Showing posts with label #Muslim Population. Show all posts
Showing posts with label #Muslim Population. Show all posts

जापान में तेजी से बढ़ती मुस्लिम आबादी से मुस्लिमों को दफनाने की जगह नहीं, 40 वर्ष में 38 गुना बढ़ी मस्जिदों की संख्या

                                     जापानी में बढ़ रही मुस्लिम आबादी ( फोटो साभार- waseda.jp)
जापान में मुस्लिम आबादी की बेतहाशा वृद्धि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। यहाँ बड़े-बड़े मस्जिद बन गए हैं। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद देखा जा सकता है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।

जापान में हजार से लाखों में पहुँची मुस्लिम आबादी

दुनियाभर में मुस्लिम आबादी बेहताशा बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस सदी के अंत तक ईसाइयों को पीछे छोड़ते हुए इस्लाम मानने वालों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी।
दुनिया में 200 से ज्यादा देशों में इनकी अच्छी खासी आबादी है। इन देशों में इस्लामी गतिविधियाँ तेजी से बढ़ी हैं। 2013 में विश्व जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 1.6 अरब थी और 2050 तक 2.9 अरब यानी विश्व जनसंख्या का करीब 26% तक पहुँचने का अनुमान है। यही वजह से की विश्व के छोटे-छोटे देशों में भी इनकी संख्या दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही है।

छोटा सा एशियाई देश जापान भी इससे अछूता नहीं है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी है। मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.18 फीसदी से 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं।

 ये लोग ज्यादातर प्रवासी कामगार हैं, जो टेक्नोलॉजी, बिजनेस और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे के मुताबिक, इनकी संख्या 200,000 से ज़्यादा होने का अनुमान है। मार्च 2021 तक, देश भर में मस्जिदों, यानी पूजा की जगहों की संख्या 1999 में 15 से बढ़कर 113 हो गई है।

जापानी की अधिकांश मुस्लिम आबादी (लगभग 80%) ग्रेटर टोक्यो क्षेत्र, चुक्यो महानगरीय क्षेत्र और किन्ही क्षेत्र में रहते हैं। अब इनका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी हो रहा है।

जापान में तेजी से बन रहे हैं बहुमंजिला मस्जिद

ईरान और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से मजदूरों के बढ़ते इमिग्रेशन और धर्मांतरण की वजह से जून 2024 तक यहाँ 149 मस्जिदें बन गई हैं। यानी इनकी संख्या 10 गुणा बढ़ गई हैं। कई मस्जिदों को बड़ा बनाया गया है।
टोक्यो में टोक्यो कैमी मस्जिद को हाल ही में बहुमंजिला बनाया गया है और समय-समय पर आम जनता को लुभाने के लिए इस्लामिक गतिविधियाँ चलाई जाती हैं। दिसंबर 2012 के मध्य में एक शुक्रवार को दोपहर के आसपास, टोक्यो के शिबुया वार्ड में टोक्यो कैमी मस्जिद में एक खास आवाज में आदमी ने अज़ान दिया और नमाज का समय बताया। उसने कहा, “मस्जिद घर जैसी है। अल्लाहु अकबर।”
यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद बन चुकी है। जैसे- वासेदा विश्वविद्यालय के टोकोरोजावा परिसर के पास एक इमारत बनी थी, जिसे मस्जिद के रूप में उपयोग करने के लिए पुनर्निर्मित किया गया है।

90 के दशक में बनी बेतहाशा मस्जिदें

1990 के दशक में यहाँ मस्जिदों की संख्या तेजी से बढ़ी। 1980 में जहाँ सिर्फ 4 मस्जिदें थी, वहीं 1990 के दशक में ये बढ़ कर 90 से ज्यादा हो गई। इन वर्षों में इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए बाहरी देशों से कई लोग आए और मस्जिदों में कार्यक्रम आयोजित कर जापानियों को लुभाने की कोशिश की गई यानी जापानियों के धर्मांतरण में इन कार्यक्रमों की अहम भूमिका रही।
अब हालात ये हैं कि न सिर्फ प्रवासी मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, बल्कि जापान की मूल आबादी का धर्मांतरण तेजी से हुआ है। जापान में प्रवासी मुस्लिमों के बसने और परिवार बसाने की वजह से एक ‘हाइब्रिड मुस्लिम’ आबादी तैयार हो गई है। नमाज पढ़ना और रोजा रखना जैसे रीति रिवाज का पालन बड़ी आबादी करती है। इनमें कट्टरता भी देखी जाती है।

सांसद मिजुहो ने कब्रिस्तान बनाने पर प्रतिबंध लगाने की माँग की

जापान में हाल ही में ये खबर भी सामने आई कि सरकार ने शव दफनाने के लिए कब्रिस्तान बनाने के लिए जमीन देने से इनकार कर दिया है और प्रवासी मुस्लिमों को शव अपने देश लेकर दफनाने को कहा है। हालाँकि सरकार ने जापानी संसद में इसको लेकर स्पष्टीकरण दिया है।
दरअसल हाउस ऑफ काउंसिलर्स की प्रतिनिधि उमेमुरा मिजुहो ने कहा कि जापान में छोटा भू भाग है। प्राकृतिक आपदाएँ यहाँ होती रहती हैं, ऐसे में किसी बड़ी आपदा की स्थिति में दफनाने पर शवों के बाहर निकलने की संभावना है। साथ ही 99 फीसदी आबादी यहाँ दाह संस्कार करती है, इसलिए जापान की स्थिति को देखते हुए दफनाने से जुड़े नियम कड़े किए जाने चाहिए।
इसको लेकर सरकार ने स्थानीय सरकार को इसके बारे में विचार करने को कहा है। साथ ही स्थानीय रीति रिवाजों, नियमों और पर्यावरण को भी ध्यान में रखने को कहा है। क्योडो न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बाद जापानी मुस्लिमों को दफनाने के लिए नई जगहों की जरूरत है।
एजेंसी का कहना है कि कुछ लोकल सरकारें बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन अलग रखने को तैयार हैं, जबकि दूसरी सरकारें इतनी मदद नहीं कर रही हैं।
जापान में दाह संस्कार आम बात है और 99.9% शवों का दाह संस्कार किया जाता है। इससे मुसलमान अपने दफ़नाने के तरीकों को लेकर परेशान हैं।
उत्तर-पूर्वी जापान में मौजूद मियागी प्रांत के गवर्नर ने दिसंबर में कहा था कि 2023 में इंडोनेशिया के साथ लोकल इलाकों के लिए मज़दूर देने के लिए मेमोरेंडम साइन करने के बाद एक नए कब्रिस्तान पर जापान शांति पसंद देश माना जाता है। अनुशासन प्रिय इस देश की बड़ी आबादी बुजुर्ग हो चुकी है। ऐसे में कामगार की जरूरत को पूरा करने के लिए विदेशों से लोग यहाँ आकर बस रहे हैं। इनमें मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है। खासकर ईरान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देशों से कामगार आकर यहाँ स्थायी रूप से बस रहे हैं। इसका असर जापान में दिखने लगा है।विचार किया जा रहा है।

क्यों अदालतें कह रहीं- धर्मांतरण रोको, घुसपैठियों को भगाओ?


हाल में इलाहाबाद की अदालत ने भारत में बहुसंख्यक हिंदुओ के अल्पसंख्यक होने की आशंका जताते हुए धर्मांतरण को रोकने के मामले में टिप्पणी की थी। वहीं झारखंड की हाई कोर्ट ने तो कहा था कि भारत में अवैध रूप से घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशियों को चिह्नित करके वापस से भेजना चाहिए क्योंकि वो यहाँ आकर जनजातीय लड़कियों को अपने जाल में फँसाते हैं और धर्मांतरण कराते हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट और झारखंड हाई कोर्ट ने भले ही ये बातें अलग-अलग मामलों में की हो, लेकिन इनके मायने समझेंगे तो पता चलेगा कि मामला कितना गंभीर है। एक तरफ अदालत मान रहा है कि अगर धर्मांतरण का खेल चलता रहा तो बहुसंख्यक अल्पसंख्यक हो जाएँगे और दूसरी ओर दिख भी रहा है कि कैसे घुसपैठ के बाद एसटी महिलाओं को फँसाते हुए उनका धर्मांतरण कराया जा रहा है, फिर वहीं रहते हुए नए मदरसे खुल रहे हैं और आबादी में परिवर्तन का खेल चल रहा है।

अदालतों की ये बातें निराधार बात नहीं है। भारत को स्वतंत्र हुए 75 साल हो गए हैं। इतने समय से मुस्लिमों को अल्पसंख्यक श्रेणी में रखा जाता है, मगर जिस हिसाब से इनकी रफ्तार बढ़ रही है उसे देख ऐसा लगता है कि ओडिशा हाई कोर्ट की चिंता जायज है।

1951 और 2011 में हुई जनगणना

1951 में हुई जनगणना के अनुसार, भारत में हिंदुओं की आबादी 30.5 करोड़ (84.1%), सिखों की 60 लाख 86 हजार (1.9%), ईसाइयों की 80 लाख के आसपास और मुसलमानों की जनसंख्या 3.54 करोड़ (9.8%) थी। वहीं 2011 की जनगणना में यदि देखें तो कुल 121.09 करोड़ की जनसंख्या में हिंदू 96.63 करोड़ यानी 79.8% हो गए। वहीं मुस्लिम की संख्या बढ़कर 17.22 करोड़ (14.2%) हो गई; ईसाई 2.78 करोड़ (2.3%); सिख 2.08 करोड़ (1.7%)।
अब इन दोनों जनगणनाओं की यदि तुलना करें तो पता चलेगा कि हर धर्म के लोगों की जनसंख्या में बढ़ते समय के साथ गिरावट आई है जबकि सिर्फ मुस्लिम ऐसे हैं जो इतने सालों में निरंतर बढ़े हैं। 1951 में ये 9.8% थे जो कि अब बढ़कर 14.2% हो गए हैं।

हिंदुओं की घटी हिस्सेदारी

इसके अलावा अभी हाल में भी ये चिंताजनक आँकड़े प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की साइट पर उपलब्ध अध्य्यन से ही उजागर हुए थे। इसमें बताया गया था कि कैसे बीते सालों में हिंदुओं की हिस्सेदारी घटी है। रिपोर्ट में बताया गया था कि 1950 से लेकर 2015 के बीच, भारत में बहुसंख्यक आबादी में 7.82% की उलेखनीय गिरावट आई। पहले हिंदू 84.68 फीसदी थे और अब सिर्फ 78.06 रह गए हैं। जबकि इसी अवधि के दौरान अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी में वृद्धि दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार 1950 में मुस्लिम आबादी का हिस्सा 9.84 प्रतिशत था और 2015 में बढ़कर 14.09 प्रतिशत हो गया।
इस रिपोर्ट पड़ोसी मुल्कों से जुड़े आँकड़े भी दिए गए थे जिनको देखने पर साफ हुआ था कि ये भारत ही है जहाँ अल्पसंख्यकों की संख्या में बढ़त देखने को मिली और बहुसंख्यक कम होते गए। वरना बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान इन तीनों मुल्कों में बहुसंख्यक आबादी यानी मुस्लिम सिर्फ बढ़े ही बढ़े हैं। कम हुए हैं तो हिंदू धर्म के लोग।
इसलिए ये कहना कि समय के साथ जनसंख्या में ऐसे परिवर्तन देखना आम है एकदम गलत तथ्य है। अगर ऐसा होता तो बाकी मुल्कों में भी संख्या बढ़ी-घटी होती। सारे देशों की तुलना में अगर कुछ समान चीज को खोजें तो पाएँगे सिर्फ और सिर्फ मुस्लिमों को हर जगह बढ़ना ही एक कॉमन चीज है। इसके अलावा अगर मीडिया रिपोर्ट्स आदि पढ़कर समझेंगे तो पता चलेगा कि जिन जगहों पर मुस्लिमों की ऐसी वृद्धि हुई है वहाँ पहले से बसे हिंदू या अन्य वर्ग के लोग अपने आप कम हुए हैं और इस बदलाव ने कई जगह की डेमोग्राफी भी बदली है।

डेमोग्राफी बदलना सामान्य नहीं

डेमोग्राफी का बदलना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं होती, वो भी तब जब धीरे-धीरे दिखने वाले इस बदलाव के साथ उस क्षेत्र के तौर-तरीकों और रहन-सहन में बदलाव दिखने लगे। सोचिए, 1930 में कराची की तस्वीर में महाशिवरात्रि के मेले की भीड़ दिखती थी क्योंकि वहाँ का इलाका हिंदू बहुल था मगर भारत से अलग होने के बाद वो जगह मुस्लिम बहुल हुई और आज कोई हिंदू वैसे उत्सव की कल्पना भी कराची में नहीं कर सकता। हाँ! अगर कल्पना कर सकता है तो धर्मांतरण की जैसा कि पाकिस्तान से आने वाली रिपोर्ट्स बताती हैं।
आज के समय में भारत में डेमोग्राफी बदलाव काफी चिंता का विषय है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, असम जैसे राज्यों के कई सीमा से सटे क्षेत्र में 10 सालों में अप्रत्याशित परिवर्तन देखने को मिला है। 2022 की खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश और असम बॉर्डर वाले इलाकों में अचानक से 32% फीसदी बढ़ने की जानकारी आई थी जबकि पूरे राज्य में मिलाकर ये दर 10-15 फीसद बढ़ी बताई गई थी। इसी तरह उत्तराखंड में भी 11 साल में मुस्लिम आबादी में हुई बढ़ोतरी की खबरें 2022 में सामने आई थी।
ये दुर्भाग्य है कि हमने अपने इतिहास से कुछ नहीं सीखा क्योंकि डेमोग्राफी में होने वाले बदलाव तो कोई अभी की बात नहीं है। इनपर चिंता तो तभी से होने चाहिए थी जब इस्लाम के नाम पर भारत का 8 लाख वर्ग किलोमीटर उठाकर पाकिस्तान को दे दिया गया। आज उसी क्षेत्र में देख लीजिए हिंदुओं के हालात क्या है। आए दिन वहाँ से अल्पसंख्यको के साथ धर्मांतरण, रेप की खबरें आती हैं। इसके बाद यही बांग्लादेश में भी हुआ। भारत का करीबन डेढ़ लाख वर्ग किलोमीटर उनको दे दिया गया। वहाँ भी आज के समय में पाकिस्तान जैसा ही अल्पसंख्यकों को हाल है। अगर कोई धर्मांतरण के खेल से बच जाए तो उस पर ईशनिंदा के आरोप लगाकर अत्याचार किए जाने लगते हैं। इसी तरह अफगानिस्तान, एक समय में ये भी भारत का हिस्सा था, मगर अब वहाँ 6 लाख वर्ग किलोमीटर में इस्लाम का बोल बाला हो गया है।
अवलोकन करें:-

हिंदुओं को सतर्क होना क्यों जरूरी

अनुपम सिंह अपनी रिपोर्ट में कहते हैं कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तो इस्लामी कट्टरवाद की बस 33 फीसद सफलता है, बाकी की जीत तो उनकी ‘गजवा-ए-हिंदुस्तान’ के सपने के साथ पूरी होगी। ‘गजवा-ए-हिंद’ यानी पूरे भारत पर इस्लाम का राज…। आज धीरे-धीरे हो रहा डेमोग्राफी बदलाव इसी मकसद को पूरा करने के लिए उठाए गए कदम हैं जिसके लिए इस्लामी कट्टरपंथी तरह-तरह से लगे हैं। उन्हें कम आँकने वालों को समझना होगा कि राज्यों में होने वाले डेमोग्राफी सामान्य नहीं हैं। न ही ये कोई हवा-हवाई बातों से उठी चिंचा है। अतीत में इसके दुष्परिणाम भारत झेल चुका है और अगर अब भी वो नहीं सतर्क हुए तो हाल बुरे हो सकते हैं। शायद अगला कराची भारत का कोई इलाका हो जहाँ हिंदुओं को अपने पर्वों का उत्साह धीरे-धीरे भूलना पड़े और आदत लग जाए इस्लामी तौर-तरीकों के हिसाब से जीने की। आप समझ भी नहीं पाएँगे कब ये समस्या दूसरे के क्षेत्र से उठकर आपके क्षेत्र में पहुँच जाएगी और आपको उस क्षेत्र से निकलने पर मजबूर कर देगी। वर्तमान में कई मामले आ चुके हैं जहाँ मुस्लिम संख्या बढ़ने पर उसे मुस्लिम इलाका अपने आप घोषित कर दिया जाता है।