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भगवान श्रीराम और हिंदुओं को कोसने वाली ममता बनर्जी उर्फ़ बेगम ममता का नया पैंतरा, महाकाल की आड़ में हिंदू वोट लेने का ढकोसला

कल तक अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने, जय श्रीराम सुनने पर कार से बाहर आकर हिन्दुओं को धमकाने वाली ममता बनर्जी उर्फ़ बेगम ममता को बिहार चुनाव में बीजेपी के परचम लहराने के डर से कुछ महीनों बाद बंगाल में अपनी सत्ता सताने लगी है। दुर्गा पूजा पंडालों में ममता के इस्लामिक गुंडों द्वारा अड़चनें डालने पर हिन्दुओं को कोर्ट का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन अब हिन्दू वोट की चिंता सताने के डर से महाकाल की शरण में पहुँच गयी है। अगर हिन्दू कालनेमि हिन्दू ममता के इस पाखंड में फंस ममता को वोट देता है उससे बड़ा महामूर्ख दुनिया में नहीं मिलेगा। हिन्दुओं को याद करना होगा कि जब से कालनेमि ममता बंगाल की मुख्यमंत्री बनी है इसके इस्लामिक गुंडों ने हिन्दुओं का जीना दूबर किया हुआ है। ये कालनेमि ममता इतनी बड़ी ड्रामेबाज़ है कि कुर्सी हिलती देख चोटिल होने का ड्रामा खेल सहानुभूति वोट बटोर मुख्यमंत्री बन जाती है। अब हिन्दुओं को अपने हित में इस कालनेमि बेगम ममता के किसी भ्रमजाल में नहीं फंसना होगा।  
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस और उसकी मुखिया ममता बनर्जी की हालिया चालबाजी ने उसे एक ऐसे नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। ममता बनर्जी लंबे समय तक खुलेआम “तुष्टिकरण की राजनीति” करती रही हैं। यहां तक कि वे हिंदू भावनाओं और भगवान श्रीराम के नाम पर उपहास का माहौल बनाती रही हैं। वही हिंदू विरोधी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब अचानक “महाकाल मंदिर” निर्माण की घोषणा कर रही हैं। सवाल उठना स्वाभाविक है क्या यह वास्तविक अध्यात्म का उद्गम है या मात्र चुनावी मौसम की राजनीतिक ठिठोली मात्र है। सभी को पता है कि अगले साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हैं। हाल ही में बिहार की जनता ने भाजपा और एनडीए को जितना प्रचंड समर्थन दिया है, उसने ममता बनर्जी को हिलाकर रख दिया है। यही वजह है कि वे अब हिंदू विरोध की राजनीति से कुछ समय तक पल्ला झाड़ने की रणनीति बना रही हैं। ताकि उनका हश्र भी राजद और महागठबंधन जैसा ना हो। इसकी शुरुआत उन्होंने अचानक ‘महाकाल’ के प्रति प्रेम को दर्शाकर आरंभ की है। लेकिन पश्चिम बंगाल की प्रबुद्ध जनता जानती है कि महाकाल मंदिर का कार्ड वास्तव में अध्यात्म नहीं, यह चुनाव का गणित मात्र है।

बिहार में भाजपा की महाविजय ने ममता बनर्जी को बुरी तरह डराया

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो ममता बनर्जी की यह रणनीति सिर्फ और सिर्फ चुनावी मौसम के अनुरूप है। बिहार में भाजपा की महाविजय ने ममता बनर्जी को बुरी तरह डरा दिया है। दरअसल, बीते वर्षों में पश्चिम बंगाल में भाजपा के तेजी से उभार के पीछे एक बड़ा निर्णायक वर्ग हिंदू मतदाता भी रहा है। ममता सरकार का कुशासन तो इसका बड़ा मजबूत पहलू है ही। ऐसे में तृणमूल को यह समझ आने लगा है कि बंगाल की राजनीति में राम, दुर्गा और महाकाल अब सब चुनावी विमर्श का केंद्र बन चुके हैं। बंगाल में जिस हिन्दू मतदाताओं ने 2021 में TMC को कड़ी चुनौती दी थी, वही वर्ग अब 2026 के आगामी विधानसभा चुनावों में निर्णायक बन सकता है। ममता की राजनीतिक टीम को इसका पूरा एहसास है। इसलिए अचानक बड़े-बड़े धार्मिक स्थलों की घोषणाएँ, देवी-देवताओं के नाम पर सरकारी कार्यक्रम और अब यह महाकाल मंदिर का कार्ड खेलने की कोशिश कर रही हैं।

चुनाव से पहले जनता के साथ महाकाल कार्ड खेलने की कोशिश

पश्चिम बंगाल की जनता ऐन चुनाव से पहले महाकाल कार्ड खेलने की कोशिश को देख रही है और इसे सफल नहीं होने देगी। दरअसल, सालों तक ममता बनर्जी दुर्गा पूजा विसर्जन से लेकर रामनवमी जुलूस पर प्रतिबंध लगाने या इन हिंदू धार्मिक आयोजन को सीमित करने के षडयंत्र करती रही हैं। यह छवि बंगाल से बाहर तो व्यापक रूप से बनी ही है। अब बंगाल के अंदर भी हिंदू समाज का इससे बहुत आहत हुआ है। इसीलिए उनका मानना है कि महाकाल मंदिर का कार्ड सिर्फ ममता बनर्जी की “छवि सुधार अभियान” का हिस्सा मात्र है। हकीकत में वह अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से एक इंच भी पीछे हटने वाली नहीं है। विरोधियों का कहना है कि जब कभी भगवान श्रीराम का नाम जनता के बीच ताकत से उठा है, ममता बनर्जी का पहला रिएक्शन “भगवान को राजनीति में घसीटने” की शिकायत करना होता है। लेकिन अब विडंबना देखिए आज वही सरकार धार्मिक आस्थाओं का सहारा लेराजनीतिक संदेश दे रही है।

महाकाल मंदिर मजाक- बिना प्रोजेक्ट लागत के जमीन आवंटित
सवाल यह भी है कि यह हिंदू विरोधी मानसिकता वाली ममता के मन में अध्यात्म किस गति से जागृत हुआ? बंगाल कैबिनेट ने अक्टूबर 2025 में महाकाल मंदिर निर्माण के लिए भूमि को पर्यटन विभाग को स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। 25.15 एकड़ जमीन में से 17.4 एकड़ केवल मंदिर परिसर के लिए निर्धारित कर दी गई। लेकिन सबसे बड़ा मजाक देखिए, प्रोजेक्ट लागत जो किसी भी सरकारी परियोजना की पारदर्शिता का मुख्य तत्व होती है—अब तक घोषित नहीं की गई है। इतने बड़े पैमाने पर भूमि आवंटन हो गया, सरकारी पहल की प्रेस कॉन्फ़्रेंसें हो गईं। राजनीतिक संदेश देने की खोखली कोशिश भी हो गई, पर असल परियोजना व्यय का कोई ठोस आंकड़ा सार्वजनिक मंचों पर नहीं रखा गया। क्या यह जल्दबाजी और हड़बड़ी का संकेत नहीं है?

बंगाल की जनता-जनार्दन के मन में बिहार की शानदार जीत बैठी
इस राजनीतिक जल्दबाजी के पीछे कारण भी उतने ही स्पष्ट हैं। बंगाल की जनता-जनार्दन के मन में बिहार की शानदार जीत से भाजपा की धार्मिक अपील गहरी पैठ बना चुकी है। राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा, शानदार शुरुआत और अब भगवा शिखर ध्वजारोहण ने राष्ट्रीय स्तर पर हिंदू आस्था की एक नई ऊर्जा पैदा की—जो बंगाल में भी शिद्दत से महसूस की जा रही है। यह असर तृणमूल कांग्रेस के लिए किसी चेतावनी से कम नहीं है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को ऐतिहासिक समर्थन मिला था, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ हिंदू मतदाता संख्या अधिक है। और 2026 की ओर बढ़ते हुए यह समर्थन और प्रभाव दोनों ही बढ़ते दिख रहे हैं। ऐसे में ममता बनर्जी का महाकाल मंदिर निर्माण कार्ड विरोधियों के लिए तो केवल एक “राजनीतिक औजार” है। ऐसा औजार जिसे मजबूरी में उठाया गया है।

ममता को 14 वर्षों में कभी महाकाल का ख्याल क्यों नहीं आया?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू है, महाकाल मंदिर बनाने के लिए समय का चुनाव। अगर ममता बनर्जी को महाकाल में इतनी ही आस्था थी तो यह विचार पिछले 14 वर्षों में कभी क्यों नहीं आया? क्यों यह घोषणा ठीक उसी समय आई जब हिंदू मतदाता का झुकाव विपक्ष की ओर तेजी से बढ़ रहा है? क्यों वही नेता, जिन्होंने रामनवमी जुलूस, दुर्गा विसर्जन, रथ यात्रा जैसे आयोजनों पर कहाँ–कहाँ पर प्रतिबंध या प्रतिबंध–समान व्यवस्थाएँ लागू की थीं, आज मंदिर निर्माण की अगुआई कर रही हैं? क्या यह किसी अचानक हुए आध्यात्मिक परिवर्तन का परिणाम है, या फिर यह चुनावी मजबूरी की तपिश में तैयार की गई रणनीति है? बंगाल के राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इस कदम के पीछे सत्ता खोने का डर भी है। क्योंकि जनता सजग हो चुकी है। वह जानती है कि जब आस्था वास्तविक होती है तो सरकार के निर्णय लंबे समय तक धार्मिक समुदायों के विश्वास को मजबूत करते हैं। और जब निर्णय केवल चुनावी समय में, अचानक, बिना किसी व्यापक परामर्श या स्पष्ट योजना के आते हैं, तो वे आस्था से अधिक राजनीति की गंध देते हैं।

तुष्टिकरण की राजनीति और “हिंदू विरोधी छवि” के लिए मशहूर
यह स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल का मतदाता—भोला नहीं, बल्कि सजग, प्रबुद्ध और आस्थावान है। बंगाल की राजनीति इन दिनों केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि यह प्रतीकों, आस्थाओं और भावनाओं का अखाड़ा बन चुकी है। इसी अखाड़े के बीच खड़े होकर ममता बनर्जी ने अचानक “महाकाल मंदिर” का कार्ड खेलने को मजबूर हो चुकी हैं। “तुष्टिकरण की राजनीति” और घोर “हिंदू विरोधी छवि” के बीच ममता बनर्जी ने अब सिलीगुड़ी में 17.4 एकड़ भूमि पर महाकाल मंदिर की घोषणा की है। यह ऐन चुनावी वर्ष से पहले की केवल रणनीतिक घोषणा है। जिसका उद्देश्य उनके माथे पर लगा हिंदू विरोध के दाग को धोना है। लेकिन बंगाल का हिंदू मतदाता उनके इस राजनीतिक पैंतरे को समझ गया है। दरअसल, ममता ने बरसों तक “हिंदुत्वात्मक प्रतीकों से दूरी” बनाए रखी। लेकिन अब जब भाजपा का हिंदू मतदाता आधार बंगाल की राजनीति में निर्णायक बनता जा रहा है, तभी अचानक ममता को “महाकाल” याद आने लगे हैं।

 पश्चिम बंगाल के बदलते सियासी मौसम में तृणमूल कांग्रेस की बैचैनी

ममता बनर्जी के विरोधियों का साफ-साफ तर्क है कि यह सब एक सुनियोजित, पर बेहद हड़बड़ी में तैयार की गई रणनीति है। ताकि कम से कम प्रतीकात्मक रूप से ही सही, हिंदू वोट बैंक में अपनी साख कुछ बचाई जा सके। राजनीतिक पंडित साफ कहते हैं कि यह हड़बड़ी तृणमूल कांग्रेस को फायदा पहुंचाने वाली नहीं है। दरअसल, लोकसभा चुनावों के बाद से पश्चिम बंगाल में भी भाजपा के हिंदुत्व-मुख्य एजेंडे का प्रभाव बढ़ा है और तृणमूल अपनी जमीन खिसकती देख रही है। ममता बनर्जी द्वारा मंदिरों, आरती, पूजा और धार्मिक प्रतीकों का उपयोग तब और संदिग्ध लगता है जब उन्हें यह करते वर्षों में पहली बार देखा जा रहा है। इसलिए यह शीशे की तरह साफ है कि पश्चिम बंगाल की जनता इस दिखावटी अध्यात्म और नकली आस्था का चुनाव में पुरजोर जवाब देने वाली है।

मोहम्मद जुबैर द्वारा भगवान श्रीराम और माता सीता का अपमान करने पर कब हमेशा के लिए जेल में डाला जाएगा?

#freedom of speech की आड़ में मोहम्मद जुबेर जैसे जहरीले नाग फिर देश में उपद्रव मचवाने का गन्दा खेल रहे हैं। कोई राज्य सरकार ऐसे उपद्रवियों पर कोई कार्यवाही करे या नहीं केंद्र में मोदी सरकार को ऐसे उपद्रवियों और इसके समर्थकों को सबक नहीं सिखाएगी ये गैंग किसी न किसी बहाने जहर घोलते रहेंगे। और जब कोई हिन्दू इस्लाम के विरुद्ध कुछ बोलेगा इस जहरीले जुबेर के समर्थक 'सिर तन से जुदा' चीखते-चिल्लाते सडकों पर आकर माहौल बिगाड़ने आ जाएंगे। दूसरे, जब तक मोदी सरकार इन जहरीलों को मिलने वाली सरकारी सुविधा से हमेशा के लिए वंचित नहीं करेगी, सीधे रास्ते नहीं आएंगे। 

दूसरे, किसी कपिल मिश्रा या अनुराग ठाकुर आदि को आरोपित करने से पहले, ऐसे लोगों के खिलाफ आम मुसलमानों को भी सचेत होना पड़ेगा, क्योकि ऐसे लोगों के कारण इस्लाम ही बदनाम हो रहा है। हिन्दू नूपुर शर्मा के विरुद्ध 'सिर तन से जुदा' की आवाज़ तो बुलंद कर सकते, लेकिन सोशल मीडिया के साथ-साथ चैनल News Nation पर 'इस्लाम क्या कहता है' शो पर कुरान, हदीस और शरीयत के एक-एक वो पन्ना खुल रहा है, जिस पर अदालत भी निर्णय देने से संकोच कर रही है। सबकी आवाज़ बंद है, क्योकि पन्ने खोलने वाला कोई और नहीं मुस्लिम एक्स मुस्लिम बनाम इस्लामिक विद्वान ही हैं। 31 जुलाई 1986 को दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट के बाद कोई कोर्ट कुरान की आपत्तिजनक आयतों के खिलाफ निर्णय दे पायी।  
देश के सेक्युलरों, लिबरलों और टुकड़े-टुकड़े गैंग का चहेता और अल्ट न्यूज का फैक्ट चेकर मोहम्मद जुबैर पर एक बार फिर धार्मिक भावना भड़काने का आरोप लगा है। सोशल मीडिया पर मोहम्मद जुबैर का एक पोस्ट वायरल हो रहा है, जिसमें उसने ब्रिटेन के नवनियुक्त प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति को भगवान राम और सीता के रूप में दर्शाया है। जुबैर द्वारा किए गए ट्वीट में मेड इन इंडिया की आड़ में भगवान श्रीराम और माता सीता का मजाक उड़ाने की कोशिश की गई है।

 

मोहम्मद जुबैर के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। लोगों ने जुबैर पर हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को भड़काने का आरोप लगाया। साथ ही पुलिस से गिरफ्तार करने की मांग की। लोगों का कहना है कि धर्म निरपेक्षता की आड़ में हर बार हिंदुओ की आस्था को निशाना बनाया जाता है। मोहम्मद जुबेर भी इस काम में पीछे नहीं है। इससे पहले धार्मिक भावना भड़काने के आरोप में जुबैर को गिरफ्तार किया गया था।

yle="font-family: verdana; font-size: medium;">गौरतलब है कि मोहम्मद जुबैर ने नूपुर शर्मा का एडिटेड और एकपक्षीय वीडियो शेयर कर पूरे देश को नफरत की आग में झोंक दिया था। यहां तक कि भारत के खिलाफ अरब देशों को भी भड़काने की कोशिश की थी। मोहम्मद जुबैर के कारण देश में ‘सर तन से जुदा’ का आतंक फैला गया था। इस्लामिक कट्टरपंथियों ने उदयपुर के कन्हैया साहू और अमरावती के उमेश कोल्हे सहित कम-से-कम 6 हिंदुओं का सरकलम कर दिया था।

गाजियाबाद पुलिस ने जून 2021 में मुस्लिम बुजुर्ग के साथ मारपीट को सांप्रदायिक रंग देने के आरोप में कथित फैक्टचेक वेबसाइट AltNews के मोहम्मद जुबैर और ट्विटर सहित 9 के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। वीडियो में आरोप लगाया गया था कि गाजियाबाद में एक मुस्लिम व्यक्ति की दाढ़ी काटकर उससे जबरदस्ती जय श्री राम बुलवाया गया। इस वीडियो के वायरल होते ही मुस्लिम पक्षकारों के साथ फैक्ट चेकरों ने हिंदुओं को बदनाम करना शुरू कर दिया। AltNews के मोहम्मद जुबैर और सबा नकवी, राणा अयूब जैसे पक्षकारों के साथ मुस्लिम कांग्रेसी नेताओं ने इस फर्जी खबर और वीडियो को ट्वीट कर ‘जय श्री राम’ को बदनाम करना शुरू कर दिया, लेकिन जब गाजियाबाद पुलिस ने इस मामले में मुस्लिम लड़कों को ही गिरफ्तार किया तो इन सबों ने चुप्पी साध ली।

मोहम्मद जुबैर ने तनिष्क विवाद का फायदा उठाते हुए ट्विटर पर इंदौर के एक शोरूम का वीडियो शेयर किया, जिसमें यह साबित करने का प्रयास किया गया है कि तनिष्क के शोरूम के सामने लोग ‘जय श्री राम’ का नारा लगाकर प्रदर्शन कर रहे हैं। आक्रोशित लोग तनिष्क के शोरूम में घुसकर काम कर रहें लोगों को डराने और धमकाने की कोशिश कर रहे है। जब इस वीडियो की जांच की गई, तो जो सच्चाई सामने आयी, वो काफी हैरान करने वाली थी। जुबैर ने शोरूम के अंदर की तस्वीरों और ‘जय श्री राम’ के नारे की आवाज को आधार बनाकर हिन्दुओं को ‘आक्रामक’ साबित करने की कोशिश की थी।

 

इससे पहले जुबैर ने 07 अगस्त, 2020 को एक ट्विटर यूजर को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने के लिए नाबालिग बच्ची की तस्वीर सार्वजानिक कर दी थी। बताया गया था कि यह बच्ची उस यूजर की पोती थी और उसे जुबैर के ट्वीट के बाद रेप की धमकियां मिली थी। नाबालिग लड़की की ऑनलाइन प्रताड़ना के आरोप में जुबैर के खिलाफ पॉस्को एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने ट्वीट कर इसके बारे में जानकारी दी। इस मामले में ट्विटर को भी नोटिस भेजा गया था।

ब्राह्मणों से दान लेने का हक सिर्फ कायस्थों को ही क्यों है?


ब्राह्मणों से दान लेने का हक सिर्फ कायस्थों को ही है! यह एक पौराणिक कथा है। जिस तरह आज वास्तविक भारतीय इतिहास बाहर आना शुरू हो गया है, उसी तरह कायस्थों का इतिहास भी बाहर आना शुरू हो गया है। विश्व में सनातन धर्म की पताका फहराने वाले भी कायस्थ स्वामी विवेकानंद ही थे, आज उसी पताका को वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लेकर चल रहे हैं। इतना ही नहीं, इतना ही नहीं, भारत में अधिकतर अविष्कारक कायस्थ ही हैं। लेकिन कुर्सी के भूखे नेताओं ने तुष्टिकरण करते आतताई मुगलों को महान बताने के चक्कर में वास्तविक इतिहास को ही धूमिल कर दिया।  

उज्जैन में भगवान श्रीचित्रगुप्त मंदिर 
उज्जैन में महाकाल मंदिर के विस्तार का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटन करने पर इन्ही तुष्टिकरण के पुजारियों ने विरोध शुरू कर दिया। जो प्रमाणित करता है कि ये फिर जनता को इतिहास से गुमराह कर रहे हैं। मध्य प्रदेश कोई नाम नहीं, इसका गूढ़ इतिहास है, जिसे पाखंडी धर्म-निरपेक्ष कभी नहीं समझने देंगे। जिस प्रकार प्राणी के शरीर में नाभि शरीर के मध्य में होती है, ठीक उसी भांति मध्य प्रदेश भारत के मध्य में है। यही वह पौराणिक पूजनीय स्थल है जहाँ से सनातन धर्म की हर गणना होती है। कहते है किसी भी नक्षत्र, समय सारणी और ग्रहण आदि का निर्धारण इसी उज्जैन से होता है और इसी उज्जैन में कायस्थों के भगवान श्रीचित्रगुप्त जी महाराज का भव्य मंदिर भी है।  

उज्जैन नगरी के यमुना तलाई के किनारे एक मंदिर में चित्रगुप्त एवं धर्मराज एक साथ विराजे हैं। यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है। मान्यता है कि इस मंदिर में कलम, दवात व डायरी चढ़ाने मात्र से मनोकामना पूरी हो जाती है। यही कारण है कि इस मंदिर में दर्शन करने आने वाले श्रद्घालुओं के हाथों में फल-फूल न होकर कलम, स्याही और डायरी नजर आती है।

चित्रगुप्त के जन्म की कथा काफी रोचक है। जब यमराज ने अपने सहयोगी की मांग की, तो ब्रह्मा ध्यान में चले गए। उनकी एक हजार वर्ष की तपस्या के बाद एक पुरूष उत्पन्न हुआ। इस पुरूष का जन्म ब्रह्मा जी की काया से हुआ था। इसलिए ये कायस्थ कहलाये और इनका नाम चित्रगुप्त पड़ा। वह यमराज के सहयोगी हैं। जो जीव जगत में मौजूद सभी का लेखा-जोखा रखते हैं।

ब्राह्मणों को हर जाति से दान लेने का अधिकार है लेकिन कायस्थ है कि उन्हे ब्राह्मणों से दान लेने का अधिकार है।

कहते है, जब भगवान राम दशानन रावण को मार कर अयोध्या लौट रहे थे, तब उनके खडाऊं को राजसिंहासन पर रख कर राज्य चला रहे राजा भरत थे। भरत ने गुरु वशिष्ठ को भगवान राम के राज्यतिलक के लिए सभी देवी देवताओं को सन्देश भेजने की व्यवस्था करने को कहा। गुरु वशिष्ठ ने ये काम अपने शिष्यों को सौंप कर राज्यतिलक की तैयारी शुरू कर दीं।

ऐसे में जब राज्यतिलक में सभी देवी-देवता आ गए तब भगवान राम ने अपने अनुज भरत से पूछा चित्रगुप्त जी नहीं दिखाई दे रहे है, इस पर जब उनकी खोज हुई। खोज में जब चित्रगुप्त जी नहीं मिले तो पता लगा कि गुरु वशिष्ठ के शिष्यों ने भगवान चित्रगुप्त जी को निमत्रण पहुंचाया ही नहीं था, जिसके चलते भगवान चित्रगुप्त नहीं आये।

इधर भगवान चित्रगुप्त सब जान तो चुके थे, और इसे भी नारायण के अवतार प्रभु राम की महिमा समझ रहे थे। फलस्वरूप उन्होंने गुरु वशिष्ठ की इस भूल को अक्षम्य मानते हुए यमलोक में सभी प्राणियों का लेखा-जोखा लिखने वाली कलम को उठा कर किनारे रख दिया। उस समय परेवा काल शुरू हो चुका था। 

दूसरी तरफ सभी देवी-देवता को भगवान राम ने देखा लेकिन भगवान चित्रगुप्त वहां कहीं दिखाई नहीं पड़े तो भगवान  राम ने भगवान चित्रगुप्त के न आने के कारणों की पड़ताल की। पड़ताल में पता चला कि गुरु वशिष्ठ के शिष्यों ने भगवान चित्रगुप्त को निमंत्रण पहुंचाया ही नहीं था।

उधर स्वर्ग और नरक के सारे काम रुक गये थे, प्राणियों का लेखा जोखा ना होने के कारण ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि किसको कहाँ भेजा जाएI 

तब गुरु वशिष्ठ की इस गलती को समझते हुए भगवान राम ने अयोध्या में भगवान् विष्णु द्वारा स्थापित भगवान चित्रगुप्त के मंदिर में गुरु वशिष्ठ के साथ जाकर भगवान चित्रगुप्त की स्तुति की और गुरु वशिष्ठ की गलती के लिए क्षमा याचना की। श्री अयोध्या महात्मय में भी इसे श्री धर्म हरि मंदिर कहा गया है धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उसे इस तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होता। जिसके बाद भगवान राम का आग्रह मानकर चित्रगुप्तजी ने लगभग 4 पहर अर्थात 24 घंटे बाद पुन: कलम-दवात की पूजा करने के पश्चात उसको उठाया और प्राणियों का लेखा-जोखा लिखने का कार्य आरम्भ किया। गौरतलब है कि श्री अयोध्या महात्मय में भी इस मंदिर को श्री धर्म हरि मंदिर कहा गया है। 

धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उसे इस तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होता।  

तभी से परेवा काल शुरु होने के बाद सभी कायस्थ 24 घंटे के लिए कलम दवात रख कर लिखने पढने का काम छोड़ते हैं, और इसी घटना के बाद कायस्थ ब्राह्मणों के लिए भी पूजनीय हो गए, और इस घटना के पश्चात मिले वरदान के फलस्वरूप सबसे दान लेने वाले ब्राह्मणों  से दान लेने का हक़ भी सिर्फ कायस्थों को मिला।

तभी से कायस्थ दीपावली की पूजा के पश्चात कलम को रख देते हैं और यमदुतिया यानि भाईदूज के दिन भगवान चित्रगुप्त का विधिवत कलम दवात पूजन करके ही कलम को धारण करते है।

ऐसा है स्वरूप

भगवान चित्रगुप्त जी के हाथों में कर्म की किताब, कलम, दवात है। ये कुशल लेखक हैं और इनकी लेखनी से जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय मिलता है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान है। यमराज और चित्रगुप्त की पूजा एवं उनसे अपने बुरे कर्मों के लिए क्षमा मांगने से नरक का फल भोगना नहीं पड़ता है। इस संदर्भ में एक कथा यहां उल्लेखनीय है।

कहते है तभी से कायस्थ ब्राह्मणों के लिए भी पूजनीय हुए और इस घटना के पश्चात मिले वरदान के फलस्वरूप सबसे दान लेने वाले ब्राह्मणों से दान लेने का हक़ सिर्फ कायस्थों को ही है।

भगवान चित्रगुप्त की पूजन विधि

सबसे पहले पूजा स्थान को साफ कर एक चौकी बनाएं। उस पर एक कपड़ा विछा कर चित्रगुप्त का चित्र रखें।

दीपक जला कर गणपति जी को चंदन, हल्दी, रोली अक्षत, दूब ,पुष्प व धूप अर्पित कर पूजा अर्चना करें।

फल, मिठाई और विशेष रूप से इस दिन के लिए बनाया गया पंचामृत (दूध, घी, कुचला अदरक ,गुड़ और गंगाजल)और पान सुपारी का भोग लगाएं।

परिवार के सभी सदस्य अपनी किताब, कलम,दवात आदि की पूजा करें और चित्रगुप्त जी के सामने रखें।

अवलोकन करें:-

कायस्थ कौन हैं ?

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कायस्थ कौन हैं ?
सर्वप्रथम तो ये जान लें आप सब कि ना तो मै जातिवादी हुँ और ना ही मुझे जातिवादी

सभी सदस्य एक सफेद कागज पर चावल का आटा, हल्दी,घी, पानी व रोली से स्वस्तिक बनाएं। उसके नीचे पांच देवी देवतावों के नाम लिखें ,जैसे- श्री गणेश जी सहाय नमः ,श्री चित्रगुप्त जी सहाय नमः, श्री सर्वदेवता सहाय नमः आदि।

इसके नीचे एक तरफ अपना नाम पता व दिनांक लिखें और दूसरी तरफ अपनी आय व्यय का विवरण दें, इसके साथ ही अगले साल के लिए आवश्यक धन हेतु निवेदन करें। अब अपने हस्ताक्षर करें। और इसे पवित्र नदी में विसर्जित करें।

संकट में श्रीलंका को आई ‘भगवान श्री राम’ की याद, रामायण से जुड़े स्थानों का हो रहा विकास


चीन के मकरजाल में फंस गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे श्रीलंका को अपने आर्थिक संकट से निकलने के लिए हिन्दुत्व की शरण में आशा की किरण दिखनी शुरू हो गयी है। श्रीलंका की अर्थव्‍यवस्‍था बड़े पैमाने पर टूरिज्‍म पर निर्भर थी। मगर आर्थिक संकट के चलते पर्यटन का कारोबार भी चौपट हो चुका है। भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहा यह द्वीपीय देश अब आर्थिक सुधार के लिए पर्यटन को बढ़ावा देने पर ध्यान देना चाहता है। इस देश से रामायण का भी गहरा नाता है। श्रीलंका के नवनियुक्त पर्यटन दूत और क्रिकेट खिलाड़ी सनत जयसूर्या ने कहा है कि उनका देश भारतीय पर्यटकों के लिए रामायण से जुड़े स्थलों की यात्रा को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करेगा। इस संदर्भ में जयसूर्या ने हाल में ही कोलंबो में भारत के उच्चायुक्त गोपाल बागले से मुलाकात की। बैठक भारत और श्रीलंका के लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने और आर्थिक सुधार के लिए एक माध्यम के रूप में पर्यटन को बढ़ावा देने पर केंद्रित थी। जयसूर्या ने कहा कि उनका देश भारतीय पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए रामायण ट्रेल (राम पथ गमन) को प्रोत्साहित करेगा। उन्होंने कहा कि इससे आर्थिक संकट में घिरे देश में पर्यटन को बढ़ावा मिलने से आर्थिक मदद मिलेगी।

संकट में श्रीलंका का मददगार बना भारत

श्रीलंका इस समय गंभीर आर्थिक संकट, ऐतिहासिक मंदी और भयानक महंगाई का सामना कर रहा है। लोगों को अब ईंधन और रोजाना की जरूरत की चीजों के लिए संघर्ष करना पड़ रह है। लोगों को खाने-पीने का सामान नहीं मिल रहा है, जिसकी वजह से पेट भरना भी मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संकटमोचक रूप में सामने आए हैं। श्रीलंका की सरकार और विपक्ष, दोनों मदद के लिए प्रधानमंत्री मोदी की ओर देख रहे थे। संकट काल में भारत ने अपने पड़ोसी देश की मदद कर रहा है। भारत की ओर से 40 मिट्रिक टन डीजल और 50 हजार टन चावल श्रीलंका भेजा गया। इसके साथ ही भारत ने श्रीलंका को 3.8 अरब डॉलर की मदद देने का ऐलान किया है।

अशोक वाटिका में बना है माता सीता मंदिर

माता सीता का हरण करने के बाद रावण ने उन्हें अपने महल की अशोक वाटिका में रखा था। यह जगह आज भी श्रीलंका में मौजूद है। यहां पर सीता माता का एक प्राचीन मंदिर भी बनाया गया है। इस जगह को सेता एलीया के नाम से जाना जाता है। ये नूवरा एलिया नामक जगह के पास स्थित है। मंदिर के पास ही एक झरना भी है। माना जाता है कि इस झरने में सीता माता स्‍नना करती थीं। इस झरने के आसपास की चट्टानों पर हनुमान जी के पैरों के निशान भी मिलते हैं। यही वो पर्वत है जहां हनुमान जी ने पहली बार कदम रखा था। इसे पवाला मलाई कहते हैं। ये पर्वत लंकापुरा और अशोक वाटिका के बीच में है

जहां गिरे थे माता सीता के आंसू, अब सीता तालाब


रावण जब सीता माता को हरण करके ले जा रहा था तब सीता माता अपने पति भगवान राम के पास जाने के लिए रावण से कह रही थीं। मगर, रावण उन्‍हें जबरन अपने साथ लंका ले जा रहा था। उस दौरान सीता माता के आंसू जिस-जिस स्‍थान पर गिरे वहां पर तलाब बन गया। श्रीलंका में भी एक ऐसा ही स्‍थान है जहां सीता माता के आंसू गिरे थे। तब से इस जगह को सीता अश्रु ताल कहा जाता है। श्रीलंका में कैंडी से लगभग 50 किलोमीटर दूर नम्बारा एलिया मार्ग पर यह तालाब मौजूद है। इसे कुछ लोग सीता टियर तालाब कहते हैं। जब लंका में गर्मी पड़ती है और सारे तलाब सूख जाते हैं तब भी यह तलाब नहीं सूखता। इस तलाब का पानी भी बहुत मीठा है।

माता सीता ने यहां दी थी अग्नि परीक्षा

श्रीलंका में वेलीमड़ा नामक एक जगह है। यहां एक मंदिर डिवाउरूम्पाला है। कहा जाता है कि यहां पर माता सीता ने अग्नि परीक्षा दी थी। आज भी स्थानीय लोग इस जगह पर सुनवाई करके न्याय करने का काम करते हैं। मान्यता है कि जिस तरह इस जगह पर देवी सीता ने सच्चाई साबित की थी उसी तरह यहां लिया गया हर फैसला सही साबित होता है।

मई में सबसे अधिक भारतीय पर्यटक श्रीलंका पहुंचे

श्रीलंका में रामायण से जुड़े 52 स्थल हैं। श्रीलंका इस वक्त भीषण आर्थिक संकट से जूझ रहा है, जिसके चलते यहां पर्यटन भी ठप पड़ा है। इस साल मई महीने में भारत की ओर से श्रीलंका के पर्यटन सेक्टर में सबसे अधिक योगदान दिया गया है। यहां 5562 पर्यटक भारत से पहुंचे हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर ब्रिटेन है, जहां के 3723 लोग श्रीलंका घूमने गए। भारत और श्रीलंका के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं से संबंधित विरासत के आदान-प्रदान के लिए वर्ष 2008 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।


सिगिरिया में था रावण का महल

कहा जाता है कि सिगिरिया ही वह स्थान है, जहां रावण रहता था। माना जाता है कि रावण का साम्राज्य मध्य श्रीलंका में, बदुल्ला, अनुराधापुरा, केंडी, पोलोन्नुरुवा और नुवारा एलिया तक फैला हुआ था, मगर रावण सिगिरिया में रहता था। इस महल के लिए कहा जाता है कि यह महल भी कुबेर ने बनाया था, जो उनके भाई हैं। सिगरिया रॉक चट्टान के शीर्ष पर एक प्राचीन महल का अवशेष है, जो किलेबंदी, सीढ़ीदार बगीचे, तालाब, नहर, गलियों और फव्वारों से घिरा हुआ है। ये भी कहा जाता है कि यहां कुछ दिन माता सीता को रखा गया था। इसके बाद दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया था।

आठ हजार फुट की ऊंचाई  पर है रावण की गुफा

साल 2017 में एक रिसर्च हुई थी जिसमें 50 ऐसे स्थानों को खोज निकाले का दावा किया गया था जिनका रिश्‍ता रामायण से था। इसी रिसर्च में कहा गया था कि एक पहाड़ी में बनी गुफा में आज भी रावण का शव सुरक्षित है। रिसर्च में कहा गया है कि श्रीलंका में रैगला के जंगलो में एक चट्टान नुमा पहाड़ी है। इस पहाड़ी में एक गुफा है और गुफा में रावण का शव आज भी सुरक्षित रखा है। यह शोध श्रीलंका के रामायण रिसर्च सेंटर और पर्यटन विभाग ने मिलकर की है। शोध में दावा किया गया कि इसी गुफा में जाकर रावण तपस्या किया करता था। दावा है कि रैगला पहाड़ी में आठ हजार फुट की ऊंचाई पर यह गुफा बनी है जहां रावण का शव रखा गया है।