यहाँ नमाज पढ़ने से यह जगह मस्जिद नहीं हो जाती। अगर सुप्रीम कोर्ट के बरामदे या हाई कोर्ट के बरामदे में, सुविधा के लिए नमाज की अनुमति दी जाती है, तो यह मस्जिद नहीं बन जाएगा।”
हार्दिक पटेल के बाद कपिल सिब्बल ने दिया कांग्रेस को झटका, हो गया सोनिया-राहुल के नेतृत्व से मोहभंग
परिवार भक्ति कांग्रेस को किस तेजी के साथ हाशिए पर ले आयी है, उसे अब खुली आँखों और दिमाग से देखने का समय आ गया है। फिर भी अगर लोग इसे नज़रअंदाज करते हैं, उसे उनके दिमाग कर दिवालियापन ही कह जाएगा।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कांग्रेस को एक जोरदार झटका दिया है। कपिल सिब्बल ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। जी-23 के प्रमुख बागी रहे सिब्बल खामोशी के साथ कांग्रेस से किनारे हो गए हैं। उन्होंने यह इस्तीफा 16 मई को ही दिया था। इसका खुलासा कपिल सिब्बल के राज्यसभा के लिए पर्चा दाखिल करने के साथ हुआ। नामांकन के बाद उन्होंने कहा कि मैं कांग्रेस का नेता था, लेकिन अब नहीं हूं। उन्होंने कहा कि मैंने समाजवादी पार्टी के समर्थन से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन किया है। इस दौरान समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय महासचिव प्रो रामगोपाल यादव भी उपस्थित थे। कांग्रेस में लंबे समय से बागी सुर बुलंद करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल काफी दिनों से पार्टी में सुधार की वकालत कर रहे थे। उन्होंने तो गांधी परिवार को कांग्रेस से हटने और नए नेतृत्व के लिए रास्ता साफ करने की मांग भी कर दी थी। उनके इस बयान के बाद कांग्रेस के कई नेताओं ने उन्हें निशाना बनाया था। सिब्बल राजस्थान के उदयपुर में हुए चिंतन शिविर में भी नहीं शामिल हुए थे। अब इस्तीफा देने के बाद उन्होंने कहा कि कांग्रेस का 30-31 साल का साथ छोड़ना इतना आसान नहीं था।
उन्होंने समाजवादी पार्टी के समर्थन से राज्यसभा के लिए नामांकन किया है। नामांकन दाखिल करते समय कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने कांग्रेस से 16 मई को ही इस्तीफा दे दिया था। सिब्बल के इस्तीफे पर उनके एक पुराने ट्वीट को रीट्वीट करते हुए बीजेपी नेता जितिन प्रसाद तंज कसे हुए लिखा ‘प्रसाद कैसा है सिब्बल जी?’ असल में एक साल पहले कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल होने पर जितिन प्रसाद पर निशाना साधते हुए कपिल सिब्बल ने कहा था कि उनका बीजेपी का दामन थामना ‘प्रसाद की राजनीति’ है। कपिल सिब्बल ने उस समय जितिन प्रसाद के विचारधारा पर भी सवाल उठाया था। ऐसे में आज कांग्रेस छोड़ समाजवादी पार्टी के समर्थन से राज्यसभा चुनाव में नामांकन करने पर जितिन प्रसाद ने उनकर करारा तंज कसा। जितिन प्रसाद के ट्वीट करते ही सोशल मीडिया पर यूजर्स कपिल सिब्बल को ट्रोल करने लगे।
कांग्रेस में उपेक्षा से नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला जारीकांग्रेस में सियासी घमासान मचा हुआ है। पार्टी नेता घुटन और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि पार्टी उनकी योग्यता और क्षमता के मुताबिक भूमिका नहीं दे रही है। इसलिए अब अन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इसी का नतीजा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और आरपीएन सिंह ने पार्टी को अलविदा कह दिया। राहुल गांधी के बेहद करीबियों में शुमार किए जाने वाले पांच युवा नेताओं में से तीन अब बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। जब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे तब पांच नेताओं का अक्सर जिक्र होता था। ये पांच नेता हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह, सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा। हालांकि भले ही सचिन पायलट और मिलिंद देवड़ा अभी कांग्रेस के साथ दिख रहे हैं, लेकिन कुछ चीजें बड़े घटनाक्रम की तरफ भी इशारा करती हैं। सचिन पायलट राजस्थान विवाद के बाद भले ही शांत हो गए हों लेकिन राज्य लीडरशिप को लेकर उनकी नाराजगी जगजाहिर है। वहीं मिलिंद देवड़ा ने भी कुछ ऐसे बयान दिए जिससे उनकी नाराजगी दिखाई देती है। महाराष्ट्र में मिलिंद देवड़ा बीते कुछ साल से लगातार कांग्रेस की मौजूदा स्थिति पर सवाल उठाते हुए चिंता जाहिर करते रहे हैं और कुछ मौकों पर तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ भी कर चुके हैं।
कांग्रेस में आलाकमान के प्रति निष्ठा रखने वाले नेताओं को अहम जिम्मेदारियां मिलती हैं, जबकि जमीन से जुड़े नेताओं को दरकिनार किया जाता है। जो भी नेता पार्टी की नकारात्मक राजनीति के खिलाफ कुछ बोलने की हिम्मत करता है, उसकी आवाज दबा दी जाती है। इस कारण कई दिग्गज नेता पार्टी को अलविदा कर चुके हैं।
असम के लोकप्रिय नेता हेमंत बिस्वा शर्मा को भी मजबूर होकर पार्टी से निकलना पड़ा। यहां के बुजुर्ग कांग्रेसी नेता तरुण गोगोई के साथ मतभेदों के कारण उन्हों हाशिए पर डाल दिया गया था। 2001 से 2015 तक कांग्रेस के विधायक हेमंत बिस्वा शर्मा 2016 में बीजेपी में आ गए। राज्य में कांग्रेस को हराने में इनका अहम योगदान रहा है। हेमंत बिस्वा शर्मा अभी असम सरकार में मंत्री हैं।
हाल ही में 18 मई, 2022 को गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने कांग्रेस नेतृत्व पर तंज कसते हुए प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजे गए पत्र में लिखा कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में गंभीरता की कमी है जिससे हर राज्य की जनता ने कांग्रेस को रिजेक्ट किया है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस गुजरातियों का सिर्फ अपमान ही करती है। अनेक प्रयासों के बाद भी कांग्रेस पार्टी द्वारा देशहित एवं समाज हित के बिल्कुल विपरीत कार्य करने के कारण कुछ बातें आपके ध्यान में लाना बहुत आवश्यक हो गया है। पिछले लगभग 3 सालों में मैंने यह पाया है कि कांग्रेस पार्टी सिर्फ विरोध की राजनीति तक सीमित रह गई है, जबकि देश के लोगों को विरोध नहीं, एक ऐसा विकल्प चाहिए जो उनके भविष्य के बारे में सोचता हो, देश को आगे ले जाने की क्षमता रखता हो। हार्दिक पटेल ने पत्र में आगे लिखा कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम का मंदिर हो, CAA-NRC का मुद्दा हो, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाना हो अथवा जीएसटी लागू करने जैसे निर्णय हों, देश लंबे समय से इनका समाधान चाहता था और कांग्रेस पार्टी सिर्फ इसमें एक बाधा बनने का काम करती रही। हर मुद्दे पर कांग्रेस का स्टैंड सिर्फ केंद्र सरकार का विरोध करने तक ही सीमित रहा। कांग्रेस को लगभग देश के हर राज्य में जनता ने रिजेक्ट इसीलिए किया है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी और पार्टी का नेतृत्व जनता के समक्ष एक बेसिक रोडमैप तक प्रस्तुत नहीं कर पाया। कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में किसी भी मुद्दे के प्रति गंभीरता की कमी एक बड़ा मुद्दा है। मैं जब भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से मिला तो लगा कि नेतृत्व का ध्यान गुजरात के लोगों और पार्टी की समस्याओं को सुनने से ज्यादा अपने मोबाइल और बाकी चीजों पर रहा।
हाल ही में राजस्थान के उदयपुर में जारी चिंतन शिविर के बीच गांधी परिवार के करीबी ने कांग्रेस पार्टी का हाथ छोड़ दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुनील जाखड़ ने अपने आधिकारिक फेसबुक पेज से लाइव होकर कांग्रेस छोड़ने का ऐलान करते हुए पार्टी आलाकमान पर जमकर निशाना साधा। कांग्रेस में जातिगत समीकरण को ध्यान में रखकर की जा रही राजनीति पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि चापलूसों के साथ रहना आपको मुबारक हो, लेकिन फैसले तो लीजिए। उन्होंने कहा कि दिल्ली में बैठे कांग्रेसी नेताओं ने पंजाब में पार्टी को बर्बाद कर दिया। जाखड़ ने गुड लक और गुड बॉय कांग्रेस कहते हुए ट्विटर बायो से कांग्रेस का नाम हटा दिया।
राहुल गांधी की कोर टीम में शामिल उत्तर प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता आरपीएन सिंह यानी रतनजीत प्रताप नारायण सिंह मंगलवार, 25 जनवरी को बीजेपी में शामिल हो गए। बीजेपी में शामिल होने के बाद पूर्व केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने कहा कि यह मेरे लिए एक नई शुरुआत है। इसके लिए मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और मार्गदर्शन में राष्ट्र निर्माण में अपने योगदान के लिए तत्पर हूं। कुशीनगर के सैंथवार के शाही परिवार से आने वाले आरपीएन सिंह पूर्वांचल में एक बड़ा चेहरा माने जाते हैं। आरपीएन सिंह कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद और अनुभवी नेताओं में से एक थे और उनके बीजेपी का दामन थाम लेने से राहुल गांधी को बड़ा झटका लगा है।
मध्य प्रदेश में जनाधार वाले लोकप्रिय युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस की अनदेखी के कारण हाल ही में बीजेपी में शामिल हो गए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ राज्य के कई अन्य विधायक और युवा नेता भी बीजेपी का दामन थाम चुके हैं। इससे राज्य में कांग्रेस काफी कमजोर हो गई है।
जम्मू-कश्मीर के अंतिम महाराजा हरि सिंह के पौत्र और वरिष्ठ नेता डॉ. कर्ण सिंह के पुत्र विक्रमादित्य सिंह ने हाल ही में कांग्रेस को अलविदा कह दिया। पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देते हुए विक्रमादित्य सिंह ने कहा कि कांग्रेस जम्मू-कश्मीर के जमीनी मुद्दों से भटक चुकी है। उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि कांग्रेस जम्मू-कश्मीर के लोगों की भावनाओं और आकांक्षाओं को महसूस करने में असमर्थ है।
हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के काफी करीबी माने-जाने वाले पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया। सोनिया गांधी को लिखी चिट्ठी में उन्होंने कहा कि इस मामले पर विचार करने के बाद मैंने निष्कर्ष निकाला है कि वर्तमान परिस्थितियों में मैं पार्टी के बाहर रहकर समाज की ज्यादा सेवा कर पाऊंगा। उन्होंने लिखा है कि मैं 46 वर्षों के लंबे जुड़ाव के बाद पार्टी छोड़ रहा हूं। आशा करता हूं कि ऐसे परिवर्तनकारी नेतृत्व से प्रेरित होकर जनता के लिए अतिसक्रियता से काम करता रहूंगा जो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा दी गई उदारवादी लोकतंत्र की उच्च प्रतिबद्धता की परिकल्पना आधारित हो। अश्विनी कुमार का कांग्रेस से बाहर निकलना बताता है कि युवाओं के साथ पुराने नेताओं का भी पार्टी से मोहभंग हो रहा है।
पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने हाल ही में राज्य विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया। सोनिया और राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले अमरिंदर सिंह काफी दिनों से पार्टी ने नाराज चल रहे थे। अमरिंदर सिंह अब बीजेपी के साथ मिलकर पंजाब में विधान सभा चुनाव लड़ रहे हैं।
राहुल गांधी की कोर कमेटी में शामिल जितिन प्रसाद ने 9 जून, 2021 को कांग्रेस को जोरदार झटका दिया और बीजेपी में शामिल हो गए। यूपी में बड़े ब्राह्मण चेहरों में शामिल जितिन प्रसाद को योगी आदित्यनाथ के कैबिनेट में प्राविधिक शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है।
इसके पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय झा ने एक न्यूज वेबसाइट को दिए इंटरव्यू और लेख के जरिए कांग्रेस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा किया था। पार्टी की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करने पर उन्हें तत्काल प्रभाव से कांग्रेस प्रवक्ता पद से हटा दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया के अपने लेख और द प्रिंट को दिए इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है। संजय झा ने दावा किया कि पार्टी के पास एक आंतरिक मजबूत तंत्र नहीं है। उन्होंने लिखा है कि पार्टी के अंदर सदस्यों की बात नहीं सुनी जाती है। अपने लेख में झा ने यह भी कहा कि पार्टी सरकार के विफल होने पर लोगों को शासन का कोई वैकल्पिक विवरण प्रस्तुत नहीं कर सकती।
कांग्रेस की एक तेजतर्रार युवा प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी को भी पार्टी नेतृत्व की अनदेखी के कारण बाहर होना पड़ा। उन्हें पार्टी में दुर्व्यवहार का भी सामना करना पड़ा। आखिर में वे शिवसेना में शामिल हो गईं।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी एक समय पार्टी नेतृत्व की अनदेखी के कारण कांग्रेस छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा था। पार्टी में किनारे किए जाने पर ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बना ली थी। ममता बनर्जी के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी का राज्य से एक तरह से सफाया हो गया है।
वाईएस जगन मोहन रेड्डी वर्तमान में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। इनके पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी दो बार राज्य के सीएम रह चुके हैं। 2009 में वाईएस राजशेखर रेड्डी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु के बाद लोगों ने जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग की लेकिन पार्टी आलाकमान ने इसे ठुकरा दिया। आखिर में पार्टी से नाराज होकर इन्होंने 2010 में अलग पार्टी बना ली और आज राज्य में इनकी सरकार है।
अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष और सिलचर से पूर्व सांसद सुष्मिता देव ने अगस्त, 2021 में पार्टी छोड़ दिया है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की करीबी सुष्मिता देव ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस्तीफा देकर ट्विटर पर कांग्रेस की ‘पूर्व सदस्य’ लिख दिया। कांग्रेसी सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके संतोष मोहन देव की बेटी सुष्मिता असम चुनाव के समय से ही कांग्रेस नेतृत्व से नाराज चल रही थी।
हरियाणा में कांग्रेस के बड़े और युवा चेहरों में शुमार दिग्गज नेता अशोक तंवर भी 23 नवंबर, 2021 को पार्टी छोड़ टीएमसी में शामिल हो गए। राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले अशोक तंवर जाने से हरियाणा में कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली से विधायक अदिति सिंह ने पार्टी का हाथ छोड़ बड़ा झटका दिया। अदिति को राहुल-प्रियंका का करीब माना जाता था। लेकिन अदिति कांग्रेस के कार्यकलाप और पार्टी की नीतियों से नाराज चल रही थीं।
सोनिया-राहुल का नाममात्र योगदान, सिब्बल ने दिए सबसे ज्यादा
राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी और प्रियंका वाड्रा के इशारे पर नाचने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को शायद नहीं मालूम की पार्टी पर कुंडली जमाए बैठे परिवार का ही पार्टी में योगदान नाममात्र का है, वह तो इनके धन पर ही इनको पागल बनाकर राज कर रहा है।
भारतीय चुनाव आयोग (Election Commission) ने 2019-20 में कॉन्ग्रेस को मिले चंदे से जुड़ी एक रिपोर्ट पिछले दिनों जारी की थी। इससे पता चलता है कि अस्तित्व के संकट से जूझ रही कॉन्ग्रेस की वित्तीय हालत भी पतली है। पार्टी 2019-2020 में महज 139.01 करोड़ रुपए का ही चंदा जुटाने में सफल रही है। पिछले साल की तुलना में इस बार गिरावट आई है। इससे पहले पार्टी को कुल 146 करोड़ रुपए का चंदा प्राप्त हुआ था।
संबंधित कानूनों के प्रावधानों के तहत राजनीतिक दलों को हर साल लोगों, कंपनियों, इलेक्टोरल ट्रस्ट और संगठनों से मिले 20,000 रुपए से अधिक चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होती है।
ईसीआई साइट पर उपलब्ध कराए गए आँकड़ों के अनुसार, कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग को 30 दिसंबर, 2020 को जानकारी दी कि 2019-20 में पार्टी को 139 करोड़ रुपए का योगदान मिला है।
Congress’s contribution report for 2019-20 uploaded on the official ECI site
यह राशि 2018-19 में एकत्र की गई राशि की तुलना में कम है।
Congress’s contribution report for 2018-19 uploaded on the official ECI site
इस रिपोर्ट से यह बात भी सामने आई है कि पार्टी की स्थापना के बाद से ही इसका कमान सँभालने वाली गाँधी परिवार का योगदान इसमें नाममात्र ही है। अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने पार्टी फंड में 50,000 रुपए दिए हैं जबकि उनके बेटे और पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने 54,000 रुपए का ही योगदान दिया है।
दिलचस्प बात यह है कि पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं, जिन्होंने अगस्त 2020 में सोनिया गाँधी को पत्र लिखकर बड़े संगठनात्मक बदलावों की माँग की थी, ने पार्टी आलाकमान के बराबर या उनसे ज्यादा योगदान पार्टी फंड में दिया है।
कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और G-23 के सदस्य कपिल सिब्बल ने 2019-2020 के बीच पार्टी कोष में सबसे अधिक तीन करोड़ रुपए का योगदान दिया। कॉन्ग्रेस द्वारा चुनाव आयोग को सौंपी गई सूची में कपिल सिब्बल के अलावा, पार्टी फंड में योगदानकर्ता के रूप में जी -23 के अन्य पाँच सदस्य भी शामिल हैं। ‘जी23’ के अन्य सदस्यों में से आनंद शर्मा, शशि थरूर और गुलाम नबी आज़ाद ने 54-54 हजार रुपए, मिलिंद देवड़ा ने एक लाख रुपए और राज बब्बर ने एक लाख आठ हजार रुपए दिए हैं।
इसके अलावा, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी, स्वर्गीय मोतीलाल वोरा, स्वर्गीय अहमद पटेल, पूर्व केंद्रीय मंत्री परनीत कौर और अधीर रंजन चौधरी ने भी राहुल गाँधी जितना ही, यानी कि 54,000 का योगदान पार्टी फंड में दिया था।
मजेदार बात यह है कि पिछले साल मार्च में कॉन्ग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी वित्त वर्ष 2019-20 में पार्टी को 54 हजार रुपए दिए थे।
जिन कॉरपोरेट्स ने कॉन्ग्रेस पार्टी के फंड में योगदान दिया उनमें प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट (Prudent Electoral Trust) का 31 करोड़ रुपये का सबसे बड़ा योगदान है। उसके बाद बिजनेस हाउस आईटीसी (Business House ITC) ने 13 करोड़ रुपए और आईटीसी इन्फोटेक ने 4 करोड़ रुपए का दान किया है।
सिब्बल के बाद पी चिदम्बरम ने कहा : ‘जमीन पर जीरो है कांग्रेस’
एक पुरानी फिल्म "अदालत" का बहुचर्चित गीत "सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया..." कांग्रेस पर शत-प्रतिशत चरितार्थ हो रहा है। आज एक के बाद एक कांग्रेसी पार्टी के पतन पर जो चीख-पुकार कर रहे हैं, असली जिम्मेदार ये ही लोग हैं, जो सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटाकर सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के समय उठी आवाज़ को दबाने में परिवार की गुलामी करते हुए, विरोध स्वरों को मुखरित नहीं होने दिया। पार्टी में इतने दिग्गज नेता होते हुए गुलामों की भांति अनुभवहीन गाँधी परिवार की गुलामी करना कांग्रेस को भारी पड़ रहा है।
2004 में मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाए जाने का भी विरोध हुआ, लेकिन नगाड़े की आवाज़ में तूती की आवाज़ किसी ने नहीं सुनी। फिर 2014 में मोदी लहर को रोकने अरविन्द केजरीवाल को प्रोत्साहित करने पर भी विरोध को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। परिवार की गुलामी की पराकाष्ठा तो उस समय भी उजागर हो गयी थी, जब राहुल को अध्यक्ष बनाये जाने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था, "जितनी जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाइए।" किसी ने लेशमात्र भी मंथन करने का साहस नहीं किया कि आखिर किस कारण विपक्ष खेमे से राहुल के अध्यक्ष बनाये जाने की आवाज़ उठी है? कदम-कदम पर हिन्दू और हिन्दुत्व को नीचा दिखाना, इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने बेकसूर हिन्दू साधु और संतों को जेलों में डालना, जेलों में उन्हें प्रताड़ित करना, और भी अनेकों ऐसे कारण है जिनकी वजह से कांग्रेस की हालत चुनाव-दर-चुनाव पतली हो रही है।
हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनावों और कई राज्यों के उपचुनावों में लचर प्रदर्शन के बाद कांग्रेस पार्टी को अपने ही दिग्गज नेताओं से तीखी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। इस कड़ी में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल के बाद अब यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम ने बयान दिया है। उन्होंने कांग्रेस के नीतिगत ढाँचे की आलोचना करते हुए कहा कि पार्टी के प्रदर्शन में पिछले कुछ समय से लगातार गिरावट ही आई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को इतना साहसी बनना होगा कि गिरावट के उन कारणों को पहचाने और उन पर काम करे।
कांग्रेस नेता पी चिदंबरम की तरफ से यह प्रतिक्रिया बिहार विधानसभा और मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश उपचुनाव में दयनीय प्रदर्शन के बाद सामने आई है। चिदंबरम ने कहा कि कांग्रेस ने अपनी संगठनात्मक क्षमता से ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा। दैनिक भास्कर को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कांग्रेस के प्रदर्शन पर खुल कर आलोचना की। चिदंबरम ने कहा कि उपचुनाव इस बात प्रमाण हैं कि कांग्रेस की संगठनात्मक दृष्टिकोण से कोई पकड़ नहीं रह गई है। इतना ही नहीं जिन राज्यों में उपचुनाव हुए हैं उनमें कांग्रेस कमज़ोर ही हुई है।
महागठबंधन की हार अपना नज़रिया रखते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि महागठबंधन के जीतने की उम्मीदें थीं फिर भी हम जीतते जीतते हार गए। इन तमाम आलोचनात्मक दलीलों के बाद कांग्रेस पार्टी के लिए आशावादी नज़र आते हुए उन्होंने कहा कि कुछ ही समय पहले कांग्रेस ने हिन्दी बेल्ट 3 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में जीत हासिल की थी।
इसके बाद एआईएमआईएम और सीपीआई (एमएल) का उल्लेख करते हुए चिदंबरम ने कहा कि छोटे दल अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं क्योंकि इनकी ज़मीनी स्तर पर पकड़ बेहद मजबूत है। कांग्रेस, राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन की सबसे कमज़ोर कड़ी साबित हुई है। पार्टी को तमाम तरह के बदलावों की ज़रूरत है और ऐसे बदलाव नहीं होने की सूरत में राजनीतिक नुकसान बढ़ता ही जाएगा।
अंत में कांग्रेस नेता ने कहा कि पार्टी ने अपनी संगठनात्मक क्षमता से ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ा। यह एक बड़ा कारण था कि कांग्रेस इतनी कम सीटों पर जीत हासिल हुई जबकि भाजपा और उसके सहयोगी दल पिछले 20 वर्षों से चुनाव जीत रहे हैं। पार्टी को सिर्फ 45 उम्मीदवार उतारने चाहिए थे, शायद तब बेहतर नतीजे हासिल होते। इसके ठीक पहले कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने भी संगठन के शीर्ष नेतृत्व पर कई सवाल खड़े किए थे।
उनका कहना था कि हार दर हार के बाद पार्टी के नेतृत्व ने इस प्रक्रिया को अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लिया। कपिल सिब्बल के इस बयान पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सलमान खुर्शीद ने आलोचना की थी। इन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि पार्टी के भीतर रह कर पार्टी को नुकसान पहुँचाने वाले नेता खुद बाहर चले जाएं। इसके अलावा लोकसभा में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन ने भी कपिल सिब्बल के बयान पर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा था कि कपिल सिब्बल को पार्टी छोड़ ही देनी चाहिए।
‘गड़बड़ी सब को पता, जवाब भी सबके पास… लेकिन नेतृत्व को लगता है कि सब ठीक है’: कपिल सिब्बल, कांग्रेस वरिष्ठ नेता
चलो देर आए, दुरुस्त आए। वास्तव में कांग्रेस का पतन उसी दिन से शुरू हो गया था, जिस दिन तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंक, सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बना दिया गया था। उसे भी बर्दाश्त किया गया, लेकिन अयोध्या में राममंदिर मुद्दे पर जनता को भ्रमित करने के साथ-साथ कोर्ट को भी भ्रमित कर हिन्दू-मुस्लिम विवाद करवाया जाता रहा, राम को काल्पनिक बता दिया, रामसेतु को तुड़वाने का कितनी बार प्रयास किया, किसी से नहीं छुपा। हिन्दू-विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता रहा। दूसरे, सोने पे सुहागा, राहुल को अध्यक्ष बना दिया गया, राहुल से हो रहे नुकसान को नज़रअंदाज़ गुलामों की भांति प्रियंका को भी पार्टी में उच्च स्थान देकर धरातल में धंसने को और सुगम कर दिया। राहुल को अध्यक्ष बनाए जाने पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हवा में नहीं बोला था, कि "जितनी जल्दी हो, राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाइए।", परिणाम दुनिया के सम्मुख है।
बिहार और देश के अन्य हिस्सों में हुए उपचुनावों में कांग्रेस की हार के बाद अब एक बार फिर से पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि न सिर्फ बिहार, बल्कि देश के जिन भी हिस्सों में चुनाव हुए – उनके परिणामों से स्पष्ट है कि जनता ने कॉन्ग्रेस को एक प्रभावशाली विकल्प के रूप में देखना ही बंद कर दिया है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे 2019 लोकसभा चुनाव और 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने क्लीन स्वीप किया।
उन्होंने उत्तर प्रदेश की बात करते हुए कहा कि वहाँ हुए चुनावों में कांग्रेस 2% वोट पाने में भी नाकाम रही। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मनोज सीजी के साथ इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि गुजरात में कांग्रेस के 3 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। उनका कहना है कि ये सब अप्रत्याशित नहीं था, बल्कि पहले से दिख रहा था। उन्होंने बताया कि CWC के एक सदस्य ने कहा भी कि वो आशा करते हैं कि पार्टी आत्ममंथन करेगी।
After the Congress' performance in Bihar elections, party veteran Kapil Sibal said the people of the country did not consider Congress to be an "effective alternative" anymore.https://t.co/DZccWHw8ma
— News18.com (@news18dotcom) November 16, 2020
When the party's own senior leaders starts speaking openly showing their disappointment then the party is in trouble and has to take major calls to revive itself.. How can a party revive India when it can't revive effectively itself
— Bhuban Patnaik (@Bhuban64039498) November 16, 2020
कपिल सिब्बल ने पूछा कि जब पिछले 6 वर्षों से कांग्रेस पार्टी ने आत्ममंथन नहीं किया तो अब कौन आशा करे कि वो ऐसा करेगी? उन्होंने कहा कि संगठनात्मक रूप से पार्टी में क्या गड़बड़ी है, ये सभी को पता है। उन्होंने कहा कि जवाब भी सबके पास है, कांग्रेस भी जानती है – लेकिन वो ऐसा स्वीकार नहीं करना चाहती। उन्होंने कहा कि अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो कांग्रेस पार्टी का ग्राफ यूँ ही गिरता चला जाएगा।
उन्होंने कहा कि समस्याओं के समाधान में CWC हिचक रही है, क्योंकि ये एक नॉमिनेटेड बॉडी है। उन्होंने कांग्रेस के संविधान का हवाला देते हुए कहा कि CWC के चयन के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि CWC के नॉमिनेटेड सदस्यों से समस्याओं पर आवाज़ उठाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। 22 नेताओं द्वारा नेतृत्व को पत्र लिख कर बदलाव की माँग पर उन्होंने कहा कि पार्टी में अपने विचार रखने के लिए कोई फोरम ही नहीं है।
उन्होंने उत्तर प्रदेश-बिहार जैसे बड़े प्रदेशों में कांग्रेस के विकल्प न बन पाने पर अफ़सोस जताते हुए कहा कि मध्य प्रदेश में भी 28 में से कांग्रेस के 8 उम्मीदवार ही जीत पाए। उन्होंने चेताया कि कांग्रेस पार्टी को बहादुर बन कर समस्या को पहचानना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब हमने सुझाव दिए तो नेतृत्व ने पीठ दिखा दिया, इसीलिए आज ये हालत हो रही है। उन्होंने कहा कि अगर नेताओं को सुनना बंद कर दिया जाता है तो संचार ठप्प हो जाता है।
उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि मेनस्ट्रीम मीडिया को सत्ताधारी पार्टी ने नियंत्रण में रखा हुआ है। उन्होंने लोगों तक पहुँचने के लिए नए माध्यम की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि फ़िलहाल हम सोशल मीडिया पर अच्छा कर रहे हैं, लेकिन जमीन पर उसके परिणाम नजर नहीं आ रहे। उन्होंने ऐसे नेताओं को आगे करने पर जोर दिया, जिन्हें लोग सुनना चाहते हों और जो सक्रिय रूप से सोच-विचार कर नेतृत्व करें।
उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व फ़िलहाल क्या सोच रहा है, ये उन्हें नहीं पता है, क्योंकि उन्हें नेतृत्व के आसपास के लोगों से ही ये बातें सुनने को मिलती हैं। कपिल सिब्बल ने कहा कि ताज़ा चुनावों में हार के बाद अब तक कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व ने नेताओं से कुछ नहीं कहा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इसे ‘जैसा चल रहा है, चलने दो’ की तरह ले रही है। उन्होंने कहा कि नेतृत्व को लगता है कि सब ठीक है।
हाल ही में बिहार में कांग्रेस विधायक दल का नेता बनने के लिए दो विधायकों के समर्थक बैठक में भिड़ गए थे। पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं द्वारा अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिखने की बात भी सामने आई थी। इसमें कहा गया कि कांग्रेस कार्यसमिति की तुरंत बैठक बुलाकर बिहार में चुनावी असफलता पर चर्चा की जाए। पत्र में पार्टी में संगठनात्मक चुनाव की भी माँग की गई। सीडब्ल्यूसी के पाँच सदस्यों ने इस पत्र के लिखे जाने की पुष्टि की है।
दलाल भगाओ, कांग्रेस बचाओ
बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 19 सीटें मिलीं, जिसके बाद पार्टी में आंतरिक कलह भी शुरू हो गया है। आम कार्यकर्ता नाराज़ हैं और वो पार्टी के ही कुछ नेताओं के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए उन्हें हार के लिए जिम्मेदार बता रहे हैं। पार्टी के बड़े नेताओं के खिलाफ बयानबाजी जारी है। अब पटना में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गया है। कहा जा रहा है कि बिहार में पार्टी के बड़े नेताओ ने टिकट-वितरण में धाँधली की।
अखिल भारतीय किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय संयोजक और बिहार प्रभारी राजकुमार शर्मा के नेतृत्व में पार्टी के पटना स्थित बिहार मुख्यालय ‘सदाकत आश्रम’ में ‘कांग्रेस बचाओ दलाल भगाओ’ महाधरना का आयोजन किया गया। जिन नेताओं पर धाँधली के आरोप लगाए गए, वो हैं – प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल, चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह, प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा, सदानंद सिंह और स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष अविनाश पांडे।
पटना में पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ कुछ पूर्व विधायकों ने भी इस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेते हुए आरोप लगाए। उनका कहना था कि जयंती झा और मुर्तज़ा अली जैसे नेता पिछले 3-4 दशकों से सक्रिय हैं, लेकिन उन्हें टिकट नहीं दिया गया और उनकी जान चली गई। मोटी रकम लेकर उसके एवज में दल-बदलू उम्मीदवारों को टिकट देने के आरोप लगे हैं। कई जिलों में कांग्रेस एक अदद सीट को तरस गई, जिससे कार्यकर्ता नाराज़ हैं।
कार्यकर्ताओं ने पूछा कि प्रदेश में कांग्रेस का खात्मा करने वाले नेताओं ने बूथ, पंचायत, ब्लॉक, जिला और प्रदेश स्तर तक कमेटी क्यों नहीं बनाई? उनका आरोप है कि कई क्षेत्रों में तो दूसरे दलों के प्रत्याशियों को जिताने के लिए कमजोर कैंडिडेट खड़े किए गए। राजकुमार शर्मा का कहना है कि भाजपा के दबाव में ऐसा किया गया। उन्होंने बिहार कांग्रेस के बड़े नेताओं पर कार्रवाई की माँग करते हुए कहा कि उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए आलाकमान को गुमराह किया है। पटना के इस प्रदर्शन में कांग्रेस के कई कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लगा।
#WATCH: RJD leader Shivanand Tiwari speaks on #BiharResults, says "...elections were in full swing & Rahul Gandhi was on picnic at Priyanka ji's place in Shimla. Is party run like that? Allegations can be levelled that manner in which Congress is being run, it's benefitting BJP." pic.twitter.com/ZZXmndMJFh
— ANI (@ANI) November 15, 2020
No to blame Pappu as he just utilizing or spending the wealth his family earned in all these years. And as far as elections they debuted there servants to campaigning on behalf of them..
— Laxmikant Karwa 🇮🇳🇮🇳 (@LKK0209) November 15, 2020
Congress party under Rahul and Priyanka pic.twitter.com/gjdp6EyiMw
— Girish (Headhunter) (@girishs2) November 15, 2020
यह पहले भी साबित हो चुका है
— Babjipv (@pvbabji) November 15, 2020
😜😜😜ENJOY THE VDO 😜😜😜 pic.twitter.com/SFR9gt8fOM
पप्पू गांधी के बारे में लालू प्रसाद यादव पहले से ही जानते हैं और खुलकर कहते भी हैं लेकिन तुम ही गलत उम्मीद लगाते हो तो किसका दोष?? pic.twitter.com/fuwr1rZGKe
— दलीप पंचोली🇮🇳 (@DalipPancholi) November 15, 2020
उधर राजद ने भी कांग्रेस को ही अपनी हार का जिम्मेदार ठहराया है। राजद के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने याद दिलाया कि कैसे कपिल सिब्बल, मुकुल वासनिक, शशि थरूर और मनीष तिवारी जैसे नेताओं ने नेतृत्व को चिट्ठी लिखी थी, पार्टी की हालत को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने इन नेताओं को कांग्रेस का वफादार और आजीवन कांग्रेसी करार दिया और नेतृत्व से कहा कि आप इस तरह से पार्टी नहीं चला सकते हैं।
शिवानंद तिवारी ने कहा कि बिहार में चुनाव हो रहा है और राहुल गाँधी अपनी बहन प्रियंका गाँधी के शिमला वाले घर पर जाकर पिकनिक मना रहे हैं, क्या ऐसे पार्टी चलाई जाती है? उन्होंने कहा कि इन चीजों से उन आरोपों को बल मिलता है कि कांग्रेस पार्टी जिस तरह से अपना ‘कारोबार’ चला रही है, उससे भाजपा को ही मदद मिल रही है। कांग्रेस अब अपने गठबंधन साथियों और अपने ही पार्टी नेताओं के आरोपों से जूझ रही है।
जनेऊधारियों के साथ जाने से यही होता है: गुलाम नबी पर ओवैसी का तंज

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
अध्यक्ष पद को लेकर कांग्रेस के भीतर की कलह खुलकर सामने आ चुकी है। पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने जिस लहजे में अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखा। और फिर जिस तेजी से कई मुख्यमंत्रियों समेत दिग्गज कांग्रेसियों ने सोनिया और राहुल गांधी के नेतृत्व में भरोसा जताया, उससे साफ है कि पार्टी में दो गुट बन चुके हैं। कांग्रेस का एक गुट जहां सोनिया गांधी को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने के पक्ष में है, तो वहीं दूसरा गुट राहुल गांधी को ही अगले अध्यक्ष के रूप में देखना चाहता है। उधर प्रियंका गांधी कह चुकी हैं कि कोई गैर गांधी अब पार्टी का मुखिया बनना चाहिए।
थोड़ा पीछे मुड़कर देखने ज्ञात होगा की कांग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर उठा मुद्दा कोई नया नहीं है। पूर्व में भी कई बार उठा था मामला, लेकिन ठंठे बस्ते में डाल दिया गया। सोनिया के नेतृत्व में कमजोर पड़ रही पार्टी को नया जोश देने के लिए राजेश पायलट और माधवराव सिंधिया का कई बार नाम उछला, लेकिन विपक्ष कमजोर होने के कारण दोनों में से किसी के हाथ अध्यक्ष पद नहीं आया और परिवार की गुलामी कर रहे नेताओं की जीत निश्चित होती रही। उस समय विपक्ष कमजोर था और मौके को भुना न सका, परन्तु आज स्थिति एकदम विपरीत है।
दूसरे, कांग्रेस को भी अच्छी तरह आभास हो चूका है कि पार्टी पंचायत, नगर निगम और बहुत से बहुत विधानसभा तक सीमित रह गयी है। और कई क्षेत्रों में तो दलीय पार्टियों से भी कमजोर। दरअसल, सोनिया गाँधी ने अपने आगे, कभी किसी की नहीं सुनी।

"बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होएं" अर्थात 2014 में मोदी लहर को रोकने के लिए जब सोनिया अपनी सलाहकार समिति के सदस्यों--अरविन्द केजरीवाल, योगेंद्र यादव, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, प्रशांत भूषण आदि को तन, मन और धन से आम आदमी पार्टी के रूप में चुनावी मैदान में उतारने के लिए कटिबद्ध थी--उस समय पार्टी के बुद्धिजीवी वर्ग ने विरोध किया था, लेकिन सोनिया के दिमाग में तो खिचड़ी सरकार घूम रही थी।(उस समय एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते शीर्षक "कांग्रेस के गर्भ से निकली आप" और "कांग्रेस और आप का Positive DNA" लेख लिखा था।) चुनाव परिणाम आने पर बाज़ी पलट गयी, वहीं से कांग्रेस उस पतन मार्ग पर अग्रसर हो गयी, जहाँ से वापसी की दूर तक कोई सम्भावना नहीं। देखा जाए तो बीजेपी से कहीं अधिक कांग्रेस को नुकसान केजरीवाल की पार्टी ने पहुँचाया है। देख लो किसी भी चुनाव के नतीजे। कांग्रेस को मिलने वाला 90 प्रतिशत वोट आप को मिला। हालांकि दिल्ली और पंजाब के अलावा कई स्थानों पर NOTA आप से आगे रहा। यानि राज्यों ने आप को ठुकरा जरूर दिया, लेकिन तब भी कांग्रेस को ही नुकसान पहुँचाया। सोनिया को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने की अपील
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक से कुछ घंटे पहले मध्य प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने सोनिया गांधी को पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने की बात कही। दोनों नेताओं ने एक के बाद एक ट्वीट कर अपना समर्थन जताया। कमलनाथ ने ट्वीट किया, ”सोनिया गांधी के नेतृत्व पर कोई भी सुझाव या आक्षेप बेतुका है। मैं सोनिया गांधी से अपील करता हूं कि वे अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस पार्टी को मजबूती प्रदान करें और कांग्रेस का नेतृत्व करें।”
मुझे इंदिरा गांधी जी , संजय गांधी , राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ काम करने का सौभाग्य मिला है। मुझे लगभग 40 वर्षों तक , लंबे समय के रूप में संसद सदस्य के रूप में कांग्रेस पार्टी की सेवा करने का सौभाग्य मिला है।— Office Of Kamal Nath (@OfficeOfKNath) August 23, 2020
1/3
मैं कई वर्षों तक अ.भा.कांग्रेस पार्टी का महासचिव भी रहा।— Office Of Kamal Nath (@OfficeOfKNath) August 23, 2020
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि श्रीमती सोनिया गांधी के खिलाफ तमाम झूठी अफवाहों के बावजूद उन्होंने 2004 में कांग्रेस पार्टी की जीत का नेतृत्व किया और अटल बिहारी वाजपेयी को घर पर बैठाया।
2/3
सोनिया जी का नेतृत्व सर्व मान्य है। यदि सोनिया जी कॉंग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ना ही चाहती हैं तो राहुल जी को अपनी ज़िद छोड़ कर अध्यक्ष का पद स्वीकार कर लेना चाहिए। देश का आम कॉंग्रेस कार्यकर्ता और किसी को स्वीकार नहीं करेगा।२/२— digvijaya singh (@digvijaya_28) August 23, 2020
पार्टी ना हुए बपौती हो गई , मा नहीं ती बेटा बेटा नई तो मा , आरे दिग्गी राजा जारा गिरेबान में झांक यही के पाप की सजा यही मिल जानी होती है , बुढ़ापे में चमचागिरी शोभा नहीं देती । pic.twitter.com/m3rue6fqTH— डॉ दीपक पाण्डेय (@gumptionguye) August 23, 2020
दिग्विजय सिंह ने कहा कि वह नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस की कल्पना नहीं कर सकते हैं और पार्टी का एक साधारण कार्यकर्ता किसी और को पार्टी अध्यक्ष के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, “सोनिया गांधी का नेतृत्व सर्वमान्य है। यदि सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ना ही चाहती हैं तो राहुल गांधी को अपनी जिद छोड़कर अध्यक्ष का पद स्वीकार कर लेना चाहिए। देश का आम कांग्रेस कार्यकर्ता और किसी को स्वीकार नहीं करेगा।”
पीएम मोदी पर व्यक्तिगत हमले को लेकर मतभेद
मई 2019 में लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद राहुल ने जिस कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अध्यक्ष पद से इस्तीफे की घोषणा की थी और उसकी एक और मीटिंग इस साल जून में हुई थी। तब कुछ सदस्यों ने राहुल से दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभालने का निवेदन किया था। राहुल ने दोनों मौकों पर पार्टी के दिग्गजों को कहा कि वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला नहीं करना चाहते हैं और वो ऐसा करने से डरते हैं।
पीएम मोदी को निशाना बनाने की रणनीति फेलराहुल की इन टिप्पणियों से कई नेताओं को आघात पहुंचा और उन्होंने कहा कि मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के खिलाफ 2014 से ही मिल रही लगातार हार के बावजूद कांग्रेस पार्टी की रणनीति की समीक्षा नहीं की गई है। उन बुजुर्ग नेताओं ने अपने बचाव में कहा कि मोदी पर व्यक्तिगत हमला करने और राफेल जैसे तथाकथित घोटालों को उठाने की रणनीति बुरी तरह नाकाम रही है। वरिष्ठ नेताओं का मत है कि मोदी को हर वक्त निशाना बनाने की जगह मुद्दे के आधार पर घेरने की कोशिश होनी चाहिए।
कपिल सिब्बल ने ट्विटर के जरिए कांग्रेस के प्रति अपने सेवा और भक्ति के बारे में ट्विटर पर लिखा है, “राहुल गाँधी कहते हैं कि हमारी बीजेपी के साथ साँठ-गाँठ है, राजस्थान हाईकोर्ट में पार्टी को सफलता दिलाई। मणिपुर में बीजेपी के खिलाफ पूरी ताकत से पार्टी का बचाव किया। पिछले 30 सालों में बीजेपी के पक्ष में एक भी बयान नहीं दिया। फिर भी हम पर बीजेपी से साँठ-गाँठ का आरोप लग रहा है।”
वहीं, कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कार्यकारिणी की बैठक में कहा है कि अगर राहुल गाँधी इन आरोपों को प्रमाणित कर सकते हैं तो वे इस्तीफा दे देंगे। गौरतलब है कि कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद उन 23 नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमिटी से पहले पत्र लिखा था।
जनेऊधारियों के साथ जाने से यही होता है: गुलाम नबी पर ओवैसी का तंज
राहुल गाँधी द्वारा कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पर भाजपा से मिलीभगत होने के आरोप के बाद कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने अपना इस्तीफा देने तक की बात कही। इसके बाद AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने गुलाम नबी आजाद पर कटाक्ष करते हुए ट्वीट किया है।
ओवैसी ने अपने ट्वीट में लिखा, “आदर्श न्याय, गुलाम नबी साहब मुझ पर यही आरोप लगाते थे। अब आप पर भी यही आरोप लगा है। 45 साल की गुलामी सिर्फ इसलिए? अब ये साबित हो गया है कि जनेऊधारी लीडरशिप का विरोध करने वाला बी-टीम ही कहलाया जाएगा। मुझे उम्मीद है कि मुस्लिम समुदाय के लोग समझेंगे कि कांग्रेस के साथ रहने से क्या होता है।”
ओवैसी के इस तंज में दम है, जहाँ नेता कोट पर जनेऊ पहने, सत्ता में रहते हिन्दू होते हुए जो "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" कर हिन्दुत्व को अपमानित करने वाले जब अपनी जीत के लिए यज्ञ करवाते हों, अपने ही भगवान श्रीराम को काल्पनिक कहा जाता हो, खुदाई में मिले मन्दिर के सबूतों को कोर्ट से छुपाया जाता हो, उस पार्टी का न कोई ईमान है और न ही कोई धर्म। अयोध्या में श्रीराम मन्दिर पता नहीं कब का बन गया होता, अगर कांग्रेस और वामपंथियों ने हिन्दुओं की जीत में अवरोध न किये होते। फिर मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि की भी अयोध्या जैसी ही स्थिति करने वाली कांग्रेस ही है। 1964 तक आये छह के छह निर्णय श्रीकृष्ण मंदिर के पक्ष में आने के बावजूद मुस्लिम वोट बैंक के हाथ से निकल जाने के डर से कांग्रेस ईदगाह हटाने में नाकाम रही।
ओवैसी का ट्वीट करना ही था कि ट्विटर पर ही प्रवचन शुरू हो गएPoetic Justice: @ghulamnazad GHULAM NABI sb u'd accused me of exactly this. Now you're accused of the same. 45 years of ghulami for this? Now it's proven that anyone opposing Janeudhari leadership will be branded B-Team I hope Muslims now know the high cost of loyalty to Congress https://t.co/cdodv5x7B4— Asaduddin Owaisi (@asadowaisi) August 24, 2020
असद साहब अपना काम ही तो कर रहे है उन जुम्मन मिया को आईना दिखाने का पहले ओवैसी बीजेपी एजेंट था अब कांग्रेस के 23सीनियर नेता भी बीजेपी एजेंट होगए कांग्रेस पार्टी से राहुल गाँधी को निकाल दो देखलेना कांग्रेस के अच्छे दिन आजाएगे नहीं तो कांग्रेस पार्टी को टूटना चाहिए— indian (@fk3569821) August 24, 2020
Never. It was misinformation spread by media houses encouraging dissent within congress. Infact media houses have colluded with BJP to weaken congress from within.— جاوید سوری Javed Suri (@JavedSuri) August 24, 2020
Exclusive political party for Muslims is beyond imagination our leadership should emerge from secular front.
He is literally intellectual apart of his highly obsession with his religion.— KIRAN CHOUDHARY (@prosaicMist) August 24, 2020
Dear Cong sleeping cell, accusing @asadowaisi as a BJP agent will not sort out your burning home. First give clarification of an internal drama happening in the party.— Gufran غفران اؔعظمی (@gufran_aazmi) August 24, 2020
Every supporter has the right to know from you, more than sold news reporters.
Mr. Owaisi.— . (@OfficialMohd1) August 24, 2020
Spread awareness nationwide and let people knows their constitutional power and practice their democratic right by electing a Muslim Leader for Muslims.
Now time has come to form a Nationwide Party who can represent Muslims strongly in Parliament.
1947 me 1 partition hua tha... If you don't know... And uss partition me India ne bohat saare areas ko Muslims ko diya tha.— Nisarg Dhamecha (@nisargdhamecha7) August 24, 2020
So, obviously Hindus were in overwhelming majority in India since then.
And secondly, look at the fertility rates of various communities in India...
Kerala's 55% Hindu and 20% Christian and it's because of those religions that the overall Fertility rate of Kerala is low.— Nisarg Dhamecha (@nisargdhamecha7) August 24, 2020
And J&K has only about 80 lakh Muslims. It's 30% Hindu. And it's the Hindus who have lower fertility rate than Muslims in J&K too! pic.twitter.com/oTPUmNvSBr
Dr., Look at the whooping difference in fertility rates of the 2 communities in WB, Assam, Bihar, UP, Jharkhand. These are the states with actually high number of Muslims and not just in Percentage.— Nisarg Dhamecha (@nisargdhamecha7) August 24, 2020
Atleast, acknowledge the reality.
Owasiji ki pro level beizzatti .. Yeh kya hua...— fida saxena (@saxenafida) August 24, 2020
दरअसल अगस्त 24 की सुबह ही राहुल गाँधी ने कांग्रेस CWC की बैठक में कथित तौर पर आरोप लगाया कि कांग्रेस के नेतृत्व में बदलाव की माँग करने के लिए लिखे गए इस इस पत्र के पीछे कांग्रेस के नेताओं का भाजपा से साँठ-गाँठ है। राहुल गाँधी के इस बयान से कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद ने खुलकर अपनी नाराजगी प्रकट की है। गुलाम नबी आजाद ने इस्तीफे तक की बात कह डाली।
इस पर कपिल सिब्बल ने ट्विटर के जरिए कांग्रेस के प्रति अपने सेवा और भक्ति के बारे में ट्विटर पर लिखा है, “राहुल गाँधी कहते हैं कि हमारी बीजेपी के साथ साँठ-गाँठ है, राजस्थान हाईकोर्ट में पार्टी को सफलता दिलाई। मणिपुर में बीजेपी के खिलाफ पूरी ताकत से पार्टी का बचाव किया। पिछले 30 सालों में बीजेपी के पक्ष में एक भी बयान नहीं दिया। फिर भी हम पर बीजेपी से साँठ-गाँठ का आरोप लग रहा है।”
वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने CWC की बैठक के दौरान ही यह ट्वीट किया है। लेकिन, इसके कुछ ही देर बाद एक और ट्वीट में कपिल सिब्बल ने लिखा कि उन्होंने राहुल गाँधी से इस बारे में ग़लतफ़हमी को दूर कर लिया है और वह ट्वीट वापस लेते हैं।
कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कार्यकारिणी की बैठक में कहा है कि अगर राहुल गाँधी इन आरोपों को प्रमाणित कर सकते हैं तो वे इस्तीफा दे देंगे। गौरतलब है कि कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद उन 23 नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमेटी से पहले पत्र लिखा था।
अवलोकन करें:-
अगस्त 24, 2020 को हुई इस बैठक में इस पत्र को लेकर काफी विवाद हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की पेशकश की। हालाँकि, कई वरिष्ठ नेताओं ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। साथ ही, यह पत्र लिखने वालों पर राहुल गाँधी ने अपना गुस्सा व्यक्त किया और इसकी टाइमिंग पर सवाल खड़े किए।















