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कर्नाटक चुनाव: क्या बहुमत में आने के बावजूद कांग्रेस टूटेगी?


रिकॉर्ड मतदान (73.19%)। जहरीला साँप से लेकर बजरंग बली की जय वाला चुनाव प्रचार। 10 एग्जिट पोल में से 4 में कांग्रेस को बहुमत। 1 में बीजेपी की सरकार। 4 में त्रिशंकु विधानसभा। 2018 के चुनाव में सबसे सटीक आकलन करने वाले का बीजेपी को बढ़त देना। सबके अपने-अपने जीत के दावे। किंगमेकर बनने की आस लिए बैठी एक पारिवारिक पार्टी (JDS)। जी, मैं बात कर रहा हूँ कर्नाटक विधानसभा चुनावों (Karnataka Assembly election, 2023) की।

आ रहे रुझानों में कांग्रेस बहुमत बनाये हुए है, लेकिन रुझानों में बहुमत मिलते देख, जीतने वाले उम्मीदवारों को बंगलोर पहुँचने के लिए चॉपर और हेलीकाप्टर आदि की व्यवस्था होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री पर भी मंथन शुरू होने के अगले ही पल समाचार डी के शिवकुमार और सिद्धिरामैया के बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनने पर चर्चा होने से बहुमत में आने के बावजूद कांग्रेस में विभाजन होने के स्पष्ट संकेत मिल गए हैं। कर्नाटक में जिस स्थिति में कांग्रेस पहुंची है, इसका श्रेय शिवकुमार की मेहनत को जाता है, किसी अन्य को नहीं। ऐसे में शिवकुमार खेमा किसी और को मुख्यमंत्री बर्दाश्त नहीं करेगा अटकलें जोर पकडे हुए हैं। और इस प्रश्न पर लगभग हर कांग्रेस प्रवक्ता बचता नज़र आ रहा है। वैसे भी चुनावों के दौरान शिवकुमार को यह भी कहते सुना गया था कि वह बीजेपी से हाथ मिला सकते हैं। 

13 मई 2023 की दोपहर होते-होते कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा चुनाव की तस्वीर साफ हो जाएगी। लेकिन तमाम किंतु-परंतु के बीच कोई भी आँकड़ा अब तक उस दावे को पुख्ता नहीं कर रहा है जो कई महीने पहले से ही दिल्ली की मीडिया में तैर रही थी। यह दावा है कर्नाटक में जबर्दस्त सत्ता विरोधी लहर का। बीजेपी सरकार के कथित भ्रष्टाचार से आम लोगों में भारी नाराजगी का। प्रवीण नेट्टारू जैसों की इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा की गई हत्या के बाद से कोर वोटरों में निराशा होने का।

सत्ता विरोधी लहर का मतलब होता है विपक्ष को प्रचंड बहुमत मिलना। लेकिन एग्जिट पोल कांग्रेस के लिए ऐसा कोई अनुमान नहीं लगा रहे। एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे ने भले 10 मई की शाम को कांग्रेस को 140 सीटें मिलने तक का अनुमान लगाया था। लेकिन नतीजों से ठीक पहले इंडिया टुडे के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने एक ट्वीट में कहा है कि 57 सीटें ऐसी हैं जो किसी भी तरफ झुक सकती हैं। इनमें 6 सीटें ऐसी हैं जिस पर बीजेपी की टक्कर कांग्रेस से न होकर जेडीएस से है। 4 सीटें तो ऐसी भी हैं जो निर्दलीय भी झटक सकते हैं। कंवल ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 13 मई के अंतिम नतीजे इन्हीं 57 सीटों से तय होंगी। अमूमन जब सत्ता विरोधी लहर चल रही हो तो इतने बड़े पैमाने पर काँटे की टक्कर नहीं दिखती। विपक्ष को स्पष्ट तौर पर बढ़त दिखती है।

इस तथ्य को समझाने के लिए एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे के एग्जिट पोल का उदाहरण इसलिए दिया गया क्योंकि काॅन्ग्रेस के लिए सबसे बेहतर संभावना इसमें ही दिखाई गई है। दिल्ली की मीडिया में दूसरा बड़ा दावा कर्नाटक में करप्शन के सबसे बड़ा मुद्दा होने का किया जाता है। लेकिन प्रचार के दौरान कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि कांग्रेस चुनाव को इस मुद्दे के इर्द-गिर्द सीमित करने में सफल रही है। उलटे जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता गया कांग्रेस बैकफुट पर जाती दिखी। पहले उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विषधर साँप कहने पर सफाई देनी पड़ी। फिर बजरंग दल की तुलना पीएफआई से कर वह ऐसे फँसी कि उसे हर जिले में बजरंग बली का मंदिर बनाने का वादा करना पड़ा। पिछले कई चुनावों के नतीजों पर यदि गौर करेंगे तो उससे यह भी पता चलता है कि भ्रष्टाचार के आरोपों और साॅफ्ट हिंदुत्व से बीजेपी को पराजित करने में कांग्रेस को कहीं भी सफलता नहीं मिली है।

तीसरा दावा दिल्ली की मीडिया में प्रवीण नेट्टारू जैसों की हत्या से बीजेपी के कोर वोटरों में निराशा को लेकर किया जाता है। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ही हमने नेट्टारू के परिजनों के लिए बने घर की तस्वीरें भी देखी हैं। हमने उनके परिजनों के वह बयान भी सुने हैं, जिनमें उन्होंने कहा है कि मुश्किल वक्त में बीजेपी ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा। कभी उनको अकेला महसूस नहीं होने दिया। ऐसे में यह समझ पाना मुश्किल है जिस नेतृत्व से पीड़ित परिवार ही निराश नहीं है, उनके साथ हुई घटना से कोर वोटरों के निराश होने की थ्योरी कहाँ से निकली होगी? या फिर किसी प्रोपेगेंडा के तहत दिल्ली की मीडिया में इसे प्लांट किया गया था?

जाहिर है कि बीजेपी रेस से बाहर नहीं है। न ही कर्नाटक में वह बेहद बुरा प्रदर्शन करने जा रही है। जब उसे इस राज्य में सबसे मजबूत स्थिति में माना गया था, तब भी वह साधारण बहुमत ही हासिल कर पाई थी। ऐसे में कर्नाटक से जुड़े कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी हो जाता है। 1978 तक इस राज्य में हर विधानसभा चुनाव में काॅन्ग्रेस को जीत मिली। लेकिन, 1985 के बाद किसी भी चुनाव में सत्ताधारी दल को जीत नहीं मिली। पिछले नौ चुनावों के ट्रेंड यह भी बताते हैं कि बीजेपी यदि सत्ता में रही है तो उसका वोट प्रतिशत सुधरा है। इसके ठीक उलट कांग्रेस यदि सत्ता में रही है तो उसको औसतन चार फीसदी वोटों का नुकसान झेलना पड़ा है।

अगर इन तथ्यों को ही सच मान लें तो तीन बातें तय दिखती हैं। पहला, 38 साल का ट्रेंड बताता है कि बीजेपी सत्ता में वापसी लायक सीटें हासिल नहीं कर पाएगी। अधिकतर एग्जिट पोल इसका अनुमान लगा रहे हैं। दूसरा, कांग्रेस विपक्ष में है, इसलिए उसे वोटों का नुकसान नहीं होगा। तीसरा, बीजेपी सत्ता में है तो उसके वोट बढ़ेगे। क्या 2018 के चुनावों के मुकाबले मतदान में जो एक फीसद की वृद्धि हुई है, वह बीजेपी का बढ़ा वोट है? यदि ऐसा है तो यह किसी भी पोल में नहीं दिखा है और न ही किसी पोल पंडित ने ऐसा पाया है। कर्नाटक के पिछले कुछ चुनावों के तथ्य और ट्रेंड को इस बार भी अंतिम सत्य (बीजेपी की हार) मान लें तो भी यह कहीं से नहीं दिखता कि कोई सत्ता विरोधी लहर चल रही थी। करप्शन बड़ा मुद्दा था। कोर वोटर निराश थे।

ऐसा भी नहीं है कि जिस कर्नाटक को बीजेपी के लिए ‘दक्षिण का द्वार’ कहते हैं, उसकी कठिन डगर का एहसास पार्टी को नहीं था। जनवरी 2023 के मध्य में मुझे बीजेपी के दिल्ली मुख्यालय में इसका पहली बार एहसास हुआ। बंद कमरे में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कुछ लोगों से बातचीत कर रहे थे। इस दौरान 2023 में होने वाले राज्यों के चुनाव पर बातचीत के दौरान उन्होंने माना कि कर्नाटक की सत्ता में वापसी आसान नहीं है।

संभवतः यही कारण है कि बीजेपी ने टिकट बँटवारे के दौरान सख्त फैसले लिए। बड़े पैमाने पर नए चेहरों को मौका दिया। पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार जैसे नेताओं की नाराजगी की चिंता नहीं की। कई हेविवेट के टिकट काट दिए। राज्य के अपने सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा को मोर्चे पर लगाया। एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे का एग्जिट पोल भी कहता है कि येदियुरप्पा जिस लिंगायत समुदाय से आते हैं उसका 64 फीसदी वोट बीजेपी को गया है। यानी लिंगायत समुदाय से आने वाले जगदीश शेट्टार भले बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में चले गए हैं, पर इस समुदाय का आम वोटर बीजेपी के ही साथ है।

यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि कर्नाटक में बीजेपी के उभरने की सबसे बड़ी वजह लिंगायतों का समर्थन ही माना जाता है। हाल के समय में कर्नाटक में बीजेपी ने सबसे बुरा प्रदर्शन 2013 में तब किया जब येदियुरप्पा उससे अलग हो गए थे। जन की बात के फाउंडर प्रदीप भंडारी ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि लिंगायत के बीच बीजेपी का आधार पहले की तरह ही बना हुआ है। गौरतलब है कि 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों का सबसे सटीक आकलन जन की बात ने ही किया था। इस बार अपने एग्जिट पोल में उसने बीजेपी के सबसे बड़ी पार्टी होने का अनुमान लगाया है।

प्रदीप भंडारी ने इस चुनाव के दौरान भी करीब-करीब पूरे कर्नाटक की यात्रा की है। उन्होंने करीब 50 दिन इस राज्य में बिताए हैं। उनका कहना है, “बुरी से बुरी स्थिति में बीजेपी को 90 सीटें मिलनी चाहिए। यदि मैं क्लोज मार्जिन की सभी सीटों पर कांग्रेस की जीत मान लूँ तब भी वह बहुमत हासिल नहीं करने जा रही है। मेरा स्पष्ट मानना है कि नतीजों से त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर उभरेंगी।”

ऑपइंडिया से बातचीत में ऐसे ही नतीजों का दावा कर्नाटक में 20 दिन बिताकर लौटे यूट्यूबर पत्रकार अभिषेक तिवारी भी करते हैं। उन्होंने बताया, “मुझे कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखी। बीजेपी का वोट शेयर 36 फीसदी से कम होने की भी कोई संभावना नहीं दिखती। मुझे लगता है कि सरकार किसकी बनेगी, यह जेडीएस और निर्दलीय तय करेंगे।”

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पोल पंडित 2020 के बिहार और 2018 के राजस्थान चुनावों की तरह ही कर्नाटक चुनाव की नब्ज पकड़ने में असफल रहे हैं? ध्यान रहे कि इन दोनों चुनावों में भी सत्ता विरोधी लहर चलने का शोर वैसा ही था, जैसा अभी कर्नाटक को लेकर है। लेकिन जब अंतिम नतीजे आए तो बिहार में सत्ताधारी गठबंधन ही आगे रहा। राजस्थान में कांग्रेस साधारण बहुमत ही हासिल कर पाई। प्रदीप भंडारी का भी मानना है कि सीटों का अनुमान लगाने में ज्यादातर लोग बिहार जैसी ही गलती कर रहे हैं।

वैसे यह रात पोल पंडितों के साथ काॅन्ग्रेस के लिए भी भारी है। आखिर उनके ‘युवराज’ ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कर्नाटक में 27 दिन जो बिताए थे। इस राज्य के 7 जिलों से जो गुजरे थे।

एग्जिट पोल्स : त्रिपुरा और नागालैंड में सत्ता बचा लेगी भाजपा, मेघालय में कड़ी टक्कर

मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा में चुनाव संपन्न हो चुके हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि किस राज्य में किस पार्टी को कितनी सीटें मिलती हुई दिख रही हैं। ऐसे में बात करते हैं ‘जन की बात’ एग्जिट पोल्स की, जिसमें हर राज्य में सीटों को लेकर सर्वे किया गया है। इस सर्वे की मानें तो मेघालय में भाजपा पिछड़ती हुई दिख रही है। राज्य में उसे मात्र 3-7 सीटें मिलती हुई दिख रही हैं, वहीं तृणमूल कांग्रेस 9-14 सीटें जीत कर बड़ी ताकत बन कर उभर सकती है। लेकिन कांग्रेस इन राज्यों में भी सत्ता के निकट तक नहीं दिख रही। राहुल गाँधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' का भी गुजरात की तरह इन चुनावों पर कोई असर नहीं दिखा। 

वहीं मेघालय में भी UDP को 10-14 सीटें मिलती हुई दिख रही हैं। प्रदीप भंडारी की ‘जन की बात’ एग्जिट पोल के अनुसार, मेघालय में NPP 11-16 सीटें जीत कर सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरने वाली है। वहीं त्रिपुरा चुनाव की बात करें तो वहाँ भाजपा 29-40 सीटें जीत कर अपनी सत्ता बचाती हुई दिख रही है। वामपंथी दल यहाँ 9-16 पर सिमट जाएँगे। नई पार्टी TIPRA भी 10-14 सीटें जीत कर एक बड़ी ताकत के रूप में उभरेगी।

अब आते हैं नागालैंड विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल पर। यहाँ भी भाजपा अपनी सत्ता बचाती हुई दिख रही है। भाजपा को 35-45 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। वहीं NPF मात्र 1-16 सीटों पर सिमट जाएगी। यहाँ अन्य दलों को भी 9-16 सीटें मिलने का अनुमान है। ‘टाइम्स’ के एग्जिट पोल की मानें तो नागालैंड में भाजपा को 39-45, ‘Zee News’ के हिसाब से 35-45 और ‘इंडिया टुडे’ की मानें तो 38-48 सीटें मिल सकती हैं।

अन्य एग्जिट पोल्स की बात करें तो मेघालय में ‘टाइम्स’ ने भाजपा को 3-6 सीटें, ‘Zee News’ ने 6-11 सीटें और ‘इंडिया टुडे’ ने 4-8 सीटें दी हैं। ‘टाइम्स नाउ’ ने नागालैंड में राजग को 44 सीटें आने का अनुमान लगाया है। ‘एक्सिस माय इंडिया’ ने राज्य में भाजपा को 43 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। त्रिपुरा में ‘Zee News’ ने भाजपा को 29-36 सीटें दी हैं। इस तरह भाजपा उत्तर-पूर्व के दो राज्यों में अपनी सत्ता बचाती हुई दिख रही है, जबकि एक में कड़ी टक्कर है।

‘पीके’ के मीडिया मैनेजमेंट से उपजे दिल्ली के Exit Polls?

प्रशांत किशोर, अरविन्द केजरीवाल
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
अब से कुछ ही पलों बाद दिल्ली विधानसभा चुनावों के परिणाम सार्वजानिक होने वाले हैं, लेकिन अपने पैसे को हलाल करने लोग क्या-क्या खेल खेलते हैं, वह चुनावों में ही मिलता है। 
दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के चुनाव प्रचार का सारा दारोमदार उन्हीं की कम्पनी पर था। उन्होंने ख़ुद व्यक्तिगत रूप से परदे के पीछे से कमान संभाल रखी थी। मोदी की लोकप्रियता के कारण चुनावी गणितज्ञ का तमगा पाने वाले किशोर ने मोदी को धोखा देकर 2015 में नीतीश-लालू गठबंधन का साथ दिया था। हालिया दिल्ली चुनाव में उनके द्वारा मीडिया को मैनेज करने की ख़बर आई। प्रेस क्लब में हुई बैठक में एक-एक पत्रकार को समझाया गया कि माहौल कैसे बनाना है।
मीडिया संस्थान ‘टीवी 9 भारतवर्ष’ के संपादक ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने प्रशांत किशोर की कोर टीम के ही एक सदस्य से बातचीत की। बातचीत के दौरान पता चला कि इस बार के एग्जिट पोल्स भीषण तरीके से ग़लत होने वाले हैं। ऐसा ख़ुद दिल्ली चुनाव की कमान संभाल रहे प्रशांत किशोर की कोर टीम के सदस्य ने कहा। हालाँकि, पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने उक्त व्यक्ति का नाम जाहिर करने से इनकार कर दिया। लेकिन, इससे कई सवाल उभर कर आते हैं? क्या प्रशांत किशोर ने जनता के बीच मेहनत करने से ज्यादा मीडिया में हाइप बनाने में सारा जोर लगाया?
2014 में माहौल ही ऐसा था और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता ही इतनी थी कि उन्हें सत्ता मिली। ज्ञात हो कि केंद्र में होने वाले चुनावों में उनकी लोकप्रियता बढ़ी ही है, घटी नहीं है। इसके बाद प्रशांत किशोर बिहार पहुँचे। मीडिया ने ऐसा प्रचारित किया कि वो राजनीति के ‘चाणक्य’ हो गए हैं और उनसे बड़ा चुनावी रणनीतिकार कोई है ही नहीं। बिहार में लालू-नीतीश की जीत ने मीडिया को इस नैरेटिव को हवा देने में और मदद की। बिहार का समीकरण सीधा है। अगर दो प्रमुख दल मिल जाएँ तो वहाँ सरकार बनने में दिक्कत नहीं आती। राज्य के दो सबसे बड़े जनाधार वाली पार्टियाँ मिल गईं और क्रेडिट प्रशांत ने लूटा।

पंजाब में उन्होंने कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार किया। बादल परिवार के ख़िलाफ़ माहौल और अकाली-भाजपा सरकार की एंटी-इंकम्बेंसी का उन्होंने ख़ूब फायदा उठाया। कांग्रेस की जीत की सम्भावना पहले से ही जताई जा रही थी लेकिन प्रशांत किशोर ने फिर लहरिया लूटने की कोशिश की। मीडिया ने फिर उनका साथ दिया। आंध्र प्रदेश में किसे नहीं पता था कि जगनमोहन रेड्डी की सरकार आने वाली है? उनकी बड़ी जीत हुई और प्रशांत किशोर फिर से ख़ुद को बड़ा ‘रणनीतिकार’ साबित करने में जुट गए। श्रेय लेने के लिए वो हर उस जगह गए, जहाँ माहौल अनुरूप था।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार हाल ही में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत की भविष्यवाणी लगभग ...

प्रशांत किशोर ने क्या आम आदमी पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए अपने हिसाब से एग्जिट पोल्स तैयार किए? क्या मीडिया ने वही किया जो ‘सेटिंग-गेटिंग’ के तहत उन्हें पाठ पढ़ाया गया? जिस तरह से केजरीवाल मीडिया में रह-रह कर मोदी के मुकाबले खड़े किए जाते हैं, उनके प्रति मीडिया के एक बड़े वर्ग की वफादारी छिपी नहीं है। ऐसे में, सवाल तो पूछे जाएँगे। ‘टीवी 9 भारतवर्ष’ के सम्पादक ने जो खुलासा किया है, उसे आधार बना कर ऐसे कई सवाल पूछे जा सकते हैं।

क्या दिल्ली Exit Polls में बड़ी गड़बड़ी?

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आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार 
आम आदमी पार्टी के गठन होने से अब तक के चुनावों में एक बात जरूर सामने आती है कि दिल्ली और पंजाब को छोड़, भारत के किसी राज्य ने इस पार्टी को महत्व नहीं दिया। सभी चुनावों में अधिकांश की जमानत जब्त होने के अलावा कई जगह NOTA से कम वोट मिले। हर राज्य के मतदाताओं ने फ्री में रेवड़ियों बाँटने की पॉलिसी को पूर्णरूप से नकारते आ रहे हैं। दिल्ली और पंजाब के अतिरिक्त अन्य राज्य अरविन्द केजरीवाल की अराजक निति को अच्छी तरह जानते और समझते हुए केजरीवाल पार्टी को सत्ता से दूर ही रखना उचित समझते हैं। 
दूसरे, जब लोकसभा में गठबन्धन की बात चल रही थी, जब भी किसी पार्टी ने केजरीवाल को ज्यादा महत्व नहीं दिया। एक बात और, जो मतदाता यह कहे कि 'मैंने कांग्रेस नहीं, आप को वोट दिया', वह  भ्रमित होने का प्रमाण दे रहा है। क्योकि कांग्रेस और आप सिक्के के एक ही पहलू हैं। 
कांग्रेस ने की केजरीवाल की प्रशंसा 
दिल्ली में विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस पहले ही हार मान गई है। कांग्रेस के बड़े नेता अब आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल की तारीफों के पुल बाँधने लगे हैं। कांग्रेस दिल्ली में हुए चुनावी मुकाबले में कहीं भी नहीं दिख रही है, इसीलिए पार्टी ने अब भाजपा विरोध के नाम पर उसी AAP का समर्थन शुरू कर दिया है, जिसके ख़िलाफ़ उसने चुनाव लड़ा था। ऐसा बयान कोई और नहीं बल्कि लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ही दे रहे हैं। अधीर रंजन के इस बयान से चर्चा शुरू हो गई है कि क्या जानबूझ कर कांग्रेस ने पूरी ताक़त लगा कर चुनाव नहीं लड़ा?
अधीर रंजन चौधरी ने कहा है कि इस चुनाव में जहाँ भाजपा ने सांप्रदायिक अजेंडे को आगे बढ़ाया, वहीं अरविन्द केजरीवाल विकास के मुद्दे को लेकर जनता के बीच गए। उन्होंने कहा कि अरविन्द केजरीवाल की जीत का अर्थ होगा विकास के मुद्दे की जीत होना। तो क्या कांग्रेस पार्टी ने मान लिया है कि दिल्ली में उसका अस्तित्व खत्म है और राहुल गाँधी व प्रियंका गाँधी भी पार्टी को बचाने में कामयाब नहीं हुए? जो पार्टी 2013 तक लगातार 15 वर्षों में सत्ता में रही थी, अब वो अस्तित्व बचाने के लिए भी जूझ रही है।

खैर, लगभग सारे एग्जिट पोल्स में आम आदमी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता दिखाया जा रहा है। हालाँकि, उसकी सीटें पिछली बार से कम ज़रूर होंगी लेकिन एग्जिट पोल्स की मानें तो मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल एक बार फिर से प्रचंड बहुमत के साथ वापसी कर रहे हैं। हालाँकि, भाजपा नेताओं मनोज तिवारी और प्रकाश जावड़ेकर ने दावा किया है कि एग्जिट पोल्स और अंतिम नतीजों के बीच बड़ा अंतर होगा। आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं ने ईवीएम गड़बड़ी का राग अलापना शुरू कर दिया है, जिससे पता चलता है कि सत्ताधारी पार्टी भी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं है।
एग्जिट पोल्स के डेटा में सबसे बड़ी गड़बड़ी ये हुई कि दोपहर 3 बजे के बाद वोटिंग प्रतिशत काफ़ी तेज़ी से बढ़ा। जहाँ दोपहर तक ये लग रहा था कि दिल्ली में मतदाता सुस्त होकर बैठे हुए हैं और वो घरों से नहीं निकल रहे हैं, रात तक के आँकड़े उतने ख़राब भी नहीं हुए जितनी आशंका जताई जा रही है। दोपहर 3 बजे तक मात्र 30% वोटर टर्नआउट था। चुनाव आयोग ने 2:50 में जो आँकड़े ट्वीट किए, उसके हिसाब से उस समय तक महज 29.5% मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था।
आज के दौर में हम देखते हैं, टीवी न्यूज़ चैनलों के बीच किसी भी ख़बर को पहले दिखाने के लिए बड़ी प्रतिस्पर्द्धा चलती है और इसके लिए वो हर तरह के हथकंडे अपनाते हैं। लाजिमी है, पहले एग्जिट पोल्स के डेटा दिखाने के लिए भी उनमें होड़ मची होगी। न्यूज़ चैनलों और सर्वे एजेंसियों ने 3-4 बजे तक डेटा कलेक्शन का काम पूरा कर लिया होगा, जिसके बाद उस आधार पर टीवी प्रोग्राम्स की रूपरेखा तय की गई होगी। पूरी प्रक्रिया में समय लगना लाजिमी है क्योंकि आजकल न्यूज़ चैनलों में कुछेक बहस के अलावा बाकि कुछ भी पूर्णरूपेण लाइव नहीं होता।
स्क्रिप्टेड शो के जमाने में टीवी न्यूज़ चैनलों में लगी होड़ के बीच उन्होंने गड़बड़ी कहाँ की, आइए देखते हैं। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध फाइनल आँकड़ों के अनुसार, दिल्ली विधानसभा चुनाव में 61.75% वोटिंग हुई है। अगर हम मानते हैं कि लगभग 3 बजे तक के डेटा को न्यूज़ चैनलों ने ध्यान में रखा होगा तो इसका अर्थ ये है कि 32.25% मतदाताओं के एक बड़े समूह में से किसी की राय जाने बिना ही एग्जिट पोल्स जारी कर दिए गए। यानी, लगभग एक तिहाई मतदाताओं को एग्जिट पोल्स में नज़रअंदाज़ कर दिया गया।


3 बजे के बाद वोटिंग प्रतिशत में तेज़ी से इजाफा हुआ और अगले 1 घंटों में ही आँकड़ा 40.51% पहुँच गया। यानी, 1 घंटे में लगभग 12% मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। जब आँकड़े इतनी तेज़ी से बढ़ रहे थे, तब न्यूज़ चैनलों ने एग्जिट पोल्स की तैयारी शुरू कर दी थी।
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आर.बी.एल.निगम,वरिष्ठ पत्रकार ऐसे वक्त में जब दिल्ली की जनता ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है, एग्जिट पोल्स आप क....

अगर मीडिया ने 4 बजे तक का डेटा लिया होगा, फिर भी 21.24% मतदाताओं में से किसी की राय नहीं जानी गई। यानी, लगभग एक चौथाई मतदाता फिर से एग्जिट पोल्स के दायरे में नहीं आए। कहते हैं, साइलेंट और प्रलोभन वाले वोटर्स दोपहर के बाद ही निकलते हैं। वास्तव में चुनाव का गणित यही वोटर बदलता है। वैसे तो प्रलोभन चुनाव प्रचार समाप्त होते ही शुरू हो जाता है। और इससे कोई पार्टी अछूती नहीं। ये वोटर अगर भाजपा के हुए तो? क्या एग्जिट पोल्स के परिणाम एकदम से नहीं पलट जाएँगे?

Exit Polls के नतीजों से पाकिस्तान में बढ़ी टेंशन!

Pak Media on Exit Poll
एग्जिट पोल्स के नतीजे घोषित होने के बाद अब सबकी निगाह 23 मई को घोषित होने वाले नतीजों पर टिकी है। देश ही नहीं विदेशों की निगाह भी दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के नतीजों पर टिकी है, खासकर कि पाकिस्तान की। जब से एग्जिट पोल्स के नतीजे आए हैं पाकिस्तानी मीडिया में भी हिंदुस्तान की खबरें छाई हुईं हैं। तमाम चैनल अपनी डिबेट्स में इन एग्जिट पोल्स को लेकर चर्चा कर रहे हैं।
तमाम पाकिस्तानी चैनल एग्जिट पोल्स में मोदी सरकार के दुबारा आने को लेकर अपनी-अपनी राय बता रहे हैं। भारत की विपक्षी दलों की तरह पाकिस्तान के टीवी चैनल्स भी बता रहे हैं कि ये एग्जिट पोल्स गलत साबित हो सकते हैं। एक टीवी चैनल तो सीधे-सीधे कह रहा है कि मोदी के सत्ता में आने से पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाही और तेज हो सकती है। भारत में विरोधियों को भी हकीकत में यही चिन्ता खाए जा रही है, इसीलिए ईवीएम पर निशाना साध रहे हैं। पाकिस्तान मीडिया खुद मान रहा है कि वो ब्रेसब्री से भारतीय चुनावों के नतीजों की घोषणा का इंतजार कर रहा है।
एक एक्सपर्ट ने माना कि यदि मोदी जीतते हैं तो पाकिस्तान को लेकर उनके नजरिये में कोई खास बदलाव नहीं आने वाला है। वहीं एक अन्य चैनल के एक्सपर्ट मानते हैं कि मोदी का फिर से पीएम बनने का मतलब है पाकिस्तान के लिए फिर से टफ टाइम शुरु होने वाला है। कई एक्सपर्ट मानते हैं कि मोदी जब मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद अपना पहला भाषण देंगे तो तब साफ होगा कि उनकी पाकिस्तान को लेकर क्या नीति है।
दरअसल पाकिस्तानी मीडिया भी मानता है कि पीएम मोदी ने पाकिस्तान को विश्व में अलग-थलग करने में बड़ी भूमिका निभाई है। खुद कई वरिष्ठ पत्रकार मानते हैं कि मोदी का इंडियन पॉलिटिक्स में तगड़ा होल्ड है जबकि राहुल गांधी एक कमजोर लीडर साबित हुए हैं। यही कारण है कि एग्जिट पोल के नतीजे घोषित होने के बाद पाकिस्तान में इंटरनेट पर सबसे ज्यादा 88 फीसदी नरेंद्र मोदी को सर्च किया जबकि 12 फीसदी लोगों ने राहुल गांधी को सर्च किया।
सोशल मीडिया में पाकिस्तानी लोग भी कह रहे हैं कि पीएम मोदीकी सत्ता में वापसी नहीं होनी चाहिए क्योंकि उन्होंने बालाकोट में एयर स्ट्राइक करने के अलावा सर्जिकल स्ट्राइक कराई। पाकिस्तानी लोग कहते हैं कि मोदी की सत्ता में वापसी पाकिस्तान के लिए हितकारी नहीं हैं। 
सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान जनमानस इस बात को भी स्वीकार कर रहा है कि सरकार और फौज आतंकवादियों के सरगनाओं को संरक्षण देना पाकिस्तान के लिए मुसीबत पैदा कर रहे हैं। क्योकि सरकार केवल नाम की हैं, वास्तव में सरकार का संचालन फौज द्वारा ही किया जाता है और किसी सरकार में फौज के खिलाफ जाने का साहस नहीं।  मोदी सरकार के पुनः वापसी होने पर पाकिस्तान सरकार और फौज को भारत के विरुद्ध अपनी सोंच में बदलाव लाना होगा। ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो से लेकर बेनज़ीर भुट्टो तक भारत से 1000 साल तक लड़ने की सोंच रखते रहे, परन्तु पाकिस्तान के विकास की तरफ सभी की सोंच एकदम विपरीत रही।