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किनकी लापरवाही की वजह से आज पूरा देश कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहा है?

कोरोना की दूसरी लहर से पूरा देश जूझ रहा है। कहीं ऑक्‍सीजन की कमी है तो कहीं मरीजों के लिए अस्‍पतालों में बेड कम पड़ने लगे हैं। हर दिन कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्‍या रिकॉर्ड तोड़ रही है और देश की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं पर भारी दबाव पड़ रहा है, जिससे अफरा-तफरी दिखाई दे रही है। ऐसे में हालात ने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर ऐसा क्‍या हुआ कि कोरोना ने इतना खतरनाक रूप धारण कर लिया और पिछले साल से भी इस साल की स्थिति ज्‍यादा खराब हो गई।

जब पिछले कुछ महीनों पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि कोरोना संक्रमण के मामले कम आने से कई राज्‍यों ने मान लिया था कि अब कोरोना जा चुका है। कोरोना के मरीज न होने के कारण राज्‍य सरकारों ने जो कोविड सेंटर पिछली बार तैयार किए थे उसे बंद कर दिया। वहां लगे वेंटिलेटर और मशीनों को पैक कर दिया गया। जब जनवरी में वैक्सीनेशन की शुरुआत हुई तो इसको कोरोना पर अंतिम प्रहार माना गया। लेकिन इसके साथ ही शुरू हुई लापरवाही और सियासत।

भारत में समस्या यह है कि यहां हर कानून और बीमारी को धर्म/मजहब के चश्मे से देखने की छद्दम धर्म-निरपेक्षों की गन्दी आदत जनता को मुसीबत में डालती आयी है। कोरोना महामारी से निजात मिली भी नहीं थी, कि मोदी विरोधियों ने कृषि कानून की आड़ में दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के नाम पर फसल आढ़तियों का जमावड़ा लगवा दिया, जिसे ख़त्म करने का इन लोगों ने आज तक साहस नहीं किया। क्यों? हर आने वाले चुनावों में जनता को चाहिए कि इस जमावड़े को समर्थन देने वाले समस्त मोदी विरोधियों से पूछे कि अगर कृषि कानून किसान विरोधी थे, फिर किस आधार पर दिल्ली के 'विज्ञापनजीवी' मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने सबसे पहले लागु कर क्यों यू-टर्न लेकर आंदोलन के समर्थन में उतर आए? दूसरे, किस आधार पर हर पार्टी ने अपने-अपने घोषणा-पत्रों में इन कानूनों को लाने की बात कही? तीसरे, जब आन्दोलनजीवियों को कोरोना टेस्ट करवाने के लिए बोलने पर क्यों नहीं टेस्ट करवाया?

5 राज्यों में हुई चुनावी रैलियों में कोरोना नियमों की सभी पार्टियों ने अवहेलना की। बंगाल में मोदी विरोधियों को दिख रही हार के कारण भाजपा को ही नियमों को तोड़ने के आरोपित किया जा रहा है, क्यों? मेरे विचार से अगर बंगाल में भाजपा 100 का आंकड़ा भी छू लेती है, तब भी भाजपा की जीत है, क्योकि 3 सीटों से 100+ बहुत बड़ी बात है। 

फिर दिल्ली में बढ़ रहे मरीजों की संख्या छुपाने के लिए 'विज्ञापनजीवी' केजरीवाल ने मीडिया को अपनी मुठ्ठी में कर लिया। जिस कारण किसी मीडिया ने केजरीवाल और आम आदमी पार्टी से यह नहीं किया कि ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए मिले धन का दुरूपयोग क्यों किया? क्यों नहीं ऑक्सीजन प्लांट लगाए गए?  

दिल्ली में लापरवाही किसने की?

  पीएम मोदी              अरविंद केजरीवाल
आने वाले कोरोना वेब के लिए चेताया

कोरोना को नियंत्रित करने के लिए टीम भेज रहे थे

ऑक्सीजन और दवाइयों की कमी को पूरा करने पर जोर दे रहे थे

Track, Test और Treat पर जोर दे रहे थे

केजरीवाल ने कहा कि चौथा वेब खतरनाक नहीं है

किसान आंदोलन को बल दिया

कोरोना का यूके स्ट्रेन पंजाब से दिल्ली पहुंचाया

ऑक्सीजन टैंकर और दवाइयों पर राजनीति कर रहे थे

कांग्रेस शासित राज्यों ने वैक्सीन को लेकर सियासत शुरू की। केंद्र सरकार पर हमले होने लगे। जहां महाराष्ट्र की उद्धव सरकार वसूली और अन्य मामलों पर ध्यान देने लगी, तो वहीं दिल्ली की केजरीवाल  सरकार को पंजाब और उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव नजर आने लगा। इस सियासी बिसात पर किसान नेताओं को आगे किया गया और दिल्ली को बंधक बना लिया गया। कृषि कानूनों के विऱोध के नाम पर सियासत को प्राथमिकता दी गई और  कोरोना को नजरअंदाज किया जाने लगा। इसका नतीजा हुआ कि कोरोना ने विकराल रूप में फिर वापसी की।

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है, तो मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। यहां की गतिविधियों का असर पूरे देश पर पड़ता है। कोरोना की दूसरी लहर ने सबसे पहले इन दो शहरों को अपने आगोश में लिया। इसके बाद छत्तीसगढ़ में हालत बिगड़ने लगे। राजस्थान और अन्य राज्यों में भी कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ने लगे। 1 अप्रैल, 2021 के बाद से इतनी तेजी से संक्रमण हुआ कि पूरे देश में हाहाकर मच गया। लेकिन कांग्रेस शासित महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हालात काफी बिगड़ गए। पूरे देश के कोरोना संक्रमण के कुल मामलों में आधे से अधिक कांग्रेस शासित पांच राज्यों में है। आइए अब जानते हैं कि दिल्ली और कांग्रेस शासित राज्यों ने कोरोना को इतना विकराल रूप धारण करने में कैसे मदद की और किनकी लापरवाही आज जनता पर भारी पड़ रही है।

महाराष्ट्र में लापरवाही किसने की ?

पीएम मोदी              उद्धव ठाकरे
चिट्ठी लिखकर और मिटिंग करके राज्य सरकार को चेताया

सबसे ज्यादा वैक्सीन महाराष्ट्र को दिया

सबसे ज्यादा ऑक्सीजन महाराष्ट्र को दिया

सबसे ज्यादा रेमडेसिविर महाराष्ट्र को दी

कंगना और अर्नब से बदला ले रहे थे

ये कोरोना-कोरोना क्या है कह रहे थे

100 करोड़ की वसूली करवा रहे थे

फ्री वैक्सीन का श्रेय लेने के लिए आपस में लड़ रहे हैं

छत्तीसगढ़ में लापरवाही किसने की?

    पीएम मोदी              भूपेश बघेल
देश भर में वैक्सीन अभियान चला रहे थे

वेंटिलेटर्स और दवाइयों का इंतजाम कर रहे थे

हर जिले में PSA ऑक्सीजन प्लांट लगा रहे हैं

80 करोड़ लोगों के लिए मुफ्त अन्न की व्यवस्था कर रहे थे

लोगों के बीच वैक्सीन पर भ्रम फैला रहे थे

प्रधानमंत्री की मीटिंग से गायब थे

असम के विधायकों और प्रत्याशियों के साथ पार्टी कर रहे थे

लाशों में कीड़े लग रहे थे, वो चुनाव प्रचार में व्यस्त थे

राजस्थान में लापरवाही किसने की?

पीएम मोदी              अशोक गहलोत
सबसे ज्यादा वैक्सीन प्राप्त करने वाले राज्यों में से एक है राजस्थान

265 मीट्रिक टन ऑक्सीजन प्रति दिन उपलब्ध करा रहे है

50,000 मीट्रिक टन ऑक्सीजन के लिए ग्लोबल टेंडर दे रहे थे

ऑक्सीजन के औद्योगिक इस्तेमाल पर रोक और दाम निर्धारित कर रहे थे

वैक्सीन की कमी का झूठा रोना रो रहे थे

जिनके स्वास्थ्य मंत्री सलमान खान के बॉडीगार्ड शेरा से गप लड़ा रहे थे

2000 कॉन्सेंट्रेटर का टेंडर रद्द कर रहे थे

लचर प्रशासन की वजह से वैक्सीन ही चोरी हो गई

मोदी सरकार ने कोविड-19 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर अपना पक्ष रखा है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार सरकार ने 200 पेज का हलफनामा दायर किया है। जिसमें कहा गया है कि ऑक्सीजन की कमी से निपटने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय 162 संयंत्र लगाने की प्रक्रिया में है। सरकार ने ऑक्सीजन को जुटाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं। हलफनामे में कुछ प्रदेशों में ऑक्सीजन की मांग और उत्पादन की स्थिति का भी जिक्र किया है।

कोविड महामारी के दौरान जनता को हुई परेशानियां को हल्के में लेने के आरोप को केंद्र ने नकार दिया है। सरकार ने कहा कि मुश्किलें दूर करने और जान के नुकसान को कम करने के लिए त्वरित, ठोस और समग्र कदम उठाए जा रहे हैं। संक्रमण के अप्रत्याशित केस के बावजूद युद्ध स्तर पर इससे निपटने के लिए तमाम प्रयत्न किए जा रहे हैं।

मोदी सरकार ने महामारी के मामले में जरूरी चीजों से लैस करने के लिए पेशेवर तरीके से कदम उठाए हैं। महामारी की दूसरी लहर के नागरिकों की दिक्कतों और कष्टों को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। केंद्र ने कहा, रेमडेसिविर की मांग बढ़ने पर सेंट्रल औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने सात मैन्यूफैक्चर्स की 22 मैन्यूफैक्चरिंग साइट को अनुमति दी। साथ ही 12 अप्रैल को तत्काल अतिरिक्त मैन्यूफैक्चरिंग साइट को मंजूरी दी है। सरकार ने कहा कि हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं।

अवलोकन करें:-

कोरोना दूसरी लहर वायरस क्या भारत को कमजोर करने कोई आंतरिक व बाह्य षड़यंत्र है?

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कोरोना दूसरी लहर वायरस क्या भारत को कमजोर करने कोई आंतरिक व बाह्य षड़यंत्र है?

देखिए मोदी सरकार ऑक्सीजन के लिए क्या कर रही है?

  • 7 अप्रैल, 2020 को मेडिकल ऑक्सीजन के उत्पादन के लिए 24 घंटे में लाइसेंस देने का इंतजाम किया।
  • अप्रैल-मई 2020 में 1,02,400 ऑक्सीजन सिलेंडर राज्यों को दिए गए।
  • 20 सितंबर, 2020 को लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन के दाम निर्धारित किए गए।
  • 5 जनवरी, 2021 को 162 PSA प्लांट लगाने के लिए 201 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
  • 16 अप्रैल, 2021 को 50, 000 एमटी ऑक्सीजन के लिए ग्लोबल टेंडर दिए गए।
  • 18 अप्रैल, 2021 को ऑक्सीजन के औद्योगिक इस्तेमाल पर रोक लगाई गई और ग्रीन कॉरिडोर बनाकर ऑक्सीजन एक्सप्रेस की शुरुआत की गई।
  • 22 अप्रैल, 2021 को ‘ऑपरेशन ऑक्सीजन’ की शुरुआत की गई।
  • 25 अप्रैल, 2021 को हर जिले में ऑक्सीजन प्लांट लगाने का फैसला लिया गया। 

अमेरिकन संस्था ‘फ्रीडम हाउस’ ने भारत को बताया ‘आंशिक आजाद’ देश, रिपोर्ट 2021 में भारत के नक्शे से जम्मू-कश्मीर को किया गायब

अमेरिकी संस्था ‘फ्रीडम हाउस’ ने Freedom Report 2021 जारी की है। इस रिपोर्ट में संस्था ने जहां ‘पॉलिटिकल फ्रीडम’ और ‘मानवाधिकार’ को लेकर भारत की रेटिंग घटाई है, वहीं भारत की संप्रभुता के साथ भी खिलवाड़ किया है। रिपोर्ट में भारत का गलत नक्शा इस्तेमाल करते हुए जम्मू-कश्मीर को गायब कर दिया गया है। वहीं इस रिपोर्ट में भारत को ‘आजाद’ मुल्क से हटाकर ‘आंशिक आजाद’ मुल्क बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जबसे मोदी सरकार आई है तबसे यहां अल्पसंख्यकों और दलितों के अधिकार कम हो गए हैं।

भारत की संप्रभुता पर उठाया सवाल 

'फ्रीडम हाउस’ अमेरिका का एक गैर-सरकारी संगठन है। जिस तरह इस संगठन ने भारत के नक्शे से जम्मू-कश्मीर को गायब किया है, उससे पता चलता है कि यह संगठन भारत की संप्रभुता को मान्यता नहीं देता है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और उसके बाद के राजनीतिक घटनाक्रम को आधार बनाकर इसने भारत की रेटिंग गिराने का काम किया है।

 आधारहीन तथ्यों के आधार पर भारत की रेटिंग में गिरावट

फ्रीडम हाउस ने अपनी सालाना रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी की भेदभावकारी नीतियों और मुस्लिम आबादी पर हिंसा को आधार बनाकर फ्रीडम स्कोर को नीचे गिराया है। इससे मोदी विरोधी तथाकथित बुद्धिजीवियों को मोदी सरकार की आलोचना करने का मौका मिल गया है। लेकिन मोदी विरोध में अंधे बुद्धिजीवियों को भारत के गलत नक्शे के इस्तेमाल से कोई परेशानी है। 

‘फ्रीडम हाउस’ जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित संस्था

‘फ्रीडम हाउस’ अमेरिका के अरबपति समाजसेवी जॉर्ज सोरोस द्वारा वित्त पोषित एक एनजीओ है, जो हमेशा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ प्रोपेगैंडा में लगा रहता है। खुद जॉर्ज सोरोस ने जनवरी 2020 में स्विटजरलैंड के दावोस शहर में आयोजित विश्व आर्थिक मंच के कार्यक्रम में कश्मीर और नागरिकता संशोधन कानून को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर बड़ा हमला बोला था।

जॉर्ज सोरोस प्रधानमंत्री मोदी का धूर विरोधी

जॉर्ज सोरोस ने दावोस में कहा था कि देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर आए प्रधानमंत्री कश्मीर में प्रतिबंध लगा वहां लोगों को दंडित कर रहे हैं और लाखों मुसलमानों से नागरिकता छीनने की धमकी दे रहे हैं। सोरोस ने कहा कि राष्ट्रवाद भारत के लिए ‘सबसे बड़ी नाकामी’ बन गया है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद फिर जोर मार रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ा और भयावह झटका यह है कि प्रधानमंत्री मोदी भारत को एक हिंदू राष्ट्र बना रहे हैं।

निवेशक और समाजसेवी हैं जॉर्ज सोरोस

अब आपको जॉर्ज सोरोस के बारे में बताते हैं। दरअसल सोरोस हंगरी मूल का निवासी है, लेकिन अमेरिकी नागरिकता हासिल कर बड़े निवेशक और समाजसेवी के रूप में काम करते हैं। फरवरी 2018 के आंकड़े के मुताबिक, उनके पास कुल 8 अरब डॉलर की संपत्ति है। उन्होंने अपनी समाजसेवी संस्था ओपन सोसायटी फाउंडेशंस को 32 अरब डॉलर से ज्यादा का दान दिया है।
दान देकर विदेशी सरकारों को प्रभावित करने का आरोप
सोरोस अमेरिका की राजनीतिक पार्टी डेमोक्रैट्स के बड़े दानदाताओं में से एक हैं। दुनिया के विभिन्न देशों में कारोबार और समाजसेवा के नाम पर जॉर्ज सोरोस ने वहां की राजनीति को प्रभावित करने करने की कोशिश की है। इसके लिए अपनी दौलत का इस्तेमाल करने के आरोप में अरब के कुछ देशों ने उनकी संस्थाओं पर पाबंदी लगाई हुई है। मध्य पूर्व और पूर्वी यूरोप के कई देशों ने सोरोस की संस्थाओं पर भारी जुर्माना भी लगाया हुआ है।

‘मोदी मर जा तू’: वामपंथी किसान संगठन की महिला 'प्रदर्शनकारी'


जिस तरह से इस प्रदर्शन में देश विरोधी ताकतों की भूमिका बढ़ती जा रही है। उससे धीरे-धीरे यह प्रदर्शन राजनीति से प्रेरित लगने से ज्यादा खतरे की घंटी नजर आने लगा है। वही खतरे की घंटी जिसे शाहीन बाग के दौरान नजरअंदाज किया जाता रहा और अंत में उसका भीषण रूप उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के रूप में देखने को मिला। इसी तरह किसानों की आड़ में भी किसी बड़ी घटना को अंजाम दिया जा सकता है। 

दोनों ही प्रदर्शनों की तुलना करने पर अंतर कुछ नहीं दिखाई देता। जिस प्रकार नागरिकता संशोधक कानून विरोध में "मोदी तेरी कब्र खुदेगी", "योगी तेरी कब्र खुदेगी", "हिन्दुत्व तेरी कब्र खुदेगी" और "fuck hindutva"(देखिए चित्र) जैसी नारेबाजी हो रही थी, और बेशर्म हिन्दू इस प्रदर्शन में ऐसे एकजुटता दिखा रहे थे, मानो वह हिन्दू नहीं। किसी बेशर्म हिन्दू ने विरोध तक नहीं किया, परिणाम विरोध हिन्दू विरोधी दंगे में परिवर्तित हो गया। ठीक वही स्थिति इस तथाकथित किसान आंदोलन की है। वैसे भी आंदोलनकारी स्वयं इस बात के प्रमाण दे रहे हैं कि "हम किसान नहीं", अगर ये किसान होते अपने मुद्दे पर रहते, अनुच्छेद 370 बहाल करने, हिन्दू विरोधी भाषण, खालिस्तान, और  हिन्दू विरोधी दंगे के आरोपियों को रिहा करने की आदि की मांग नहीं करते। अपनी कुर्सी की खातिर हिन्दुओं को अपमानित करने वाले अजमेर जाने की बजाए बीकानेर संग्रहालय जाकर औरंगज़ेब का दस्तावेज़ देखें। 
नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का हल्लाबोल जारी है। किसानों के इस आंदोलन के बीच राजनीतिक दल अपना-अपना झंडा ऊपर रखना चाहते हैं। इसको लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। इस बीच एक नया वीडियो सामने आया है। इसमें ‘प्रदर्शनकारी’ महिलाएँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मरने की दुआ कर रही हैं। 

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में एक महिला को कहते हुए देखा जा सकता है, “मोदी मर जा तू, शिक्षा बेच के खा गया रे मोदी, मर जा तू। रेल बेचकर खा गया रे मोदी, मर जा तू। देश बेच के खा गया रे मोदी, मर जा तू। किसानों को धोखा दे गए रे मोदी, मर जा तू।” वहीं सामने बैठी महिला बार-बार ‘हाय-हाय मोदी मर जा तू’ दोहरा रही थी।

हालाँकि यह स्पष्ट नहीं है कि वीडियो कहाँ का है। लेकिन बैकग्राउंड में अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) और कम्युनिस्ट पार्टी का हथौड़ा देखा जा सकता है। एआईकेएस एक वामपंथी मोर्चा संगठन है। इसके दो गुट हैं- एक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और दूसरा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)। वीडियो में पीछे लगे बैनर से लग रहा है कि यह राजस्थान के घड़साना क्षेत्र का है।

दिल्ली बीजेपी महासचिव कुलजीत सिंह चहल ने इस वीडियो को ट्वीट करते हुए कहा कि ये मेरे देश के किसान नहीं हो सकते। साथ ही उन्होंने सवाल भी किया कि ऐसा करने के लिए इन्हें स्पॉन्सर कौन कर रहा है? उन्होंने इसे शर्मनाक बताया।

इस शर्मनाक वीडियो के सामने आने के बाद लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही है। कोई कह रहा है कि ये कॉन्ग्रेस के लोग हैं तो वहीं कुछ लोग सच का पता लगाने और उन्हें दंडित करने की बात कह रहे हैं।

‘अन्नदाता’ के इस आंदोलन के बीच कई जानी-मानी हस्तियाँ भी समर्थन में आ रही हैं। यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की बातें सामने आई है। इससे पहले भारत के पूर्व-क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह ने भी जहर उगला था।

पंजाबी में दिए भाषण में योगराज सिंह ने कहा था, “मैं इन्हें आपलोगों से ज्यादा जानता हूँ। ये माँ-बेटियों की कसमें खा कर भी पलट जाते हैं। मैं आपको बधाई देता हूँ कि जब अमित शाह ने कहा कि निरंकारी ग्राउंड आ जाओ तो आपलोग नहीं गए। इनकी किसी बात का विश्वास नहीं करना। एक बात और कहना चाहता हूँ जब इनकी औरतों को अहमद शाह दुर्रानी ले जाता और वहाँ टके-टके की बिकती थी, तो पंजाबियों ने बचाया।” https://www.facebook.com/skmisra1942/posts/10218086052452146

जब योगराज सिंह से पूछा गया था कि इस ‘किसान आंदोलन’ में इंदिरा गाँधी की हत्या को याद करते हुए पीएम मोदी को भी धमकी दी गई है, तो उन्होंने कहा था कि जिसने जो बोया है, वो वही काटेगा। उन्होंने इसे भावनाओं की लड़ाई बताते हुए कहा था कि सरकार को ऐसा कोई भी बयान नहीं देना चाहिए, जो भारत को विभाजित करे। उन्होंने भारत सरकार पर मुग़ल बादशाहों बाबर, औरंगजेब और अंग्रेजों से भी ज्यादा क्रूरता और अत्याचार करने के आरोप लगाए।

 योगराज सिंह ने कहा था कि उन्होंने पीएम मोदी सहित भाजपा के अन्य नेताओं के चेहरे देखे हैं, वो सभी ‘शैतानों की तरह’ दिखते हैं। पंजाबी में बोलते हुए उन्होंने कहा कि पीएम मोदी शायद ये नहीं जानते हैं कि भगवान और शैतान एक साथ नहीं रह सकते। 

इसी तरह का एक और वीडियो सामने आया था जिसमें एक तथाकथित किसान द्वारा स्पष्ट तौर पर यह कहते हुए सुना जा सकता था कि जैसे इंदिरा गाँधी को ठोका वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी ठोक देंगे।

वहीं एक वीडियो में प्रदर्शनकारी ‘जय हिन्द’ बोलने से भी इनकार कर रहा था। जब ये सब चल रहा था, तब ओखला से आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक अमानतुल्लाह खान वहीं पर मौजूद थे। वीडियो में एक प्रदर्शनकारी कह रहा था कि वो ‘जय हिन्द’ नहीं बोलेगा और न ही ‘भारत माता की जय’ बोलेगा, सिर्फ ‘जो बोले सो निहाल’ ही बोलेगा। साथ ही उसने कहा था कि वो ‘अस्सलाम वालेकुम’ भी बोलेगा। AAP विधायक अमानतुल्लाह खान की मौजूदगी में प्रदर्शनकारी ने धमकाया कि जैसे इंदिरा गाँधी को ‘सबक सिखाया गया’ था, वैसे ही पीएम मोदी को भी ‘सबक सिखाया जाएगा।’

कांग्रेस की इस हालत का जिम्मेदार कौन ? 😎
राहुल गाँधी का कहना है कि कांग्रेस एक सोच है, कांग्रेस एक विचारधारा है, कांग्रेस ये है, कांग्रेस वो है, कांग्रेस कौन है और कांग्रेस क्या है, कुछ बिंदु आपके समक्ष, ध्यानपूर्वक पढ़िए :
* कांग्रेस वही है जिसने महाराणा प्रताप की जगह अकबर को महान किताबों में पढाया।
* कांग्रेस वही है जिसने शिवाजी महाराज की जगह औरंगजेब को महान बनाया | संभाजी नगर का नाम औरंगाबाद कर दिया, दिल्ली में औरंगजेब के नाम पर मुख्य सड़क बना दी |
* कांग्रेस वही है जिसने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने की सिफारिश की और तो और इनका नाम शहीदों की लिस्ट में नहीं आने दिया ।
* कांग्रेस वही है जिसने भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद को उग्रवादी बताया आतंकी बताया और नेहरू को क्रन्तिकारी बताया |
* कांग्रेस वही है जिसके नेहरू ने मुखबरी करके चंद्रशेखर आज़ाद को मरने पर मजबूर किया।
* कांग्रेस वही है जिसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज का विरोध किया, आज़ाद हिन्द फ़ौज का धन लूट लिया |
* कांग्रेस वही है जिसके कालखंड में 1990 में कश्मीर घाटी में भयंकर कत्लेआम हुआ | 5 लाख हिन्दुओं को घाटी छोड़नी पड़ी।
* कांग्रेस वही है जिसने 2G घोटाला, आदर्श सोसायटी घोटाला, CWG घोटाला, तेलगी घोटाला, कोयला घोटाला, दूरसंचार घोटाला, हर्षद मेहता घोटाला जैसे कई घोटाले हुए |
* कांग्रेस वही है जिसके राज में चीन 2013 में 19 km अंदर हमारी सीमा में घुस आया | अब मोदी राज में हम 19 km डोकलाम में गये।
* कांग्रेस वही है जिसके कालखण्ड में सैनिकों का अपमान होता था, कर्नल पठानिया समेत 5 सैनिकों को उम्रकैद की सजा दी गयी |
* कांग्रेस वही है जिसके एक परिवार के नेताओं के नाम से 650 योजनाएँ हैं | क्यों भाई और कोई महापुरुष देश में नहीं हुए क्या?
* कौनसा कांग्रेसी फांसी पर चढ़ा ? एक तो नाम बताओ।
* कांग्रेस की वजह से देश का विभाजन हुआ।
* कांग्रेस जिसके नेता JNU में देशविरोधी नारे लगाने वालों का स्पोर्ट करते हैं।
* कांग्रेस वही है जिसने मदरसों में तिरंगा फहराने और राष्ट्रगान गाने का विरोध किया।
*कांग्रेस वही है जिसके नेता खुल्लेआम केरल में गाय को काटकर खाते हैं*
* कांग्रेस वही है जिसने तुष्टिकरण हेतु हिन्दुओं को बदनाम करने हेतु भगवा आतंकवाद कहा, इसी कांग्रेस ने आतंकियों को "साहब" कहा, हाफिज साहब और ओसामा जी बताया, वहीं हिन्दुओं को आतंकी बताया |

* कांग्रेस वही है जिसने पत्थरबाजों को भाई बताया और सेना प्रमुख को गली का गुंडा बताया |
दिल्ली पर बड़ा खतरा मंडराने लगा है
*कितनी भी बातचीत कर लो*
कितना भी समझा लो, इनमें नकली किसान नेताओं की जायज़ नाज़ायज़ मांगे भी मान लो।
*फिर भी हिंसा तो हो कर ही रहेगी, सारी तैयारी और फंडिंग हिंसा के लिए हो रही है।*
दिल्ली दंगे की तरह गोली भी खुद ही चलाएंगे और जान भी अपनों की लेंगे, विपक्ष को किसी भी कीमत पर मोदीजी को किसान विरोधी सिद्ध करना है। इसलिए एक बार फिर से ये सारे गिद्ध इकट्ठे हैं, इन्हें लाशें गिरने का इंतज़ार है।
*इनमें कांग्रेस है, आप है, अकाली दल है, वामपंथी है, योगेंद्र यादव है, JNU गैंग है, अमानतुल्ला खान है, खालिस्तानी हैं, रावण है, पप्पू यादव है, शहीनबाग वाली दिहाड़ी की दादी है, इनमें बहुत से सिखों का वेश धरे मुसलमान हैं,* हाथरस वाली नक्सली भाभी है तलवारें है डंडे हैं बंदूकें भी होंगी अभी पता नही है किरपाण है बरछा है
*इनके पास मोटे गद्दे हैं, झक सफ़ेद रजाइयां और ढेरों कम्बल भी हैं, अनवरत चाय की चुस्कियां हैं, चौबीस घंटे तर माल वाले लंगर हैं, डिज़ाइनर कपडे हैं, डिज़ाइनर टोपियां हैं.*
कनाडा का बेवकूफ पप्पू प्रधानमन्त्री है इंग्लैंड के भारत विरोधी सांसद भी हैं
*बहुतों के हाथों में महंगे वाले मोबाइल हैं, fortuner गाडियाँ हैं, 6 महीने का राशन हैं, 1000 से ज्यादा ट्रेक्टर हैं लक्ज़री बसें है कनाडा के खालिस्तानी 10 mn डॉलर की मदद की घोषणा कर दी है*
ये लोग इतनी बड़ी तैयारी करके आये हैं, निहंगों की टोलियां पँजाब से निकल चुकी हैं, और इन्होंने तो दिल्ली को घेर भी लिया है और बिना हिंसा के और बिना लाशें गिराए वापस चले जाएंगे? ये हो नहीं सकता
*ये देशद्रोही इस मुद्दे को पूरा निचोड़ लेंगे तो अचानक ये मुद्दा गधे के सींग की तरह गायब हो जाएगा... नया मुद्दा प्रकट होगा... रंगभूमि बदल जायेगी पर कलाकार वही होंगे फिर अवार्ड वापिसी होगी, वहां सभी फिर इक्कठे होंगे, फिर देश को बंधक बनाएंगे*
देश विरोधी ताकतें अकूत धन और गद्दारों की फौज के साथ देश को उसी पुराने पतन के गढ्ढे में धकेलने को आतुर हैं.
मज़बूत और ईमानदार देश उनके किस काम का.. जहाँ भ्रष्टाचार की संभावना ही न हो?
*यह किसान आंदोलन बिना बड़ी जानमाल के नुक्सान के ख़त्म नहीं होगा

‘जय हिन्द नहीं… भारत माता भी नहीं, इंदिरा जैसा सबक मोदी को भी सिखाएँगे’ – अमानतुल्लाह के साथ प्रदर्शनकारियों की धमकी

                    विधायक अमानतुल्लाह खान (बाएँ) और धमकी देने वाला प्रदर्शनकारी (दाएँ) [गोल पीले घेरे में]
दिल्ली में हो रहे ‘किसान आंदोलन’ पर खालिस्तानी ताकतों के कब्जा करने और इस्लामी संगठनों द्वारा उसे बढ़ावा देने के कई मामले सामने आए हैं। इसी बीच एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें एक प्रदर्शनकारी ‘जय हिन्द’ बोलने से भी इनकार कर रहा है। जब ये सब चल रहा था, तब ओखला से आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक अमानतुल्लाह खान वहीं पर मौजूद थे। इस विवादित वीडियो के सामने आने के बाद इस प्रदर्शन के पीछे के ताकतों के बारे में पता चल रहा है।

इस वीडियो में एक प्रदर्शनकारी कह रहा है कि वो ‘जय हिन्द’ नहीं बोलेगा और न ही ‘भारत माता की जय’ बोलेगा, सिर्फ ‘जो बोले सो निहाल’ ही बोलेगा। साथ ही उसने कहा कि वो ‘अस्सलाम वालेकुम’ भी बोलेगा। AAP विधायक अमानतुल्लाह खान की मौजूदगी में प्रदर्शनकारी ने धमकाया कि जैसे इंदिरा गाँधी को ‘सबक सिखाया गया’ था, वैसे ही पीएम मोदी को भी ‘सबक सिखाया जाएगा।’ उक्त प्रदर्शनकारी ने ‘मानवता’ की भी बातें की।

ट्विटर पर लगती इनकी क्लास

बुराड़ी के निरंकारी समागम ग्राउंड में जाकर अमानतुल्लाह खान ने वो अपने समर्थकों के साथ यहाँ पर इसीलिए आए हैं, ताकि प्रदर्शनकारियों को कोई परेशानी न हो। भोजन और रहने की व्यवस्था भी उनके द्वारा वहीं की जा रही है। इस ग्राउंड पर विरोध प्रदर्शन के लिए सरकार ने अनुमति दे रखी है। विधायक ने कहा कि इन प्रदर्शनकारियों को किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसका ख्याल रखा जा रहा है।

इससे पहले भी इसी तरह का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें एक तथाकथित किसान द्वारा स्पष्ट तौर पर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि जैसे इंदिरा गाँधी को ठोका वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी ठोक देंगे। एक प्रदर्शनकारी ने कहा था, “अगर 3 दिसंबर की उस मीटिंग में कुछ हल नहीं निकला तो बैरिकेड तो क्या हम तो इनको (शासन प्रशासन) ऐसे ही मिटा देंगे। हमारे शहीद उधम सिंह कनाडा की धरती पर जाकर उन्हें (अंग्रेज़ों को) ठोक सकते हैं तो दिल्ली कुछ भी नहीं है हमारे लिए। जब इंदिरा ठोक दी तो मोदी की छाती भी ठोक देंगे।” 

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद शेखर गुप्ता के द प्रिंट ने श्रमिक ट्रेनों के किराए पर परोसा झूठ

प्रोपगेंडा पत्रकार शेखर गुप्ता ने 'द ...
कोरोना संकट के बीच मोदी सरकार के ख़िलाफ़ बोलने के लिए मीडिया को कुछ नहीं मिल रहा तो उसका एक धड़ा श्रमिक ट्रेनों पर अपने झूठों, अटकलों और भ्रमित करने वाली रिपोर्टिंग से सवाल उठा रहा है।
28 मई को सुप्रीम कोर्ट में एक केस की सुनवाई हुई। केस मुख्यत: उन श्रमिकों से संबंधित था, जिन्हें लॉकडाउन के कारण काफी परेशानियों का सामना कर पड़ा रहा है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में हुई इस केस की सुनवाई पर जो रिपोर्टिंग हुई, उसने केवल इस बात का खुलासा किया कि आखिर द प्रिंट विपक्षी दलों को फेक न्यूज फैलाने की सलाह देने के बाद खुद भी इस हथकंडे को आजमा रहा है।
दरअसल, गुरुवार (28 मई 2020) की रात प्रिंट ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इस लेख में बताया गया कि मोदी सरकार ने आखिरकार इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि वह श्रमिक ट्रेन का खर्चा नहीं उठा रही। इसका भुगतान राज्य कर रही है।
इस लेख से द प्रिंट की मंशा साफ थी। वह कहना चाहता है कि मोदी सरकार ने पहले लोगों को भ्रमित किया और अब सुप्रीम कोर्ट के सामने इस बात का स्पष्टीकरण दिया है कि वे श्रमिक एक्सप्रेस के किराए का भुगतान नहीं कर रहे, बल्कि पूरा बिल भरने का दारोमदार राज्य पर है। ध्यान रहे कि यहाँ पर ‘Entire (सम्पूर्ण)’ शब्द का प्रयोग किस तरह प्रवर्तनशील मूल्य (operative value) के लिए किया गया है। 
इस लेख के पहले पैराग्राफ से ही दिख गया कि द प्रिंट अपने पाठकों को ये बताना चाहता है कि मोदी सरकार ने पहले झूठ बोला था कि वह श्रमिक ट्रेनों का 85% प्रतिशत किराया चुकाएगी और राज्यों को 15% चुकाना होगा। अपने पहले पैराग्राफ में द प्रिंट ने केंद्र सरकार की ओर से दिए बयान को स्पष्टीकरण बताया और लिखा कि प्रवासी मजदूरों की टिकटों का भुगतान केंद्र सरकार नहीं कर रही, बल्कि इसका जिम्मा राज्य सरकारों पर है।
कुल मिलाकर किसी भी साधारण पाठक के लिए द प्रिंट ने अपने आर्टिकल में दो बातें मुख्यत: बताई है:
  1. केंद्र सरकार ने झूठ बोला।
  2. प्रवासी मजदूरों के लिए चलाई जा रही श्रमिक ट्रेनों के टिकट का ‘सम्पूर्ण’ खर्चा राज्य सरकार दे रही हैं।
बाद में द प्रिंट ने अपने आर्टिकल के आखिरी में रेलवे मंत्रालय के स्पष्टीकरण वाला हिस्सा भी जोड़ा। उन्होंने लिखा कि रेलवे ने द प्रिंट को बताया कि केंद्र सरकार सरकार ने हमेशा कहा कि वह प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्य भिजवाने के लिए चलाई गई श्रमिक ट्रेनों के लिए रेलवे को 85% भुगतान करेगी और किराया संबंधी भुगतान राज्यों द्वारा किया जाएगा।
इस व्याख्या के बाद भी, जिससे श्रमिक ट्रेनों के किराए पर कोई प्रश्न ही नहीं बचता, उसे लेख में द प्रिंट ने एकदम आखिर में लिखा और उसके बाद विपक्षियों के कुछ झूठे बयानों को एजेंडा चलाने के लिए रिपोर्ट में जोड़ दिया। जबकि लेख की शुरुआत में वह अपना झूठ बोलता रहा कि सरकार ने श्रमिक ट्रेनों पर अब स्पष्टीकरण दिया है।
द प्रिंट के साथ अन्य मीडिया ने भी फैलाया झूठ 
द प्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में बिजनेस स्टैंडर्ड का लिंक लगाया, जिसमें इसी खबर को ऐसे ही झूठ के साथ फैलाया जा रहा था, बस उसे पेश करने का तरीका अलग था। रिपोर्ट की हेडलाइन थी, “विवादों के बाद सरकार ने श्रमिकों के लिए ट्रेन का 85% किराया रेलवे को अदा किया।”
इसके बाद, लेख के दूसरे पैराग्राफ में उन्होंने भी द प्रिंट की तरह रेलवे प्रशासन के बयान को कोट किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि श्रमिक ट्रेनों की लागत का 85% केद्रीय सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है।
मंत्रालय के प्रवक्ता को कोट करते हुए बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा, “हमने राज्यों के अनुरोध पर विशेष ट्रेनें चलाने की अनुमति दी है। हम मानदंडों के अनुसार लागत को 85-15 प्रतिशत (रेलवे: राज्यों) में विभाजित कर रहे हैं। हमने राज्यों से कभी नहीं कहा कि वे फँसे हुए मजदूरों से पैसा वसूलें।”
साफ है कि बिजनेस स्टैंडर्स ने भी मामले में सारी जानकारी रखते हुए, लेख के भीतर सच्चाई को बताते हुए, हेडलाइन के जरिए पाठकों को भ्रमित करने का प्रयास किया।
केन्द्र दे रही 85% खर्चा 
अगर कोई व्यक्ति आम स्थिति में ट्रेनों की टिकटों को देखता है, तो उसे मालूम चलेगा कि उसमें ये साफ लिखा होता है कि उसे चार्ज की गई राशि यात्रा के लिए खर्च की गई लागत का केवल 57% है।
मगर, श्रमिक ट्रेनों के लिए, यात्रा के दौरान सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने के लिए केवल 2/3rd सीटें भरी जाएँगी। यानी दाई और बाई ओर की सीटें भरी जाएँगी, लेकिन बीच की सीट खाली रहेगी। इसी प्रकार टॉप और बॉटम बर्थ भी यात्रियों को दिए जाएँगे। मगर मिडिल बर्थ खाली रखा जाएगा। इनके कारण इनका शुल्क घटकर 38% हो जाएगा।
श्रमिकों को मुद्दा बनाने से पूर्व मीडिया को धरातल पर आकर सच्चाई को जानना चाहिए था, जिसे मोदी विरोधियों ने राजनीतिक प्रभाव के चलते नहीं किया। मीडिया ने लॉक डाउन के चलते हज़ारों श्रमिकों के सड़क पर आने की सच्चाई जनता के सम्मुख लाने का साहस नहीं किया, क्यों? लॉक डाउन के चलते किसने श्रमिकों को बताया कि उस अमुक स्थान से बसें चलेंगी? दूसरे, जब दिल्ली और अन्य राज्यों की सरकारें, स्वयंसेवी संस्थाएं रोज लाखों भूखों और श्रमिकों को भोजन वितरित कर रही हैं, फिर किस आधार पर एक राज्य से अपने राज्य जाने वाले श्रमिकों का यही कहना है कि "हम भूख से मर रहे हैं, हमारे पर पैसे नहीं" आदि आदि। इतना ही कई मालिकों का तो यह तक कहना है कि "अपने श्रमिकों को परिवार का हिस्सा मानते उनको किसी भी तरह की भूख-प्यास महसूस नहीं होनी दी, लेकिन जैसे ही लॉक डाउन में मिल रही छूट के चलते होटल खुलने के आसार नज़र आते देख, सारे श्रमिक भाग गए।" क्या मीडिया ने इस सच्चाई को जानने की कोशिश की? खैर, इसमें कोई राय नहीं, कि श्रमिकों पर मोदी विरोधी राजनीती कर कोरोना लड़ाई में सरकार को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। किसी खोजी पत्रकार ने दिल्ली, महाराष्ट्र और बंगाल आदि राज्यों में कोरोना पीड़ित और हो रही मौतों की वास्तविक संख्या सामने लाकर इन सरकारों को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास नहीं किया, क्यों? लेकिन इस सच्चाई को छुपाने श्रमिकों को ही मुद्दा बनाकर उछाला जा रहा है। 
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श्रमिकों के लिए चलाई गई ये विशेष ट्रेनें हैं और पूरी तरह से खाली होकर वापस होंगी, इसलिए यात्री की लागत को आधे से विभाजित किया गया है, जो कि 19% होगी। मगर बावजूद इसके भोजन और स्वच्छता जैसी यात्री सेवाओं को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकारों को कुल लागत का 15% भुगतान करने के लिए कहा गया था, शेष 85% केंद्र सरकार द्वारा वहन किया गया था।
15% चार्ज जो राज्य सरकार पर लगाया गया है, उसका उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि राज्य सरकार भी इस मामले पर गौर करें। अगर, यात्रा को रेलवे और केंद्र सरकार मुफ्त करवा देगी तो प्रवासी मजदूरों के अलावा कई ऐसे लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाएगी जो एक राज्य से दूसरे राज्य में सफर करना चाहते हैं। बीते दिनों हमने ऐसे नजारे महाराष्ट्र में बांद्रा के एक मस्जिद के पास और दिल्ली में आनंद विहार में देखे। अगर 15 प्रतिशत से राज्य सरकार की भागीदारी श्रमिकों को भेजने में रहती है, तो वे इसकी जिम्मेदारी लेंगे और प्रवासी मजदूरों की स्क्रीनिंग के बाद उनकी लिस्ट के साथ सामने आएँगे। ताकि उन्हें टिकट मिल सके।
सॉलिसिटर ने आखिर क्या कहा था?
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई के दौरान सॉलिस्टर जनरल ने कुछ चुनिंदा सवालों के जवाब दिए।

ये सवाल केवल किराए ये संबंधित थे। सॉलिस्टर जनरल ने कहा कि इनका भुगतान सरकार द्वारा किया जाएगा। अब ध्यान रहे कि राज्य सरकार द्वारा दिए जा रहे 15% खर्चे में ही ये किराए का खर्चा आता है। लेकिन, फिर भी द प्रिंट ने फर्जी नैरेटिव गढ़ने के लिए और अपना एजेंडा चलाने के लिए बयानों को तोडा-मरोड़ा और हमेशा की तरह झूठी खबरें फैलाने का काम किया।
द प्रिंट के शेखर गुप्ता और एटिडर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट के सामने उनकी ही वेबासइट से एक तर्क रखें- जिनका एक लंबा और कथित तौर पर सम्मानजनक कैरियर समाचार पत्रों के साथ रहा है।
एक बहुत पुराना अखबार, जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया, जिसमें 48 पेज होते हैं और उसकी कीमत 5 रुपए होती है और इसमें भी 40% डिस्ट्रिब्यूटर्स द्वारा ले लिया जाता है। बाद में मीडिया संस्थान को केवल 2.40 रुपए मिलते हैं। अब पेज छपने की लागत 0.25 है और जब 48 पेज छपते हैं, तो कुल लागत 12 रुपए की आती है। ऐसे में कर्मचारियों और समाचार एजेंसियों का आदि भुगतान करने के लिए कुल लागत 3 रुपए है। सब मिलाकर एक अखबार 15 रुपए में तैयार होता है। तो क्या, उपभोक्ता से केवल 5 रुपए लेना, किसी भी रूप में तार्किक है क्या? जाहिर है नहीं।
ये उक्त जानकारी द प्रिंट के ही एक हालिया आर्टिकल में पब्लिश हुई है। इसलिए ये बात साफ है कि शेखर गुप्ता इन बातों को अच्छे से जानते हैं कि अखबारों को विज्ञापनों के जरिए पैसा आता है और सरकार भी अप्रत्यक्ष रूप से न केवल उन्हें एड के लिए पैसे देती है, बल्कि सब्सिडी इत्यादि से अखबारों को आर्थिक मदद देती है। और, अगर अखबार खुले में बिकता है, तो उसके प्रमोटर उसके लिए उसे भुगतान करते हैं।
अब यही तर्क, जो अखबार के लिए आता है, वही ट्रेनों के मामले में भी लागू होता है। बावजूद इसके शेखर गुप्ता की वेबसाइट मानती है कि यात्रा का किराया ही ट्रेन का आखिरी किराया होता है। इसका इस्तेमाल ट्रेन संचालित करने के लिए किया जाता है और जो पार्टी उस किराए की भरपाई करती है, वही पार्टी या सरकार पूरी किराए का भुगतान करती है।
श्रमिक ट्रेनों के मामले में, टिकटों की अंतिम कीमत कुल परिचालन लागत का सिर्फ 15% है, जैसे अखबार की अंतिम कीमत कुल परिचालन लागत का सिर्फ 33% है। फिर भी, शेखर गुप्ता की वेबसाइट बेईमानी से बताती है जैसे कि अंतिम कीमत केवल एक चीज है जो मायने रखती है।
कुछ दिनों पहले शेखर गुप्ता के द प्रिंट ने स्पष्ट रूप से सुझाव दिया था कि विपक्षी दल मोदी सरकार के बारे में फर्जी खबरें फैलाएँ ताकि वे नरेंद्र मोदी सरकार के ‘झूठों’ को काट सकें।
अब द प्रिंट की हरकतों को देखकर ऐसा लगता है कि शेखर गुप्ता की अगुवाई में मीडिया संस्थान ने जो बिंदुवार तरीके विरोधियों को बताए थे, उन पर अब वह खुद अमल करने लगा है। ताकि न केवल मोदी सरकार को बदनाम किया जा सके, अपितु विरोधियों को इसका फायदा पहुँचाया जा सके।