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कारण जिनके चलते राज्य में बीजेपी का राज हुआ अस्त

राजस्थान: 6 कारण जिनके चलते राज्य में बीजेपी का राज अस्त होता दिख रहा है!
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
राजस्थान की राजनीति पांच साल में कितना बदल गई, ये विधानसभा चुनाव के रुझानों से समझा जा सकता है। राजस्थान में बीजेपी ने 2013 में 200 में 163 सीट जीती थीं। इस बार कांग्रेस ने लगातार बढ़त बना रखी है। यानी बीजेपी को राज्य में भारी नुकसान हो रहा है। राजस्थान में बीते दिनों हुए दो लोकसभा सीट और एक विधानसभा सीट के उप चुनावों में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। इससे हवा का रुख बदलने का संकेत मिल गया था। जानें कि वो कौन से कारण हैं, जो बीजेपी की हार का कारण बनें :--
1. राजपूत फैक्टर
माना जा रहा है कि इस बार राजपूत वसुंधरा सरकार ने नाराज थे। इसका नुकसान चुनाव में बीजेपी को उठाना पड़ा। चुनाव के दौरान राजपूत समाज के कई नेताओं ने बीजेपी के विरोध का ऐलान किया। गैंगस्टर आनंदपाल सिंह रावणा राजपूत समाज से था और उसके गैंग के 70 प्रतिशत लोग राजपूत है। मुठभेड़ में उसकी हत्या के बाद राजपूत समाज की नाराजगी बढ़ गई। राजपूत बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक है। उसके नाराज होने से बीजेपी परसेप्शन की लड़ाई चुनाव से पहले ही हार गई। 
2. सचिन पायलट और अशोक गहलोत की जोड़ी
राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने कांग्रेस में नया जोश भरने का काम किया। उन्होंने युवाओं को अपने साथ जोड़ा, जबकि दूसरी ओर अनुभवी अशोक गहलोत ने राज्य में जातीय समीकरणों को साधा। उन्होंने वरिष्ठ नेताओं में भरोसा जगाया कि कांग्रेस में सभी के लिए जगह होगी। राजपूतों की बीजेपी से नाराजगी और माली तथा गुर्जर वोट कांग्रेस के पक्ष में आने से राज्य के चुनावी समीकरण बदल गए।  
3 वसुंधरा राजे की छवि
वसुंधरा राजे की छवि भी बीजेपी की हार की एक वजह रही। राज्य में उनकी महारानी वाली छवि है। आम धारणा है कि वो अपने खास लोगों की कोटरी में रहना पसंद करती हैं और आम जनता के साथ उनका जुड़ाव उतना नहीं है। आम बीजेपी कार्यकर्ताओं और संगठन के लोगों के साथ भी उनका भावनात्मक जुड़ाव कम है
। यही बात पार्टी के अन्य नेताओं पर भी लागू होती है। केवल अपने मनपसंद यानि चमचों के इर्दगिर्द रहकर, दूसरे कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ करना, भी हार का मुख्य कारण है। 

4. बगावत
राजस्थान में बीजेपी पिछले कई चुनावों से बगावत और भीतरघात का सामना कर रही थी। इस बार घनश्याम तिवाड़ी और मानवेंद्र सिंह के रूप में दो बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। घनश्याम तिवारी ने अपनी अलग पार्टी बनाई, जबकि मानवेंद्र में शामिल हो गए। टिकट कटने से नाराज जिला स्तर के कई नेताओं की बगावत ने हालात को बीजेपी के लिए और बिगाड़ दिया। राज्य में पार्टी के नेताओं की बगावत बीजेपी की हार का एक प्रमुख कारण है
। 

5. पद्मावत का विरोध
संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत का राजपूत समाज ने पूरे देश में विरोध किया। हालांकि ये विरोध राजस्थान में सबसे तेज था. राजपूत समाज की वसुंधरा राजे से शिकायत थी कि इस फिल्म के निर्माण और प्रदर्शन को रोकने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाया और बीजेपी पर राजपूतों की उपेक्षा का आरोप लगाया
। 

6. अयोग्य प्रत्याशी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार टिकट बंटवारे को लेकर कांग्रेस ने बाजी मारी. कांग्रेस ने स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखकर कहीं बेहतर टिकट दिए।  जबकि बीजेपी के प्रत्याशियों का जनता के साथ उतना अधिक जुड़ाव नहीं था
। 

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राजस्थान में कांग्रेस ने भाजपा को शिकस्त जरूर दे दी है, लेकिन अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच हो रहे घमासान पर पार्ट...
मध्य प्रदेश की वे सीटें जहां जीत और हार का अंतर 2000 वोटों से भी रहा कम
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद राज्य में कांग्रेस का 15 सालों का वनवास खत्म हुआ है। 15 सालों के लंबे इंतजार के बाद कांग्रेस सत्ता में वापसी करने जा रही है। कांग्रेस ने मध्य प्रदेश की 230 सीटों में से 114 पर जीत हासिल की, हालांकि ये बहुमत के लिए जरूरी 116 सीटों की संख्या से 2 कम था लेकिन सपा और बसपा के समर्थन के अलावा कांग्रेस ने अन्य 4 विधायकों के समर्थन का दावा भी किया है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस के लिए मध्य प्रदेश में चुनौतियां आसान नहीं थीं। शिवराज सिंह चौहान के सामने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार न देने के बाद कांग्रेस ने पूरे चुनाव में सत्ता-विरोधी लहर पर अपना ध्यान लगाए रखा। 
इस चुनाव में बीजेपी को कांग्रेस ने कड़ी टक्कर देते हुए आखिरकार सत्ता में वापसी कर ली लेकिन ये इतना आसान नहीं रहा जितना नतीजे आने के बाद आसान समझा जा रहा है। ऐसी कई सीटें थी जहां पर जीत-हार में मामूली अंतर था और वोटों की गिनती के दौरान कई बार बीजेपी इन सीटों पर कांग्रेस से आगे रही थी। बार-बार कांग्रेस और बीजेपी के बीच आगे-पीछे की रेस चलती रही। इनमें से कुछ सीटों पर बीजेपी को जीत हासिल हुई तो अंत में कुछ सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार विजयी घोषित हुए और पार्टी का आंकड़ा 114 सीटों तक जा पहुंचा।
 क्रम     विधानसभा सीट          विजेता        पार्टी     दूसरे स्थान पर                पार्टी         वोटों का अंतर     1         ग्वालियर              प्रवीण पाठक     कांग्रेस  नारायण सिंह कुशवाहा       बीजेपी     121 

 2         सुवासरा                    हरदीप सिंह      कांग्रेस  राधेश्याम नंदलाल पाटीदार  बीजेपी       350 
 3         जावरा                       राजेंद्र पांडेय      बीजेपी  केके सिंह कलुखेड़ा             कांग्रेस         511  
4         जबलपुर नॉर्थ         विनय सक्सेना   कांग्रेस  शरद जैन                             बीजेपी        578  
5         बीना                     महेश राय       बीजेपी  शशि कठोरिया                 कांग्रेस       632  
6        कोलारस                 बीरेंद्र रधुवंशी      बीजेपी   महेंद्र रामसिंह                     कांंग्रेस        720  
7        दमोह                     राहुल सिंह           कांग्रेस   जयंत मलैया                      बीजेपी        798  
8        बिओरा                  गोवर्धन डांगी       कांग्रेस   नारायण सिंह पनवार        बीजेपी        826  
9       देव तालाब              गिरीश गौतम      बीजेपी   सीमा जयवीर सिंह सेंगर    बसपा        1080  
10     इंदौर-5                  महेंद्र हरदिया      बीजेपी  सत्यनारायण पटेल            कांग्रेस        1133  
11    चंदला                    राजेश कुमार प्रजापति बीजेपी अनुरागी हरप्रसाद        कांग्रेस         1177  
12    नागौर                     नगेंद्र सिंह          बीजेपी   यादवेंद्र सिंह                      कांग्रेस        1234  
13    नेपानगर                सुमित्रा देवी         कांग्रेस   मंजू राजेंद्र दादू                  बीजेपी        1264  
14  ग्वालियर रुरल        भरत सिंह कुशवाहा  बीजेपी  साहब सिंह गुर्जर             बसपा      1517  
15   गुन्नौर                 शिवदयाल बागरी     कांग्रेस  राजेश कुमार वर्मा            बीजेपी     1984
'नोटा' के चलते यहां बदल गई तस्वीर
ब्यावरा में कांग्रेस प्रत्याशी 826 वोट से जीता, जबकि नोटा में 1481 मत गिरे। दमोह में वित्तमंत्री जयंत मलैया 798 मतों से हारे और नोटा में 1299 वोट निकले। गुन्नाोर में जीत हार का अंतर 1984 मतों का रहा, जबकि नोटा में 3734 वोट चले गए। ग्वालियर दक्षिण का फैसला 121 वोटों से हुआ, लेकिन 1550 मतदाताओं ने नोटा दबा दिया। जबलपुर उत्तर में राज्यमंत्री शरद जैन 578 मतों से हारे और 1209 नोटा को अपना मत दे दिया।
जोबट में 2056 मतों से फैसला हुआ, लेकिन नोटा में सबसे ज्यादा 5139 वोट चले गए। मंधाता में भले ही जीत-हार का फैसला 1236 वोट से हुआ हो पर 1575 मतदाताओं ने नोटा को चुना। नेपानगर में भाजपा प्रत्याशी को जीतने के लिए 732 वोट चाहिए थे पर 2551 मतदाताओं ने नोटा का विकल्प अपनाया।

सुर्खियों में रही सीट राजनगर में राजपरिवार के विक्रम सिंह नातीराजा 732 वोट से जीते और 2485 वोट नोटा में चले गए उधर राजपुर सीट पर भाजपा प्रत्याशी को जीत के लिए 932 वोट चाहिए थे, लेकिन 3358 मतदाताओं ने उनके बजाय नोटा का बटन दबा दिया। सुवासरा में भी भाजपा प्रत्याशी को जीतने के लिए मात्र 350 वोट चाहिए थे, लेकिन 2976 मतदाताओं ने उन्हें अथवा किसी अन्य प्रत्याशी को चुनने के बजाय नोटा का विकल्प चुन लिया।
दूसरे, दिल्ली से कश्मीर और कश्मीर से कन्याकुमारी तक पार्टी त्रिमूर्ति मोदी-योगी-अमित पर ही निर्भर है। पुराने कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर, दूसरी पार्टी से आये दलबदलुओं को सिर पर बैठाया जा रहा हैं। भाजपा किसी भी आंदोलन पर आक्रामक होने की बजाए बचाव में व्यस्त रही। विपक्ष भाजपा की इस मजबूरी को अच्छी तरह से समझ चुकी है, उपचुनावों के बाद विधानसभा चुनावों में भी उनका हथियार काम आ गया, अब 2019 लोकसभा चुनावों में भी यही हत्कन्डे अपनाये जाएंगे।

5 राज्यों में कांग्रेस को लाभ 83%, 

भाजपा को 50% नुकसान

5 राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस को हुए लाभ या हानि को देखें तो पिछली बार के मुकाबले इस बार भाजपा को लगभग 50 प्रतिशत का नुकसान उठाना पड़ा है जबकि कांग्रेस को 83 प्रतिशत का लाभ हुआ है।
2013 में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में चुनाव हुए थे जबकि 2014 में आंध्र प्रदेश का चुनाव हुआ था जिससे तेलंगाना बना था। 2013 और 2014 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को सभी 5 राज्यों में मिली सीटें देखे तो कुल 382 सीटें मिली थी जिसमें सबसे अधिक मध्य प्रदेश में 165, राजस्थना में 163 और छत्तीसगढ़ में 49 सीटें आईं थी। वहीं उस समय कांग्रेस को इन सभी राज्यों में कुल 165 ही सीटें मिल पायीं थी।
लेकिन इस बार के चुनावों में कांग्रेस ने BJP पर बढ़त ली है और अपनी कुल सीटों के आंकड़े को 303 तक पहुंचा दिया है, वहीं दूसरी ओर BJP की पाचों राज्यों में सीटें 382 से घटकर अब 192 रह गई हैं। यानि BJP को लगभग 50 प्रतिशत नुकसान हुआ है और कांग्रेस को 83 प्रतिशत का फायदा हुआ है।

राज्यकांग्रेसभाजपा
2013 सीट2018 सीट% बदलाव2013 सीट2018 सीट% बदलाव
छत्तीसगढ़396258.974913-73.46
मध्य प्रदेश5811496.55165106-35.75
राजस्थान21102385.7116371-56.44
मिजोरम 345-58.2901100
तेलंगाना (2014)132053.8451-80
कुल 16530383.6382192-49.6












    

चुनाव परिणाम से पहले ही कांग्रेस में घबराहट में

Related imageमध्यप्रदेश में 28 नवंबर को मतदान सम्पन्न हो चुका है और अब मतगणना का इंतजार है। लेकिन कांग्रेस इस समय खासी चिंता में है। इस चिंता और बैचेनी का कारण केवल 11 दिसंबर को आने वाले चुनावी नतीजे नहीं हैं, बल्कि कुछ और भी है। जिसके चलते कांग्रेस के नेताओं की नींद उड़ी हुई है और वो अब भी काम में जुटे हुए हैं। इतना ही नहीं इसे लेकर ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया को एक ट्वीट भी करना पड़ा।
दरअसल, मतदाताओं का फैसला ईवीएम मशीनों में कैद हो चुका है और परिणाम आना बाकी है।  इस दौरान ईवीएम की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।  इसको लेकर लगातार लापरवाही के मामले भी सामने आ रहे हैं जिससे विवाद बढ़ता जा रहा है और इसे लेकर अब चुनाव आयोग को सफाई देनी पड़ रही है। प्रदेश के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह के विधानसभा क्षेत्र खुरई से ईवीएम मशीनों के 48 घंटे देरी से स्ट्रॉग रूम तक पहुँचने का मामला सामने आया है, जिसके बाद नायब तहसीलदार को सस्पेंड कर दिया गया।
इसी तरह से राजधानी भोपाल के स्ट्रांग रूम के बाहर लगी एलईडी के कुछ देर के लिए बंद होने का मामला भी सामने आया,  जिसके बाद कांग्रेस द्वारा आरोप लगाया गया कि एलईडी बंद होने के पीछे भाजपा का हाथ है और इसको लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा जमकर हंगामा किया गया। ईवीएम की सुरक्षा को लेकर सतना और खरगोन से भी शिकायतें आ चुकी हैं।
आ रही इन शिकायतों को देखते हुये कांग्रेस पार्टी ने निर्वाचन आयोग को ज्ञापन सौंप कर ईवीएम मशीनों में छेडछाड की संभावना जताते हुये मांग की कि ईवीएम मशीनों की निगरानी के लिए लगाये गए कैमरों की रिकार्डिंग का लिंक सार्वजनिक किया जाये तथा मशीनों की निगरानी के लिये उसके कार्यकर्ताओं को स्ट्रांग रूम के नजदीक स्थान उपलब्ध कराया जाये, जहां से वे स्ट्रांग रूम पर नजर रख सकें।
इस सम्बन्ध में कांग्रेस के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बड़ी साजिश का अंदेशा जताते हुये ट्वीट किया है कि  “मेरा प्रदेश के सभी जाबांज़ कांग्रेस कार्यकर्ताओं से भी अनुरोध है कि वो भी मतगणना तक स्ट्रांग रूम पर कड़ी नजर रखे जिससे भाजपा किसी भी तरह की साज़िश में कामयाब ना हो सके।”
Image result for ईवीएमदूसरी तरफ कांग्रेस के इस आरोप पर भाजपा का कहना है कि “ईवीएम मशीन भाजपा कार्यलय में नहीं रखी हैं न ही भाजपा कार्यालय में मतगणना होना है यह कांग्रेस की हार की खिसियाहट है जो वह हार का ठीकरा ईवीएम पर पहले से फोड़ने लगी है।”
ईवीएम मशीनों की सुरक्षा को लेकर चुनाव आयोग ने किसी भी गड़बड़ी की संभावना से इनकार करते हुये कहा है कि ‘चुनाव में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है और जो घटनायें सामने आयी है वे महज मानवीय भूल हैं।’
कांग्रेस को मतगणना में गड़बड़ी की आशंका 
कांग्रस को मतगणना में भी गड़बड़ी का डर सता रहा है इसलिये पार्टी अपने प्रत्याशियों को मतगणना में गड़बड़ी रोकने के लिये ट्रेनिंग देने जा रही है। इसके लिये कांग्रेस के सभी 229 प्रत्याशियों को 6 दिसंबर को भोपाल बुलाया गया है जिसमें उन्हें मतगणना के दौरान क्या सावधानी बरतनी है और इस दौरान होने वाली गड़बड़ियों को कैसे पहचानना और रोकना है इसके बारे में बताया जायेगा।
इतने वर्षों तक कांग्रेस क्यों चुप रही? 
ज्ञात हो, ईवीएम की शुरुआत कांग्रेस ने ही की थी, और उसी कांग्रेस पार्टी द्वारा इसका विरोध करना हास्यप्रद लगता है। इसका अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि कांग्रेस को मालूम है ईवीएम में किस तरह गड़बड़ी की जा सकती है। अगर ईवीएम का प्रयोग उचित नहीं था, इतने वर्षों तक कांग्रेस क्यों चुप रही?   

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव : 15 साल में शिवराज के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनी कांग्रेस

मध्यप्रदेश में 15वीं विधानसभा की  230 सीटों के लिए आज(नवंबर 28)  सुबह 8 से शाम 5 बजे तक मतदान हो रहा है और परिणाम 11 दिसंबर को आएंगे। लगातार चौथी बार सरकार बनाने के लिए प्रयासरत भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने पिछले 15 सालों में सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया की एकता है। 
हालांकि तीनों ही कांग्रेस से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में परस्पर प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान इनकी एकजुटता ने कांग्रेस को कड़ी टक्कर में ला दिया। वहीं बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और आम आदमी पार्टी भी दोनों प्रमुख दलों को चुनौती दे रहे हैं।
इस चुनाव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित भाजपा की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। अगले साल आम चुनाव से पहले जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें मध्यप्रदेश में सबसे अधिक 29 लोकसभा सीटें हैं। विधानसभा चुनाव के परिणाम लोकसभा में भी असर डालेंगे, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। चौहान के अलावा राज्य के वित्त मंत्री जयंत मलैया, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव, जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा समेत केबिनेट के तमाम चेहरे चुनाव मैदान में हैं। 
कांग्रेसी दिग्गजों में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ‘राहुल’, प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव, सुरेश पचौरी और भाजपा छोड़कर होशंगाबाद से कांग्रेस के उम्मीदवार बने पूर्व केंद्रीय मंत्री सरताज सिंह का भविष्य दांव पर लगा है।

भाजपा के 3 सांसद भी मैदान में, कांग्रेस के दो सीएम चेहरे बाहर

इस बार भाजपा के तीन लोकसभा सदस्य अनूप मिश्रा, मनोहर ऊंटवाल और नागेन्द्र सिंह भी चुनाव मैदान में हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे मिश्रा ग्वालियर की भितरवार, ऊंटवाल आगर मालवा और नागेन्द्र सतना की नागौद सीट से किस्मत आजमा रहे हैं। जबकि कांग्रेस से सीएम के दो चेहरे कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। 
हालांकि शिवपुरी जिले में कोलारस से कांग्रेस उम्मीदवार महेंद्र सिंह यादव ने अभी से ऐलान कर दिया है कि कांग्रेस की सरकार बनने पर यदि सिंधिया सीएम बने तो वह चुनाव जीतने पर उनके लिए अपनी सीट खाली कर कर देंगे। यादव ने सिंधिया के सामने भरी सभा में यह ऐलान किया और सिंधिया ने भी इसे स्वीकार कर लिया।
30 सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार
राज्य में अधिकांश सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है। लेकिन करीब 30 सीटें ऐसी हैं, जहां दोनों पार्टियों के बागियों और कुछ स्थानों पर बसपा-सपा के कारण त्रिकोणीय संघर्ष के हालात हैं। डैमेज कंट्रोल के लिए दोनों ही दलों के प्रबंधकों ने आखिर तक जोर लगाया, पर बात बनी नहीं। यह स्थिति प्रदेश के हर अंचल में है।


जो मालवा-निमाड़ जीता, वही सिकंदर

मालवा-निमाड़ क्षेत्र में सर्वाधिक 66 सीटें हैं। माना जाता रहा है कि जिसने यहां किला फतह कर लिया, वो सिकंदर हो जाता है। पिछली बार 66 में से 57 (एक निर्दलीय) सीटें भाजपा के पास थीं। सवाल है कि इस बार भी क्या दृश्य ऐसा ही रहने वाला है? यही हाल राज्य के दूसरे हिस्सों विंध्य, महाकौशल, बुंदेलखंड, ग्वालियर-चंबल और मध्य भारत का है।
पहली बार छह किन्नर भी मैदान में 
पहली बार छह किन्नर प्रत्याशी भी अपनी किस्मत आजमा रही हैं। इनके नाम हैं- अनूपपुर जिले की कोतमा सीट से पूर्व विधायक शबनम मौसी उर्फ शबनम कोल (61), मुरैना जिले की अंबाह सीट से नेहा किन्नर (28), दमोह जिले की दमोह सीट से रिहाना शब्बो बुआ (56), शहडोल जिले की जयसिंह नगर सीट से सल्लू मौसी (30), होशंगाबाद जिले की होशंगाबाद सीट से पांची देशमुख (44) और इंदौर जिले की इंदौर-2 सीट से बाला वैश्वरा (28)। इनमें अंबाह में नेहा किन्नर को सपाक्स पार्टी का समर्थन मिल रहा है।
किसके कितने प्रत्याशी
सीटें : 230
भाजपा : 230
कांग्रेस : 229 (जतारा सीट शरद यादव की पार्टी के लिए छोड़ी)
बसपा : 227
सपा : 51
सपाक्स : 109
आप : 208
शिवसेना : 81
गोंडवाना : 73
निर्दलीय : 1102
कुल उम्मीदवार : 2907
महिला प्रत्याशी : 235

2013 का परिणाम
भाजपा – 165
कांग्रेस – 58
बसपा – 04
अन्य – 03

कुल मतदाता : 5,04,95251
पुरुष मतदाता : 2,63,01,300
महिला मतदाता : 2,41,30,390
थर्ड जेंडर : 1389
पोस्टल बैलेट : 62,172

पहली बार के मतदाता : 10,93,445
इनमें नवयुवक : 6,48,043
नवयुवती : 4,45,330

कुल मतदान केंद्र : 65,340
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार अपनी 2014 चुनाव रैलियों में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी कहते थे, "ना खाऊंगा, ना खाने दूँ.....

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भिंड के लहार विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस प्रत्याशी डॉ गोविंद सिंह, भाजपा प्रत्याशी रसाल सिंह और बसपा प्रत्याशी...

भाजपा के संजय पाठक की संपत्ति सबसे ज्यादा

दोबारा चुनाव लड़ रहे भाजपा और कांग्रेस उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 5-5 करोड़ रुपए है। इनमें भाजपा के 89 और कांग्रेस के 71 करोड़पति उम्मीदवार हैं। सबसे ज्यादा संपत्ति भाजपा के संजय पाठक के नाम है। विजयराघवगढ़ से उम्मीदवार पाठक ने अपनी संपत्ति 141 करोड़ रुपए दर्शाई है। दूसरे नंबर पर भाजपा के ही चेतन कश्यप (120 करोड़ रु.) हैं। कांग्रेस से सबसे ज्यादा संपत्ति वाले उम्मीदवार संजय शर्मा हैं, जो चुनाव से ठीक पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए। उन्होंने अपनी संपत्ति 65 करोड़ दर्शाई है।
शीर्ष पांच अमीर उम्मीदवार
उम्मीदवार      पार्टी       संपत्ति(रुपए में)
संजय पाठक   भाजपा        141 करोड़
चेतन कश्यप    भाजपा       120 करोड़
संजय शर्मा       कांग्रेस        65 करोड़
केपी सिंह          कांग्रेस        60 करोड़
सुरेंद्र पटवा।       भाजपा       38 करोड़

भाजपा के पवैया, कांग्रेस के गिरीश पर सबसे ज्यादा गंभीर मामले

दोबारा चुनाव में उतरे भाजपा के 28 और कांग्रेस के 41 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से भाजपा के 18 और कांग्रेस के 27 उम्मीदवारों पर गंभीर केस दर्ज हैं। भाजपा के 14 प्रतिशत और कांग्रेस के 27 प्रतिशत उम्मीदवारों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले हैं। भाजपा के जयभान सिंह पवैया और कांग्रेस के गिरीश कुमार पर सबसे ज्यादा 8-8 गंभीर केस दर्ज हैं।