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| प्रतीकात्मक |
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार
आज अख़बार निकालने की आड़ में पत्रकारिता को किस कदर कलंकित करने में जुटे हैं, शर्म आती है ऐसे लोगों को पत्रकार कहने में। मेरी आयु के वरिष्ठ पत्रकार सरदार दुर्लभ सिंह के नाम से अच्छी तरह परिचित होंगे। जिनकी दिनचर्या सुबह दारू से शुरू होकर रात को सोने पर ही पूर्ण होती थी, नई दिल्ली स्थित कनॉट प्लेस से मासिक पत्रिका निकालते थे, ऑफिस में एक से बढ़कर एक हसीन युवती थी, लेकिन कभी इस तरह की घिनौनी हरकत नहीं सुनी।
लेकिन हवस के रसिया किसी न किसी रूप में पत्रकारिता की आड़ में इन घिनौने कामों को अंजाम देने में लगे हैं। भोपाल से एक अखबार निकलता है। नाम है – अफ़कार। जो इसे प्रकाशित करता है, वो पत्रकार है और मालिक भी। उसका नाम है – प्यारे मियाँ। प्यारे मियाँ की उम्र 68 साल है। पत्रकार, अखबार छापने वाली कंपनी का मालिक भी और उम्र साठ के ऊपर! मतलब इलाके में रसूख पूरा। भोपाल में प्यारे मियाँ ने इसी का फायदा उठाया और कम उम्र की लड़कियों को अपना शिकार बनाया। लेकिन फँस गया।
हुआ यह कि देर रात गश्त करती पुलिस पार्टी को 5 लड़कियाँ सड़क पर दिखीं। कारण पूछा गया तो जवाब देने के हालत में एक भी लड़की नहीं थी। सब शराब के नशे में थीं। नाबालिग लड़कियों का शराब के नशे में होना पुलिस को खटका। पुलिस ने सभी 5 लड़कियों को चाइल्ड लाइन को सौंप दिया। फिर इनकी काउंसलिंग की गई। जब पूछताछ हुई तो इन्होंने यौन शोषण का खुलासा किया।
घटना वाली रात इन पाँच लड़कियों में से सिर्फ एक लड़की के साथ प्यारे मियाँ ने रेप किया। लेकिन बाकी चार लड़कियों के साथ कभी कुछ नहीं हुआ है, ऐसा नहीं है। ऊपर पुलिस के द्वारा दिए प्रेस नोट को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि प्यारे मियाँ अपने असिस्टेंट स्वीटी के साथ मिलकर काफी दिनों से इन लड़कियों का यौन शोषण करता रहा है।
पार्टियों में पैसे के बदले डांस करने और उसके बाद यौन शोषण (संभोग, रेप) के लिए प्यारे मियाँ ने इन नाबालिग लड़कियों को अपने जाल में फँसाया। और इस काम के लिए उसका साथ दिया असिस्टेंट स्वीटी ने। इस मामले में अब तक की जाँच में भोपाल के 5 बड़े नाम सामने आ रहे हैं। लड़कियों ने पुलिस को बताया है कि उन्हें शाहपुरा क्षेत्र में शनिवार की रात एक जन्मदिन की पार्टी में नाचने के लिए ले जाया गया था।
प्यारे मियाँ ने अपनी सहायक स्वीटी विश्वकर्मा की मदद से इन लड़कियों को अपने यहाँ नाचने के लिए बुलाया था। विष्णु हाइट्स स्थित फ्लैट में पार्टी के दौरान प्यारे मियां द्वारा एक नाबालिग का यौन शोषण करने की बात भी सामने आई है। इन पाँचों लड़कियों ने भी प्यारे मियां पर लैंगिक शोषण का आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें समय-समय पर उस फ्लैट में ले जाया जाता था। उन्हें इसके लिए धनराशि भी दी जाती थी।
सब कुछ स्वीटी विश्वकर्मा ही मैनेज करती थी और प्यारे मियां की तरफ से उन लड़कियों को धनराशि देने का प्रलोभन दिया करती थी। उन्हें पार्टियों के बहाने बुलाया जाता था और उनके साथ सेक्स किया जाता था। पुलिस 68 वर्षीय आरोपित की तलाश में लगी हुई है और उसकी सहायिका 21 वर्षीय स्वीटी को गिरफ्तार कर चुकी है। प्यारे के खिलाफ विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कर ली गई है और आगे की कार्रवाई की जा रही है।
पुलिस अब ये पता लगाने में जुटी है कि प्यारे मियाँ ने अब तक कितनी लड़कियों के साथ ज्यादती की है और कितनों की जबरन शादी कराई है। इस मामले में कई रसूखदारों के नाम सामने आने के कारण भी ये बड़ा मुद्दा बन सकता है। क्योकि बिना किसी रसूक के कोई ऐसे काम को अंजाम नहीं दे सकता। यह भी संभव हो सकता है कि अपने किसी काम को अंजाम देने के लिए भी बालाओं का प्रयोग किया जाता हो। इसका तो गंभीर जाँच में खुलासा हो पाएगा।
आर.बी.एल.निगम
एक समय था जब पत्रकारिता को लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ के नाम से चर्चित थी, लेकिन प्रशांत और इनके समर्थक पत्रकारिता के नाम को कलंकित कर रहे हैं। एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते अपने स्तम्भ "झोंक आँखों में धूल-चित्रगुप्त" में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह पर देखिए क्या प्रकाशित किया था, इस पाक्षिक के मुख्य सम्पादक तत्कालीन केन्द्रीय मन्त्रियों सहित डॉ मनमोहन सिंह को भी प्रति देकर आते थे। प्रधानमंत्री हो या कोई मंत्री आलोचना करो, लेकिन आलोचना का आधार होना चाहिए। जिसमें समाज एवं देश के लिए कल्याणकारी हो।
लेकिन जो प्रायोजित आलोचना करने में व्यस्त हो, उन्हें प्रशांत जैसे हालात से रूबरू होना पड़ता है। वास्तव में देश में फैला व्याप्त छद्दमवाद ही समाप्त समस्याओं की जड़ है। दूसरे, जब तक देश तुष्टिकरण भी नासूर बना हुआ है। इन्हीं दोनों-छद्दमवाद और तुष्टिकरण- ने ही भारत को इसके वास्तविक इतिहास से अज्ञान रखा हुआ है और जो वास्तविकता से रूबरू करवाना चाहता है, इन्हीं जैसे पत्रकार उसे साम्प्रदायिक और न जाने किस-किस नाम से सम्बोधित कर बदनाम करते हैं।
स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत कनौजिया को उत्तर प्रदेश पुलिस ने आठ जून को गिरफ्तार कर लिया। इसकी खबर मिलते ही दिल्ली के वामपंथी पत्रकार और कथित बुद्धिजीवी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ लामबंद हो गए। सागरिका घोष, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, एस वरदारजन, रोहिणी सिंह, रावि नायर, मोहुआ चटर्जी, संजुक्ता बसु, स्मिता शर्मा, शबनम हाशमी, उमर खालिद, कविता कृष्णन, इंदिरा जयसिंह और प्रशांत भूषण आदि जैसे घाघ मोदी विरोधी सोशल मीडिया पर आवाज उठाने लगे कि ‘प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में है’। लेकिन इनमें से किसी ने यह जानने की जरुरत नहीं समझी कि प्रशांत कनौजिया वास्तव में ‘ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के अधिकार को ढाल बनाकर कैसी पत्रकारिता करता है। वह देश के प्रधानमंत्री, मंत्री और जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर जहर और नफरत फैलाने के काम को ही पत्रकारिता का उद्देश्य मानता है।

प्रशांत कनौजिया ने हाल ही में सोशल मीडिया पर जिन विचारों को व्यक्त किया है, उसको पढ़कर आप दंग रह जाएंगे और सोचने पर मजबूर होंगे कि क्या यह भारत के एक पत्रकार की सोच है या किसी दुश्मन देश के पत्रकार की?
आखिर किस सोंच और किसके संरक्षण में इस तरह की प्रशांत पत्रकारिता कर रहे हैं? स्वतन्त्र पत्रकारिता के भी नियम होते हैं। मैंने भी 1980 से स्वतन्त्र पत्रकारिता से ही लेखन का श्रीगणेश किया था, लेकिन सीमाओं में रहकर, जबरदस्ती कभी आरोपित नहीं किया। प्रशांत जैसे लोगों ने न जाने किस-किस नाम से आरोपित किया। प्रशांत जैसे पत्रकारों ने कभी भारत के वास्तविक इतिहास को उजागर नहीं होने दिया। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को गुजरात 2002 दंगों के लिए आरोपित करने राष्ट्र को बताएँ "क्या 2002 से पूर्व गुजरात में दंगे हुए और कितने-कितने दिन तक चलते थे? फिर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के समय मलियाना दंगा भूल गए, किसने करवाया था? अखिलेश यादव के कार्यकाल में मुज़फ्फर नगर दंगे पर सब क्यों चुप रहे? किसी ने दंगे में तत्कालीन सरकार का क्या योगदान था, सच्चाई सामने लाकर अखिलेश को आरोपित करने का साहस किया?
प्रशांत के ट्वीट से जान पड़ता है, कि इस तरह के ट्वीट करवाने के पीछे कौन-कौन हैं, इसकी गम्भीर जाँच जरुरी है। बिना प्रलोभन के कोई अपनी प्रतिष्ठा को दॉंव पर नहीं लगा सकता।
देश के चुने सांसदों को आतंकवादी बताया-23 मई को लोकसभा चुनाव के परिणाम में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रचंड जीत पर लिखा कि अब हमारे संसद में आतंकवादी पहुंच गए हैं-
देश के गृहमंत्री के खिलाफ जहर-30 मई को अमित शाह जब देश के गृहमंत्री के पद की शपथ ले रहे थे तो इसने लिखा-
एक दूसरे Tweet में लिखता है-
आगे Tweet में लिखता है-
हिन्दू धर्म के खिलाफ जहर-प्रशांत कनौजिया जो अपना धर्म सरकार से सवाल पूछना मानता हैं, उसके ये Tweets पत्रकारिता के किस धर्म के दायरे में आते हैं, जिसमें बहुसंख्यकों के धर्म को भला बुरा कहा जाता है और धर्म के आदर्श पुरुष के बारे में अमर्यादित बातें कही जाती हैं?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की मानहानि-प्रशांत कनौजिया सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाते हुए अक्सर खबरों को लेकर अमर्यादित टिप्पणी करता रहता है। लेकिन 06 जून के Tweet में मर्यादा की सीमा को ही पार कर गया और योगी आदित्यनाथ के व्यक्तिगत जीवन के बारे में एक महिला के बयान को बिना जांच पड़ताल के सोशल मीडिया पर अभद्र टिप्पणी के साथ प्रचारित कर दिया-
महेन्द्र सिंह धोनी का अपमान- पूर्वाग्रहों से ग्रस्त पत्रकारिता का क्या स्वरूप होता है, इसका पता कनौजिया के उस Tweet से चलता है जो इसने पूर्व भारतीय कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी के बारे में किया। कोई भी धोनी के देश प्रेम की भावना पर सवाल नहीं खड़ा कर सकता है, लेकिन प्रशांत कनौजिया ने लिखा-