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अब केजरीवाल की पार्टी AAP(आम आदमी पार्टी) का होगा BBP (भ्रष्टाचार बढ़ाओ पार्टी) नाम

किसन बाबूराव हजारे जिन्हें लोग समाजसेवी अन्ना हजारे के नाम से जानते हैं, उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में सक्रिय रहे अरविंद केजरीवाल ने उनको धोखा देकर न सिर्फ आम आदमी पार्टी का दो अक्टूबर 2012 को गठन कर लिया, बल्कि अन्ना हजारे के मूल सिद्धांतों को भी तिलांजलि दे दी। आम आदमी पार्टी जिस भ्रष्टाचार विरोध के मुद्दे पर जन्मी थी, एक के बाद एक उसके नेता भ्रष्टाचार के जनक ही बनते गए। पार्षद, विधायक, मंत्री से लेकर अब उप-मुख्यमंत्री तक करोड़ों के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। आप सरकार के कानून मंत्री की वकालत की डिग्री फर्जी मिली, तो महिला कल्याण मंत्री ही महिला का बलात्कार करते धरे गए। अन्ना हजारे को अब दुख हो रहा है कि उन्होंने कैसे भ्रष्ट नेताओं के साथ मंच शेयर करके उनको आगे बढ़ाया था। दिल्ली से लेकर पंजाब तक नित-नए घोटाले, घपले और घूसखोर नेता सामने आने के कारण लगता है कि आम आदमी पार्टी (AAP) को अपना नाम बदलकर भ्रष्टाचार बढ़ाओ पार्टी (BBP) कर लेना चाहिए। क्योंकि केजरीवाल की भ्रष्टाचार पर खोखली जीरो टालरेंस नीति की अब पूरी तरह पोल खुल चुकी है। सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया केसों की जाँच में अरविन्द केजरीवाल का नाम आने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं। 

दो मंत्रियों के इस्तीफे स्वीकार कर लेने से आप के पाप धुलने वाले नहीं

द‍िल्‍ली के ड‍िप्‍टी सीएम मनीष स‍िसोद‍िया की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को दिन में तारे नजर आने लगे हैं। व‍िपक्ष इस घटनाक्रम में बाद आप सरकार और अरव‍िंद केजरीवाल पर भ्रष्टाचार को लेकर पूरी तरह से हमलावर हो गया है। इस सबको क‍िस तरह से जवाब द‍िया जाए और सरकार की धूम‍िल हो रही छव‍ि को कैसे बचाया जाए, इसको लेकर अब माथापच्ची की जा रही है। इसी के तहत कई महीने से जेल में बंद स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन और अब धरे गए मनीष सिसोदिया से इस्तीफा मांग लिया है। लेकिन केजरीवाल के इन दोनों मंत्रियों के इस्तीफे स्वीकार कर लेने भर से आप के पाप धुलने वाले नहीं है। क्योंकि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, जबकि आप का बड़ा नेता भ्रष्टाचार को लेकर एक्सपोज हुआ हो।

डिप्टी सीएम और मंत्री ही नहीं, दो दर्जन से ज्यादा विधायक भी आरोपी

इससे पहले भी दिल्ली से लेकर पंजाब तक आप सरकार के मंत्री जेल जा चुके हैं। बहुत उछलकूद कर बड़ी-बड़ी बातें कर रहे डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया भी अब इन्हीं नेताओं की पंगत में शुमार हो गए हैं। मंत्रियों के अलावा आप के करीब दो दर्जन विधायकों पर घूसखोरी के अलावा अन्य आरोप लगे हैं और कुछ जेल गए हैं। वहीं मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन के इस्तीफे के बाद दिल्ली की राजनीति उफान पर है। डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया से गत वर्ष 17 अक्तूबर को भी सीबीआई ने पूछताछ की थी। इसके साथ ही ईडी ने भी कई जगह छापेमारी की थी। इससे पहले दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को ईडी ने ही गिरफ्तार किया था। ईडी ने जैन की लगभग पौने पांच करोड़ रुपये की संपत्ति भी जब्त की है।

 जेल में बंद सबसे करीबी सत्येंद्र जैन को केजरीवाल ने दी थी क्लीन चिट

मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य आरोपों में जेल में बंद स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को केजरीवाल का बहुत करीबी माना जाता है। यही वजह है कि जैन के तिहाड़ जेल में जाने के बावजूद केजरीवाल ने अपने इस विश्वस्त मंत्री को पद से नहीं हटाया गया। खास बात ये रही कि अरविंद केजरीवाल की ओर से जैन को क्लीन चिट दी गई थी। उन्होंने कई अवसरों पर कहा कि राजनीतिक खुन्नस निकालने के लिए आप नेताओं को परेशान किया जा रहा है। लेकिन जांच एजेंसियों की लगातार की जा रही पड़ताल में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। सत्येंद्र जैन के बाद मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से केजरीवाल के भी तोते उड़ने लगे हैं। इसकी बड़ी वजह यही है कि उनकी पार्टी भ्रष्टाचारियों की फौज बनती चली जा रही है। पंजाब की जनता ने केजरीवाल की पार्टी को जिताया तो वहां भी स्वास्थ्य मंत्री विजय सिंगला भ्रष्टाचार के मामले जेल जा चुके हैं।
दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पर करोड़ों की मनी लॉन्ड्रिंग का केस
प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में शिकंजा कसते हुए दिल्ली में AAP सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ्तार किया। ईडी ने जैन की 4.81 करोड़ की संपत्ति भी जब्त की थी। दरअसल, जैन के परिवार के लोग कुछ ऐसी फर्म से जुड़े थे जो PMLA के तहत जांच के दायरे में हैं। सत्येंद्र जैन की बेटी सौम्या जैन को मोहल्ला क्लीनिक के लिए सलाहकार नियुक्त किए जाने के मामले ने भी काफी तूल पकड़ा था। इस मामले की जांच सीबीआई तक को दी गई थी। ईडी की जांच में पता चला है कि साल 2015-16 के दौरान जब सत्येंद्र कुमार जैन एक लोक सेवक थे, तब जैन पर अधिकारों के दुरुपयोग के भी कई आरोप लग चुके हैं।
महिला कल्याण मंत्री संदीप कुमार ने महिला को बनाया हवस का शिकार
आम आदमी पार्टी के मंत्री भ्रष्टाचार में ही नहीं, रेप केस में भी संलिप्त पाए गए हैं। दिल्ली सरकार में मंत्री रहे संदीप कुमार 2016 में राशन कार्ड बनवाने के बहाने महिला से रेप केस में फंस चुके हैं। इस मामले में उनको जेल भेजा गया। इस घटना की एक सीडी भी सामने आई थी। संदीप कुमार 2015 में दिल्ली की सुल्तानपुर माजरा विधानसभा सीट से विधायक बना और उसको केजरीवाल सरकार में महिला एवं बाल कल्याण विकास मंत्री बनाया गया था। 2016 में एक ऐसी सीडी वायरल हुई, जिसमें संदीप कुमार को दो महिलाओं के साथ आपत्तिजनक हालात में देखे जाने के आरोप लगे। महिला का कहना था कि वह संदीप कुमार के पास राशन कार्ड बनवाने गई थी। यहां कोल्ड ड्रिंक में नशीला पदार्थ मिलाकर पिला दिया गया। उसके बाद रेप किया गया। मंत्री के रेप केस में आने के बाद भारी दबाव पड़ने पर केजरीवाल को संदीप को हटाना पड़ा।
दिल्ली के कानून मंत्री जितेंद्र तोमर की ही वकालत की बोगस डिग्री
साल 2015 में दिल्ली सरकार में कानून मंत्री जितेन्द्र सिंह तोमर को गिरफ्तार किया गया था। उन पर वकालत की फर्जी डिग्री रखने के आरोप लगे। एक आरटीआई के हवाले से पता चला कि जितेंद्र की डिग्री बोगस है। भागलपुर यूनिवर्सिटी ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि जो पंजीकरण नंबर उनकी डिग्री पर है, उस नंबर पर कोई और पंजीकृत है। डिग्री पूरी तरह से गलत और बोगस है। जितेंद्र पहले कांग्रेस नेता भी रहे हैं। दिल्ली चुनाव में वो आम आदमी पार्टी से त्रिनगर से चुनाव जीते और केजरीवाल सरकार में कानून मंत्री बने। उनको दिल्ली के पर्यटन, कला और संस्कृति की भी जिम्मेदारी दी गई थी।
खाद्य आपूर्ति मंत्री आसिम खान ने खाई छह लाख की रिश्वत
दिल्ली सरकार में साल 2018 में मंत्री आसिम अहमद खान का नाम भी भ्रष्टाचार की सुर्खियों में आया। दिल्ली सरकार में खाद्य आपूर्ति मंत्री आसिम खान पर एक बिल्डर से 6 लाख रुपये की रिश्वत खाने के आरोप लगे। आसिम के ख‍िलाफ भ्रष्टाचार के आरोप की जांच CBI को सौंपी गई। भारी दबाव के बाद तब सीएम अरविंद केजरीवाल ने अपने कैबिनेट मंत्री आसिम अहमद खान को हटाना पड़ा था।

‘हमसे रोज 100 रूपए लेते हैं आम आदमी पार्टी के पार्षद’: सूरत में इकट्ठा हुए फेरीवालों ने केजरीवाल की पार्टी पर लगाया वसूली का आरोप

उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड राज्यों में होने वाले चुनावों में अपनी रैलियों में दिल्ली मॉडल और फ्री में सरकारी खजाना लुटाकर सत्ता हथियाने अरविन्द केजरीवाल की पार्टी दूसरी पार्टियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाली स्वयं कितनी भ्रष्टाचार में लिप्त है, सूरत में इसकी मिसाल सामने आयी है।  

सोशल मीडिया पर गुजरात के सूरत शहर का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में फेरीवालों ने आम आदमी पार्टी के पार्षदों पर हर किसी 100 रुपए वसूली करने का आरोप लगाया है। जी मीडिया के संवाददाता चेतन पटेल ने इस वीडियो को शेयर किया है।

इस वीडियो में एक व्यक्ति को कहते सुना जा सकता है, “एक तरफ वो कहते हैं कि हम सबसे ईमानदार पार्टी हैं। क्या यही है ईमानदारी? यहाँ किसी से भी पूछ लो, अगर मैं झूठ बोल रहा हूँ तो।” इस आरोप पर भीड़ सहमत होती दिखाई दे रही है। भीड़ ने स्वीकार किया कि उन्हें रोज 100 रुपए आम आदमी पार्टी के पार्षदों को देना पड़ता है। अगर इसका हिसाब किया जाए तो साल भर में ये संख्या करोड़ों में होगी। अंत में उसने ऐसा करने वालों में आम आदमी पार्टी के पार्षदों का नाम लिया। पीछे खड़े लोगों में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। मौके पर पुलिस का वाहन भी खड़ा दिखाई दे रहा है।

इस साल हुए गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी सूरत में दूसरे नंबर पर रही थी। तब आप पार्टी को कुल 30 वार्डों की 120 में से 27 सीटें हासिल हुईं थीं। वहीं, भाजपा को सबसे अधिक 93 सीटें मिली थीं, जबकि कॉन्ग्रेस का खाता भी नहीं खुला था।

निर्वाचित सदस्यों को पेंशन क्यों?


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Related imageआर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई है। भारत में हर नागरिक को आवाज उठानी चाहिए, वैसे भी अभी लगभग आधी संसद के लिए मतदान होना शेष है। पीछे-पीछे नगर निगम तो किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। लोकसभा चुनावों के चलते ही देखिए किस तरह दल-बदलू इधर-उधर भाग रहे हैं, क्यों? जनता सेवा के लिए नहीं, बल्कि केवल अपना और अपने परिवार का भविष्य उज्जवल करने के लिए। व्यापार रूप धारण कर चुकी राजनीती को भी बदलने की उस तरह जरुरी है, जिस तरह देश से आतंकवाद समाप्त करना जरुरी है। 
लाखों रूपए खर्च कर पंचायत से लेकर संसद तक जाने के लिए कोई ऐसे ही नहीं लुटाता। एक के दस बनाने के लिए खर्च करता है, क्योकि उसे मालूम है कि बस एक बार निर्वाचित हो गए, चाँदी ही चाँदी नहीं, बल्कि सोना ही सोना है। एक बार सदस्य बन गए कम से कम एक पीढ़ी के खाने का प्रबन्ध। 
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सभी कार्टून साभार 
वैसे भी कुछ लोगों ने चुनाव को व्यापार ही बना रखा है। धरातल पर आकर ही वास्तविकता का बोध होता है। निर्दलीय उम्मीदवार, जिसकी पड़ोसी तक इज्जत नहीं करता, वह भी किसी न किसी रूप में सौदेबाज़ी करते रहते हैं, उन्हें फिर इस बात की भी चिन्ता नहीं होती, जमानत जब्त होगी या नहीं। उससे अधिक पहले ही उनकी जेब आ चूका होता है। निर्दलीय उम्मीदवारों के अतिरिक्त पार्टियों के उम्मीदवार भी जेब भरने में पीछे नहीं, कई बात तो सामने हार देख दूसरी पार्टी से चुपचाप हाथ मिला, अपनी गरीबी दूर कर ली जाती है, पार्टी जाए भाड़ की भट्टी में। हारा हुआ उम्मीदवार जानता है, हार बाद भी पार्टी कोई न कोई लाभ का पद दे ही देगी। कार्यकर्ता पागलों की तरह पार्टी के नाम पर अपनी भूख-प्यास की परवाह नहीं करता। हर पार्टी को इस कटु सच्चाई पर मन्थन करना चाहिए। केवल आरोप या मनघडंत पटकथा समझ, नज़रअंदाज़ न करें।   
अभी कल(अप्रैल 26) को ही प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव खर्च कम करने की बात कही, लेकिन समाजसेवा के नाम पर मेवा खाने और तिजोरियाँ भरने वालों पर चुप्पी साधे रहे। प्रधानमन्त्री के एक आव्हान पर देश के हज़ारों नागरिकों ने गैस सब्सिडी लेनी बंद कर दी, फिर इसी तरह का आव्हान सांसदों और अन्य सदनों में निर्वाचित सदस्यों से मुफ्त मिल रही सुविधाओं को वापस लेने का भी होना चाहिए। लेकिन लगता है ऐसे आव्हान करने के लिए 56X10 सीना चाहिए। यदि पेंशन आदि बंद हो गयी, सरकारी खजाने में हर महीने करोड़ों की बचत होगी, बजट का घाटा भी लगभग शून्य भी आ सकता है।     
2018 का सुधार अधिनियम
सांसदों को पेंशन नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि राजनीति कोई नौकरी या रोजगार नही है बल्कि एक निःशुल्क सेवा है।
राजनीति लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत एक चुनाव है, इसकी पुनर्निर्माण पर कोई सेवानिवृत्ति नहीं है, लेकिन उन्हें फिर से उसी स्थिति में फिर से चुना जा सकता है। (वर्तमान में उन्हें पेंशन मिलती है सेवा के 5 साल होने पर)। इसमें एक और बड़ी गड़बड़ी यह है कि अगर कोई व्यक्ति पहले पार्षद रहा हो, फिर विधायक बन जाए और फिर सांसद बन जाए तो उसे एक नहीं, बल्कि तीन-तीन पेंशनें मिलती हैं। यह देश के नागरिकों साथ बहुत बड़ा विश्वासघात है जो तुरंत बंद होना चाहिए।
यदि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पुनः वापसी करते हैं या गठबन्धन सत्ता में आता है, तो पेंशन की इस सुविधा को तुरन्त बंद कर देनी चाहिए। जिससे प्रति माह सरकार को करोड़ों की बचत होगी और यही बचत देश के विकास में और तेजी से आगे बढ़ाएगी, बजट में होने वाले वित्तीय घाटे को भी बहुत कम या दूसरे अर्थों में कहा जाए लगभग न्यूनतम पर रहा सकता है।  
केंद्रीय वेतन आयोग के साथ संसद सदस्यों सांसदो का वेतन भत्ता संशोधित किया जाना चाहिए और इनको इनकम टैक्स के दायरे में लाया जाए। (वर्तमान में वे स्वयं के लिए मतदान करके मनमाने ढंग से अपने वेतन व भत्ते बढा लेते हैं और उस समय सभी दलों के सुर एक हो जाते हैं।
सांसदों को अपनी वर्तमान स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली त्यागनी चाहिए और भारतीय जन-स्वास्थ्य के समान स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में भाग लेना चाहिए। इलाज विदेश में नही भारत मे होना चाहिए,  इनका अगर विदेश में करवाना है तो अपने खर्च से करवाएँ।
मुफ्त छूट जैसे: बिजली, पानी, फोन बिल जैसी सभी रियायत समाप्त होनी चाहिए। (वे न केवल ऐसी बहुत सी रियायतें प्राप्त करते हैं बल्कि वे नियमित रूप से इसे बढ़ाते भी रहे हैं)
अपराधी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोका जाए, संदिग्ध व्यक्तियों के साथ दंडित रिकॉर्ड, अपराधिक आरोप और दृढ़ संकल्प, अतीत या वर्तमान को संसद से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए,
कार्यालय में राजनेताओं के कारण होने वाली वित्तीय हानि, उनके परिवारों, नामांकित व्यक्तियों, संपत्तियों से वसूल की जानी चाहिए।
सांसदों को भी सामान्य भारतीय लोगों पर लागू सभी कानूनों का समान रूप से पालन करना चाहिए। - नागरिकों द्वारा एलपीजी गैस सब्सिडी का कोई समर्पण नहीं जब तक सांसदों और विधायकों को उपलब्ध सब्सिडी, संसद कैंटीन में सब्सिडी वाले भोजन, सहित अन्य रियायतें वापस नहीं ले ली जाती।
संसद में सेवा करना एक सम्मान है, लूटपाट के लिए एक आकर्षक करियर नहीं।
फ्री रेल और हवाई जहाज की यात्रा की सुविधा बंद हो। आम आदमी क्यो उठाये इनकी मौज मस्ती का खर्च 
क्या आपको नहीं लगता कि यह मुद्दा उठाने का सही समय है ?
विस्तार से देखिये एक निर्वाचित सदस्य टैक्स भुगतान करने वालों का कितना बड़ा भाग हड़प जाते हैं:-
माननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरानहमारे देश में सालाना प्रति व्यक्ति आय (per capita income) अगर देखें तो वो करीब 1 लाख रुपए है। यानी औसतन हर भारतीय साल में 1 लाख रुपए कमा ही लेता है, लेकिन क्या आप अपने द्वारा ही चुने गए नेताजी के वेतन के बारे में जानते हैं? अगर नहीं, तो ये जानकारी आपको हैरान कर देगी। इन जनप्रतिनिधियों को वेतन के अलावा इतना भत्ता मिलता है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। एक सांसद को हर माह 1 लाख 40 हजार रुपए फिक्स मिलता है जिसके ऊपर इससे ज्यादा भत्ता दिया जाता है। बात करें फिक्स वेतन की तो इसमें फिक्स सैलरी/महीना : 50, 000+ कंस्टीट्यूटेन्सी अलाउंस/महीना : 45, 000 + ऑफिस अलाउंस/महीना : 45,000 जुड़ा होता है। 
इसके ऊपर मिलते हैं इतने भत्ते
माननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरान
सैलरी के ऊपर मिलने वाले भत्तों की तो इसकी लिस्ट बहुत लंबी है। इसमें डायरेक्ट एरियर (सालाना) : 3 लाख 80 हजार रु, हवाई सफर भत्ता (सालाना) : 4 लाख 8 हजार रु, रेल सफर भत्ता (सालाना) : 5 हजार रु, पानी भत्ता (सालाना) : 4 हजार रुपए रु, बिजली भत्ता (सालाना) : 4 लाख रु जैसे कई भत्ते शामिल हैं। एक सांसद को सैलरी के अलावा करीब 1 लाख 51 हजार 833 रुपए प्रतिमाह यानी 18 लाख 22 हजार रुपए सालाना भत्ता दिया जाता है। तो कितनी हुई कुल सैलरी
- फिक्स्ड सैलरी और भत्ते को जोड़ें तो एक सांसद एक महीने में 2,91,833 रुपए वेतन पाता है। यानी देश को एक सांसद सालाना 35 लाख रुपए का पड़ता है।
माननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरानमाननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरानटैक्स नहीं लगता, और ये सुविधाएं भी फ्री
सबसे खास बात ये है कि इनकी सैलरी पर कोई टैक्स नहीं मिलता। वहीं इन्हें मिलने वाले भत्ते कई तरह के होते हैं, जिनमें कई सुविधाएं इनके परिवार के लोगों के लिए भी होती हैं। इसमें वाइफ या पार्टनर के लिए 34 फ्री हवाई सफर, अनलिमिटेड ट्रेन का सफर और संसद सत्र के दौरान घर से दिल्ली तक सालाना 8 हवाई सफर भी शामिल हैं।
भत्ते में जुड़ी हैं ये चीजें
बात करें भत्ते में जुड़ी चीजों की तो एक सांसद को 50 हजार यूनिट फ्री बिजली, 1 लाख 70 हजार फ्री कॉल्स, 40 लाख लीटर पानी, रहने के लिए सरकारी बंगला (जिसमें सारे फर्नीचर और एयरकंडीशन, और इनका मेंटेनेंस भी फ्री) शामिल है।
ये तो मिलना ही है
इस सबके अलावा जो बचता है, वो है सिक्युरिटी गार्ड्स, जिंदगीभर की पेंशन, जीवन बीमा और सरकारी गाड़ी, जो सरकार की तरफ से सांसद को मुफ्त दिया जाता है। अब आप भी सोच रहे होंगी कि नेता जी की जिंदगी कितनी आरामदायक होती होगी?
कभी एक सांसद को मिलते थे 20 रूपए महीना
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साल 2018-2019 का बजट पेश किया। जिसमें उन्होंने देश के राष्ट्रपति की सैलरी 5 लाख रुपये प्रति महीना दिए जाने का ऐलान किया वहीं उपराष्ट्रपति का वेतन 4 लाख और राज्यपाल का वेतन 3.5 लाख रुपये करने का प्रस्ताव पेश किया
बजट से भले ही किसी को फायदा हुआ हो या ना हुआ हो, लेकिन राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यपालों को इसका फायदा मिला वहीं सांसदों के वेतन को लेकर जेटली ने कहा, सांसदों की तनख्वाह में बढ़ोतरी महंगाई इंडेक्स के आधार पर हर 5 साल पर तय होगी यह 1 अप्रैल 2018 से लागू होगी 
मजे की बात यह है कि संसद में न कोई शोर-शराबा हुआ और न ही किसी ने walkout किया यानि सबकुछ पलक छपकते ही पारित हो गया। इन्हे प्रलोभनों ने आज राजनीति को जनसेवा नहीं बल्कि एक व्यापार बना दिया है। 
वहीं कुछ आंकड़े हम आपके सामने पेश कर रहे हैं, जिसमें बताया जा रहा है कि संसद के सदस्यों की सैलरी में अब तक कितना बदलाव हुआ
अगर हम इस बारे में ऐतिहासिक आंकड़ों पर गौर करें तो साल 1921 में संसद के सदस्यों को दैनिक भत्ते के रूप में 20 रुपये मिलते थे जिसके बाद साल 1945 में दैनिक भत्ता 30 रुपये दिया जाता था। वहीं वाहन भत्ता 15 रुपये था जिसे साल 1946 में बढ़ाकर 45 रुपये कर दिया गया
वहीं, मासिक वेतन को लेकर महात्मा गांधी ने जोर देकर कहा था कि सार्वजनिक जीवन में व्यक्तियों को न्यूनतम वेतन लेना चाहिए। उस दौरान संविधान सभा के कुछ सदस्यों को केवल 30 रुपये का भुगतान किया जाता था
20 मई 1949 को वेतन और दैनिक भत्ते के लिए मसौदा संविधान प्रावधान( Draft Constitution provision) पेश किया गया, जिसमें मासिक आय को 750 से 1000 रुपये के बीच का भुगतान करने के लिए एक सुझाव दिया गया था लेकिन एक दम से इतने पैसे बढ़ाने के लिए विधानसभा ने आपत्ति जताई थीलेकिन दैनिक भत्ता 30 रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दिया गया 
17 अक्टूबर 1949 में वी. आई. मुन्नीस्वामी पिल्लई ने दैनिक भत्ता को 40 रुपये करने के लिए एक प्रस्ताव भेजा मेंबर ऑफ पार्लियामेंट एक्ट 1954 के तहत मासिक वेतन के रूप में 400 रुपये और दैनिक भत्ता के रूप में 21 रुपये का प्रस्ताव रखा गया साथ ही 1946 में पेंशन को भी शामिल किया गया
इतने बदलाव के बाद सैलरी में बढ़ोत्तरी होती गई जो इस प्रकार है:-
1964 में 500 रुपये, 1983 में 750 रुपये, 1985 में 1000 रुपये, 1988 में 4000 हजार रूपए, 1998 में 12000 रुपये और 2006 में हालिया पैमाने पर 16,000 रुपये की वृद्धि हुई थी वहीं जिस प्रकार मासिक आय में बढ़ोतरी हुई वहीं दैनिक भत्ते में भी बढ़ोतरी हुई जो इस प्रकार है:- 1964 में 31 रुपये, 1969 में 51 रुपये, 1983 में 75 रुपये, 1988 में 150 रुपये, 1993 में 200 रुपये, 1998 में 400 रुपये और 2001 में 500 रुपये कर दिया गया
सैलरी के साथ कितनी सुविधाएं लोकसभा के मेंबर को दी जाती है:- एक सांसद को 50 हजार रुपये हर महीने वेतन के रूप में मिलते हैं जिसके साथ संसदीय क्षेत्र भत्ता 45 हजार रुपये, दैनिक भत्ता 2 हजार रुपये, ऑफिस के खर्चे के लिए 45,000 हजार रुपये मिलते हैं इसी के साथ ट्रैवलिंग, रेल यात्रा, हवाई यात्रा के लिए सुविधाएं दी जाती है जो कुल मिलाकर 2 लाख 20 हजार है सांसद की पत्नी के लिए सुविधाएं: सांसद की पत्नी को रेल यात्रा के लिये फर्स्ट एसी का टिकट मुफ्त दिया जाता है जिसमें वह साल में 8 बार यात्राएं कर सकती हैं