Showing posts with label #Economic Survey. Show all posts
Showing posts with label #Economic Survey. Show all posts

दिल्ली : सरकार के ही सर्वे खोल रहे पोल ; पानी संकट के लिए केजरीवाल सरकार ही जिम्मेदार : न सप्लाई करने की क्षमता बढ़ाई, न पानी सफाई की क्षमता बढ़ाई, न सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बनाए, न दिया बजट

अपनी कमियों का ढीगरा दूसरों पर फोड़ने की बजाए, पानी अनशन पर बैठी पानी मंत्री आतिशी मार्लेना अनशन स्वांग को छोड़ धरातल पर काम करो। तुम्हारी अपनी ही सरकार के सर्वे ही तुम्हारी लापरवाही की पोल खोल रही है। और आरोप हरियाणा पर लगा रही हो। पूर्व मुख्यमंत्रियों मदन लाल खुराना से लेकर शीला दीक्षित द्वारा water treatments पर जितना काम हुआ है, अगर उसी पर नियमित काम किया होता, यह समस्या नहीं होती। दोनों मुख्यमंत्रियों ने विरोधियों के सरकारें होते हुए भी कभी इस तरह की किल्लत नहीं होने दी। दिल्लीवासियों को बताओ वाटर ट्रीटमेंट में कितनी मिट्टी जमा है? क्यों नहीं नियमित रूप से उनकी सफाई करवाई जाती? यमुना की सफाई छोड़ो, water treatments की ही सफाई करवा लो। जब तक तुम्हारी सरकार धरातल पर काम नहीं करेगी, कोई सरकार इस समस्या को दूर नहीं कर सकती। शर्म करो जनता पानी को तरस रही है और तुम अनशन की नौटंकी कर रही हो। अगर शर्म हो अनशन से उठो और water treatments की सफाई करवाओ। देखो दो दिन में समस्या का समाधान हो जाएगा।    

भीषण गर्मी के बीच देश की राजधानी दिल्ली जल संकट से जूझ रही है। देश की राजधानी में रहने वाली जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा चिलचिलाती धूप के बीच पानी के लिए तरस रहा है। दिल्ली के VIP इलाकों में भी पानी के टैंकरों के पीछे-पीछे बच्चे और बूढ़े तक भाग रहे हैं। दिल्ली जल बोर्ड की तरफ से आने वाला पानी गंदा है। दरअसल, यह पूरी अव्यवस्था की स्थिति क्यों है, इसकी पोल अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार के खुद के दस्तावेज खोलते हैं।

केजरीवाल सरकार द्वारा जनता में रखे गए कागज ही बताते हैं कि बीते 9-10 वर्षों में दिल्ली में पानी की आपूर्ति बढ़ाने पर कोई काम नहीं हुआ है। दिल्ली पानी आपूर्ति पर किए जाने वाले खर्चे भी कमी कर दी गई है। उस पर जितने खर्चे की योजना बन रही है, उसका आधा ही पैसा उसे दिया जा रहा है। इस बीच दिल्ली की जनसंख्या बढ़ती जा रही है।

पानी आपूर्ति बढ़ाने पर कोई काम नहीं

राजधानी में पानी की माँग भी इन वर्षों में लगभग 30% तक बढ़ गई है, लेकिन धरना-प्रदर्शन वाली सरकार जमीन पर कुछ भी नहीं कर पाई है। अरविन्द केजरीवाल की सरकार के दावों की पोल उन्होंने खुद दिल्ली के आर्थिक सर्वे में खोली है। इस आर्थिक सर्वे में कई चौंकाने वाले खुलासे हैं।

दूसरे राज्यों पर अपनी नाकामी का ठीकरा फोड़ने वाले केजरीवाल ने 2015 में स्थायी रूप से सत्ता में आने के बाद से दिल्ली में जल आपूर्ति क्षमता में कोई वृद्धि नहीं की है। इस क्षेत्र में उनका काम एकदम नगण्य है। उनसे पहले सत्ता में रहने वाली शीला दीक्षित के मुकाबले वह कहीं नहीं ठहरते।

दिल्ली को अलग-अलग स्रोतों पानी से मिलता है और इसे ट्रीटमेंट प्लांट में साफ करके भेजा जाता है। दिल्ली सरकार का 2023-24 का आर्थिक सर्वे बताता है कि वर्ष 2006 में दिल्ली में इस पानी साफ करने की क्षमता कुल 650 मिलियन गैलन/दिन थी। यह शीला दीक्षित सरकार के दौरान यह प्रति वर्ष बढ़ रही थी।

वर्ष 2015 तक आते आते यह क्षमता 906 मिलियन गैलन/दिन हो चुकी थी। यानी 2006 से 2013 के बीच दिल्ली में पानी साफ करने की क्षमता में 39% बढ़ोतरी हुई थी। इसके बाद केजरीवाल सत्ता में आ गए और मुफ्त पानी का वादा भी किया। 2015 के बाद से 2024 तक लगातार केजरीवाल लगातार सत्ता में हैं।

                                                                                                            BG साभार: oneindia

उनके शासनकाल के दौरान दिल्ली की पानी साफ करने की क्षमता में मात्र 40 मिलियन गैलन/दिन की वृद्धि हुई और यह क्षमता 946 मिलियन गैलन/दिन पहुँच पाई। यानी जहाँ 2006-15 के बीच वृद्धि 39% हुई थी तो वहीं 2015-2024 में यह मात्र 4% रह गई। ऊपर दिए गए ग्राफ से यह तुलना आसानी से समझी जा सकती है।

पानी की माँग 9 सालों में 26% बढ़ी

केजरीवाल सरकार की इस शिथिलता का खामियाजा दिल्लीवासियों को भुगतना पड़ रहा है। केजरीवाल सरकार की इस नाकामी के बीच दिल्ली में पानी की माँग प्रति वर्ष बढ़ती जा रही है। दिल्ली में वर्ष 2006 में पानी की माँग 963 मिलियन गैलन/दिन थी, यह 2015 तक बढ़ कर 1020 मिलियन गैलन/दिन हो गई। 2023-24 के लिए दिल्ली की पानी माँग और बढ़ कर 1290 मिलियन गैलन/दिन हो चुकी है।
                                                                                                        BG साभार: The Hans India
ऐसे में साफ़ होता है कि जहाँ 2015 में दिल्ली पानी की रोजाना माँग का 94% पानी साफ करने की क्षमता उसके पास थी तो वहीं 2024 तक आते-आते यह 73% हो चुकी है। यानी दिल्ली वर्तमान में जितना पानी चाहती है, उतना पानी साफ करने की उसके पास क्षमता नहीं है। वर्तमान में दिल्ली की एक चौथाई पानी की माँग पूरे करने के साधन उसके पास नहीं हैं। दिल्ली की केजरीवाल सरकार इसका इलाज करने के बजाय अपने मंत्रियों को धरने पर बिठाने और दूसरे राज्यों पर दोष डालने में लगी हुई है।

सीवर ट्रीटमेंट क्षमता पर भी काम नहीं

केजरीवाल सरकार ने पानी साफ करने की क्षमता बढ़ाने पर तो नहीं ही काम किया, उन्होंने दिल्ली से निकलने वाले सीवरेज को साफ करने पर भी कोई ध्यान नहीं दिया। दिल्ली के सभी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की कुल क्षमता कमोबेश उतनी ही है, जितनी वह 2015 में हुआ करती थी। 2006 में दिल्ली के सभी सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की कुल क्षमता 512 मिलियन गैलन/दिन हुआ करती थी। यह 2015 आते-आते 613 मिलियन गैलन/दिन हो चुकी थी। यानी इसमें 6 वर्ष के भीतर लगभग 100 मिलियन गैलन/ दिन की वृद्धि हुई थी।
                                                                                                                              BG साभार: HT
दिल्ली सरकार का 2023-24 का आर्थिक सर्वे बताता है कि मार्च 2023 में 632 मिलियन गैलन/दिन की क्षमता के सीवर ट्रीटमेंट प्लांट हैं। यानी 2015 से 2023 के बीच केजरीवाल सरकार ने मात्र 19 मिलियन गैलन/दिन सीवर ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ाने का काम किया है जबकि उनकी पूर्ववर्ती सरकार ने 100 मिलियन गैलन/दिन क्षमता बढ़ाई थी।
 दिल्ली सीवर से आने वाले पानी की सफाई को लेकर निवेश ना करना दिल्ली को दो तरह से नुकसान पहुँचा रहा है। पहला तो यह है कि गंदा पानी साफ होकर वापस दिल्ली वासियों को नहीं मिल पा रहा, जिससे पानी की कमी में और बढ़त हो रही है। वहीं इस गंदे पानी के साफ पानी के स्रोत में मिलने से और भी समस्या हो रही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि लम्बे समय ऐसा नहीं किया जाता तो साफ़ साफ पानी के स्रोतों की क्षमता भी कम हो जाती है।

पानी के लिए खर्चे में भी कमी कर रही सरकार

केजरीवाल सरकार जहाँ एक ओर लम्बे चौड़े वादे करती हैं तो वहीं जमीन पर काम करने के दौरान उसके सारे वादे हिरन हो जाते हैं। दिल्ली सरकार के आर्थिक सर्वे ने ही बताया है कि जितना पैसे की योजनाएँ दिल्ली में प्रति वर्ष बनाई जा रही हैं, उतना खर्च नहीं हो रहा। पिछले तीन वर्षों में इसमें भारी गिरावट आई है। आर्थिक सर्वे के अनुसार, 2020-21 के दौरान दिल्ली पानी की कमी को पूरा करने के लिए 4004 करोड़ रूपए खर्च करने की योजना बनाई गई थी। इसके मुकाबले 3584 करोड़ रूपए की ही धनराशि जारी की गई।
अवलोकन करें:-
वर्ष 2021-22 के दौरान 2951 करोड़ रूपए खर्च की मंजूरी दी गई थी लेकिन इस वर्ष मात्र 1892 करोड़ रूपए ही जारी किए गए। 2022-23 में तो जितना बजट मंजूर हुआ उसकी आधी धनराशि ही जारी की गई। 2022-23 में दिल्ली में पानी से सम्बन्धित सुविधाओं पर 6344 करोड़ रूपए के खर्चे की मंजूरी दी गई थी। इसकी तुलना में मात्र 3171 करोड़ रूपए ही जारी किए गए।
पानी साफ करने की नई क्षमताओं का विकास ना करना, सीवर व्यवस्था को ना बढ़ाना और पानी की आपूर्ति पर खर्च ना करना दिल्ली में वर्तमान जल संकट का बड़ा कारण है। दिल्ली की AAP सरकार इस नाकामी का ठीकरा हरियाणा और हिमाचल प्रदेश पर फोड़ कर बचना चाह रही है। उसके मंत्री केंद्र सरकार को पत्र लिख रहे हैं, आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं लेकिन जमीन पर काम नहीं कर रहे। मात्र जुबानी जमा खर्च करके ही काम चलाया जा रहा है।

तेलंगाना : भारत का ज्यादा महंगा प्रदेश

तेलंगाना में देश में सबसे अधिक मुद्रास्फीति की दर बनी हुई है। 31 जनवरी को संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 में कहा गया है कि तेलंगाना में अप्रैल और दिसंबर 2022 के बीच इसी अवधि के राष्ट्रीय औसत 6.8 प्रतिशत के मुकाबले 8.7 प्रतिशत की मुद्रास्फीति दर है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि ग्रामीण तेलंगाना में मुद्रास्फीति 9.2 प्रतिशत थी जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 8.3 प्रतिशत थी। तेलंगाना के शहरी से लेकर गांवों के लोग महंगाई से त्रस्त हैं लेकिन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) को जनता की परवाह ही नहीं है। विकास के पैमाने पर तेलंगाना अन्य राज्यों से पिछड़ती जा रही है। राज्य की जनता केसीआर की कार्यशैली और तुष्टिकरण की नीति और कामकाज से परेशान है। यही वजह है कि केसीआर की लोकप्रियता अब काफी निचले स्तर पर आ गई है।

जनता महंगाई से परेशान, केसीआर को उनकी परवाह नहीं

एक तरफ तेलंगाना की जनता महंगाई से परेशान है वहीं केसीआर प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने की अपनी चाहत को पूरा करने पर पूरा जोर लगा रहे हैं। राज्य की परेशानी से ध्यान हटाने के लिए वह विपक्षी नेताओं को एकजुट करने का नाटक करते हैं। केसीआर के मन में भी पीएम उम्मीदवार बनने की आकांक्षा इस कदर हिलोरे मारी कि उन्होंने अपनी पार्टी का नाम तक बदल दिया। तेलंगाना राष्ट्र समिति(टीआरएस) अब भारतीय राष्ट्र समिति (बीआरएस) हो गई है। वह बीआरएस को राष्ट्रीय पार्टी बनाकर चाहते हैं, हालांकि इसे अभी राष्ट्रीय पार्टी बनने में लंबा रास्ता तय करना है। लोगों की नाराजगी इस बात से भी बढ़ रही है कि केसीआर पार्टी में परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं जो कि देश के मूड के हिसाब से उनके खिलाफ जा सकती है। उनकी सरकार में उनका बेटा केटी रामाराव, बेटी कविता सहित कई रिश्तेदार भरे-पड़े हैं।

महंगाई के लिए बीआरएस सरकार जिम्मेदारः बंदी संजय

आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट पर तेलंगाना भाजपा के अध्यक्ष बंदी संजय कुमार ने उच्च मुद्रास्फीति के लिए भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) सरकार को दोषी ठहराया। बंदी संजय ने कहा कि महंगाई बढ़ने में ईंधन का बड़ा हाथ है। उन्होंने कहा, “बीआरएस सरकार पेट्रोल/डीजल की कीमतों पर वैट कम नहीं करेगी, भले ही केंद्र और अधिकांश राज्यों ने इसे कम कर दिया हो। केसीआर ने आम आदमी पर बोझ डालना जारी रखा।” भाजपा नेता ने संसद के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण का बहिष्कार करने के लिए भी बीआरएस की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि बीआरएस और मुख्यमंत्री केसीआर का एकमात्र फोकस उनका अपना परिवार है। उन्होंने कहा कि उनके मन में संविधान, परंपराओं और सामान्य शिष्टाचार के लिए कोई सम्मान नहीं है।

पीएम मोदी ने दिया विकास की सौगात, केसीआर को तेलंगाना के विकास की परवाह नहीं

हैरानी की बात यह है कि पिछले साल एक तरफ तो प्रधानमंत्री तेलंगाना राज्य को हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं की सौगात देने गए थे लेकिन तब भी केसीआर को राजनीति ही सूझ रही थी। इन परियोजनाओं से जहां राज्य की तरक्की सुनिश्चित होगी वहीं युवाओं के अनेक रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि केसीआर को तेलंगाना की जनता की परवाह नहीं है। यही वजह है कि जनता भी अब केसीआर से मुंह मोड़ने लगी है। हाल के चुनाव परिणाम में बीजेपी को मिल रही सफलता इसी ओर संकेत करते हैं। तेलंगाना को हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं का सौगात देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी राज्य में थे, लेकिन प्रोटोकाल का उल्लंघन करते हुए वे खुद अगवानी के लिए नहीं आए। इतना ही नहीं केसीआर नीति आयोग जैसी संस्था की बैठक में भी भाग लेने से कतराते हैं। इसका सीधा असर राज्य के विकास पर पड़ रहा है। यही वजह है कि वहां की जनता अब उन्हें सत्ता से बेदखल करने का मन बना चुकी है।

अंधविश्वासी हैं केसीआर

मोदी ने अंधविश्वास को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा, “इस आधुनिक शहर में अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि तेलंगाना की सरकार ने अंधविश्वास को राज्याश्रय दिया हुआ है। यहां अंधविश्वास के नाम पर क्या हो रहा है ये पूरे देश के लोगों को जानना चाहिए। किसे कहां जाना है’ किस दफ्तर में जाना है’ किसे मंत्री बनाना है’ ये सब अंधविश्वास तय करता है। यहां के विकास के लिए और इसे पिछड़ेपन से निकालने के लिए हर तरह के अंधविश्वास को दूर करना होगा। यहां सुशासन और तेज विकास की अकांक्षा प्रबल है। भ्रष्टाचार और परिवारवाद लोकतंत्र का सहसे बड़ा दुश्मन है। आज आपने देखा होगा कि कुछ लोग कार्रवाई से बचने के लिए एकजुट होने का प्रयास कर रहे हैं। भ्रष्टाचारियों का गठजोर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। भ्रष्टाचार और परिवारवाद गरीबों का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। भाजपा सरकार इसे जड़ से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार और जनता के बीच बिचौलियों की क्या जरूरत है।’”

केसीआरः सचिवालय का ‘भूत’, वास्तु यज्ञ, न्यूमरोलॉजी का चक्कर

सीएम बनने के बाद केसीआर कभी सचिवालय नहीं गये। उन्‍हें किसी ने बताया क‍ि सचिवालय का वास्‍तु ठीक नहीं है। इसके लिए उन्‍होंने 2016 में 50 करोड़ की लागत से घर पर ही एक कार्यालय बनवाया। वे कभी सचिवालय नहीं गए जबकि उनकी सरकार के अध‍िकारी वहीं से काम करते हैं। उन्होंने बेगमपेट में अपने कैंप ऑफिस की मरम्मत कराई और इसे 5 मंजिल ऊंचा और 6 ब्लॉक्स तक बढ़ा दिया। इसके पीछे उन्‍होंने तर्क दिया क‍ि शासक को ऐसी जगह से काम करना चाहिए जो दूसरों की तुलना में ज्यादा ऊंचाई पर हो। पिछले 5 साल से केसीआर सचिवालय की बजाय अपने सरकारी आवास से काम कर रहे हैं।

कोई भी काम ब‍िना मुहूर्त देखे नहीं करते केसीआर

केसीआर 6 नंबर को अपने लिए बहुत लकी मानते हैं। वे जब भी कुछ नया या बड़ा करते हैं तो उसमें 6 अंक जरूर होता है। उनके काफिले की गाड़‍ियों के नंबर में 6 जरूर होता है। कोई भी काम ब‍िना मुहूर्त देखे नहीं करते। मुहूर्त में भी इसका ध्‍यान रखा जाता है क‍ि उसके जोड़ के अंक 6 जरूर हो। वे जब पहली बार सीएम बने तो उन्होंने दोपहर 12:57 मिनट पर शपथ ली, जिसके अंकों का जोड़ 6 होता है। एक बार वह महबूब नगर जिला गए तो वहां 51 बकरों की बलि चढ़ाई गई। लोगों का दावा है कि 51 बकरों की बलि इसीलिए चढ़ाई गई क्योंकि इसका जोड़ भी 6 होता है। चंद्रशेखर राव जो कमेटियां बनाते हैं, उनके सदस्यों की संख्या भी इस तरह रखते हैं जिसके अंकों का जोड़ 6 हो। शायद यही वजह है कि उन्होंने किसानों के लिए जो को-ऑर्डिनेशन कमेटी बनाई उसमें 15 सदस्य रखे। उनकी पार्टी की जिला समिति में 24 सदस्य हैं, राज्य स्तरीय समिति में 42 सदस्य हैं और इन सबका जोड़ 6 है।

न्यूमरोलॉजी के चक्कर में केसीआर ने विधानसभा भंग कर दिया

मुख्यमंत्री केसीआर ने सितंबर 2018 में विधानसभा भंग कर दी थी। 6 अंक को शुभ मानने वाले केसीआर ने इस अहम फैसले के लिए 6 सितंबर के दिन को चुना। बैठक भी ज्योतिष के आधार पर बुलाई थी। जिसके बाद उन्होंने विधानसभा भंग करने की सिफारिश की। केसीआर हैदराबाद की मशहूर हुसैन सागर झील कभी नहीं जाते, क्योंकि कहा जाता है कि हुसैन सागर झील जाने के बाद ही एनटी रामाराव से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री की गद्दी छिन गई थी।

केसीआर की ओछी राजनीति

ऐसे में तेलंगाना के मुख्यमंत्री को फिर से चुनाव जीतना मुश्किल लग रहा है। हाल ही में राज्य में उपचुनाव में पार्टी को तगड़ा झटका लगा है। बीजेपी ने यहां अपना परचम लहरा दिया है। हार के डर से केसीआर बौखला गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी के दौरे पर केसीआर की पार्टी के नेताओं ने मोदी गो बैक के नारे लगाए। जगह-जगह मोदी विरोधी पोस्टर भी लगाए। इससे राज्य की जनता में भी मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के प्रति गुस्सा है। लोगों का साफ मानना है कि विकास परियोजनाओं का लोकार्पण-शिलान्यास करने आ रहे प्रधानमंत्री मोदी का विरोध कर केसीआर गलत कर रहे हैं।

सिकंदराबाद से सांसद और केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी कहा था कि यह तेलंगाना के लिए गर्व और प्रतिष्ठा की बात है कि प्रधानमंत्री राज्य को लाभान्वित करने वाली कई परियोजनाओं का शुभारंभ कर रहे हैं और राष्ट्र को समर्पित कर रहे हैं। भाजपा नेताओं ने पीएम मोदी से तेलंगाना नहीं आने के लिए कहने वाले पोस्टर लगाने की निंदा की। भाजपा नेता रामचंदर राव ने कहा, “क्या नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री नहीं हैं? या तेलंगाना भारत का हिस्सा नहीं है? केसीआर एक बच्चे की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वह और उनकी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति दक्षिणी राज्य में भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से ईर्ष्या कर रहे हैं। रामचंदर राव ने कहा,” एमके स्टालिन और वाईएस जगन मोहन रेड्डी दोनों भाजपा के राजनीतिक विरोधी हैं। अगर वे प्रधानमंत्री का स्वागत कर सकते हैं तो केसीआर क्यों नहीं?”

केसीआर की सरकार में मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव खुद को मुस्लिम तुष्टिकरण का चैंपियन साबित करने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। ताकि राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पार्टी के विस्तार को पंख लग सके। केसीआर की सरकार में मुस्लिमों को खुश करने के लिए जहां उन्हें पूरी छूट दी जा रही है और उनके निर्देशों को लागू किया जा रहा है, वहीं हिन्दुओं और महिलाओं को दमन का शिकार होना पड़ा रहा है। तेलंगाना में अक्टूबर 2022 में आयोजित Group-1 की परीक्षा के दौरान हिन्दू महिलाओं से भेदभाव करते देखा जा सकता है। परीक्षा केंद्र पर बुर्का और हिज़ाब की खुली छूट थी। सुरक्षाकर्मी बुर्का पहनी मुस्लिम महिलाओं की तलाशी भी नहीं ले रही थी। उन्हें सीधे परीक्षा हॉल में जाने की अनुमति दी जा रही थी। वहीं हिन्दू महिलाओं के साथ भेदभाव किया गया। हिन्दू लड़कियों और महिलाओं की चूड़ियां,पायल और कुंडल तक उतरवाया गया।

हिंदी की जगह उर्दू को दिया दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा

तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए राज्य में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बनाने का एलान किया। यानी सरकारी कामकाज में तेलुगू के बाद उर्दू में भी कामकाज होगा। मुख्यमंत्री केसीआर का लंबे समय से मुस्लिमों के प्रति रुझान रहा है। लिहाजा, माना जा रहा है कि उन्होंने तुष्टिकरण की नीति पर चलते हुए उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया है। इससे पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि हिन्दी को दूसरी आधिकारिक भाषा होने का गौरव प्राप्त होगा मगर मुख्यमंत्री ने ऐसा नहीं किया।