Showing posts with label Farooq Abdullah. Show all posts
Showing posts with label Farooq Abdullah. Show all posts

पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने महिला पत्रकार’ का हाथ पकड़, पूछा- निकाह कब करोगी, शौहर खुद चुनोगी: वीडियो वायरल

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल है। इसमें वे एक युवा महिला पत्रकार के साथ अजीबोगरीब व्यवहार और सवाल करते दिख रहे हैं। इसको लेकर सोशल मीडिया में उनकी आलोचना हो रही है।

हालाँकि वीडियो में दिखने वाली युवा महिला पत्रकार उरफाना मुनीर का कहना है कि फारूक अब्दुल्ला के साथ उनकी बातचीत ‘शानदार’ रही और पूर्व मुख्यमंत्री उन्हें ‘बेटी’ की तरह मानते हैं।

85 वर्षीय फारूक अब्दुल्ला का यह वीडियो ऐसे वक्त में वायरल हो रहा जब INDI गठबंधन ने ऐसे 14 पत्रकारों के बायकॉट का ऐलान किया है जो कठिन सवाल पूछते रहे हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता अब्दुल्ला विपक्ष के इस गठबंधन के हिस्सा हैं।

वीडियो में अब्दुल्ला को युवा महिला पत्रकार का हाथ पकड़ते और कंधा छूते दिख रहे हैं। उससे पूछते हैं कि क्या उसने अपना शौहर चुन लिया है। अब्दुल्ला की इस हरकत पर आसपास खड़े कुछ लोग हँसते हुए भी दिख रहे हैं।

फारूक अब्दुल्ला ने महिला पत्रकार से पूछा- निकाह कब करोगी

इस वीडियो में महिला पत्रकार उरफाना मुनीर कहती हैं कि सर एक लास्ट सवाल यह जानना चाहूँगी कि इनका कहना… लेकिन उनका सवाल पूरा होने से पहले ही पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल्ला उनसे स्थानीय भाषा में उससे पूछते हैं- तुमने निकाह कर ली, तुम निकाह कब करोगी? क्या तुमने अपना शौहर चुना? क्या तुम्हारे अब्बू-अम्मी तुम्हारा शौहर चुनेंगे या तुम चुनोगी।
इस पर युवा महिला पत्रकार जवाब देती है, “मैं अभी बहुत छोटी हूँ सर अभी।” इसके बाद बुजुर्ग अब्दुल्ला उससे निकाह में सावधान रहने को कहते हैं। कहते हैं- क्या पता वो औरतों के साथ घूम रहा हो और तुम्हें पता भी न चले। इसके बाद वे जोर से हँसने लगते हैं।
इसके बाद फारूक अब्दुल्ला महिला पत्रकार से पूछते हैं- यह (मेहंदी) आपके हाथों पर क्यों है? इसके बाद वे हिंदी में कहते हैं- तेरी किसी की शादी थी? जवाब में महिला पत्रकार कहती हैं- मेरे बड़े भाई की शादी थी। इसके बाद अब्दुल्ला उससे हँसते हुए कहते हैं- शादी ठीक थी, बीवी रहेगी कुछ दिन या भाग जाएगी। जवाब में महिला पत्रकार कहती है- रहेगी सर।
बीजेपी आईटी सेल के हेड अमित मालवीय ने एक्स/ट्विटर पर पोस्ट करते कहा है कि फारूक अब्दुल्ला अपने सबसे घृणित रूप में दिख रहे हैं। उन्होंने लिखा है, “रिपोर्टर शायद उनकी पोती की उम्र या उससे भी छोटी है। लेकिन यह तथ्य उन्हें असहज सवाल पूछने से नहीं रोकता है।”
वहीं पत्रकार आदित्य राज कौल ने लिखा है, “महिला विरोधी फारूक अब्दुल्ला से मिलिए।” साथ ही पूछा है कि क्या फारूक अब्दुल्ला सार्वजानिक तौर पर कैमरे के सामने अपने बेटे या बेटी की शादी के बारे में उनसे ऐसे ही सवाल पूछते?
वहीं बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा है कि यह सिर्फ गैर पेशवर ही नहीं है। यह महिला विरोधी और बेहद घिनौना भी है। लेकिन उस गठबंधन के लिए यह हैरानी की बात नहीं है जो सवाल पूछने वाले पत्रकारों का बहिष्कार करता है।
वीडियो वायरल होने के बाद युवा महिला पत्रकार उरफाना मुनीर की भी प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने कहा है, “फारूक अब्दुल्ला साहब के साथ बातचीत शानदार थी। उन्होंने हमेशा मुझे एक बेटी की तरह माना है। नेटिजन्स से अनुरोध है कि वे इसका मजाक न बनाएँ।”

रोशनी एक्ट : जिसका गुनाह छिपाने के लिए हंगामा कर रहा है घोटालेबाज गुपकार गैंग

                                            घोटालेबाज़ गुपकार गैंग 
1947 में जब से भारत स्वतंत्र हुआ है, तब से लेकर आज तक देश में घोटाले थमने का नाम ही नहीं ले रहे। जबकि देश में इतनी अधिक भ्रष्टाचार विरोधी एनजीओ बन चुके हैं, उसके बावजूद घोटाले होना सिद्ध करता है कि जिस तरह जनसेवा के नाम पर नेता और पार्टियां घोटालों में लिप्त हैं, इस स्थिति में इन भ्रष्टाचार विरोधी एनजीओ का क्या है औचित्य, यह ज्वलंत प्रश्न है। 

भ्रष्टाचार करने वाले भ्रष्टाचार दूर करने के नाम पर जनता से वोट मांगते हैं और जनता किसी भी मौसम--सर्दी, गर्मी अथवा बारिश-- में वोट देने लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े होकर अपना वोट देने जाती हैं। लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात। विश्व में भारत ही ऐसा अनूठा देश है, जहाँ सबसे अधिक पार्टियां है। कोई धर्म के नाम पर तो कोई जाति के नाम पर अपनी-अपनी दुकानें खोलकर बैठ अपनी ही तिजोरियां भर रहे हैं, समस्याएं जस की तस बनी हुई है।  

जम्मू-कश्मीर इतना बड़ा राज्य नहीं, लेकिन वह भी इस भ्रष्टाचार से अछूता नहीं। कभी जनता को अनुच्छेद 370 के नाम पर, कभी अलगाववाद के नाम पर, कभी हिन्दू राष्ट्र ने नाम से तो कभी धर्म एवं जाति के नाम पर उकसाया जाता है। जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद 370 की आड़ में किस तरह देश में अराजकता फ़ैला भ्रष्टाचार किया जा रहा था, सुनकर एवं देखकर आंखें फटी रह जाती हैं।

इस घोटाले की जाँच CBI ने अपने हाथों में ली हुई है। अभी तक के जाँच में कई खुलासे हुए हैं और इन सब के तार जम्मू कश्मीर के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों से जुड़ रहे हैं, जिनमें से एक फारूक अब्दुल्लाह का नाम पहले ही सामने आ चुका है। ‘न्यूज़ 18’ की खबर के अनुसार, अब पता चला है कि महबूबा मुफ्ती की पार्टी PDP ने जम्मू के संजवान क्षेत्र में तीन कनाल सरकारी भूमि पर अवैध रूप से कब्ज़ा जमा लिया।
इसके बाद इस जमीन पर पार्टी के दफ्तर का निर्माण कराया गया। इसी ऑफिस के पहले फ्लोर पर विवादास्पद नेता राशिद खान ने डेरा जमा लिया। जिस समय ये सब हुआ, उस वक़्त राज्य में मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार थी। 2 बार जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे सईद काफी विवादित नेता थे और उनके केंद्रीय गृह मंत्री रहते ही घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ था। उनके निधन के बाद उनकी बेटी महबूबा सीएम बनी थीं।
‘न्यूज़ 18’ की खबर में एक CBI अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि गुजरे जमाने की फ़िल्मी हस्तियाँ फिरोज खान और संजय खान की बहन दिलशाद शेख ने भी राजधानी श्रीनगर में 7 कनाल सरकारी जमीन पर कब्ज़ा जमा लिया। दिलशाद ने जमीन को नियमित करने के लिए राशि भी नहीं जमा कराई लेकिन रोशनी एक्ट का इस्तेमाल किया। इसी तरह एक अन्य PDP नेता असलम मट्टू ने भी राजधानी में भूमि कब्जाई।
उन्होंने भी इसके तहत जमा कराई जाने वाली रकम नहीं दी। जम्मू-कश्मीर के एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद के परिवार के एक सदस्य ने भी इस एक्ट का गलत तरीके से फायदा उठा कर सरकारी भूमि पर कब्ज़ा किया। फारूक अब्दुल्लाह ने दावा किया था कि अवैध रूप से कब्ज़ा की गई सरकारी जमीन के बदले चुकाई गई रकम से राज्य में बिजली आएगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

‘रोशनी एक्ट’ या ‘रोशनी स्कीम’ जैसा नाम सुनकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह बिजली से जुड़ी कोई योजना होगी। जी नहीं, यह जम्मू कश्मीर में ‘अंधेरगर्दी’ से जुड़े एक घोटाले का नाम है। बेशक, रियल एस्टेट सेक्टर में सरकारी स्तर पर अरबों रुपए के घपले को अंजाम देने के लिए यह एक्ट लाया गया था। इस भूमि घोटाले के तहत हुए तमाम आवंटन और प्रक्रियाएँ निरस्त कर दी गई और हाई कोर्ट ने इसे पूरी तरह ‘गैर कानूनी और असंवैधानिक’ करार दे दिया।

जम्मू-कश्मीर के ‘रोशनी एक्ट’ भूमि घोटाले की लिस्ट सार्वजनिक होने पर हड़कंप मच गया है। क्योंकि फेरिस्त में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला समेत कई दिग्गज नेताओं के नाम सामने आए हैं। अब्दुल्ला पर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करने का गंभीर आरोप है। हालाँकि, उन्होंने इसे एक बड़ी साजिश करार देते हुए सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया है। फारुक अब्दुल्ला का कहना है कि इस इलाके में सिर्फ उनका ही घर नहीं है। उन्होंने कहा कि इन आरोपों से साफ पता चलता है कि सरकार की मंशा सिर्फ उन्हें फँसाने की है और कुछ नहीं।


अगर फ़ारूक़ की बात को सच भी माना जाए, तो एक भारतीय सांसद होते हुए क्यों जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 वापस लाने के लिए चीन से सहायता लेने की बात बोल रहे हैं? क्या ऐसे लोग नेता कहलवाने योग्य हैं? क्या ऐसे नेता वोट के अधिकारी हैं?

फ़ारूक़ पर जमीन हड़पने का आरोप 

फारुक अब्दुल्ला पर सरकारी जमीन कब्जा कर घर बनाने का आरोप है। मीडिया रिपोर्ट में बताया जा रहा है कि जम्मू के सजवान में उनका जो घर है, वो जंगल की जमीन पर है। ये घर 10 कनाल में बना हुआ है। इनमें से 7 कनाल जंगल की जमीन है जबकि 3 कनाल जमीन उनकी अपनी है। आरोप ये है कि जमीन रोशनी एक्ट के तहत गलत तरीके से ली गई। हालाँकि पूर्व मुख्यमंत्री ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि उन पर लगे सभी आरोप बेबुनियाद हैं।

PDP और NC  नेताओं के नाम 

वहीं इससे पहले पीडीपी, एनसी समेत कांग्रेस के कई नेताओं के नाम इस घोटाले में सामने आए थे। इनमें से एक नाम जम्मू कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू का भी था। दरअसल 25,000 करोड़ रुपए के कथित रोशनी भूमि घोटाले के मामले की जाँच हाईकोर्ट ने सीबीआई को सौंपी थी। जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने इस गड़बड़ी को ‘बेशर्म’ और ‘राष्ट्रहित को नुकसान पहुँचाने वाला’ बताते हुए सीबीआई जाँच के आदेश दिए। आरोप है कि कश्मीर में प्रदेश के दो बड़े राजनीतिक दलों को करोड़ों की जमीन तय मूल्य से 85 प्रतिशत तक के कम मूल्य पर दी गई। 

जम्मू कश्मीर के इतिहास में 25,000 करोड़ रुपए के सबसे बड़े घोटाले के तौर पर देखे जा रहे इस एक्ट को सिरे से खारिज कर दिया गया और हाई कोर्ट ने इसकी सीबीआई जाँच के आदेश दे दिए थे। सियासी कद्दावरों और ब्यूरोक्रेटों को सीधे तौर पर फायदा पहुँचाने के लिए बनाई गई इस खुराफाती स्कीम के बारे में सब कुछ जानिए।

क्या है ऐतिहासिक भूमि घोटाला?

इस स्कीम का आधिकारिक नाम जम्मू और कश्मीर राज्य भूमि एक्ट 2001 था, जिसे ‘रोशनी स्कीम’ के नाम से भी जाना गया। इसके तहत राज्य सरकार ने मामूली कीमतें तय कर उन लोगों को उन ज़मीनों पर स्थाई कब्जा देने की बात कही, जिन्होंने सरकारी ज़मीन पर अतिक्रमण कर रखा था। यानी सरकारी जमीनों पर गैर कानूनी कब्जों को कानूनी तौर पर मालिकाना हक देने की कवायद की गई।

तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला सरकार द्वारा 2001 में लाई गई इस स्कीम के तहत 1990 से हुए अतिक्रमणों को इस एक्ट के दायरे में कट ऑफ सेट किया गया था। सरकार का कहना था कि इसका सीधा फायदा उन किसानों को मिलेगा, जो सरकारी जमीन पर कई सालों से खेती कर रहे है। लेकिन नेताओं ने जमीनों पर कब्जे जमाने का काम शुरू कर दिया। वर्ष 2005 में तब की मुफ्ती सरकार ने 2004 के कट ऑफ में छूट दी। उसके बाद गुलाम नबी आजाद ने भी कट ऑफ ईयर को वर्ष 2007 तक के लिए सीमित कर दिया।

इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस राजेश बिंदल की खंडपीठ ने सीबीआई डायरेक्टर को इसकी जाँच के लिए एसपी रैंक के पुलिस अफसरों से कम की टीम नहीं बनाने को कहा था और गहराई से जाँच के बाद मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया। रोशनी ऐक्ट के तहत तत्कालीन राज्य सरकार का लक्ष्य 20 लाख कनाल सरकारी जमीन अवैध कब्जेदारों के हाथों में सौंपना था, जिसकी एवज में सरकार बाजार भाव से पैसे लेकर 25,000 करोड़ रुपए की कमाई करती।

रोशनी ऐक्ट सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए बनाया गया था। इसके बदले उनसे एक रकम ली जाती थी, जो सरकार तय करती थी। 2001 में फारूक अब्दुल्ला सरकार ने जब ये कानून लागू किया था, तब सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वालों को मालिकाना हक देने के लिए 1990 को कट ऑफ वर्ष निर्धारित किया गया था। लेकिन, उसके बाद की हर सरकारों ने इस कट ऑफ साल को बढ़ाना शुरू कर दिया, जिसकी आड़ में सरकारी जमीन की बंदरबाँट की आशंका जताई जा रही है। कोर्ट ने कहा था कि मुफ्ती मोहम्मद सईद (2004) और गुलाम नबी आजाद (2007) की सरकारों ने इस कानून में और संशोधन किए ताकि गैर-कानूनी रूप से जमीन हथियाने वालों को फायदा पहुँचाई जा सके।

जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट ने लगाई थी फटकार

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकारियों और सतर्कता अधिकारियों को ‘लूट की’ इस नीति के प्रति आँखें मूँदकर अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कोताही बरतने के लिए जमकर लताड़ लगाई। अदालत ने सरकारी जमीन पर गैर-कानूनी कब्जा करने वालों को लेकर कहा कि इन लुटेरों की सत्ता में इतनी गहरी पैठ रही है कि यह अपने फायदे के लिए कानून भी बनवा सकते थे। 

अदालत ने यह भी आशंका जताई कि जिस तरह से जमीन के ये लुटेरे प्रभावी रहे हैं, उससे लगता है कि उन्होंने नीति निर्धारण से लेकर उसके लागू करवाने तक में हर स्तर पर भूमिका निभाई है। अदालत की ऐसी टिप्पणी उन राजनेताओं के लिए भी सख्त संकेत हैं, जिनके कार्यकाल में ऐसे कानून बनाए गए हैं। अदालत ने यहाँ तक टिप्पणी की कि उन्होंने अब तक ऐसी आपराधिक गतिविधि नहीं देखी है, जिसमें सरकार ने राष्ट्रीय और जनता के हित को ताक पर रखकर कोई कानून बनाया हो और जनता के खजाने और पर्यावरण को होने वाले नुकसान का कोई आँकलन भी नहीं किया गया हो।

कितनी जमीन पर अवैध कब्जे?

जम्मू-कश्मीर में लाखों एकड़ सरकारी जमीन पर नेताओं, पुलिस, प्रशासन और रेवेन्यू डिपार्टमेंट के अफसरों का कब्जा था। इस एक्ट के जरिए ही करीब ढाई लाख एकड़ जमीन पर कब्जे को कानूनी रूप दे दिया गया। करोड़ों रुपए की ये जमीनें नाम मात्र की कीमतों पर दी गई थीं। शुरुआती जाँच में पता चला है कि राज्य के कई पूर्व मंत्रियों ने खुद के साथ रिश्तेदारों के नाम पर भी कई एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा किया था।

क्यों मिला ‘रोशनी’ नाम और कैसे हुआ ‘अंधेर’?

अब्दुल्ला सरकार ने इस एक्ट को बनाते समय कहा कि जमीनों के कब्ज़ों को कानूनी किए जाने से जो फंड जुटेगा, उससे राज्य में पावर प्रोजेक्टों का काम किया जाएगा, इसलिए इस एक्ट का नाम ‘रोशनी’ रखा गया, जो मार्च 2002 से लागू हुआ। 1 एकड़ में 8 कनाल होते हैं और इस लिहाज़ से ढाई लाख एकड़ से ज्यादा अवैध कब्जे वाली जमीन को हस्तांतरित करने की योजना बनाई गई।

‘अंधेर’ ये था कि ज़मीन को मार्केट वैल्यू के सिर्फ 20 फीसदी दर पर सरकार ने कब्जेदारों को सौंपा। यानी कुल मिलाकर इससे 25 हज़ार करोड़ रुपए का घोटाला होने की बात सामने आई। अंधेर ये भी रहा कि अब्दुल्ला सरकार के बाद की सरकारों ने भी इसका फायदा उठाया। 2005 में सत्तारूढ़ मुफ्ती सरकार ने कट ऑफ को 2004 तक बढ़ा दिया था और फिर गुलाम नबी आजाद सरकार ने 2007 तक।

किसे मिलता रहा नाजायज़ फायदा?

इस विवादास्पद रोशनी एक्ट से किस किसको फायदा हुआ? इस बारे में आई रिपोर्ट्स में कहा गया कि ‘स्थानीय स्तरों पर जो भी प्रभावशाली था या प्रभावशालियों के संपर्क में था’, हर उस व्यक्ति को फायदा पहुँचा। मंत्रियों, कारोबारियों, नौकरशाहों और इन सबके रिश्तेदारों या करीबियों को ज़मीनें कौड़ियों के भाव मिलीं। हसीब द्रबू, मेहबूब बेग, मुश्ताक अहमद चाया, कृशन अमला, खुर्शीद अहमद गनी और तनवीर जहान जैसे प्रभावशाली नाम इस लिस्ट में सामने आ चुके हैं।

इस घोटाले की गहराई की अंदाजा इस बात से लगाइए कि श्रीनगर शहर के बीचों बीच ‘खिदमत ट्रस्ट’ के नाम से कॉन्ग्रेस के पास कीमती जमीन का मालिकाना हक पहुँचा, तो नेशनल कॉन्फ्रेंस का भव्य मुख्यालय तक ऐसी ही ज़मीन पर बना हुआ है, जो इस भूमि घोटाले से तकरीबन मुफ्त के दाम ​हथियाई गई।

एक लाख हेक्टेयर जमीन बाँट दी

बता दें कि जम्मू-कश्मीर के विवादित रोशनी एक्ट के तहत 20.55 लाख कनाल (1,02,750 हेक्टेयर) सरकारी जमीन लोगों को औने-पौने दाम में बाँट दी गई थी। इसमें से मात्र 15.58 प्रतिशत जमीन को ही मालिकाना हक के लिए मंजूरी दी गई। योजना का उद्देश्य था कि जमीन के आवंटन से प्राप्त होने वाली राशि का इस्तेमाल राज्य में बिजली ढाँचे को सुधारने में किया जाएगा। इस एक्ट के तहत रसूखदारों ने अपने तथा अपने रिश्तेदारों के नाम जमीन आवंटित करा ली।

एक्ट निरस्त होने का मतलब क्या है?

जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक की अगुवाई वाली राज्य प्रशासनिक परिषद यानी SAC ने 2018 में रोशनी एक्ट को निरस्त किया, तो इसका शुरुआती मतलब यही था कि इस स्कीम में जो आवेदन या प्रक्रियाएँ पेंडिंग थीं, उन्हीं को निरस्त माना जाए। लेकिन, बाद में इसे लेकर हलचल बढ़ी और हाई कोर्ट ने इसे गैरकानूनी, अन्यायपूर्ण, असंवैधानिक और असंगत करार दे दिया।

हाई कोर्ट ने जब इसे सिरे से खारिज किया तो इस एक्ट की शुरुआत से हुई तमाम प्रक्रियाएँ और आवंटन गैर कानूनी हो गए। हाल में, जस्टिस गीता मित्तल व राजेश बिंदल की हाई कोर्ट बेंच ने सीबीआई जाँच के आदेश देकर यह भी कहा कि हर आठ हफ्ते में केस की जाँच के स्टेटस की रिपोर्ट दी जाती रहे।

‘रोशनी’ करा सकती है जम्मू-कश्मीर के ‘राजघरानों’ में ‘अंधेरा’, गुपकार से नहीं होगा बचाव

सुरक्षा एवं राजनीतिक विश्लेषक ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) के मुताबिक महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला और कॉन्ग्रेस पार्टी को आखिर ‘गुपकार’ समझौता करने के लिए साथ आना पड़ा। दरअसल, ये लोग खुद को रोशनी एक्ट के घोटाले से बचाने के लिए ‘गुपकार’ बैठकें कर रहे हैं। इनका मकसद है कि देश-दुनिया का ध्यान ‘रोशनी’ जैसे बड़े घोटाले से हट कर गुपकार पर आ जाए।

ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता बताते हैं कि कई जगह की जमीन तो अब दूसरे व तीसरे व्यक्ति को बेची जा चुकी है। पावर अटॉर्नी का जबरदस्त खेल चला है। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने जम्मू और सांबा जिलों में जमीन हड़पने के मामलों की जाँच शुरू कर दी है। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से ही इन नेताओं के चेहरे उतरे हुए थे। अब रही सही कसर ‘रोशनी’ एक्ट की जाँच ने पूरी कर दी।

जिन लोगों ने रोशनी एक्ट की आड़ लेकर करोड़ों रुपए की जमीनों पर कब्जे कराए हैं, वही लोग अब ‘गुपकार’ समझौते के जरिए देश दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाह रहे हैं। हालाँकि वे इसमें कामयाब नहीं होंगे, क्योंकि सीबीआई जब अपनी चार्जशीट दाखिल करेगी तो उस वक्त इन नेताओं के पास कोई जवाब नहीं होगा।

जम्मू-कश्मीर के राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव पहले ही कह चुके हैं कि एक जनवरी 2001 के आधार पर सरकारी जमीन का ब्योरा एकत्र कर उसे वेबसाइट पर प्रदर्शित करेंगे। कौन सी जमीन पर किसका कब्जा है, इस बाबत सभी अवैध कब्जा धारकों के नाम सार्वजनिक करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।

अब नेताओं और उनके रिश्तेदारों के अलावा उन नौकरशाहों को भी पसीना आ रहा है, जिन्होंने जमीन पर कब्जा कराने में मदद की थी। सांबा जिले में राजस्व अधिकारियों ने रोशनी एक्ट के प्रावधानों का जान-बूझकर उल्लंघन कर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कराया है।

बता दें कि यही वो गुपकार गैंग है, जिन्होंने अपने शासनकाल के दौरान जम्मू की डोगरा संस्कृति को खत्म करने का भरसक प्रयास किया है। साठ साल के शासन में इन लोगों ने सिलसिलेवार तरीके से गौरवशाली संस्कृति पर प्रहार किए हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी भी इसके लिए बराबर की जिम्मेदार है। यही वजह है कि अब जम्मू-कश्मीर में उसका अपना कोई वजूद नहीं रहा। 

पिछले दिनों श्रीनगर में गुपकार समझौता हुआ है। यह समझौता केवल इसी बात को लेकर हुआ है कि अब रोशनी एक्ट घोटाले से खुद को कैसे बचाएँ। इन तीनों दलों के नेताओं ने थोक के भाव में रोशनी एक्ट का फायदा उठाया था। अनिल गुप्ता का कहना है कि अब उन्हें यह डर सताने लगा है कि जब अखबारों में उनके नाम सार्वजनिक होंगे तो जनता के बीच उनका नकाब उतर जाएगा।

इसी के चलते उन्होंने आपस में गुपकार समझौता कर लिया। इसमें उन्होंने अनुच्छेद 370 को दोबारा से लाने की माँग दोहराई है, जबकि हकीकत यह है कि वे रोशनी एक्ट से खुद को कैसे बचाएँ, लोगों तक किसी तरह इसकी सच्चाई न पहुँचे, इस बाबत रणनीति बना रहे हैं।

महबूबा मुफ्ती, नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला और कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता यह बात अच्छे से जानते हैं कि बिना साथ आए वे रोशनी एक्ट पर लोगों को गुमराह नहीं कर सकेंगे। इसके लिए मिलकर रणनीति बनानी जरूरी है। हालाँकि अब इन तीनों दलों के नेताओं की पोल खुलनी तय है। जनता समझ चुकी है कि रोशनी एक्ट में क्या कुछ हुआ है। जल्द ही इनके चेहरे का नकाब उतरेगा और इनका असली चेहरा लोगों के सामने आएगा।                                                            (साभार एवं एजेंसीज इनपुट्स सहित)

गुपकार गैंग ने मांगी चीन से मदद ; नगरौटा में मारे गए आतंकियों से मिले हथियारों पर लिखा है मेड इन चाइना

मारे गए आतंकवादियों से बरामद चाइना निर्मित हथियारों का जखीरा 
जम्मू-कश्मीर में हाल ही में एक नया गठबंधन बना है- गुपकार गठबंधन। इस गठबंधन में फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती की पार्टी समेत कश्मीर के कई दल शामिल हैं। गुपकार का मुख्य एजेंडा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35-A बहाली है। गठबंधन के नेताओं का कहना है कि वो इस बहाली के लिए चीन से भी मदद लेने को तैयार हैं। हैरानी की बात यह है कि गुपकार गैंग ने पिछले हफ्ते ही चीन से मदद मांगी और आज, 19 नवंबर को नगरौटा में मारे गए आतंकियों के पास से जो हथियार मिले हैं उन पर ‘मेड इन चाइना’ लिखा है।
जब से गुपकार गैंग नज़रबंदी से मुक्त हुआ है, जम्मू-कश्मीर में अराजकता का माहौल बनाने का पुनः प्रयास किया जा रहा है। केंद्र सरकार को इनकी और इनके समर्थकों की भी हर गतिविधि पर गिद्द की नज़र रखनी होगी। ये लोग अपनी तिजोरी की खातिर कुछ भी कर सकते हैं। इन्हें देश से अधिक अपनी तिजोरी और रोटी की चिंता है। ये लोग अनुच्छेद 370 की आड़ में अपनी तिजोरियां भर रहे थे। 

चीन में बने हथियारों से भारत में तबाही की थी साजिश

जम्मू कश्मीर के नगरौटा में गुरुवार सुबह सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में चार आतंकवादी मारे गए। मारे गए चारों आतंकी पाकिस्तानी थे। चारों आतंकी जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक ट्रक में जा रहे थे। नगरोटा के पास एक टोल प्लाजा पर रोकने पर आतंकवादियों ने पुलिस पार्टी पर ग्रेनेड से हमला कर दिया। जिसके बाद मुठभेड़ में चारों आतंकी मारे गए। मारे गए आतंकवादियों के पास से आरडीएक्स, एके-56 राइफल, पिस्टल, ग्रेनेड, मोबाइल सेल, मैगजीन और अन्य हथियार भी बरामद हुए हैं। इन हथियारों पर ‘मेड इन चाइना’ लिखा हुआ है। चीन के इतने हथियार मिलने पर संविधान की दुहाई देने वाले समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्ष क्यों चुप्पी साधे हुए हैं, इसी से सम्बंधित लोग ट्विटर पर प्रश्न भी कर रहे हैं। ये देश भक्ति का चोला ओढ़े बहुरूपियों पर सख्ती से निपटने की मांग भी हो रही है :-

मुठभेड़ के बाद एक पुलिस अधिकारी का कहना था कि ऐसा पहली बार सामने आया है कि एक-एक आतंकवादी के पास चार-चार एके-47 हथियार थे। इसके अलावा उनके पास से तीन पिस्टल, सैटेलाइट फोन, कम्पास और अन्य उपकरण बरामद हुए हैं। अधिकारी ने आशंका जताई कि राज्य में डीडीसी के चुनाव होने हैं, ऐसे में आतंकवादी चुनाव में बाधा पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन आतंकवादियों के मंसूबों को ध्वस्त करने के लिए सुरक्षाबल पूरी तरह से मुस्तैद हैं।

जम्मू जोन के आईजी मुकेश सिंह ने कहा है कि ट्रक चालक फरार है, हम उसकी तलाश कर रहे हैं। यह संभव है कि वे एक बड़े हमले की योजना बना रहे थे। इस तरह की जब्ती अभूतपूर्व है। यह संभव है कि वे डीडीसी चुनाव को निशाना बना रहे थे। हालांकि, हम जांच कर रहे हैं।


शेख अब्दुल्ला के बनाए लकड़ी तस्करों के लिए कानून में फॅंस गए बेटे फारूक अब्दुल्ला

Related image
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को सितम्बर 16 को सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत हिरासत में लिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शेख अब्दुल्ला को उनके आवास पर ही हिरासत में रखा गया है और उसे ही अस्थायी जेल बना दिया गया है। पीएसए के तहत किसी भी व्यक्ति को बिना किसी मुकदमे के दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है।
दिलचस्प यह है कि पीएसए फारूक के पिता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला ने ही लागू किया था। लागू होने के बाद से ही यह कानून विवादों में रहा है। बताया जाता है कि यह कानून 1978 में शेख अब्दुल्ला ने लकड़ी तस्करों पर नकेल कसने के लिए बनाया था। आतंकवाद के दौर में कश्मीर में इस कानून का जमकर इस्तेमाल किया गया।
शेख अब्दुल्ला राजनीतिक पार्टी ‘ऑल जम्मू एन्ड कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस’ के संस्थापक थे। इस पार्टी को अब ‘जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC)’ के नाम से जाना जाता है। शेख अब्दुल्ला के बेटे फ़ारूक़ अब्दुल्ला और पोते उमर अब्दुल्ला भी राज्य के मुख्यमंत्री रहे।
वैसे, श्रीनगर से लोकसभा सांसद फारूक अब्दुल्ला 5 अगस्त से घर में नजरबंद हैं। उनके बेटे उमर भी उसी समय से हिरासत में हैं। इसी दिन कश्मीर को विशेष अधिकार देने वाले संविधान का अनुच्छेद 370 निरस्त किया गया था। हाल में, नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसदों को फारूक और उमर अब्दुल्ला से मिलने की अनुमति दी गई थी, लेकिन इस प्रतिबंध के साथ कि वे मुलाकात के बाद मीडिया के साथ बातचीत नहीं कर सकते।
अब फारूक अब्दुल्ला को जिस पीएसए एक्ट तहत हिरासत में लिया गया है उसमें किसी व्यक्ति को बिना मुक़दमा चलाए 2 वर्षों तक हिरासत में रखा जा सकता है। अप्रैल 8, 1978 को जम्मू कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट को राज्यपाल की मंजूरी मिली थी। इन क़ानून को मुख्यतः जम्मू-कश्मीर में लकड़ी तस्करी रोकने के लिए लाया गया था। उस दौरान शेख अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री थे। इसके तहत 2 साल तक के लिए 16 वर्ष से अधिक उम्र के किसी भी व्यक्ति को बिना ट्रायल गिरफ़्तार किया जा सकता है।
जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा कई बार अलगाववादियों के ख़िलाफ़ पीएसए का इस्तेमाल किया गया। जुलाई 2016 में आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद कई लोगों ने घाटी में हिंसा भड़काने की कोशिश की थी। उस दौरान ऐसे लोगों को पीएसए एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया था। अगस्त 2018 में इस एक्ट में संशोधन कर के राज्य के बाहर के नागरिकों को भी इसके दायरे में लाया गया। इसके तहत ऐसे लोगों को गिरफ़्तार किया जाता है जो राज्य की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कार्य कर रहे हैं या फिर सार्वजनिक शांति को भंग करते हैं।

पीएसए के तहत हिरासत में लेने का आदेश डिविजनल कमिश्नर या डीएम दे सकते हैं। उन्हें इसके लिए सार्वजनिक रूप से कारण बताने की भी ज़रूरत नहीं है। शेख अब्दुल्ला सरकार द्वारा बनाए गए इस क़ानून की जद में आज उनके बेटे ही आ गए हैं।
मई 1946 में शेख अब्दुल्ला कश्मीर के तत्कालीन राजा हरि सिंह के ख़िलाफ़ ‘क्विट कश्मीर’ आंदोलन भी चला चुके हैं। उन पर ‘संविधान सभा’ के चुनाव में धाँधली करने का भी आरोप है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव भी कह चुके हैं कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के लिए नेताओं को गिरफ़्तार पहले भी किया जाता रहा है। उन्होंने शेख अब्दुल्ला का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें भी 1953 में कई सालों के लिए गिरफ़्तार किया गया था।

धारा-370 और 35 A के हटने से बेचैनी क्यों?

कश्मीर में सुरक्षा इंतजामों को लेकर न्यूज चैनलों पर बहस क्यों?
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
सुरक्षा की दृष्टि से सरकार ने कश्मीर में जो इंतजाम किए हैं उन पर न्यूज चैनलों पर लगातार बहस हो रही है।

इन चर्चाओं में आतंकियों के समर्थक भी भाग ले रहे हैं जो हमारे सुरक्षा बलों की तैनाती पर एतराज कर रहे हैं। ऐसी चर्चाओं से आतंकियों के समर्थकों को सरकार के खिलाफ जहर उगलने का अवसर मिल रहा है। सब जानते हैं कि कश्मीर में पाकिस्तान की दखलंदाजी है। हाल ही में जो घातक हथियार बरामद किए है उनसे पता चलता है कि आतंकी बड़ी कार्यवाही करने वाले हैं। ऐसे में यदि सुरक्षा इंतजाम किए जाते हैं तो एतराज क्यों? क्या विदेशी आतंकियों से कश्मीर को बचाने का हक सरकार और सुरक्षा बलों को नहीं है? यदि इन सुरक्षा इंतजाम पर भी चैनलों पर बहस होगी तो किसी सरकार का काम करना मुश्किल हो जाएगा। वैसे भी आतंक से ग्रस्त कश्मीर के सुरक्षा इंतजाम गुप्त ही रहने चाहिए। सरकार कितने सुरक्षा बल तैनात कर रही है इससे कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। न्यूज चैनल वालों को कम से कम कश्मीर से लाइव प्रसारण नहीं करना चाहिए।
महबूबा की घबराहट:
कश्मीर की पूर्व सीएम और पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती इन दिनों कुछ ज्यादा ही घबराई हुई हैं। दो अगस्त को भी अलगाववादी नेता सज्जाद लोन को साथ लेकर राज्यपाल सत्यपाल मलिक से मुलाकात की। यह वो ही महबूबा है जिन्होंने कहा था कि अनुच्छेद 370 और 35-ए के साथ छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर में तिरंग को कांधा देने वाला कोई नहीं मिलेगा। सवाल उठता है कि महबूबा की वो दबंगता कहां गई? अब अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती से ही महबूबा इतनी घबराह गई हैं? असल में अब महबूबा जैसे नेताओं की दुकान कश्मीर से उखड़ चुकी है। महबूबा हों या फारुख अब्दुल्ला। ऐसे नेताओं की पोल कश्मीर के लोगों के सामने खुल चुकी है। रोज रोज के आतंक से कश्मीर के आम लोग भी परेशान हो गए हैं। कश्मीर के लोग अब अमन और सुकून चाहते हैं। विदेशी पैसा बंद हो जाने से पत्थरबाज भी खामोश है।

अब्दुल्ला परिवार और महबूबा मुफ़्ती याद करों हिन्दुओं के पलायन और उनकी माँ-बहनों के होते बलात्कार का दर्द 
कश्मीर में ऐसा डर का माहौल मैने पहले कभी नही देखा ..कहना है पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का..
30-31 साल की उम्र रही होगी महबूबा मुफ्ती की
जब 1989/90 में घाटी की सभी मस्जिदों से मूल निवासी हिन्दुओं को कश्मीर छोड़कर जाने के ऐलान हो रहे थे।
किसके कहने पर मस्जिदों से ऐलान हो रहे थे? कौन करवा रहा था, मस्जिदों से ऐलान? किसके इशारे पर मस्जिदों का दुरूपयोग हो रहा था? 
जब रातोंरात हिन्दुओं के घरों पर क्रास के निशान लगा दिए गये थे । 
जब हिन्दुओं को अपनी जवान बेटियाँ वहीं छोड़कर जाने के फरमान सुनाये गये थे।   
मैडम मेहबूबा जी ... 30 साल की उम्र इतनी कम नही होती की आज 60 की उम्र में आपको याद भी नही कि किस डर के माहौल में हिन्दुओं ने अपना घर छोड़ा होगा या अपनो का कत्लोग़ारत होते या अपनी आँखों के सामने अपनी माँ और बहनों का बलात्कार होते देखा होगा ! ! ये खौफ का नंगा नाच आपकी उस कश्मीरियत ने ही किया था जिसे बचाने की दुहाई देते हुए आप हाथ जोड़ रहीं हैं।  
हो सकता है उस समय आप अपनी बहन का फर्जी अपहरण करवाकर.. भारत के केन्द्रीय गृहमंत्री रहे अपने पिता मुफ़्ती मोहम्मद सईद के साथ मिलकर अपने खास आतंकवादियों को छुड़वाने के ड्रामे में व्यस्त हो इसलिये आपको घाटी के हिन्दुओं का खौफ नही दिखा होगा। कंधार विमान अपहरण में तो निर्दोषों को बचाने सभी पार्टियों के समर्थन उपरांत आतंकवादियों को छोड़ा गया था, जिसका आज तक समस्त भाजपा विरोधी रोना-रोते हैं, लेकिन डॉ रुबैया मुफ़्ती के फर्जी अपहरण के कारण छोड़े गए आतंकवादियों पर सब चुप्पी साधे हुए हैं। 
आज इन्हीं पीड़ित परिवारों को अब्दुल्ला खानदान और महबूबा मुफ्ती के चेहरे पर पसरा खौफ उतना ही आकर्षक लग रहा है जितनी आकर्षक मोदीजी की कुटिल मुस्कान लगती है।  
2 अगस्त को जम्मू कश्मीर सरकार ने अमरनाथ यात्रियों और कश्मीर घूमने आए पर्यटकों को कश्मीर छोडऩे का फरमान जारी किया तो तनाव पूर्ण हालात हो गए लेकिन तीन अगस्त को घाटी और जम्मू में हालात सामान्य दिखे। राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने एक बार फिर दोहराया है कि सुरक्षा की दृष्टि से अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। उन्होंने अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की। राज्यपाल ने साफ कहा कि कश्मीर में कोई बड़ी घटना नहीं होने जा रही। हालांकि तीन अगस्त को पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने भी राज्यपाल से मुलाकात की। उमर भी जानना चाहते थे, कि आखिर कश्मीर में क्या हो रहा है? राजपाल ने उमर से भी कहा कि किसी को भी बघराने की जरुरत नहीं है। सारे कदम सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाए गए हैं।
कश्मीर का जिक्र आए और धारा 370 और 35 ए की बात ना हो ऐसा हो नहीं सकता, इसको लेकर अक्सर ही विरोध के सुर उठते रहे हैं, दरअसल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष स्वायत्तता दी गई है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 एक ऐसा लेख है जो जम्मू और कश्मीर राज्य को स्वायत्तता का दर्जा देता है।
वहीं 35 A की बात करें तो भारतीय संविधान का 35 ए अनुच्छेद एक अनुच्छेद है जो जम्मू और कश्मीर राज्य विधानमण्डल को 'स्थायी निवासी' परिभाषित करने तथा उन नागरिकों को विशेषाधिकार प्रदान करने का अधिकार देता है। यह भारतीय संविधान में जम्मू और कश्मीर सरकार की सहमति से राष्ट्रपति के आदेश पर जोड़ा गया, जो कि भारत के राष्ट्रपति द्वारा 14 मई 1954 को जारी किया गया था। यह अनुच्छेद 370 के खण्ड (1) में उल्लेखित है।

Article 370 अक्सर ही जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाये जाने की मांग की जाती रही है जबकि कश्मीर के नेता और स्थानीय निवासी ऐसी किसी भी संभावना मात्र का पुरजोर विरोध करते आ रहे हैं।
धारा 370 के प्रावधानों पर एक नजर-
धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित क़ानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का अनुमोदन चाहिये।

इसी विशेष दर्ज़े के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती।
इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्ख़ास्त करने का अधिकार नहीं है।
1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता।
इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते।
भारतीय संविधान की धारा 360 जिसके अन्तर्गत देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती।
धारा 370 के तहत कुछ विशेष अधिकार कश्मीर की जनता को मिले हुए हैं-
कश्मीर में पंचायत को अधिकार प्राप्त नहीं है।
कश्मीर में अल्पसंख्यकों [हिन्दू-सिख] को 16% आरक्षण नहीं मिलता।
धारा 370 की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते हैं।
धारा 370 की वजह से ही कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता मिल जाती है।
धारा 370 की वजह से कश्मीर में आरटीआई (RTI) और सीएजी (CAG) जैसे कानून लागू नहीं होते है।
जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है।
जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है।
जम्मू - कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है।
भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश जम्मू-कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं।
भारत की संसद को जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यन्त सीमित क्षेत्र में कानून बना सकती है।
जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जायेगी। इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी।

अनुच्छेद 35A  के क्या हैं मायने
35A से जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए स्थायी नागरिकता के नियम और नागरिकों के अधिकार तय होते हैं
14 मई 1954 के पहले जो कश्मीर में बस गए थे वही स्थायी निवासी माना जाएगा
वह व्यक्ति जो जम्मू और कश्मीर का स्थायी निवासी नहीं है, राज्य में सम्पत्ति नहीं खरीद सकता।
वह व्यक्ति जो जम्मू और कश्मीर का स्थायी निवासी नहीं है, जम्मू और कश्मीर सरकार की नौकरियों के लिये आवेदन नहीं कर सकता।

वह व्यक्ति जो जम्मू और कश्मीर का स्थायी निवासी नहीं है, जम्मू और कश्मीर सरकार के विश्विद्यालयों में दाखिला नहीं ले सकता, न ही राज्य सरकार द्वारा कोई वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकता है।
हालांकि धारा 370 में समय के साथ-साथ कई बदलाव भी किए गए हैं। 1965 तक वहां राज्यपाल और मुख्यमंत्री नहीं होता था। उनकी जगह सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री हुआ करता था, जिसे बाद में बदला गया।
इसके अलावा पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय नागरिक के जाने पर उसे अपने साथ पहचान-पत्र रखना जरूरी होता था, लेकिन बाद में विरोध के बाद इस प्रावधान को हटा दिया गया था।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस संवैधानिक प्रावधान के पूरी तरह ख़िलाफ़ थे। उन्होंने कहा था कि इससे भारत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहा है। हाल ही में घाटी में इस आशंका की खबरें गरमा रही हैं कि शायद सरकार राज्य से इसे हटा सकती है और इसको लेकर पीडीपी नेता और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फ़ारूक़ और उमर अब्दुल्ला सभी एकजुट होकर इस हालात पर चिंता जताते दिख रहे हैं।
जम्मू कश्मीर को लेकर सरगर्मियां तेज हैं और सरकार ने राज्य में जारी अमरनाथ यात्रा को लेकर अगस्त 2 को अमरनाथ यात्रियों को यहां से जाने संबधी एक एडवायजरी जारी की थी, बताया जा रहा है कि यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए ये कदम उठाया गया है।
इस मसले पर राज्य की सभी राजनैतिक पार्टियों में खासी हलचल है और सबको लग रहा है कि घाटी में कुछ बड़ा होने वाला है, इसके मद्देनजर पीडीपी और नेशनल कांफ्रेस के नेताओं ने गवर्नर से मुलाकात की।
वहीं पीडीपी की मुखिया महबूबा मुफ्ती ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में अतिरिक्त सुरक्षाकर्मियों के भेजे जाने से लोगों को लगता है कि केंद्र सरकार राज्य को मिले विशेषाथिकारों पर हमला करने जा रही है।
अवलोकन करें:-

NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
भूली बिसरी यादें : इतिहास के धूमिल पृष्ठों से भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी...

About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार सेवा निर्वित उपरान्त एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते सितम्बर 2014 में आमुख लेख शीर्.....

About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 80 के दशक में स्वतन्त्र पत्रकारिता करते दिल्ली के मुस्लिम बहुत क्षेत्र के एक जाने-माने ...

About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार एक तरफ मोदी सरकार कश्मीर से आतंकवाद का जनाज़ा निकालने के लिए कमर कस, आतंकवादियों को चुन...


About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
पीडीपी प्रमुख और जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने आर्टिकल 35 A को लेकर एक ऐसा बयान दिया है जिससे व..... 
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
लोकसभा चुनाव 2019 के संकल्प पत्र (घोषणा पत्र) में भारतीय जनता पार्टी ने कश्मीर में धारा 370 हटाने की बात कही है। इस पर जम्...

महबूबा मुफ्ती ने कहा कि वैसे तो इस्लाम में हाथ जोड़ने की मनाही है। लेकिन वो पीएम मोदी से हाथ जोड़कर अपील करती हैं कि जम्मू-कश्मीर को जो संवैधानिक आजादी मिली है उसमें वो किसी तरह की छेड़छाड़ न करें। उन्होंने कहा कि मोदी जी आप बहुत बड़ा जनमत लेकर आए हैं। आप से अपील है कि आप हमारी खास पहचान को बरकरार रखें। जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा एडवाइजरी जारी किये जाने के बाद अफरातफरी का माहौल है। 
सैलानियों को कश्मीर से निकालने के लिए अतिरिक्त उड़ान​