राहुल गाँधी ने 'येलोबुक प्रोटोकॉल तोड़ा (साभार: HT) लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की सुरक्षा को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। उनकी VVIP सुरक्षा संभालने वाली केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर ‘येलोबुक प्रोटोकॉल’ तोड़ने की शिकायत की है।
राहुल गाँधी पर आरोप है कि पिछले 9 महीनों में वे बिना जानकारी दिए 6 बार विदेश यात्रा पर गए। इसमें इटली, वियतनाम, दुबई, कतर, लंदन और मलेशिया जैसे देशों की यात्राएँ शामिल हैं।
CRPF ने राहुल गाँधी को अलग से पत्र भेजकर चेतावनी दी है कि इस तरह की चूक उनकी Z+ कैटेगरी की सुरक्षा को कमजोर कर सकती है और उन्हें गंभीर खतरा हो सकता है। सुरक्षा एजेंसी का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब राहुल गाँधी पर प्रोटोकॉल तोड़ने के आरोप लगे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राहुल गाँधी ने साल 2020 से अब तक वे 113 बार सुरक्षा नियमों का उल्लंघन कर चुके हैं। इसमें उनकी भारत जोड़ो यात्रा का दिल्ली वाला हिस्सा भी शामिल है।
क्या है ‘येलोबुक प्रोटोकॉल’?
गृह मंत्रालय ने VVIP सुरक्षा के लिए एक खास गाइडलाइन बनाई है जिसे ‘येलोबुक’ कहा जाता है। इस किताब में साफ लिखा है कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को छोड़कर बाकी सभी बड़ी हस्तियों की सुरक्षा इन्हीं नियमों के आधार पर तय होगी।
जिन लोगों को Z+ या Z सुरक्षा दी गई है, उन्हें अपनी सभी गतिविधियों और यात्राओं की जानकारी पहले से सुरक्षा एजेंसियों को देनी होती है। ताकि खतरे का आकलन कर उन्हें सुरक्षित रखा जा सके। अलग-अलग खतरे की स्थिति को देखते हुए X, Y, Z और Z+ श्रेणी की सुरक्षा दी जाती है।
इतिहास गवाह है कि अगर सुरक्षा नियमों को गंभीरता से न लिया जाए तो इसके भयानक परिणाम हो सकते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने भी अपनी सुरक्षा एजेंसियों की सलाह और प्रोटोकॉल की अनदेखी की थी, जिसका नतीजा उनकी हत्या के रूप में सामने आया। यही वजह है कि CRPF बार-बार राहुल गाँधी को नियमों का पालन करने की सलाह दे रही है।
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा (साभार: X_himantabiswa) असम में जनसांख्यिकीय बदलाव और संभावित सुरक्षा खतरों को लेकर चिंताओं को देखते हुए असम कैबिनेट ने एक नई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को मंजूरी दी है। यह SOP अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच भूमि हस्तांतरण की जाँच के लिए बनाई गई है। इसके अलावा असम के बाहर से आने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा जमीन खरीदने की प्रक्रिया को भी इस SOP के तहत जाँचा जाएगा।
बुधवार (27 अगस्त 2025) को कैबिनेट बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस नीति के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि असम जैसे संवेदनशील राज्य में जमीन के लेन-देन को बहुत सावधानी से संभालना जरूरी है, ताकि कोई धोखाधड़ी न हो और समाज में शांति बनी रहे।
मुख्यमंत्री ने बताया कि अगर जमीन का ट्रांसफर (खरीद-बिक्री, दान) एक ही धर्म के लोगों के बीच हो रहा है, तो इस SOP का कोई असर नहीं होगा और ऐसे सौदे बिना किसी अतिरिक्त रुकावट के हो सकेंगे। लेकिन अगर यह ट्रांसफर अलग-अलग धर्मों के बीच हो, जैसे हिंदू और मुस्लिम या इसके उलट, तो इसके लिए कई स्तरों पर जाँच होगी।
हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “जब कोई प्रस्ताव सब-डिविजनल ऑफिसर के पास आएगा, तो अगर यह एक ही धर्म के लोगों के बीच का सौदा है, तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन अगर यह इंटर-रिलीजन सौदा है, जैसे हिंदू और मुस्लिम के बीच तो पहले यह जाँचा जाएगा कि जमीन का मालिक असली है या नहीं, जमीन असली है या नहीं। इसके बाद प्रस्ताव डिप्टी कमिश्नर के पास जाएगा।”
मुख्यमंत्री ने आगे बताया, “डिप्टी कमिश्नर इस प्रस्ताव को राजस्व विभाग को भेजेगा। वहाँ से यह असम पुलिस की स्पेशल ब्रांच को जाएगा। स्पेशल ब्रांच यह देखेगी कि कहीं यह सौदा जबरदस्ती, धोखाधड़ी या गैरकानूनी तो नहीं है। साथ ही खरीदार के पैसे का स्रोत भी जाँचा जाएगा कि वह काला धन तो नहीं है।”
इसके अलावा स्थानीय लोगों की राय भी ली जाएगी कि वे इस सौदे से सहमत हैं या नहीं, खासकर जब जमीन किसी अलग धर्म के व्यक्ति को बेची जा रही हो। मुख्यमंत्री ने कहा, “स्पेशल ब्रांच यह भी देखेगी कि इस सौदे से स्थानीय सामाजिक ढाँचे पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ रहा या इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा तो नहीं है। उनकी रिपोर्ट डिप्टी कमिश्नर को वापस भेजी जाएगी, जो अंतिम फैसला लेगा कि सौदा मंजूर करना है या नहीं।”
स्पेशल ब्रांच की रिपोर्ट सरकार को भेजी जाएगी, जो डिप्टी कमिश्नर को अंतिम फैसला लेने के लिए कहेगी। सरमा ने जोर देकर कहा कि यह सख्त जाँच जरूरी है ताकि धोखाधड़ी या गैरकानूनी काम, पैसे के स्रोत, स्थानीय सामाजिक ढाँचे पर प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को ठीक से देखा जा सके। उन्होंने कहा, “SOP के तहत, असम पुलिस की स्पेशल ब्रांच यह जाँचेगी कि क्या भूमि हस्तांतरण में कोई धोखाधड़ी या गैरकानूनी काम है, खरीदार के पैसे का स्रोत क्या है, जमीन के आसपास के सामाजिक ढाँचे पर क्या असर होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा का कोई मुद्दा तो नहीं है।”
हिमंता ने यह भी बताया कि पिछले छह महीनों से रुके हुए कई भूमि हस्तांतरण के मामलों का अब इस नए ढाँचे के तहत जल्दी निपटारा किया जाएगा।
यह SOP सिर्फ व्यक्तिगत सौदों तक सीमित नहीं है। असम के बाहर से आने वाले NGOs जो जमीन खरीदकर स्कूल, कॉलेज या अन्य संस्थान बनाना चाहते हैं, उन्हें भी इस SOP के तहत जाँच से गुजरना होगा।
सरमा ने हाल के रुझानों पर चिंता जताई, जहाँ कुछ NGOs ने असम में जमीन खरीदी है। उन्होंने कहा, “हाल ही में हमने देखा कि केरल से कुछ NGOs ने यहाँ जमीन खरीदी। उन्होंने कुछ आयोजन किए, जो भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं। अगर कोई बाहरी NGO शिक्षण संस्थान, मेडिकल कॉलेज या नर्सिंग कॉलेज के लिए जमीन खरीदना चाहता है, तो उसे भी इस SOP की प्रक्रिया से गुजरना होगा।”
Today #AssamCabinet has approved an SoP for land transfer between persons from two different religions. We will examine such proposals for
1️⃣ Source of funds 2️⃣ Threat to National Security 3️⃣ Possibility of Socio - demographic change pic.twitter.com/nFnytDQMzq
असम के मुख्यमंत्री ने खास तौर पर बराक वैली, श्रीभूमि और बरपेटा जैसे इलाकों का जिक्र किया, जहाँ बाहरी NGOs, जो अक्सर किसी खास धर्म से जुड़े होते हैं, स्कूल या अन्य सुविधाओं के नाम पर बड़ी मात्रा में जमीन खरीद रहे हैं। उन्होंने कहा, “वे कहते हैं कि वे स्कूल बनाना चाहते हैं, लेकिन उनका असली मकसद कुछ और हो सकता है। पुलिस इन सभी पहलुओं की जाँच करेगी।”
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह SOP असम में रजिस्टर्ड NGOs पर लागू नहीं होगी। यह सिर्फ बाहरी NGOs पर लागू होगी, ताकि किसी भी अनुचित प्रभाव या छिपे मकसद को रोका जा सके। उन्होंने दोहराया, “असम जैसे संवेदनशील राज्य में भूमि हस्तांतरण के मुद्दे को बहुत सावधानी से संभालना जरूरी है।” इस नीति का मकसद राज्य के जनसांख्यिकीय संतुलन को बनाए रखना और राष्ट्रीय सुरक्षा को किसी भी खतरे से बचाना है।
मोदी 13-14 सितंबर को करेंगे असम का दौरा
प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिमंता बिस्वा सरमा ने यह भी घोषणा की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असम यात्रा, जो पहले 8 सितंबर को होने वाली थी, अब उप-राष्ट्रपति चुनाव के कारण टल गई है। चुनाव आयोग ने 9 सितंबर को उप-राष्ट्रपति चुनाव की तारीख तय की है, इसलिए अब पीएम मोदी 13 सितंबर को असम आएँगे और 14 सितंबर को वापस जाएँगे। इस वजह से 8 सितंबर को होने वाले सभी कार्यक्रम अब 13 और 14 सितंबर को होंगे।
Hon’ble Prime Minister Shri @narendramodi Ji will visit Assam on September 13 & 14 to celebrate Dr Bhupen Hazarika’s birth centenary and dedicate various development projects. pic.twitter.com/U6mLZLI6tt
साभार: न्यूज18/हंस इंडिया जब भारत स्वतंत्रता दिवस मना था और LoP राहुल गाँधी का लाल किला नहीं पहुंचना क्या साबित करता है? आखिर कांग्रेस प्रवक्ता कब तक राहुल और गाँधी परिवार की भयंकर गलतियों का बचाव करते रहेंगे? LoP का लाल किला नहीं पहुँचने से साबित हो गया कि कांग्रेस भारत विरोधियों के हाथ कठपुतली बन सारी संवैधानिक संस्थाओं को अपमानित क्यों जनता को गुमराह किया जा रहा है? कांग्रेस और INDI गठबंधन को वोट देने वालों को अब इस गैंग को वोट देने से देशहित में सोंचना होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से यह साफ कर दिया कि भारत कोई न्यूक्लियर ब्लैकमेल नहीं सहेगा। यह सीधे तौर पर उस न्यूक्लियर गीदड़भभकी का जवाब था जो कुछ दिनों पहले पाकिस्तानी फौज के मुखिया आसिम मुनीर ने अमेरिका की गोद में बैठकर दी थी।
परमाणु हथियारों के दम पर पाकिस्तान खुद को इस्लामिक मुल्कों का अब्बा समझता आया है और भारत को धमकाने की कोशिश करता रहा है। अतीत में उसकी धमकियाँ सफल भी हुईं लेकिन अब भारत की नीति बदल गई है। अब भारत ने नया ‘न्यू नॉर्मल’ बना लिया है, जिसमें किसी परमाणु ब्लैकमेल की कोई जगह नहीं है।
पाकिस्तान तक कैसे पहुँचे परमाणु हथियार
माना जाता है कि पाकिस्तान के परमाणु सपने की शुरुआत 1953 से ही हो गई थी जब Pakistan Atomic Energy Committee (PAEC) की स्थापना की गई। बड़ी संख्या में वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित किया जाने लगा। 1965 में जब भारत के साथ युद्ध में पाकिस्तान की हार हुई तो पाकिस्तान परमाणु हथियारों के लिए बिलबिलाने लगा।
चीन ने अक्टूबर 1964 में अपना पहला परमाणु परीक्षण कर न्यूक्लियर पावर बन गया तो मार्च 1965 में पाकिस्तान ने चीन से भी परमाणु हथियार बनाने के लिए मदद माँगी लेकिन पाकिस्तान को कोई सहयोग नहीं मिल पाया।
मार्च 1965 में पाकिस्तानी के तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा था, “अगर भारत परमाणु बम बनाता है तो हम घास-पत्ते खा लेंगे, भूखे रहेंगे लेकिन हमें अपना परमाणु बम बनाना ही होगा।”
दिसंबर 1971 में पाकिस्तान के दो हिस्से हो गए और बांग्लादेश का जन्म हुआ। इसके बाद पाकिस्तान की जग हँसाई होने लगी। देशी और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में पाकिस्तान की खूब खिल्ली उड़ाई गई। न्यूयॉर्क टाइम्स में तो यहाँ तक लिखा गया कि यह सैन्य अपमान उस मुस्लिम राष्ट्र के लिए बेहद दर्दनाक था जो भारतीयों को ‘मूर्ति पूजक, गौ-प्रेमी‘ कहकर घृणा करता है।
इसके कुछ ही समय बाद ही 18 मई 1974 को भारत ने राजस्थान के पोकरण में अपनी पहला सफल परमाणु परीक्षण ‘स्माइलिंग बुद्धा‘ भी कर दिया। यह ना केवल पाकिस्तान के लिए झटका था बल्कि अमेरिका भी इससे तिलमिला गया।
1974 के सितंबर में अब्दुल कादिर खान ने भुट्टो को पत्र लिखकर कहा कि उसके पास परमाणु बम बनाने के सारे ब्लूप्रिंट हैं। 1972 से ए.क्यू. खान सेंट्रीफ्यूज बनाने वाली नीदरलैंड्स की फिजिक्स डायनेमिक्स रिसर्च लेबोरेटरी में काम कर रहा था। दिसंबर 1974 में भुट्टो से मुलाकात के बाद ए.क्यू. खान यूरेनियम संवर्धन और सेंट्रीफ्यूज से जुड़े डॉक्यूमेंट्स और ब्लूप्रिंट्स चुराने लगा।
इस बीच नीदरलैंड्स की एजेंसियों को शक हुआ तो खान की निगरानी होने लगी और जाँच एजेंसियाँ इससे पहले उसे पकड़ पाती वो दिंसबर 1975 में पाकिस्तान पहुँच गए। खान उन सप्लायर्स की लिस्ट भी लेकर आए जो न्यूक्लियर बॉम्ब बनाने में इस्तेमाल होने वाले रॉ मटेरियल से लेकर टेक्निकल चीजें तक बेचते थे।
खान ने 1976 में Pakistan Atomic Energy Commission (PAEC) के साथ काम करना शुरू किया लेकिन इसके मुखिया मुनीर अहमद खान के साथ उनके मतभेद हो गए। मुनीर दरअसल प्लूटोनियम पर काम करना चाहते थेक जबकि अब्दुल के पास ब्लूप्रिंट यूरेनियम के थे।
1976 में भुट्टो ने अब्दुल के लिए इस्लामाबाद से 50 किमी दूर कहुटा में इंजीनियरिंग रिसर्च लेबोरेटरी यानी ERL शुरू की जहाँ यूरेनियम पर काम होने लगा था। 1978 आते-आते में पाकिस्तान ने यूरेनियम एनरिचमेंट का काम लगभग कर लिया और वो बम बनाने ही वाला था।
इस बीच अप्रैल 1979 में दुनिया को जब खबर लगी तो अमेरिका ने पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगा दिए। हालाँकि, यह प्रतिबंध सिर्फ दिखावे के लिए थे। वहीं, 1983 में एक डच अदालत ने अब्दुल को 4 साल की कैद की सजा सुनाई लेकिन किन्हीं ताकतों ने अब्दुल को जेल जाने से बचा लिया।
1986 में पाकिस्तान-ईरान के बीच न्यूक्लियर कोऑपरेशन अग्रीमेंट साइन हो गया। खबरें आईं कि पाकिस्तान ने वेपन ग्रेड यूरेनियम मटिरियल बना लिया है। कहा जाता है कि 1985-1990 के बीच पाकिस्तान के पास परमाणु बम के लिए जरूरी अत्यधिक संवर्द्धित यूरेनियम था।
इस बीच पाकिस्तान ने इराक, लीबिया, केन्या, माली, सूडान, मोरक्को, जैसों देशों के आतंकी संगठनों को कथित तौर पर सेंट्रीफ्यूज बेचकर मोटा पैसा कमाया था। इस बीच जब खुद को दुनिया का ‘बॉस’ समझने वाले अमेरिका को पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने चाहिए थे तो वो पाकिस्तान के समर्थन में दिख रहा था।
1990 की एक अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पाकिस्तान ने एक परमाणु बम बना लिया था लेकिन इसका परीक्षण नहीं किया था। अक्टूबर 1990 मे अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा कि ‘अब अमेरिका ये नहीं कहेगा कि पाकिस्तान के पास न्यूक्लियर हथियार नहीं हैं’।
इसके बाद आया 1998, भारत ने 11 और 13 मई को पोकरण रेंज में 5 परमाणु परीक्षण किए। इसके 15 दिन बाद ही 28-30 मई को पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किया और वह पहला परमाणु शक्ति संपन्न इस्लामिक देश बन गया।
पाकिस्तान की 1990 की परमाणु धमकी
पाकिस्तान के पास आधिकारिक तौर पर परमाणु बम 1998 में आया था लेकिन उसकी परमाणु धमकियों की शुरुआत 1990 से ही हो गई थी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश को मई 1990 में यकीन हो गया था कि पाकिस्तान, भारत पर परमाणु हमला करने वाला है।
व्हाइट हाउस से सीआईए के सीनियर एजेंट रॉबर्ट गेट्स को भारत-पाकिस्तान की यात्रा पर भेजा गया। 21 मई 1990 को अमेरिका ने दुनिया को बतया कि उसने भारत और पाकिस्तान के बीच न्यूक्लियर युद्ध रुकवा दिया है।
1990 का दशक वही था जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देना शुरू कर दिया था। हिंदुओं को घरों से भगाया जा रहा था और हिंदू बेटियों का रेप-हत्या आम बात हो गई थी। उधर, पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो कश्मीर की आजादी का राग आलाप रही थी।
उस समय की कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि भारत ने अपने 2 लाख सैनिक, 5 अटैक यूनिट और टैंकों को पाकिस्तान के बॉर्डर पर तैनात कर दिया है। पाकिस्तान में इसे युद्ध की तैयारी के तौर पर देखा जाने लगा था। लेकिन तभी आया पहला ‘न्यूक्लियर बल्फ’। अमेरिका ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया और कथित तौर पर भारत-पाकिस्तान के न्यूक्लियर वॉर को टलवा दिया।
इसके 3 साल बाद 1993 मे The New Yorker newspapaer मे ‘On the Nuclear Edge’ नाम से एक रिपोर्ट छपी जिसमें दावा किया गया कि पाकिस्तान हमला करने वाला था। कहा गया कि बेनजीर भुट्टो इस प्लान में शामिल नहीं थी लेकिन राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान और फौज के प्रमुख मिर्जा असलम बेग बस न्यूक्लियर बटन दबाने ही वाले थे।
हालाँकि, कभी इस बात की पुष्टि नहीं हुई कि भारत ने एक गोली भी नहीं चलाई थी फिर भी पाकिस्तान अचानक से तमाम एस्कलेशन लैडर को पार करके सीधे न्यूक्लियर हमले तक क्यूँ और कैसे पहुँच गया। अमेरिका के अलावा किसी और जगह की खुफिया एजेंसी को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी? और मामले सामने आने पर पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
कारगिल में न्यूक्लियर वॉर की गीदड़भभकी
मई 1999 में, भारतीय सेना को कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ की सूचना मिली। शुरू में इसे कबायली आतंकवादियों की घुसपैठ माना गया लेकिन बाद में यह स्पष्ट हुआ कि इसमें पाकिस्तानी फौजी शामिल थे। भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया, जिसका उद्देश्य घुसपैठियों को हटाना और नियंत्रण रेखा (LoC) की स्थिति बहाल करना था।
उस समय CIA में काउंटर टेररिज्म के विशेषज्ञ रहे ब्रूस रीडेल ने अपनी किताब Avoiding Armageddon में इसका दावा किया है कि कारगिल युद्ध भी परमाणु हमले तक पहुँचने वाला था। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को संकेत मिलने लगे थे कि पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों को तैनात करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
नवाज शरीफ इसके बाद एक बिना पूर्व निर्धारित यात्रा पर अमेरिका पहुँचे। नवाज शरीफ अमेरिका से ये चाहते थे कि उनकी सरकार को भारत के आगे झुककर शांति समझौते की माँग ना करनी पड़े। इसके बाद इस युद्ध को न्यूक्लियर धमकी की आड़ में रूकवा दिया गया। जिससे भारत पाकिस्तान के खिलाफ और कड़ी कार्रवाई ना कर पाए।
भारत की कार्रवाई रोकने के लिए पाकिस्तान का न्यूक्लियर बल्फ
2008 में मुंबई पर पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकियों ने हमला किया। इसमें सैकड़ों लोगों की जान गई और भारत को इस पर जवाबी कार्रवाई करने की जरूरत थी। डेविड हेडली से लेकर कसाब तक, पाकिस्तान आर्मी और वहाँ के आतंकी इको-सिस्टम से जुड़े लोग इसमें शामिल थे। भारत के पास पाकिस्तान के खिलाफ सबूत भी थे।
उसी समय भारत ने अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील साइन की थी। इसके कई फायदे बताए जाते हैं लेकिन इस पर कई सवाल भी हैं। इस डील के बाद भारत के न्यूक्लियर हथियार टेस्ट करने, यूरेनियम एनरिचमेंट करने जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर एक अमेरिकी कैप लग गई। इस हमले के बाद पाकिस्तान पर भारत को अडवांटेज मिलता उससे पहले ही भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर अमेरिकी नजर आकर टिक गईं।
इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स (ICWA) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारतीय संसद पर हमला (2001), 26/11 मुंबई हमला (2008), उरी हमला (2016) और पुलवामा हमला (2019) जैसी घटनाओं में पाकिस्तान भारत की जवाबी कार्रवाई को रोकने के लिए परमाणु हमले को ढाल के रूप में इस्तेमाल करता है।
ऑपरेशन सिंदूर में भी न्यूक्लियर बल्फ लेकिन भारत ने दिया मुँहतोड़ जवाब
पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू कर पाकिस्तान और PoK में आतंकी ठिकानों को तबाह किया। भारत की इस जवाबी कार्रवाई से पाकिस्तान बौखला गया और फिर सीधा डोनाल्ड ट्रंप के पास पहुँचा।
ट्रंप ने इस युद्ध में मध्यस्थता का दावा करते हुए बार-बार कहा कि उन्होंने परमाणु युद्ध टाल दिया है। भारत ने इस हमले के बीच कभी भी परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी नहीं दी थी। अमेरिकी फिर वही पुरानी चाल के जरिए भारत पर पाकिस्तान के न्यूक्लियर बमों का दबाव बनाना चाहता है। पाकिस्तान की फौज का मुखिया आसिम मुनीर, ट्रंप की गोद में बैठकर भारत को परमाणु युद्ध की गीदड़भभकी दे रहा है।
भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान की न्यूक्लियर ब्लैकमेल को अब भारत नहीं सहेगा। अगर पाकिस्तान कोई हमला करने की कोशिश करता है तो भारत पूरी ताकत से उसकी जवाब देगा।
के मुरलीधरन, शशि थरूर (फोटो साभार: HT) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के. मुरलीधरन ने रविवार को तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर को लेकर बड़ा बयान दिया, जिसने पार्टी के भीतर हलचल मचा दी। मुरलीधरन ने साफ कहा कि जब तक थरूर राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपना रुख नहीं बदलते, उन्हें तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस के किसी भी कार्यक्रम में नहीं बुलाया जाएगा।
अब सवाल यह होता है कि कांग्रेस राष्ट्रीय सुरक्षा की बजाए देश विरोधी ताकतों के साथ है? अगर नहीं तो आखिर किस वजह से शशि थरूर के लिए केरल कांग्रेस ने शशि थरूर के खिलाफ ऐसा कदम क्यों उठाया? क्या कांग्रेस की दुकान पाकिस्तान और आतंकियों को समर्थन देने से चलती है? शायद यही वजह है कि कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए के कार्यकाल में आतंकी अपना खून खेल खेल रहे थे? क्या बेगुनाहों का खून यूपीए के इशारे पर हो रहा था?
के मुरलीधरन ने शशि थरूर को चेतावनी देते हुए कहा कि कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के सदस्य होने के बावजूद अब उन्हें ‘हम में से एक’ नहीं माना जाता। मुरलीधरन ने यह भी कहा कि थरूर के खिलाफ आगे की कार्रवाई का फैसला पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब थरूर ने कोच्चि में एक कार्यक्रम में कहा कि देश और उसकी सीमाओं की सुरक्षा पहले आती है और पार्टियाँ सिर्फ देश को बेहतर बनाने का माध्यम हैं। उन्होंने हाल के घटनाक्रमों में सशस्त्र बलों और केंद्र सरकार के रुख का समर्थन किया था, जिसकी वजह से उनकी अपनी पार्टी में आलोचना हो रही है।
शशि थरूर ने कहा, “मैं अपने रुख पर कायम हूँ, क्योंकि यह देशहित में है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए दूसरी पार्टियों से सहयोग की बात करने पर उनकी अपनी पार्टी को यह विश्वासघात लगता है, जो एक बड़ी समस्या है।
मुरलीधरन ने पहले भी थरूर की आलोचना की थी। हाल ही में एक सर्वेक्षण में थरूर को यूडीएफ की ओर से केरल के मुख्यमंत्री पद का पसंदीदा चेहरा बताया गया था, जिस पर मुरलीधरन ने तंज कसते हुए कहा था कि थरूर को पहले अपनी पार्टी की पहचान तय करनी चाहिए। इसके अलावा थरूर के एक लेख में इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गाँधी की भूमिका पर टिप्पणी को लेकर भी मुरलीधरन ने उनसे स्पष्ट राजनीतिक रास्ता चुनने को कहा था।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद थरूर के बयानों ने पार्टी को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर किया, जिससे उनके और कॉन्ग्रेस नेतृत्व के बीच तनाव बढ़ गया। यह घटनाक्रम कांग्रेस के भीतर विचारधारा और नेतृत्व को लेकर गहरी खींचतान को दर्शाता है। पार्टी के कई नेता मानते हैं कि थरूर का रुख पार्टी लाइन से हटकर है, जिससे आंतरिक एकता पर सवाल उठ रहे हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नया आदेश जारी किया है। इसके तहत अमेरिका में दुनिया के 12 देशों पर पूरी तरह और 7 देशों पर आंशिक प्रतिबंध लगा दिया है। इसके पीछे ट्रंप ने अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने कहा, “हम फिर से ‘ट्रंप टैवेल बैन’ को लागू करेंगे ताकि कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकियों को देश में आने से रोका जा सके।” अपने पहले के कार्यकाल में भी 7 मुस्लिम देशों (इराक, सीरिया, सूडान, लीबिया, सोमालिया और यमन) के वीजा पर भी रोक लगाई थी। हालाँकि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने उन देशों को अनुमति देदी थी।
ट्रंप सरकार ने अफगानिस्तान, म्यांमार, चाड, एक्वाटोरियल गुयाना, हैती, रिपब्लिक ऑफ कांगो, ईरान, लीबिया, सोमालिया, सूडान, येमेन और इरिट्रिया देशों को अमेरिका में एंट्री पर पूरी तरह रोक लगा दी है। वहीं, आंशिक तौर पर प्रतिबंधित देशों की सूची में वेनेजुएला, क्यूबा, लाओस, टोगो, लियोन, बुरुंडी औऱ तुर्कमेनिस्तान शामिल हैं।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, जिन 12 देशों के नागरिकों के अमेरिका में पूरी तरह से प्रवेश पर पाबंदी लगाई है है, उनमें अफगानिस्तान, म्यांमार, चाड, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी, इरिट्रिया, हैती, ईरान, लीबिया, सोमालिया, सूडान और यमन शामिल हैं।
ट्रंप प्रशासन ने 7 अन्य देशों के लोगों पर आंशिक रूप से पाबंदी लगाई है। इनमें बुरुंडी, क्यूबा, लाओस, सिएरा लियोन, टोगो, तुर्कमेनिस्तान और वेनेजुएला शामिल हैं। अमेरिका में इन देशों से आने वाले लोगों पर अब विशेष शर्तें और कड़ी जांच लागू होगी। ऐसा पहली बार नहीं है, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने इस तरह के फैसले लिए हैं। अपने पहले उन्होंने 7 मुस्लिम-बहुल देशों से यात्रा पर प्रतिबंध लगाया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में मंजूरी दी थी।
इस फैसले पर राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि मुझे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और अपने नागरिकों के हित की रक्षा के लिए यह कदम उठाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि हम फिर से ट्रैवल बैन लागू करेंगे, जिसे कुछ लोग 'ट्रंप ट्रैवल बैन' कहते हैं, ताकि कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवादियों को देश में आने से रोका जा सके। एक ऐसा कदम जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया था।
व्हाइट हाउस की ओर से ये भी कहा गया कि ये सभी देश स्क्रीनिंग और सुरक्षा जाँच में चूक गए हैं। ट्रंप ने अमेरिका में हमेशा के लिए बसने के विचार से आने वाले लोगों के वीजा पर रोक लगाई है। वहीं कुछ देशों के पर्यटक वीजा पर भी रोक लगी है।
अमेरिका में चीनी छात्रों के वीजा होंगे रद्द (फोटो साभार: China Daily) अमेरिका को जासूसी का डर सता रहा है। इसके लिए अमेरिकी सरकार ने चीनी छात्रों के वीजा रद्द करने का फैसला किया है। गुरुवार (29 मार्च 2025) को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि जिन चीनी छात्रों का कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीसीपी) से कोई संबंध है या जो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पढ़ाई कर रहे हैं, उनके वीजा रद्द किए जाएँगे। इसके लिए विदेश मंत्रालय और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग मिलकर काम करेंगे।
यह कदम ट्रम्प प्रशासन की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिशों का हिस्सा है, जिसमें चीन और हॉन्गकॉन्ग से आने वाले वीजा आवेदनों की कड़ी जाँच की जा रही है।
The U.S. will begin revoking visas of Chinese students, including those with connections to the Chinese Communist Party or studying in critical fields.
एक दिन पहले, रुबियो ने दुनिया भर में अमेरिकी दूतावासों को निर्देश दिया कि वे छात्र वीजा के लिए इंटरव्यू शेड्यूल करना बंद करें, क्योंकि सरकार विदेशी छात्रों के अमेरिकी शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश को सीमित करना चाहती है। अमेरिकी विश्वविद्यालयों में भारत के बाद सबसे ज्यादा चीनी छात्र पढ़ते हैं। 2023-24 में 2,70,000 से ज्यादा चीनी छात्र अमेरिका में थे, जो कुल विदेशी छात्रों का एक-चौथाई हिस्सा हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार (29 मई 2025) को मीडिया से कहा कि वे अमेरिकी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले विदेशी छात्रों की कड़ी जाँच करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “कुछ लोग बहुत कट्टरपंथी क्षेत्रों से आ रहे हैं और हम नहीं चाहते कि वे हमारे देश में परेशानी खड़ी करें। हार्वर्ड में करीब 31 प्रतिशत छात्र विदेशी हैं। ऐसे मामलों में 15% की कैपिंग होनी चाहिए।”
#WATCH | On student visa issue, US President Donald Trump says, "... We don't want to see shopping centres explode. We don't want to see the kind of riots that you had, and I'll tell you what, many of those students didn't go anywhere, many of those students were troublemakers… pic.twitter.com/dZCpcUJM4r
चीनी छात्रों के वीजा पर यह सख्ती अमेरिका में चीन के जासूसी नेटवर्क को तोड़ने की कोशिश है। चीन अपने प्रतिद्वंद्वी देशों में जासूसी के लिए मशहूर है और इसके लिए वह कंपनियों, विश्वविद्यालयों और सरकारी एजेंसियों में लोगों को निशाना बनाता है। जुलाई 2021 में चार चीनी नागरिकों पर अमेरिका में जासूसी का आरोप लगा, जो 2009 से 2018 तक 12 देशों को निशाना बनाने वाली वैश्विक जासूसी में शामिल थे।
अमेरिकी विश्वविद्यालयों में चीन का जासूसी नेटवर्क
चीन ने अमेरिका के शीर्ष विश्वविद्यालयों जैसे हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड में जासूसी नेटवर्क बना रखा है। ये विश्वविद्यालय सीसीपी से भारी फंडिंग भी लेते हैं। चीनी सेना अपने जासूसों को छात्रों के रूप में भेजती है, जो विश्वविद्यालय की लैब से बौद्धिक संपदा और शोध दस्तावेज चुराकर चीन भेजते हैं।
साल 2020 में हार्वर्ड के प्रोफेसर लाइबर की गिरफ्तारी के बाद इस जासूसी नेटवर्क का पता चला। शोधकर्ता बनकर आए दो चीनी जासूसों पर भी विदेशी सरकार के एजेंट होने का आरोप लगा। इन जासूसों ने अपने रिसर्च के बारे में झूठ बोला और लैब से रिसर्च सैंपल चुराकर देश से बाहर भेजे।
अक्टूबर 2022 में अमेरिकी अधिकारियों ने तीन चीनी मंत्रालय ऑफ स्टेट सिक्योरिटी (एमएसएस) के अधिकारियों समेत चार चीनी नागरिकों पर जासूसी का आरोप लगाया। इनका नाम वांग लिन, बी होंगवेई, डोंग तिंग (उर्फ चेल्सी डोंग) और वांग कियांग था। इन्हें चीनी सरकार के लिए लोगों को भर्ती करने का काम सौंपा गया था। इसके लिए इन्होंने प्रोफेसरों, पूर्व कानून प्रवर्तन अधिकारियों और अन्य लोगों को निशाना बनाया ताकि संवेदनशील जानकारी हासिल की जा सके।
ये लोग चीन के ओशन यूनिवर्सिटी के एक कथित शैक्षणिक संस्थान इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज (आईआईएस) के नाम पर काम कर रहे थे और अमेरिकी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को संवेदनशील उपकरण और जानकारी हासिल करने के लिए निशाना बनाया।
नीदरलैंड्स, कनाडा और फिनलैंड भी जता चुके हैं चीनी जासूसों पर चिंता
साल 2021 में नीदरलैंड्स, कनाडा और फिनलैंड की जासूसी एजेंसियों ने चीनी जासूसी हमलों को लेकर चेतावनी दी। इन देशों ने सरकार, कंपनियों और विश्वविद्यालयों पर चीनी जासूसी के खतरे को उजागर किया। नीदरलैंड्स की खुफिया एजेंसियों ने कहा कि उनके शैक्षणिक संस्थानों पर चीन से साइबर हमले का खतरा है। इसके अलावा चीन अपने शोधकर्ताओं, पीएचडी उम्मीदवारों और छात्रों को जासूस के रूप में भेजता है।
फिनलैंड की एजेंसियों ने चीनी सरकार पर देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे जैसे टेलीकॉम, एनर्जी, जल वितरण, हवाई अड्डों, सड़कों और बंदरगाहों पर कब्जा करने की कोशिश का आरोप लगाया। कनाडा की खुफिया एजेंसियों ने भी चीनी सरकार पर बायोफार्मास्युटिकल, हेल्थ, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, समुद्री तकनीक और एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों को निशाना बनाने की चेतावनी दी।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (29 अप्रैल 2025) को पेगासस जासूसी मामले की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि देश की सुरक्षा के लिए जासूसी सॉफ्टवेयर (स्पाइवेयर) का इस्तेमाल करने में कोई गलती नहीं है, लेकिन इसका निजी व्यक्तियों के खिलाफ दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इस मामले में कई याचिकाओं पर सुनवाई की, जिसमें आरोप लगाया गया है कि भारत सरकार ने पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल पत्रकारों, जजों, कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों की जासूसी के लिए किया।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान देश की मौजूदा सुरक्षा स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे कठिन समय में सावधानी बरतनी जरूरी है। एक वकील ने जब कहा कि अगर सरकार ने स्पाइवेयर खरीदा है तो उसे इस्तेमाल करने से कोई नहीं रोक सकता, तो जस्टिस सूर्यकांत ने जवाब दिया, “अगर देश इस स्पाइवेयर का इस्तेमाल खतरनाक तत्वों के खिलाफ कर रहा है तो इसमें क्या गलत है? स्पाइवेयर रखने में कोई गलती नहीं है… हम देश की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं कर सकते। निजी नागरिक, जिन्हें निजता का अधिकार है, उनकी रक्षा संविधान के तहत होगी… उनकी शिकायतों को हमेशा देखा जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पेगासस के कथित दुरुपयोग की जाँच के लिए गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि यह रिपोर्ट देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ी है, इसलिए इसे सड़कों पर चर्चा का विषय नहीं बनाया जा सकता। हालाँकि कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रभावित व्यक्तियों को उनकी स्थिति के बारे में सूचित किया जा सकता है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “हाँ, व्यक्तिगत शंकाओं का समाधान होना चाहिए, लेकिन इसे सड़कों पर चर्चा का दस्तावेज नहीं बनाया जा सकता।”
यह मामला 2021 में उस समय सुर्खियों में आया था, जब न्यूज पोर्टल्स ने खुलासा किया था कि इजरायल की कंपनी एनएसओ ग्रुप के पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल भारत में पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, वकीलों, अधिकारियों, एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज और अन्य लोगों के मोबाइल फोन में सेंधमारी के लिए किया गया। इन रिपोर्ट्स में एक लिस्ट का जिक्र था, जिसमें संभावित टारगेट्स के फोन नंबर शामिल थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल की जाँच में कुछ फोन नंबरों में पेगासस की घुसपैठ के निशान मिले, जबकि कुछ में घुसपैठ की कोशिश के सबूत थे।
इस खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएँ दाखिल हुईं, जिनमें वकील एमएल शर्मा, राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास, हिंदू ग्रुप के निदेशक एन. राम, एशियानेट के संस्थापक शशि कुमार, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, पत्रकार रूपेश कुमार सिंह, इप्सा शताक्षी, परंजॉय गुहा ठाकुरता, एसएनएम आबिदी और प्रेम शंकर झा शामिल हैं। इन याचिकाओं में पेगासस के कथित इस्तेमाल की स्वतंत्र जाँच की माँग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में इस मामले की जाँच के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस आरवी रविंद्रन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की थी। समिति ने जुलाई 2022 में अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी। रिपोर्ट में कहा गया कि जाँच किए गए 29 मोबाइल फोनों में पेगासस स्पाइवेयर नहीं मिला। हालाँकि 5 डिवाइस में कुछ मालवेयर पाए गए, लेकिन वे पेगासस नहीं थे। समिति ने यह भी बताया कि भारत सरकार ने जाँच में सहयोग नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि अमेरिका की एक जिला अदालत में व्हाट्सएप ने स्वीकार किया है कि पेगासस के जरिए हैकिंग हुई थी। सिब्बल ने कहा, “अब कोर्ट का सबूत है और व्हाट्सएप का सबूत है।” उन्होंने माँग की कि कम से कम समिति की जाँच रिपोर्ट याचिकाकर्ताओं को दी जाए। लेकिन कोर्ट ने कहा, “यह एक ऑब्जेक्टिव प्रश्न-उत्तर प्रकार का हो सकता है। आप पूछ सकते हैं कि क्या मैं इसमें शामिल हूँ। हम हाँ या ना में जवाब दे सकते हैं।”
वकील श्याम दीवान ने मामले की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा, “राज्य ने अपने नागरिकों के खिलाफ स्पाइवेयर का इस्तेमाल किया। यह और भी बुरा है।” उन्होंने कहा कि इसमें पत्रकारों और जजों के खिलाफ इस्तेमाल के सबूत हैं। जवाब में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ऐसी दलीलें किसी और मंशा के साथ दी जा रही हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि ये अभी सिर्फ आरोप हैं और व्यक्तियों को यह जानने का हक है कि क्या वे प्रभावित हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी।
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई 2025 को तय की है। सिब्बल को दो हफ्ते में अमेरिकी कोर्ट का फैसला और अन्य दस्तावेज जमा करने की इजाजत दी गई है।
झारखंड हाई कोर्ट राज्य में बढ़ रही घुसपैठ को लेकर सख्त हो गया है। उसने बांग्लादेशी घुसपैठियों से को राज्य से बेदखल करने को लेकर एक्शन का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान घुसपैठियों की राज्य में उपस्थिति के ऊपर भी रिपोर्ट माँगी है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस एके राय की पीठ ने बुधवार (3 जुलाई 2024) को ये निर्देश दिए हैं। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह दो सप्ताह के भीतर राज्य में मौजूद घुसपैठियों का पता लगाए, उनको चिन्हित करे और उन पर क्या कार्रवाई की गई, इसको लेकर रिपोर्ट दाखिल करे। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से भी रिपोर्ट माँगी है।
हाई कोर्ट की यह सख्ती डानियल दानिश की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिखी है। याचिका में अदालत को बताया गया था कि राज्य के संताल परगना के जो भी जिले बांग्लादेश से सटे हुए हैं, उनमें बांग्लादेश के प्रतिबंधित संगठन सुनियोजित तरीके से झारखंड की जनजातीय लड़कियों से शादी करके उनका धर्मांतऱण करवा रहे हैं। नए मदरसे भी खुल रहे हैं। यहाँ 46 नए मदरसे खुले हैं। संताल परगना में गोड्डा, देवघर, दुमका, जामताड़ा, साहिबगंज और पाकुड़ जिले शामिल हैं।
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी झारखंड की उस समस्या को दर्शाती है जो धीरे-धीरे नासूर बन चुकी है। संताल परगना के जिले पश्चिम बंगाल से सीमाएँ साझा करते हैं। पहले घुसपैठिए बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में आते हैं और यहाँ से फैलते हुए वह झारखंड में आ जाते हैं।
नई नहीं है डेमोग्राफी बदलने की बात
झारखंड हाई कोर्ट की टिप्पणी को रेखांकित करने वाली काफी सारी घटनाएँ पहले भी सामने आ चुकी हैं। इससे पहले मार्च, 2024 में आजतक की एक रिपोर्ट में याचिका में बताई गई समस्या को लेकर ही बात की गई थी। आजतक की रिपोर्ट में बताया गया था कि यहाँ बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए, पश्चिम बंगाल के रास्ते आते हैं। इसके बाद वह बस जाते हैं। इनमें से कुछ आदिवासियों की लड़कियों को निशाना बनाते हैं। जब लडकियाँ उनके दिखावे में फंस जाती हैं तो उनसे शादी कर ली जाती है।
शादी के बाद लड़की की कागजों में पहचान आदिवासी के तौर पर ही रहने दी जाती है। इसके बाद उस लड़की के नाम पर जमीन ली जाती है या फिर उसकी ही जमीन कब्जा ली जाती है। रिपोर्ट में बताया गया था कि यह सब करने के लिए बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठियों को फंडिंग मिलती है। लड़की की पहचान आदिवासी रखने के पीछे सरकारी फायदे लेने के मकसद रहता है। इसके अलावा कई जगह उन लड़कियों को चुनाव भी लड़वाया गया, जिन्होंने मुस्लिमों से शादी की।
आजतक की रिपोर्ट में यह तक बताया गया था कि यहाँ घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशी इस जमीन में खनन के लिए भी ऐसा कर रहे हैं। कुल मिलाकर धीमे-धीमे इस इलाके की पहचान बदली जा रही है। बांग्लादेशी घुसपैठिए झारखंड में घुसते ही फर्जी पहचान पत्र भी बनवा लेते हैं। इसमें इनकी मदद पहले से आकर बस चुके लोग भी करते हैं।
सिर्फ जमीन ही नहीं चुनाव में भी घुसपैठ
बांग्लादेशी घुसपैठियों की यह समस्या शादी करने और जमीन हथियाने तक सीमित नहीं रही है। इसका कनेक्शन लोकसभा चुनाव तक से जुड़ा है। इसके लिए आपको संताल के बड़े जिले साहिबगंज की राजमहल विधानसभा का रुख करना होगा। कुछ दिन पहले राजमहल के विधायक अनंत ओझा ने ऑपइंडिया को बताया था कि उनके इलाके में कुछ गाँवों में बेतहाशा मुस्लिम वोट बढ़े हैं। उन्होंने बताया था कि यह काम पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे गाँवों में हुआ है।
अनंत ओझा के अनुसार, उनकी विधानसभा के 187 नंबर बूथ पर 2019 में 672 वोट थे। 2024 में यह बढ़ कर 1461 हो गए। यानी इसमें लगभग 117% की वृद्धि हुई। इसी के साथ सरकारी मदरसा बूथ पर 754 वोट बढ़ कर 1189 हो गए। ऐसे कम से कम 73 बूथ इस विधानसभा के भीतर हैं जहाँ की वोटर वृद्धि असामान्य है।
विधायक अनंत ओझा ने ऑपइंडिया को बताया था कि यह सभी बूथ मुस्लिम आबादी के बीच स्थित हैं। इसी इलाके में हिन्दू आबादी वाले 17 बूथ पर इसी दौरान आबादी कम हो गई है। उन्होंने इस संबंध में राज्य चुनाव आयोग से भी शिकायत की थी। राज्य चुनाव आयोग ने इस मामले में एक टीम बनाकर एक्शन लेने को कहा है।
इस इलाके में मतदाताओं के भौतिक सत्यापन पर भी विचार हो रहा है। हालाँकि, इस बीच समस्या का दायरा बढ़ रहा है। ऐसे में अब कोर्ट को भी इस मामले में उतरना पड़ा है। कोर्ट के आदेश के बाद राज्य की सरकार इन बांग्लादेशी घुसपैठियों पर क्या कार्रवाई करती है, यह देखने वाला होगा।
लोकसभा चुनावों में नतीजे आने के बाद संसद में घुसपैठ की कोशिश का मामला सामने आया है। आधिकारिक सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि संसद परिसर में प्रवेश करने का प्रयास करते हुए तीन मजदूरों को CISF कर्मियों ने पकड़ा और बाद में इनकी गिरफ्तारी हुई।
पुलिस को इन्हे फर्जी आधार कार्ड बनाने और कार्ड बनवाने वालों को भी गिरफ्त में लेना चाहिए। ऐसे पता नहीं कितनों को फर्जी आधार कार्ड दिए होंगे। यह बहुत गंभीर मामला है।
इन तीनों के नाम कासिम, मोनिस और सोएब है। इनके खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी से संबंधित आईपीसी धाराएँ लगाई गई हैं। खबरों के अनुसार, इन तीनों की गिरफ्तारी उस समय हुई जब तीनों नियमित सुरक्षा और पहचान जाँच के दौरान संसद भवन के फ्लैप गेट एंट्री से घुस रहे थे। इसी बीच सीआईएसएफ कर्मियों को इनकी एक्टिविटी संदिग्ध लगी।
#BREAKING | Major Attempt to Breach Parliament Security Thwarted
3 Arrested For Attempting To Enter Premises Using Fake Aadhar Cards
सीआईएसएफ कर्मियों ने तीनों को रोका और हिरासत में लिया जाँच हुई तो ये भी सामने आया कि उन लोगों के आधार कार्ड जाली थे और तीनों ही डीवी प्रोजेक्ट्स लिमिटेड में कार्यरत थे, जिसे संसदर परिसर के अंदर सांसदों के लिए लाउंज बनाने का ठेका दिया गया है।
सीआईएसएफ ने तीनों को दिल्ली पुलिस को सौंप दिया है। उन्होंने इनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर ली है और आईपीसी की धाराओं 465, 419, 120 बी, 471, 468 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
साल 2023 में भी संसद में सुरक्षा चूक का मामला सामने आया था, जिस पर हाल की खबरें बताती हैं कि उस केस के 6 आरोपितों के विरुद्ध गैरकानूनी गतिविधिया रोकथाम अधिनियम के तहत केस चलेगा। इन 6 आरोपितों के नाम ललित झा, सागर शर्मा, मनोरंजन डी, अमोल धनराज शिंदे, नीलम रानोलिया और महेश कुमावत हैं।
इन लोगों ने संसद में उपद्रव मचाने के लिए कई समय से प्लानिंग की थीं। इसके अलावा इन्होंने एक मोची से विशेष जूते बनवाए थे जिनके तलवे में 2.5 इंच गहरी जगह थी। ये लोग धुएँ के केन इसी स्पेस में छिपाकर संसद में लाए थे। हालाँकि सांसदों की तेजी के बाद ये सारे पकड़ लिए गए और इनके पास से पर्चे बरामद हुए थे जिनपर प्रधानमंत्री के लापता होने जैसी बात लिखी थी।
UPA सरकार ने ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात की नहीं दी अनुमति
केंद्र में 2004 से लेकर 2014 तक UPA की सरकार थी। कॉन्ग्रेस इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी थी और डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, लेकिन सत्ता की बागडोर सोनिया गाँधी के हाथ में थी। UPA सरकार में कोयला और कॉमनववेल्थ से लेकर 2G और रेलवे में नौकरी तक, कई घोटाले हुए। वहीं मुंबई में 26/11 हमलों के बाद सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, कांग्रेस पार्टी पाकिस्तान को क्लीन-चिट देते हुए हिन्दुओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराती रही।
अब UPA सरकार का नया कारनामा देश के सामने आया है। UPA सरकार ने जानबूझकर ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात से जुड़ी फाइलों को अटकाया। ब्रह्मोस की टीम का फिलीपींस दौरा रोक दिया गया था और इसके लिए राजनीतिक क्लियरेंस न होने की बात कही गई थी। कोई पॉलिसी न होने से असमंजस की स्थिति बनी रही, ब्रह्मोस के निर्यात में देरी हुई। ‘ABP News’ के पत्रकार आशीष सिंह ने कई पुराने पत्रों को जारी करते हुए ये खुलासा किया। इसके तार विदेश और रक्षा मंत्रालय तक जुड़े हुए हैं।
3 अलग-अलग देशों से संबंधित ये दस्तावेज हैं। असल में पिछले महीने ब्रह्मोस की पहली बार देश से बाहर डिलीवरी हुई, वो कई वर्षों पहले हो सकती थी अगर UPA सरकार लचर रवैया नहीं अपनाती। 17 अप्रैल, 2014 को विदेश मंत्रालय ने ब्रह्मोस के GM को पत्र लिखा था, तब टीम फिलीपींस जाने वाली थी। उन्होंने हिदायत दी गई कि बिना पॉलिटिकल क्लियरेंस के वो फिलीपींस न जाए। उस समय RK अग्निहोत्री ब्रह्मोस ऐरोस्पेस के CEO थे और उन्हें भी ये पत्र लिखा गया था।
इस पत्र में लिखा गया है कि सूचना मिली है कि ब्रह्मोस की टीम फिलीपींस जा रही है, लेकिन हमारे पास इसके पॉलिटिकल क्लियरेंस संबंधित कोई दस्तावेज नहीं हैं। साथ ही टीम को MEA से संपर्क करने को भी कहा गया है। एक अन्य पत्र इंडिया इंडोनेशिया जॉइंट डिफेंस कॉर्पोरेशन की बैठक को लेकर है, जो 17-18 जून, 2010 को हुई थी। इस दौरान इंडोनेशिया प्रतिनधिमंडल को नई दिल्ली में ब्रम्होस ऐरोस्पेस का दौरा भी करना था। हालाँकि, केंद्रीय रक्षा मंत्रालय ने सलाह दी कि इस दौरे को रद्द किया जाए।
कारण बताते हुए कहा गया कि ब्रह्मोस के निर्यात को लेकर अभी राजनीतिक स्तर पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। ये पत्र ब्रह्मोस ऐरोस्पेस के तत्कालीन CEO ए सिवाथनु पिल्लई को केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के अधिकारी DK महापात्रा ने लिखा था। इस पत्र में लिखा गया था कि हम इंडोनेशिया को गलती से ये इंगित करा रहे हैं कि हम ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात को लेकर तैयार हैं। वहीं 9 मई, 2011 को भी एक पत्र भेजा गया है जिसमें कहा गया है कि केंद्रीय विदेश मंत्रालय चुनिंदा देशों को ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात करने के पक्ष में है।
इस पत्र में कहा गया है कि ब्रह्मोस मिसाइल के उत्पादन और विक्रय को लेकर रूस के साथ हुए करार को इस तरह से लागू किया जाना चाहिए जो किसी भी पक्ष की सुरक्षा और सैन्य-राजनीतिक हितों को नुकसान नहीं पहुँचाता हो। इसमें राष्ट्रीय कानूनों का ध्यान रखने की भी सलाह दी गई थी। हालाँकि, अंत में इसमें भी आदेश दिया गया था कि मिसाइलों के निर्यात को लेकर जब तक निर्णय नहीं हो जाता तब तक ब्रह्मोस के निर्यात को लेकर कोई बातचीत न की जाए।
तत्कालीन केंद्रीय विदेश सचिव निरुपमा राव ने कहा था कि हम ब्रह्मोस के पक्ष में हैं, लेकिन इसके निर्यात के लिए हमारे पास कोई नीति नहीं है। इस पत्र में भी लिखा गया है कि MEA इसके लिए नीति बनाने की ज़रूरत पर जोर देती है। इसमें संयुक्त राष्ट्र के नियमों के पालन की बात से लेकर आतंकियों के हाथ में तकनीक जाने की आशंका भी जताई गई है, लेकिन इसका कोई निदान नहीं बताया गया है। सिर्फ निर्यात के लिए किसी भी बातचीत से मना किया गया है।
'मिशन ब्रह्मोस’@ABPNews पर बहुत बड़ा खुलासाI यूपीए सरकार कैसे बनी बूतI सनसनीख़ेज़ दस्तावेज...पक्के सबूतI दस्तावेज बोले नीति-नीयत की पोल खोलेI ‘लटकाने-अटकाने’ वाली नीयत की साक्षात् गवाहीI UPA में पॉलिसी पैरालिसिसI
ब्रह्मोस मध्यम रेंज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। इसे सबमैरीन, जहाज या फाइटर एयरक्राफ्ट से लॉन्च किया जा सकता है। इसके जमीन और जहाज से मार करने वाले वर्जन हैं। भारत के ब्रह्मपुत्र और रूस की नदी मॉस्क्वा नदी के संयुक्त नाम पर इसका नाम ब्रह्मोस रखा गया है। अब 1500 किलोमीटर रेंज तक के ब्रह्मोस मिसाइलों के उत्पादन की तैयारी है। इसकी पहली टेस्ट फायरिंग जून 2001 में हुई थी। सितंबर 2010 में सुपरसोनिक स्पीड में टेस्ट की जाने वाली ये पहले स्टीप डाइव मिसाइल बनी।
अप्रैल 2024 में भारत ने ब्रह्मोस की पहली सफल डिलीवरी पूरी की। भारत और फिलीपींस के बीच इसे लेकर 375 मिलियन डॉलर (3114 करोड़ रुपए) की डीप हुई थी। भारतीय वायुसेना के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट से इसके पहले बैच की डिलीवरी पूरी की जा चुकी है। फिलीपींस अपनी सेना के आधुनिकीकरण की योजना के तहत ब्रह्मोस खरीद रहा है।4 खेप में ये मिसाइलें पहुँचाई गई हैं, हर खेप में 3 लॉन्चर और 290 किलोमीटर रेंज की 3 मिसाइलों के अलावा प्रत्येक लॉन्चर के लिए एक मोबाइल प्लेटफॉर्म दिया जाता है।
छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ जवानों ने मंदिर का करवाया पुन:निर्माण
छत्तीसगढ़ के सुकमा के केरलापेंदा गाँव में नक्सल आतंक के कारण 21 सालों से बंद पड़े हिंदू मंदिर को सीआरपीएफ के जवानों ने खोलकर, उसमें साफ सफाई करके उसे ग्रामीणों को सौंप दिया। इस दौरान मंदिर में पूजा आरती भी हुई।
सामने आई वीडियो में गाँव के बच्चों के साथ मिलकर सीआरपीएफ जवान मंदिर के पट को पानी से धो रहे हैं। इसके बाद वह अंदर रखी भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी की मूर्ति के आगे आरती भी करते हैं।
#WATCH | Sukma, Chhattisgarh: CRPF 74 Corps revived a Hindu Ram Temple and handed it over to the local villagers, which was closed down in 2003 due to Naxal terror. (08.04) pic.twitter.com/08jQmfaZux
इस संबंध में सीआरपीएफ की 74वीं कोर के कमांडेंट हिमांशु पांडेय ने बताया कि सुकमा के लाखापाल में बीते 14 मार्च को सीआरपीएफ ने अपना कैंप लगाया था। लाखापाल में ही केरलापेंडा गाँव आता है।
सीआरपीएफ ने देखा कि गाँव में एक मंदिर टूटी-फूटी हालत में है। गाँव वालों से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ये मंदिर ऐतिहासिक है और यहाँ साल में एक बार मेला भी लगता था। इसके बाद नक्सलियों ने यहाँ पूजा-पाठ बंद करा दिया।
#WATCH | Sukma, Chhattisgarh: CRPF 74 Corps Commandant Himanshu Pandey says, "On March 14, 2023, CRPF set up their camp in Lakhapal... In the Keralapenda village, we saw a temple which was in ruins. The villagers informed us that it was a historical temple and there also used to… https://t.co/cJaTe75s1rpic.twitter.com/Z6K7ryFwk8
Why would the Naxals stop prayers in Temple? their demands have nothing to do with religion Temple.Only reason is they must have taken money from missionaries to convert and stop Hindu practices.Same story in Jharkhand,Orissa,NE,other remote tribal areas. Rahul Vinci aiding them.
मंदिर के कपाट दोबारा खोले जाने पर ग्रामीणों ने अपनी खुशी जाहिर की है। बताया गया कि 2003 में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के सुकमा स्थित इस मंदिर को तोड़-फोड़ दिया था। ग्रामीणों को धमकी दी गई थी कि इस मंदिर में कोई पूजा नहीं करेगा। हालाँकि अब सीआरपीएफ के जवानों के कारण इस मंदिर में दोबारा से पूजा पाठ शुरू होगी, यह देख गाँव के लोग बहुत खुश हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1970 में राम मंदिर की स्थापना बिहारी महाराज द्वारा की गई थी। उस समय ग्रामीणों ने सिर पर सीमेंट, पत्थर, बजरी, सरिया लादा और सुकमा से लगभग 80 किलोमीटर दूर पैदल चलकर निर्माण सामग्री पहुँचाई थी। मंदिर का निर्माण हुआ तो रामभक्ति में पूरा क्षेत्र रम गया। धीरे-धीरे इलाके में मांसाहार, मदिरा का सेवन भी बंद हो गया।
बताया जाता है कि आज भी गाँव के 95 प्रतिशत लोग मांसाहार, मदिरापान का सेवन नहीं करते। ग्रामीणों ने बताया कि यहाँ कभी भव्य मेला भी लगता था। साधु-संन्यासी अयोध्या से आते थे, लेकिन नक्सल प्रकोप बढ़ने व नक्सलियों द्वारा पूजा-पाठ बंद करवा देने से मेला आयोजन बंद हो गया। नक्सलियों ने मंदिर को अपवित्र कर ताला लगा दिया।
मंदिर के कपाट दोबारा खुलने की खबर सोशल मीडिया पर देखने के बाद नेटिजन्स अपनी खुशी जाहिर कर रहे हैं। सीआरपीएफ के जवानों को आभार व्यक्त किया जा रहा है। लोग कह रहे हैं हमारी सेना और सीआरपीएफ देश और संस्कृति दोनों की रक्षा करती है।
संसद में सुरक्षा चूक, लोकसभा में घुसे 2 प्रदर्शनकारी (फोटो साभार: Youtube_SansadTV)
संसद पर साल 2001 में हुए हमले की 22वीं बरसी पर सुरक्षा चूक का मामला सामने आया है। लोकसभा में कार्यवाही के दौरान दो प्रदर्शनकारी गैलरी से सदन में कूद गए, जिन्हें सांसदों ने ही पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। ये सुरक्षा चूक का बड़ा मामला है, जिसमें सांसद से जारी पास के आधार पर लोकसभा के दर्शक दीर्घा तक पहुँचे दो लोगों ने लोकसभा की कार्यवाही के दौरान ही सदन में छलांग लगा दिया। उन्होंने सुरक्षा घेरे को धता बताकर नारेबाजी की।
हालाँकि, उन्हें सांसदों ने ही पकड़ लिया। इन दो लोगों के अलावा संसद के बाहर भी स्मोक केन से धुआँ निकाल कर प्रदर्शन कर रहे दो लोगों को हिरासत में लिया गया है।
अब सांसद ही मांग कर रहे हैं कि जिस सांसद की मार्फ़त ये उपद्रवी संसद पहुंचे हैं,उस सांसद को भी तुरंत हिरासत में लेकर पूछताछ करनी चाहिए। यह भी सम्भावनायें व्यक्त की जा रही हैं, धुंए का सामान सांसद की कार में ले जाया गया हो? इस सांसद को सदस्यता ही समाप्त नहीं हो. बल्कि इसके बैंक खातों को भी तुरंत सील किया जाये।
ANI की रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा में ये घुसपैठ ठीक 1 बजकर 1 मिनट पर हुई। उस समय सदन में पश्चिम बंगाल के मालदा उत्तर सीट से भाजपा के लोकसभा सांसद खरगेन मुर्मू अपनी बात रख रहे थे। इसी दौरान एक युवक ने लोकसभा में छलांग लगा दी। अगले ही क्षण पीठाधीन राजेंद्र अग्रवाल ने सदन को 2 बजे तक के लिए स्थगित कर लिया। इस बीच लोकसभा में मौजूद सांसदों ने सुरक्षा घेरा तोड़ने वाले दोनों युवकों को पकड़ लिया।
बताया जा रहा है कि लोकसभा में सुरक्षा घेरे को तोड़ने वाले युवकों ने जूते में स्मोक कनस्तर छिपा रखे थे, उन्होंने सदन के भीतर नारेबाजी भी की।
#WATCH | An unidentified man jumps from the visitor's gallery of Lok Sabha after which there was a slight commotion and the House was adjourned. pic.twitter.com/Fas1LQyaO4
इस बीच दिल्ली पुलिस ने ट्रांसपोर्ट भवन के सामने दो प्रदर्शनकारियों, एक पुरुष और एक महिला को हिरासत में लिया है, जो रंग-बिरंगा धुआँ छोड़ने वाली सामग्री के साथ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। घटना संसद के बाहर हुई। उन्हें दिल्ली पुलिस के जवानों ने तुरंत हिरासत में ले लिया। हिरासत में लिए गए व्यक्तियों में एक महिला भी है, जो नारेबाजी करती दिख रही है।
#WATCH | Delhi: Two protestors, a man and a woman have been detained by Police in front of Transport Bhawan who were protesting with colour smoke. The incident took place outside the Parliament: Delhi Police pic.twitter.com/EZAdULMliz
हिरासत में लिए गए आरोपितों को संसद मार्ग पुलिस स्टेशन ले जाया गया है। दिल्ली पुलिस की एंटी टेरर यूनिट स्पेशल सेल पार्लियामेंट के अंदर हंगामा करने वाले लोगों से पूछताछ करने पहुँच गई है।
#WATCH | Delhi: The two people protesting with colour smoke outside the Parliament, in front of Transport Bhawan were detained by Police and taken to Parliament Street Police Station. pic.twitter.com/ja9IgU7P9k
शिवसेना (UBT) सांसद अरविंद सावंत ने इस बारे में बताया कि इस घटना में कोई घायल नहीं हुआ। जब वे नीचे कूदे तो पीछे की बेंचें खाली थीं, वे पकड़े गए। सदन में दो मंत्री भी मौजूद थे
#WATCH | Security breach in Lok Sabha | Shiv Sena (UBT) MP Arvind Sawant says, "...Nobody got injured. When they jumped down, the benches at the back were unoccupied so they were caught...Two ministers were in the House." pic.twitter.com/ig0Z1z2dCG
कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने बताया कि अचानक करीब 20 साल के दो युवक दर्शक दीर्घा से सदन में कूद पड़े और उनके हाथ में कनस्तर थे। इन कनस्तरों से पीला धुआँ निकल रहा था। उनमें से एक अध्यक्ष की कुर्सी की ओर भागने की कोशिश कर रहा था। वो लोग नारेबाजी भी कर रहे थे। कार्ति चिदंबरम ने इसे सुरक्षा चूक का गंभीर उल्लंघन बताया है।
#WATCH | Security breach in Lok Sabha | Congress MP Karti Chidambaram says "Suddenly two young men around 20 years old jumped into the House from the visitor's gallery and had canisters in their hand. These canisters were emitting yellow smoke. One of them was attempting to run… pic.twitter.com/RhZlecrzxo
बताया जा रहा है कि ये लोग मैसूर के सांसद द्वारा जारी पास के आधार पर लोकसभा की गैलरी तक पहुँचे थे। उन्होंने जूते में रंग-बिरंगा धुआँ फेंकने वाले कनस्तर छिपाए थे। उनके पास किसी तरह का विस्फोटक या घातक हथियार नहीं मिला। सूत्रों के मुताबिक, एक युवक का नाम सागर है और उनका मकसद लोकसभा में हंगामा मचाकर लोकप्रियता हासिल करना था।