प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रभाव में काफी वृद्धि हुई है। आज भारत दूसरे देशों के लिए संकटमोचक के रूप में उभर कर सामने आया है। इसका असर श्रीलंका की आर्थिक बदहाली और चीन के जहाज हंबनटोटा के मामले में देखने को मिला है। भारत ने आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका की खुलकर मदद की है। इसका परिणाम है कि भारत आज श्रीलंका से अपनी बात मनवाने में कामयाब रहा। श्रीलंका ने चीनी रिसर्च शिप को अपने हंबनटोटा पोर्ट पर रूकने की अनुमति नहीं दी। इसे भारत की कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। दरअसल भारत ने चीनी रिसर्च शिप की श्रीलंका में संभावित मौजूदगी को लेकर चिंता व्यक्त की थी। श्रीलंका ने भारत की बात का मान रखते हुए चीन को साफ इनकार कर दिया। इसके बाद चीन का जहाज श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट पर नहीं रुका। श्रीलंकाई अधिकारियों ने गुरुवार (11 अगस्त, 2022) को बताया कि उच्च तकनीक वाला चीनी रिसर्च शिप तय कार्यक्रम के मुताबिक बंदरगाह नहीं पहुंचा। शिप के गुरुवार को हंबनटोटा पहुंचने की योजना थी। चीनी शिप 11 से 17 अगस्त तक हंबनटोटा बंदरगाह पर लंगर डालने वाला था।
‘न्यूजफर्स्ट डॉट एलके’ वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक, हंबनटोटा बंदरगाह के ‘हार्बर मास्टर’ ने कहा कि कोई भी जहाज उनकी अनुमति के बिना बंदरगाह में प्रवेश नहीं कर सकता। ‘हार्बर मास्टर’ ने कहा था कि चीनी बैलिस्टिक मिसाइल और उपग्रह निगरानी जहाज ‘युआन वांग 5’ गुरुवार को हंबनटोटा बंदरगाह नहीं पहुंचेगा। पिछले हफ्ते, भारत द्वारा व्यक्त की गई सुरक्षा चिंताओं के कारण श्रीलंका के विदेश मंत्रालय ने बीजिंग से ‘युआन वांग 5’ के आगमन को टालने के लिए कहा था।
‘युआन वांग 5’ चीन से 14 जुलाई को रवाना हुआ था और अब तक इसने अपने रास्ते में एक भी बंदरगाह में प्रवेश नहीं किया है। जहाज लगभग 28 दिनों से यात्रा पर है। श्रीलंका के विदेश मंत्रालय ने 12 जुलाई को हंबनटोटा बंदरगाह पर जहाज को लंगर डालने के लिए मंजूरी दी थी। आठ अगस्त को, मंत्रालय ने कोलंबो में चीनी दूतावास को लिखे एक पत्र में जहाज के तय कार्यक्रम के मुताबिक ठहराव को स्थगित करने का अनुरोध किया।
पहले श्रीलंका ने भारत सरकार के अनुरोध को गंभीरता से नहीं लिया था। वहां की सरकार का कहना था कि, जहाज के हंबनटोटा में रुकने की मुख्य वजह ईंधन है। इस तरह के जहाज समय-समय पर भारत, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे विभिन्न देशों से आते रहे हैं और इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। लेकिन भारत के बढ़ते दबाव के बाद श्रीलंका ने चीन को पत्र लिखकर जहाज को रोकने का अनुरोध किया।
हंबनटोटा के बंदरगाह को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। बंदरगाह को बड़े पैमाने पर चीनी कर्ज की मदद से विकसित किया गया है। वहीं युआन वांग 5 एक डबल यूज वाला जासूसी पोत है, जो अंतरिक्ष और उपग्रह ट्रैकिंग के लिए बनाया गया है। यह बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च में भी सक्षम है। शिप में 400 लोगों का क्रू है। साथ ही इस पर एक बड़ा सा पाराबोलिक एंटिना लगा हुआ है और कई तरह के सेंसर मौजूद हैं।
चीनी रिसर्च शिप ‘युआन वांग 5’ की सबसे खास बात यह है कि यह परमाणु ऊर्जा संयत्रों की भी जासूसी कर सकता है। ऐसे में भारत के लिए खतरा और बढ़ जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक हंबनटोटा बंदरगाह से भारत के कलपक्कम और कूडनकुलम परमाणु ऊर्जा स्टेशनों की दूरी 750 किलोमीटर है। इसके अलावा दक्षिणी भारत के 6 बंदरगाहों की दूरी भी ज्यादा नहीं है। ऐसे में इन सबकी “जासूसी” होने का खतरा था। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम पर भारत काफी नजदीक से नजर बनाए हुए था।
आठ सालों में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने विश्व क्षितिज पर किस तरह दमदार उपस्थिति दर्ज की है और वैश्विक ताकत बन गया है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2014 में देश का नेतृत्व संभालने के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत के अग्रदूत बने हुए हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मंचों पर भारत की भागीदारी बढ़ी है। वैश्विक कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध से तीसरे विश्व युद्ध की आहट के बीच भारत की स्वतंत्र विदेश नीति ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। उसने बता दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी का नया भारत बिना किसी दबाव में अपने देश के हित में फैसले लेता है। भारत के खिलाफ उठने वाली हर अंतरराष्ट्रीय आवाज का मुंहतोड़ जवाब देता है।

ग्लोबल लीडर बने प्रधानमंत्री मोदी
एक दौर वह भी था जब भारत विश्व की महाशक्तियों के भरोसे रहता था। आज भारत बोलता है तो दुनिया सुनती है। दरअसल दुनिया में इस समय किसी नेता की सबसे ज्यादा पूछ है तो वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। प्रधानमंत्री मोदी की शख्सियत और व्यक्तित्व की पूरी दुनिया कायल है। प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले आठ सालों में जिस तरह से भारत की छवि को पूरी दुनिया में पेश किया है, उसने दुनिया भर के नेताओं को प्रधानमंत्री मोदी का मुरीद बना दिया है। आज पूरी दुनिया प्रधानमंत्री मोदी के दमदार व्यक्तित्व और शानदार प्रतिनिधित्व का कायल है। घरेलू राजनीति में वे जितने लोकप्रिय हैं वैसे ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ चुके हैं। आलम यह है कि विश्व के तमाम राजनेता उन्हें एक ग्लोबल लीडर मानते हैं।
वर्ल्ड लीडर्स में पहले पायदान पर पीएम मोदी
प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले दिनों कोरोना संकट के दौरान जिस प्रकार से देश की 130 करोड़ जनता की रक्षा करते हुए पूरी दुनिया के लिए मदद के हाथ बढ़ाए हैं, उसने उन्हें एक बार फिर दुनिया का सबसे लोकप्रिय और शीर्ष नेता बना दिया है। अमेरिकी रिसर्च एजेंसी मॉर्निग कंसल्ट के ताजा सर्वे के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय और शीर्ष नेता बने हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी की अप्रूवल रेटिंग बढ़कर 77 प्रतिशत हो गई है और यह रेटिंग दुनिया के शीर्ष 13 नेताओं में सबसे ज्यादा है। प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया भर में वयस्कों के बीच सबसे ज्यादा रेटिंग मिली है। 18 मार्च, 2022 को ग्लोबल लीडर अप्रूवल ट्रैकर मॉर्निंग कंसल्ट ने अपना लेटेस्ट डेटा जारी किया था।
क्वाड सम्मेलन में बाइडेन ने की पीएम मोदी की तारीफ
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 23 मई,2022 को दो दिवसीय क्वाड शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने जापान की राजधानी टोक्यो पहुंचे। इस दौरान भारतीय समुदाय ने प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत किया। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने सम्मेलन के दौरान कोरोना महामारी से लोकतांत्रिक तरीके से निपटने में प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका की जमकर प्रशंसा की, वहीं चीन पर विफलता का आरोप लगाया। यह सम्मेलन भारत की दृष्टि से काफी सफल रहा। अमेरिका ने भारत के साथ सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। हिंद महासागर क्षेत्र में क्वाड का सहयोग भारत को एक रणनीतिक बढ़त प्रदान करेगा। इसका उपयोग भारत इस क्षेत्र की शांति के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की आक्रामकता को नियंत्रित करने के लिए कर सकेगा। गौरतलब है कि नवंबर 2017 में हिंद-प्रशांत क्षेत्र को चीन के प्रभाव से मुक्त रखने हेतु नई रणनीति बनाने के लिये ‘क्वाड’ समूह की स्थापना की गई थी।
आईपीईएफ कार्यक्रम में शामिल हुए प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 23 मई, 2022 को टोक्यो में इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क फॉर प्रॉस्पेरिटी (IPEF- आईपीईएफ) कार्यक्रम में भाग लिया। इस कार्यक्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति जोसेफ आर बाइडेन और जापान के प्रधानमंत्री किशिदा फुमियो भी शामिल हुए। बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत एक समावेशी और लचीले ‘इंडो पैसिफिक इकोनॉमिक मॉडल’ के निर्माण के लिए आप सभी के साथ काम करेगा। उन्होंने कहा, ‘भारत आईपीईएफ के लिए सभी हिन्द-प्रशांत देशों के साथ काम मिलकर काम करेगा। मेरा मानना है की हमारे बीच लचीली आपूर्ति श्रृंखला के तीन मुख्य आधार होने चाहिए- Trust (विश्वास), Transparency (पारदर्शिता) और Timeliness (समयबद्धता)। मुझे विश्वास है कि यह फ्रेमवर्क इन तीनों स्तंभों को मजबूत करने में सहायक होगा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में विकास, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगा।’
रूस-यूक्रेन युद्ध : वैश्विक कूटनीति में बढ़ी भारत की धमक
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रभाव में काफी वृद्धि हुई है। इसका असर रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान देखने को मिल रहा है। युद्ध की वजह से दुनिया में मची उथल-पुथल के बीच भारत अचानक वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गया है। एक महीने में 20 से अधिक ग्लोबल लीडर्स के भारत दौरे ने साबित किया कि आज वैश्विक कूटनीति में भारत का कद काफी बढ़ा है। भारत की राजधानी दिल्ली में रशिया के विदेश मंत्री सर्गी लावरोव, ब्रिटेन की विदेश मंत्री एलिजाबेथ ट्रस और अमेरिका के डिप्टी एनएसए दिलीप सिंह की मौजूदगी से भारत की कूटनीतिक ताकत के बारे में पता चला। भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है, जो रशिया से भी बात कर रहा है और अमेरिका से भी बात कर रहा है।
आतंकवाद पर दुनिया ने स्वीकारा पीएम मोदी का आह्वान
आतंकवाद अच्छा या बुरा नहीं होता, आतंकवाद तो बस आतंकवाद होता है। अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की यही बात पहले अनसुनी रह जाती थी, लेकिन अब भारत की बातों को दुनिया मानने लगी है और एक सुर में आतंक की निंदा कर रही है। आतंक के खिलाफ आज अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, नार्वे, कनाडा, ईरान जैसे देश हमारे साथ खड़े हैं। पाकिस्तान को छोड़कर सार्क के सभी सदस्य देश अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव और नेपाल हमारे साथ हैं। जी-20 हो या हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन, ब्रिक्स हो या सार्क समिट सभी ने हमारे साथ आतंकवाद को मानवता का दुश्मन बताते हुए दुनिया को इसके खिलाफ एक होने का आह्वान किया है।
प्रधानमंत्री मोदी की नीति से पस्त हुआ पाकिस्तान
मोदी सरकार की स्पष्ट और दूरदर्शी विदेशनीति के प्रभाव से पाकिस्तान विश्व बिरादरी में अलग-थलग पड़ गया है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति में ऐसा घिरा है कि उसे विश्व पटल पर भारत के खिलाफ अपने साथ खड़ा होने वाला कोई एक सहयोगी देश नहीं मिल रहा। चीन तक भारत के खिलाफ उसका साथ देने को तैयार नहीं है। हाल में ही जब चीन ने पाकिस्तान की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें पाकिस्तान ने भारत पर ओबीओआर को नुकसान पहुंचाने के लिए भारत की साजिश की बात कही थी। दूसरी ओर अमेरिका की अफगान नीति से उसे बाहर किया जा चुका है और वह पाकिस्तान से सहयोग में भी लगातार कटौती कर रहा है। पाक को आतंकवाद का गढ़ कहते हुए अफगानिस्तान और बांग्लादेश भी अब पाकिस्तान का साथ पूरी तरह से छोड़ चुके हैं।
सर्जिकल स्ट्राइक पर भारत को दुनिया का साथ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का दुनिया में जो स्थान बन गया है वह निश्चित ही भारत के बढ़ते प्रभुत्व को बयां करता है। फरवरी 2019 में पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में हवाई हमला और जम्मू-कश्मीर के उरी में 18 सितंबर, 2016 को हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 29 सितम्बर 2016 को सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों और लॉन्चपैड को तबाह किया तो विश्व समुदाय भारत के साथ खड़ा रहा। इस के साथ ही पहली बड़ी सफलता 28 सितंबर को तब मिली जब पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन के बहिष्कार की घोषणा के तुरंत बाद तीन अन्य देशों (बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान) ने उसका समर्थन करते हुए सम्मेलन में ना जाने की बात कही। वहीं नेपाल ने सम्मेलन की जगह बदलने का प्रस्ताव दिया और पाकिस्तान के आंतकवाद के कारण सार्क सम्मेलन न हो सका। इसके अलावा चीन ने भी पाक के द्वारा कश्मीर में अंतराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग पर इसे द्विपक्षीय मामला कहकर कन्नी काट ली।
लद्दाख और डोकलाम में चीन ने देखी भारत की धमक
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने लद्दाख और डोकलाम में चीन को मुंहतोड़ जवाब दिया। गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के मारे जाने की संख्या को लेकर जमकर आलोचना का सामना करना पड़ा। अमेरिका के प्रतिष्ठित थिंक-टैंक हडसन इंस्टिट्यूट के सेंटर ऑन चाइनीज स्ट्रैटजी के डायरेक्टर माइकल पिल्स्बरी नो कहा कि चीन की बढ़ती ताकत के समक्ष मोदी अकेले खड़े हैं। दरअसल ये टिप्पणी उन्होंने ‘वन बेल्ट, वन रोड’ परियोजना को ध्यान में रखते हुए कही थी। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी और उनकी टीम चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के इस महत्वाकांक्षी प्रॉजेक्ट के खिलाफ मुखर रही है। दरअसल अमेरिकी थिंक टैंक का मानना बिल्कुल सही है, क्योंकि भारत ने चीन को डोकलाम विवाद में भी अपनी दृढ़ता का परिचय करा दिया है और चीन को अपनी सेना को वापस बुलाने पर मजबूर होना पड़ा। चीन ने भारत को युद्ध की भी धमकी दी लेकिन पीएम मोदी की नीतियों से चीन अकेला हो गया और पश्चिमी देशों ने उसे संयम बरतने की सलाह दी। अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारत के साथ खड़े रहे।
‘ऑपरेशन गंगा’ की सफलता के पीछे भारत का बढ़ता कद
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुशल और दमदार नेतृत्व से वैश्विक स्तर पर आज भारत अपने देश और उसके नागरिकों की सुरक्षा के लिए बिना संकोच अपनी बात रखने में सक्षम है। इसका फिर प्रमाण रूस-यूक्रेन युद्ध में मिला है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने देश के नागरिकों की सुरक्षा को लेकर यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी बात की और उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराया। इससे दोनों देशों ने भारतीयों की सुरक्षित निकासी का आश्वासन दिया। जहां अमेरिका जैसे ताकतवर देश अपने नागरिकों को युद्धग्रस्त युक्रेन से निकालने में असमर्थ था, वहीं भारत ‘ऑपरेशन गंगा’ के तहत 20 हजार से अधिक अपने नागरिकों को निकालने में सफल रहा। इस सफलता के पीछे वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव, प्रधानमंत्री मोदी, चार केंद्रीय मंत्रियों और सुपर 30 का प्रमुख योगदान रहा है।
रूस पर प्रतिबंध के बावजूद भारत ने खरीदा कच्चा तेल
यूक्रेन पर रूस के हमले के खिलाफ पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और अमेरिका की नसीहत के बावजूद भारत ने रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदने का फैसला किया। भारत के वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी व्यापार आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अप्रैल में 20.19 बिलियन डॉलर का पेट्रोलियम खरीदा, जबकि पिछले साल इसी महीने में यह 10.76 बिलियन डॉलर था। भारत रूस से 70 डॉलर प्रति बैरेल तेल खरीदने लगा। हालांकि इसकी यूरोपीय देशों ने खूब आलोचना की। जिसके बाद भारत ने भी पश्चिमी देशों को दो टूक जवाब दिया। परिणाम सामने है। भारत ने अपने राष्ट्रीय हित को ध्यन में रखते हुए मात्र चार महीने में रूस से 1 प्रतिशत तेल की जगह 17 प्रतिशत तेल खरीदने लगा। भारत अब रूस से कच्चा तेल मंगवाकर जामनगर की फैक्ट्री में पेट्रोल-डीजल तेल तैयार करता है और यूरोपीय देशों को बेचता है।
अमेरिका के दबाव के बावजूद रूस से S-400 की आपूर्ति
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले आठ साल के शासन में आत्मविश्वास से लबरेज एक ‘न्यू इंडिया’ का उदय हुआ है, जो हर चुनौती से टकराने का साहस और सामर्थ्य रखता है। भारत अब दूसरे देशों की सोच और उनके दबाव में नहीं, बल्कि अपने संकल्प से चलता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर समझौता नहीं करता। इसका प्रमाण चीन से तनाव के बीच रूस से आधुनिक ब्रह्मास्त्र कहे जाने वाले एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम की आपूर्ति शुरू होने से मिलता है। इस सिस्टम की दो खेप भारत पहुंच चुकी है और तीसरी खेप भी जल्द मिलने वाली है। गौरतलब है कि दिसंबर में मिले पहले मिसाइल डिफेंस सिस्टम को सेना ने पंजाब सेक्टर में तैनात किया है। भारत ने रूस के साथ पांच एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 खरीदने के लिए 5.43 बिलियन डॉलर यानि 40 हजार करोड़ रुपये में सौदा किया था। अक्टूबर 2023 तक भारतीय वायुसेना को एस-400 ट्रायम्फ मिसाइल की कुल पांच रेजीमेंट मिलनी है।
कोरोना के खिलाफ जंग में मिली वैश्विक सराहना
प्रधानमंत्री मोदी ने कोरोना से जंग में पूरी दुनिया को रास्ता दिखाया है। विश्व के तमाम संगठनों ने कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई में निर्णयकारी नेतृत्व निभाने वाले प्रधानमंत्री मोदी को दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत बताया है। कई दिग्गज अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के सर्वे में भी प्रधानमंत्री मोदी की वाहवाही की गई है। मशहूर अमेरिकी पत्रकार थॉमस फ्रायडमैन ने भी माना कि मोदी सरकार ने कोरोना वायरस को परास्त करने में बेहतरीन काम किया है। इससे विश्व स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ भारत का सम्मान बढ़ा है। वैश्विक कोरोना संकट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने ना सिर्फ देश के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए संकटमोचक बन गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश पर दुनिया के तमाम देशों में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए मदद भेजी जा रही है। वैक्सीन के साथ कई देशों को मोदी सरकार ने दवाएं और चिकित्सीय उपकरण भेजे हैं।
अमेरिका और रूस से एक साथ दोस्ती
अमेरिका और रूस की अदावत सभी जानते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की के कूटनीतिक कौशल के कारण आज दोनों ही देश भारत के साथ खड़े दिखते हैं। ब्रिक्स सम्मेलन में जिस तरह से रुस ने भारत का साथ देते हुए चीन की हेकड़ी गुम कर दी वह काबिले तारीफ है। ठीक इसी तरह पाकिस्तान परस्त रहे अमेरिका को भारत की तरफ ले आना भी बड़ी बात है। आज अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने का खतरा मंडरा रहा है। अमेरिका ने भारत से दोस्ती की खातिर आज पाकिस्तान को हर मंच पर अकेला छोड़ दिया है।
Asean देशों को चीन के ‘चंगुल’ से छुड़ाया
26 जनवरी, 2018 को नई दिल्ली के राजपथ पर विश्व ने एक और अनोखा दृश्य तब देखा जब आसियान देशों के 10 राष्ट्राध्यक्ष भारत की जमीन पर एक साथ दिखे। थाइलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस और ब्रुनेई आसियान के नेताओं ने भारत को अपनी इस इच्छा से अवगत कराया कि रणनीतिक तौर पर अहम भारत-प्रशांत क्षेत्र में ज्यादा मुखर भूमिका निभाए। साफ है कि आसियान देशों के नेताओं का पीएम मोदी पर भरोसा व्यक्त किया जाना विश्व राजनीति में भारत के दबदबे को दिखा रहा है।