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दिल्ली में मस्जिद के पास पुलिस टीम पर पथराव के वीडियो आए सामने, CCTV से की जाएगी पत्थरबाजों की पहचान: इलाके में भारी पुलिसबल तैनात

                             मस्जिद के पास पुलिस पर पथराव का वीडियो आया सामने (फोटो साभार: X)
दिल्ली में रामलीला मैदान के पास तुर्कमान गेट स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास पुलिस और नगर निगम (MCD) टीम पर पत्थरबाजी का वीडियो सामने आया है। वीडियो में उग्र भीड़ बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश कर रही है। लेकिन पुलिस ने लाठी और आँसू गैस के गोले छोड़कर भीड़ पर काबू पाया।

काफी समय से खासतौर पर जब से पत्थरबाज़ी की हरकतें होनी शुरू हुई है तब से पुलिस की सुरक्षा दृष्टि से यह सवाल उठाया जाता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट पत्थरबाजों पर blind firing के आदेश क्यों नहीं देती? क्या पुलिसकर्मी बलि का बकरा हैं? क्या उनकी जान की कोई कीमत नहीं?     

रामलीला मैदान के पास मस्जिद और कब्रिस्तान से सटी जमीन से सोमवार (06 जनवरी 2025) की रात 1 बजे अतिक्रमण हटाया गया। इस दौरान तुर्कमान गेट स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास पुलिस पर पुलिस और नगर निगम (MCD) टीम पर पत्थरबाजी की गई। पथराव में 5 पुलिसकर्मी घायल हो गए।

सेंट्रल रेंज के जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस मधुर वर्मा ने कहा कि हालात कंट्रोल में हैं। पूरे इलाके को 9 जोन में बाँटा गया है। हर जोन की ADCP स्तर के अधिकारी निगरानी कर रहे हैं। संवेदनशील जगहों पर भारी पुलिस बल तैनात हैं। सीसीटीवी फुटेज के जरिए पत्थरबाजों की पहचान कर कार्रवाई की जाएगी।

विरोध के बावजूद टीम ने अतिक्रमण हटाने का काम जारी रखा। मंगलवार (07 जनवरी 2026) सुबह तक टीम ने अपना काम पूरा कर लिया। बता दें कि यह अतिक्रमण दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर हटाया जा रहा था। नगर निगम की इस जमीन पर अवैध रूप से बारात घर, डायग्नोस्टिक सेंटर और दुकानें बनाई गई थीं। जिन्हें पुलिस और नगर निगम की टीम ने बुलडोजर से ढहा दिया।

असम : ‘हत्याओं के लिए कुख्यात हैं बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठिए, 1983 में कांग्रेस ने बसाया था’

असम के दरांग में हुई हिंसा की स्थानीय लोगों ने खोली पोल (फाइल फोटो)
दरांग जिले में 23 सितंबर, 2021 को जब पुलिस अतिक्रमणकारियों से जमीन खाली कराने गई तो जवानों पर हमला बोल दिया गया और 11 पुलिसकर्मी घायल हो गए। इसके बाद वामपंथियों ने राज्य में हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया। सरकार बता चुकी है कि 10,000 मुस्लिमों की भीड़ ने पुलिस को घेर कर लाठी-डंडों व ईंट-पत्थर से हमला बोल दिया था, तभी पुलिस ने कार्रवाई की।

लेकिन, विपक्ष और मीडिया का गिरोह विशेष ये दुष्प्रचारित करने में जुटा है कि भाजपा सरकार मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा कर रही है। इसी बीच ‘न्यू इंडिया जंक्शन’ नाम के एक यूट्यूब चैनल ने स्थानीय नागरिकों से बात कर के सच्चाई सामने रखी है और असम में चल रहे अतिक्रमण विरोधी अभियान को लेकर फैलाए जा रहे झूठ को भी बेनकाब किया है। इस ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ से सच्चाई का पता चलता है।

दरांग जिले के एक स्थानीय नागरिक लाक्षेदार नाथ ने बताया कि 23 सितंबर, 2021 को जो भी हुआ वो एक असामान्य घटना नहीं थी, क्योंकि उस क्षेत्र में रहने वाले लोग हत्याओं और मारपीट में अभ्यस्त हैं। नैरेटिव ये फैलाया जा रहा है कि असम से मुस्लिमों को भगाने के लिए राज्य सरकार कार्रवाई कर रही है। उन्होंने कहा कि तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है, ताकि प्रशासन को बदनाम किया जा सके।

उन्होंने बताया कि गुवाहाटी हाईकोर्ट के समक्ष अवैध अतिक्रमण का मामला उठाने वाला मुस्लिम व्यक्ति ही था। इसके बाद ही उच्च-न्यायालय ने राज्य सरकार को कार्रवाई का आदेश दिया। इसी तरह रबीन्द्र कुमार नाथ नाम के स्थानीय नागरिक ने बताया कि 1975 से ही यहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों का अतिक्रमण चालू है, जिन्होंने 77,000 एकड़ ही नहीं बल्कि 5000 वर्ष पुराने शिव मंदिर की जमीन भी हथिया ली।

उन्होंने कहा कि घुसपैठियों की इस तरह की हरकत से सबसे ज्यादा परेशानी स्थानीय नागरिकों को हुई है, जिनमें से कई बर्बाद हो गए। उन्होंने न सिर्फ असम के आदिवासियों की संस्कृति को ख़त्म करने की कोशिश की, बल्कि आर्थिक रूप से भी उन्हें नुकसान पहुँचाया। दरांग के सिपाझार में गरुखुटी के निकट स्थित शिव मंदिर के सेवादार प्रसेनजीत ने बताया कि वर्षों से हिन्दू समुदाय के लोग मंदिर के आसपास रहते आए हैं।

उन्होंने कहा कि 1983 चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी ने अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को बुला यहाँ बसाया। धौलपुर शिव मंदिर के सचिव ने बताया कि 1980 में यहाँ 36 परिवारों को बसाया गया था। धर्मकान्त नाथ ने कहा कि उसी समय बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों ने मंदिर की 500 बीघा जमीन हथिया ली थी और बाद में इसकी अधिकतर जमीनें उनके कब्जे में चली गई। स्थानीय नागरिकों को प्रताड़ित किया गया।

अवलोकन करें:-

देश से अवैध कब्जे हटाने के लिए नैतिक बल जुटाना सरकारों और उनके नेतृत्व के लिए चुनौती: मुख्यमंत्

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देश से अवैध कब्जे हटाने के लिए नैतिक बल जुटाना सरकारों और उनके नेतृत्व के लिए चुनौती: मुख्यमंत्

कई ऐसे वीडियोज भी सामने आए हैं, जहाँ कांग्रेस नेताओं को धौलपुर के अतिक्रमणकारियों के यहाँ दौरा करते हुए देखा जा सकता है। आखिर जहाँ जमीन खाली कराई जानी थी, वहाँ कांग्रेस  नेताओ ने दौरा क्यों किया? क्या उन्होंने वहाँ जाकर उनसे कहा होगा कि वो सरकारी कार्य में सहयोग करें? न कांग्रेस का चरित्र ऐसा है और न ही सबूत ऐसा कहते हैं। उन्होंने वहाँ जाकर लोगों को भड़काया और विरोध प्रदर्शन करने लगे।

दिल्ली में सरकार बनाओ, 1 भी गैर क़ानूनी मस्जिद को नहीं छोडूंगा : प्रवेश वर्मा, बीजेपी सांसद

दिल्ली ही नहीं बल्कि ये देश के सभी राज्यों और शहरों का हाल है, हर जगह गैर क़ानूनी मस्जिदें, मदरसे, मजारों ने सरकारी भूमि पर कब्ज़ा जमाया हुआ है। 
सेक्युलर सरकारों के दौर में सरकारी जमीनों को बड़े पैमाने पर इस्लामिक माफिया और कट्टरपंथियों ने हडपा है और सरकारी जमीने हड़पने के लिए वहां पर मस्जिद, मजारें बनाई गयी है
दिल्ली में भी काफी बड़े सरकारी भूभाग पर गैर क़ानूनी मस्जिदें बनी हुई है, और अब दिल्ली के बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा ने डंके की चोट पर बड़ा ऐलान किया है
प्रवेश वर्मा ने आज ऐलान करते हुए कहा की अगर दिल्ली में भाजपा की सरकार बनती है तो सारी गैर क़ानूनी मस्जिदों को हटा दिया जायेगा, प्रवेश वर्मा ने कहा की - मेरी लोकसभा सीट के इलाके में जितनी भी मस्जिदें सरकारी जमीनों पर बनी है उनमे से 1 भी मस्जिद को नहीं छोडूंगा

जहाँ प्रवेश वर्मा के ऐलान के बाद आम लोगों ने इस बात का समर्थन किया है क्योकि लोग गैर क़ानूनी कब्जे के खिलाफ है वहीँ सेक्युलर तत्वों ने प्रवेश वर्मा को सांप्रदायिक घोषित कर दिया है
अब देखना ये है की दिल्ली के लोग क्या चाहते है, अगर वो गैर क़ानूनी कब्जे से आज़ादी चाहते है तो प्रवेश वर्मा का समर्थन वोट के द्वारा करेंगे और अगर लोग मुफ्तखोरी और सेकुलरिज्म ही चाहते है तो गैर क़ानूनी मस्जिदें दिल्ली की भूमि पर जमी रहेंगी
जहाँ तक अवैध कब्जे की बात है, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में यह आम बात है। जामा मस्जिद क्षेत्र जिसे भीड़भाड़ वाला क्षेत्र कहा जाता है, अगर हकीकत में देखा जाए, यहाँ इतनी भीड़ नहीं जितनी दिखती है। जिस दिन दुकानदारों के अवैध कब्जे हटा दिए जाएंगे, भीड़ अपने आप झंट जाएगी। एक अवैध अधिक्रमण दूसरे दो/तीन फुट आगे तक सामान रखना, सरकारी जमीन पर दुकानें खोलना आदि के कारण ट्रैफिक और पैदल चलने वालों को जो समस्या होती है, उस ओर किसी सरकार एवं पार्टी ने अपने वोटों के हित के कारण कभी गंभीरता से नहीं लिया। पटरियों पर कारें और रिक्शा खड़े रहने से पैदल चलने वालों को सड़क पर ही चलना पड़ता है। इस विषय पर कई बार इस गंभीर समस्या पर लिखता रहा हूँ।     

फ़िल्म सिटी ने हड़प रखी है नेशनल पार्क की 51 एकड़ ज़मीन, Aarey पर विरोध करने वाला बॉलीवुड भी चुप

फ़िल्म सिटी, संजय गाँधी नेशनल पार्कआरे को हाईकोर्ट ने आधिकारिक रूप से जंगल मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद इसे लेकर महाराष्ट्र सरकार का विरोध कर रहे लोगों को काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इस विरोध प्रदर्शन में बॉलीवुड बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा है। मनोज वाजपेयी और वरुण धवन जैसे अभिनेताओं से लेकर दिया मिर्जा और ऋचा चड्ढा जैसी अभिनेत्रियों तक ने आरे क्षेत्र में मेट्रो के लिए पेड़ों को काटे जाने का विरोध किया। एकाध कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने तो उस पेड़ को गले लगाया, जिन्हें काटा ही नहीं जाना है। हालाँकि, अक्षय कुमार और अमिताभ बच्चन जैसे बड़े अभिनेताओं ने मेट्रो की महत्ता बताते हुए सरकार का समर्थन भी किया है।
इसी क्रम में एक दो वर्ष पुरानी ख़बर है, जो बॉलीवुड को अपने भीतर झाँकने पर मजबूर कर देगी। लक्ज़री गाड़ियों से घूमने वाले जिस बॉलीवुड के लोग मेट्रो प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं, उसी बॉलीवुड के गढ़ को लेकर ऐसी सूचना आई थी, जिसे लेकर आज तक एक भी सेलेब्रिटी ने आवाज़ नहीं उठाई। मुंबई के गोरेगाँव में फिल्म सिटी और संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान स्थित हैं। जहाँ फ़िल्म सिटी के नाम से जाना जाने वाला ‘दादासाहब फाल्के नगर’ 1977 में बनाया गया था। यहीं ‘बोरीवली नेशनल पार्क’ भी है, जिसका नाम 1996 में ‘संजय गाँधी नेशनल पार्क’ कर दिया गया था।
फ़िल्म सिटी का निर्माण भले ही 1977 में हुआ लेकिन यहाँ दादासाहब फाल्के द्वारा निर्मित स्टूडियो पहले से ही था। यह 1911 से ही वहाँ स्थापित है। इसे 1977 में एक नया रूप-रंग दिया गया था।
संजय गाँधी नेशनल पार्क (जो तब बोरीवली नेशनल पार्क हुआ करता था) की अथॉरिटी का कहना है कि 1966 में ग़लती से उसके हिस्से की 51 एकड़ ज़मीन फिल्म सिटी को ट्रांसफर हो गई थी, जिसे अब तक नहीं लौटाया गया है। ‘वनशक्ति’ एनजीओ ने सूचना के अधिकार के तहत कुछ डॉक्युमेंट्स हासिल किए थे, जिससे पता चला कि 51 एकड़ की यह ज़मीन विवादित है क्योंकि फिल्म सिटी और नेशनल पार्क के बीच कोई बाउंड्री नहीं है। नेशनल पार्क के अधिकारियों का कहना है कि वे 1970 से लगातार फ़िल्म सिटी से मिन्नतें कर रहे हैं कि नेशनल पार्क की ज़मीन लौटा दी जाए।
अगस्त 2017 में भी इस सम्बन्ध में फिल्म सिटी से निवेदन करते हुए एक पत्र लिखा गया था। पार्क के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि फिल्म सिटी के लोगों की सुरक्षा के लिए भी यह ज़रूरी है क्योंकि जंगली जानवर उस क्षेत्र में स्वच्छंद घुमते हैं। बता दें कि फ़िल्म सिटी में आर्टिफिसियल झरने और जेल से लेकर वो सभी चीजें हैं, जिनकी बॉलीवुड फ़िल्मों की शूटिंग में आवश्यकता होती है। लगभग सभी बॉलीवुड फ़िल्मों का अधिकतर हिस्सा यहीं शूट किया जाता है। तब फ़िल्म सिटी ने ये ज़मीन लौटाने से मना कर दिया था और उन्होंने कहा था कि वे अपने निर्णय पर अडिग रहेंगे।
अगस्त 2017 में फ़िल्म सिटी में शूटिंग के दौरान कई लोगों पर जंगली जानवरों ने हमले किए थे। उसके बाद एक सप्ताह से भी अधिक समय तक इसे बंद रखा गया था। बावजूद इसके फ़िल्म सिटी ने नेशनल पार्क को ज़मीन लौटाने से इनकार कर दिया। ‘वनशक्ति’ के डायरेक्टर स्टालिन का कहना है कि संजय गाँधी नेशनल पार्क की ज़मीन के बड़े हिस्से को धोखाधड़ी के माध्यम से फ़िल्म सिटी को बेच डाला गया था। उन्होंने बताया कि इससे वन्य जनजीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। स्टालिन ने इसे लैंड स्कैम करार दिया।

पार्क के अधिकारी मानते हैं कि सर्वे नंबर में गड़बड़ी होने के कारण फ़िल्म सिटी को अतिरिक्त ज़मीन मिल गई। महाराष्ट्र सरकार ने 1969 में मुंबई इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (MIDC) को 215 एकड़ ज़मीन दी थी। 1970 में आए एक सरकारी नोटिफिकेशन ने इसकी पुष्टि की। 
अक्टूबर 9, 2017 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने इस ख़बर पर विस्तृत कवरेज की थी
इसके बाद 1977 में MIDC ने 245 एकड़ ज़मीन फ़िल्म सिटी को ट्रांसफर किया। बाद में फ़ैसला लिया गया कि फ़िल्म सिटी को 245 एकड़ की जगह 194 एकड़ ही ट्रांसफर किया जाएगा। इस तरह से बाकी के बचे 51 एकड़ ज़मीन को वन विभाग को वापस लौटाया जाना था।
ग़लती कहाँ हुई थी। 1970 के सरकारी नोटिफिकेशन में ग़लत सूचना दी गई थी। 1984 में एक दूसरा नोटिफिकेशन आया, जिसमें भूल-सुधार किया गया। दरअसल, 1970 के नोटिफिकेशन में ग़लती यह हुई थी कि 194 एकड़ को 215 एकड़ माप लिया गया था। एक गाँव का क्षेत्रफल ग़लत आँके जाने के कारण ऐसा हुआ। इस तरह से 245 एकड़ में से 194 एकड़ फ़िल्म सिटी को दिया जाना था और बाकी का 51 एकड़ वापस फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को लौटाया जाना था। फ़िल्म सिटी ने ये ज़मीन लौटाने से इनकार कर दिया और इसी कारण पिछले कई दशकों से नेशनल पार्क के साथ उसकी बाउंड्री अंतिम रूप नहीं ले सकी।
अगस्त 2017 में बाढ़ आने के कारण संजय गाँधी नेशनल पार्क के कई अहम दस्तावेज नष्ट हो गए। इस कारण इस मुद्दे को सुलझाने में और देरी हुई। दूसरी ओर, फ़िल्म सिटी के डिप्टी इंजीनियर चंद्रकांत ने कहा कि नेशनल पार्क की किसी भी ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा नहीं किया गया है और कोई भी ज़मीन वापस नहीं लौटाई जाएगी। बॉलीवुड के लोगों ने भी पिछले 35 सालों से (जब नोटिफिकेशन में भूल-सुधार हुआ) इसे लेकर कोई आवाज़ नहीं उठाई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्यों न आरे जंगल बचाने के लिए पर्यावरण की चिंता करने वाले बॉलीवुड सेलेब्स अपने घर से ही शुरुआत करें?

करतारपुर साहिब : भारतीय अधिकारियों का बड़ा खुलासा- इमरान सरकार ने चोरी छिपे हड़प ली गुरूद्वारे की जमीन

Kartarpur corridor भारतीय अधिकारियों ने कहा कि पाकिस्तान ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए गलियारा विकसित करने के नाम पर करतारपुर गुरूद्वारे की जमीन ‘चोरी-छिपे हड़प’ ली और इस परियोजना के लिए भारत के ज्यादातर प्रस्तावों पर आपत्ति की जो उसके ‘‘दोहरे मापदंड’’ का परिचायक है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने भारत में गुरू नामक देव के श्रद्धालुओं की भावनाओं के प्रतिकूल इस पावन सिख स्थल की जमीन पर ‘धड़ल्ले से अतिक्रमण’ किये जाने के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया। यह प्रतिनिधिमंडल पंजाब के गुरदासपुर को पाकिस्तान के करतारपुर सिख धर्मस्थल से जोड़ने के लिए बनने वाले गलियारे के तौर तरीके को अंतिम रूप देने के लिए मार्च 14 को पहली भारत-पाकिस्तान बैठक में हिस्सा ले रहा था।
बैठक में हिस्सा लेने वाले एक सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘पाकिस्तान झूठे वादे और ऊंचे दावे करने एवं जमीनी स्तर पर कुछ नहीं करने की अपनी पुरानी छवि पर खरा उतरा है। करतारपुर साहिब गलियारे पर उसका दोहरा मापदंड मार्च 14 को उसकी पहली बैठक में ही बेनकाब हो गया।’ अधिकारी ने कहा कि जिस जमीन पर अतिक्रमण किया गया है, वह महाराजा रणजीत सिंह और अन्य श्रद्धालुओं ने करतारपुर साहिब को दान में दी थी। 
अधिकारी ने कहा, ‘गुरूद्वारे की जमीन पाकिस्तान सरकार ने गलियारा विकसित करने के नाम पर चोरी-छिपे हड़प ली। भारत में इस मुद्दे पर लोगों की प्रबल भावनाओं को ध्यान में रखकर इन जमीनों को पवित्र गुरूद्वारे को तत्काल लौटाये जाने की कड़ी मांग रखी गयी।’ भारत के यह स्पष्ट करने के बावजूद कि वह 190 करोड़ रूपये खर्च कर सीमा पर स्थायी और समग्र सुविधाओं का निर्माण कर रहा है, पाकिस्तान करतारपुर समझौते की अवधि को बस दो साल तक के लिए सीमित करना चाहता है।
भारत ने भारतीय तीर्थयात्रियों और गुरू नानक देव के श्रद्धालुओं की करतारपुर साहिब के आसान एवं निर्विघ्न तीर्थाटन की पुरानी आकांक्षा को पूरा करने के लिए गंभीर प्रयास किये हैं जबकि पाकिस्तान ने उसके प्रस्तावों पर ठंडा पानी डाल दिया है। अधिकारी ने कहा, ‘पाकिस्तान सरकार और मीडिया द्वारा खड़ा किये गये हौआ के बीच वार्ता के दौरान उसकी वास्तविक पेशकश हास्यास्पद और रस्मी साबित हुई। प्रधानमंत्री इमरान खान और पाकिस्तान ने जो कुछ कहा है और अटारी की बैठक में पाकिस्तानी पक्ष ने जो कुछ पेशकश की, उसके बीच जमीन आसमान का अंतर है। स्पष्टत: पाकिस्तान की भारतीय तीर्थयात्रियों को करतारपुर साहिब की आसान यात्रा उपलब्ध कराने में रूचि नहीं है।’
अधिकारी ने कहा कि जहां भारत रोजाना 5000 तीर्थयात्रियों और वैशाखी जैसे विशेष मौकों पर 15000 तीर्थयात्रियों को ध्यान में रखकर अत्याधुनिक यात्री टर्मिनल बिल्डिंग बना रहा है, वहीं पाकिस्तान ने तीर्थयात्रियों की संख्या रोजाना 700 सीमित कर दी है। पाकिस्तान उसके द्वारा निर्धारित यात्रा दिवसों और वह भी उनके पैदल नहीं, बल्कि वाहनों से जाने पर जोर दे रहा है। पहले तो उसने करतारपुर साहिब के लिए वीजामुक्त तीर्थयात्रा का आश्वासन दिया था लेकिन अब उसने शुल्क लेकर तीर्थयात्रियों को विशेष परमिट देने की शर्त रख दी है। इस तरह कई अन्य शर्तें भी उसने रखी है।
करतारपुर में ही सिख धर्म के संस्थापक गुरू नानक देव ने अपने जीवन के आखिरी साल गुजारे थे। यह पाकिस्तान के नारोवाल जिले में है। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू और पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने गुरदासपुर में इस गलियारे की आधारशिला रखी थी। दो दिन बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने नारोवाल में इस गलियारे की आधारशिला रखी थी।