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चीनी छात्रों के वीजा रद्द कर रहा अमेरिका, राष्ट्रीय सुरक्षा की वजह से लिया फैसला: शैक्षणिक संस्थानों को पढ़ाई के नाम पर जासूसों का अड्डा बना देता है चीन; नीदरलैंड्स, कनाडा और फिनलैंड भी जता चुके हैं चीनी जासूसों पर चिंता

                              अमेरिका में चीनी छात्रों के वीजा होंगे रद्द (फोटो साभार: China Daily)
अमेरिका को जासूसी का डर सता रहा है। इसके लिए अमेरिकी सरकार ने चीनी छात्रों के वीजा रद्द करने का फैसला किया है। गुरुवार (29 मार्च 2025) को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि जिन चीनी छात्रों का कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीसीपी) से कोई संबंध है या जो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पढ़ाई कर रहे हैं, उनके वीजा रद्द किए जाएँगे। इसके लिए विदेश मंत्रालय और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग मिलकर काम करेंगे।

यह कदम ट्रम्प प्रशासन की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिशों का हिस्सा है, जिसमें चीन और हॉन्गकॉन्ग से आने वाले वीजा आवेदनों की कड़ी जाँच की जा रही है।

एक दिन पहले, रुबियो ने दुनिया भर में अमेरिकी दूतावासों को निर्देश दिया कि वे छात्र वीजा के लिए इंटरव्यू शेड्यूल करना बंद करें, क्योंकि सरकार विदेशी छात्रों के अमेरिकी शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश को सीमित करना चाहती है। अमेरिकी विश्वविद्यालयों में भारत के बाद सबसे ज्यादा चीनी छात्र पढ़ते हैं। 2023-24 में 2,70,000 से ज्यादा चीनी छात्र अमेरिका में थे, जो कुल विदेशी छात्रों का एक-चौथाई हिस्सा हैं।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार (29 मई 2025) को मीडिया से कहा कि वे अमेरिकी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले विदेशी छात्रों की कड़ी जाँच करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “कुछ लोग बहुत कट्टरपंथी क्षेत्रों से आ रहे हैं और हम नहीं चाहते कि वे हमारे देश में परेशानी खड़ी करें। हार्वर्ड में करीब 31 प्रतिशत छात्र विदेशी हैं। ऐसे मामलों में 15% की कैपिंग होनी चाहिए।”

चीनी छात्रों के वीजा पर यह सख्ती अमेरिका में चीन के जासूसी नेटवर्क को तोड़ने की कोशिश है। चीन अपने प्रतिद्वंद्वी देशों में जासूसी के लिए मशहूर है और इसके लिए वह कंपनियों, विश्वविद्यालयों और सरकारी एजेंसियों में लोगों को निशाना बनाता है। जुलाई 2021 में चार चीनी नागरिकों पर अमेरिका में जासूसी का आरोप लगा, जो 2009 से 2018 तक 12 देशों को निशाना बनाने वाली वैश्विक जासूसी में शामिल थे।

अमेरिकी विश्वविद्यालयों में चीन का जासूसी नेटवर्क

चीन ने अमेरिका के शीर्ष विश्वविद्यालयों जैसे हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड में जासूसी नेटवर्क बना रखा है। ये विश्वविद्यालय सीसीपी से भारी फंडिंग भी लेते हैं। चीनी सेना अपने जासूसों को छात्रों के रूप में भेजती है, जो विश्वविद्यालय की लैब से बौद्धिक संपदा और शोध दस्तावेज चुराकर चीन भेजते हैं।
साल 2020 में हार्वर्ड के प्रोफेसर लाइबर की गिरफ्तारी के बाद इस जासूसी नेटवर्क का पता चला। शोधकर्ता बनकर आए दो चीनी जासूसों पर भी विदेशी सरकार के एजेंट होने का आरोप लगा। इन जासूसों ने अपने रिसर्च के बारे में झूठ बोला और लैब से रिसर्च सैंपल चुराकर देश से बाहर भेजे।
अक्टूबर 2022 में अमेरिकी अधिकारियों ने तीन चीनी मंत्रालय ऑफ स्टेट सिक्योरिटी (एमएसएस) के अधिकारियों समेत चार चीनी नागरिकों पर जासूसी का आरोप लगाया। इनका नाम वांग लिन, बी होंगवेई, डोंग तिंग (उर्फ चेल्सी डोंग) और वांग कियांग था। इन्हें चीनी सरकार के लिए लोगों को भर्ती करने का काम सौंपा गया था। इसके लिए इन्होंने प्रोफेसरों, पूर्व कानून प्रवर्तन अधिकारियों और अन्य लोगों को निशाना बनाया ताकि संवेदनशील जानकारी हासिल की जा सके।
ये लोग चीन के ओशन यूनिवर्सिटी के एक कथित शैक्षणिक संस्थान इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज (आईआईएस) के नाम पर काम कर रहे थे और अमेरिकी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को संवेदनशील उपकरण और जानकारी हासिल करने के लिए निशाना बनाया।

नीदरलैंड्स, कनाडा और फिनलैंड भी जता चुके हैं चीनी जासूसों पर चिंता

साल 2021 में नीदरलैंड्स, कनाडा और फिनलैंड की जासूसी एजेंसियों ने चीनी जासूसी हमलों को लेकर चेतावनी दी। इन देशों ने सरकार, कंपनियों और विश्वविद्यालयों पर चीनी जासूसी के खतरे को उजागर किया। नीदरलैंड्स की खुफिया एजेंसियों ने कहा कि उनके शैक्षणिक संस्थानों पर चीन से साइबर हमले का खतरा है। इसके अलावा चीन अपने शोधकर्ताओं, पीएचडी उम्मीदवारों और छात्रों को जासूस के रूप में भेजता है।
फिनलैंड की एजेंसियों ने चीनी सरकार पर देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे जैसे टेलीकॉम, एनर्जी, जल वितरण, हवाई अड्डों, सड़कों और बंदरगाहों पर कब्जा करने की कोशिश का आरोप लगाया। कनाडा की खुफिया एजेंसियों ने भी चीनी सरकार पर बायोफार्मास्युटिकल, हेल्थ, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, समुद्री तकनीक और एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों को निशाना बनाने की चेतावनी दी।

क्या सुप्रीम कोर्ट रोहिंग्या घुसपैठियों को संरक्षण के लिए है? रोहिंग्या पर सब हुए दरियादिल: सुप्रीम कोर्ट चाहता है इनके बच्चों को पढ़ाए सरकार; क्या घुसपैठियों की वोट से पप्पू यादव संसद पहुंचा है?

                               रोहिंग्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट (साभार: इंडिया टुडे/लीगल इंडिया)
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार(12 फरवरी 2025) को कहा कि बच्चों की शिक्षा के मामले में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए और यह बात रोहिंग्या के बच्चों पर भी लागू होती है। दरअसल, ‘रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ नाम के एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए सुविधाओं की माँग की है। इनमें बच्चों की मुफ्त शिक्षा भी शामिल है। वहीं, पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने रोहिंग्या मुस्लिमों को नागरिकता देने की माँग की है। संविधान की शपथ लेने वाले क्या घुसपैठियों को संरक्षण की पैरवी करेंगे? 

पप्पू यादव अगर तुम्हे रोहिंग्या इतने प्यारे है तो किसी भी इस्लामिक देश में ले जाकर दिखाओ? उसी दिन सारी नेतागिरी करनी भूल जाओगे। जिन रोहिंग्यों को कोई इस्लामिक मुल्क अपने मुल्क में कदम तक नहीं रखने दे रहा उन्हें यहाँ कुर्सी के भूखे बेशर्म नेता छाती पीट रहे हैं। फिर बकवास करते फिरते हैं कि हम संविधान की रक्षा के लिए हैं। पप्पू यादव जैसे नेताओं देश के साथ खिलवाड़ मत करो।   

पप्पू यादव ने कहा कि देश में रोहिंग्या-रोहिंग्या होते रहता है। पूरी दुनिया में इनकी संख्या सिर्फ 17 लाख है। उन्होंने कहा कि जो लोग भारत में लंबे समय से रह रहे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता दी जानी चाहिए। इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स बिल 2025 पर पप्पू यादव ने कहा, “मैं इमिग्रेशन बिल का समर्थन करता हूँ, लेकिन पिछले 10-12 सालों में क्या वे यह पता लगा पाए हैं कि हमारे देश में कितने अप्रवासी हैं? वे सिर्फ़ वोट बैंक के लिए रोहिंग्याओं की बात करते हैं… सरकार को उन लोगों को नागरिकता देनी चाहिए जो लंबे समय से यहां रह रहे हैं…।”

रोहिंग्या ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव द्वारा दायर याचिका में कोर्ट से ये निर्देश देने की माँग की गई थी कि रोहिंग्या शरणार्थियों के बच्चों को स्कूल में प्रवेश और सरकारी लाभ दिया जाए। इसके लिए आधार कार्ड अनिवार्यता और उनकी नागरिकता की स्थिति की परवाह ना की जाए। इस मामले पर सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एनके सिंह की खंडपीठ ने की।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने पीठ के समक्ष कहा कि रोहिंग्या शरणार्थी एक निराशाजनक स्थिति का सामना कर रहे हैं। इस पर न्यायालय ने कहा, “हमें छात्रों और उनके माता-पिता के बारे में बताएँ। वे कहां रह रहे हैं? हमें घर का नंबर, परिवारों की सूची, उनके रहने के सबूत दें। हमें पंजीकरण संख्या आदि दिखाएँ। हम देखेंगे कि क्या किया जा सकता है।”

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता एनजीओ को निर्देश दिया था कि वह कोर्ट को बताए कि दिल्ली में रोहिंग्या शरणार्थी कहाँ-कहाँ बसे हुए हैं और उन्हें क्या-क्या सुविधाएँ मिली हुई हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि रोहिंग्या ‘शरणार्थियों’ को स्कूलों और अस्पतालों में प्रवेश से वंचित रखा जाता है, क्योंकि उनके पास आधार कार्ड नहीं है।

कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा, “वे शरणार्थी हैं, जिनके पास UNHCR (शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त) कार्ड हैं और इसलिए उनके पास आधार कार्ड नहीं हो सकते। लेकिन, आधार कार्ड के अभाव में उन्हें सरकारी स्कूलों और अस्पतालों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है।” उन्होंने बताया कि रोहिंग्या शाहीन बाग और कालिंदी कुंज में झुग्गियों में और खजूरी खास में किराए के मकानों में रह रहे हैं।

इस एनजीओ द्वारा दायर याचिका में केंद्र और दिल्ली सरकारों को निर्देश देने की माँग की गई है कि वे रोहिंग्या बच्चों को आधार कार्ड या भारतीय नागरिकता न होने के बावजूद मुफ्त शिक्षा दें। जनहित याचिका में आगे माँग की गई थी कि इन रोहिंग्या ‘शरणार्थियों’ को सरकार द्वारा पहचान पत्र माँगे बिना कक्षा 10, 12 और स्नातक सहित सभी परीक्षाओं में भाग लेने की अनुमति दी जाए।

भरूच पाकिस्तान में आता है या भारत बन चुका है इस्लामिक देश? खुदा, रमजान, ईद नमाज… पेपर हिंदी का और सवाल इस्लामिक

                                                             नर्मदा विद्यालय का प्रश्न पत्र
गुजरात के भरूच के नर्मदा स्कूल में यूनिट टेस्ट में इस्लाम संबंधी प्रश्न पूछने का मामला सामने आया है। सोशल मीडिया पर एक प्रश्न पत्र वायरल हो रहा है जिसमें शुरुआत के चार के चार सवाल इस्लाम मजहब से जुड़े हैं। इस प्रश्न पत्र को देख लोग कह रहे हैं कि आखिर ये स्कूल भारत में आता है या फिर पाकिस्तान में। वहीं शिक्षा जिलाधिकारी का कहना है कि पेपर नियमानुसार ही छपा है।

जानकारी के मुताबिक, यह प्रश्न भरूच के जीएनएफसी नर्मदा विद्यालय में आठवीं कक्षा के छात्रों से पूछे गए। यूनिट टेस्ट 7 अगस्त को आयोजित हुआ था। पेपर की फोटो सोशल मीडिया पर खूब तेजी से वायरल हो रही है। इसमें पाँच MCQ नजर आ रहे हैं जिनमें से 4 इस्लाम संबंधित हैं।

पेपर में देख सकते हैं कि पहला प्रश्न हैं- ‘हम संसार में किसकी इच्छा से आए?’ विकल्पों में माता, पिता, परिवार को रखा गया और अंतिम विकल्प ‘खुदा’ दिया गया। दूसरा प्रश्न है – ‘यदि ईश्वर चाहे तो (रिक्त स्थान) से हर कोई बच सकता है। जिसमें किस्मत, मन्नत, दावत और आफत जैसे शब्द विकल्प दिए गए।

तीसरा सवाल रमजान को लेकर है जिसमें पूछा गया, रमजान पूरे तीस (खाली जगह) के बाद आता है। विकल्प में विघानों, दानों और फेरों और रोजा जैसे शब्द हैं। इसके बाद चौथा सवाल में पूछा गया। ईद की नमाज़ जगह का क्या नाम है? विकल्प हैं – ईदबाग, ईदमेदान, ईदघर और ईदगाह।

बताया जा रहा है कि जब बच्चों ने अपने घर पर जाकर इस प्रश्न पत्र को दिखाया तो अभिभावकों ने इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल कर दीं। साथ ही बच्चों से इस तरह के प्रश्न पूछे जाने का विरोध भी किया।

पाठ्यक्रम से पूछे सवाल, इरादा गलत नहीं: स्कूल प्रबंधन

जब ऑपइंडिया के संज्ञान में मामला आया तो हमने भी इस मामले में आगे जानकारी के लिए स्कूल से संपर्क किया। स्कूल प्रबंधन के मुताबिक, ” प्रश्न सरकारी पाठ्यपुस्तक से ही लिए गए हैं और कोई भी विषय से बाहर का प्रश्न नहीं पूछा गया है। विवाद इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि सवाल लगातार थे, लेकिन इसके पीछे पीछे स्कूल या शिक्षकों का कोई और इरादा नहीं था। यही कहना है कि प्रश्न पाठ से ही पूछे गए थे।” आगे कहा कि इस मामले में उन्होंने जिला शिक्षा अधिकारी और कलेक्टर कार्यालय को जवाब भी सौंप दिया है।
वहीं इस मामले में जिला शिक्षा अधिकारी स्वातिबा रावल का भी बयान सामने आया है। उनका कहना है कि प्रश्न नियमानुसार पूछा गया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय को राई का पहाड़ बनाया जा रहा है।‘दिव्य भास्कर’ से बातचीत में उन्होंने कहा, ” सरकारी नियमों और पाठ्यपुस्तकों के अनुसार ही प्रश्न पूछे गए हैं और वे किसी पाठ्यक्रम के अध्याय से हैं। इस पूरी घटना को किसी ने तूल देने की कोशिश की है।”
ऑपइंडिया ने इस मामले में जिला प्राथमिक शिक्षा अधिकारी सचिन शाह से भी संपर्क किया। हालाँकि, उन्होंने कहा कि यह मामला जिला शिक्षा अधिकारी के दायरे में आता है, लेकिन उन्हें मिली जानकारी के अनुसार, इस मामले पर एक रिपोर्ट राज्य सरकार को भी सौंपी गई है और प्रश्न पाठ्यपुस्तक से ही लिए गए हैं। उन्होंने कहा कि विवाद सुलझ गया है।

कर्नाटक : हिन्दू विरोधी कांग्रेस राज में हिंदू विरोधी पाठ पढ़ेंगे स्कूली बच्चे: पेरियार सहित वामपंथियों को किया शामिल, धर्म को बदलकर किया ‘रिलीजन’

कर्नाटक सरकार ने कक्षा एक से दस तक के पाठ्यपुस्तकों के संशोधन को अंतिम रूप दे दिया है, जिसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इसके तहत बच्चों को ‘सनातन धर्म’ आधारित पाठ में इसे विस्तार से बताया जाएगा। इसके अलावा, सरकार ने पी. लंकेश, सावित्रीबाई फुले, गिरीश कर्नाड, पेरियार, देवनूर महादेव, थिरुनाकुडु चिन्नास्वामी, नागेश हेगड़े जैसे लेखकों की रचनाओं को भी शामिल किया है।

प्रो. मंजूनाथ जी. हेगड़े की अध्यक्षता वाली पाठ्यपुस्तक संशोधन समिति ने कर्नाटक सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी है। समिति ने सावित्रीबाई फुले और पेरियार जैसे कट्टरपंथी लेखकों से संबंधित विषयों पर पाठ को फिर से शुरू करने की सिफारिश की है। हालाँकि, समिति ने टीपू सुल्तान और हैदर अली से संबंधित पाठों को फिर से शुरू करने की सिफारिश नहीं की है। भाजपा सरकार ने इन्हें हटा दिया था।

इन पाठ्यपुस्तकों में जैन धर्म और बौद्ध धर्म के बारे में बताने वाले नए अध्याय शामिल किए गए हैं। वहीं, ‘धर्म’ जैसे कुछ शब्दों को ‘रिलिजन’ में बदल दिया गया है। जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राजवंश वाले भागों को काट दिया गया है। दसवीं कक्षा की इतिहास में ‘सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन’ शामिल किया गया है। भक्ति आंदोलन में कनक दास, पुरंदर दास और शिशुनाला शरीफ को जोड़ा गया है।

जून में कर्नाटक टेक्स्टबुक सोसाइटी ने एक पत्र के माध्यम से घोषित महत्वपूर्ण बदलावों में दसवीं कक्षा की कन्नड़ पाठ्यपुस्तक में आरएसएस संस्थापक के.बी. हेडगेवार के ‘निजवाड़ा आदर्श पुरुष यारागाबेकु’ को शिवकोट्याचार्य के ‘सुकुमार स्वामीया कथे’ से स्थान्नपन शामिल है। वहीं, दसवीं कक्षा की कन्नड़ पाठ्यपुस्तक में शतावधानी आर. गणेश की ‘श्रेष्ठ भारतीय चिंतानेगलु’ को सारा अबूबकर की ‘युद्ध’ से बदल दिया गया।

 जिन लेखकों की रचनाओं या उनकी जीवनी को कर्नाटक सरकार ने पाठ्य-पुस्तकों में शामिल किया है, वे हिंदू विरोधी और घनघोर वामपंथी विचारधारा के रहे हैं। उन्होंने भारत की संस्कृति को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश की। उनकी रचनाओं में भी इसका असर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसमें पी. लंकेश और गिरीश कर्नाड जैसे लेखक वामपंथी विचारधारा को पोषक रहे हैं।

दूसरी तरफ, पाठ्य-पुस्तकों में पेरियार को भी शामिल किया गया है। वे बेहद कट्टर विचारधारा के रहे हैं। पेरियार का असली नाम ई वी रामास्वामी था। वे एक धार्मिक हिंदू परिवार में पैदा हुए थे, लेकिन ब्राह्मणवाद के विरोधी रहे। उन्होंने न केवल ब्राह्मण ग्रंथों की होली जलाई, बल्कि रावण को अपना नायक भी माना था। वो बाल विवाह और देवदासी प्रथा के खिलाफ थे।

दरअसल, पिछले साल कॉन्ग्रेस के सत्ता में आते ही पाठ्य पुस्तकों में किए गए सभी सुधारों को समिति ने बरकरार रखा है। कर्नाटक टेक्स्ट बुक सोसायटी ने मंगलवार (5 मार्च 2024) को एक रिपोर्ट जारी की और कक्षा 1 से लेकर 10 तक के पाठ्य-पुस्तकों में किए गए बदलावों की जानकारी दी। ये बदलाव 2024-25 के लिए किए गए हैं।

भाजपा विधायक और पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री अश्वथ नारायण ने कर्नाटक सरकार के इस कदम का विरोध किया है। उन्होंने कहा, “वे संविधान और कर्नाटक के लोगों की आस्था और विश्वास का सम्मान नहीं करते हैं। वे अराजकता, भ्रम और ध्रुवीकरण पैदा करना चाहते हैं। वे उस सनातन धर्म का सम्मान नहीं करते हैं। इसलिए वे ऐसे लोगों को लाने की कोशिश कर रहे हैं जो सनातन धर्म के खिलाफ हैं।”

उन्होंने कहा, “यह हमारी आस्था के खिलाफ है। ऐसा करके वे (कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार) भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रही है। वे सनातन धर्म के खिलाफ काम कर रहे हैं, जिसकी हम निंदा करते हैं। हम कॉन्ग्रेस सरकार को बेनकाब करेंगे और जागरूकता पैदा करेंगे। हम पाठ्यक्रम का पुरजोर विरोध करेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि इसमें समावेशन न हो।”

कर्नाटक : सरकारी स्कूल में ब्राह्मण छात्रा को अंडा खाने को किया मजबूर: शिकायत के बाद प्रशासन ने मिड डे मील में परोसा जाना कबूला

     कर्नाटक के सरकारी स्कूल में ब्राह्मण छात्रा को जबरन अंडे खिलाने की शिकायत (साभार: इकोनॉमिक्स टाइम्स)
कर्नाटक के एक सरकारी स्कूल में एक ब्राह्मण छात्रा को मिड डे मील के दौरान अंडा खाने के लिए मजबूर करने का मामला सामने आया। छात्रा के पिता ने स्कूल के हेडमास्टर और सहायक शिक्षक के खिलाफ शिक्षा विभाग में शिकायत दर्ज कराई है। प्रारंभिक जाँच के बाद प्रशासन ने मिड डे मील में अंडा परोसा जाना तो कबूला है। लेकिन किसी भी छात्र को खाने के लिए मजबूर किए जाने के आरोपों को नकार दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार घटना शिवमोगा जिले के कम्माची गाँव स्थित केपीएस स्कूल का है। पीड़ित बच्ची कक्षा 2 की छात्रा है। इस स्कूल के कक्षा दो में 26 बच्चे पढ़ते हैं। इनमें से 10 शाकाहारी हैं। बच्ची के पिता वी श्रीकांत भी इसी स्कूल में शिक्षक हैं। कई रिपोर्टों में यह स्कूल होसनगरा तालुका के अमृता गाँव में बताया गया है।

छात्रा की पिता की शिकायत के बाद ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर और मिड डे मील परिचारिका ने गुरुवार (23 नवंबर 2023) को स्कूल का दौरा किया। पीड़ित छात्रा के पिता ने शिकायत शिक्षा मंत्री मधु बंगारप्पा, शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव, उप निदेशक और स्थानीय विधायक को भी दी है।

शिकायत में छात्रा के पिता वी श्रीकांत ने कहा कि ब्राह्मण समुदाय से आने वाली उनकी बेटी को स्कूल में जबरदस्ती अंडा खाने के लिए मजबूर किया गया। सात साल की इस बच्ची ने अपने पिता से शिकायत की थी कि शिक्षक पुट्टास्वामी ने उससे कहा था कि अच्छी सेहत के लिए अंडे बहुत ज़रूरी हैं।

राज्य सरकार की तरफ से मिड डे मील में दो बार अंडे और केले बाँटे जाते हैं। श्रीकांत का दावा है कि उनकी बेटी ने कभी मांसाहारी भोजन नहीं किया है, लेकिन उसे स्कूल में अंडा खाने के लिए मजबूर किया गया। शिकायत में कहा है कि उन्होंने स्कूल के अधिकारियों को बताया था कि उनकी बेटी शाकाहारी है, इसलिए उसे अंडे की जगह चिक्की दिया जाए।

उन्होंने कहा है कि इसके बाद भी पुट्टास्वामी ने कक्षा को बताया कि अंडे सेहत के लिए अच्छे हैं। अंडा खाने बाद उनकी बेटी बीमार पड़ गई और मानसिक रूप से परेशान है। इससे उनके परिवार की धार्मिक मान्यताओं को भी ठेस पहुँची है।

श्रीकांत का कहने है कि शिक्षक पुट्टस्वामी ने इसके लिए खेद जताया है। उन्होंने कहा, “मेरा उनसे कोई निजी दुश्मनी नहीं है। मैं इस मुद्दे को खींचना नहीं चाहता।” उधर इस मामले पर शिक्षा विभाग के सीनियर ऑफिसर का कहना है, “प्रारंभिक जाँच में सामने आया है कि ये घटना मिड डे मील परोसे जाने के दौरान हुई। छात्रों का एक समूह भोजन के लिए एक पंक्ति में बैठा था। तभी संबंधित शिक्षक ने छात्रों से पूछा कि कौन अंडे खाना पसंद करेगा? ऐसा लगता है कि इस खास बच्चे ने भी अपने बाकी सहपाठियों से हाथ खड़ा कर दिया थे और इसलिए उसे अंडा परोसा गया। लेकिन, खास तौर पर इस बच्चे या किसी भी छात्र को अंडे खाने के लिए मजबूर नहीं किया गया।”

शिवमोगा के सार्वजनिक निर्देश उप निदेशक परमेश्वरप्पा सीआर के मुताबिक, “हमने इस मुद्दे को बहुत गंभीरता से लिया है। लेकिन हमें मिली जानकारी के आधार पर, छात्र को जबरदस्ती अंडा नहीं खिलाया गया था। हालाँकि, हम दी गई जाँच रिपोर्ट की समीक्षा करेंगे। यदि नियमों का उल्लंघन पाया गया तो खंड शिक्षा अधिकारी संबंधित शिक्षक के खिलाफ गंभीर कार्रवाई करेंगे।”

उत्तर प्रदेश : शिक्षा जगत में नई क्रांति : A फॉर अर्जुन, B फॉर बलराम…, अंग्रेजी के साथ-साथ भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान

                                     लखनऊ का अमीनाबाद इंटर कॉलेज (फोटो साभार: ANI)
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक स्कूल ने एक सराहनीय कदम उठाते हुए बच्चों के पाठ्यक्रमों में बदलाव किया है। उस स्कूल में बच्चों को A फॉर एप्पल और B फॉर बॉय की जगह A फॉर अर्जुन और B से बलराम पढ़ाया जा रहा है। स्कूल के प्रधानाचार्य का कहना है कि इस पद्धति से बच्चों को पौराणिक और ऐतिहासिक ज्ञान मिलेगा।

सोशल मीडिया पर इस किताब की तस्वीरें वायरल हो रही हैं। इसके साथ ही यूजर स्कूल और प्रधानाचार्य के इस पहल की तारीफ कर रहे हैं। वायरल हो रही किताब में A से लेकर Z तक के शब्दों के मतलब भारतीय पौराणिक इतिहास के संदर्भ में बताया जा रहा है।

लखनऊ के जिस स्कूल ने यह पहल की है, उसका नाम अमीनाबाद इंटर कॉलेज है। लगभग 125 साल पुराना यह स्कूल अमीनाबाद में स्थित है। किताब में  ABCD का अर्थ चित्र के साथ वर्णन किया गया है। बच्चों को पढ़ाया जा रहा है- A फॉर अर्जुन इज अ ग्रेट वॉरियर। ऐसे ही B फॉर का मतलब बलराम इज ब्रदर ऑफ कृष्णा बताया जा रहा है।

स्कूल के प्रधानचार्य साहेब लाल मिश्रा का कहना है कि बच्चों को आजकल भारतीय संस्कृति के बारे में कम जानकारी है। उनके ज्ञान को बढ़ाने के लिए यह पहल की गई है। इससे छात्रों को भारतीय संस्कृति के बारे में जानकारी मिलेगी।

स्कूल नगर निगम द्वारा संचालित है और 1897 में स्थापित इस स्कूल के प्रधानाचार्य का कहना है कि यह किताब PDF फॉरमेट भी उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी वर्णमाला की तरह ही हिंदी वर्णमाला के लिए भी ऐसे प्रारूप तैयार करने की कोशिश की जा रही है। हिंदी में अधिक अक्षर हैं, इसलिए इसकी प्रक्रिया में अधिक समय लग रहा है।