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हिजाब और बिकनी नहीं, माहवारी के बाद निकाह और हलाला से लड़ाई ज़रूरी

चुनावी माहौल में हिजाब विवाद कोई नई बात नहीं। दूसरे, जब केरल में एक मुस्लिम संस्था द्वारा हिजाब बैन किया गया था, तब हिजाब समर्थकों ने क्यों नहीं विरोध किया? यानि हर चुनाव में मोदी-योगी विरोधी गैंग सक्रिय हो जाता है। पिछले चुनावों में #me too, #award vapasi, #mob lynching, #not in my name, #intolerence और टुकड़े-टुकड़े गैंग आदि गैंग चुनाव संपन्न होते ही किस बिल में छुप जाते हैं, फिर नए नाम से निकल आते हैं। 
CAA विरोध में हिन्दुत्व पर अपमानित नारेबाजी की गयी, जिसका इसको समर्थन दे रही किसी भी पार्टी ने विरोध तक नहीं किया, यदि यही नारेबाजी किसी अन्य मजहब के लिए की होती, जितने भी विरोधी थे सभी अपनी जान बचाने पुलिस की संरक्षण की मांग करते किसी गुप्त स्थान पर छुपे बैठे होते। 
केंद्र एवं राज्य सरकारों को हिजाब विवाद शुरू करने वाली लड़कियों एवं उनके घर वालों के बैंक खातों की जाँच जरुरी है। जो कौम अपने आपको गरीब, मज़लूम मासूम आदि कहे जाने वाले अपने काम धंधे छोड़कर सड़क पर आना, प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।     
ज्यादा बड़ी नहीं थी जब पहली बार देखा था कि स्कूल जाने वाली लड़कियाँ सर्दियों के बिना भी सिर ढकने वाला स्कार्फ पहनती हैं। मुझे तब कोई अंदाजा नहीं था कि ये क्या है, क्यों है, किसलिए पहना गया है। मैं चूँकि उस समय धूल से बचने के लिए मुँह पर रुमाल बाँधा करती थी तो पहले सोचा कि ये स्कार्फ भी शायद ऐसा कोई उपाय है। बहुत लंबे तक मन में इस स्कार्फ को लेकर जद्दोजहद चली… फिर धीरे-धीरे इसके बारे में समझ आया कि इसे मुस्लिमों में सिर ढकने के लिए पहना जाता है। बाकी की जानकारी तब हुई जब एक मुस्लिम सहेली बनी और उसने इसके बारे में सब बताया…

कर्नाटक में हुए हिजाब विवाद से पहले वो पुरानी बातें मेरे जहन से गायब थीं, पर पूरे बखेड़े के बाद जब जगह-जगह तर्क पढ़े, हिजाब को संवैधानिक अधिकार बताने के लिए आतुर लोग देखे, कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की दलीलें सुनीं, तो वो पुरानी बातें याद आती गईं। मैं, तब हिजाब शब्द से पूरी तरह अंजान थी इसलिए, सवाल किया था कि इसे पहनकर क्यों आते हो और आते हो तो क्लास में क्यों उतार देते हो? माहौल राजनैतिक नहीं था, इसलिए पहले जवाब मिला- “हमारे में ये जरूरी होता है।” और फिर आगे कहा गया- “हम जिस इलाके में रहते हैं वहाँ ज्यादा मुस्लिम ही हैं। इसलिए घर से निकलते वक्त इसे पहनते हैं और घर जाते समय पहनना पड़ता है। क्लास में इसलिए उतारते हैं क्योंकि यहाँ देखो कोई इसे नहीं पहनता।”

हिजाब का मुद्दा स्वेच्छा से जुड़ा?

उस उम्र में जितनी समझ होनी चाहिए मैंने उसी के हिसाब से उस लड़की की बातें अपने मन में बैठाईं और उसी के नजरिए से मैं आज भी इस पूरे मुद्दे को देखती हूँ। घटना चाहे आज की हो या 15 साल पुरानी…एक बात साफ है कि एक लोकतांत्रिक देश में, समानता के अधिकार के साथ, शिक्षा की चाह रखने वाली लड़की के लिए हिजाब का मुद्दा कभी भी ‘स्वेच्छा’ से जुड़ा नहीं हो सकता। हम माने चाहें न मानें लेकिन यदि कोई लड़की स्कूल के बाहर तक हिजाब पहनकर आई और क्लास में घुसने से पहले उसे उतार दिया तो ये दिखाता है कि किस हद्द तक मजहबी ठेकेदारों ने उस लड़की को गुलाम बनाया हुआ था जो क्लास में बैठकर एक समान दिखने के इच्छुक तो थी, लेकिन बाहर निकलते ही उसे डर भी था कि कहीं उसके आस-पास के लोग उसे कुछ न बोल दें।
आज समय बदल गया है जो कभी मजहबी ठेकेदारों का डर था वो कट्टरपंथ में तब्दील हो गया है। थोपी गई चीजें स्वेच्छा से जुड़ी बताई जा रही है। हिजाब पहनकर क्लास लेने की लड़कियों की जिद्द दिखाती है कि किस हद्द तक उन्हें मानसिक तौर पर गुलाम बनाया जा चुका है कि वो एक शैक्षणिक संस्थान के बाहर खड़े होकर ये बातें कह रही हैं कि इस्लाम उनकी प्राथमिकता है और शिक्षा उनके लिए सेकेंड्री चीज है। सोचिए, अभी 6 माह ही हुए हैं जब पूरे विश्व ने अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद वहाँ की लड़कियों को शून्य में जाते देखा। हर कोई सिर्फ यही बता रहा था कि एक बार फिर कट्टरपंथ के आ जाने से लड़कियों का जीवन अंधकार में चला जाएगा।

माहवारी के बाद निकाह, हलाला पर कब लड़ेंगी मुस्लिम लड़कियाँ?

भारत में लोकतंत्र है, समान अधिकार देने वाला संविधान है- बावजूद इसके अगर पूरी लड़ाई मजहब से जुड़ी ही बना ली जाए तो कोई फरिश्ता भी मानसिक गुलामों को आजाद नहीं करवा पाएगा। जिन लड़कियों को ऐसा लग रहा है कि आखिर हिजाब पहनकर क्लास में बैठने की अनुमति से प्रशासन को क्या परेशानी है, वो बस इस बात की कल्पना करें कि उनकी ही कक्षा में कोई लड़की किसी अन्य रंग के दुपट्टे से सिर ढक कर बैठी है। क्या ये समानता होगी? जिस तरह शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा का अधिकार सभी के लिए समान है वैसे ही वहाँ नियम भी सभी के लिए समान होने चाहिए। अगर हिजाब को लेकर इतना प्रेम है तो इसके लिए कई मजहबी संस्थानों की ओर रुख करने की आवश्यकता है जहाँ न इन्हें लेकर आपत्ति और न ही इन पर कोई विवाद। 
एक सामान्य कॉलेज या स्कूल, एक ऐसी जगह होते हैं, जहाँ ड्रेस कोड लागू करने का उद्देश्य ही ये होता है कि कोई न किसी से अलग दिखे और न ही किसी से कोई भेदभाव हो, बताइए वहाँ हिजाब की माँग की क्या जरूरत है । क्या इन लड़कियों को अधिकारों की लड़ाई लड़ने के क्रम में तीन तलाक, माहवारी के बाद निकाह, बहुविवाह या फिर हलाला जैसे नारकीय रीतियाँ नहीं दिखतीं? अगर ये मानसिक गुलामी नहीं हैं तो क्या है कि जिनका खुद पर इतना भी अधिकार नहीं है कि वो ये स्टैंड ले सकें कि उन्होंने किस प्रदर्शन में शामिल होना है किसमें नहीं!
आज कट्टरपंथी समूहों द्वारा ब्रेनवॉश होकर और उनका समर्थन पाकर, लोकतांत्रिक देश को संविधान में मिले अधिकारों का हवाला दिया जा रहा है। सोचिए अगर ये मजहबी कट्टरपंथ फैलता रहा और इसी तरह शैक्षणिक संस्थानों पर दबाव बनाता रहा तो कब तक आप खुद को लोकतांत्रिक देश का नागरिक कह पाएँगे और कब तक अधिकारों के नाम पर मजहबी या धार्मिक प्रेम को जगजाहिर कर पाएँगे।

मजहबी दबाव में क्यों आएँ स्कूल-कॉलेज

कर्नाटक में जो बवाल चल रहा है सोचिए उसका क्या केंद्र बिंदु है…..? सिर्फ मजहब, मजहब और मजहब। कहीं से कहीं तक शिक्षा की कोई बात ही नहीं है। लड़कियों को किसी ने भी हिजाब या बुर्का पहनने से मना नहीं किया है उन्हें बस कहा जा रहा है कि जब बच्चे बैठकर क्लास लेंगे वहाँ इसकी अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा लड़कियाँ चाहें तो उसे परिसर में पहनकर घूमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं है। मगर, बावजूद इसके उन लड़कियों को एक ऐसी जगह पर अपना लोहा मनवाना है जहाँ कुछ नियम हैं, कुछ कायदें हैं कानून हैं।
हर जगह अपनी मर्जियाँ नहीं चलतीं। जैसे हर धर्म-मजहब के अपने नियम हैं, उन्हें स्वतंत्रता है, वैसे ही संस्थान भी हैं। खासकर ऐसे संस्थान, जो सबके लिए निर्मित हुए हों। कोर्ट इस मामले में सुनवाई कर रहा है। हो सकता है फैसला लड़कियों के पक्ष में आए या हो सकता है ऐसा न भी हो। मगर, उससे पहले जो हालात अब बन चुके हैं उन पर विचार सबको करना ही पड़ेगा। बाहरी देशों में मजहबी बेड़ियाँ से बाहर निकलने पर लड़कियों को मारा जा रहा है, उनपर अत्याचार हो रहे हैं, प्रताड़नाएँ दी जा रही हैं, उन्हें देश छोड़ना पड़ रहा है और एक हम हैं, जो उस देश में रहकर अपना विकास नहीं कर पा रहे जिसने हमें किसी भी बेड़ी में बँधे बिना मनमुताबिक तौर-तरीकों जीने का पूरा-पूरा हक दिया है।

बिकनी और हिजाब संवैधानिक अधिकार

ये देश की विडंबना ही है कि एक ओर देश को बुर्काधारी लड़कियों को ये समझाना पड़ता है कि कैसे शैक्षणिक केंद्र में एकरूपता और समानता का महत्व हैं और दूसरी ओर पढ़ी लिखी प्रियंका को गाँधी अपने ट्वीट में लिखती हैं चाहे बिकनी हो, घूँघट हो या हिजाब हो, ये महिला का अधिकार है कि वो क्या पहनना चाहती है। इसका अधिकार लड़कियों को संविधान ने दिया है।
अवलोकन करें:-
हिजाब इंडोनेशिया में है ‘बैन’ ; यूनिफॉर्म का हिस्सा बनाने पर स्कूलों को मिलती है सज़ा
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हिजाब इंडोनेशिया में है ‘बैन’ ; यूनिफॉर्म का हिस्सा बनाने पर स्कूलों को मिलती है सज़ा
क्या संविधान ये अधिकार देता है कि बिकनी पहनकर क्लास ली जाए? या संविधान ये कहता है कि घूँघट में क्लास रूम में पहुँच जाया जाए या फिर रिप्ड जींस में पढ़ाई हो….अगर नहीं तो हिजाब के मना करने पर इतना बवाल क्यों? जैसे हम देश के नागरिक हैं वैसे ही संस्थान भी लोकतांत्रिक देश से जुड़ा हिस्सा है। ड्रेस कोड का नियम आज से नहीं चल रहा। सालोंसाल से इसे अपनाया गया है। जहाँ हिजाब पर आपत्ति नहीं है वहाँ कभी इसकी मनाही नहीं हुई, मगर यदि किसी संस्थान के नियमों के अनुसार, ड्रेस कोड के अतिरिक्त कुछ भी नियमों का उल्लंघन है तो उसमें मजहबी तौर पर जबरदस्ती करनी क्यों है।

राहुल गांधी की देशविरोधी ताकतों से सांठगांठ

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद कांग्रेस का देश विरोधी चेहरा खुलकर सामने आने लगा। देश और मोदी सरकार विरोधी ताकतों से कांग्रेस और राहुल गांधी की किस तरह की सांठगांठ है, उसकी परतें लगातार खुलती जा रही हैं। शुक्रवार को सांठगांठ की एक और परत खुली जब राहुल गांधी ने पूर्व अमेरिकी राजनयिक निकोलस बर्न्स से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संवाद किया। इस दौरान भी राहुल गांधी देश का अपमान करने से बाज नहीं आए। 
सहिष्णुता को लेकर राहुल ने साधा निशाना 
राहुल से बातचीत में निकोलस ने कोरोना को लेकर कहा कि भारत और कैंब्रिज में एक से हालात हैं। यहां भी लॉकडाउन है। वहीं राहुल ने कहा कि इन दिनों अमेरिका और भारत में वह सहिष्णुता देखने को नहीं मिल रही है जो पहले थी। हम खुले विचारों वाले हैं, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि वो अब गायब हो रहा है। यह काफी दुःखद है कि मैं उस स्तर की सहिष्णुता को नहीं देखता, जो मैं पहले देखता था। ये दोनों ही देशों में नहीं दिख रही है।
राहुल गांधी का लॉकडाउन पर हमला

राहुल गांधी ने कहा कि हम एक भयानक समय से गुजर रहे हैं लेकिन जरूर बेहतर समय आएगा। उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर प्रधानमंत्री मोदी पर हमला बोलते हुए कहा कि आप एकतरफा फैसला करते हैं। दुनिया में सबसे बड़ा कठोर लॉकडाउन करते हैं। आपके पास लाखों दिहाड़ी मजदूर हैं जो लाखों किलोमीटर पैदल चल रहे हैं। तो यह एकतरफा नेतृत्व है, जहां आप आते हैं  कुछ करते हैं और चले जाते हैं। यह बहुत ही विनाशकारी है। लेकिन यह समय की बात है।
राष्ट्रवाद पर उठाया सवाल
राहुल गांधी ने कहा कि विभाजन वास्तव में देश को कमजोर करने वाला होता है, लेकिन विभाजन करने वाले लोग इसे देश की ताकत के रूप में चित्रित करते हैं। देश की नींव को कमजोर करने वाले लोग खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं।
मोदी पर अपमानजनक और निराधार आरोप 
निकोलस बर्न्स देश की जनता द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर आपत्तिजनक ट्वीट करते रहे हैं। अपने ट्वीट्स में बर्न्स साफतौर पर उनका अपमान करते देखे गए हैं। बर्न्स अपने ट्वीट्स में प्रधानमंत्री मोदी पर भारत को धार्मिक आधार पर विभाजित करने और समाज को अस्थिर करने जैसे निराधार आरोप लगा चुके हैं।
सामाजिक एकता को नष्ट करने का लगाया आरोप
इतना ही नहीं बर्न्स प्रधानमंत्री मोदी को हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने वाला बता चुके हैं। बर्न्स ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री मोदी पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करने और देश की सामाजिक एकता को नष्ट करने का आरोप लगाया था।
वीजा नहीं देने में निभाई मुख्य भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी बर्न्स एक बार उनका वीज़ा रोकने वाले अधिकारियों में मुख्य भूमिका में थे। अमेरिका ने 2005 में प्रधानमंत्री मोदी को वीजा जारी करने से मना कर दिया था। उन पर 2002 में हुए गुजरात दंगों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। इसके बाद 2013 में भी धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी संसद के स्वतंत्र आयोग ने प्रधानमंत्री मोदी पर वीजा प्रतिबंध जारी रखने की सिफारिश की।
बर्न्स ने भारत का किया आपमान
भारत को लेकर बर्न्स की सोच भी काफी संकुचित रही है। 2014 में क्लाइमेट चेंज पर हुई अमेरिका और चीन की डील के बाद भी बर्न्स ने भारत पर तंज कसा था।
2015 में पेरिस में ‘कोप 21’ यानी कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज का आयोजन किया गया था, जिसमें भारत की भूमिका को लेकर बर्न्स ने भारत को ‘स्पॉइलर’ बताकर निशाना साधा था।
डोकलाम विवाद के समय चीनी राजदूत से चोरी-छिपे मिले राहुल 
भारत-चीन के बीच 73 दिनों तक सिक्किम से सटे डोकलाम क्षेत्र जबर्दस्त तनातनी का माहौल रहा। इस कूटनीतिक और सैन्य तनाव पर दुनिया भर की नजरें गड़ी थीं। ऐसे में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी चोरी-छिपे भारत में मौजूद चीन के राजदूत लिओ झाओहुई से मिलने पहुंच गए। राहुल गांधी ने भारत की सेना या प्रधानमंत्री पर विश्वास करने की जगह चीनी राजदूत पर भरोसा किया। 
पूर्व पीएम मनमोहन ने पाकिस्तान उच्चायुक्त से की गुप्त मंत्रणा 
कांग्रेसा नेता मणिशंकर अय्यर ने जिस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘नीच आदमी’ कहा। उसके एक दिन पहले मणिशंकर अय्यर के घर पर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और पाकिस्तान उच्चायुक्त के हाई कमिश्नर ने हाई लेवल की गुप्त बैठकें कीं। इस गुप्त मंत्रणा के अगले ही दिन मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को गाली दे दी। इस पूरे वाकये में मनमोहन सिंह ने प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा दीं।
पाकिस्तान से अय्यर ने कहा – हमें ले आइए, मोदी को हटाइए 
साल 2014 पहली बार मोदी सरकार बनने के कुछ ही महीने बाद कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में एक मणिशंकर अय्यर ने पाकिस्तान जाकर पीएम मोदी को हटाने के लिए उसकी मदद मांगी थी। एक पाकिस्तानी चैनल के सामने उन्होंने इसके लिए लगभग पाकिस्तानी शासकों से गुहार तक लगाई थी।
JNU में राहुल ने दिया देशद्रोहियों का साथ दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी JNU में भारत विरोधी नारे और देश को तोड़ने वाले नारे लगाते हुए पूरे देश ने देखा था, लेकिन देशविरोधी इन ताकतों की आलोचना करने के बजाए राहुल गांधी इनका समर्थन करने JNU पहुंच गए थे। 
कश्मीर के अलगावादियों से कांग्रेस के रिश्ते
कश्मीर में बिगड़ते माहौल के पीछे काफी हद तक अलगाववादी नेताओं का ही हाथ रहा है। अलगाववादी नेताओं को लगातार उनके पाकिस्तानी आकाओं से मदद मिलती रही है और वह यहां कश्मीरी लड़कों को भड़काते हैं। NIA की की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2005 से लेकर 2011 के बीच अलगाववादियों को ISI की ओर से लगातार मदद मिल रही थी। 2011 में NIA की दायर चार्जशीट के अनुसार हिज्बुल के फंड मैनेजर इस्लाबाद निवासी मोहम्मद मकबूल पंडित लगातार अलगाववादियों को पैसा पहुंचा रहा था, लेकिन कांग्रेस सरकार ने इस पर कोई कठोर निर्णय नहीं लिया था।
कांग्रेसी नेताओं का ‘जहरीले’ जाकिर नाइक से नाता
इस्लामी कट्टरपंथी धर्म प्रचारक जाकिर नाइक से कांग्रेसी नेताओं के ताल्लुकात रहे हैं। जाकिर नाइक ने कई देशविरोधी कार्य किए, कई देशविरोधी भाषण दिए। वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने 15 जुलाई, 2016 को कहा कि वह इस्लाम का सही अर्थ और उद्देश्य का प्रचार कर रहे हैं जबकि भाजपा इस्लाम को आतंकवाद से जोड़कर पेश कर रही है। नाइक के साथ दिग्विजय सिंह 2012 में मंच साझा कर चुके हैं। इस इवेंट में दिग्विजय को जाकिर नाइक की तारीफों के पुल बांधते हुए सुना जा सकता है। 

चुनावों भरा होगा साल 2019, भारत का विकास स्टेट्समैन मोदी के अंदर ही हो सकता है, पॉलिटिशियन मोदी के अंदर नहीं। --न्यू यॉर्क टाइम्स

नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
2019 के इस साल पर कईयों की नजर है। राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह साल काफी खास होने वाला है। क्योंकि 2019 में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। इसके अलाव कुछ राज्य भी हैं जहां पर विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में आज हम 2019 में लोकसभा चुनाव के अलावा किन-किन राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले उसके बारे में विस्तृत जानकारी देंगे।इनके 
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की दिल्ली इकाई ने 2019 के आम चुनाव से पूर्व बूथ स्तर के लगभग 69,000 कार्यकर्ताओं से प्रभावी तरीके से जोड़ने के लिए ‘नमो अगेन’ नाम से एक व्हाट्सएप नंबर आरम्भ किया है.
वहीं उन्होंने सोशल मीडिया एवं आईटी सेल को सभी बूथ संयोजकों, प्रभारियों और पंच प्रमुखों से जुड़ने के लिए मोबाइल नंबर का उपयोग  करने के निर्देश जारी किए हैं. उल्लेखनीय है कि हर मतदान केंद्र पर पंच प्रमुख और बूथस्तर के कार्यकर्ता मतदाताओं के साथ जुड़ने के लिए पार्टी के लिंक के रूप में काम करते हैं. दिल्ली में कुल 13,816 मतदान केंद्र हैं. वहीं भाजपा ने हर मतदान केंद्र पर पांच पंच प्रमुख नियुक्त कर दिए हैं. इस तरह दिल्ली में बूथ स्तर के लगभग 69,000 कार्यकर्ता हैं.
दिल्ली भाजपा के सोशल मीडिया एवं आईटी सेल के वरिष्ठ अधिकारी नीलकंठ बख्शी ने बताया है कि, ”ऐसा पाया गया है कि पार्टी के राष्ट्रीय एवं प्रदेश नेतृत्व के निर्देश बूथस्तर के कार्यकर्ताओं तक समय पर नहीं पहुंच पाते हैं. जिससे सौंपे गये कार्य के पूरा होने में भी देरी हो जाती है. ”बख्शी ने कहा है कि ‘नमो अगेन’ मोबाइल नंबर एक व्हाट्सएप ग्रुप और ब्रॉडकास्ट लिस्ट के जरिए तिवारी और बूथ कार्यकर्ताओं के बीच सीधा संवाद स्थापित करेगा.

नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा

2019 के मध्य में लोकसभा चुनाव होंगे। 3 जून को नरेंद्र मोदी सरकार का कार्यकाल खत्म हो रहा है। ऐसे में उससे पहले ही यानी अप्रैल और मई में ही आम चुनाव हो सकते हैं। ऐसे इस चुनाव को एनडीए और नरेंद्र मोदी सरकार की अग्निपरीक्षा माना जा रहा है। बता दें कि देश में लोकसभा की कुल 543 सीटें हैं। अब राजनीतिक पार्टियों की बात करें तो अभी से ही चुनाव की तैयारियों में जुट गई हैं। इस चुनाव को इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि एक तरफ एनडीए और मोदी सरकार है तो दूसरी ओर बाकी दल एकजुट होने की कोशिश में लगे हुए हैं। लेकिन आखिरी फैसला देश की जनता ही करेगी कि आखिर सत्ता की गद्दी किस पार्टी को दी जाए और किसको विपक्ष में रखा जाए। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खाते में 282 सीटें आई थी और नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का शपथ दिलाया गया था।
ओडिशा में नवीन पटनायक के लिए खास रहेगा साल 2019

ओडिशा में नवीन पटनायक के लिए खास रहेगा साल 2019

2019 में होने वाले विधानसभा चुनावों की बात करें तो सूची में सबसे पहला नाम ओडिशा का है। 2019 में ओडिशा की नवीन पटनायक की सरकार के पांच साल पूरे हो रहे हैं ऐसे में यहां भी विधानसभा चुनाव होंगे। कहा ये भी जा रहा है कि ओडिशा की 147 सीटों वाली विधानसभा चुनाव के परिणाम लोकसभा चुनाव के साथ ही आएंगे। ओडिशा में फिलहाल बीजू जनता दल (बीजद) की सरकार है और नवीन पटनायक यहां के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं। 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजद को 117 सीटें मिली थी जबकि कांग्रेस को 15, भाजपा को 10 और एसकेआई और सीपीआई को एक-एक सीटें मिली थी। वहीं निर्दलीय के खाते में 2 सीटें आई थीं।
आंध्र प्रदेश में एन चंद्रबाबू नायडू की अग्निपरीक्षाअग्निपरीक्षा 2019 में होने वाले विधानसभा चुनाव में आंध्र प्रदेश का नाम भी है। 
आंध्र प्रदेश में फिलहाल तेलुगू देशम पार्टी पार्टी के एन चंद्रबाबू नायडू की सरकार है। राज्य में विधानसभा चुनाव की तैयारी अभी से शुरू हो गई है। 2019 लोकसभा चुनाव और राज्य में विधानसभा चुनाव को देखते हुए चंद्रबाबू नायडू कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुके हैं। गठबंधन की वजह से राज्य की राजनीति में हलचल पैदा हो गई है। बता दें कि साल 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में चन्द्र बाबू नायडू के नेतृत्व में तेलुगू देशम पार्टी 294 सीटों में से 117 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। इसके बाद चंद्रबाबू नायडू ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। आंध्र प्रदेश में भी मई और जून के बीच में चुनाव हो सकते हैं।
महाराष्ट्र में सीएम देवेंद्र फडणवीस के लिए चुनौती भरा रहेगा 
महाराष्ट्र में सीएम देवेंद्र फडणवीस के लिए चुनौती भरा रहेगा 20192019 विधानसभा चुनाव के हिसाब से 2019 का साल देवेंद्र फडणवीस के लिए भी खास होने वाला है। लोकसभा चुनाव के बाद या फिर उसके साथ ही महाराष्ट्र में भी विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। फडणवीस के लिए यह चुनाव इसलिए खास है क्योंकि पिछली बार मोदी लहर थी और राज्य में बीजेपी ने आसानी से जीत हासिल करते हुए सत्ता हासिल कर ली। लेकिन इस बार महाराष्ट्र में राजनीतिक माहौल पिछली बार से काफी अलग नजर आ रहा है। क्योंकि अधिकतर पार्टियां एकजुट होती हुई नजर आ रही हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना का रूख भी कभी बीजेपी के साथ रहता है तो कभी खिलाफ में खड़ी हो जाती है इसलिए यह चुनाव बीजेपी और देवेंद्र फडणवीस के लिए आसान नहीं होने वाला है। बता दें कि 2014 में महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 19 अक्टूबर हुई मतगणना में भारतीय जनता पार्टी 123 सीटें हासिल कर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और सत्ता की गद्दी हासिल की। चुनाव परिणाम में कांग्रेस तीसरे स्थान पर खिसक गई।
हरियाणा में खट्टर सरकार के हो रहे पांच साल पूरे 
हरियाणा में खट्टर सरकार के हो रहे पांच साल पूरे2019 में हरियाणा में बीजेपी की मनोहर लाल खट्टर सरकार के भी पांच साल पूरे हो रहे हैं। ऐसे में सितंबर-अक्टूबर के महीने में यहां भी चुनाव हो सकते हैं। खट्टर सरकार और बीजेपी के लिए यह चुनाव काफी अहम है। क्योंकि यहां पर पहले से ही बीजेपी की सत्ता है। ऐसे में बीजेपी चाहेगी कि किसी भी हाल में वो राज्य की गद्दी हासिल करें। दूसरी ओर विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी चुनाव की तैयारियों में अभी से जुट गई है।भ जबकि 2014 में दूसरे नंबर पर रही इंडियन नेशनल लोकदल भी राज्य की राजनीति में अहम भूमिका निभाने के लिए तैयार है। बता दें कि 2014 में 90 विधानसभा सीटों वाले हरियाणा में हुए चुनाव में बीजेपी को 47 सीटें प्राप्त हुई थी। इसके अलावा इंडियन नेशनल लोकदल ने 19 सीटों पर जीत दर्ज की थी और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। जबकि सत्तारूढ़ कांग्रेस के खाते में केवल 15 सीटें आईं।
अरुणाचल में भी खत्म हो रहा पेमा खांडू की सरकार का कार्यकाल 
अरुणाचल में भी खत्म हो रहा पेमा खांडू की सरकार का कार्यकालचुनाव के लिहाज से अरुणाचल प्रदेश के लिए भी 2019 का साल काफी खास रहने वाला है। क्योंकि 1 जून 2019 को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू की सरकार का कार्यकाल खत्म हो रहा है। ऐसे में अरुणाचल प्रदेश में भी चुनाव की गहमा गहमी रहेगी। फिलहाल यह राज्य बीजेपी के कब्जे वाला राज्य है। यहां का विधानसभा चुनाव 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के साथ ही हुआ था। जिसके बाद कांग्रेस बहुमत में आई और सरकार भी बनी। लेकिन 2016 के आखिरी महीनों में कांग्रेस के कई विधायक बीजेपी में शामिल हो गए जिसकी वजह से वर्तमान समय में अरुणाचल में बीजेपी की सरकार है। राज्य में विधानसभा की कुल 60 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 31 सीटों की जरूरत होती है। राज्य के मुख्यमंत्री पेमा खांडू मुक्तो विधानसभा सीट से विधायक हैं।
सिक्किम में चामलिंग की अग्निपरीक्षा
चुनाव के हिसाब से 2019 का साल सिक्किम के लिए भी खास है। सिक्किम में कुल 32 विधानसभा सीटें हैं। सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग 12 दिसंबर को मुख्यमंत्री के रूप में अपना 20वां साल पूरा कर लिए हैं। चामलिंग के साथ सबसे खास बात ये हैं कि इनकी पार्टी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) ने 2009 में हुए विधानसभा चुनाव मेमं 32 सोटों में से 32 पर जीत हासिल करने में सफल रही। ऐसे में यहां पर किसी दूसरे दल को राज्य में पैरा जमाना आसान नहीं होगा। क्योंकि राज्य की जनता का पूरा सपोर्ट चामलिंग को है।
पांच राज्यों के असेम्बली चुनावो के परिणाम के बाद, न्यू यॉर्क टाइम्स ने एक आलेख लिखा, जिसका यथासम्भव हिंदी अनुवाद किया है:--
"भारतीयों द्वारा वोट देने का पैटर्न एक दम साफ है उससे वर्तमान सरकार को सबक सीखना चाहिये...
- भारतीय मतदाता, फिस्कल डेफिसिट नही समझता और उसे, कोई मतलब नही कि ये 2.4% रहे चाहे 3.4%. उन्हें सब्सिडी और फ्री-बी (मुफ्त देने की योजना) की भी समझ नही। उन्हें तो ये भी नही पता कि सब्सिडी और फ्री-बी एक उधार है जिसे एक दिन कोई न कोई चुकायेगा।
भारतीय जनता को GDP रेट से कोई मतलब नही, भले ही पिछले चार सालों में 3.8 से बढ़कर 7.4 हो गया, जो कि अमरीका, ब्रिटेन जापान आदि देशों से आगे है
- भारतीय लोग हमेशा शिकायत करेंगे, सिर्फ प्याज और दाल पर ही नही, डीजल पेट्रोल पर भी। उन्हें चीजे सस्ती भी मिलनी चाहिये और किसानों को भी अच्छी कीमत मिलनी चाहिये।
- भारतीयों के पुरानी आदते सुधारने को मत कहिये, उनकी नजर में ये सरकार का काम है कि हर चीज वही बदले
- भारतीयों को लॉन्ग टर्म मुद्दों से कोई लेना देना नही, उन्हें हर चीज आज ही चाहिये, और आज ही नही, अभी के अभी चाहिये
- भारतीयों की यादाश्त कमजोर और उनका दृष्टिकोण बहुत ही संकीर्ण होता है। वो पिछला भूल जाते है और नेताओं के पिछले कुकर्मो को माफ कर देते है
- वो ढीठई से जातिवाद पर वोट करते है और जातिवाद एक मुख्य शत्रु है जो युवाओं का उत्थान नही करता बल्कि लोगों को बांटकर रख देता है... और चीन और पाक जैसे देश, भारतीयों को ही जातिवाद फैलाने का हथियार बनाते हैं क्योंकि, दोनों ही अपने GDP के लिये भारतीय बाजार पर निर्भर हैं
इंडियन रक्षा तंत्र पिछले पांच सालों में बहुत मजबूत हुआ है पाकिस्तान और गल्फ देशों के बनिस्बत, और ये देश, खुल्लम खुल्ला हिंदुस्तान को शासन का निर्देश नही दे सकते, इसलिये वो विध्वंसकारी संगठनों को अरबो खरबो की फंडिंग करते है कि हिंदुस्तान को बर्बाद करो.....
और मोदी ही, इसे कूटनीतिक युद्ध से जीत सकते हैं और
दुख की बात है कि ये बात, भारतीय ही नही समझते
अगर मि. मोदी, अगले 5 महीनों तक लॉन्ग टर्म प्लान फिक्स करने मे रह जाते हैं तो, वो 2019 खो बैठेंगे फिर एक मृत और गिरा सिपाही देश के लिये कुछ नही कर सकता। उन्हें, अगले 5 साल की सरकार बनाने के लिये हर हाल में कठोर बनकर जिंदा रहना होगा। अब उन्हें बचे 5 महीनों में राजनीतिज्ञ बनना पड़ेगा
अगर पब्लिक सस्ता पेट्रोल डीजल चाहती है, तो दीजिये उसे।
अगर किसान कर्जमाफी चाहते है, तो निराश मत कीजिये उन्हें ...
वे 'सबका साथ सबका विकास नही जानते, वे सिर्फ अपने पॉकेट में आये गांधी को जानते हैं
हम, मोदी को सलाह देंगे कि अगले 5 महीने स्टेट्समैनशिप छोड़िये और पॉलिटिशियन बनिये । 2019 की जीत के बाद ही स्टेट्समैन बनिये, क्योंकि भारत का विकास स्टेट्समैन मोदी के अंदर ही हो सकता है, पॉलिटिशियन मोदी के अंदर नहीं। "
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किसी खोजी पत्रकार तक ने इन सब्ज़ी और दूध
फेंकने वालों की तिजोरियों की जाँच
करवाए जाने की मांग नहीं की, क्यों?
न्यू यॉर्क टाइम्स में प्रकाशित उपरोक्त आलेख समस्त भारतीयों की आँखे खोलने वाला है, लेकिन यहाँ तो "अन्धे की आँख में सुरमा डालने पर रोता है, हाय मेरी आँख फोड़ दी"; दूसरे, मोदी-योगी सरकारों को #metoo, #not in my name, #mob lynching, #intolerence, #dalit appeasement, #casteism आदि षड्यंत्रकारियों से भी सतर्क रहना चाहिए। इन आने वाले चुनावों में ये षड्यंत्रकारी कौन से नए कलेवर के साथ जनता को भ्रमित करेंगे, कहा नहीं जा सकता। 2019 में पुनः सत्ता में आने पर देश के विकास और शौचालय को ताक पर रख इन षड्यंत्रकारियों के पंख काटने चाहिए, जिस दिन से इन षड्यंत्रकारियों के पंख कटने का श्रीगणेश हुआ नहीं, देश भी स्वतः विकास की ओर चल पड़ेगा। 
सड़क पर दूध एवं सब्ज़ी आदि फेंकने वालों के बैंक खातों आदि की गम्भीरता से जाँच करवानी होगी, क्योकि कोई भूखा अथवा क़र्ज़ में डूबा किसान अपने उत्पाद को सड़क पर नहीं फेंकेगा। इतने वर्षों से इन्ही षड्यंत्रकारियों ने देश को खोखला कर दिया।  
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किसानों का क़र्ज़ माफ़ी 
जहाँ तक किसानों के क़र्ज़ माफ़ी की समस्या है, अभी कुछ दिन पूर्व कुछ लोगों से एक बहुत ही गम्भीर एवं षड्यंत्रकारी नीति के बारे में जानकारी मिली कि बड़े-बड़े जमींदार लोगों को पट्टे पर अपनी जमीन दे देते हैं, मोटा धन तो जमींदार को मिल गया, लेकिन पट्टा होने से पूर्व खेतों में कैमिकल डलवा देते हैं, जिससे एक/दो वर्ष तो खूब फसल होती है, परन्तु उसके बाद ज़मीन बंजर होने लगती है। जिस कारण वही किसान अपनी अच्छी फसल के आधार पर बैंक पर क़र्ज़ तो ले लेता है, परन्तु फसल न होने के कारण बैंक का कर्ज़ा नहीं दे पाता। यदि यह बात सच है तो सरकार को कर्ज़ा माफ़ करने से पूर्व इन बारीकियों की भी जाँच करनी चाहिए। 
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क्योकि कुछ दिन पूर्व, एक चैनल पर चर्चा के दौरान, महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री देवेन्द्र से जब महाराष्ट्र में हुए किसान आन्दोलन के विषय में किये गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने स्पष्ट कहा कि "जब मैंने आंदोलनकारी किसानो से बात की, उनका कहना था कि हमारे पास तो खेती के लिए ज़मीन ही नहीं है, हमें तो धन देकर लाया गया है।" मतलब यह की कर्ज़ा ले कोई रहा है और प्रदर्शन कोई और कर रहा है।