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दिल्ली : बंगाली मार्केट और ITO की तकिया बब्बर शाह मस्जिद को रेलवे का नोटिस, कहा- 15 दिन में खाली करो जमीन, नहीं तो होगा एक्शन

                                    दो मस्जिदों को रेलवे का नोटिस (फोटो साभार: आज तक)
दिल्ली की दो बड़ी मस्जिदों को रेलवे ने नोटिस भेजा है। इनमें से एक मस्जिद दिल्ली की बंगाली मार्केट में है। दूसरी आईटीओ की तकिया बब्बर शाह मस्जिद है। उत्तर रेलवे ने 15 दिन के भीतर दोनों मस्जिद के प्रशासन से अतिक्रमण हटाने को कहा है। ऐसा नहीं होने पर एक्शन लेने की चेतावनी दी है।

अगर रेलवे गंभीरता से रेलवे जमीन पर हुए अतिक्रमण को सख्ती से हटाए, रेलवे के पास बहुत भूमि होगी, जिसका रेलवे के विकास में प्रयोग हो सकता है।  

22 जुलाई 2023 को उत्तर रेलवे प्रशासन की तरफ जारी नोटिस में कहा गया है, “सर्व साधारण को सूचित किया जाता है कि रेलवे भूमि को अनाधिकृत रूप से अतिक्रमित किया गया है। आप लोग अनाधिकृत रूप से रेलवे की जमीन पर बने अनाधिकृत भवन/मंदिर/ मस्जिद/मजार को इस सूचना के 15 दिन के अंदर स्वेच्छा से हटा दें। अन्यथा रेलवे प्रशासन एक्शन लेगा। रेलवे अधिनियम के प्रावधान के तहत अनाधिकृत कब्जे को हटा दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में होने वाले नुकसान के लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे। रेलवे प्रशासन जिम्मेदार नहीं होगा।”

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार तकिया बब्बर शाह मस्जिद के बगल में स्थित एमसीडी के मलेरिया दफ्तर को भी खाली करने का नोटिस दिया गया है। यहाँ भी रेलवे का नोटिस चिपका दिया गया है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली वक्फ बोर्ड का कहना है कि इन मस्जिदों को जमीन 1945 में कानूनी तौर पर एग्रीमेंट के जरिए ट्रांसफर की गई थी।

इससे पहले इसी साल अप्रैल में भूमि और विकास कार्यालय (L&DO), नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) ने एक संयुक्त अभियान में बंगाली मार्केट की मस्जिद के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया था। इस कार्रवाई के दौरान एक दीवार हटाई गई थी। अधिकारियों ने बताया था कि कुछ महीने पहले अतिक्रमण कर कंक्रीट की यह दीवार खड़ी की गई थी। वहीं मस्जिद के अधिकारियों का कहना था कि कार्रवाई से पहले उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई थी।

वहीं 2 जुलाई 2023 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के भजनपुरा में एक सड़क को चौड़ा करने के लिए फुटपाथ पर बने दो धार्मिक स्थलों को हटाया गया था। लोक निर्माण विभाग (PWD) ने इस दौरान एक हनुमान मंदिर और एक दरगाह को हटाया था। अभियान के दौरान भारी संख्या में बलों की तैनाती की गई थी। साथ ही ड्रोन से पूरे इलाके की निगरानी हो रही थी।

गोंड रानी कमलापति के नाम पर होगा हबीबगंज रेलवे स्टेशन

                         रानी कमलापति (पहले हबीबगंज) रेलवे स्टेशन देश का पहला PPP मॉडल स्टेशन
जब से देश मोदी सरकार आयी है, तब से मुग़ल आक्रांताओं एवं वर्तमान छद्दम सेक्युलर नेताओं द्वारा देश के वास्तविक इतिहास को धूमिल कर जगहों के नाम रख दिए गए थे, अब उन्हें बदलने का काम चल रहा है, ताकि देशवासियों को उनके वास्तविक इतिहास से परिचित करवाया जा सके। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने मध्य प्रदेश स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति के नाम पर रखने का निर्णय लिया है। ये रेलवे स्टेशन अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है और इसका उद्घाटन 15 नवंबर, 2021 को खुद पीएम मोदी करेंगे। भारत सरकार ने 100 करोड़ रुपए की लागत से इस रेलवे स्टेशन का पुनर्विकास कर के इसे अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस बनाया है। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के दिन इसका उद्घाटन होगा, जिसे केंद्र सरकार ने ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए पत्र में कहा गया है कि 16वीं शताब्दी में भोपाल क्षेत्र गोंड शासकों के अधीन था। गोंड राजा सूरज सिंह शाह के बेटे निजाम शाह से रानी कमलापति का विवाह हुआ था। उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में बड़ी बहादुरी से आक्रांताओं का सामना किया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि उनकी स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए केंद्र सरकार ने ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के दिन स्टेशन के नामकरण का फैसला लिया है।

नाम बदलने का प्रस्ताव मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने ही केंद्र को भेजा था। राज्य सरकार के निवेदन पर ये निर्णय लिया गया। भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने भी यही माँग की थी। हबीबगंज का नाम हबीब मियाँ के नाम पर रखा गया था। इससे पहले इसके नाम शाहपुर था। कहा जाता है कि हबीब मियाँ ने 1979 में स्टेशन के लिए जमीन दी थी, जिस कारण उनके नाम पर इसे रखा गया था। आज के एमपी नगर का नाम तब गंज हुआ करता था।

हबीब और गंज को जोड़ कर इसे हबीबगंज बना दिया गया था। रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पर विश्व स्तरीय सुविधाएँ मिलेंगी। सार्वजनिक-निजी (PPP) साझेदारी के तहत ये देश का पहला मॉडल रेलवे स्टेशन है, जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट जैसी सुविधाएँ मिलेंगी। बिना किसी भीड़भाड़ के ट्रेन पर चढ़ने और आने वाले यात्रियों के लिए स्टेशन से बाहर निकलने की व्यवस्था है। एस्केलेटर और लिफ्ट के अलावा 700 यात्रियों की क्षमता वाला कॉनकोर भी है। यहाँ यात्री बैठ कर ट्रेन का इंतजार कर सकेंगे।

पूरे स्टेशन पर अलग-अलग डिस्प्ले बोर्ड के माध्यम से ट्रेनों की आवाजाही की ताज़ा जानकारी दी जाएगी। यात्रियों के मनोरंजन की व्यवस्था भी है। काउंटर भी हाईटेक है, जहाँ आसानी से टिकट मिल जाएगा। रेस्टॉरेंट्स भी होंगे। वेटिंग रूम, रिटायरिंग रूम, डॉरमेट्री और वीआईपी लाउंज भी है। सुरक्षा के लिए 159 सीसीटीवी कमरे हैं। ये सौर ऊर्जा से संचालित स्टेशन होगा। आग लगने जैसी दुर्घटना के समय यात्रियों को सुरक्षित निकालने की व्यवस्था भी है। यहाँ 70-80 ट्रेनों का हॉल्ट होता है।

 भोपाल से 50 किलोमीटर की दूरी पर ही गिन्नौर गढ़ नाम की एक रियासत थी, जहाँ की रानी कमलापति थीं। उनके पति निजाम शाह गौढ़ के राजा थे। रानी कमलापति की खूबसूरती को लेकर ‘ताल है तो भोपाल ताल और बाकी सब हैं तलैया। ‘रानी थी तो कमलापति और सब हैं गधाईयाँ…’ नामक कहावत काफी प्रचलित थी। निजाम शाह के भतीजे आलम शाह ने ही उन्हें खाने की दावत पर बुला आकर उनकी हत्या कर दी थी, क्योंकि वो उनके राज्य, संपत्ति और रानी की खूबसूरती से ईर्ष्या करता था।

उस समय बाड़ी नाम के राज्य पर आलम का शासन था। रानी कमलापति ने मोहम्मद नाम के एक व्यक्ति को हायर किया, जो पैसे लेकर लोगों की मदद करता था। उसे एक लाख रुपए देकर रानी ने आलम शाह से अपना बदला पूरा किया। आलम शाह मारा गया। हालाँकि, मोहम्मद को जब भोपाल का कुछ हिस्सा दे दिया गया था तो उसका रानी कमलापति के बेटे नवल शाह से युद्ध हुआ था। इस युद्ध में काफी खून बहा और नवल शाह को हार का सामना करना पड़ा।

पूर्व राज्यसभा सांसद 7 बार ट्रेन में चढ़े, 63 टिकट का पैसा माँगा : सरकारी खजाने को वामपंथी चपत

रेलवे, राज्यसभा
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
सियासत भी क्या सफ़ेदपोश लुटेरों की जमात है, जिन्हें जनता अपना सेवक समझ आगे-पीछे भागती है, फूलों की मालाएं पहनाती है, वह कितने बड़े लुटेरे हैं। सदस्य बनने पर संविधान की कसम खाते हैं, ईमानदारी से देश की सेवा करने की शपथ लेते हैं, लेकिन घोटाले कर देश को ही चूना लगाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। सदस्य न होने पर लुटेरों को पेंशन भी चाहिए। और सदस्य रहते जनसेवा के नाम पर की गयी लूट भी। वाह जनसेवा के नाम पर सफेदपोशी लुटेरों। यदि यही लूट किसी कर्मचारी अथवा अधिकारी ने की होती, क्या सरकार उसे सजा दिए बिना छोड़ती?
मुफ़्त रेल टिकटों की सुविधा की आड़ में कुछ सांसद एवं पूर्व सांसद किस तरह सरकारी पैसों की बर्बादी करते हैं, इसका उदाहरण CPI (M) के एक पूर्व राज्यसभा सांसद की करतूत से सामने आया है।
इस पूर्व राज्यसभा सदस्य ने जनवरी 2019 में 63 ट्रेन टिकट बुक की। लेकिन इनमें से केवल 7 ट्रेन टिकट का ही उन्होंने लाभ लिया। बावजूद इसके बाकी टिकट कैंसिल नहीं कारवाई। बाद में सभी 63 टिकट के रिम्बरस्मेंट यानी, बिल भुगतान की माँग की। इसके कारण रेल मंत्रालय को संसद सचिवालय द्वारा ₹1,46,920 का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा।
इस पूर्व वामपंथी सांसद का नाम सार्वजानिक नहीं किया गया है। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि वे पश्चिम बंगाल से सीपीआई (एम) के पूर्व राज्यसभा सदस्य थे।
दरअसल राज्यसभा सांसदों को और पूर्व राज्यसभा सांसदों को रेलवे में नि:शुल्क असीमित यात्रा की सुविधा मिलती है। इसके पूरा भार राज्यसभा सचिवालय को उठाना होता है।
संसद के प्रत्येक सदस्य को नियमानुसार पत्नी सहित AC-1 में मुफ़्त यात्रा की सुविधा उपलब्ध होती है। इसके अलावा, इनके साथ यात्रा करने वाले एक अटेंडेंट को भी सेकेंड क्लास AC कोच या एग्जीक्यूटिव क्लास में किसी भी समय पूरे भारत में मुफ्त टिकट अथवा पास प्राप्त है।
सीपीआई (एम) के इस पूर्व राज्यसभा सांसद ने जिन सात टिकटों का इस्तेमाल किया उसकी लागत केवल ₹22,085 है। लेकिन उन्होंने उन्होंने अन्य टिकट कैंसिल नहीं कराया जिसकी वजह से सरकारी खजाने पर ₹1,46,920 का अतिरिक्त भर पड़ा। साल 2019-20 में ऐसे टिकटों जिन पर यात्रा नहीं हुई, लेकिन वो कैंसिल भी नहीं कराए गए, रेलवे ने राज्यसभा सचिवालय को ₹7.8 करोड़ रुपए का बिल भेजा है। ये सभी टिकट माननीय राज्यसभा सांसदों के हैं।
इसी तरह एक वर्तमान राज्यसभा सांसद ने जितने टिकट बुक कराए, उनमें से सिर्फ़ 15% टिकटों पर ही यात्रा की। इस तरह उनके द्वारा बर्बाद किए गए 85% टिकटों का भुगतान अब राज्यसभा सचिवालय को करना है।
टिकट कैंसिल न करवाने पर खुद करना होता है भुगतान 
राज्यसभा सचिवालय को कई सांसदों और पूर्व सांसदों को कई टिकट बुक करने और अभी तक भुगतान की माँग नहीं करने के कई उदाहरण मिले हैं। लेकिन अब यदि राज्यसभा का कोई सदस्य ट्रेन का टिकट बुक करने के बाद यात्रा नहीं करता है, तो उसे खुद किराए का भुगतान करना होगा।
राज्यसभा के महासचिव दीपक वर्मा की ओर से सदस्यों को जारी परामर्श में दी गई जानकारी में यह स्पष्ट किया गया है कि वे यात्रा नहीं करने की स्थिति में ट्रेन बुकिंग को कैंसल करें और अगर ऐसा नहीं करते हैं तो किराया उनसे वसूला जाएगा।
परामर्श में कहा गया है कि रेल मंत्रालय ने भुगतान के दावे का जो ब्यौरा दिया है उसके मुताबिक कुछ सदस्यों ने एक ही दिन एक ही अथवा दूसरे स्टेशनों से जाने वाली कई ट्रेनों में टिकट बुक कराए। उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने राज्यसभा सचिवालय को निर्देश दिया था कि इस मुद्दे को उनके संज्ञान में लाया जाए।
फ़िलहाल राज्यसभा सचिवालय ने सांसदों के ये बिल भुगतान अदा करने से मना कर दिया है। राज्यसभा सचिवालय ने रेलवे से आग्रह किया है कि वो सिर्फ उन्हीं टिकटों का किराया वसूल करे, जिन पर सांसदों ने वास्तव में यात्रा भी की हो, लेकिन रेलवे नियमों का हवाला देते हुए इस बात पर क़ायम है कि जो टिकट कैंसिल नहीं कराए गए, उनका पैसा राज्यसभा सचिवालय को देना ही होगा।
इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि वर्तमान में रेलवे के पास अपनी ओर से आम नागरिक और सांसदों में भेद करने का कोई नियम नहीं है। सम्भव है कि रेलवे जल्द ही लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों द्वारा ट्रेन बुकिंग के बीच अंतर करने के लिए अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव करे।

श्रमिक एक्सप्रेस द्वारा केरल से झारखण्ड गए 1129 मजदूरों से वसूला गया किराया: कांग्रेस और CPM ने साधी चुप्पी

प्रवासी मजदूर ट्रेन किराया
प्रवासी मजदूरों को श्रमिक ट्रेन से पहुँचाया जा रहा घर
(फोटो साभार: The Week)
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
देश में इन दिनों प्रवासी मजदूरों से ट्रेन का किराया वलूसने के मुद्दे पर राजनीति गर्माई हुई है। प्रवासी मजदूरों से किराया वसूलने के मुद्दे पर चल रही राजनीति के बीच रेलवे ने साफ किया है कि उसने प्रवासी मजदूरों से कोई किराया नहीं वसूला है। इस संबंध में राज्य व केंद्र सरकार, रेल मंत्रालय के साथ मिलकर प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने जानकारी दी थी कि किराया भी प्रदेश सरकार वहन करेगी।
कई मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि अधिकांश राज्यों से राज्य सरकारों ने सरकारी फंड से प्रवासी मजदूरों के किराए का भुगतान किया है, जबकि महाराष्ट्र, केरल और राजस्थान की सरकार ने प्रवासी मजदूरों को उनके पैतृक राज्य पहुँचाने के लिए उनसे किराया वसूला है।
पीटीआई ने बताया कि महाराष्ट्र के राज्य मंत्री नितिन राउत ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर राज्य से जाने वाले प्रवासियों की यात्रा लागत वहन करने का आग्रह किया है। उन्होंने रविवार (मई 3, 2020) को रेल मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि प्रवासियों के परिवहन का खर्च रेलवे वहन करे।
कांग्रेस और इसकी समर्थक सरकारें ही वसूल रही किराया 
उल्लेखनीय है कि इन तीनों राज्यों- महाराष्ट्र, राजस्थान और केरल में से दो राज्यों में कांग्रेस सरकार में है। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है, जबकि महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी की सरकार है, जिसमें कांग्रेस सहयोगी पार्टी है। बता दें कि इससे पहले, यह कांग्रेस पार्टी ही थ, जिसने प्रवासी श्रमिकों के रेलवे टिकटों की लागत वहन करने का वादा किया था, जबकि इसकी अपनी राज्य सरकारें ही प्रवासियों से रेलवे किराए वसूल रही हैं।
सोमवार (मई 4, 2020) को कई विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस पार्टी द्वारा इस अफवाह को हवा दी गई कि रेलवे प्रवासी मजदूरों से किराया वसूल रहा है। इतना ही नहीं, कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष ने तो यहाँ तक कह दिया कि उनकी पार्टी श्रमिकों का रेलवे किराया वहन करेगी। वो किराया, जो पहले से ही मुफ्त है। वहीं महाराष्ट्र के मुंबई में तो उद्धव सरकार प्रवासी मजदूरों से मेडिकल सर्टिफिकेट के 200 रुपए वसूल रही है।
केंद्र सरकार ने मजदूरों को वापस घर ले जाने के लिए स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था की है। भाजपा ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार उनके किराए का 85% वहन करेगी और बाकी राज्य सरकार को वहन करना है। श्रमिक एक्सप्रेस से केरल से झारखण्ड लौटे मजदूरों ने बताया कि उनसे 875 रुपए बतौर किराया वसूले गए। मजदूरों ने बताया कि उनके रूम पर जाकर किराया वसूला गया। ये मजदूर केरल से गिरिडीह पहुँचे थे।

भारतीय रेलवे ने अपनी नोटिस में स्पष्ट कहा है कि रेलवे टिकट नहीं बेच रही है और कोई भी आकर टिकट ख़रीद नहीं सकता। हर राज्य द्वारा दूसरे राज्य में तैनात नोडल अधिकारी की ये जिम्मेदारी है कि वो तय करे कि किन यात्रियों को लेकर जाना है और फिर अधिकारी ही उन्हें स्टेशन तक लाने की व्यवस्था करेंगे। मजदूरों ने कहा कि उनके कमरे पर जाकर किराया वसूला गया। जब रेलवे टिकट ही नहीं काट रही तो उसके अधिकारी मजदूरों के कमरे पर तो जाएँगे ही नहीं। तो फिर गया कौन? किसने लिया किराया?
केरल से झारखण्ड गए यात्रियों के मामले में भी वहाँ झारखण्ड के नोडल अधिकारी ने उन 1129 मजदूरों की सूची बनाई होगी, जो झारखण्ड के 22 जिलों के थे। फिर उन्हें दोनों राज्यों के अधिकारियों की मदद से स्टेशन लाया गया होगा। रेलवे को तो सिर्फ़ इससे मतलब है कि आने वाले यात्री राज्य सरकारों द्वारा लाए गए हैं या नहीं, फिर केंद्र सरकार के स्पष्टीकरण के बावजूद किराए के रूप में इतने रकम किस ने वसूल लिए? जाहिर है, राज्य सरकार के अधिकारियों या स्थानीय लालची नेताओं ने ही ऐसा किया होगा। इसकी जाँच होनी चाहिए।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों में भी स्पष्ट लिखा हुआ है कि किसी भी रेलवे स्टेशन पर किसी प्रकार का टिकट नहीं बेचा जाएगा। नियमानुसार, रेलवे टिकट प्रिंट करेगा और इसके लिए वो राज्य उसे बताएगा, जहाँ से ट्रेन चालू हो रही है। उस राज्य को ये सूची वो राज्य देगा, जहाँ ये मजदूर जाने वाले हैं। इसके बाद स्थानीय राज्य सरकार ही टिकट को मजदूरों में बाँटेगी। स्पष्ट है कि जो भी हुआ है, वो राज्य सरकार के अधिकारियों या स्थानीय नेताओं की मिलीभगत से हुआ है।
कांग्रेस पार्टी इस मामले में केंद्र सरकार पर हमलावर है और मीडिया में कहा जा रहा है कि ये ‘कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ 2.0 है, जिसके तहत सोनिया गाँधी ने इस मामले को उठाया है। लेकिन झारखण्ड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में कांग्रेस भी गठबंधन सरकार का हिस्सा है, केरल में वामपंथियों की सरकार है। ऐसे में पार्टी को इन दोनों सरकारों से पूछ कर स्पष्ट करना चाहिए कि मजदूरों से किराया किसने वसूला?

केंद्र सरकार ने कहा है कि हर एक श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन के लिए रेलवे द्वारा राज्य सरकारों को 1200 टिकट दिए जा रहे हैं, इसके बाद ये उनकी जिम्मेदारी है कि वो अपने हिस्से की रकम का भुगतान करें और यात्रियों को चिह्नित कर उन्हें स्टेशन तक लेकर आएँ।
केरल के मुख्यमंत्री पिनराई वियजन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के स्पष्ट कह चुके हैं कि उनकी सरकार मजदूरों का किराया वहन नहीं कर रही है। महाराष्ट्र, राजस्थान और केरल की सरकारें इन मजदूरों का किराया नहीं दे रही है। एक जगह कांग्रेस की सरकार है तो एक जगह सीपीआई-सीपीएम की। राजस्थान में तो कॉन्ग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार है। ऐसे में कांग्रेस केंद्र को जिस काम के लिए कह रही है (और जो हो चुका है), वही बात अपनी ही सरकारों से क्यों नहीं मनवा पा रही है? क्या नियम अलग-अलग हैं?