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भारत के इतिहास में पहली बार: उपराष्ट्रपति ने त्यागपत्र दिया : जब विपक्ष उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया; धनखड़ की मिमिक्री; लेकिन धनखड़ का त्यागपत्र राहुल गाँधी को बेनकाब कर गया

    संसद में सभापति जगदीप धनखड़ पर विपक्ष ने लगाए थे गंभीर आरोप ( फाइल फोटो, साभार- sansad tv n PTI )
2014 चुनाव के बाद से लगभग हर क्षेत्र में भारत में कई काम पहली बार हो रहे हैं। एक समय था जब आतंकी भारत में उनके आकाओं के दम पर बेगुनाहों के खून से सड़कें लाल करते थे, आतंकियों को प्रधानमंत्री आवास में बैठाकर सम्मान के साथ बिरयानी और कोरमा खिलाया जाता था। लेकिन कालचक्र ऐसा घुमा कि आतंकियों को गोला मिल रहा है, घर में घुसकर मारा जा रहा है। इन सब में सबसे प्रमुख बात सामने आयी कि भारत विरोधी देशों के हाथों कठपुतली बना विपक्ष। फिर कहते हैं "मोदी हटाओं, हमारे हाथ सत्ता दे दो।" लेकिन जनता इतनी महामूर्ख है कि आँखों देखी मक्खी खाने को पता नहीं क्यों मजबूर हैं? सड़क से लेकर लोक/राज्य सभा तक उपद्रव विदेशी चंदे को भुनाने के लिए होते हैं। एक समय था जब नेता विपक्ष की कही किसी बात पर सरकार सोंचने को मजबूर होती थी, परन्तु आज लगता नेता विपक्ष नहीं कोई गली का खलीफा बोल रहा है। जब LoP यह कहे कि "हमें nation के खिलाफ लड़ाई लड़नी है" LoP राष्ट्र को बताए कि कौन-से nation से लड़ रहे हो? यानि विपक्ष नेता की गरिमा बिलकुल तार-तार कर दिया।         

जगदीप धनखड़ ने भले ‘स्वास्थ्य कारणों’ से उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया हो, पर विपक्ष इसमें ‘राजनीति’ देख रहा है। ये वही विपक्ष है जिसने न केवल धनखड़ की मिमिक्री कर सदन के बाहर उनका मजाक उड़ाया, बल्कि सदन के भीतर उन्हें ‘विपक्ष की आवाज दबाने वाला सभापति’ से लेकर ‘बीजेपी प्रवक्ता’ तक कहने में भी हिचक नहीं दिखाई।

यहाँ तक कि देश में पहली बार किसी उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश तक की। अब कांग्रेस नेता जयराम रमेश कह रहे हैं कि उन्होंने विपक्ष को मिलाकर चलने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य वजह से बजाए जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की वजह ‘गहरे’ हैं।

धनखड़ अविश्वास प्रस्ताव ला ला चुका है कांग्रेस 

कांग्रेस को जगदीप धनखड़ विपक्ष को साथ लेकर चलने वाले नजर आने लगे हैं। ये वही कांग्रेस है जिसने देश के इतिहास में पहली बार उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर उनका ‘संवैधानिक अपमान’ किया । 72 साल के संवैधानिक इतिहास में धनखड़ पहले ऐसे उपराष्ट्रपति रहे जिनके खिलाफ प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की अगुवाई वाली इंडी गठबंधन ने दिसंबर 2024 में सदन में महाभियोग प्रस्ताव लेकर आया था।

उस वक्त धनखड़ पर ‘पक्षपातपूर्ण तरीके’ से सदन चलाने और विपक्ष को ‘बोलने का मौका नहीं ‘देने का आरोप लगाया था। हालाँकि तकनीकी कारणों से महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो गया। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

लेकिन आज उपराष्ट्रपति धनखड़ कांग्रेस को सभी दलों को मिला कर चलने वाले नेता नजर आने लगे हैं। कांग्रेस के पूर्व नेता अब समाजवादी पार्टी के सांसद कपिल सिब्बल ने यहाँ तक कहा है कि धनखड़ सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिलाकर चलना चाहते थे और दुनिया में भारत के लोकतंत्र की बेहतर छवि प्रस्तुत करना चाहते थे।

धनखड़ की मिमिक्री का मामला

उपराष्ट्रपति धनखड़ को विपक्ष ने आहत भी किया है। याद कीजिए मोदी सरकार 2.0 का वो आखिरी शीतकालीन सत्र जब सदन में हंगामे की वजह से राज्यसभा के 45 सांसदों समेत कुल 78 सांसदों को निलंबित कर दिया गया था। सभी निलंबित सांसद संसद भवन की सीढ़ियों पर बैठकर निलंबन का विरोध कर रहे थे।
इसी दौरान टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी उठे और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री करने लगे। उनके बात करने और शारीरिक संरचना की खिल्ली उड़ाई। इस दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गांधी खड़े होकर हँसते और मिमिक्री का वीडियो बनाते नजर आए।
इस पर जगदीप धनखड़ ने अपनी नाराजगी भी जताई। उन्होंने संसद में कहा था कि एक सांसद चेयरमैन का मजाक बनाता है और कांग्रेस के बड़े नेता हँसते हैं और उसका वीडियो बनाते हैं। उन्होंने इसे व्यक्तिगत और जाति आधारित अपमान बताया था। उन्होंने कहा था कि उनकी जाट पहचान और किसान बैकग्राउंड का मजाक उड़ाया गया। ये पूरे जाट समुदाय का अपमान है।
सांसद कल्याण बनर्जी ने इसके बाद भी कई बार जगदीप धनखड़ की मिमिक्री बनाई और कहा कि वो 1000 बार ऐसा करेंगे।

हाथ धोकर पीछे पड़ी रही टीएमसी

विपक्ष के हर उस दांव में टीएमसी साथ देती रही जो धनखड़ के खिलाफ थी। दरअसल उपराष्ट्रपति की मुखर आलोचक टीएमसी के साथ धनखड़ का रिश्ता उस वक्त से खराब रहा था, जब वह बंगाल के राज्यपाल थे। 2019 से 2022 के बीच राज्यपाल धनखड़ ने बंगाल की ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार की कई मुद्दों पर आलोचना की।
उन्होंने कहा था कि राज्य में संविधान का शासन नहीं है और अराजकता,गुंडागर्दी का बोलबाला है। इसको मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य का अपमान बताया था। उन्होंने सरकार के कामकाज में दखलंदाजी के आरोप भी लगाए। ऐसे में जब जगदीप धनखड़ उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार बने तो उनका जमकर विरोध किया।

सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणी को लेकर धनखड़ और विपक्ष के बीच बहसबाजी

सुप्रीम कोर्ट को लेकर उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा था कि संसद के बनाए कानूनों को अगर कोर्ट रोक देती है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। धनखड़ के इस बयान का विपक्ष ने कड़ा विरोध किया था। टीएमसी ने कहा था कि यह व्यक्ति बीजेपी का एजेंडा चला रहा है वहीं कांग्रेस ने कहा था, “उपराष्ट्रपति संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ रहे हैं।” अब वही कांग्रेस उपराष्ट्रपति का गुणगान करती नजर आ रही है। अब इसे दोगलापन नहीं कहा जाये तो क्या जाये? 

विश्वविद्यालयों पर धनखड़ की टिप्पणी पर विपक्ष हुआ था आग-बबूला

मार्च 2023 में जब शैक्षणिक संस्थानों और छात्र राजनीति पर राज्यसभा में बहस चल रही थी तो सभापति धनखड़ ने कहा था, “कुछ विश्वविद्यालय देशविरोधी विचारधाराओं को प्रश्रय देते हैं।” उनका इशारा जेएनयू की तरफ था। इस पर कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों ने उपराष्ट्रपति की भाषा को ‘संघी एजेंडा’ करार दे दिया और बयान वापस लेने पर अड़े रहे। इस दौरान संसद में कई दिनों तक व्यवधान रहा।

विपक्ष ने लगाया बीजेपी प्रवक्ता होने का आरोप

दिसंबर 2023 में शीतकालीन सत्र के दौरान विपक्ष ने धनखड़ पर विपक्षी सांसदों को नहीं बोलने का आरोप लगाया था। इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था, “ये उपराष्ट्रपति नहीं, बीजेपी प्रवक्ता की तरह बर्ताव कर रहे हैं।” आज वही कांग्रेस उनकी तारीफ के पुल बाँध रही है और ‘लोकतंत्र का सच्चा सिपाही’ कह रही है।

2022 में उपराष्ट्रपति बनने का भी विपक्ष ने किया था विरोध

मोदी सरकार ने 2022 में बंगाल के राज्यपाल से सीधे केन्द्र में उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया। इंडी गठबंधन ने कांग्रेस नेता मार्गेट अल्वा को अपना उम्मीदवार बनाया था। धनखड़ ने 725 में से 528 वोट पाकर जीत दर्ज की थी और 11 अगस्त 2022 को उपराष्ट्रपति बने।

लोकसभा स्पीकर के बराबर हैं CJI, फिर राष्ट्रपति को आदेश दे सकता है सुप्रीम कोर्ट? क्या है आर्टिकल 142? उपराष्ट्रपति ने क्यों बताया ‘न्यूक्लियर मिसाइल’?


केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बनाए गए वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति को भी समय सीमा देते हुए निर्देश जारी किया था। अब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने न्यायपालिका पर फिर से निशाना साधा है और कहा कि वह अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर विधायिका के मामले में हस्तक्षेप कर रही है।

उपराष्ट्रपति धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 142 लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ एक ‘परमाणु मिसाइल’ बन गया है, जो न्यायपालिका के पास 24 घंटे उपलब्ध होता है।। उपराष्ट्रपति का बयान ऐसे समय में आया है, जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित वक्फ अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताई और उसे रोकने की बात कही।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा, “हाल ही में एक निर्णय के माध्यम से राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है। हम कहाँ जा रहे हैं? देश में क्या हो रहा है? हमने लोकतंत्र के लिए इस दिन की कभी उम्मीद नहीं की थी। हमारे पास ऐसे न्यायाधीश हैं जो कानून बनाएँगे, कार्यकारी कार्य करेंगे, सुपर-संसद के रूप में कार्य करेंगे और उनकी कोई जवाबदेही नहीं होगी, क्योंकि देश का कानून उन पर लागू नहीं होता है।”

उपराष्ट्रपति ने कहा, “हम ऐसी स्थिति नहीं बना सकते, जहाँ आप (सुप्रीम कोर्ट) भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें। वह भी किस आधार पर? संविधान के तहत आपके पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है।” उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 145(3) के अनुसार किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर कम-से-कम 5 न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा निर्णय लिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब पाँच न्यायाधीशों वाली पीठों का निर्णय निर्धारित किया गया था, तब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या आठ थी। धनखड़ ने बिल के संबंधित मामले को लेकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति के खिलाफ निर्णय दो न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा दिया गया था। अब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 31 हो गई है।

उन्होंने यहाँ तक कहा कि संविधान पीठ में न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या बढ़ाने के लिए अनुच्छेद 145(3) में संशोधन करने की आवश्यकता है। उपराष्ट्रपति ने राज्यसभा के प्रशिक्षुओं के छठे बैच को संबोधित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति को बिल पर तीन महीने में निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो संबंधित राज्यपाल द्वारा भेजा गया विधेयक कानून बन जाता है।

न्यायपालिका की वर्तमान हालात पर बात करते हुए उपराष्ट्रपति ने न्यायाधीश यशवंत वर्मा का भी जिक्र किया। ये वही जज हैं, जिनके घर पर इस साल होली के दिन नोटों से भरे बोरों में आग लग गई थी। मामले में भारी विवाद के बाद भी सुप्रीम कोर्ट उन्हें दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया और मामले की जाँच के लिए आंतरिक कमिटी बना दी गई।

धनखड़ ने कहा, “14 और 15 मार्च की रात को नई दिल्ली में एक न्यायाधीश के निवास पर एक घटना घटी। सात दिनों तक किसी को इसके बारे में पता नहीं चला। हमें खुद से सवाल पूछने होंगे। इसमें हुई देरी को क्या समझा जा सकता है? क्या यह क्षमा योग्य है? क्या इससे कुछ बुनियादी सवाल नहीं उठते? किसी भी सामान्य स्थिति में और सामान्य परिस्थितियाँ कानून के शासन को परिभाषित करती हैं।”

अनुच्छेद 142, जिसे उपराष्ट्रपति ने परमाणु मिसाइल कहा

संविधान के अनुच्छेद 142 में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और डिक्री को देने का अधिकार और उसे लागू करने आदि से संबंधित से संबंधित है। अनुच्छेद 142 के उपबंध-1 सुप्रीम कोर्ट को ये अधिकार देता है कि उसके पास आए किसी भी मामले में वह न्याय के लिए डिक्री या आदेश पारित कर सकेगा। यह डिक्री या आदेश पूरे भारत में लागू होगा।
इसके उपबंध-2 में कहा गया है कि इस संंबंध में संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन रहते हुए सुप्रीम कोर्ट पूरे भारत के किसी भी क्षेत्र के किसी व्यक्ति को हाजिर होने, दस्तावेज प्रस्तुत करने, अवमानना की जाँच करने या दंड देने का समस्त अधिकार उसके पास होगा। इस तरह अनुच्छेद 142 में स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट को संसद द्वारा पारित कानून के दायरे में ही काम करना है।
हालाँकि, बात यहीं खत्म नहीं होती। कॉलेजियम के तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट ने इसकी भी काट निकाली है। पिछले कुछ वर्षों में अनुच्छेद 142 की व्याख्या और उसके प्रयोग के विभिन्न उदाहरण पेश किए गए। हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में निर्णय देकर एक कानूनी ढाँचा विकसित किया।
यह ढाँचा संविधान के अनुच्छेद 142 की व्याख्या और उसके प्रयोग से संबंधित था। इस निर्णय ‘एशियन रीसर्फेसिंग ऑफ रोड एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम सीबीआई के पिछले निर्णय से बिल्कुल उलट था। सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट बार के फैसले में एशियन रीसर्फेसिंग के निर्णय को पलट दिया था। इसमें अनुच्छेद 142 के तहत नए दिशा-निर्देश जारी करने के अलावा अंतरिम आदेशों से संबंधित पहलुओं को भी शामिल किया।
इसमें विचार किया गया कि अंतरिम आदेश को रद्द करने या संशोधित करने का हाई कोर्ट का अधिकार क्या है और क्या अंतरिम आदेश किसी विशेष समय की समाप्ति पर खुद ही समाप्त हो सकता है। एशियन रिसर्फेसिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी मुद्दे पर विचार किया था। उस दौरान शीर्ष न्यायालय ने माना था कि जब तक अंतरिम आदेश का समय ना बढ़ाया न जाए, वह आदेश की तारीख से 6 महीने बाद स्वतः समाप्त हो जाता है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस फैसले को उलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एशियन रीसर्फेसिंग मामले में निर्धारित समय बीत जाने पर अंतरिम आदेशों की स्वतः समाप्ति की शर्त लागू रहने योग्य नहीं थी और इसलिए इसे खारिज कर दिया। इसके बाद अनुच्छेद 142 में दिए गए अधिकारों के तहत उसने नए दिशा-निर्देश जारी किए।
इसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्या कोई न्यायालय अंतरिम आदेश पारित करते समय कोई समय सीमा तय कर सकता है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का उपयोग प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दबाने या वादियों के मूल अधिकारों को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार क्षेत्र का उपयोग विवेक से और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, ताकि विवादों का निष्पक्ष और न्यायपूर्ण समाधान निकाला जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि अनुच्छेद 142 द्वारा दी गई शक्तियों का उद्देश्यपूर्ण न्याय सुनिश्चित करना है।
सुप्रीम कोर्ट ने एशियन रीसर्फेसिंग में पहले दिए गए निर्णय को खारिज करते हुए कहा कि अनुच्छेद 226(3) के तहत पारित स्थगन आदेश को रद्द करने के लिए अनिवार्य शर्त स्थगन आदेश हटाने के लिए आवेदन दाखिल करना और न्यायालय द्वारा न्यायिक विवेक का प्रयोग करना है। इस आवेदन पर दो सप्ताह के भीतर निर्णय नहीं लिया जाता है तो स्थगन आदेश स्वतः समाप्त नहीं होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्थगन आदेश तब तक प्रभावी रहता है, जब तक कि इसके रद्द करने के लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए आवेदन का कारणों के साथ निपटारा नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों को मामलों के निपटान के लिए कठोर समय-सीमा नहीं लगानी चाहिए, जब तक कि कोई असाधारण परिस्थिति न हो।
अपने इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने जो नया गाइडलाइन तय किया उसके अनुसार, अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग न्यायालय द्वारा अपने समक्ष पक्षकारों के लिए पूर्ण न्याय करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन ऐसा करने में न्यायालय अन्य अधिकार क्षेत्रों में अन्य वादियों के पक्ष में पारित वैध न्यायिक आदेशों को रद्द नहीं करेगा।

राष्ट्रपति को निर्देश देने के लिए उपराष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट पर क्यों भड़के?

हमने अपने पिछले आर्टिकल में बताया था कि क्या सुप्रीम कोर्ट भारत के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति को निर्देश सकते हैं या नहीं। इस आर्टिकल में हमने कई कानून पहलुओं पर विचार किया था। कई लोगों के मन में सवाल उठता होगा कि भारत में पदों की वरीयता क्रम क्या है। इससे भी साफ हो जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति को निर्देश दे सकता है या नहीं।
अगर वरीयता क्रम की बात की जाए तो राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च पद है। राष्ट्रपति को भारत का पहला नागरिक कहा जाता है। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति और संसद को मिलाकर ही भारत बनता है और वह संघ के प्रशासन का प्रमुख होता है। इसी प्रशासन का एक अंग न्यायपालिका भी है। इस तरह देश का सर्वोच्च राष्ट्रपति का होता है।
भारत में राष्ट्रपति और राज्यपाल ही ऐसे दो पद हैं, जिनके खिलाफ अदालती कार्रवाई नहीं की जा सकती है। भारत के संविधान ने अनुच्छेद 361 के तहत इसका प्रावधान किया है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति और राज्यपालों के खिलाफ अदालती कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ना ही इन दोनों को किसी मामले में नोटिस जारी कर सकता है और ना ही निर्देश दे सकता है।
राष्ट्रपति के बाद देश में दूसरा सर्वोच्च पद उपराष्ट्रपति का होता है। इसके बाद तीसरे नंबर पर प्रधानमंत्री आते हैं। देश का चौथा सर्वोच्च पद राज्यपाल का होता है, जो उनके कार्य वाले राज्यों में होता है। इसके बाद वरीयता क्रम में पाँचवें स्थान पर पूर्व राष्ट्रपति आते हैं। इसके बाद भारत के उपप्रधानमंत्री का पद वरीयता क्रम में 5A स्थान पर आता है।
                                    भारत में अधिकारियों का वरीयता क्रम (साभार: www.mha.gov.in)
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और लोकसभा स्पीकर का पद एक समान होता है। दोनों वरीयता क्रम में छठे नंबर पर आते हैं। इसके बाद सातवें नंबर पर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री अपने राज्यों में होते हैं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष, पूर्व प्रधानमंत्री, राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष के नेता भी सातवें क्रम पर ही आते हैं।
भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति का क्रम 7A होता है। आठवें क्रम में राजदूत, भारत द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रमंडल देशों के आयुक्त, अपने राज्य के बाहर मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल होते हैं। नौंवें क्रम पर सुप्रीम कोर्ट के आते हैं। इसके बाद 9A पर संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, मुख्य चुनाव आयुक्त और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) आते हैं।
वरीयता क्रम मेें 10वें स्थान पर राज्यसभा के उपसभापति, राज्यों के उपमुख्यमंत्री, लोकसभा के उपसभापति, योजना आयोग (वर्तमान में नीति आयोग) के सदस्य और केंद्र सरकार के राज्यमंत्री आते हैं। वहीं, 11वें स्थान पर भारत के अटॉर्नी जनरल, कैबिनेट सचिव और अपने-अपने केंद्रशासित प्रदेशों के भीतर लेफ्टिनेंट गवर्नर (उपराज्यपाल) तक शामिल हैं। वरीयता क्रम में 12वें स्थान पर पूर्ण जनरल या समकक्ष रैंक के पद पर कार्यरत चीफ ऑफ स्टाफ।

राजनीति के लिए पति का नाम भी छोड़ने के लिए हो गई तैयार; अमिताभ नाम से बिलबिला रही हैं लेकिन एक OBC नाबालिग बेटी के साथ हुए दुष्कर्म पर नहीं बोलती ; Opposition के नाम को कलंकित करती Opposition

 सुभाष चन्द्र

राजनीति को इतना घटिया कर देगा विपक्ष, कभी सपने में भी नहीं सोचा था लेकिन अब लगता है विपक्ष के गिरने की कोई सीमा नहीं है, इससे भी ज्यादा देखने को मिल सकता है। राज्यसभा में सभापति जगदीप धनकड़ जी ने सपा सांसद को “जया अमिताभ बच्चन” कह कर संबोधित क्या कर दिया, मैडम तो बिलबिला गईं

यह नाम किसी तरह से भी गलत नहीं था लेकिन उन्हें जवाब देते हुए खुद अपना नाम “जया अमिताभ बच्चन” कहती हैं कि मैं कलाकार हूं, Body Language समझती हूं expression समझती हूं, आपकी tone is not acceptable”। राज्यसभा से बाहर निकल कर भी सभापति के खिलाफ अनाप शनाप बोला और आरोप लगाया कि वो चेयर पर बैठ कर Unparliamentary शब्द बोलते हैं, हमारे विपक्ष के नेता खड़गे जी का माइक बंद कर दिया, ऐसा आप कैसे कर सकते हैं। I Want an apology for saying you may be a celebrity, I don’t care, यह महिला का अपमान है”

 

इसके पहले भी उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह जी से भी ये मैडम ऐसे ही उलझी थी और तब उन्होंने कहा था कि आपका नाम जो राज्यसभा के रिकॉर्ड में है वह लिया जाएगा, आप चाहें तो आपने नाम बदल सकती है और उन्होंने उसे तरीका भी समझा दिया। फिर भी सभापति से तकरार करना साबित करता है कि समूचे विपक्ष को केवल हंगामा करना है

अपने नाम पर बिलबिला रही हैं और उनकी पार्टी के लोगों ने अयोध्या में जो एक पिछड़ी जाति की नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म किया उस पर खामोश है। क्यों न हो जब वह अपनी नातिन को कह सकती है कि उसे कोई दिक्कत नहीं है अगर वह बिना शादी के माँ बनती है। ये मैडम तो हर किसी का अपमान करने को तैयार रहती हैं, याद होगा रवि किशन को कहा था “जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं”। अब इनसे पूछो तुम्हारे बाप से लेकर खा रहे हैं, मेहनत करते हैं काम करते है और तब ही कमाते हैंइसमें किसकी थाली में छेद हो गया

लेखक 
चर्चित YouTuber 
पुराना समय याद आता है सोनिया गांधी को इसके साथ खड़े देख कर कि 2006 में जया अमिताभ बच्चन की शिकायत की थी कांग्रेस के सांसद ने चुनाव आयोग से कि राज्यसभा की सदस्य होते हुए, ये देवी जी UP Film Development Corporation की Chairperson हैं और चुनाव आयोग ने इन्हे राज्यसभा से निष्काषित कर दिया था और मुलायम सिंह यादव बुरी तरह सोनिया गांधी पर बरसे थे लेकिन आज प्यार मोहब्बत की पींगे बढ़ रही है

अब सुनिये, मैंने सर्च किया तो मुझे इन मैडम के 2018 में चुनाव आयोग में दिए हुए दो Affidavit मिले, उसमें एक में  अपना नाम मैडम ने लिखा था “Jaya Amitabh Bachchan”  और दूसरे में लिखा था “Bachchan Jaya Amitabh” 

खुद अपना नाम अमिताभ के साथ जोड़ कर लिखती हैं और सभापति और उपसभापति कहते हैं तो बवाल काहे काट रही हो देवी जी। ये 5th time राज्यसभा की सदस्य बनी हैं और पहले भी उन्हें जया अमिताभ बच्चन नाम से पुकारा जाता रहा होगा लेकिन इस बार परेशानी इसलिए है कि मोदी है सामने। 

आप खड़गे की वकालत कर रही हैं, ये माइक बंद करने का अब रोज का शोशा बन गया है लेकिन मैडम आपको याद नहीं इसी खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी को “जहरीला नाग” कहा था और कांग्रेस के लोग अब तक मोदी को 100 से ज्यादा गालियां दे चुके है और आपको जया अमिताभ बच्चन सुनकर भी लगता है गाली दे दी। आप अपना Original नाम नहीं सुनना चाहती और सोनिया गांधी भी नहीं सुनना चाहती

अगर जया अमिताभ बच्चन को लगता है धनकड़ जी ने आपका महिला होने के नाते अपमान किया है तो महिला आयोग में शिकायत कर दीजिए

बेचारा अमिताभ बच्चन भी सोचता होगा कि परिवार के 80 की उम्र पार करने पर भी 18 घंटे काम करता हूं लेकिन आज बीवी को मेरे नाम से ही नफरत है। कहीं तलाक की नौबत तो नहीं आ रही। बड़े घरों में क्या होता है किसी को पता नहीं चलता

सागरिका घोष क्या आप इसी लिए संसद में आई हैं? राज्यसभा के वेल में हंगामे पर सभापति जगदीप धनखड़ ने फटकारा, कहा- यह भारतीय इतिहास का कलंकित दिन

                                       जगदीप धनखड़ एवं सागरिका घोष (साभार: हिंदुस्तान/वेब दुनिया)
संसद सत्र के पाँचवें दिन राज्यसभा में शुक्रवार (28 जून 2024) को विपक्ष ने NEET पेपर लीक मुद्दे पर खूब हंगामा किया। इस दौरान कई सांसद वेल में पहुँच गए। इससे राज्यसभा के चेयरमैन जगदीप धनखड़ ने भड़क गए और इसमें टीएमसी सांसद सागरिका घोष, डेरेक ओ ब्रायन सहित को फटकार लगाते हुए सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी।

सांसदों के व्यवहार को देखते हुए उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए। उन्होंने कहा, “जो लोग वेल में खड़े हैं, हम उनका नाम ले रहे हैं।” इसके बाद उन्होंने खड़े होकर उन सांसदों का नाम लेना शुरू किया जो हंगामा कर रहे थे। सबसे पहले टीएमसी सांसद सागरिका घोष का नाम लेते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, “आप यहाँ सदन में हंगामे के मकसद से आई हैं?”

सभापति जगदीप धनखड़ यहीं नहीं रूके। कुछ देर के बाद तृणमूल कॉनग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन का नाम लेकर उन्होंने कहा, “मिस्टर डेरेक ओ ब्रायन, आप इस हंगामे के डायरेक्टर बन रहे हैं।” वहीं टीएमसी सांसद साकेत गोखले को लेकर कहा, “आप वर्चुअली अपने लिए ही परेशानी बन रहे हैं।” इस दौरान विपक्षी सांसद सदन में नारेबाजी करते रहे।

उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने कहा, “आज भारतीय संसद के इतिहास में ऐसा कलंकित दिन है कि विपक्ष के नेता खुद वेल में आ गए हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। मैं दुखी हूँ, स्तब्ध हूँ। भारतीय संसदीय परंपरा इस हद तक बिगड़ जाएगी कि विपक्ष के नेता वेल में आ जाएँगे, उपनेता वेल में आ जाएँगे।”

इसके कुछ देर बाद ही उपराष्ट्रपति धनखड़ ने सदन को दोपहर 12 बजे तक के लिए स्‍थगित कर दिया। सभापति जगदीप धनखड़ ने कहा कि बिजनेस एडवाइजरी कमेटी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के लिए 21 घंटे का समय निर्धारित किया है। सांसद इस समय को चर्चा के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

राज्यसभा में शुक्रवार को नीट से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए विपक्षी सांसदों ने नोटिस दिए। सभापति जगदीप धनखड़ ने बताया कि उन्हें इस विषय पर चर्चा के लिए कुल 22 नोटिस मिले हैं। इनमें नीट में अनियमितता, चीटिंग और पेपर लीक के विषय पर बहस के लिए नियम 267 के तहत नोटिस दिया गया था। हालाँकि, सभापति ने इन सभी नोटिस को अस्वीकार कर दिया। 

उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अपमान पर जाटों के सबसे बड़े खाप ने बुलाई पंचायत: ‘किसान मोर्चा’ करेगा प्रदर्शन

उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अपमान पर भाजपा का किसान मोर्चा करेगा प्रदर्शन, जाटों के खाप ने बुलाई पंचायत
तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद कल्याण बनर्जी के उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अपमान पर जाट समुदाय क्रोधित है। जाटों ने एक पंचायत बुला कर इस मामले में कल्याण बनर्जी से माफ़ी की माँग की है। वहीं भाजपा सांसदों ने उप-राष्ट्रपति के समर्थन में राज्यसभा में खड़े रह कर विरोध प्रदर्शन किया है।

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने भी उप-राष्ट्रपति से मुलाक़ात की है। गौरतलब है कि तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की नकल उतारी थी। उन्होंने उप-राष्ट्रपति के हावभाव की नक़ल उतारते हुए अभद्र तरीके से उनकी मिमिक्री की। इस दौरान राहुल गाँधी उनका वीडियो बनाते रहे जबकि अन्य सांसद भी उनका साथ देकर ठहाके लगाते रहे।

इस मामले में भाजपा के राज्यसभा सांसद उप-राष्ट्रपति के समर्थन में राज्यसभा में 20 दिसम्बर, 2023 को एक घंटा खड़े रहे। इसके द्वारा उन्होंने उप-राष्ट्रपति के साथ एकजुटता दिखाई। इस एक घंटे में सदन की कार्रवाई में भाजपा और इसके गठबंधन दलों के सांसद चलती हुई कार्रवाई में खड़े होकर हिस्सा लेते रहे।

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री प्रल्हाद जोशी (प्रहलाद जोशी) ने कहा, “दूसरे सदन के सदस्य राहुल गाँधी ने उप-राष्ट्रपति का अपमान किया है। पहली बार विपक्ष इस स्तर जा रहे हैं कि कोई हद ही नहीं है।” प्रल्हाद जोशी से कल्याण बनर्जी से माफ़ी की माँग भी की।

वहीं उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अपमान पर जाट समुदाय भी आक्रोशित हो गया है। देश की सबसे बड़ी खाप पंचायत के उपाध्यक्ष प्रधान सुरेन्द्र सोलंकी ने इस मामले पर पंचायत बुलाई है। उन्होंने कहा है कि कल्याण बनर्जी ने उप-राष्ट्रपति का अपमान करके किसान समुदाय का अपमान किया है। उन्हें जल्द ही माफ़ी माँगनी होगी वर्ना तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों के घरों का घेराव किया जाएगा। उन्होंने राहुल गाँधी के व्यवहार की आलोचना भी की है। उन्होंने आगे बड़ी पंचायतों और विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से फोन पर बातचीत के बाद उप-राष्ट्रपति धनखड़ के साथ लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने भी मुलाक़ात की। उन्होंने कल्याण बनर्जी की हरकत पर दुःख जताया। उन्होंने राहुल गाँधी द्वारा इस घटना की वीडियो बनाए जाने पर भी आश्चर्य जताया। उन्होंने कहा कि यह नया निचला स्तर है लोकतंत्र में विश्वास करने वाले लोग इसकी कभी प्रशंसा नहीं करेंगे।

वहीं कल्याण बनर्जी ने अपने इस कृत्य पर माफ़ी माँगने से मना कर दिया है। उन्होंने कहा, “मिमिक्री एक कला है, इसीलिए मैं माफ़ी नहीं माँगूँगा।” उन्होंने कहा कि मेरा उनकी भावनाएँ आहत करने का इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि मिमिक्री एक कला है इसलिए वो माफ़ी नहीं माँगेंगे।

भाजपा ने इस मामले पर विपक्ष को घेरने का भी इरादा बना लिया है। भाजपा का किसान मोर्चा इस मामले में अब प्रदर्शन करेगा और कल्याण बनर्जी का पुतला फूँकेगा।