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हमास की क्रूरता : प्राइवेट पार्ट में चाकू घोंपकर किया बलात्कार, भाई बहन को आपस में सेक्स करने को कहा; आतंकियों ने इजरायलियों पर किए कितने अत्याचार, सामने आई 300 पन्नों की रिपोर्ट

         हमास ने यौन अपराधों का जश्न मनाया था। (फोटो साभार- द इकोनॉमिस्ट, साइलेंस नो मोर/बोस्टन हेराल्ड)
इजरायल के एनजीओ ‘द सिविल कमीशन’ ने ‘साइलेंस्ड नो मोर‘ यानी ‘अब और चुप नहीं’ नाम से एक रिपोर्ट जारी किया है। इसमें 7 अक्टूबर को योजनाबद्ध तरीके से हमास द्वारा रेप और यौन उत्पीड़न के सबूत दिए गए हैं। इसकी टैगलाइन ‘सेक्सुअल टेरर अनवील्ड: 7 अक्टूबर के अनकहे अत्याचार और कैद में बंधकों के खिलाफ’ है।

7 अक्टूबर 2023 इजरायल के इतिहास का सबसे खूनी दिवस था। उस दिन हमास ने नेतृत्व में फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद जैसे संगठनों ने इजरायल के मासूम बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं को अपना निशाना बनाया था। इस हमले में 1200 से ज्यादा लोग मारे गए। हमलावरों ने घरों, सड़कों, बस्तियों, सुरक्षा प्रतिष्ठानों और एक संगीत समारोह में आतंक मचाया। इस दौरान करीब 251 लोगों को अगवा कर गाजा ले जाया गया। घटना का वीडियो बनाकर पूरी दुनिया में इसको प्रसारित किया गया।

इस दौरान इजरायली नागरिकों के साथ अभूतपूर्व यौन हिंसा किया गया। इस दिल दहला देने वाली घटना के गवाहों ने जब दुनिया को जानकारी दी, तो लोग सन्न रह गए।

इजरायल की गैर लाभकारी संगठन ‘द सिविल कमीशन’ ने 12 मई 2026 को ‘साइलेंस्ड नो मोर’ यानी ‘अब और चुप नहीं’ शीर्षक से करीब 300 पेज की रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट का शीर्षक है ‘यौन आतंक का पर्दाफाश: 7 अक्टूबर की अनकही क्रूरताएँ और बंधकों के खिलाफ अत्याचार’।

यौन हिंसा, अपमान और क्रूरता की दास्ताँ

दो साल के रिसर्च के आधार पर आयोग ने जो निष्कर्ष निकाला, उसमें कहा गया है कि यौन और लिंग आधारित हिंसा सुनियोजित, व्यापक और अहम थी। हमास और उसके सहयोगियों ने हमले के दौरान कई जगहों पर और कई फेज में पीड़ितों के साथ यौन शोषण किया और उन्हें यातनाएँ दी। उनका अपहरण, स्थानांतरण किया गया और जेल में डाला गया। इन अपराधों में अत्यधिक क्रूरता और गंभीर मानवीय पीड़ा देखी गई, जिन्हें पीड़ितों को डराने और अपमानित करने के उद्देश्य से अंजाम दिया गया था।

हमले के चश्मदीदों और पीड़ितों के बयान, साक्षात्कार, तस्वीरें, वीडियो, सरकारी दस्तावेज और अन्य प्राथमिक सामग्रियों का उपयोग निष्कर्ष निकालने में किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है, “आयोग द्वारा किए गए डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि पीड़ित 52 अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के थे, जो अपराधों के अंतर्राष्ट्रीय दायरे और उनके प्रभाव को रेखांकित करता है।” गाजा में हिरासत में लिए गए लोगों में विदेशी या दोहरी इजरायली और विदेशी नागरिकता वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा था।

इसमें कहा गया है कि सबूतों और सामग्रियों की तुलना और अपराधियों के तौर-तरीकों के विस्तृत विश्लेषण के आधार पर आयोग ने कई स्थानों पर की गई यौन और लिंग आधारित हिंसा की 13 पुनरावृत्तियों की पहचान की। इन पुनरावृत्तियों से पता चलता है कि ये अपराध एक व्यापक और सुनियोजित कार्यप्रणाली का हिस्सा थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि आतंकवादियों ने हमले में खुद को दिखा कर और यौन उत्पीड़न को डिजिटल माध्यमों से प्रसार कर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने हमले, अपमान और हत्या के फुटेज प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया और पीड़ितों की व्यक्तिगत ऑनलाइन प्रोफाइल का दुरुपयोग किया। परिवार के सदस्यों को अपनों की मृत्यु के बारे में सबसे पहले हमलावरों द्वारा कई बार साझा की गई तस्वीरों या वीडियो के माध्यम से पता चला।

आतंकवादियों ने गोप्रो और बॉडी-वियर कैमरे लगा रखे थे या यह सुनिश्चित किया था कि उनके कृत्यों को रिकॉर्ड किया जाए और सार्वजनिक किया जाए। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि इसी वजह से सभी साइटों पर वीडियो में सशस्त्र समूहों और फिलिस्तीनी नागरिकों को हमलों का जश्न मनाते हुए, प्रसन्न और उत्साहित दिखाया गया। डिजिटल मीडिया के इस दुरुपयोग ने जघन्य क्राइम को मनोवैज्ञानिक युद्ध के हथियार में बदल दिया। इसका लक्ष्य न केवल पीड़ित थे, बल्कि उनके परिवार और पूरा समाज भी था।

पीड़ितों को गाजा पट्टी में घसीट कर ले जाने के बाद भी उन्हें दंडित करने, अपमानित करने और यौन हिंसा का शिकार बनाया गया। आतंक का यह एक सुनियोजित अभियान था। नवजात बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को भी नहीं बख्शा गया। महिलाओं और पुरुषों को घोर अपमान और यौन हिंसा का सामना करना पड़ा। परिवारों को अलग कर दिया गया और बुनियादी चिकित्सा उपचार से वंचित कर दिया गया। दरअसल इन कैदियों के तन-मन पर लगे गहरे चोट का इस्तेमाल प्रचार और दबाव के हथियार के रूप में किया गया।

रिपोर्ट में इन कृत्यों को हमले का ‘केन्द्र’ बताया गया है। इसमें कहा गया है, “महिलाओं और लड़कियों, और कई मामलों में पुरुषों और लड़कों को बलात्कार, यौन यातना, अंग-भंग, जबरन नग्नता और शवों के अपमान का शिकार बनाया गया। माता-पिता की उनके बच्चों के सामने हत्या कर दी गई, भाई-बहनों पर एक-दूसरे के सामने हमला किया गया, पीड़ितों को निर्वस्त्र किया गया, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, उनका वीडियो बनाया गया और प्रदर्शित किया गया। ये आवेश में किए गए अपराध नहीं थे। ये सुनियोजित और योजनाबद्ध तरीके से किए गए थे ताकि यौन प्रकृति के अपराधों की क्रूरता को और भी बढ़ाया जा सके।”

परिजनों के सामने यौन उत्पीड़न, मृतकों को भी नहीं बख्शा- पीड़ित

रिपोर्ट में कहा गया है, “हमास और उसके सहयोगियों ने हमले की व्यापक रणनीति के एक अंतर्निहित हिस्से के रूप में जानबूझकर और व्यवस्थित रूप से यौन और लिंग आधारित हिंसा (एसजीबीवी) का इस्तेमाल किया। महिलाओं और बंधकों को निशाना बनाया। नाबालिगों को भी इस तरह की हिंसा और दुर्व्यवहार का शिकार बनाया गया।” जिहादियों ने लोगों को उनके परिवारों की उपस्थिति में हृदयविदारक रूप से यातना दी।

जांच में पता चला कि पीड़ितों को क्रूरता के इंतहा तक तड़पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, “पीड़ितों को जलाना, अंग-भंग करना, बलात्कार, बांधना, प्राइवेट पार्ट में जबरन वस्तुएँ डालना, चेहरे और प्राइवेट पार्ट पर गोली मारना, परिवार के सदस्यों के सामने हत्याएँ और दुर्व्यवहार करना और फाँसी देना शामिल थे। कई पीड़ितों को हथकड़ी लगाए हुए और बंधक के रूप में बरामद किया गया था। लंबे समय तक बंधक बनाए गए लोगों के खिलाफ यौन उत्पीड़न आम रहे। इन पीड़ितों में महिलाओं के साथ-साथ पुरुष भी शामिल थे।”

यातनाओं की वजह से जीवित बचे लोगों को गंभीर और दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक और शारीरिक क्षति पहुँची। शवों के पोस्टमार्टम में यौन शोषण, अपमान के सबूत मिले।

जाँच रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ितों को हथकड़ी लगाना, बंधक बनाए हुए दिखाना, महिलाओं और बच्चों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना और परेड कराना। माताओं और बच्चों का अपहरण। परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में यौन हिंसा करना, उसका वीडियो बनाना और डिजिटल प्रसार करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करना शामिल है। जबरन विवाह की धमकियाँ भी दी गई। लड़कों और पुरुषों के अंग-भंग करना, बलात्कार और यौन हिंसा के भी सबूत मिले।

एक ही परिवार के लोगों और खून के रिश्ते वाले पीड़ितों को जानबूझकर आपस में यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया। इसमें एक विशेष मामले का जिक्र जाँच रिपोर्ट में किया गया है। इसके अलावा परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे की उपस्थिति में यौन उत्पीड़न या अपमानित किया गया। इससे पूरा परिवार आतंकित रहता था। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से हमास की कैद के दौरान देखी गई।”

चरमपंथियों ने खुद को कैमरे पर रिकॉर्ड किया और महिलाओं, बच्चों और पूरे परिवारों को पीटते, अपमानित करते, अपहरण करते और उनकी हत्या करते हुए और शवों का अपमान करते हुए वीडियो अपलोड किए। उन्होंने महिलाओं और उनके शवों को युद्ध की लूट के रूप में प्रदर्शित किया। कुछ क्लिप में आतंकवादियों और गाजावासियों को जश्न मनाते हुए दिखाया गया।

इसके अलावा, फुटेज में बेरहमी से क्षत-विक्षत और जलाए गए शव दिखाए गए। रिपोर्ट में कहा गया है, “हमास और उसके सहयोगियों ने घायल महिलाओं, लड़कियों और बुजुर्ग महिलाओं के हिंसक रूप से अपमानित और अपहरण किए जाने के फुटेज भी प्रसारित किए। हमले का समय सुबह-सुबह होने के कारण इनमें से कई पीड़ितों को उनके रात के कपड़ों में ही ले जाया गया, जिससे वे ज्यादा कष्ट महसूस कर रहे थे।”

रिपोर्ट में नोवा संगीत समारोह में बचे एक व्यक्ति का बयान भी शामिल किया गया। उसने बताया कि उन लोगों ने एक महिला को वाहन से बाहर निकाला, उसके कपड़े जबरदस्ती उतार दिए और उसके साथ बलात्कार किया। उन्होंने उसे बार-बार चाकू मारा, जिससे उसकी मौत हो गई। उसकी मृत्यु के बाद भी उन्होंने उसके साथ बलात्कार करना जारी रखा। यह क्रूरता और हिंसा की भयावहता को दर्शाता है।

एक चश्मदीद राज कोहेन ने बताया, “मैंने उन्हें उसके साथ बलात्कार करते देखा। बलात्कार करते समय हमने उसकी चीखें सुनीं। फिर उन्होंने उसकी हत्या कर दी और उसके बेजान हो जाने के बाद भी उसके साथ दोबारा बलात्कार किया। मैंने उन्हें उसके साथ बलात्कार करते देखा।”

यहूदी राज्य को झकझोर देने वाला वह क्रूर हमला

शुरुआती हमलों में दो गर्भवती महिलाएँ, 28 वर्षीय नित्जान रहुम और 23 वर्षीय एस अबू-रशीद भी निशाना बनीं। अबू-रशीद तो बच गईं, लेकिन उनका बच्चा, रहुम और उनका अजन्मा बच्चा, तीनों ही मारे गए। हमले के तुरंत बाद यौन उत्पीड़न के बारे में गवाहों के बयान और विवरण सामने आए।

रिपोर्ट में बताया गया है, “शुरुआती दिनों से ही पीड़ितों, बचाव कर्मियों, चिकित्सा विशेषज्ञों और मुर्दाघर के कर्मचारियों की रिपोर्टों से संकेत मिल रहे थे कि इन हमलों में यौन हिंसा शामिल है। कई पीड़ित को मौत के बाद ही इन अपराधों से मुक्ति मिली। अनेक मामलों में, पीड़ितों की हत्या हमलों के दौरान या बाद में की गई, और उनके शव क्षत-विक्षत, अधजली अवस्था में बरामद किए गए। यह असाधारण क्रूरता से भरी यौन हिंसा के पैटर्न को दर्शाता है।”

रिपोर्ट में एक घटना के बारे में बताया गया है। इसमें कहा गया है, “22 वर्षीय शानी लूक एक पिकअप ट्रक के पीछे मुँह के बल लेटी हुई, आंशिक रूप से नग्न, घायल अवस्था में थी। उसे गाजा की सड़कों पर सशस्त्र अपराधियों ने उसी अवस्था में घुमाया। इस दौरान उसके शरीर पर थूकते और नारे लगाते हुए अपराधी देखे गए।”

हमले के बाद के महीनों में हमास ने अनगिनत वीडियो जारी किए । इनमें निर्दोष बंदी अपनी जान बचाने की गुहार लगाते या शव दिखाते नजर आए। उन्होंने कुछ मामलों में पीड़ितों के परिवार वालों से सीधे संपर्क किया, जिससे उनका दुख और बढ़ गया। इन कार्रवाइयों ने आतंकी हमले के प्रभाव को और बढ़ा दिया, जिससे दर्द और सदमा और भी गहरा गया।

शवों का अंतिम संस्कार करने वाले शेरोन लॉफर के मुताबिक, कई बार इन खूबसूरत युवतियों की आंखों में गोली मारी जाती थी, जिससे उनके चेहरे विकृत हो जाते थे। उनकी मौत इससे नहीं होती थी, बल्कि दिल में गोली लगने से होती थी।

रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र के अनुमान वाले रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। इसमें आतंकवादियों द्वारा किए गए यौन शोषण और हिंसा सहित अपराधों की गंभीरता को रेखांकित किया गया है। इसमें खुलासा किया गया है कि हमास को अगस्त 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की ब्लैकलिस्ट में शामिल किया गया था, जिसमें उन पक्षों की पहचान की जाती है जिन पर सशस्त्र संघर्ष के दौरान व्यवस्थित बलात्कार और अन्य प्रकार की यौन हिंसा करने या उसके लिए जिम्मेदार होने के पक्के सबूत होते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, “इस सूची में शामिल होने का मतलब यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने भी 7 अक्टूबर के हमलों के दौरान और बंधकों के खिलाफ हमास द्वारा किए गए ऐसे उल्लंघनों के पर्याप्त सबूतों की पुष्टि की है।”

आयोग ने अपहरणकर्ताओं को पीड़ितों को नियंत्रित करने, नागरिक क्षेत्रों में घुसपैठ करने और हिब्रू भाषा में निर्देश जारी करने के तरीके बताने वाले विभिन्न सामरिक नियमावली, नोटबुक, चेकलिस्ट, नक्शे, किताबें और दूसरे संसाधनों की जाँच की। इन सामग्रियों में धार्मिक हिंसा और घृणा परोसा गया था।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर डाला गया है कि “इन सामग्रियों में अरबी से हिब्रू में अनुवादित वाक्यांशों की सूचियाँ भी शामिल हैं, जिनमें आदेशात्मक और अपमानजनक निर्देश (उदाहरण के लिए पीड़ितों को अपनी पैंट उतारने या अपने कपड़े उतारने, लेट जाने, अपने पैर फैलाने का आदेश देना) शामिल हैं।”

रिपोर्ट के मुताबिक, “इन वैचारिक सामग्रियों में यहूदी लोगों और इजरायली नागरिकों, जिनमें महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं, के खिलाफ एक अंतर्निहित अमानवीय कथा शामिल थी, जिन्हें कुछ ग्रंथों और बयानों में हिंसा के वैध शिकार के रूप में दर्शाया गया था।” दरअसल हमास यहूदी समुदाय के खिलाफ हिंसा का समर्थन करता है।

इस नरसंहार और घृणित कृत्यों को न केवल फिल्माया गया, बल्कि धार्मिक अभिव्यक्तियों और जोश के साथ महिमामंडित भी किया गया।

इस्लामी आतंकवाद का भयंकर चेहरा

पीड़ितों और गवाहों ने इस्लामी आतंकवाद की कहानी बयान की। नोवा संगीत समारोह में मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी ने हमले के दौरान सात अन्य लोगों के साथ छिप कर जान बचाई। उसने बताया कि उसने अपने छिपने की जगह के पास तीन अलग-अलग स्थानों से बलात्कार की तीन घटनाओं को देखा।

उन्होंने चीखते-चिल्लाते पीड़ितों को एक-दूसरे को सौंप दिया और फिर उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी और फिर जश्न मनाया। चश्मदीद के मुताबिक, “मुझे नहीं पता कि सामान्य बलात्कार क्या होता है, लेकिन वहाँ जो आवाजें सुनाई दे रही थीं, वे वैसी नहीं थीं। वहाँ हँसी-मज़ाक हो रहा था। चुटकुले चल रहे थे। वे एक-दूसरे को चुटकुले सुना रहे थे। यह सब मजे के लिए किया जा रहा था। वे जश्न मना रहे थे। वे सचमुच इस बात का जश्न मना रहे थे,”

उन्होंने आगे बताया, “एक और घटना यह थी कि मैंने किसी को चिल्लाते हुए सुना, ‘उसे मत छुओ, ऐसा मत करो,’ और फिर उन्होंने उसकी प्रेमिका के साथ उसकी आँखों के सामने बलात्कार किया।” इसके बाद उस जोड़े का भी वही हश्र हुआ।

उन्होंने आगे बताया, “एक और घटना यह थी कि मैंने किसी को चिल्लाते हुए सुना, ‘उसे मत छुओ, ऐसा मत करो,’ और फिर उन्होंने उसकी प्रेमिका के साथ उसकी आँखों के सामने बलात्कार किया।” इसके बाद उस जोड़े का भी वही हश्र हुआ।

फेक न्यूज फैलाने वाले ‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ का नॉन प्रॉफिट दर्जा वापस : रोने लगा जॉर्ज सोरोस के पैसों पर पलने वाले पत्रकारों का गैंग; भारत में गरीबी पर फैलाया था झूठ

डोनाल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति बने अमेरिका के लेकिन मातम भारत में। भारत की राजधानी दिल्ली में चुनाव और बजट संसद सत्र लगभग शांति। महामहिम के भाषण पर कुछ टिप्पणियां जरूर हुई लेकिन उन टिप्पणियों पर भी विपक्ष को मुंह की खानी पड़ रही है। Deep State से लिए धन को हलाल तो करना था। ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने से पहले देश में चुनाव हो या संसद सत्र Deep State के टुकड़ों पर पलने वाले आन्दोलनजीवी और उनके आका कोई न कोई हंगामा करते रहते थे। हाँ, अगर कमला हैरिस अमेरिका राष्ट्रपति बन गयी होती, भारत में Deep State की बल्ले-बल्ले हो गयी थी। पिछली लोकसभा में जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोलने के खड़े हुए विपक्ष ने लोकसभा को चील-कौओं की तरह ऐसे चीखना-चिल्लाना शुरू किया मानो लोकसभा लोकसभा नहीं मछली मंडी है। वही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब फरवरी 4 को बोलने के लिए खड़े हुए, कुछ अपवाद को छोड़, सदन में शांति रही। 

Deep State पर कार्यवाही अमेरिका में हो रही है, लेकिन उसका असर भारत में भी देखा जा सकता है। यही असली कारण है की भारत हितैषी डोनाल्ड ट्रम्प की जीत के लिए जगह-जगह यज्ञ करवा रहे थे। यानि अब जनता को भी समझना होगा कि विपक्ष कोई जनहित में आन्दोलनजीवियों से आंदोलन नहीं करवाते थे बल्कि Deep State की भीख से देश की जनता को गुमराह कर उपद्रव करवा रहे थे। अभी तो ट्रम्प की शुरुआत है आगे-आगे देखो अब क्या गुल खिलते हैं। जो विपक्ष विदेशी भीख पर पल रहा हो देशहित के बारे में नहीं सोंच सकता।         

मोदी सरकार ने भारत को लेकर लगातार झूठी खबरें फैलाने वाले कथित पत्रकारों के एक समूह ‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ को दी गई रियायतें छीन ली है। मोदी सरकार ने इसका नॉन प्रॉफिट दर्जा वापस ले लिया है। रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने भारत को लेकर लगातार कई झूठी खबरें फैलाई थी। इसको जॉर्ज सोरोस से पैसा आता था।

रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने 28 जनवरी, 2025 को यह जानकारी दी। उसने ट्विटर पर लिख कर बताया कि मोदी सरकार ने उससे नॉन प्रॉफिट ट्रस्ट का दर्जा वापस ले लिया है। कुछ दिन पहले उसने एक झूठी रिपोर्ट में दावा किया था कि केंद्र सरकार भारत में गरीबी की दर के डाटा में गड़बड़ी कर उसे कम करके बता रही है।

 रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने बताया कि वह जुलाई 2021 से ‘नॉन प्रॉफिट ट्रस्ट’ के रूप में मौजूद था। रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने आरोप लगाया कि सरकार ने अब इसका यह छीन लिया जो सही नहीं है। इसने कहा कि पत्रकारिता से किसी को मुनाफा नहीं होता, ऐसे में इसका नॉन प्रॉफिट दर्जा हटाया जाना ठीक नहीं है।

रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने दावा किया कि उसका नॉन प्रॉफिट दर्जा रद्द किए जाने से अब वह अपना पत्रकारिता का काम करने में कठिनाई आएगी। सोरोस के दान के पैसे से चलने वाले रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने आरोप लगाया कि इससे उनकी क्षमता को गहरा धक्का लगेगा। उसने कहा कि मोदी सरकार के फैसले के खिलाफ कानूनी कदम उठाएगा।

झूठ फैलाता रहा है रिपोर्टर्स कलेक्टिव

रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने 18 दिसंबर, 2024 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि मोदी सरकार ने भारत में गरीबी में कमी दिखाने के लिए गरीबी सूचकांक में हेराफेरी की है। इसमें दावा किया गया कि 10 साल में 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालने की सरकार की रिपोर्ट झूठी थी क्योंकि सरकार ने वैश्विक सूचकांक में दो महत्वपूर्ण पैरामीटर जोड़ दिए थे।
रिपोर्ट में कहा गया था कि अच्छे नतीजे दिखाने के लिए मोदी सरकार ने खुद का ही एक इंडेक्स बनाया क्योंकि वैश्विक एजेंसियाँ सच्चाई दिखा देती। आरोप था कि खुद के बनाए सूचकांक में अपने हिसाब से डाटा में गड़बड़ी की गई। हालाँकि, रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अपनी इस रिपोर्ट में यह दावा किस आधार पर किया, इस संबंध में कोई सबूत नहीं दिए।
दुनिया में गरीबी के विषय में बताने वाले ग्लोबल मल्टीडायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स को OPHI और UNDP ने विकसित किया था। मोदी सरकार ने भारत में गरीबी का सही आँकड़ा मापने के लिए नीति आयोग के माध्यम से एक गरीबी सूचकांक बनाया था।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट में खुद उल्लेख किया गया है कि नीति आयोग ने सूचकांक विकसित करने के लिए OPHI और UNDP के साथ साझेदारी की थी। आश्चर्य की बात यह है कि भारत के डाटा पर वैश्विक एजेंसियाँ सहमत हैं लेकिन रिपोर्ट्स कलेक्टिव वाले यह बात नहीं मानते।

अमेरिका के डीप स्टेट से है कनेक्शन

रिपोर्टर्स कलेक्टिव को कहाँ से खाद-पानी मिल रहा है, यह भी देखने वाला है। एक बार नजर डालने पर पता चलता है कि इसे भी उन्हीं भारत विरोधी संस्थानो से पैसा मिलता है, जो बाकी संस्थाओं और NGO को फंडिंग देते रहे हैं। भारत में रिपोर्टर्स कलेक्टिव को नेशनल फ़ाउंडेशन फ़ॉर इंडिया नाम का एक FCRA लाइसेंस वाला NGO चलाता है।
नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया को फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन, जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क और रॉकफ़ेलर फ़ाउंडेशन सहित अन्य संगठनों से फ़ंड मिलता है। ये सभी संगठन अमेरिकी डीप स्टेट नेटवर्क का हिस्सा हैं और उन्होंने कई भारत विरोधी अभियानों को पैसा दिया है।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव अमेरिकी डीप स्टेट का हिस्सा है। दिसंबर, 2024 में इसके द्वारा प्रकाशित फर्जी खबरें जॉर्ज सोरोस और उसके ओपन सोसाइटी फाउंडेशन द्वारा द्वारा भारत में अपना राजनीतिक एजेंडा चलाने की पहल का भी एक हिस्सा है।

‘केजरीवाल के लिए राष्ट्रहित से ऊपर व्यक्तिगत हित’: भड़का हाई कोर्ट, जेल से सरकार चलाने के कारण दिल्ली के 2 लाख+ स्टूडेंट को न किताब मिली, न ड्रेस; क्या केजरीवाल कोर्ट को कोई सख्त फैसला लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?

शराब घोटाले में जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार करने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने जमकर फटकार लगाई। यानि कोर्ट ने केजरीवाल को इस्तीफा नहीं देने के कारण दिल्ली को हो रहे नुकसान पर सख्त आदेश देने के संकेत दे दिए हैं। हर जगह केजरीवाल की तानाशाही काम नहीं आने वाली। हाई कोर्ट ने कहा कि अरविंद केजरीवाल राष्ट्रहित से ऊपर अपना व्यक्तिगत हित रखते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि उनके जेल में होने के कारण दिल्ली नगर निगम के स्कूलों में 2 लाख विद्यार्थियों को किताब एवं यूनिफॉर्म मिलने में देरी हो रही है।

केजरीवाल पहले खुद ही कह चुके हैं कि 'मैं anarchy हूँ' लेकिन ये anarchy मुख्यमंत्री बने केजरीवाल को नहीं मालूम कि सांप का फन कैसे कुचला जाता है। हर जिद की एक सीमा होती है। सीमा से बाहर जाने पर होने वाली कार्यवाही को उचित ही कहा जायेगा अनुचित नहीं। केजरीवाल दिल्ली की जनता और स्कूल के छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ मत करो। घोटाले करके ईमानदार मत बनो। 

दरअसल, ‘सोशल ज्यूरिस्ट’ नाम के एक NGO ने एक जनहित याचिका दाखिल करके कहा है कि नगर निगम के स्कूलों में पढ़ रहे विद्यार्थियों को अब तक किताबें नहीं मिली हैं। इस पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस मनमोहन और जस्टिस प्रीतम सिंह अरोड़ा ने कहा कि दिल्ली सरकार को सिर्फ सत्ता की चाह है।

बेंच ने कहा, “किताब और यूनिफॉर्म बँटवाना कोर्ट का काम नहीं है। हम ये इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि कोई अपना काम नहीं कर रहा है… आपके क्लाइंट (दिल्ली सरकार) को सिर्फ सत्ता में दिलचस्पी है। मैं नहीं जानता कि आप कितनी शक्ति चाहते हैं? समस्या यह है कि आप शक्ति को हथियाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसके कारण आपको शक्ति नहीं मिल रही है।”

इस पर दिल्ली सरकार की ओर से पेश वकील शादान फरासत ने कोर्ट को बताया कि MCD की स्थायी समिति की गैर-मौजूदगी में किसी अधिकारी को शक्ति देने के लिए मुख्यमंत्री की सहमति जरूरी है। मुख्यमंत्री अभी हिरासत में हैं, इसलिए देरी हो रही है। इस पर कोर्ट ने कहा कि ये कोई बहाना नहीं हो सकता।

इस पर जस्टिस मनमोहन ने कहा कि खुद हाई कोर्ट अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से हटाने की माँग वाली कई याचिकाओं को खारिज कर चुका है। उन्होंने कहा, “आपने कहा है कि मुख्यमंत्री के हिरासत में होने के बावजूद सरकार जारी रहेगी। आप हमें उस रास्ते पर जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जिस पर हम नहीं जाना चाहते थे। यदि आप चाहते हैं कि हम इस पर टिप्पणी करें, तो हम पूरी सख्ती से करेंगे।”

कोर्ट ने कहा कि इसका मतलब ये नहीं है कि इस मामले को ऐसे ही छोड़ दिया जाए। कोर्ट ने आगे कहा कि अगर स्टैंडिंग कमिटी किसी भी वजह से नहीं बन पा रही है तो दिल्ली सरकार किसी उपयुक्त अथॉरिटी को वित्तीय अधिकार दे। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया कि वो इस मामले में दो दिन के अंदर जरूरी कार्रवाई करे।

भाजपा का दिल्ली सरकार पर हमला

दिल्ली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रामवीर बिधूड़ी ने कहा क‍ि मुख्यमंत्री केजरीवाल की जेल से सरकार चलाने की जिद से संवैधानिक संकट गहराता जा रहा है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की सिफारिश के अभाव में द‍िल्‍ली नगर न‍िगम में मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव स्थगित हो गए हैं।
उन्होंने कहा कि दिल्ली में पिछले 35 दिनों से कैबिनेट की बैठक नहीं हुई है। राजधानी में बिजली और पानी का समर प्लान नहीं बना है। पिछले साल डूबने के बावजूद मॉनसून के दौरान राजधानी को बचाने के लिए कोई मीटिंग नहीं हो रही है। पूरा प्रशासन ठप पड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि इस मामले में उपराज्यपाल को हस्तक्षेप करना चाहिए।

शराब घोटाले में नष्ट किए सबूत

शराब घोटाले में जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोर्ट में अपनी बात रखी है। हलफनामे में ED ने कहा, “घोटाले की अवधि में और जब 2021-22 की दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति में घोटाला और अनियमितताएँ सार्वजनिक हो गईं, तब 36 व्यक्तियों (आरोपित और इसमें शामिल अन्य व्यक्तियों) द्वारा कुल 170 से अधिक मोबाइल फोन बदले/नष्ट किए गए।”
हलफनामे में आगे कहा गया है, “घोटाले और धन के लेन-देन के महत्वपूर्ण डिजिटल सबूतों को आरोपियों और इसमें शामिल अन्य व्यक्तियों द्वारा सक्रिय रूप से नष्ट कर दिया गया है। सबूतों के इतने सक्रिय और आपराधिक विनाश के बावजूद एजेंसी महत्वपूर्ण सबूतों को फिर से हासिल करने में सक्षम रही है, जो सीधे तौर पर प्रक्रिया में याचिकाकर्ता का खुलासा करती है।”

‘विदेशी फंडिंग से देश की डेमोग्राफी बदलने की कोशिश कर रहे जो NGO, उनके प्रति कोई नरमी नहीं’: संसद में गरजे अमित शाह – ये कांग्रेस नहीं, मोदी सरकार है

                                                                                                                               साभार एएनआई
लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार वैसे गैर-सरकारी संगठनों के प्रति कोई दया नहीं दिखाएगी जो विदेशी फंडिंग की मदद से देश की जनसांख्यिकी को बदलने और सामाजिक गड़बड़ी फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा यह कांग्रेस नहीं, मोदी सरकार है।

खाड़ी देशों से आता है ड्रग्स- अमित शाह

लोकसभा के शीतकालीन सत्र में 21 दिसंबर, 2022 को गृह मंत्री अमित शाह ने देश में ड्रग्स की समस्या और इससे निपटने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर विस्तार से बात की। गृह मंत्री अमित शाह ने ड्रग्स के मुद्दे पर संसद में कहा कि इसे लेकर कोई सियासत नहीं होनी चाहिए। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि ड्रग के कारोबार और उसके मुनाफे से होने वाले आतंकवाद को मोदी सरकार कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि ड्रग्स बच्चों को अपना शिकार बनाता है और नस्लें बर्बाद होती हैं।

अपने संबोधन में अमित शाह ने जानकारी दी कि देश में खाड़ी देशों से बड़े स्तर पर ड्रग्स की खेप भेजी जाती है। इस सिलसिले में 12 राज्यों में छापेमारी हुई और ड्रग्स तस्करी में शामिल लोगों को गिरफ्तार किया गया। उन्होंने कहा कि हमने राज्यों में ड्रग नेटवर्क की मैपिंग की है। उन्होंने भरोसा दिया कि अगले 2 सालों में बड़ा से बड़ा अपराधी सलाखों के पीछे होगा।

संबोधन के दौरान नाराज़ हो गए अमित शाह

जब अमित शाह अपनी बात रख रहे थे उस बीच टीएमसी सांसद सौगत राय ने टोका-टाकी शुरू कर दी। बीच भाषण में इस टोका-टाकी से अमित शाह नाराज़ हो गए। अमित शाह ने कहा कि बीच में टोका–टाकी ठीक नहीं है। यह न आपकी उम्र के लिए ठीक है न ही आपकी सीनियरिटी के लिए। अमित शाह ने कहा यदि आप बोलना चाहते हैं तो मैं बैठ जाता हूँ। अमित शाह ने इस दौरान विषय की गंभीरता समझने का भी आग्रह किया और आगे अपनी बात रखी।

कई बार बड़ों को भी समझाना पड़ता है

टोका-टाकी पर अमित शाह के नाराज़ होने के बाद विपक्ष के एक सांसद ने पूछा कि आप इतने नाराज क्यों होते हैं। इस पर अमित शाह ने कहा, “मैं नाराज़ नहीं हो रहा हूँ, समझा रहा हूँ कई बार बड़ों को भी समझाना पड़ता है।” इसके बाद सदन में टोका-टाकी बंद हो गई और अमित शाह ने ड्रग्स के मुद्दे पर अपनी बात पूरी की।

डेमोग्राफी चेंज पर अमित शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि कुछ एनजीओ विदेशी चंदा लेकर देश में जनसांख्यिकी बदलने (डेमोग्राफी चेंज) करने की कोशिश में हैं। उन्होंने कहा कि कुछ एनजीओ ऐसे हैं जो भारतीय समाज को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री ने ऐलान किया कि सरकार देश की जनसांख्यिकी को बदलने की कोशिश कर रहे गैर सरकारी संगठनों के प्रति कोई दया नहीं दिखाएगी। विदेशी फंडिंग के माध्यम से सामाजिक गड़बड़ी फैलाने वाले संगठनों पर कार्रवाई होगी।
अमित शाह ने कहा कि संगठनों को विदेशी योगदान अधिनियम (FCRA) का पालन करना ही होगा जो FCRA का पालन नहीं करेंगे उनके साथ सख्‍ती की जाएगी। विदेशी फंडिंग पर अब सरकार की निगरानी होगी। अमित शाह ने कहा, “यह नरेंद्र मोदी की सरकार है, देश को खत्म करने के लिए देश में एक पाई भी हम नहीं आने देंगे।”