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चोरी और सीना जोरी, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध तस्करी में जेल जाने से बचने के लिए टीएमसी बना रही दबाव

ड्रामेबाज़ ममता का चोटिल होना 
पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों एक बार फिर उबाल पर है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का रुख और टीएमसी नेताओं को सड़क पर उतारना, दरअसल उस राजनीति का परिचित दृश्य है, जिसमें जांच को “राजनीतिक प्रतिशोध” बताकर असली सवालों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है। मनी लॉन्ड्रिंग, अवैध तस्करी और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में जब एजेंसियां सवाल पूछती हैं, तो जवाब देने के बजाय नेता आंदोलन का रास्ता अपनाने लग जाते हैं। बिहार में राजद और दिल्ली में आप नेताओं के ऐसे कई उदाहरण हैं। अब इसी लकीर पर टीएमसी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी चल निकली हैं। ईडी बनाम दीदी की यह लड़ाई दरअसल एजेंसी बनाम नेता की नहीं, बल्कि जवाबदेही बनाम दबाव की राजनीति की है। लोकतंत्र में जांच एजेंसियों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन जांच से भागा नहीं जा सकता। पश्चिम बंगाल की जनता अब यह समझने लगी है कि सच्ची ताकत नारों, सड़कों पर शोर-शराबे में नहीं, बल्कि भाजपा के सुशासन में होती है। यदि टीएमसी सरकार इन सवालों का ठोस जवाब नहीं देती, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में जनादेश अपना फैसला सुनाने से बिल्कुल नहीं हिचकेगा।

तृणमूल सरकार में चोरी और सीना जोरी की कहावत चरितार्थ

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सरकार दरअसल, चोरी और सीना जोरी की कहावत ही चरितार्थ कर रही हैं। मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध तस्करी के आरोपों से बचने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल से दिल्ली तक टीएमसी नेताओं को सड़क पर उतारा है, लेकिन इस दबाव के बावजूद जनता के सामने उनकी कलई खुल गई है, जिसका खामियाजा उन्हें आने वाले विधानसभा चुनाव में जरूर उठाना पड़ेगा। जनता-जनार्दन भ्रष्टाचारी नेताओं को अब किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं करने वाली है। बिहार में पिछले साल ही में हुए चुनाव इसका ताजा उदाहरण है, जिसमें भाजपा-एनडीए को प्रचंड जीत मिली थी। पीएम मोदी ने कहा था कि गंगा बिहार से होकर बंगाल तक जाती है। इसी तर्ज पर ममता सरकार की काली करतूतों के चलते बिहार के बाद जनता-जनार्दन भाजपा को बंगाल में भी जीत का आशीर्वाद दे सकती है।

कारनामों की पोल खुलने से ममता की धड़कने बढ़ीं
दरअसल, सीएम ममता बनर्जी को जैसे ही आई-पैक में छापे की जानकारी मिली, वे प्रतीक जैन के घर पर पहुंच गईं। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि क्या ईडी का काम पार्टी की हार्ड डिस्क और उम्मीदवारों की सूची जब्त करना है? सीएम ने कहा कि मेरी पार्टी के सभी दस्तावेज उठा ले जाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में SIR के बाद अब इस तरह की कार्रवाई की जा रही है। दरअसल, पश्चिम बंगाल में ज्यों-ज्यों विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, त्यों-त्यों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। हिंदुओं की खिलाफत, मुस्लिम तुष्टिकरण, एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और अब ईडी के छापे ने ममता बनर्जी की धड़कने बढ़ा दी हैं। बांग्लादेशी घुसपैठियों के दम पर जिस तरह तृणमूल कांग्रेस जीतती रही है, उस पर एसआईआर ने सेंध लगा दी है। इस रिवीजन में राज्य के 58 लाख से ज्यादा ‘फर्जी’ वोटर के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं।
खाली हाथ आईं ममता हरी की ग्रीन फाइल सुर्खियों में आई
ममता खाली हाथ आईं थीं, लेकिन घर से बाहर निकलीं तो हाथ में ग्रीन फाइल थी। छापेमारी के दौरान प्रतीक जैन अपने घर पर ही मौजूद थे। यह कार्रवाई सुबह से जारी थी, लेकिन करीब 11:30 बजे के बाद मामला बढ़ा। सबसे पहले कोलकाता पुलिस कमिश्नर प्रतीक जैन के आवास पर पहुंचे। कुछ समय बाद सीएम ममता बनर्जी खुद लाउडन स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के घर पहुंचीं। ममता वहां कुछ देर रुकीं। जब बाहर निकलीं, तो उनके हाथ में एक हरी फाइल दिखाई दी। इसके बाद वे I-PAC के ऑफिस भी गईं।
जांच में बाधा डाली, सीएम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो
भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने कहा कि ममता बनर्जी ने केंद्रीय एजेंसियों के काम में दखल देने का काम किया है। ईडी सबूतों के आधार पर अपना काम कर रही है। बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, ‘छापेमारी के बारे में ED पूरी डिटेल्स दे सकती है। लेकिन यह सच है कि ममता बनर्जी केंद्रीय एजेंसियों के काम में दखल दिया। ममता ने आज जो किया, वह जांच में बाधा डालना था। मुख्यमंत्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। IPAC ऑफिस में वोटर लिस्ट क्यों मिली। क्या IPAC कोई पार्टी ऑफिस है।’
ईडी की कार्रवाई और ‘पीड़ित राजनीति’ का नया अध्याय

ईडी की जांच जिन मामलों से जुड़ी है, वे केवल कागजी आरोप नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे उस तंत्र की ओर इशारा करते हैं, जिसमें सत्ता, पैसे और प्रभाव का कथित गठजोड़ दिखाई देता है। टीएमसी नेतृत्व का यह कहना कि सब कुछ राजनीतिक साजिश है, तब खोखला लगता है जब बार-बार अलग-अलग मामलों में पार्टी से जुड़े नाम सामने आते हैं। यदि सरकार और पार्टी नेतृत्व स्वयं को निर्दोष मानते हैं, तो जांच का सामना करना चाहिए, न कि सड़कों पर दबाव की राजनीति कर लोकतांत्रिक संस्थाओं को डराने की कोशिश। पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक टीएमसी नेताओं का प्रदर्शन यह दिखाता है कि पार्टी जांच एजेंसियों से ‘पीड़ित राजनीति’ के नैरेटिव से लड़ाई जीतना चाहती है। मगर सवाल यह है कि क्या प्रदर्शन से सच्चाई को छुपा सकता है? क्या नारे लगाने से दस्तावेज और सुबूत गायब हो जाएंगे ? लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन जब विरोध का उद्देश्य केवल जांच से बचना हो, तो जनता उसे समझने में देर नहीं लगाती। पश्चिम बंगाल की प्रबुद्ध और जागरूक जनता भावनात्मक अपील से नहीं, तथ्यों और जवाबदेही से संतुष्ट होती है।

आरोपों से भागना यानी जनता-जनार्दन को गुमराह करना

देश की राजनीति में बीते वर्षों में एक स्पष्ट बदलाव दिखा है। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं के प्रति जनता का धैर्य अब टूट रहा है। भ्रष्टाचार में डूबे नेता आरोपों से भागकर जनता को भले कितना ही गुमराह करने के प्रयास कर लें, लेकिन यह पब्लिक है, जो सब जानती है। बिहार में हालिया चुनाव परिणामों ने यह संकेत दिया कि विकास, सुशासन और साफ छवि को मतदाता प्राथमिकता दे रहे हैं। यह संदेश केवल बिहार तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल की जनता भी यह देख रही है कि सत्ता में रहते हुए कौन जवाबदेह है और कौन हर सवाल को साजिश बताकर टाल देता है। आने वाले विधानसभा चुनाव पश्चिम बंगाल के लिए केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं होंगे, बल्कि राजनीतिक संस्कृति की दिशा तय करने का अवसर होंगे। जनता यह तय करेगी कि क्या वह आरोपों, आंदोलनों और टकराव की राजनीति को स्वीकार करेगी या पारदर्शिता, विकास और जवाबदेही को चुनेगी। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता ने खुद को जनता से ऊपर समझा, तब-तब जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से उसे जवाब दिया है।

 गंगा का प्रतीक और सुशासन बनाम सड़कों की राजनीति

प्रधानमंत्री मोदी का बिहार की जीत के बाद का यह कथन कि “गंगा बिहार से होकर बंगाल तक जाती है” केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत भी है। जैसे बिहार में जनता ने भ्रष्टाचार और अराजकता की बरसों-बरस तक राजनीति करने वालों के जंगलराज को नकारा, वैसे ही बंगाल में भी बदलाव की बयार चलने की बात कही जा रही है। टीएमसी सरकार पर लगे आरोप, कानून-व्यवस्था को लेकर उठते सवाल और निवेश व उद्योग के मोर्चे पर पिछड़ता राज्य—ये सभी मुद्दे आने वाले विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। दरअसल, किसी भी सीएम से जनता की अपेक्षा होती है कि वह शासन, विकास और कानून के पालन की मिसाल पेश करे। लेकिन जब सत्ता का केंद्र खुद को हर जांच से ऊपर समझने लगे, तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ता है। सड़क पर उतरकर संस्थाओं पर दबाव बनाना सुशासन नहीं, बल्कि असहजता का संकेत है। यदि टीएमसी सरकार के पास अपने बचाव में ठोस तथ्य हैं, तो उन्हें अदालत और जांच एजेंसियों के सामने रखना चाहिए, न कि भीड़ जुटाकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश करनी चाहिए।
दरअसल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति और तृणमूल सरकार एक बार फिर भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध कोयला तस्करी के भंवर में बुरी तरह से फंस गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा कोलकाता में पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म I-PAC के कार्यालय और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की गई। ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आईटी सेल के प्रतीक जैन हेड भी हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, छापेमारी की यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग, जाली दस्तावेज आदि के मामले में की जा रही है। इसने ममता बनर्जी सरकार की इमेज पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। बता दें कि ममता सरकार इससे पहले भी शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, पशु तस्करी, कोयला तस्करी, महिलाओं के शोषण, रेप केस और बढ़ते अपराधों के गंभीर आरोपों में फंस चुकी है। इस बार सीधे ममता बनर्जी की पार्टी और राजनीतिक कंसलटेंसी से जुड़ा मनी लॉन्ड्रिंग का गंभीर मामला सामने आया है।
पारदर्शिता की जगह अहंकार और जवाबदेही की जगह टकराव
आज पश्चिम बंगाल देश के सामने एक ऐसा उदाहरण बन रहा है, जो कि सत्ता के लंबे शासन में पारदर्शिता की जगह अहंकार और जवाबदेही की जगह टकराव से चल रहा है। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई किसी व्यक्ति या दल के खिलाफ नहीं होती, बल्कि उन तथ्यों के आधार पर है, जो जांच में सामने आए हैं। ऐसे में यदि ममता बनर्जी सच में अपने आपको बेदाग मानती हैं, तो उन्हें जांच से डरने की नहीं, सहयोग करने की जरूरत है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध जांच नहीं, सच से भागना होता है। इस समय ममता बनर्जी वही कर रही हैं। इससे साफ है कि उनके मन में किसी काले कारनामे का पर्दाफाश होने का डर समाया हुआ है।
ममता के राज में सत्ता, पैसे और सिस्टम का गठजोड़?
सबसे अहम तथ्य यह है कि प्रतीक जैन न केवल I-PAC के डायरेक्टर हैं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आईटी सेल के प्रमुख भी बताए जाते हैं। यानी यह मामला केवल एक कंसलटेंसी फर्म तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि सत्ता के डिजिटल, रणनीतिक और चुनावी इको सिस्टम तंत्र तक पहुंचता दिखाई देता है। ममता बनर्जी अक्सर केंद्र सरकार पर “राजनीतिक बदले” का आरोप लगाती रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ पारदर्शी है तो ईडी बार-बार टीएमसी के इतने करीबी नेताओं, मंत्रियों और अफसरों तक क्यों पहुंच रही है? क्या यह महज संयोग है या फिर सत्ता के भीतर पनपते उस सिस्टम का संकेत है, जहां राजनीति, पैसा और प्रशासन एक-दूसरे में घुलते जा रहे हैं?
अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में छापेमारी
छापेमारी के बाद ED ने मीडिया से कहा कि छापेमारी अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की गई है। ED ने कहा कि कोलकाता में I-PAC कार्यालय पर छापे पूरी तरह सबूतों के आधार पर किए जा रहे हैं। यह किसी राजनीतिक दल या चुनाव से जुड़ा मामला नहीं है। यह कार्रवाई अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े केस में हो रही है। फिलहाल 10 ठिकानों पर तलाशी जारी है। 6 पश्चिम बंगाल और 4 दिल्ली में बताए जाते हैं। एजेंसी ने बताया कि जांच में कैश जनरेशन, हवाला ट्रांसफर से जुड़े परिसर शामिल हैं। किसी भी पार्टी कार्यालय की तलाशी नहीं ली गई। अधिकारियों के मुताबिक कुछ संवैधानिक पदों पर बैठे लोग दो ठिकानों पर पहुंचे, अवैध दखल दिया और दस्तावेज छीन लिए।
प्रशांत किशोर के हटने के बाद I-PAC की कमान प्रतीक ने संभाली
  • I-PAC (Indian Political Action Committee) एक पॉलिटिकल कंसलटेंट फर्म है। इसके डायरेक्टर प्रतीक जैन है।
  • यह राजनीतिक दलों को चुनावी रणनीति, डेटा-आधारित कैंपेन, मीडिया प्लानिंग और वोटर आउटरीच में मदद करती है।
  • I-PAC पहले Citizens for Accountable Governance (CAG) थी। इसकी शुरुआत 2013 में प्रशांत किशोर ने प्रतीक के साथ की थी। बाद में इसका नाम I-PAC रखा गया।
  • प्रशांत किशोर के हटने के बाद I-PAC की कमान प्रतीक के पास आ गई।
  • प्रशांत ने बाद में बिहार में ‘जन सुराज’ पार्टी बनाई।
  • I-PAC तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ 2021 से जुड़ी है।

भ्रष्टाचार की नींव पर टिके नेशनल हेराल्ड की नई गुत्थी ने बढ़ाया राहुल-सोनिया के लिए संकट, INDI गठबंधन की एकता और बंगाल के चुनावी समीकरण पर पड़ेगा प्रभाव

नेशनल हेराल्ड में फैले भ्रष्टाचार की जैसे-जैसे परतें खुल रही है जिसमें जवाहर लाल नेहरू से लेकर वर्तमान सोनिया गाँधी परिवार डूबा नज़र आ रहा है। फिर जिस तरह EOW ने इस केस में हाथ डाला है सुब्रमण्यम स्वामी के हाथों से पूरा केस छीन लिया। पलटू राम सुब्रमण्यम स्वामी अब अगर पलटी मार केस को वापस लेना चाहे तो ले नहीं सकते। पलटू राम इसलिए कहा है कि इन्होने कई बार पलटी मार राजनीतिक उथल-पुथल मचा चुके हैं।  
आज जिस तरह सुब्रमण्यम स्वामी हर दिशा में तड़पते और छटपटाते नज़र आ रहे हैं, उससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि उनकी राजनीति का खेल अब पूरी तरह उलट चुका है।उन्हें पहला झटका तब लगा था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्त मंत्रालय से संबंधित मामलों से उन्हें न केवल दूर रखा, बल्कि उनकी पहुँच को पाँच हज़ार किलोमीटर की दूरी तक सीमित कर दिया था, जिससे उनकी वर्षों पुरानी महत्त्वाकांक्षाएँ वहीँ ढह गई थीं।
अब उन्हें दूसरा और उससे भी बड़ा झटका नेशनल हेराल्ड केस में तब लगा है जब ED ने पूरी तरह अपनी शिकायत, अपने सबूत और अपनी जाँच के आधार पर नई FIR दर्ज कर दी है, जिसका किसी निजी याचिकाकर्ता से कोई लेना-देना नहीं है।इसका साफ़ और सीधा अर्थ यह है कि यदि स्वामी जी अपनी पुरानी याचिका वापस लेने की कोशिश भी करें, तब भी इस केस की दिशा में रत्ती भर बदलाव नहीं होगा, क्योंकि अब केस ED की कानूनी ढाँचे पर खड़ा है, न कि किसी व्यक्ति की इच्छा या राजनीति पर।
पिछले ग्यारह वर्षों में इस केस की धीमी रफ्तार के पीछे जिन “व्यक्तिगत लाभों” और “राजनीतिक सौदों” की चर्चा होती रही है, वे अब पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं, क्योंकि ED ने दिल्ली पुलिस को इस केस को तेज़ गति से आगे बढ़ाने के लिए औपचारिक निर्देश दे दिए हैं, जिससे स्वामी जी की बेचैनी कई गुना बढ़ गई है।
आज उनकी हर प्रतिक्रिया, हर टिप्पणी और हर तीरछी बात यह साबित करती है कि वह नियंत्रण खो चुके हैं और उन्हें समझ आ चुका है कि अब न तो बर्गेनिंग की गुंजाइश बची है और न ही किसी पार्टी से किसी कथित “राज्यसभा सीट डील” का सपना वास्तविकता में बदल सकता है।
नेशनल हेराल्ड केस अब उनकी पकड़ से पूरी तरह बाहर निकल चुका है, क्योंकि इस बार केस किसी के व्यक्तिगत स्वार्थ पर नहीं बल्कि संस्थागत जाँच और ठोस सबूतों पर आगे बढ़ रहा है, और यही बात स्वामी जी की सबसे गहरी बेचैनी बन गई है।
आज यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि नेशनल हेराल्ड केस काअंतिम और निर्णायक दौर शुरू हो चुका है, और इस बार मंच पर केवल एक ही शक्ति निर्णायक भूमिका निभाने जा रही है…ED और उसका कठोर कानून, जिसे न झुकाया जा सकता है और न खरीदा जा सकता है।
संस्कार बेच किया संविधान अपनी जेब में! महामहिम राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष सब खड़े हैं और बिगड़ैल शहजादा बैठ गया
नेशनल हेराल्ड का बहुचर्चित मामला एक बार फिर भारतीय राजनीति के केंद्र में है। प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा दर्ज किए गए नए मामले ने इस लंबे विवाद की कहानी को फिर से एक नई दिशा दे दी है। एजेंसियों का दावा है कि उन्हें वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ी नई सूचनाएं मिली हैं। ये जानकारियों ऐसी हैं, जिनसे साफ पता चलता है कि नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी मे मिलीभगत की है। सोनिया-राहुल के साथ-साथ कई अन्य प्रमुख व्यक्तियों के खिलाफ नेशनल हेराल्ड मामले में दिल्ली पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की है। यह कार्रवाई प्रवर्तन निदेशालय की शिकायत पर की गई है, जो इस हाई-प्रोफाइल मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रही है। आरोप है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने पद का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत लाभ उठाया है। नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी और सोनिया गांधी अपनी करतूतों के चलते घिर चुके हैं।

दशकों बाद अब सच हो रही है सरदार पटेल की चेतावनी
दशकों बाद सरदार पटेल की ये चेतावनी अब लोगों के सामने आ रही है, जब ईडी इस मामले की जांच कर रही है। सरदार वल्लभ भाई पटेल की जो चेतावनी पत्र के रूप में तब शुरू हुई थी, वह अब एक बड़े घोटाले में बदल गई है। ईडी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ इस मामले में आरोपपत्र दायर किया है। इसमें उन पर यंग इंडिया लिमिटेड के जरिए 5,000 करोड़ रुपए की संपत्ति का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया गया है, जो उनके नियंत्रण में है और नेशनल हेराल्ड और उसकी मूल कंपनी एसोसिएट जर्नल लिमिटेड से जुड़ी है। 5 मई 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर चिंता जताई कि नेशनल हेराल्ड ने हिमालयन एयरवेज से जुड़े दो व्यक्तियों से 75,000 रुपए से अधिक की रकम स्वीकार की है। उन्होंने बताया कि एयरलाइन ने भारतीय वायुसेना की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए अवैध रूप से रात्रि हवाई डाक सेवा के लिए सरकारी अनुबंध इसके जरिए हासिल किया है। उसी पत्र में सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को आगाह किया कि नेशनल हेराल्ड ने अखानी नामक एक व्यवसायी से धन स्वीकार किया था, जो उनकी विमानन कंपनी के लिए रात्रि डाक अनुबंध हासिल करने में शामिल था। सरदार पटेल ने उल्लेख किया कि अखानी टाटा और एयर सर्विसेज ऑफ इंडिया जैसी फर्मों से भी धन जुटा रहा था।

नेशनल हेराल्ड के लिए धन जुटाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग
सरदार पटेल ने पत्र में आगे नेहरू को लिखा था कि अखानी पर बैंकों से धोखाधड़ी करने के लिए विभिन्न अदालतों में पहले से ही कई आरोप हैं। उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अहमद किदवई द्वारा नेशनल हेराल्ड के लिए धन जुटाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने के बारे में भी चेतावनी पत्र के जरिए दी थी, जिसमें जेपी श्रीवास्तव जैसे लखनऊ स्थित व्यापारियों से धन इकट्ठा करना भी शामिल है। उसी दिन, 5 मई 1950 को नेहरू ने पटेल को ऐसे लहजे में जवाब दिया था, जिससे लगता था कि उन्हें शांत करने की कोशिश की जा रही थी। नेहरू ने अपने पत्र में उल्लेख किया था कि उन्होंने अपने दामाद फिरोज गांधी, जो उस समय नेशनल हेराल्ड के महाप्रबंधक थे, से इस अवैध धन संग्रह के आरोपों की जांच करने के लिए कहा है।

सरदार पटेल ने नेहरू के रुख पर स्पष्ट असंतोष जताया था
इसके ठीक अगले ही दिन 6 मई को पटेल ने नेहरू के दावों का दृढ़ता से खंडन करते हुए फिर से नेहरू को जवाब दिया। उन्होंने साफ कहा कि अवैध धन की उगाही पूरी तरह से जारी है। फिर पटेल को शांत करने का प्रयास किया गया। लेकिन सरदार पटेल के द्वारा अवैध फंडिंग के बारे में जो चिंता व्यक्त की गई थी, उसे दरकिनार कर दिया गया। हालांकि, तब नेहरू ने यह स्वीकार किया था कि इसमें कुछ गलतियां हुई होंगी। इसके बाद 10 मई, 1950 को लिखे अपने अंतिम पत्र में सरदार पटेल ने नेहरू के इस रुख पर स्पष्ट असंतोष व्यक्त किया था। गृह मंत्री के रूप में उन्होंने भुगतानों से जुड़ी बेईमानी और नेशनल हेराल्ड के वित्तपोषण से जुड़े संदिग्ध व्यक्तियों पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।

गांधी परिवार पर बढ़ता दबाव, नेतृत्व का बोझ और कानूनी चुनौतियां
करीब 2000 करोड़ रुपये की संपत्तियों को केवल 50 लाख रुपये में “अधिग्रहित” करने से जुड़े इस मामले का सबसे सीधा असर सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर पड़ रहा है। Young Indian कंपनी से जुड़े वित्तीय विवाद पहले भी कांग्रेस की राजनीति को भीतर तक हिलाते रहे हैं। नए मामले ने नेतृत्व की विश्वसनीयता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। जब किसी राजनीतिक दल का सर्वोच्च नेतृत्व लगातार कानूनी लड़ाइयों में उलझ जाता है, तो संगठन का मनोबल प्रभावित होना लाजिमी ही है। उस दल की अपने ही सहयोगी गठबंधन में भूमिका कमजोर पड़ जाती है। कांग्रेस के भीतर यह चर्चा वर्षों से चलती रही है कि नेतृत्व का दबाव और मुकदमों का बोझ पार्टी के पुनर्निर्माण की राह में एक स्थायी रुकावट बन जाता है।

एफआईआर में सोनिया-राहुल के साथ सुमन दुबे और सैम पित्रोदा के नाम
इस नई एफआईआर में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, कांग्रेस नेता सुमन दुबे और सैम पित्रोदा के साथ-साथ यंग इंडियन (वाईआई), डॉटैक्स मर्चेंडाइज लिमिटेड (Dotex Merchandise Ltd), डॉटैक्स प्रमोटर सुनील भंडारी और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) तथा अज्ञात अन्य को आरोपी बनाया गया है। ईडी सूत्रों के अनुसार, संघीय एजेंसी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) की धारा 66(2) के तहत उपलब्ध शक्तियों का उपयोग करके पुलिस FIR दर्ज कराई। यह धारा केंद्रीय एजेंसी को कानून प्रवर्तन एजेंसी द्वारा आपराधिक पूर्ववर्ती अपराध के पंजीकरण के लिए सबूत साझा करने की अनुमति देती है, ताकि बाद में मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया जा सके और जांच को आगे बढ़ाया जा सके। यह एफआईआर ईडी के मामले को मजबूत करेगी, जिसका आरोप पत्र एक मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, दिल्ली के आदेश से उत्पन्न हुआ है।

दो हजार करोड़ रुपये की संपत्तियों को केवल 50 लाख रुपये में अधिग्रहीत
बता दें कि यह आदेश भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा 26 जून, 2014 को एजेएल की संपत्तियों से जुड़ी कथित अनियमितताओं के संबंध में दायर एक निजी शिकायत पर संज्ञान लेते हुए दिया गया था। एफआईआर में ईडी द्वारा 4 सितंबर को ईओडब्ल्यू को भेजे गए एक पत्र में लगाए गए आरोपों का संज्ञान लिया गया है। ईडी के इस संचार की सामग्री वही है, जो केंद्रीय एजेंसी ने अपने आरोप पत्र में बताई है। ईडी ने अपने आरोप पत्र में आरोप लगाया था कि एक “आपराधिक साजिश” कांग्रेस पार्टी के पहले परिवार के नेतृत्व में, जिसमें सोनिया गांधी, उनके बेटे राहुल गांधी, दिवंगत कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीस, सैम पित्रोदा और एक निजी कंपनी यंग इंडियन शामिल हैं। एजेएल की 2000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्तियों के धोखाधड़ी वाले अधिग्रहण से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग योजना में शामिल थे। सोनिया-राहुल यंग इंडियन के बहुसंख्यक शेयरधारक हैं, जिनमें से प्रत्येक के पास 38 प्रतिशत शेयर हैं। ईडी का दावा है कि उसकी जांच ने “निर्णायक रूप से” पाया है कि यंग इंडियन ने एजेएल की 2000 करोड़ रुपये की संपत्तियों को केवल 50 लाख रुपये में “अधिग्रहित” किया, जो उसके मूल्य से काफी कम था।

यह राजनीतिक हमला नहीं, करोड़ों की जालसाजी का प्रत्यक्ष प्रमाण
कांग्रेस की पहली प्रतिक्रिया हमेशा यही रही है कि यह “राजनीतिक बदले की कार्रवाई” है। सवाल यह है कि क्या जनता इसे मानने को तैयार है? जब बार-बार करोड़ों की संपत्तियों, वित्तीय लेनदेन और कथित जालसाज़ी के आरोप सामने आते हैं, तब किसी भी दल को नैतिक रूप से खुद को साफ सिद्ध करना आसान नहीं रहता। जनता यह मानने लगती है कि जिन नेताओं के ऊपर पार्टी का मूल ढांचा खड़ा है, वे लगातार कानूनी विवादों में क्यों फंसे रहते हैं। कांग्रेस का संकट सिर्फ कानून या अदालत तक सीमित नहीं है। यह उसकी राजनीतिक छवि, जनविश्वास और विपक्ष में उसकी भूमिका पर सीधा प्रभाव डालती है। इसलिए यह शीशे की तरह साफ है कि यह कोई राजनीतिक हमला नहीं है, बल्कि कांग्रेस द्वारा किए गए धृत कर्मों का दुष्परिणाम है।

पहले से ही टूट रहे INDIA गठबंधन की एकता पर पड़ेगा असर
INDIA गठबंधन पहले ही कई असहमतियों और रणनीतिक मतभेदों से जूझ रहा है। राहुल गांधी और कांग्रेस को गठबंधन का “मुख्य चेहरा” बनाने का प्रयास कई क्षेत्रीय दलों को रास नहीं आ रहा। ममता बनर्जी से लेकर तेजस्वी यादव तक इसका विरोध कर चुके हैं। तेजस्वी ने तो बिहार में कांग्रेस का साथ देने का हश्र देख ही लिया। अब ममता को बंगाल चुनाव को लेकर चिंता है। दरअसल, नए मामले ने उन सभी दलों को और भी अधिक ताकत दे दी है जो पहले से ही कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में विपक्षी गठबंधन की एकता अब और भी कठिन होती जाएगी, क्योंकि सहयोगी दलों को कांग्रेस के साथ मंच साझा करने से पहले राजनीतिक जोखिमों का मूल्यांकन करना होगा।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का आधार और कमजोर होगा
पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य पहले ही लगातार बदल रहा है। तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी विपक्षी राजनीति में अपनी स्वतंत्र भूमिका स्थापित करने की कोशिश करती रही हैं। वे कई बार राहुल गांधी और कांग्रेस की रणनीति पर सवाल उठा चुकी हैं। अब नेशनल हेराल्ड का नया प्रकरण उनके लिए एक ताज़ा राजनीतिक हथियार का काम करेगा। कांग्रेस पहले ही बंगाल में सीमित उपस्थिति रखती है। अब यह मामला तृणमूल को कांग्रेस को “कमजोर, नेतृत्वहीन और समस्याग्रस्त पार्टी” के रूप में पेश करने का अवसर देगा। इससे कांग्रेस का बंगाल में आधार और कमजोर पड़ने की पूरी संभावना है। इसका फायदा 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिल सकता है।

बिहार के राजनीतिक बदलाव और विपक्ष की भ्रष्टाचारी छवि का लाभ
भाजपा वर्षों से जिस सच्चाई को उजागर करती आई है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार और परिवारवाद से घिरी पार्टी है, उसे यह मामला पुनः नई ऊर्जा देता नजर आ रहा है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल जैसे राज्य, जहां भ्रष्टाचार, घोटालों और कटमनी की राजनीति पर जनता बेहद संवेदनशील है, वहां भाजपा इसे एक बड़ा मुद्दा बना सकती है। भाजपा की नीतिगत स्थिरता और “साफ़-सुथरी राजनीति” का संदेश, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के विवादों के चलते इसका फायदा अगले चुनाव में भाजपा को मिलने वाला है। हाल ही में बिहार में हुए राजनीतिक उतार-चढ़ाव ने विपक्ष की एकता को हिलाकर रख दिया है। भाजपा की वापसी और गठबंधन समीकरणों में हुए बदलाव ने पहले ही विपक्ष को कमजोर किया है। अब नेशनल हेराल्ड केस का नया अध्याय इस कमजोरी को और उजागर करता है। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष अब कई हिस्सों में बंटा दिखाई देता है। बिहार की तरह अन्य राज्यों में भी क्षेत्रीय दल कांग्रेस से दूरी बनाए रखने की वजह तलाश रहे हैं। पीएम मोदी ने इसीलिए कांग्रेस को परजीवी नाम दिया है, जो जिसके साथ जुड़ती है, उसे ही खत्म कर देती है।

गांधी परिवार के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचार कांग्रेस के लिए नुकसानदेह
यह सवाल अब पार्टी के भीतर भी पहले से अधिक तीखे रूप में पूछा जा रहा है। नेशनल हेराल्ड मामला पहले भी कांग्रेस के लिए नकारात्मक धारणा बनाता रहा है। अदालत का फैसला जो भी आए, लेकिन जनता की नजर में गांधी परिवार के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचार, परिवारवाद, असफलता और विवादों की पुनरावृत्ति कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित होगी। बंगाल में ममता बनर्जी की दूरी, सहयोगी दलों की सतर्कता और कांग्रेस की अपनी सीमाएं, ये फैक्टर इस धारणा को और मजबूत करते हैं कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजनीतिक रूप से कमजोर हो चुका है। कांग्रेस की राजनीतिक चुनौती सिर्फ बाहरी नहीं, आंतरिक भी है। कई कांग्रेस नेता वर्षों से कह रहे हैं कि पार्टी को नए नेतृत्व या व्यापक संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता है। लेकिन पार्टी शीर्ष नेतृत्व पर निर्भरता कम नहीं कर पाई है। जब भी कोई नया केस सामने आता है, यह बहस फिर ज़िंदा हो जाती है। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन इसलिए खो रही है क्योंकि राहुल-सोनिया के नेतृत्व कमजोर पड़ता जा रहा है। 

करोड़ों के कांग्रेसी घपले वाला नेशनल हेराल्ड केस क्या है?
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 2012 में दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में एक याचिका दाखिल करते हुए सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस के ही मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडीज, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे पर घाटे में चल रहे नेशनल हेराल्ड अखबार को धोखाधड़ी और पैसों की हेराफेरी के जरिए हड़पने का आरोप लगाया था। आरोप के मुताबिक, कांग्रेसी नेताओं ने नेशनल हेराल्ड की संपत्तियों पर कब्जे के लिए यंग इंडियन लिमिटेड ऑर्गेनाइजेशन बनाया और उसके जरिए नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन करने वाली एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (AJL) का अवैध अधिग्रहण कर लिया।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने तो बकायदा चार्जशीट फाइल कर दी है। ईडी की चार्जशीट में राहुल गांधी और सोनिया गांधी को भी आरोपी बनाया गया है। चार्जशीट में कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा और राजीव गांधी फाउंडेशन के ट्रस्टी सुमन दुबे भी अभियुक्त हैं। दरअसल, नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) करती है। इसका मालिकाना हक यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड के पास है। यही वह कंपनी है जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों की हिस्सेदारी है। यही वजह है कि ईडी की जांच की आंच इन दोनों तक जा पहुंची है। नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी और सोनिया गांधी अपनी करतूतों के चलते घिर चुके हैं। इस मामले में एक रोचक तथ्य यह भी है कि अगर 75 साल पहले सरदार पटेल की बात जवाहर लाल नेहरू मान लेते और बाद में ये लोग साजिश ना करते तो शायद आज राहुल गांधी और सोनिया गांधी को यह दिन ना देखने पड़ते।

करोड़ों की संपत्तियों पर यंग इंडियन ने कब्जा किया – ED
प्रवर्तन निदेशालय ने 15 अप्रैल को नेशनल हेराल्ड अखबार और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) से जुडे मनी लॉन्ड्रिंग केस में पहली चार्जशीट दाखिल कर दी। इसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे के नाम शामिल हैं। मामले की सुनवाई दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट में होगी। कोर्ट ने ED से मामले की केस डायरी भी मांगी है। ED का आरोप है कि कांग्रेस नेताओं ने साजिश के तहत एसोसिएटेड जर्नल्स लि. (एजेएल) की 2,000 करोड़ रुपए की संपत्तियों पर कब्जे के लिए उसका अधिग्रहण निजी स्वामित्व वाली कंपनी ‘यंग इंडियन’ के जरिए केवल 50 लाख रुपए में कर लिया। इस कंपनी के 76प्रतिशत शेयर सोनिया व राहुल के पास हैं। इस मामले में ‘अपराध से अर्जित आय’ 988 करोड़ रुपए की मानी गई। साथ ही संबद्ध संपत्तियों का बाजार मूल्य 5,000 करोड़ रुपए बताया गया है। जून 2022 में नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी से 5 दिनों में 50 घंटे पूछताछ हुई थी। फिर 21 जुलाई 2022 में नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी से 3 दिन में 12 घंटे सवाल हुए थे। इस दौरान उनसे 100 से ज्यादा सवाल किए गए।

आजादी से पहले शुरु हुए थे नेशनल हेराल्ड समेत तीन अखबार
इतिहास की बात करें तो 1937 में एसोसिएट जर्नल का गठन हुआ। इसके बाद 9 सितंबर 1938 को जवाहर लाल नेहरू ने नेशनल हेराल्ड अखबार शुरू किया। यह बात आजादी मिलने के ठीक 9 साल पहले की है। इस अखबार को शुरू करने में हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने अहम भूमिका निभाई थी। इसके तहत तीन अखबार थे, अंग्रेजी में ‘नेशनल हेराल्ड’, हिंदी में ‘नवजीवन’ और उर्दू में ‘कौमी आवाज’.यही नेशनल हेराल्ड आज सुर्खियों में बना हुआ है। नेशनल हेराल्ड केस में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत कई लोगों पर ईडी ने 988 करोड़ रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग मामले को लेकर चार्जशीट दायर की है। इसे लेकर ही बवाल है।

फिरोज के कमजोर संचालन से अखबार आर्थिक संकट में आया
जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव ओ. एम. मथाई ने अपनी किताब में सरदार पटेल और नेहरू की कहानी का जिक्र है। इसमें इस बात का भी जिक्र है कि फिरोज गांधी इस कंपनी के संचालन में बहुत अच्छे नहीं थे। इसलिए यह नेशनल हेराल्ड आर्थिक संकट में फंस गया। इसे आर्थिक संकट से उबारने के लिए जनहित निधि ट्रस्ट के रूप में बदल दिया गया। इस नए ट्रस्ट पर भी नेहरू परिवार का ही कब्जा रहा। इस ट्रस्ट के सभी ट्रस्टी नेहरू और उनके परिवार के बेहद करीबी लोग बनाए गए। उस समय विज्ञापन के नाम पर कई बड़े औद्योगिक घरानों से लाखों की रकम एक साल में इस अखबार ने हासिल की।

बड़ौदा के महाराजा से ही मांग ली थी दो लाख की रिश्वत
अपनी किताब में ओ. एम. मथाई ने तो यहां तक दावा किया कि नेशनल हेराल्ड के लिए बड़ौदा के महाराजा से पूरे दो लाख रुपए की रिश्वत मांग ली गई थी। सरदार वल्लभभाई पटेल को जब इसकी सूचना मिली थी तो उन्होंने इसकी शिकायत नेहरू से की थी। नेहरू के प्रधानमंत्री रहते ही दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर नेशनल हेराल्ड को ऑफिस बनाने के लिए जमीन भी आवंटित की गई। 1950 में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को पत्र लिखकर नेशनल हेराल्ड का समर्थन करने के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग करने के साथ ही संदिग्ध धन उगाही के बारे में भी चेतावनी दी थी। सरदार पटेल के पत्राचार में दर्ज इन चिंताओं को नेहरू ने खारिज कर दिया था, जबकि वह इसके दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में आशंकित थे।

ये चुनावी दिनों में ही क्यों घोटाले की जाँच सामने आती है? इतने सालों से चल रही जाँच लेकिन कोई सजा नहीं? ED ने गुरुग्राम की विवादित लैंड डील में रॉबर्ट वाड्रा, उनकी कंपनियों के खिलाफ दाखिल की चार्जशीट: 43 संपत्तियाँ हो चुकी हैं कुर्क

ये चुनावी मौसम में जो घोटालों की जाँच सामने आती है, शंका पैदा करती है कि 'क्या घोटाला हुआ था या नहीं, इतने सालों की जाँच में क्या पाया? किसी भी नेता का घोटाला हो चुनावी दिनों में सुनने को मिलते हैं। अगर यही घोटाले किसी सामान्य नागरिक ने किये होते कभी जाँच पूरी कर दोषी पाए जाने पर जेल हो गयी होती, लेकिन जहाँ सियासत हो तो ये सब ड्रामेबाज़ी। अगर घोटाला है जल्दी जाँच पूरी कर भेजो जेल।  
दूसरे, दिल्ली के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ कितने घोटालों पर शोर हुआ, जेल जाना और आना पर्यटन बन गया था। चुनाव होने के बाद सारे घोटाले क्या ठंठे बस्ते में चले गए हैं? क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स का? क्या कार्यवाही हुई? या फिर यही समझा जाए कि जिस तरह केजरीवाल चुनावी रैलियों में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के घोटालों को दिखाकर जेल भेजने की बात करते थे शीला स्वर्ग सिधार गयी लेकिन कुछ नहीं किया, मतलब क्या वही दौर दोहराया जा रहा है? मसला सिर्फ केजरीवाल का ही नहीं, कई नेता हैं जिन पर किसी न किसी घोटाले में जो जमानत हुई मामला शांत हो गया। अगर यही घोटाले किसी आम नागरिक ने किये होते क्या उनके साथ भी सरकार से लेकर कोर्ट तक ऐसी ही नरमी बरतती? क्या नेताओं और आम नागरिक के अलग कानूनी प्रक्रिया होती है?

             
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने हरियाणा के गुरुग्राम स्थित शिखोपुर लैंड डील मामले में कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा सहित 11 लोगों और संस्थाओं के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। यह चार्जशीट गुरुवार (17 जुलाई 2025) को नई दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित विशेष PMLA कोर्ट में दाखिल की गई।

रिपोर्टस के अनुसार, यह मामला मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार से जुड़ा है, जिसमें वाड्रा की कंपनी पर भारी मुनाफा कमाने और नियमों का उल्लंघन करने के गंभीर आरोप लगे हैं।

मामला वर्ष 2008 में गुरुग्राम के शिखोपुर गाँव (अब सेक्टर 83) की 3.53 एकड़ जमीन की खरीद से जुड़ा है। ED के अनुसार, रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी प्रा लि ने यह जमीन ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से महज 7.5 करोड़ रुपये में खरीदी थी।

कुछ ही महीनों में हरियाणा सरकार ने इस जमीन पर व्यावसायिक कॉलोनी के लिए लाइसेंस दे दिया, जिससे जमीन की कीमत लगभग 700% बढ़ गई। इसके बाद सितंबर 2012 में इस जमीन को DLF को करीब 58 करोड़ रुपये में बेच दिया गया।

उस वक्त हरियाणा में कॉन्ग्रेस की भूपिंदर सिंह हुड्डा की सरकार थी। इस सौदे की जाँच तत्कालीन IAS अधिकारी अशोक खेमका ने शुरू की और म्यूटेशन रद्द कर दिया। उन्होंने इसे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का मामला बताया।

इसी के आधार पर 1 सितंबर 2018 को गुरुग्राम पुलिस ने FIR दर्ज की। इसके बाद ED ने मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच शुरू की। कहना है कि इस सौदे से जो मुनाफा हुआ, उसे मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए इधर-उधर घुमाया गया।

रॉबर्ट वाड्रा को अप्रैल 2025 में तीन दिनों तक पूछताछ के लिए बुलाया गया था, जहाँ उनके बयान PMLA के तहत दर्ज किए गए। वाड्रा ने इन सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है और कहा है कि उन्होंने जाँच में पूरा सहयोग किया है और 23000 से ज्यादा पेज के दस्तावेज भी सौंपे हैं।

इस चार्जशीट में रॉबर्ट वाड्रा के अलावा उनकी कंपनियों, सत्यनंद याजी, केवल सिंह विर्क और ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज प्रा. लि. को आरोपित बनाया गया है। इसके अलावा बुधवार (16 जुलाई 2025) को ED ने वाड्रा और उनकी कंपनियों की कुल 43 अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया है, जिनकी कीमत लगभग 37.64 करोड़ रुपए बताई गई है।

फिलहाल कोर्ट ने इस चार्जशीट पर संज्ञान नहीं लिया है। अगली सुनवाई की तारीख तय की जा चुकी है, जिसके बाद यह तय होगा कि आरोपितों के खिलाफ मुकदमा चलेगा या नहीं।

‘सोनिया-राहुल गाँधी ने बनाए 142 करोड़ रूपए’: नेशनल हेराल्ड केस में ED ने कोर्ट को बताया, 2 जुलाई से मनी लॉन्ड्रिंग मामले की होगी रोजाना सुनवाई

                      सोनिया-राहुल गाँधी नेशनल हेराल्ड केस में फँसे (फोटो साभार: OpIndia English)
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले की सुनवाई बुधवार (21 मई 2025) को हुई। इस हाई-प्रोफाइल मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कांग्रेस नेताओं सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ईडी ने कोर्ट को बताया कि आरोपितों ने अपराध की आय से 142 करोड़ रुपए का फायदा उठाया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह राशि यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड के जरिए नेशनल हेराल्ड अखबार चलाने वाली कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) से प्राप्त किराये की आय से जुड़ी है। ईडी के विशेष वकील जोहेब हुसैन ने कोर्ट में दावा किया कि यंग इंडियन के 76% मालिक सोनिया और राहुल गाँधी ने केवल 50 लाख रुपए का भुगतान करके 90.25 करोड़ रुपए की संपत्ति हासिल की।

ईडी ने जब तक संपत्तियाँ जब्त नहीं की, तब तक सोनिया-राहुल ने उठाया फायदा

ईडी ने कोर्ट में यह भी कहा कि गाँधी परिवार ने न सिर्फ मनी लॉन्ड्रिंग की, बल्कि अपराध की आय को अपने पास रखकर इस अपराध को और बढ़ाया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कोर्ट को बताया कि यंग इंडियन ने एजेएल के शेयरों का दुरुपयोग किया, जिसके जरिए भारी मुनाफा कमाया गया।

नवंबर 2023 में ईडी ने नेशनल हेराल्ड से जुड़ी 751.9 करोड़ रुपए की संपत्तियों को जब्त किया था, जिसके बाद यह मामला और सुर्खियों में आ गया। राजू ने कोर्ट में यह भी स्पष्ट किया कि आरोपितों ने तब तक इस आय का लाभ उठाया, जब तक ईडी ने कार्रवाई नहीं की।

साल 2012 में सुब्रमण्यम स्वामी ने की थी शिकायत

यह मामला मूल रूप से 2012 में सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत से शुरू हुआ था। स्वामी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि गाँधी परिवार ने यंग इंडियन के जरिए एजेएल को धोखाधड़ी, आपराधिक दुरुपयोग और विश्वासघात के जरिए हासिल किया। 2010 में एजेएल में 1,057 शेयरधारक थे, लेकिन स्वामी का दावा है कि यंग इंडियन ने गलत तरीके से कंपनी पर नियंत्रण हासिल कर लिया।
ईडी ने इस मामले की जाँच 2014 में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत शुरू की थी, जब एक ट्रायल कोर्ट ने स्वामी की निजी आपराधिक शिकायत के आधार पर आयकर जाँच में अनियमितताओं का संज्ञान लिया।

राहुल-सोनिया के वकील ने समय माँग कर मामले को आगे बढ़वाया

कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वरिष्ठ वकीलों अभिषेक मनु सिंघवी और आरएस चीमा ने दस्तावेजों की जाँच के लिए और समय माँगा। उन्होंने कहा कि उन्हें हाल ही में करीब 5,000 पन्नों के दस्तावेज मिले हैं और मई का महीना कोर्ट और वकीलों के लिए व्यस्त रहता है। इसलिए उन्होंने जून के अंत या जुलाई के पहले सप्ताह तक का समय माँगा। कोर्ट ने उनकी माँग को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मामले को 2 जुलाई से 8 जुलाई तक रोजाना सुनवाई के लिए स्थगित कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला एमपी-एमएलए कोर्ट के दायरे में आता है, इसलिए नियमित सुनवाई जरूरी है।

सुब्रमण्यम स्वामी ने माँगी चार्जशीट और अन्य दस्तावेजों की कॉपी

इसके अलावा कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी की उस याचिका को भी मंजूरी दे दी, जिसमें उन्होंने नेशनल हेराल्ड केस की चार्जशीट और अन्य दस्तावेजों की कॉपी माँगी थी। ईडी ने सुनवाई के दौरान यह दलील दी कि सरकारी मँजूरी की जरूरत नहीं है, क्योंकि चार्जशीट एक अधिकृत अधिकारी के जरिए दायर की गई है, जो ईडी में सहायक निदेशक के पद पर है। राजू ने एक सरकारी आदेश का हवाला देते हुए कहा कि सरकार किसी अधिकारी को धारा 45 के तहत शिकायत दायर करने के लिए अधिकृत कर सकती है।

मीलॉर्ड क्या नेताओं के लिए अलग कानून बनाना चाहते हो कि चुनाव से पहले गिरफ़्तारी न हो; ED से गिरफ़्तारी के समय पर सवाल उठाने से आपको भी कुछ जवाब देने पड़ जाएंगे

सुभाष चन्द्र

एक कहावत है 'you show me the man, I will show you the rules' जिसे जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ घोटाले के kingpin अरविन्द केजरीवाल प्रकरण में सही साबित कर रही है। पीठ को ED से प्रश्न करने से पहले केजरीवाल से ये क्यों नहीं पूछा कि 9 सम्मान देने की नौबत क्यों आयी? अगर बेकसूर थे क्यों नहीं पहले ही समन पर हुए पेश? क्यों 9 समन देने की नौबत आयी? क्या अपनी गिरफ़्तारी से बचने के लिए सबूतों को नष्ट कर रहे थे? क्यों नहीं अपने electronic devices का पासवर्ड बता रहे? 170 मोबाइल क्यों नष्ट किए? पीठ पर प्रश्न उठाने को विवश करता है कि 'क्या पीठ और केजरीवाल के बीच कोई समझौता हुआ है? मुख्य न्यायधीश को संज्ञान लेना चाहिए।  

लेखक 
चर्चित यूटूबर 
मीलॉर्ड जिस दिन घोटाले के kingpin केजरीवाल ने अपने electronic devices का पासवर्ड बता दिया संभव है वो घोटाले सामने आएं, जिन्हे देख और सुनकर पीठ भी हैरान हो जाए और ED की कार्यवाही पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर आपको ही शर्मिदा न होना पड़े। न्याय करिए अन्याय नहीं। यह भी संभव हो सकता है कि पूरे ही परिवार को जेल में जाने की नौबत आ जाए। केजरीवाल की बहुत मोटी खाल है आसानी से घोटाले नहीं कबूलने वाला। Third degree पर भी आसानी से नहीं कबूलने वाला। जिसका सबूत आपके ही सामने है कि गिरफ़्तारी को चुनौती दे रहा है, जमानत लेने के लिए नहीं। ये जिंदगी भर उल्टे-पुल्टे सवालों में उलछा कर घोटालों से ध्यान भटकाता रहेगा और मीलॉर्ड घोटाले के मुद्दे पर सवाल नहीं कर पाएंगे।   

केजरीवाल की गिरफ़्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर कल(मई 1) की सुनवाई में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने ED से जो सवाल उसकी गिरफ़्तारी को लेकर किए हैं, उनके जवाब तो ED देगा लेकिन आपके सवाल आप पर भी कुछ सवाल खड़े करता है। 

सबसे पहले इसी सवाल पर बात करते हैं, मीलॉर्ड ने कहा कि स्वतंत्रता बहुत महत्वपूर्ण है जिससे आप इंकार नहीं कर सकते और केजरीवाल ने चुनाव के दौरान गिरफ़्तारी पर सवाल उठाया है ED को गिरफ़्तारी के समय पर जवाब देना होगा कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि केस में कार्रवाई शुरू होने और गिरफ़्तारी का अंतराल 365 दिन होता है

केजरीवाल भी वही करेगा जो  संजय सिंह ने किया कोर्ट के मना करने पर भी केस के संबंध में मीडिया में बयानबाजी की लेकिन आपने जमानत खारिज नहीं की

मीलॉर्ड आपको हम ही याद करा दें कि केजरीवाल को पहला समन अक्टूबर में दिया गया था और उसे 9 समन दिए गए अगर वह उन पर पेश हो जाता तो आपका आज का सवाल खड़ा ही नहीं होता लेकिन केजरीवाल शुरू से एक सुपर सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बन कर summons को illegal कहता रहा मीलॉर्ड क्या ED से सवाल करते हुए आप भी मानते हैं कि summons illegal थे और अगर ऐसा है तो फिर CJI चंद्रचूड़ की बेंच के उस फैसले का क्या मतलब है जिसमे उन्होंने तमिलनाडु के DMs को कहा था ED के summons पर हाजिर होना आपके लिए जरूरी है और उसमे कोई छूट नहीं मिल सकती 

फिर केजरीवाल 2, 3, 5 summons को कोर्ट में चुनौती दे सकता था लेकिन उस मक्कार-ए-आज़म ने 9 summons को जानबूझकर चुनावों की घोषणा होने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी और यह भी नौटंकी की कि वो पेश होने को तैयार है लेकिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से या उसे भरोसा दिया जाए कि उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा क्या मीलॉर्ड आप मानते है कि कोई व्यक्ति इस तरह की शर्तें लगा सकता है? 

दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच ने ED से उसके खिलाफ सबूत मांगे और सबूत देखकर बेंच के जजों ने कहा इसे अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया और अंततः केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर रोक लगाने वाली मांग खारिज कर दी ऐसे में मीलॉर्ड बताएं कि क्या हाई कोर्ट को चुनावों को देखते हुए गिरफ़्तारी पर रोक लगा देनी चाहिए थी या क्या ED को केजरीवाल पर कार्रवाई करने और गिरफ्तार करने के लिए चुनावों के ख़त्म होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी 

केजरीवाल खुद चुनाव के समय में summons को चुनौती देने पहुंचा तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी तुरंत हो सकती थी और इसमें कुछ गलत नहीं है केजरीवाल का अक्टूबर, 2023 से summons की अवहेलना करना केस शुरू होने और गिरफ्तार होने के अंतराल के बारे में आपका प्रश्न स्वतः ही उत्तर दे देता है

अदालत ने यह भी कहा कि केजरीवाल से अभी तक जब्ती की कार्रवाई नहीं हुई है और अगर हुई भी है तो उससे केजरीवाल का क्या संबंध है; इसलिए ED को गिरफ़्तारी और जब्ती का केजरीवाल से संबंध बताना पड़ेगा 

मीलॉर्ड एक बात पर ध्यान दीजिए कि केजरीवाल ने करीब 170 फ़ोन Destroy किए हैं जो अपने आप में सबूतों को नष्ट करना है जो फ़ोन ED ने custody में लिए हैं, उनके password केजरीवाल नहीं दे रहा जिनके मिलते ही जबरदस्त जब्ती हो सकती है उसे निर्देश दीजिए password देने के लिए 

एक बात और अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर, 2023 में सिसोदिया को जमानत ख़ारिज करते हुए ED को कहा था कि केस की सुनवाई 3 महीने में पूरी कर ली जाए लेकिन जब घोटाले के kingpin केजरीवाल ही जांच से 5 महीने तक भागता फिरा तो केस की सुनवाई कैसे पूरी होगी?

दिल्ली : अरविंद केजरीवाल को ED ने गिरफ्तार किया: शराब नीति के बदले ‘साउथ लॉबी’ ने AAP को दिए थे 100 करोड़ रूपए, मुख्यमंत्री के दफ्तर में रची जाती थी साजिश

दिल्ली के मुख्यमंत्री और AAP (आम आदमी पार्टी) के संयोजक अरविंद केजरीवाल को ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने गिरफ्तार कर लिया है। शराब घोटाला के मामले में ED ने ये कार्रवाई की है। AAP के नेता सौरभ भारद्वाज और आतिशी पहले से ही कह रही थीं कि दिल्ली सीएम को गिरफ्तार किया जा सकता है। शराब घोटाला के मामले में दायर चार्जशीट में ED ने अरविंद केजरीवाल को साजिशकर्ता के रूप में नामित किया था। BRS की बेटी  के कविता का भी इसमें नाम है।

केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर कांग्रेस घड़ियाली आंसू बहाती नज़र आ रही है। कांग्रेस के अनुसार गिरफ़्तारी लगभग 3 साल देर है। कांग्रेस को जितना नुकसान केजरीवाल ने पहुँचाया है बीजेपी ने नहीं, यही वजह है कि कांग्रेस केजरीवाल के विरुद्ध थी। केजरीवाल द्वारा I.N.D.I. गठबंधन में शामिल होने का मुख्य कारण था, कि केजरीवाल और पार्टी पहले से जानती थी कि कभी भी गिरफ़्तारी होने पर विपक्ष साथ खड़ा नज़र आये, जो मात्र एक दिखावे के अलावा कुछ नहीं।    

AAP के अन्य नेता पूर्व उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और राज्यसभा सांसद संजय सिंह पहले से ही इस मामले में जेल में हैं। ED ने कहा है कि शराब माफियाओं की एक ‘साउथ लॉबी’ है, जिसे फायदा पहुँचाने के लिए दिल्ली की शराब नीति बनाई गई थी। हालाँकि, बाद में इसे रद्द कर दिया गया। इसके बदले में उक्त ‘साउथ लॉबी’ ने AAP को 100 करोड़ रुपए दिए थे। इस मामले का एक अन्य आरोपित विजय नायर अक्सर अरविंद केजरीवाल के घर जाता था और वहाँ काफी समय गुजारता था।

इस मामले के गवाहों और आरोपितों ने अरविंद केजरीवाल का नाम लिया था। शराब कारोबारियों से विजय नायर ने कहा था कि उसने अरविंद केजरीवाल से नई शराब नीति को लेकर विचार-विमर्श किया है। विजय नायर ने ही ‘Indospirit’ के मालिक समीर महेन्द्रू को दिल्ली के CM से मिलवाया था। बैठक असफल रही तो उसने वीडियो कॉल के जरिए दोनों की बात करवाई। इसमें अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि कीजै नायर उनका ‘बच्चा’ है और उस पर उन्हें पूरा विश्वास है।

इसमें एक राघव मगुंटा का नाम भी आया है, जो ‘साउथ लॉबी’ का पहला आरोपित है और अब सरकारी गवाह बन चुका है। उसके पिता YSR कॉन्ग्रेस पार्टी के सांसद हैं। उन्होंने AAP संयोजक से मुलाकात कर के दिल्ली की शराब नीति के बारे में समझा था। मनीष सिसोदिया के पूर्व सेक्रेटरी C अरविंद ने दिसंबर 2022 में अपने एक बयान में कहा था कि एक ‘ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स’ रिपोर्ट के दस्तावेज के आधार पर उन्हें ड्राफ्ट बनाने के लिए कहा गया था, जबकि बैठक में ऐसी कोई चर्चा ही नहीं हुई थी।


अब केजरीवाल की पार्टी AAP(आम आदमी पार्टी) का होगा BBP (भ्रष्टाचार बढ़ाओ पार्टी) नाम

किसन बाबूराव हजारे जिन्हें लोग समाजसेवी अन्ना हजारे के नाम से जानते हैं, उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में सक्रिय रहे अरविंद केजरीवाल ने उनको धोखा देकर न सिर्फ आम आदमी पार्टी का दो अक्टूबर 2012 को गठन कर लिया, बल्कि अन्ना हजारे के मूल सिद्धांतों को भी तिलांजलि दे दी। आम आदमी पार्टी जिस भ्रष्टाचार विरोध के मुद्दे पर जन्मी थी, एक के बाद एक उसके नेता भ्रष्टाचार के जनक ही बनते गए। पार्षद, विधायक, मंत्री से लेकर अब उप-मुख्यमंत्री तक करोड़ों के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। आप सरकार के कानून मंत्री की वकालत की डिग्री फर्जी मिली, तो महिला कल्याण मंत्री ही महिला का बलात्कार करते धरे गए। अन्ना हजारे को अब दुख हो रहा है कि उन्होंने कैसे भ्रष्ट नेताओं के साथ मंच शेयर करके उनको आगे बढ़ाया था। दिल्ली से लेकर पंजाब तक नित-नए घोटाले, घपले और घूसखोर नेता सामने आने के कारण लगता है कि आम आदमी पार्टी (AAP) को अपना नाम बदलकर भ्रष्टाचार बढ़ाओ पार्टी (BBP) कर लेना चाहिए। क्योंकि केजरीवाल की भ्रष्टाचार पर खोखली जीरो टालरेंस नीति की अब पूरी तरह पोल खुल चुकी है। सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया केसों की जाँच में अरविन्द केजरीवाल का नाम आने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं। 

दो मंत्रियों के इस्तीफे स्वीकार कर लेने से आप के पाप धुलने वाले नहीं

द‍िल्‍ली के ड‍िप्‍टी सीएम मनीष स‍िसोद‍िया की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को दिन में तारे नजर आने लगे हैं। व‍िपक्ष इस घटनाक्रम में बाद आप सरकार और अरव‍िंद केजरीवाल पर भ्रष्टाचार को लेकर पूरी तरह से हमलावर हो गया है। इस सबको क‍िस तरह से जवाब द‍िया जाए और सरकार की धूम‍िल हो रही छव‍ि को कैसे बचाया जाए, इसको लेकर अब माथापच्ची की जा रही है। इसी के तहत कई महीने से जेल में बंद स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन और अब धरे गए मनीष सिसोदिया से इस्तीफा मांग लिया है। लेकिन केजरीवाल के इन दोनों मंत्रियों के इस्तीफे स्वीकार कर लेने भर से आप के पाप धुलने वाले नहीं है। क्योंकि यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, जबकि आप का बड़ा नेता भ्रष्टाचार को लेकर एक्सपोज हुआ हो।

डिप्टी सीएम और मंत्री ही नहीं, दो दर्जन से ज्यादा विधायक भी आरोपी

इससे पहले भी दिल्ली से लेकर पंजाब तक आप सरकार के मंत्री जेल जा चुके हैं। बहुत उछलकूद कर बड़ी-बड़ी बातें कर रहे डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया भी अब इन्हीं नेताओं की पंगत में शुमार हो गए हैं। मंत्रियों के अलावा आप के करीब दो दर्जन विधायकों पर घूसखोरी के अलावा अन्य आरोप लगे हैं और कुछ जेल गए हैं। वहीं मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन के इस्तीफे के बाद दिल्ली की राजनीति उफान पर है। डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया से गत वर्ष 17 अक्तूबर को भी सीबीआई ने पूछताछ की थी। इसके साथ ही ईडी ने भी कई जगह छापेमारी की थी। इससे पहले दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को ईडी ने ही गिरफ्तार किया था। ईडी ने जैन की लगभग पौने पांच करोड़ रुपये की संपत्ति भी जब्त की है।

 जेल में बंद सबसे करीबी सत्येंद्र जैन को केजरीवाल ने दी थी क्लीन चिट

मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य आरोपों में जेल में बंद स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को केजरीवाल का बहुत करीबी माना जाता है। यही वजह है कि जैन के तिहाड़ जेल में जाने के बावजूद केजरीवाल ने अपने इस विश्वस्त मंत्री को पद से नहीं हटाया गया। खास बात ये रही कि अरविंद केजरीवाल की ओर से जैन को क्लीन चिट दी गई थी। उन्होंने कई अवसरों पर कहा कि राजनीतिक खुन्नस निकालने के लिए आप नेताओं को परेशान किया जा रहा है। लेकिन जांच एजेंसियों की लगातार की जा रही पड़ताल में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। सत्येंद्र जैन के बाद मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी से केजरीवाल के भी तोते उड़ने लगे हैं। इसकी बड़ी वजह यही है कि उनकी पार्टी भ्रष्टाचारियों की फौज बनती चली जा रही है। पंजाब की जनता ने केजरीवाल की पार्टी को जिताया तो वहां भी स्वास्थ्य मंत्री विजय सिंगला भ्रष्टाचार के मामले जेल जा चुके हैं।
दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पर करोड़ों की मनी लॉन्ड्रिंग का केस
प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में शिकंजा कसते हुए दिल्ली में AAP सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ्तार किया। ईडी ने जैन की 4.81 करोड़ की संपत्ति भी जब्त की थी। दरअसल, जैन के परिवार के लोग कुछ ऐसी फर्म से जुड़े थे जो PMLA के तहत जांच के दायरे में हैं। सत्येंद्र जैन की बेटी सौम्या जैन को मोहल्ला क्लीनिक के लिए सलाहकार नियुक्त किए जाने के मामले ने भी काफी तूल पकड़ा था। इस मामले की जांच सीबीआई तक को दी गई थी। ईडी की जांच में पता चला है कि साल 2015-16 के दौरान जब सत्येंद्र कुमार जैन एक लोक सेवक थे, तब जैन पर अधिकारों के दुरुपयोग के भी कई आरोप लग चुके हैं।
महिला कल्याण मंत्री संदीप कुमार ने महिला को बनाया हवस का शिकार
आम आदमी पार्टी के मंत्री भ्रष्टाचार में ही नहीं, रेप केस में भी संलिप्त पाए गए हैं। दिल्ली सरकार में मंत्री रहे संदीप कुमार 2016 में राशन कार्ड बनवाने के बहाने महिला से रेप केस में फंस चुके हैं। इस मामले में उनको जेल भेजा गया। इस घटना की एक सीडी भी सामने आई थी। संदीप कुमार 2015 में दिल्ली की सुल्तानपुर माजरा विधानसभा सीट से विधायक बना और उसको केजरीवाल सरकार में महिला एवं बाल कल्याण विकास मंत्री बनाया गया था। 2016 में एक ऐसी सीडी वायरल हुई, जिसमें संदीप कुमार को दो महिलाओं के साथ आपत्तिजनक हालात में देखे जाने के आरोप लगे। महिला का कहना था कि वह संदीप कुमार के पास राशन कार्ड बनवाने गई थी। यहां कोल्ड ड्रिंक में नशीला पदार्थ मिलाकर पिला दिया गया। उसके बाद रेप किया गया। मंत्री के रेप केस में आने के बाद भारी दबाव पड़ने पर केजरीवाल को संदीप को हटाना पड़ा।
दिल्ली के कानून मंत्री जितेंद्र तोमर की ही वकालत की बोगस डिग्री
साल 2015 में दिल्ली सरकार में कानून मंत्री जितेन्द्र सिंह तोमर को गिरफ्तार किया गया था। उन पर वकालत की फर्जी डिग्री रखने के आरोप लगे। एक आरटीआई के हवाले से पता चला कि जितेंद्र की डिग्री बोगस है। भागलपुर यूनिवर्सिटी ने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि जो पंजीकरण नंबर उनकी डिग्री पर है, उस नंबर पर कोई और पंजीकृत है। डिग्री पूरी तरह से गलत और बोगस है। जितेंद्र पहले कांग्रेस नेता भी रहे हैं। दिल्ली चुनाव में वो आम आदमी पार्टी से त्रिनगर से चुनाव जीते और केजरीवाल सरकार में कानून मंत्री बने। उनको दिल्ली के पर्यटन, कला और संस्कृति की भी जिम्मेदारी दी गई थी।
खाद्य आपूर्ति मंत्री आसिम खान ने खाई छह लाख की रिश्वत
दिल्ली सरकार में साल 2018 में मंत्री आसिम अहमद खान का नाम भी भ्रष्टाचार की सुर्खियों में आया। दिल्ली सरकार में खाद्य आपूर्ति मंत्री आसिम खान पर एक बिल्डर से 6 लाख रुपये की रिश्वत खाने के आरोप लगे। आसिम के ख‍िलाफ भ्रष्टाचार के आरोप की जांच CBI को सौंपी गई। भारी दबाव के बाद तब सीएम अरविंद केजरीवाल ने अपने कैबिनेट मंत्री आसिम अहमद खान को हटाना पड़ा था।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की राणा अयूब की याचिका, लटकी गिरफ्तारी की तलवार: गरीबों के नाम पर करोड़ों खाने का आरोप

मनी लांड्रिंग केस में बच निकलने का जुगाड़ निकाल रहीं वामपंथी प्रोपेगेंडा पत्रकार राणा अयूब को तगड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने राणा अयूब की उस याचिका को ख़ारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने गाजियाबाद की एक अदालत द्वारा जारी सम्मन को चुनौती थी जिसमें उनसे हाजिर होने को कहा गया था। सम्मन के मुताबिक राणा को 27 दिसंबर 2022 तक कोर्ट में हाजिर होना था जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। याचिका ख़ारिज होने के बाद अब राणा अयूब को अदालत में हाजिर होना ही पड़ेगा। अयूब के खिलाफ मनी लांड्रिंग का यह केस प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दर्ज करवाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राणा अयूब की तरफ से सीनियर एडवोकेट वृंदा ग्रोवर सुप्रीम कोर्ट में पेश हुईं थीं। राणा अयूब को गाजियाबाद की विशेष अदालत ने 27 दिसंबर 2022 को पेश होने का निर्देश दिया था। इस निर्देश और सम्मन के खिलाफ राणा अयूब सुप्रीम कोर्ट गईं थीं जिस पर 31 जनवरी 2023 को सुनवाई हुई थी। सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षा रख लिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने राणा अयूब की याचिका ख़ारिज कर दी है। याचिका ख़ारिज होने के बाद राणा अयूब पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है।

दरअसल राणा अयूब पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ‘Ketto’ के जरिए अवैध तौर पर पैसे जुटाने का आरोप है। ये पैसे कोरोना काल के दौरान गरीबों की मदद के लिए जुटाए गए लेकिन उसका सही उपयोग नहीं हुआ। दान की यह राशि ₹2.69 करोड़ बताई जा रही है। आरोप है कि जनसेवा के लिए मिले पैसे का प्रयोग राणा अयूब ने अपने और अपने परिवार के लिए किया और उससे बैंक के एफ डी बनवा डाली। मामले की जाँच कर रही ED ने इस बावत केस दर्ज करवाया और अक्टूबर 2022 में अदालत में पर्याप्त सबूत भी जमा करने का दावा करते हुए चार्जशीट दाखिल की है।

हालाँकि राणा अयूब ने इस मामले में खुद को बेगुनाह बताते हुए इस केस को खुद को फँसाने की साजिश बताया। इस मामले में गाजियाबाद की PMLA स्पेशल कोर्ट ने पहले तो राणा अयूब को जमानत दे दी थी लेकिन बाद में ED द्वारा सबूत पेश किए जाने पर सम्मन जारी करते हुए 27 दिसंबर 2022 को हाजिर होने का आदेश दिया था। राणा अयूब कोर्ट में पेश होने के बजाए इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।