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बिहार : पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी द्वारा राम मंदिर पर सवाल उठाते ही गिर गया पूरा मंच: आए थे दाएँ पैर में बेल्ट बाँध कर, अब बायाँ पैर भी घायल

खुद भी गिरे अनवर अंसारी, दूसरों को भी ले डूबे! (फोटो साभार: वीडियो स्क्रीन ग्रैब)
बिहार के गया में मुस्लिम समुदाय की एक सभा में JDU के पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की आलोचना करना भारी पड़ गया। जैसे ही उन्होंने रामलला के भव्य मंदिर और प्रभु की प्राण प्रतिष्ठा पर सवाल उठाया, मंच भरभरा कर गिर गया। इसके कारण मंच पर मौजूद जेडीयू नेता सहित कई और लोग घायल हो गए।

ये सभा अतरी प्रखंड के डिहुरी गाँव में हो रही थी। यहाँ मुस्लिम समुदाय की तरफ से फ्रीडम फाइटर और पूर्व मंत्री अब्दुल कयूम अंसारी की 51वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही थी। कार्यक्रम में पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी मुख्य वक्ता थे।

पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी ने कहा, “22 जनवरी को श्रीरामचंद्र जी की प्राण प्रतिष्ठा है। वोट के लिए यह कार्यक्रम किया जा रहा है। जिस दिन भगवान राम का जन्मदिन है, उस दिन प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन क्यों नहीं किया गया?” इसके बाद क्या हुआ, वीडियो में देख सकते हैं।

JDU नेता अली अनवर अंसारी के इतना कहते ही अचानक से मंच भरभरा कर गिर गया और मंच पर मौजूद सभी नेता जमीन पर आ गए। जिस दौरान मंच गिरा, वहाँ गिनती के 10-12 लोग ही बैठे थे, लेकिन किसी को संभलने तक का मौका नहीं मिला और पल भर में ही पूरा मंच जमीन पर आ गया।

मंच के गिरते ही ‘खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे’ की तरह पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी ने कहा, “दाहिने पैर में हम बेल्ट बाँधकर आए थे। आज बायाँ पैर भी चोटिल हो गया, लेकिन कोई बात नहीं है। नेताओं को इसी तरह से फँसाया जाता है। फिरोज साहब ने कहा कि 10 से 12 गाँव हैं। नेता तो लोभी होता ही है। हमें लगा कि मजमा लगेगा, इसलिए आ गए। जितने लोग आए सभी को आभार व्यक्त करते हैं।”

मंच के गिरने से पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी के बाएँ पैर में चोट आ गई। बताते चलें कि मंच गिरने से पहले ये कार्यक्रम सुचारू रूप से जारी था। कार्यक्रम दोपहर बाद शुरू हुआ था। मंच से भाषणबाजी जारी थी। अब्दुल कयूम अंसारी के कामों के कसीदे पढ़े जा रहे थे।

इसी दौरान मुख्य वक़्ता अंसारी की जुबान ने जैसे ही आराध्य में भगवान राम के समारोह पर सियासी बयानबाजी जारी की, रामलला पर सवाल उठाए, वैसे ही सब जमीन पर आ गिरे।

‘नीतीश कुमार के खाने में मिलाई जा रही दवा, इसीलिए हो रहा मेमोरी लॉस’: ललन सिंह पर आरोप

                                   नीतीश कुमार और अरुण कुमार (साभार-आउटलुक और ABP न्यूज़)
बिहार में लोकसभा चुनावों से पहले ही आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। इसी क्रम में अब पूर्व सांसद और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अरुण कुमार ने जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने दावा किया है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को खाने में मेमोरी लॉस की दवा मिलाकर दी जा रही है। कुछ ऐसा ही बयान प्रशांत किशोर ने भी दिया है। 

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हाजीपुर में शनिवार (14 अक्टूबर, 2023) को मीडिया से बात करते हुए अरुण कुमार ने नितीश कुमार के मेमोरी लॉस का दावा किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चीजें भूल जा रहे हैं। उन्हें खाने में मेमोरी लॉस की दवा मिलाकर खिलाई जा रही है। अरुण कुमार ने कहा कि इसकी जाँच कराई जानी चाहिए।

दरअसल, नितीश कुमार के मेमोरी लॉस का मुद्दा प्रशांत किशोर ने उठाया। उन्होंने मुख्यमंत्री के कुछ समय के बात-व्यवहार का हवाला देते हुए कहा कि मानसिक रूप से कमजोर करने के लिए उन्हें ऐसी दवा ललन सिंह के कहने पर दी जा रही है।  

जदयू अध्यक्ष ललन सिंह पर गंभीर आरोप

नीतीश कुमार के भूलने की बीमारी की तरफ इशारा करते हुए चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अरुण कुमार ने इसके लिए जदयू अध्यक्ष ललन सिंह और कुछ अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया।
पूर्व सांसद अरुण कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मानसिक स्थिति खराब हो गई है। वह जनता दरबार में गृह मंत्री खोजने लगते हैं। इसके बाद कोई और उन्हें बताता है कि वह खुद ही प्रदेश के गृह मंत्री भी हैं।
अरुण कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री कभी नेताओं के सिर पकड़कर एक-दूसरे से टकराने लगते हैं। उन्होंने ललन सिंह पर हमला बोलते हुए कहा कि जो लोग लालू यादव के लिए चारा घोटाला मामले में मुंशी की तरह पैरवी करते थे।
आज वही लालू यादव को मुंशी की तरह समझा दिए हैं कि हम बचा भी सकते हैं। हम फँसाए हैं तो बचा भी सकते हैं। हम नीतीश कुमार को किनारे कर देंगे, आप हमारे नेता हैं, निश्चिंत रहिए। हम जेडीयू को भी खा जाएँगे, आप निश्चिंत रहिए।
उन्होंने कहा कि इन लोगों ने पार्टी को बर्बाद किया। जदयू के कई लोग जो हमसे जुड़े हुए हैं, हमारे पास आ रहे हैं। ऐसी अराजक स्थिति में अब एक ही उम्मीद है चिराग पासवान। जाति, धर्म, पार्टी से ऊपर उठकर सब लोग चिराग को खोज रहे हैं। चाहे खेल का मैदान हो, स्कूल का मैदान हो, कॉलेज हो, गाँव हो, खेत या खलिहान हो।

नीतीश कुमार पर हो रहा उम्र का असर

जनसुराज पदयात्रा के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने भी नितीश कुमार के भूलने की बीमारी का मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार को अगर ध्यान से देखिएगा तो पता चलेगा कि उनपर उम्र का असर हो गया है। पिछले एक साल की उनकी पुरानी स्पीच उठाकर देख लीजिए आपको पता चल जाएगा कि वो हर बात को जलेबी की तरह घुमाते रहते हैं। बोलना कुछ चाहते हैं बोल कुछ और जाते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि आपने कभी नीतीश कुमार को किसी फैक्ट्री बनाने को लेकर चर्चा करते सुना? नीतीश कुमार के लिए आज चर्चा का विषय क्या है? उनके लिए आज चर्चा का विषय है कि धरती का नाश होने वाला है। मोबाइल का उपयोग करने से लोग पागल हो रहे हैं। क्या यही नीतीश कुमार का काम है? नीतीश कुमार क्या साइकोलोजिस्ट हैं या मनोवैज्ञानिक हैं? बिहार की जनता ने जो काम नीतीश कुमार को दिया है वो तो ये कर नहीं रहे बाकी बेकार की चीजों में इनका ध्यान रहता है। दुनिया कितने दिनों तक रहेगी कब खत्म हो जाएगी इस पर बात करते हैं।

 

विपक्ष की बारात से ‘फूफा’ बन निकले नीतीश कुमार

नीतीश कुमार को लगता है कि कांग्रेस उनका सारा क्रेडिट खा गई, (फोटो: बैठक में सोनिया गाँधी से मिलते नीतीश)
विपक्षी नेताओं ने कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में मंगलवार (18 जुलाई, 2023) को बैठक कर अपने नए गठबंधन का नाम ‘INDIA’ रखा। विपक्षी नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बड़ी-बड़ी बातें की और ‘लोकतंत्र की हत्या’ का आरोप लगाते हुए अगली विपक्षी बैठक मुंबई में होने की बात कही। इसी बीच खबर आई कि नीतीश कुमार नाराज़ हो गए हैं। इन अटकलों को हवा तब मिली जब नीतीश कुमार बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस अटेंड किए ही पटना के लिए निकल गए।

ज्ञात हो, जब देश में आपातकाल के बाद 1977 में चुनाव होने थे, तब संघ प्रचारक नानाजी देशमुख ने समस्त विपक्ष को एकजुट करने में जो परिश्रम किया था, उसे नकारा नहीं जा सकता। वामपंथियों को छोड़, समस्त पार्टियां अपने भेदभाव भूल और पार्टी की साख को ताक पर रख एकजुट हुए थे, तब नानाजी ने किसी पद की लालसा नहीं थी और न ही चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। परन्तु ये जितने भी भाजपा विरोधी एकजुट हुए हैं किसी ने अपना नाम नहीं छोड़ा, पद के अभिलाषी सभी हैं, जिसे देख यह सम्भावना व्यक्त की जा रही कि चुनाव आते-आते गठबंधन धराशायी हो सकता है। 

प्रेस कॉन्फ्रेंस में लालू यादव और तेजस्वी यादव भी नहीं दिखाई दिए। राजद ने ‘INDIA’ को लेकर जो ट्वीट किया था, उसे भी डिलीट कर लिया। इसके बाद चर्चा चलने लगी कि आखिर नीतीश कुमार और लालू यादव किस बात से नाराज हैं? सबसे पहली बात तो ये छन कर सामने आई कि गठबंधन का नया नाम रखने को लेकर नीतीश कुमार की सलाह को दरकिनार कर दिया गया। वो नहीं चाहते थे कि ‘INDIA’ इस गठबंधन का नाम हो, वो हिंदी में कुछ नाम रखना चाहते थे।

ANI ने भी अपने सूत्रों के हवाले से कहा है कि नीतीश कुमार ने अंत में जब अन्य नेताओं को उनकी सलाह को दरकिनार करते हुए देखा तो कह दिया कि ठीक है, अगर आप लोगों की यही इच्छा है तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन, सबको पता है कि नीतीश कुमार जैसे नेता के लिए ये एक ‘अपमानजनक’ बात हो गई। नीतीश कुमार 2005 से ही बिहार की सत्ता पर काबिज हैं और 2025 के विधानसभा चुनाव तक सत्ता में उनके 2 दशक हो जाएँगे। उससे पहले वो केंद्र सरकार में मंत्री थे।

आपको ये तो याद ही होगा कि नीतीश कुमार पिछले 11 महीनों से विपक्षी गठबंधन बनाने के लिए पहल कर रहे थे और इसके लिए उन्होंने दिल्ली से लेकर लखनऊ, भुवनेश्वर और चेन्नई तक का दौरा किया था। उन्होंने 11 महीने तक दौरा कर-कर के माहौल बनाया, लेकिन अंत में उन्हें ही किनारे कर दिया गया। पटना में विपक्ष की जो पहली बैठक हुई थी, उसकी मेजबानी भी नीतीश कुमार ने ही की थी। साथ ही उसमें विपक्षी नेता काफी हँसी-ख़ुशी वाले माहौल में मिलते हुए दिखे थे।

लेकिन, बेंगलुरु में हुई दूसरी बैठक में ये नजारा नहीं दिखा। यहाँ प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी अधिकतर नेता मुँह बनाए हुए दिखे। ऊपर से नीतीश कुमार की गैर-मौजूदगी ने सबका ध्यान खींचा। गठबंधन के नाम में सहमति न होने वाली तो एक बात है, दूसरी और सबसे बड़ी बात ये है कि विपक्षी गठबंधन का संयोजक कौन होगा, इस पर कोई एकमत नहीं बन पाया। नीतीश कुमार की इच्छा थी कि वो संयोजक बनाए जाएँ, लेकिन इसके लिए सभी दल राजी नहीं हुए।

बताया जाता है कि अंत में भारत के 4 अलग-अलग हिस्सों का प्रतिनिधित्व करते हुए 4 संयोजक बनाए जाने की चर्चा चली, लेकिन छोटे विपक्षी दलों ने इस पर भी ऐतराज जताया। अंत में घोषणा कर दी गई कि 11 सदस्यों की एक समिति बनेगी जो ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ का ड्राफ्ट तैयार करेगी और साथ ही संयोजक के नाम का ऐलान भी मुंबई की बैठक में किया जाएगा। साफ़ है, ‘संयोजक’ बनने के लिए ही नीतीश कुमार ‘नाराज फूफा’ बन कर मुँह फुलाए हुए हैं।

भाजपा विधायक हरिभूषण ठाकुर का इस संबंध में बयान देखिए। उनका कहना है कि कांग्रेस  की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने नीतीश कुमार की सारी मेहनत को कांग्रेस पार्टी के खाते में डाल दिया। जिस तरह से बेंगलुरु में KC वेणुगोपाल सक्रिय दिखे और कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी बड़े पैमाने पर रही, उससे साफ़ है कि नीतीश कुमार को ऐसा लग रहा है कि उनके हिस्से का एटेंशन किसी को मिल रहा है। नीतीश कुमार की बेचैनी के और भी कारण हैं।

उन्हें पता है कि वो मुख्यमंत्री हैं और पुराने नेता हैं, लेकिन ये सच्चाई भी उन्हें मन ही मन पता ही है कि बिहार में उनकी पार्टी तीसरे नंबर की है और सांसदों या विधायकों की संख्या गिनी जाए तो उनका कोई खास महत्व नहीं बनता। हालाँकि, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश पूरी की। गठबंधन तोड़ कर फिर से राजद के साथ जा मिलने के बाद से ही वो लगातार उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ मिल कर राज्य-राज्य घूमते रहे।

कुछ नेताओं ने कहा है कि नीतीश कुमार की फ्लाइट का समय हो गया था, इसीलिए वो चले गए थे। इस पर भी सवाल उठ सकते हैं कि ये नेता तो चार्टर्ड प्लेन से बेंगलुरु गए थे, फिर कैसा शेड्यूल? चार्टर्ड प्लेन का शेड्यूल तो फिर से तय किया जा सकता है। क्या ऐसे नेताओं के लिए पैसा कोई समस्या है? बिलकुल नहीं। चार्टर्ड प्लेन भी हो तो ये दिन भर में 20 बार टिकट बुक कर सकते हैं। इसीलिए, कांग्रेस पार्टी का ये बयान बिलकुल ही बचकाना लगता है कि नीतीश कुमार की फ्लाइट का समय हो गया था।

नीतीश कुमार की नाराजगी का तीसरा कारण – बेंगलुरु में ‘The Unstable Prime Ministerial Candidate’ बताते हुए उनके नामों के साथ पोस्टर लगाए गए। साथ ही इन पोस्टरों में बिहार में ध्वस्त हुए पुलों के बारे में भी बताया गया। बता दें कि बिहार में हाल ही में सुल्तानगंज और सहरसा समेत कई इलाकों में पुल ध्वस्त हुए हैं। कांग्रेस की सरकार के रहते इस तरह के पोस्टर्स का लग्न नीतीश कुमार को रास नहीं आया।

अब राजद और जदयू के नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए हैं। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने नीतीश कुमार को विपक्षी एकता का सूत्रधार बताते हुए कह दिया कि जिस व्यक्ति ने सबको साथ लाया हो वो नाराज़ नहीं हो सकता। उन्होंने ‘INDIA’ नाम के पीछे भी सबकी सहमति होने की बात कही। इसी तरह राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने विपक्षी बैठक की सफलता की बात करते हुए कहा कि भाजपा 2024 में साफ़ हो जाएगी। इन पार्टियों के नेता लगातार साबित करने में लगे हुए हैं कि कोई मनमुटाव नहीं है।

यहाँ सवाल ये भी उठता है कि नीतीश कुमार के साथ-साथ लालू यादव और तेजस्वी यादव भी बैठक से क्यों चले गए? असल में लालू यादव की भी यही इच्छा है कि विपक्षी एकता गठबंधन का संयोजक नीतीश कुमार को बनाया जाए। वो चाहते हैं कि इसके बाद नीतीश कुमार CM की कुर्सी तेजस्वी यादव को दे दें। अपने बेटे के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी सुनिश्चित करने में ही लालू का सारा ध्यान है। खुद नीतीश कुमार भी तेजस्वी को भविष्य बता चुके हैं।

अंत में सवाल ये भी उठ सकता है कि क्या नीतीश कुमार ‘संयोजक’ का पद पाने और विपक्षी बैठकों में अटेंशन के लिए इस तरह की पैंतरेबाजी कर रहे हैं? ऐसे नेताओं द्वारा इस तरह के तिकड़म आजमाए जाते हैं, ताकि उनकी महत्ता बनी रहे। इससे मीडिया में चर्चा मिलती है और मनाने की कोशिशें की जाती हैं बाकियों द्वारा। अब नीतीश कुमार को भी मनाने की कोशिश की जाएगी। हो सकता है वो गठबंधन के पक्ष में कोई बयान भी दे दें, लेकिन देखना ये है कि उनकी नाराजगी रहती है या वो संयोजक बनाए जाते हैं।

बिहार : आनंद मोहन के आज़ाद होने से जंगल राज की वापसी , सुबह सबेरे जेल से रिहाई: अशोक यादव भी बाहर निकला, बोला- सरकार बढ़िया काम किया हमलोगों के लिए

आनंद मोहन के साथ जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह (फाइल फोटो, साभारः @ChetanAmohanRJD)
बिहार में अब गुंडाराज आ गया है। लालू प्रसाद यादव के समय में जंगलराज था और अब नीतीश कुमार- तेजस्वी यादव के समय में गुंडाराज आ गया है। चुनावी लाभ के लिए गुंडों को संरक्षण दिया जा रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आनंद मोहन के साथ ही 27 वैसे लोगों को छोड़ रहे हैं जो कुख्यात अपराधी रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार ने गुंडों और माफिया को संरक्षण देने के लिए कानून बदल दिया।

पूर्व सांसद आनंद मोहन आजाद हो गया है। 27 अप्रैल 2023 की सुबह उसे सहरसा जेल से रिहा कर दिया गया। गोपालगंज के डीएम रहे जी कृष्णैया की हत्या में उसे आजीवन कारावास हुई थी। वह 16 साल से जेल में बंद था। बिहार सरकार ने 10 अप्रैल 2023 को जेल नियमावली, 2012 के नियम 481 में संशोधन कर उसकी रिहाई का रास्ता साफ किया था।

सहरसा जेल अधीक्षक अमित कुमार ने उसकी रिहाई की पुष्टि की है। आनंद मोहन की रिहाई को लेकर नियमों में जो बदलाव किया गया है, उस पर कृष्णैया के परिजन निराशा जता चुके हैं। मीडिया में भी इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। इसका असर रिहाई के समय भी दिखा। जब आनंद मोहन जेल से बाहर निकला तो समर्थकों का कोई जमावड़ा नहीं था। न उसने रोड शो कर अपनी शक्ति दिखाई।

नीतीश कुमार कभी लालू यादव के शासनकाल को जंगलराज कहा करते थे और आज वह खुद गुंडाराज को बढ़ावा दे रहे हैं। गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी कृष्णैया हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहे पूर्व सांसद आनंद मोहन को जेल से स्थायी तौर पर रिहा करने का आदेश जारी हो गया है। आनंद मोहन के साथ दर्जन भर जेलों में बंद 27 बंदियों को मुक्त करने का आदेश दिया गया है। कई नेता से लेकर अधिकारी तक नीतीश सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। सेंट्रल IAS एसोसिएशन ने बिहार सरकार द्वारा आनंद मोहन की रिहाई को लेकर नोटिफिकेशन जारी करने का विरोध जताया है। यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने आनंद मोहन की रिहाई का विरोध किया है। यहां तक कि महागठबंधन में शामिल कांग्रेस और भाकपा माले ने भी इस फैसले का विरोध किया है।

बाहुबली आनंद मोहन के साथ 26 अन्य कैदी जेल से रिहा होंगे

बिहार सरकार ने गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या के आरोप में जेल में बंद पूर्व सांसद बाहुबली आनंद मोहन जल्द कैद से आजाद हो जाएंगे। उनके साथ 26 अन्य कैदी भी जेल से बाहर आ जाएंगे। आनंद मोहन के लिए जेल के नियमों में बदलाव किया गया। नीतीश कुमार की सरकार ने आनंद मोहन के साथ ही 26 अन्य कैदियों को रिहा करने से संबंधित आदेश जारी कर दिया। इन्हें छोड़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

नीतीश सरकार द्वारा जेल कानून में बदलाव बाद रिहाई का आदेश

नीतीश सरकार द्वारा जेल कानून में बदलाव किए जाने के बाद गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 20 अप्रैल को हुई राज्य दंडादेश परिहार पर्षद की बैठक में इन कैदियों को छोड़ने से संबंधित प्रस्ताव पर सहमति बनी। इसके बाद विधि विभाग ने सभी पहलुओं पर समीक्षा करने के बाद इसकी अनुमति देते हुए आदेश जारी कर दिया। यह आदेश विधि सचिव रमेश चंद्र मालवीय की तरफ से जारी किया गया है। इसके आधार पर जेल निदेशालय ने सभी संबंधित कैदियों को छोड़ने से जुड़ा निर्देश संबंधित जेलों को भेज दिया। इस सूची में आनंद मोहन 11वें नंबर पर हैं।

15 से अधिक कैदी लोक सेवकों की हत्या के दोषी

अब 27 कैदियों को रिहा करने से संबंधित अंतिम प्रक्रिया जेल के स्तर पर शुरू हो गई है। जल्द ही सभी कैदी बाहर आ जाएंगे। सूचना के अनुसार, इसमें 15 से अधिक कैदी लोक सेवकों की हत्या के आरोप में सजा काट रहे हैं। जबकि 20 वर्ष या आजीवन कैद की सजा काट रहे कुछ कैदी ऐसे भी हैं, जिन्हें हाईकोर्ट ने मामलों की सुनवाई करने के बाद रिहा करने का आदेश दिया है। ऐसे ये सभी वैसे कैदी हैं, जो 20 वर्ष से अधिक समय की सजा काट चुके हैं।

बक्सर जेल से कैदियों की रिहाई शुरू

बिहार के बक्सर मुक्त कारा से पांच कैदी की रिहाई होनी थी। इसमें तीन कैदी को बुधवार को रिहा कर दिया गया जबकि एक कैदी ने अर्थ दंड नहीं जमा किया है इस वजह से उसकी रिहाई नहीं हो सकी। वहीं पांचवे कैदी की रिहाई अब कभी नहीं हो सकती है क्योंकि वह अब कैद में नहीं है। बक्सर जेल से जिन पांच कैदियों की रिहाई होनी थी उनमें से एक कैदी पतिराम राय की मौत करीब 6 महीने पहले ही हो गई है।

पतिराम राय की पहले हो चुकी है मौत

बिहार सरकार ने रिहा किए जाने वाले कैदियों की सूची जारी की है उसमें 15 नंबर पर कैदी पतिराम राय की रिहाई का आदेश सरकार ने दिया है। पतिराम राय को 1988 में उम्रकैद की सजा हुई थी। उन्हें हत्या मामले में यह सजा मिली थी। 35 सालों से जेल में बद पतिराम राय की उम्र सरकारी कागजों के अनुसार 93 साल है। जेल अधीक्षक ने उनकी रिहाई के लिए कारा एवं सुधार विभाग को पत्र लिखा था। जिसके बाद सरकार ने आनंद मोहन सिंह के साथ जिन 26 कैदियों को रिहा करने का आदेश जारी किया है उसमें पतिराम राय का भी नाम शामिल है लेकिन पतिराम राम रिहाई की खुशी महसूस करने के लिए इस दुनिया में नहीं हैं। 6 महीने पहले ही उनकी मौत हो चुकी है। आश्चर्य की बात यह है कि किसी कैद मौत हो चुकी है लेकिन सरकार को इस बात की जानकारी ही नहीं है। इससे सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठते हैं। 

बिहार में अंधेर नगरी, मौत के बाद रिहाई का आदेश

बीजेपी प्रवक्ता निखिल आनंद ने कहा -बिहार में अंधेर नगरी है। यहां निधन के बाद कर्मचारियों का ट्रांसफर होता है। जिनकी मौत हो चुकी होती है उनके खिलाफ आदेश जारी होता है। अब एक दलित कैदी को जेल से छोड़ने का आदेश तब दिया गया है जब उस कैदी की पहले मौत हो गई है। बीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि काश उस दलित को जिंदा रहते न्याय मिल जाता।

कांग्रेस ने कहा- इससे देश में गलत संदेश जा रहा

कांग्रेस ने बिहार सरकार के इस फैसले का खुलकर विरोध किया है। कांग्रेस नेता पी.एल.पुनिया ने कहा कि गोपालगंज के डीएम की हत्या करने वाले आनंद मोहन को सजा से पहले छोड़ने के लिए कानून के नियमों में संशोधन किया गया, जिससे वे जल्दी रिहा हो जाए। इससे देश में गलत संदेश जा रहा है।

जी कृष्णैया अपनी हत्या के खुद जिम्मेदारः शिवानंद तिवारी

गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे आनंद मोहन सिंह को रिहा करने के फैसले का विरोध हो रहा है। जिसके बाद महागठबंधन के नेता इसका बचाव कर रहे हैं। आनंद मोहन के बचाव में उतरे नेता ऐसे तर्क दे रहे हैं जिसका कोई सिर पैर नहीं हैं। आरजेडी के सीनियर लीडर और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने तो जी कृष्णैया की हत्या के लिए उन्हें ही जिम्मेदार बता दिया है। शिवांनद तिवारी ने कहा है कि- जिस दिन जी. कृष्णैया की हत्या हुई वह किसी और रास्ते से जा सकते थे। उस दिन वह मुजफ्फरपुर के रास्ते से ही क्यों गए?

IAS एसोसिएशन ने कहा- इससे लोक सेवकों के मनोबल में गिरावट आएगी

सेंट्रल IAS एसोसिएशन ने बिहार सरकार द्वारा आनंद मोहन की रिहाई को लेकर नोटिफिकेसन जारी करने का विरोध जताया है। एसोसिएशन ने एक बायन में कहा कि गोपालगंज के पूर्व डीएम स्वर्गीय जी कृष्णैया की नृशंस हत्या के दोषियों को रिहा करने के बिहार सरकार के फैसले पर कैदियों के वर्गीकरण नियमों में बदलाव पर गहरी निराशा व्यक्त करता है। IAS एसोसिएशन द्वारा जारी लेटर में कहा गया कि कि नियमों में संशोधन कर लोक सेवक की हत्या के आरोप में दोषी को जघन्य श्रेणी में फिर से क्लासिफाई नहीं किया जा सकता। ऐसे फैसलों से लोक सेवकों के मनोबल में गिरावट आती है। लोक व्यवस्था कमजोर होती है और प्रशासन के न्याय का मजाक बनता है। हमलोग अनुरोध करते हैं कि बिहार सरकार जल्द से जल्द अपने फैसले पर पुनर्विचार करे।

भाकपा माले नेताओं ने कहा- यह भेदभावपूर्व कदम है

महागठबंधन सरकार के सहयोगी भाकपा माले आनंद मोहन की रिहाई को लेकर अपनी ही सरकार का विरोध किया। भाकपा माले ने बिहार सरकार के इस कदम को भेदभाव पूर्ण बताया।

आनंद मोहन के साथ इन बंदियों की होगी रिहाई

कैदी का नाम – जेल का नाम

कलक्टर पासवान उर्फ घुरफेकन – मंडल कारा, आरा
किशुनदेव राय – मुक्त कारागार, बक्सर
सुरेंद्र शर्मा – केंद्रीय कारा, गया
देवनंदन नोनिया – केंद्रीय कारा, गया
रामप्रवेश सिंह – केंद्रीय कारा, गया
विजय सिंह उर्फ मुन्ना सिंह – केंद्रीय कारा, मुजफ्फरपुर
रामाधार राम – मुक्त कारागार, बक्सर
दस्तगीर खान – मंडल कारा, अररिया
पप्पू सिंह उर्फ राजीव रंजन सिंह – केंद्रीय कारा, मोतिहारी
अशोक यादव – मंडल कारा, लखीसराय
शिवजी यादव – आदर्श केंद्रीय कारा, बेउर
किरथ यादव – विशेष केंद्रीय कारा, भागलपुर
राजबल्लभ यादव उर्फ बिजली यादव – मुक्त कारागार, बक्सर
अलाउद्दीन अंसारी – विशेष केंद्रीय कारा, भागलपुर
मो. हलीम अंसारी – विशेष केंद्रीय कारा, भागलपुर
अख्तर अंसारी – विशेष केंद्रीय कारा, भागलपुर
मो. खुदबुद्दीन – विशेष केंद्रीय कारा, भागलपुर
सिकंदर महतो – मंडल कारा, कटिहार
अवधेश मंडल – विशेष केंद्रीय कारा, भागलपुर
पतिराम राय – मुक्त कारागार, बक्सर
हृदय नारायण शर्मा उर्फ बबुन शर्मा – केंद्रीय कारा, गया
मनोज प्रसाद – आदर्श केंद्रीय कारा, बेउर
पंचा उर्फ पंचानंद पासवान – केंद्रीय कारा, भागलपुर
जितेंद्र सिंह – मुक्त कारागार, बक्सर
चंदेश्वरी यादव – केंद्रीय कारा, भागलपुर
खेलावन यादव – मंडल कारा, बिहारशरीफ


बिहार : शराब मुक्त राज्य में शराब माफिया कौन है? गरीबों के पास शराब के लिए पैसे कहाँ से आए?

बिहार में शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब बनाने का काम जारी है और उसे पीकर मरने वालों का आँकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है। इन सबके बीच जहरीली शराब पीकर मरे लोगों को मुआवजे की माँग पर राजनीति तेज हो गई है। जदयू के नेता उपेंद्र कुशवाहा ने मृतकों की तुलना बम बनाने वालों से की है। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार मौत के मामलों की जाँच करेगी।

आज देश की राजनीति का स्तर इतना गिर गया है, जहां तर्कसंगत विरोध करना अपमान समझा जा है। बिहार में शराब पीकर मरने वालों के परिवार वालों को मुआफजा देने की मांग करने की बजाए, सरकार को शराब मुक्त राज्य में शराब बनाने, बेचने एवं इस माफिया को संरक्षण देने वालों को फांसी की मांग होनी चाहिए। इस बात की भी गंभीरता से जाँच होनी चाहिए यह शराब क्या उन्हें मुफ्त में मिली थी या खरीद कर पी थी, समाचार है कि मरने वाले के परिवारों के पास अंतिम संस्कार करने के भी पैसे नहीं, फिर शराब पीने के लिए कहाँ से आए? अगर खरीदकर पी थी, फिर उसके पैसे किसने दिए थे? इतना ही नहीं, इस कांड में सम्मिलित सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारियों को मिलने वाली हर सरकारी सुविधा जैसे पेंशन आदि तुरंत छीन लेनी चाहिए। गुजरात में भी चुनाव से पूर्व शराब कांड हो चुका है।    

बिहार में जहरीली शराब पीकर लगातार हो रही मौतों का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने संज्ञान लिया है। आयोग ने जहरीली शराब से हुई मौतों की जाँच के लिए एक टीम बिहार भेजने का निर्णय लिया है। आयोग ने कहा कि इसके सदस्य की अध्यक्षता वाली एक जाँच टीम बनाई जाएगी।

उधर, JDU नेता उपेंद्र कुशवाहा ने जहरीली शराब पीकर मरने वाले लोगों की तुलना बम बनाने वालों से करते हुए कहा कि बम बनाते वक्त विस्फोट में किसी की मौत हो तो सरकार मुआवज़ा देती है? उन्होंने मृतकों को मुआवजे देने की विपक्ष की माँग को सिरे से खारिज कर दिया।

बिहार में जहरीली शराब पीने से मृतकों की संख्या बढ़ रही है। इसुआपुर से शुरू शुरू हुआ मौत का सिलसिला मशरख, मढ़ौरा, तरैया, अमनौर, बनियापुर तक जा पहुँचा। अब तक 72 लोगों की मौत की बात सामने आई है। वहीं, कई लोगों का इलाज विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है।

इलाज करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि जहरीली शराब पीने के कारण मृतकों के शरीर में फॉलिक एसिड बढ़ गई है, जिसके कारण शरीर कम अंग काम करना बंद कर दे रहे हैं। मौत से पहले सभी मृतकों के ब्लड प्रेशर में लगातार बदलाव भी देखने को मिल रहा है। मरीजों में बेचैनी, उल्टी, पेट दर्द, साँस लेने में परेशानी, आँखों से धुँधला दिखाई देने जैसे कई तरह की समस्याएँ देखने को मिल रही हैं।

उधर लोजपा (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान (Chirag Paswan) ने कहा कि जहरीली शराब पीने से लगभग 200 मौतें हुई हैं। सरकार बिना पोस्टमार्टम के मृतकों का अंतिम संस्कार करा रही है और मृतकों की संख्या छिपाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि वे राज्यपाल से मिलकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की माँग करेंगे।

मृतकों को लेकर राज्य की नीतीश सरकार की छिछालेदर होने के बाद सारण के SP ने इसुआपुर थाना के अध्यक्ष संजय कुमार राम, चौकीदार और दफदार को निलंबित कर अपने काम की इतिश्री कर ली है। पुलिस ऑपरेशन क्लीन के तहत छापेमारी कर शराब के कारोबार से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी कर रही है। हालाँकि, इसमें बड़ी मछलियाँ पहले भी बचती रही हैं और आशंका है कि इस बार भी बच जाएँगी।

जब विधानसभा में विपक्ष ने जहरीली शराब पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार को घेरना शुरू किया तो वे बिफर उठे थे। कुर्सी और सदन की मर्यादा को तार-तार करते हुए वे विपक्ष पर चिल्लाने लगे थे। उन्होंने कहा था कि जो नकली शराब पीएगा, वो मरेगा ही।

नीतीश कुमार ने राज्य में शराब की तस्करी और अवैध निर्माण को रोकने में लाचार रहने के बावजूद मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया। दरअसल, मुआवजे की माँग को नकार कर नीतीश कुमार जहरीली शराब मामले में सरकार की लापरवाही को नजरअंदाज करना चाहते हैं।

बिहार : शपथ लेते ही तेजस्वी ने शुरू किया मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल, हिन्दू प्रतीक ‘टीका-शिखा’ पर की अभद्र टिप्पणी

क्या भारत में भाजपा का अलग और भाजपा विरोधियों का अलग संविधान है? बरहाल, भारत का वर्तमान संविधान जब सबको समान अधिकार देता है, फिर किस आधार पर तुष्टिकरण कर क्यों संविधान का अपमान किया जा रहा है? भाजपा द्वारा लागु कोई एक नीति अथवा योजना बताये जो केवल हिन्दुओं को छोड़ किसी अन्य धर्म पर लागु नहीं हो रही। लाभ सभी को मिल रहा है। लेकिन भाजपा विरोधियों को वोट हिन्दुओं का भी चाहिए लेकिन हिन्दु को ठगने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे।  जब भाजपा विरोधियों को मुस्लिम तुष्टिकरण ही करना है, फिर हिन्दू वोट क्यों चाहिए या फिर हिन्दू क्यों इनको वोट देता है? इस पर समस्त मतदाताओं को गंभीर चिंतन करना होगा।  
आरजेडी की इफ्तार पार्टी में पहुंचकर नीतीश कुमार ने जो सियासी बदलाव का संकेत दिया था, मुहर्रम के दिन वह अपनी मंजिल पर पहुंच गया। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि ‘इफ्तार’ और ‘मुहर्रम’ का दिन कोई संयोगमात्र नहीं है, बल्कि यह बहुत सोच-समझकर किया गया एक फैसला था। आरजेडी और जेडीयू गठबंधन की सरकार बनते ही बिहार में मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल शुरू हो गया। नीतीश कुमार के मुहबोले भतीजे और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने जहां हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए उनके प्रतीक चिन्ह टीका और शिखा पर विवादित टिप्पणी की है, वहीं मुस्लिमों को खुश करने के लिए उर्दू और बांग्ला टीचरों के रिक्त पदों की सूची मांगी गई है।

सोशल मीडिया में तेजस्वी यादव का एक बयान वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंंने 2020 विधानसभा चुनाव के समय 10 लाख रोजगार देने का वादा किया था। इस वादे को लेकर अब उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं। सवाल पूछने वालों में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भी शामिल है। उनके एक ट्वीट के जवाब में तेजस्वी यादव ने अपने पिता लालू यादव के नक्शेकदम पर चलते हुए जातीय पहचान और हिन्दू प्रतीक ‘चोटी’ को भी निशाना बनाया।

तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया, “श्रीमान जी, इतना बेशर्म मत बनिए। एक फुट लंबी चोटी रखने से कोई ज्ञानी नहीं बन जाता, जैसे आप रखते हैं। आप लोगों की इन चिरकुट हरकतों, Edited Videos व सड़क छाप बयानों की बदौलत ही भाजपा की यह दुर्दशा है। इन बेचारों का बिहार में कोई चेहरा ही नहीं। बाक़ी इस पूरे Video को सुन ख़ुशी मनाइए”

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बिहार की महागठबंधन सरकार पर सत्ता में आते ही तुष्टिकरण की नीति शुरू करने का आरोप लगाया है। तेजस्वी के ‘एक फुट लंबी चोटी’ वाले बयान पर पलटवार करते हुए इसे हिंदुत्व पर हमला बता दिया। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि बिहार की सेक्युलर सरकार के शीर्ष नेताओं ने हिंदू प्रतीक चिह्न टीका-शिखा पर हमले शुरू कर दिए हैं।

दरअसल धर्मनिरपेक्षता और हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा की बात करने वाले लालू यादव और नीतीश कुमार ने हमेशा हिन्दुओं की एकता को तोड़ने की कोशिश की है। आज लालू के लाल तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार बिहार में जातीय जनगणना कराकर जातियों को आपस में लड़ाना चाहते हैं। इसी तरह 90 के दशक में जंगलराज के दौरान लालू यादव ने बिहार में ‘भूरा बाल साफ करो’ का नारा दिया था। भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला (कायस्थ) को केंद्रित कर दिए गए इस नारे ने राज्य में जातीय कटुता पैदा की थी। इसकी वजह से कई भीषण जातीय नरसंहार हुए थे। 

बिहार में सत्ता परिवर्तन के साथ ही जातीय संघर्ष और जंगलराज का आगाज हो चुका है। बेतिया में एक पुजारी की हत्या इसका प्रमाण है। अब तक दो पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। यह और भी विभत्स रूप में सामने आ सकता है। इसको लेकर लोग डरे हुए है। क्योंकि वामपंथी दल भी इस सरकार में साझेदार हैं, जो वर्ग संघर्ष के लिए कुख्यात हैं। तेजस्वी यादव ने ‘चोटी’ को राजनीतिक बयानबाजी में घसीट कर अपने और वामपंथी दलों के समर्थकों को एक बड़ा संदेश दे दिया है। इससे बिहार में फिर से जातीय संघर्ष की आशंका व्यक्त की जा रही है। 

वहीं सोशल मीडिया पर शिक्षा विभाग का एक पत्र वायरल हो रहा है, जिसमें सभी जिलों में खाली अल्पसंख्यक शिक्षक पदों की सूची मांगी गई है। इसके अलावा उर्दू और बांग्ला शिक्षक का कुल कितने पद स्वीकृत है और कितने पद पर शिक्षक कार्यरत है और कितने पद रिक्त है। जिला शिक्षा पदाधिकारी से 24 घण्टे के अंदर रिपोर्ट देने को कहा गया है! हालांकि यह जानकारी बिहार विधानसभा की अल्पसंख्यक कल्याण बैठक में मांगी गई। लेकिन बताया जा रहा है कि यह जानकारी डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव की तरफ से मांगी गई है। इस पर गिरिराज सिंह ने ट्वीट किया, “नीतीश सरकार में संस्कृत पर कोई फैसला नहीं आया,उर्दू पर आ गया। 24 घंटे में ही तुष्टिकरण शुरू हो गया।”

एक ट्विटर यूजर ने शिक्षा विभाग के पत्र और उर्दू शिक्षकों की बिहाली पर तेजस्वी यादव से सवाल करते हुए ट्वीट किया, “बिहार में दस हजार उर्दू शिक्षक होंगे बहाल-तेजस्वी ऐसी शिक्षा की क्या आवश्यकता है? जिसमें पृथ्वी को चपटा,जन्नत में हूरों,शराब का झांसा अन्य धर्मों के प्रति कटुता और घृणा सिखाई जाती हो,नौकरी की लगभग न के बराबर सम्भावना,और ऐसी शिक्षा पर करोड़ों-अरबों का खर्चा!”

एक दूसरे ट्विटर यूजर ने उर्दू शिक्षकों की बहाली को लेकर ट्वीट किया, ” राजद सरकार अपने एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया है! पहली बैठक में उर्दू और बंगाली(बंगलादेशी मुस्लिम जो बंगाली भाषाई है) शिक्षक के लिए 24 घण्टे के अंदर रिपोर्ट देने को कहा ! अपने वोटर का ख्याल ऐसे रखा जाता है! ध्यान रखें यादव जी लोग इसमें नही हैं ! और न ही नीतीश जी के स्वजातीय”


उत्तर प्रदेश : 200 सीटों पर चुनाव लड़ेगी भाजपा की सहयोगी पार्टी JDU

उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है, राजनैतिक पार्टियां अपनी-अपनी तैयारियाँ शुरू कर चुकी हैं, इसी बीच भाजपा की सहयोगी जेडीयू ने उत्तर प्रदेश में 200 सीटों ( JDU contest in UP ) पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, जेडीयू नेता केसी त्यागी ने जुलाई 31 को इसकी घोषणा की, जेडीयू महासचिव केसी त्यागी ने कहा, पार्टी ने आगामी राज्यों के चुनाव लड़ने ( JDU contest in UP ) का फैसला किया है। हमारी प्राथमिकता NDA के तहत चुनाव लड़ना है। हमें सम्मानजनक सीटें मिलीं तो NDA के साथ लड़ेंगे नहीं तो अकेले लड़ेंगे। क्या JDU के लिए भाजपा सीटें छोड़ेगी? या फिर यादव वोट में सेंधमारी करनी है? उत्तर प्रदेश में हम करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। मणिपुर में भी चुनाव लड़ेंगे।

जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह ने अपना पद छोड़ दिया, ललन सिंह पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए, राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान ललन सिंह को अध्यक्ष चुनाव गया, बैठक में सीएम नीतीश कुमार भी मौजूद थे.

जेडीयू अध्यक्ष बनने के बाद ललन सिंह ने कहा, आरसीपी सिंह पहले पार्टी का काम देख रहे थे, उस काम को उन्होंने जहां तक पहुंचाया उसे आगे ले जाना और बिहार के गांवों व अन्य प्रदेशों तक पहुंचाना पार्टी की प्राथमिकता होगी। सभी नेताओं और महत्वपूर्ण साथियों से विचारविमर्श के आधार पर संगठन को मजबूत किया जाएगा।

ललन सिंह के JD(U) के नए अध्यक्ष बनने पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, ललन जी (ललन सिंह) हमारी पार्टी के बहुत वरिष्ठ साथी हैं। शुरू से ही साथ रहे हैं। आरसीपी सिंह ने आज की बैठक में खुद ही कहा और ललन जी का प्रस्ताव भी रखा। सर्वसम्मति से सब लोगों ने उसे स्वीकार किया। सीएम नीतीश ने कहा, चुनाव ( JDU contest in UP ) है, उसके बारे में भी लोगों ने अपनी बात कही है। उसमें सब लोगों को जिम्मेदारी दी गई है कि इन लोगों के साथ बैठिए और पूरी बात करिए।

बिहार : कटिहार : किन मुस्लिमों ने छठ घाट पर मल-मूत्र त्यागा? क्या यही है गंगा-जमुनी तहजीब?

कटिहार में तहस-नहस छठ घाट और अपनी पीड़ा रखते ग्रामीण
बिहार का कटिहार जिला मुस्लिम बहुत सीमांचल का हिस्सा है, जिसकी सीमाएँ पश्चिम बंगाल से लगती हैं। बीते दिनों बिहार में छठ महापर्व का समापन हुआ, लेकिन कटिहार के रतौरा में मुस्लिम भीड़ पर छठ पूजा में घाट पर आकर विघ्न डालने का आरोप लगाते हुए स्थानीय लोगों ने वीडियो बनाया और प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई। वीडियो में मुस्लिम भीड़ पर छठ पूजा न करने देने और व्यवस्था को तहस-नहस कर देने के आरोप लगते हुए स्थानीय लोगों ने उप-मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद से भी हस्तक्षेप की माँग की।

कटिहार जिला के कोढ़ा प्रखंड के रतौरा थाना क्षेत्र अंतर्गत हथियादियरा स्थित दिघरि पंचायत के चामापारा गाँव के लोगों को संध्या अर्घ्य के दौरान (नवम्बर 20, 2020) मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा तंग किया गया। उनके अनुसार छठ घाट पर उपद्रव कर घाट पर तोड़फोड़ किया गया, जिसके बाद स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई। वहाँ के स्थानीय लोगों का कहना था कि शाम को तो वो किसी तरह पूजा करने में कामयाब रहे, लेकिन सुबह उनके साथ जिस तरह से व्यवहार किया गया, उससे वो काफी डर गए हैं।

सबसे पहले जो वीडियो सोशल मीडिया पर आया, उसमें कई श्रद्धालु, महिलाएँ एवं पुरुष, खड़े दिख रहे हैं। एक महिला ने बताया कि वो प्रशासन के लिए यहाँ खड़ी हैं। महिलाओं ने बताया कि थोड़े से विवाद के बाद उनके बनाए घाट वगैरह को उजाड़ डाला गया। वहीं एक युवक ने दावा किया कि इलाके में 30 घर हिंदू हैं और 30,000 घर मुस्लिम हैं (हालाँकि, ये दावा अपुष्ट है)। उसने बताया कि यहाँ के कुछ लोग चाहते थे कि सुबह में छठ महापर्व हो ही नहीं।

उसने आगे उप-मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद, जो कटिहार के ही विधायक हैं, उनसे निवेदन करते हुए कहा कि वो थाना प्रभारी को निर्देश दें कि वो वहाँ पर आकर अपनी निगरानी में छठ पूजा संपन्न करवाएँ। उस वीडियो में सभी महिलाओं एवं पुरुषों ने उक्त युवक की बात से सहमति जताते हुए कहा कि उन्हें वहाँ प्रशासन की जरूरत है। उसने हिन्दुओं से अपील की कि इस वीडियो को वो फैलाएँ, जिससे उन्हें न्याय मिले।

एक अन्य महिला ने बताया कि घाट पर जब श्रद्धालु वहाँ अर्घ्य देने गए तो पटाखा उड़ाने को लेकर मुस्लिम समाज के लोगों से विवाद हुआ। महिला ने बताया कि वहाँ ‘काफी सारे मुस्लिम समाज के लोग’ थे और शाम को अर्घ्य देने के बाद वो लोग जैसे ही घर लौटे, तभी वहाँ पर केले के सारे थम उखाड़ डाले गए और मुस्लिम समाज के लोगों ने वहाँ मल-मूत्र त्याग कर दिया। साथ ही सजावट को तबाह कर देने और गुब्बारों को फोड़ देने के भी आरोप लगाए।

क्या कहना है हिन्दू पीड़ितों का 

जब हमने स्थानीय लोगों से बात की तो कई चौंकाने वाले विवरण सामने आए। कटिहार के ही एक व्यक्ति ने बताया कि इस पूरे घटनाक्रम में गाँव के स्थानीय मौलाना के दामाद की सहभागिता थी, इसी कारण प्रशासन ने भी उन पर थाने के बाहर ही सुलह कर के मामले निपटाने के लिए कहा। उक्त व्यक्ति ने हमें बताया कि उस क्षेत्र में मुस्लिम समाज के दबंगों द्वारा हिन्दुओं के खेतों की फसलें काट लेना आम बात है और ये इस तरह की पहली घटना नहीं है।

हमारी बात देवनारायण उराँव से हुई, जो इस घटना के पीड़ित हैं और उनके सामने ही ये सब कुछ हुआ। उन्होंने हमें पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार तरीके से समझाते हुए बताया कि वो अन्य श्रद्धालुओं के साथ सांध्य अर्घ्य के दिन दोपहर 1 बजे घाट पर गए और पूरे मन से वहाँ पर सजावट की। उन्होंने बताया कि पूरी साफ़-सफाई करने के बाद घाट को चमकाया गया। इसके बाद सारे ग्रामीण लौट आए और स्नान-ध्यान कर के पूजा की तैयारी के साथ वापस घाट के लिए शाम 4 बजे निकले। उन्होंने बताया:

“हम जैसे ही वहाँ पहुँचे, मुस्लिम समाज के लोग हमें परेशान करने लगे। वो लोग कह रहे थे कि अगर तुम छठ करने गए तो तुम्हें घाट पर से फेंक दूँगा। इसके बाद हम लोग किसी तरह पूजा-पाठ निपटाने के बाद वापस घर आ गए। अभी हमें घर पहुँचे आधे घंटे भी नहीं हुए थे कि सारी सजावट नोच डाली गई थी। धमकियों के बाद हमारे बच्चे घाट देखने गए थे कि सब सुरक्षित है या नहीं। उन्होंने देखा कि हमारे लगाए हजार गुब्बारों में से एक भी नहीं बचा है। मुझे जैसे ही इसकी सूचना बच्चों ने दी, मैंने अन्य ग्रामीणों को बताया। इसके बाद मैं सारे ग्रामीणों के साथ थाना गया। वहाँ हमें ही शांतिपूर्वक बैठने को कहा जाने लगा। हमने पूछा कि क्या हम थाना प्रभारी से बात करने में सक्षम नहीं? तत्पश्चात रतौरा थानाध्यक्ष को हमने सारी बात बताई।”

बकौल देवनारायण उराँव, आक्रोशित ग्रामीणों ने थाने में पूछा कि यहाँ एक मंदिर टूट जाता है, फिर भी आप लोग कुछ क्यों नहीं करते? हमारे आक्रोश के बाद पुलिस हमें लेकर रात के 10 बजे घाट पर गई। वहाँ जाकर पुलिस ने वीडियो बनाया और हमारे दावे सही पाए। उन्होंने ये भी बताया कि पुलिस ने पुनः सजावट के लिए 500 रुपए की मदद की। उन्होंने बताया कि फिर से बाँस वगैरह काटने पड़े और पूरी सजावट भी करनी पड़ी।

क्या वहाँ पहले से भी हिन्दुओं को परेशानी थी? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि स्थानीय हिन्दू ठीक से शादी-विवाह तक नहीं कर पाते हैं और पूजा-पाठ के दौरान भी तनाव का माहौल पैदा कर दिया जाता है। उन्होंने बताया कि सुबह के अर्घ्य के समय प्रशासन वहाँ मौजूद था, वरना हम छठ ठीक से नहीं कर पाते। उनका कहना है कि स्थानीय हिन्दू अपने धर्म के नियम-कायदे निभाने को भी तरस जाते हैं। साथ ही जानकारी दी कि इन चीजों के सम्बन्ध में पहले भी थाने में आवेदन दिया गया था, लेकिन पुलिस अब बड़ी घटना होने के बाद हरकत में आई है।

कई वीडियो में हिन्दू कार्यकर्ता न्याय के लिए नारेबाजी करते हुए भी दिख रहे हैं। साथ ही पुलिस की गाड़ी के पास जनता मौजूद दिख रही है। घाट पर तहस-नहस स्थिति में चीजें भी दिख रही हैं, जिनसे महिलाएँ खासी आक्रोशित हैं। एक महिला ने बताया कि वहाँ मुस्लिम समाज के लोग इतनी संख्या में जमा हो गए थे, जितने पर्व मनाने के लिए हिन्दू भी नहीं जाते हैं। महिला ने बताया कि हिन्दुओं के साथ जबरदस्ती होती है, उनके साथ मारपीट होती है और उन्हें चारों तरफ से दबा कर रखा जाता है।

महिला ने बताया कि जब तक ग्रामीणों ने थाने पहुँच कर हंगामा नहीं किया, तब तक पुलिसकर्मी नींद से नहीं जागे। उसने बताया कि मुस्लिम समाज के लोग सोचते हैं कि हिन्दू संख्या में कम हैं, इसीलिए मारपीट कर भगा देंगे। साथ ही ये भी कहा कि जमीन-जायदाद के झगड़े भी वो हिन्दू समाज के लोगों के साथ करते रहते हैं। उसने बताया कि मुस्लिम समाज के लोग बोलते हैं कि ‘मुस्लिम इलाका बनाएँगे, हिन्दुओं को यहाँ रहने नहीं देंगे और उनकी जमीनें हड़प के उन्हें भगा देंगे’।

उजाड़े जाने के बाद छठ घाट का नजारा

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली जानकारी हमें ग्रामीण विकास उराँव ने दी, जिन्होंने रुआँसे स्वर में कहा कि गाँव के लोग मीडिया में अपनी बात रखने के लिए इंतजार कर रहे हैं लेकिन एक भी मीडियाकर्मी वहाँ नहीं पहुँचा है। उन्होंने बताया कि वो भी छठ घाट पर हुई इस हरकत के गवाह हैं। साथ ही दावा किया कि मुस्लिम समाज के कुछ असामाजिक तत्व छठ पर्व कर रही महिलाओं का कपड़े बदलते हुए वीडियो बना रहे थे, जिसके लिए मना करने पर हंगामा शुरू हुआ।

विकास उराँव ने बताया, “हम क्या करें? हम शादी-विवाह तक ठीक से नहीं कर पाते। मुस्लिम समाज के युवक जबरदस्ती हमारे शादी समारोह में घुस जाते हैं और नाचने लगते हैं। हमारे घर की लड़कियों का दुपट्टा खींचा जाता है। महिलाओं के साथ छेड़खानी होती है। हम किसी से कुछ कह नहीं सकते।” विकास बार-बार कह रहे थे कि मीडिया उनके गाँव में आए तो हर ग्रामीण अपनी बात रखने के लिए बेचैन है, लेकिन साथ ही सब डरे हुए भी हैं।

क्या है पुलिस का कहना?

वहीं कटिहार के SDPO अमरकांत झा का भी इस मामले को लेकर बयान आया है। उन्होंने बताया कि रौतारा में छठ पूजा में कुछ असामाजिक तत्वों ने हल्का सा विध्वंस किया था। उन्होंने बताया कि जैसे ही पुलिस को इसकी जानकारी हुई, वो हरकत में आई और दोनों समय की छठ पूजा संपन्न हुई। उन्होंने बताया कि अब वहाँ शांति है। उनका कहना है कि ये कोई उस तरह की बड़ी घटना नहीं थी, इसीलिए अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।

इस मामले में अब तक कोई गिरफ़्तारी भी नहीं हुई है। SDPO शर्मा ने जानकारी दी कि चीजें सुलझा ली गई हैं, क्योंकि थानाध्यक्ष ने त्वरित पहल की, वो खुद भी घटना की निगरानी कर रहे थे और एसपी ने भी आवश्यक निर्देश जारी कर दिए थे। देर रात की सामने आई कई वीडियो में पीड़ित हिन्दू और पुलिस की गाड़ियाँ घटनास्थल पर जाती हुई दिख रही हैं। साथ ही इसकी सूचना मिलते ही बजरंग दल और विहिप के पदाधिकारी भी वहाँ पहुँचे।

विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने ऑपइंडिया से कहा कि बिहार सरकार को संवेदनशील सीमांचल के इलाके में हिन्दू धर्म स्थलों की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि वहाँ हिन्दू डर कर रह रहे हैं। उन्होंने इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि उप-मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद को वहाँ जाकर लोगों की बातें सुननी चाहिए। बंसल ने कहा कि ये बहुत ही बड़ी घटना है और सीमांचल में बढ़ती इस्लामी कट्टरता खतरनाक है।

बिहार में चुनाव के दौरान दुर्गा पूजा विसर्जन में मुंगेर में हुई घटना को लेकर हिन्दू पहले से ही आक्रोशित हैं। उस घटना में दो युवकों की मौत की बात सामने आई थी। ‘मुंगेर बड़ी दुर्गा पूजा समिति’ ने ऑपइंडिया को बताया था की उनके साथ ऐसा दुर्व्यवहार हुआ कि पूरा मुंगेर देख कर रो पड़ा। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि फायरिंग प्रशासन ने ही की है और पुलिसकर्मी इंसास राइफल और पिस्टल लहराते नज़र आ रहे थे।

                            साभार:-अनुपम कुमार सिंह, http://anupamkrsin.wordpress.com


बिहार के नवनिर्वाचित शिक्षा मंत्री मेवा लाल ने दिया इस्तीफा

बिहार की नवनिर्वाचित बिहार विधानसभा में शिक्षा मंत्री बनाए गए मेवा लाल ने इस्तीफा दे दिया है।दरअसल मेवा लाल के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं। यानि भ्रष्टाचार के विरुद्ध स्वच्छ प्रशासन के लिए हुए मतदान में भ्रष्टाचारी को ही जितवाने का मतलब है कि जनता ही भ्रष्टाचार को दूर नहीं करना चाहती। दूसरे, यह कि जब राजनितिक पार्टियां भ्रष्टाचार दूर करने की बात करती हैं, फिर क्यों एक भ्रष्टाचारी को टिकट दिया? यानि खुद भी खाओ, पार्टी को भी खिलाओ और जनता को पागल बनाओ। 
बिहार कृषि विश्वविद्यालय में साल 2012-13 के दौरान असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति के मामले में जांच के दौरान तत्कालीन वीसी और मेवा लाल पर लगाए गए आरोप सही पाए गए थे। हाईकोर्ट के पूर्व जज ने इस मामले की जांच की थी जिसमें मेवा लाल दोषी करार दिेए गए थे। मेवा लाल पर अब भी मामला चल रहा है।  

नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार में मेवा लाल को शिक्षा मंत्री बनाया गया था जिसके बाद से ही उन पर लगे अनियमित्ताओं के आरोपों को नए सिरे से हवा मिल रही थी। जिस नेता को करप्शन के मामले में खुद नीतीश ने पार्टी से हटाया था, उसे सीधा मंत्री कैसे बना दिया था जबकि उस मामले की जांच जारी थी।शायद यही वजह है कि मेवा लाल पर इस्तीफे का दवाब बना और उन्होंने मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया है।बताया जा रहा है कि मेवा लाल मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचे थे और फिर वहां से एक चिट्ठी राजभवन पहुंच गई है जिसमें मेवा लाल का इस्तीफा पत्र है। 

बिहार के कृषि विश्वविद्यालय में लगभग 160 सहायक प्राध्यापक और कनीय वैज्ञानिकों की नियुक्ति में अनियमित्ताओं की शिकायत के बाद जांच की गई तो पता चला कि वहां के तत्कालीन कुलपति और मेवालाल चौधरी की मिलीभगत से धांधली हुई और पास अभ्यर्थिर्यो को फेल कर वेबसाइट पर रिजल्ट जारी कर दिया था। जानकारी के मुताबिक विश्वविद्यालय से बहाली से जुड़े कागजात भी गायब कर दिए गए थे। मामले सामने आने के बाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज ने मामले की जांच की। राजभवन के निर्देश पर फरवरी, 2017 में पूर्व कुलपति के खिलाफ सबौर थाना में केस दर्ज किया गया था। इस मामले में पूर्व कुलपति से एसआईटी ने भी पूछताछ की जिसके बाद वो अंडरग्राउंड हो गए। बाद में पता चला कि उन्होंने हाइकोर्ट से बेल भी ले लिया। 

बिहार इतिहास में पहली बार सत्ता पक्ष में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने एक बार फिर से जबरदस्त जीत हासिल की तो वहीं महागठबंधन को करारी हार मिली। चुनाव नतीजों से असंतुष्ट प्रोपेगेंडाबाज फर्जी नैरेटिव से जदयू, बीजेपी और एनडीए में शामिल अन्य दलों द्वारा कड़ी मेहनत से हासिल की गई जीत को मटियामेट करने की कोशिश में जुटे हैं।

कांग्रेस, राजद और अन्य पार्टी के महागठबंधन के जीतने की कामना करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों में से कई ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिनके लिए इस जीत को पचा पाना काफी मुश्किल हो रहा है। बिहार चुनावों में जदयू और बीजेपी के खिलाफ ध्रुवीकरण अभियान चलाने के बाद अब ये लोग नया प्रोपेगेंडा लेकर आए हैं। इस बार उनका इरादा  पीएम मोदी, बीजेपी और जेडीयू को मुस्लिम विरोधी के रूप में दिखाने का है। उन्होंने कहा कि एनडीए से एक भी मुस्लिम विधायक नहीं बना।

एनडीए से एक भी मुस्लिम विधायक के न जीत पाने के लिए हमें मुस्लिम मानसिकता को समझना होगा। इनका उद्देश्य भाजपा को हराने के लिए विपक्ष के किसी भी उम्मीदवार चाहे वह हिन्दू ही क्यों न हो, को वोट देकर भाजपा को हराओ। भाजपा को हराने में पार्टी का मुस्लिम वर्ग भी पीछे नहीं। संघ और भाजपा अपने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ में सम्मिलित मुसलमानों को देख खुश जरूर होए, लेकिन चुनावों में वह ख़ुशी मात्र एक फूंक से उड़नछू हो जाती है। पूरे चुनाव में साथ खड़े होकर हर सूचना विपक्ष को दी जाती है। जब मंडल अध्यक्ष के अपने ही मतदान केंद्र से एक भी वोट न मिलना क्या प्रमाणित नहीं करता, कि वह मुस्लिम भाजपा से केवल लाभ लेने के लिए पार्टी में है, वोट देने के लिए नहीं। अब इसे दोगलापन ही कहा जाएगा। कई क्षेत्रों में तो हिन्दू वोटों के दम पर शीर्ष नेतृत्व को गुमराह कर अपनी वाह-वाही लुटते हैं। यह आरोप नहीं, बल्कि विस्तार से कई बार प्रमाणों के साथ लिख चूका हूँ।

अरफ़ा खानुम शेरवानी के ट्वीट पर लोगों की प्रक्रियाएं विचारणीय है:- 

वामपंथी ऑनलाइन वेबसाइट ‘द वायर’ की पत्रकार ने ‘द टेलीग्राफ’ की एक रिपोर्ट शेयर करते हुए बिहार विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं बनने के लिए एनडीए गठबंधन को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताने का प्रयास किया। आरफा ने ट्वीट किया, “आजादी के बाद बिहार में पहली बार ऐसा हुआ है जब अपने सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के एक भी विधायक के बिना सत्ताधारी गठबंधन बना।”

कई अन्य वामपंथी ‘बुद्धिजीवी’ और मीडिया पोर्टलों ने भी बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को मुस्लिम विरोधी साबित करने के लिए इसी लाइन को आगे बढ़ाया है। उनका यह प्रयास ये दिखाने के लिए था कि भाजपा देश के मुसलमानों को असंतुष्ट करने का काम कर रही है।

उनका यह प्रयास स्वाभाविक रूप से देश के मुसलमानों के बीच के फैले छद्म भय को ट्रिगर करने के लिए किया जाता है ताकि उन्हें भाजपा और उसके सहयोगियों के खिलाफ वोट करने के लिए जुटाया जा सके। इसी तरह का पैंतरा उस समय भी आजमाया गया था जब बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को निरस्त कर दिया और नागरिकता संशोधन अधिनियम को पारित किया था। वामपंथियों द्वारा भाजपा को एक ऐसी पार्टी के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया, जो मुस्लिमों की विरोधी है। ऐसा करके, वे अपने पसंदीदा दलों- कॉन्ग्रेस और अन्य वामपंथी दलों को उबारने की कोशिश कर रहे हैं, जो भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के भितरघात के कारण पतन की ओर अग्रसर हैं।

हालाँकि, जब मीडिया संगठनों और वामपंथी विचारकों ने बिहार विधानसभा चुनावों में जदयू-भाजपा गठबंधन पर शून्य मुस्लिम प्रतिनिधित्व का दोष लगाया, तो यहाँ पर ध्यान देने वाली बात है कि उन्होंने जो दोष लगाया है, उसके पीछे कोई तर्क भी है या फिर वो सिर्फ सच्चाई को छुपाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

सच्चाई यह है कि एनडीए गठबंधन के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगियों में से एक, जदयू ने हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनावों के लिए 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। हालाँकि, इनमें से एक भी मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत हासिल नहीं हो सकी।

बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू द्वारा मैदान में उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन

सबा जफर ने जदयू के लिए अमौर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और 22.72 प्रतिशत वोट हासिल किए। हालाँकि, वह एआईएमआईएम उम्मीदवार अख्तरुल ईमान से हार गईं, जिन्होंने 51 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया।

सभी ग्राफ चुनाव आयोग से साभार 
अररिया में, कॉन्ग्रेस पार्टी के उम्मीदवार अबिदुर रहमान ने जेडीयू उम्मीदवार शगुफ्ता अजीम पर व्यापक जीत दर्ज की।

ठाकुरगंज में जदयू के मोहम्मद नौशाद आलम ने 11.46 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि राजद उम्मीदवार ने 41.48 प्रतिशत वोट हासिल कर विधानसभा चुनाव जीत लिया।

जदयू द्वारा मुस्लिम उम्मीदवार के लिए कोचाधामन की कहानी भी निराशाजनक थी। जदयू के मुजाहिद आलम एआईएमआईएम उम्मीदवार मुहम्मद इज़हार असफी से हार गए, जिन्होंने लगभग 50 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किए।

बिहार के कांति में राजद के उम्मीदवार मुहम्मद इजरायल मंसूरी ने जदयू के उम्मीदवार मोहम्मद जमाल को पटखनी दी।

सिकटा विधान सभा क्षेत्र से जदयू के खुर्शीद फिरोज अहमद को सीपीआई (एमएलएल) के उम्मीदवार बीरेंद्र प्रसाद गुप्ता को लगभग 14,000 वोटों के अंतर से हराया।

जदयू के एक और मुस्लिम उम्मीदवार मोहम्मद शरफुद्दीन राजद उम्मीदवार चेतन आनंद से शेहर निर्वाचन क्षेत्र में हार गए।

दरभंगा ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र में राजद प्रत्याशी ललित कुमार यादव और जदयू के फारुकी फातमी के बीच घनिष्ठ चुनावी रस्साकशी देखने को मिली। हालाँकि, अंत में यादव विजयी होकर उभरे।

मरौरा जिले में, राजद के जितेंद्र कुमार रे ने जदयू के अल्ताफ आलम को काफी अंतर से हराया।

महुआ में चुनाव परिणाम मारहरा से अलग नहीं था। यहाँ भी मुकेश कुमार रौशन ने जदयू के मुस्लिम उम्मीदवार अश्मा परवीन को करारी हार दी।

बिहार के डुमरांव में, सीपीआई (एमएलएल) के उम्मीदवार अजीत कुमार सिंह ने चुनाव जीता, जदयू की अंजुम आरा को बढ़िया अंतर से हराया।

राजनीतिक दल उम्मीदवारों की जीत को प्राथमिकता देते हैं

इस तरह से उपरोक्त परिणामों से स्पष्ट है, एनडीए गठबंधन के सहयोगियों द्वारा मैदान में उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों में से कोई भी विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब नहीं हुआ। जदयू ने 43 सदस्यों को विधानसभा भेजा। अगर जदयू के सभी 11 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीत जाते, तो उनके पास विधानसभा की 54 सीटें होतीं, और उनमें से 20 प्रतिशत मुस्लिम होते।

राजनीतिक दल उन उम्मीदवारों का चयन करते हैं जो चुनाव जीतने की सबसे अधिक संभावना रखते हैं। बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों का चयन करना, लेकिन उनमें से एक को भी विधानसभा में नहीं लाना कहीं से भी समझदारी की रणनीति नहीं है। इसलिए, बिहार विधानसभा में एनडीए में मुस्लिम विधायकों के न होने को लेकर गुमराह किया जा रहा है। क्योंकि ऐसा उम्मीदवारों की कमी की वजह से नहीं बल्कि उनके न जीतने की वजह से हैं।