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क्या 30 दिन के बाद पाकिस्तान पानी से बेहाल होने वाला है? सिंधु के पानी को लेकर पाकिस्तान के मंत्री इशाक डार ने European Union के सामने दुखड़ा रोया

सिंधु के पानी को लेकर पाकिस्तान के मंत्री इशाक डार ने EU के सामने दुखड़ा रोया (साभार- Business Today/profit by pakistan today)
पाकिस्तान ने हाल ही में यूरोपियन यूनियन (EU) की मीटिंग में सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty – IWT) को लेकर अपना दुखड़ा सुनाया है। पाकिस्तान का दावा है कि उनके पास सिर्फ 30 दिनों का पानी बचा है। पाकिस्तान इसका जिम्मेदार भारत को कह रहा है। इतना ही नहीं अभी अफगानिस्तान की तरफ से भी पाकिस्तान पर मुसीबत आने वाली है। 

पाकिस्तान का कहना है कि सिंधु जल संधि की गोलबंदी और भारत के पानी रोकने के कारण पाक में जल संकट की स्थितियाँ बनी हैं। इस मुद्दे को लेकर 2025 की IEP (इकोलॉजिकल थ्रेट रिपोर्ट) में भी चेतावनी दी गई है।

इसमें लिखा गया है कि पाकिस्तान की कृषि प्रणाली लगभग 80% सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर है और वर्तमान में ये गंभीर जल संकट के खतरे में है। इस पूरे मुद्दे को भारत-पाकिस्तान के इतिहास, सिंधु जल संधि के प्रावधानों और हालिया विवादों के साथ समझे जाने की जरूरत है।

IEP की 2025 की रिपोर्ट में क्या हैं प्रमुख दावे

ऑस्ट्रेलिया के थिंक-टैंक इंस्टीट्यूट फॉर इकनॉमिक्स एंड पीस (IEP) द्वारा जारी ‘इकोलॉजिकल थ्रेट रिपोर्ट 2025’ में कहा गया कि सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र गंभीर जल संकट के खतरे का सामना कर रहा है। इसके अनुसार, भारत के बाँध प्रबंधन में मामूली बदलाव भी पाकिस्तान के लिए गंभीर नुकसान पहुँचाने वाला साबित हो सकता है।
रिपोर्ट में जल संकट को व्यापक पर्यावरणीय और सामाजिक खतरा बताया गया है जो पाकिस्तान की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। पानी की कमी के कारण सिंधु बेसिन में खाद्य उत्पादन, रोजगार, और आर्थिक गतिविधियां गहरे संकट में आ सकती हैं। रिपोर्ट ने भारत और पाकिस्तान दोनों को बेहतर संवाद और जल प्रबंधन पर ध्यान देने की सलाह दी है।

भारत के जल प्रबंधन की रणनीति और जियोपॉलिटिकल विवाद

भारत ने अपनी जल संरचनाओं में इजाफा किया है। इसमें ब्यास नदी को गंगा से और सिंधु को यमुना से जोड़ने वाली नई नहर परियोजनाएँ, जल संचयन सुविधाओं का विकास और सिंधु बेसिन के जल अधिकारों पर रणनीतिक नियंत्रण शामिल है।
भारत का तर्क है कि जनसंख्या वृद्धि और बढ़ती कृषि माँग के मद्देनजर जल की अपनी जरूरतों को पूरा करना जरूरी है। भारत ने सिंधु जल संधि के प्रावधानों की दोबारा समीक्षा करने की माँग की है।
इस समीक्षा में जल संसाधनों के न्यायसंगत और संतुलित उपयोग (Equitable and Reasonable Utilization – ERU) और किसी भी प्रकार के नुकसान से बचने (No-Harm Rule) के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत शामिल हो सकते हैं। भारत ने जल सुरक्षा के पहलुओं को भी प्रमुखता दी है और यह भी कहा है कि उसकी परियोजनाएँ संधि के तकनीकी मानकों के अनुरूप हैं।

पाकिस्तान के लिए सिंधु जल संकट के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांत को देश का ‘अन्न भंडार’ कहा जाता है। ये दोनों सिंधु नदी जल पर काफी निर्भर हैं। जल संकट के कारण खेत सूखाग्रस्त हो रहे हैं, फसलों का उत्पादन गिर रहा है, और खाद्य सुरक्षा संकट गहरा रहा है।
कपास, गेहूं, चावल जैसी प्रमुख फसलों की उपज में भारी कमी आ रही है, जो पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर सकती है। इसके साथ ही, जल संकट से ग्रामीण रोजगार में कमी, खाद्य कीमतों में वृद्धि और सामाजिक उथल-पुथल की आशंका भी बढ़ रही है।
जल संकट को कभी-कभी ‘जल आतंकवाद’ के रूप में भी देखा जाता है, जिसमें जल संसाधन के नियंत्रण को राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

क्या था भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि का इतिहास

सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से बनी एक संधि है। यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी से निकलने वाले जल का बँटवारा सुनिश्चित करती है।
सिंधु नदी में तीन पश्चिमी नदियाँ सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान को आवंटित की गईं जबकि तीन पूर्वी नदियाँ रावी, बीस और सतलज भारत के पाले में आई। संधि के अनुसार, भारत के पास पश्चिमी नदियों के जल पर नियंत्रण करने का अधिकार नहीं था, लेकिन भारत अपने बांध और जल प्रबंधन परियोजनाओं के लिए पूर्वी नदियों के जल का उपयोग कर सकता था।
इस समझौते में यह भी प्रावधान था कि भारत पाकिस्तान के जल आपूर्ति को बिना प्रभावित किए पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग सीमित मात्रा में कर सकता है। विश्व बैंक ने संधि की निगरानी और विवाद समाधान में सहायता की जिम्मेदारी भी ली थी।
सिंधु जल संधि इसलिए ऐतिहासिक रूप से भारत-पाकिस्तान के बीच सीमांत जल विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण समझी जाती रही है। हालाँकि 2023 से 2025 के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और खासकर 26 अप्रैल 2025 पहलगाम आतंकी हमले के बाद, भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला किया।
इससे पाकिस्तान में जल संकट बढ़ गया। पाकिस्तान की इंडस रिवर सिस्टम अथॉरिटी (IRSA) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि सिंधु नदी बेसिन से मिले पानी की मात्रा में हर वर्ष औसतन 13.3% की कमी आ रही है। इसके कारण पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र में काफी परेशानी हो रही है।
सिंधु नदी की दो प्रमुख जलाशयों तरबेला और मंगला का जलस्तर डेड स्टोरेज लेवल पर पहुँच चुका है। इसका मतलब है कि पानी की आपूर्ति लगभग खत्म होने वाली है। इस कमी के कारण कपास की खेती समेत कई अहम फसलों की उपज में गिरावट देखने को मिली है।
पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि को दोबारा स्थापित करने और पानी बँटवारे में अपने ‘न्याय’ के लिए विश्व बैंक से फिर से मध्यस्थता की माँग की, मगर विश्व बैंक ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद पाकिस्तान ने यूरोपीय संघ सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ अपना रोना रोया। उसने दावा किया कि जल संकट की वजह से पाकिस्तान की किसानी और जीविका पर भारी असर पड़ा है। साथ ही, पाकिस्तान की ओर से इस संकट को ‘जल संकट आपातकाल’ कहा जा रहा है।

संधि का वर्तमान स्वरूप और विवाद के क्या हैं समाधान

सिंधु जल संधि विश्व में जल विवादों के लिए एक ऐसा उदाहरण रही है जिसे दोनों देशों ने विवाद के समाधान के लिए अपनाया था। हालाँकि, वर्तमान स्थिति में यह संधि संकट में है।
दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी और राजनीतिक तनाव के कारण संधि के पालन और वाटर शेयरिंग पर असहमति गहरी हो गई है। विश्व बैंक की मध्यस्थता और तटस्थ विशेषज्ञों की नियुक्ति के बावजूद विवाद नहीं सुलझ पाया है।
जल संकट को लेकर भारत और पाकिस्तान के संवाद के बिना समाधान की राहें अभी दूर हैं। जल अधिकारों पर नए नियम, जल उपयोग के तकनीकी सुधार और क्षेत्रीय जल प्रबंधन के नए ढाँचे की जरूरत महसूस की जा रही है। इसके लिए दोनों को संयुक्त प्रयास, संघर्ष कम करना, और परस्पर भरोसा स्थापित करना होगा।
सिंधु जल संधि का संघर्ष और जल संकट क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और जल संरक्षण के लिहाज से बेहद संवेदनशील मामला है। पाकिस्तान EU समेत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी दिक्कतों को रखकर गम्भीर संकट की स्थिति दिखलाने और उशका पीड़ित बनने की कोशिश कर रहा है।
वहीं, भारत जल संसाधन प्रबंधन और राष्ट्रीय हितों के तहत अपनी रणनीति को मजबूती दे रहा है। इस जटिल विवाद का दीर्घकालिक समाधान द्विपक्षीय या बहुपक्षीय संवाद, जल कानूनों के आधुनिकरण, पर्यावरणीय स्थिरता और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से ही संभव है। सिंधु जल संधि की वर्तमान स्थिति बताती है कि जल को लेकर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों का टकराव भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।

डोनाल्ड ट्रंप की गोद में बैठ असीम मुनीर ने भारत को दी ‘न्यूक्लियर हमले’ की गीदड़भभकी, कहा- आधी दुनिया को अपने साथ ले जाएँगे: सिंधु पर बाँध बना तो 10 मिसाइल मारेंगे

भूखे-प्यासे पाकिस्तान में जनता रोटी को तरस रही और हुक्मरान परमाणु बम का ख्वाब देख रहे हैं। कुछ दिनों पहले भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पाकिस्तान बीच बचाव के लिए अमेरिका से भीख माँग रहा था। अब पाकिस्तानी का सेना प्रमुख डोनाल्ड ट्रंप की गोद में बैठकर भारत को गीदड़भभकी दे रहा है। वो भी न्यूक्लियर हमले की।

जिस तरह ट्रम्प और मुनीर की बीच खिचड़ी पक रही है, देखना यह है कि कौन किसको लेकर डूबेगा? एक का डूबना पक्का है। एक भी वर्षों से एक कहावत चलती आ रही है कि गरीब की जोरू को हर कोई भाभी बनाता आया है।   

पाकिस्तान और अमेरिका के हुक्ममारों को नहीं मालूम कि भारत का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खतरों का खिलाडी है। मोदी को दी जाने वाली धमकी उग्र बनाती है। हर धमकी मोदी के लिए सफलता की सीढ़ी का काम करती है। अभी हाल में दुनिया ने देख भी लिया। आतंकी हमला का पाकिस्तान को घर में घुसकर मारा। दूसरे, जिस अमेरिका के आगे दुनियां झुकती है लेकिन मोदी एक चट्टान बन खड़े हैं। मुनीर तो बिन बुलाए पाकिस्तान पहुँच गया लेकिन मोदी को डोनाल्ड ट्रम्प ने कनाडा से भारत वापस जाते हुए अमेरिका होकर जाने को कहा था। मोदी ने डिप्लोमेटिक तरीके से मना कर दिया। टैरिफ की धमकी भी मोदी पर बेअसर हो रही है। पाकिस्तान को नहीं मालूम कि उसके नुक्लिएर भारत के मुकाबले बहुत हलके हैं। पाकिस्तान के नुक्लिएर भारत में ज्यादा नुकसान नहीं कर पाएंगे लेकिन भारत के नुक्लिएर दुनियां के नक़्शे से पाकिस्तान का नाम गायब कर देगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी यही बात कह चुके हैं। जब कारगिल युद्ध के दौरान के जब अमेरिका द्वारा पाकिस्तान की नुक्लिएर धमकी के जवाब में कहा था कि "पाकिस्तान सवेरे का सूरज नहीं देखेगा।"     

मुनीर ने क्या कहा?

द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी दौरे पर पहुँचे मुनीर ने एक डिनर पार्टी में गीदड़भभकी देते हुए कहा कि भारत के साथ युद्ध में पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरा हुआ तो वो इस क्षेत्र को परमाणु युद्ध में झोंक देगा। मुनीर ने कहा, “हम एक परमाणु राष्ट्र हैं, अगर हमें लगता है कि हम डूब रहे हैं, तो हम आधी दुनिया को अपने साथ ले जाएँगे।” माना जा रहा है कि यह अमेरिकी धरती से किसी तीसरे देश को पहली परमाणु धमकी है।

पाकिस्तान द्वारा पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिया है। मुनीर ने इस पर भी जहर उगला है। मुनीर ने इस फैसले से 25 करोड़ लोगों को भुखमरी का खतरा बताया है। मुनीर ने कहा, “हम भारत के बांध बनाने का इंतजार करेंगे और जब वह ऐसा करेगा, तो हम उसे 10 मिसाइलों से तबाह कर देंगे।” मुनीर ने कहा, “सिंधु नदी भारत की पारिवारिक संपत्ति नहीं है। हमें मिसाइलों की कमी नहीं है, अल्हम्दुलिल्लाह।”

मुनीर ने खुद ही कर दी पाकिस्तान की बेइज्जती

मदरसे में पढ़े और कट्टर इस्लामिक विचारधारा को मानने वाले मुनीर ने खुद ही पाकिस्तान की बेइज्जती भी कर दी है। पाकिस्तान की भूखी-नंगी हालात को मुनीर से बेहतर कौन जानता होगा। उसके उदाहरण भी वैसे ही है।

मुनीर ने कहा, “भारत एक चमचमाती हुई मर्सिडीज़ है जो फेरारी की तरह हाईवे पर आ रही है। हम बजरी से भरा एक डंप ट्रक हैं। अगर ट्रक कार से टकरा जाए, तो नुकसान किसका होगा?”

पाकिस्तान खुद को सड़क छाप, टक्कर मारने वाले गुंडे से ज्यादा क्या ही समझेगा। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान का ‘डंप ट्रक’ अब बिना पेट्रोल, बिना ड्राइवर और बिना ब्रेक के खाई में गिर चुका है। मुनीर ये मत भूलना कि भारत की मर्सिडीज दौड़ती रहेगी और पाकिस्तान का ट्रक कबाड़ में ही बिकेगा।

यह बात भी साफ है कि भारत ने पाकिस्तान के परमाणु ब्लैकमेल को ना सुनने का भी मन बना लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्पष्ट कर चुके हैं कि अब कोई न्यूक्लियर धमकी नहीं सुनी जाएगी।

मुनीर ने अपने दौरे के दौरान अमेरिकी राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों के साथ-साथ पाकिस्तानी प्रवासी समुदाय से भी मुलाकात की। इस दौरान मुनीर ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के निवर्तमान कमांडर जनरल माइकल कुरीला के सेवानिवृत्ति समारोह और एडमिरल ब्रैड कूपर के कार्यभार ग्रहण समारोह में भी हिस्सा लिया है।

पानी के लिए तरस रहा पाकिस्तान, 4 बार पत्र लिखकर भारत से लगाई गुहार: सिंधु जल समझौता रद्द होने के बाद बाँध सूखे, खेती-बाड़ी और बिजली के चौपट होने का खतरा

                                                                                                          प्रतीकात्मक फोटो साभार: WION
भारत के सिंधु जल समझौता निलंबित करने का असर पाकिस्तान पर दिखने लगा है। भीषण गर्मी में पाकिस्तान के बाँध सूख रहे हैं। इन बाँधों से पानी भी कम छोड़ा जा रहा है। इसके चलते पाकिस्तान में खेती पर असर पढ़ने की संभावना है। पानी कम होने का असर सीधे-सीधे आँकड़ों में भी दिखा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान में सिंधु नदी पर बने बाँधों से इस वर्ष कम पानी छोड़ा जा रहा है। पिछले वर्ष के मुकाबले इसमें लगभग 15% की कमी आई है। इस बात की पुष्टि आधिकारिक डाटा से हुई है। यह कमी बीते सप्ताह (1 जून 2025-8 जून 2025) में आई है।

सूखे पाकिस्तान के बाँध

पाकिस्तान में सिंधु नदी के सहारे ही खेती और बाकी उद्योग चलते हैं। यह पाकिस्तान के पंजाब समेत बाकी राज्यों की जीवनरेखा सरीखी है। इसी पर कई बाँध भी बनाए गए हैं। अब पाकिस्तान के पंजाब में सिंधु से छोड़ा जाने वाला पानी मात्र 1.24 लाख क्यूसेक रह गया है। पिछले वर्ष यह 1.44 लाख क्यूसेक था।

पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण तरबेला बाँध भी सूख रहा है। तरबेला बाँध में सिंधु नदी का स्तर वर्तमान में 1465 मीटर पर है। यह इसके डेड लेवल 1402 मीटर से थोड़ा ही ऊपर है। किसी बाँध का डेड लेवल वह स्तर होता है, जहाँ से पानी को आगे भेजने के लिए पम्प का इस्तेमाल होता है।

इससे ऊपर के स्तर से पानी स्वयं ही आगे बह जाता है। यह हाल सिर्फ तरबेला बाँध का ही नहीं है बल्कि सिंधु नदी पर ही बने चश्मा बाँध का भी यही हाल है। पाकिस्तान के मियांवाली में बने इस बाँध में पानी का स्तर, डेड लेवल मात्र से 6 मीटर ही ऊपर है। यहाँ डेड लेवल 638 मीटर का है, जबकि यहाँ पानी का स्तर 644 मीटर है।

इस भीषण गर्मी में पानी की लगातार माँग बढ़ने वाली है, ऐसे में जल्द ही पाकिस्तान को और पानी इन बाँधों से छोड़ना पड़ेगा। तब यह डेड लेवल पर जा सकते हैं। पाकिस्तान के एक और महत्वपूर्ण मंगला बाँध में भी यही हाल है। यह झेलम नदी पर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बना है।

इसमें भी डेड लेवल 1050 मीटर के निकट ही 1163 मीटर पर पानी आ चुका है। इस पानी की कमी से पाकिस्तान में केवल खेती ही नहीं बल्कि बिजली का उत्पादन भी प्रभावित होने वाला है। पाकिस्तान इन बाँधों से बनने वाली पनबिजली पर बड़े स्तर पर निर्भर है।

खरीफ बुवाई में 21% पानी की कमी

पाकिस्तान का पंजाब और सिंध प्रांत बड़े स्तर पर सिंधु नदी से आने वाले पानी पर निर्भर है, इसी से यहाँ खेती होती है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट कहती है कि 10 जून, 2025 तक चलने वाली खरीफ की बुवाई में 21% पानी की कमी पाकिस्तान को इस वर्ष झेलनी पड़ेगी। यह असर सीधे तौर पर भारत के एक्शन का होगा।

पानी की कमी से परेशान पाकिस्तान अब लगातार भारत से सिंधु जल समझौते पर बात करने की गुहार लगा रहा है। उसने सिंधु जल समझौता निलंबित किए जाने के बाद 4 बार भारत को पत्र लिख कर ऐसा ना करने की गुहार लगाई है। पाकिस्तान ने यह पत्र भारत के जलशक्ति मंत्रालय को लिखे हैं। हालाँकि, भारत अपने स्टैंड पर कायम है।

क्या है सिन्धु जल समझौता?

भारत और पाकिस्तान, एक ही भूभाग का हिस्सा है। भारत से कई नदियाँ बह कर पाकिस्तान जाती हैं। सिंधु नदी तंत्र की नदियाँ पाकिस्तान के पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। इन्हीं के पानी के बँटवारे को लेकर किया गया समझौता सिंधु जल समझौता कहलाता है।

यह समझौता वर्ष 1960 में हुआ था। इसके लिए लगभग एक दशक तक बातचीत पाकिस्तान और भारत के बीच चली थी। तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के तानाशाह अयूब खान ने इसको मंजूरी दी थी। सिंधु जल समझौते के तहत सिंधु नदी तंत्र की 6 नदियों (व्यास, रावी, सतलुज, सिन्धु, चेनाब और झेलम) के पानी का बँटवारा होता है।

इस जल समझौते के अनुसार, पूर्वी नदियाँ (व्यास, रावी और सतलुज) के पानी पर पूरा अधिकार भारत का है। यानी इनमें बहने वाले पानी का वह किसी भी तरह से इस्तेमाल कर सकता है। भारत इन नदियों पर बाँध बना सकता है, उनकी जलधाराएँ मोड़ सकता है, उनसे नहरें निकाल सकता है और पूरा उपयोग कर सकता है।

सिंधु जल समझौते के अनुच्छेद 2 का खंड (1) कहता है, “पूर्वी नदियों का पूरा पानी भारत के अप्रतिबंधित उपयोग के लिए उपलब्ध रहेगा, सिवाय इसके कि इस अनुच्छेद में अन्यथा अलग से उसके लिए कोई प्रावधान किया गया हो।” पूर्वी नदियों को लेकर पाकिस्तान को दखलअंदाजी करने का कोई अधिकार नहीं है।

इसको लेकर भी अनुच्छेद 2 के खंड (2) में प्रावधान है। इसमें लिखा है, “घरेलू उपयोग को छोड़कर, पाकिस्तान सतलुज और रावी नदियों के पानी को बहने देने के लिए बाध्य होगा और उन स्थानों पर इनके पानी में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं होने देगा, जहाँ ये पाकिस्तान में बहती हैं और अभी तक पूरी तरह से पाकिस्तान में प्रवेश नहीं कर पाई हैं।”

दरअसल, यह नदियाँ पाकिस्तान में अंतिम रूप से घुसने से पहले कई बार दोनों सीमाओं के इधर-उधर बहती हैं। पूर्वी नदियों के अलावा बाक़ी पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चेनाब) के पानी पर पूरा अधिकार पाकिस्तान का है। समझौता के अनुसार, भारत इन नदियों को लेकर कोई भी रोक नहीं लगा सकता।

समझौते का अनुच्छेद 3 का भाग (2) कहता है, “भारत पश्चिमी नदियों के जल को बहने देने के लिए बाध्य होगा, और इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देगा, कुछ परिस्थितियों को छोड़ कर।” यह परिस्थितियाँ घरेलू उपयोग और कृषि उपयोग से जुड़ी हुई हैं।

इस समझौते के तहत इन 6 नदियों के लगभग 70%-80% पानी पर पाकिस्तान को जबकि 20%-30% पानी पर भारत को अधिकार मिलता है। इसको लेकर पहले भी प्रश्न उठाए जाते रहे हैं कि इसका सीधा फायदा पाकिस्तान को मिला है और भारत का इससे कोई लाभ नहीं है।

अब जब भारत ने 22 अप्रैल, 2025 को हुए पहलगाम हमले के बाद ने यह समझौता रद्द कर दिया है, तो पाकिस्तान में पानी की कमी साफ़ तौर पर दिखने लगी है।

भारत ने बगलिहार बाँध से चिनाब का रोका पानी, पहलगाम अटैक के बाद तोड़ दी थी पाकिस्तान से सिंधु जल संधि


पाकिस्तान को सबक सिखाने की शुरुआत हो चुकी है! जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 26 हिंदू पर्यटकों के नृशंस नरसंहार के बाद भारत ने पड़ोसी मुल्क की नकेल कसना शुरू कर दिया है। सीमा पर दोनों देशों की सेनाएँ आमने-सामने हैं, और भारत ने अपनी सेना को खुली छूट दे दी है। लेकिन यह केवल सैन्य मोर्चे की बात नहीं है; भारत ने पानी के मोर्चे पर भी पाकिस्तान को करारा झटका दिया है। चेनाब नदी पर बने बगलिहार डैम के फाटक बंद कर दिए गए हैं, जिससे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में पानी की भारी किल्लत होने वाली है।

यह कदम सिंधु जल संधि को तोड़ने के महज 10 दिनों बाद उठाया गया है, जिसे विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में लागू किया गया था।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बगलिहार डैम, जो रन-ऑफ-द-रिवर हाइड्रो पावर प्लांट के रूप में बनाया गया था, अब पानी के प्रवाह को रोकने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। पहले इस डैम से बिना रुकावट पानी बहता था और बिजली पैदा की जाती थी, लेकिन अब भारत ने इसे हथियार बना लिया है। चेनाब नदी का पानी पाकिस्तान के पंजाब में खेतों की सिंचाई के लिए जीवन रेखा है। इस कदम से वहाँ की कृषि और अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान होगा।

इतना ही नहीं, भारत अब झेलम नदी पर बने किशनगंगा डैम के जरिए भी पानी रोकने की तैयारी कर रहा है। इन डैमों से भारत पानी के प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है, यानी बिना चेतावनी के पानी कम या ज्यादा कर सकता है, जो पाकिस्तान के लिए तबाही ला सकता है।

सिंधु जल संधि के तहत छह नदियों का बँटवारा हुआ था। पूर्वी नदियाँ (सतलुज, ब्यास, रवि) भारत को और पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, चेनाब, झेलम) पाकिस्तान को मिली थीं। लेकिन भारत में लंबे समय से इस संधि पर सवाल उठते रहे हैं। कई लोग मानते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसमें जरूरत से ज्यादा उदारता दिखाई। 1965, 1971 और 1999 की जंगों में भी भारत ने यह संधि नहीं तोड़ी, लेकिन इस बार पाकिस्तान की आतंकी हरकतों का जवाब देने के लिए भारत ने कड़ा रुख अपनाया है।

पहलगाम हमले के बाद संधि को निलंबित कर चेनाब का पानी रोकना भारत का कूटनीतिक और रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक है। पाकिस्तान, जो अपनी 80% कृषि के लिए सिंधु नदी सिस्टम पर निर्भर है, अब जंग की धमकी दे रहा है। लेकिन भारत का यह वाटर अटैक तो बस शुरुआत है, आगे और सबक सिखाए जाएँगे!

सिंधु जल समझौता रोकने का असर शुरू: पानी का फ्लो कंट्रोल कर कभी सूखा कभी बाढ़ आने से पाकिस्तान में अफरा-तफरी


पहलगाम हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि स्थगित की, तो लेफ्ट लिबरल गैंग के पेट में अचानक दर्द होने लगा। इसने ये सवाल उठा दिए कि संधि को स्थगित करने का इम्पैक्ट दिखने में तो सालों लग जाएंगे। लेकिन पीएम मोदी जिस स्पीड और स्केल पर काम करते हैं, उससे पाकिस्तान पर इसका असर अभी से दिखने लगा है। क्योंकि भारत भले ही पाकिस्तान जाने वाला पूरा पानी तत्काल रोक नहीं सकता, लेकिन इसके फ्लो को कंट्रोल करना भारत के हाथ में है। यही वजह है कि भारत ने नदियों के पानी के फ्लो को कंट्रोल करके ही पाकिस्तान का गेम बजा शुरू कर दिया है। भारत ने पहले चिनाब का फ्लो रोका, फिर 26 अप्रैल को झेलम का पानी अचानक छोड़ दिया। इसलिए पाकिस्तान के प्रभावित इलाकों में अचानक अफरा-तफरी मच गई और वाटर इमरजेंसी लगानी पड़ी। जहां तक संधि को स्थगित करने पर सवालिया निशान लगाने का मामला है तो वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के तहत भारत इस आधार पर संधि से पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान उसके खिलाफ आतंकी गुटों का इस्तेमाल कर रहा है। इंटरनेशनल कोर्ट ने भी कहा है कि अगर मौजूदा स्थितियों में कोई बदलाव हो तो कोई भी संधि रद्द की जा सकती है।

अच्छे रिश्तों के बिना सिंधु जल समझौते को जारी नहीं रखा जा सकता
पहलगाम में आतंकी हमले के एक दिन बाद पीएम मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक में पाकिस्तान के खिलाफ 5 बड़े फैसले हुए। इनमें सबसे अहम था- सिंधु जल समझौते को स्थगित करना। 1960 में भारत-पाकिस्तान के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत सिंधु वाटर सिस्टम की 3 पूर्वी नदियों का पानी भारत इस्तेमाल कर सकता है और बाकी 3 पश्चिमी नदियों के पानी पर पाकिस्तान को अधिकार दिया गया था। सीसीएस की बैठक के अगले ही दिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के घर पर जल शक्ति मंत्रालय की बैठक हुई। बैठक के बाद जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने कहा कि सिंधु नदी का एक बूंद पानी पाकिस्तान नहीं जाएगा। इसके साथ ही भारत में जलशक्ति सचिव देवश्री मुखर्जी ने पाकिस्तानी जल संसाधन मंत्रालय के सचिव मुर्तजा को पत्र लिखकर साफ-साफ कह दिया कि यह संधि अच्छे संदर्भ में की गई थी, लेकिन अच्छे रिश्तों के बिना इसे जारी नहीं रखा जा सकता।

पानी के फ्लो के कंट्रोल से तत्काल आएगा पाकिस्तान पर असर
सिंधु, झेलम और चिनाब बड़ी नदियां हैं। मई से सितंबर के बीच जब बर्फ पिघलती है तो ये नदियां अपने साथ अरबों क्यूबिक मीटर पानी लेकर पाकिस्तान में घुसती हैं। इनमें से चिनाब पर भारत ने बगलीहार डैम, रतले प्रोजेक्ट, चिनाब की सहायक नदी मारुसूदर पर पाकल डुल प्रोजेक्ट और झेलम की सहायक नदी नीलम पर किशनगंगा प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। सिंधु बेसिन के पूरे पानी को भारतीय इलाकों में मोड़ने के लिए बड़े बांध और डायवर्जन प्रोजेक्ट लगाने होंगे। इसमें भले ही कुछ समय लग सकता है, लेकिन नदियों के पानी के फ्लो का कंट्रोल करके भारत तत्काल पाकिस्तान पर असर डाल सकता है। इसे आप यूं समझ सकते हैं कि पाकिस्तान में एक सुबह उनको यह पता चले कि आज पानी नहीं आ रहा। फिर अगली ही सुबह हाल ये हो जाए कि आपके मोहल्ले की गलियों से लेकर घर के कमरे तक पानी से भरे हों। किस दिन क्या होगा, आपको पहले से इसकी खबर तक न मिले। ऐसे में पाकिस्तान के इन नदियों के जुड़े इलाकों में अफरा-तफरी की स्थिति बन जाएगी।

नदियों का पानी इतनी तबाही मचाएगा कि पाक को होगी भारी परेशानी
इसी तरह भारत भले ही रातोंरात पाकिस्तान का पूरा पानी हमेशा के लिए नहीं रोक सकता, लेकिन वह अस्थायी तौर पर झेलम, चिनाब और सिंधु जैसी नदियों के पानी का फ्लो कंट्रोल करके पाकिस्तान के पंजाब के इलाके से लेकर कराची तक पानी की सप्लाई डिस्टर्ब कर सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ‘भारत के पास अब पानी का फ्लो डिस्टर्ब करके और उससे जुड़ी जानकारी रोककर पाकिस्तान में पानी की कमी या छोटी बाढ़ लाने की क्षमता है। पानी अचानक छोड़ा गया या रोका गया तो पाकिस्तान में दिक्कत पर दिक्कत आएगी। इसका ताजा उदाहरण गत 26 अप्रैल का ही है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के मुताबिक PoK में नदी के किनारे बसे गांव डुमेल के निवासी मुहम्मद आसिफ ने बताया, ‘हमें कोई अलर्ट नहीं मिला। पानी तेजी से आया। हम जानमाल बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।’ लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। ऑफिसर्स को समझ नहीं आ रहा था कि पानी कितना ज्यादा है और कितनी तबाही मचा सकता है।

पाक की काफी खेती और एक-तिहाई हाइड्रोप्रोजेक्ट सिंधु नदी पर निर्भर
दरअसल, पाकिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से कैसे बुरी तरह फंस चुका है। सिंधु नदी भारत के पूर्व में तिब्बत से निकलती है और पहले लेह, फिर जम्मू-कश्मीर से होते हुए पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान में घुसती है। बेसिन की बाकी 5 नदियां भी हिमाचल प्रदेश के बाद जम्मू-कश्मीर होते हुए पाकिस्तान में दाखिल होती हैं और सिंधु से मिलती जाती हैं। अपने पूरे रूट के दौरान जब तक ये नदियां भारत में हैं ये ऊंचाई पर होती हैं और पाकिस्तान में घुसते ही इनका फ्लो नीचे की तरफ हो जाता है। पाकिस्तान की 90% खेती और बिजली बनाने वाले लगभग एक-तिहाई हाइड्रोप्रोजेक्ट सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर हैं। जिसका कंट्रोल भारत के पास है। ऐसे में पश्चिमी नदियों के पानी का फ्लो भारत के लिए एक हथियार के तौर पर काम कर रहा है। इस भौगोलिक स्थिति की वजह से पाकिस्तान बुरी तरह फंस चुका है।

भारत की वाटर स्ट्राइक के बाद फिर चीन की गोदी में बैठा पाक
पाकिस्तान समझ रहा है कि भारत की ये वाटर स्ट्राइक उसे कितनी महंगा पड़ सकती है। इसीलिए पाकिस्तान ‘पानी रोकने पर खून बहाने’ की बात कर रहा है, साथ ही चीन से भारत का पानी रोकने की गुहार लगा रहा है। दरअसल, भारत में भी चीन के कब्जे वाले तिब्बत के इलाके से ब्रह्मपुत्र नदी का पानी आता है, जो असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय होते हुए बांग्लादेश और फिर बंगाल की खाड़ी में गिर जाता है। डोकलाम विवाद के बाद चीन ने ब्रह्मपुत्र के वाटर फ्लो का डेटा भारत से शेयर करना बंद कर दिया था। अब पाकिस्तान फिर चाहेगा कि चीन कुछ ऐसा ही करे। लेकिन फिलहाल चीन टैरिफ वार के इस दौर में भारत के खिलाफ जाने वाला नहीं है। अमेरिका के आर्थिक युद्ध के बाद उसके भी भारत जैसे मजबूत देश की जरूरत है। ऐसे में पाकिस्तान सिंधु जल समझौते के स्थगित होने पर अलग-थलग पड़ गया है।

मोदी सरकार शॉर्ट टर्म, मिड टर्म और लॉन्ग टर्म पर कर रही काम
भारत पाकिस्तान पर नकेल कसने के लिए सिंधु वाटर ट्रीटी को लेकर 3 स्टेप्स में लॉन्ग टर्म प्लान कर रहा है। सिंधु जल समझौता रोकने के बाद भारत का 3 स्टेप की रणनीति बना रहा है। केंद्रीय जल मंत्री सीआर पाटिल ने कहा है कि इसके लिए एक रोडमैप तैयार किया गया है। सरकार शॉर्ट टर्म, मिड टर्म और लॉन्ग टर्म के कुल 3 प्लान पर काम कर रही है, ताकि पानी की एक बूंद भी पाकिस्तान न जाए। 

सिंधु जल समझौता स्थगित करने का आधार बने ये पांच प्वाइंट
केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने कहा है कि पाक जाने वाले पानी को लेकर 3 तरह की रणनीति बना रहे हैं। इससे पाकिस्तान को एक बूंद पानी नहीं मिलेगा। पहलगाम आतंकी हमले के बाद 23 अप्रैल को केंद्र सरकार ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। भारत में जलशक्ति सचिव देवश्री मुखर्जी ने पाकिस्तानी जल संसाधन मंत्रालय के सचिव मुर्तजा को पत्र लिखा। इसमें कहा गया कि यह संधि अच्छे संदर्भ में की गई थी, लेकिन अच्छे रिश्तों के बिना इसे बनाए नहीं रखा जा सकता। उन्होंने अपने पत्र में इन पांच प्वाइंट पर जोर दिया है…
• भारत सरकार की तरफ से पाकिस्तान सरकार को नोटिस भेजा जा रहा है। जिसमें संधि के अनुच्छेद XII (3) के तहत सिंधु जल संधि 1960 में संशोधन की मांग की गई है। इस लेटर में उन मुद्दों का हवाला दिया गया है जिसके चलते समझौते पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता है।
• संधि के बाद से अब तक जनसंख्या में काफी बदलाव हुआ है। ऐसे में क्लीन एनर्जी डेवलपमेंट में तेजी लाने के लिए कुछ बदलाव करने जरूरी हो जाते हैं।
• किसी भी समझौते में सबसे जरूरी होता है कि उस संधि का सम्मान किया जाए। इसके बजाय पाकिस्तान की तरफ से केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर को निशाना बनाकर सीमा पार आतंकवाद जारी है।
• सुरक्षा से जुड़ी अनिश्चितताओं ने संधि के तहत भारत के अपने अधिकारों को बाधित किया है। इसके अलावा भारत के अनुरोध पर पाकिस्तान ने कोई रिएक्शन नहीं दिया। इस प्रकार उसने संधि का उल्लंघन किया है।
• इसलिए भारत सरकार ने निर्णय लिया है कि सिंधु जल संधि 1960 को तत्काल प्रभाव से स्थगित किया जाता है।