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हिंदुओं को बताया ‘भेड़ों की नस्ल’ : भगवान श्रीराम से लेकर गोधरा तक का मजाक उड़ाने वाले मुनव्वर फारूकी ने

मुनव्वर फारूकी के ख़िलाफ़ शिकायत हुई दर्ज
 शिव रावत ने दर्ज कराई  मुनव्वर फारूकी के ख़िलाफ़ शिकायत
स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम हिंदू देवी देवताओं पर अभद्र टिप्पणियाँ करने वाले मुनव्वर फारूकी के ख़िलाफ़ एक बार फिर एफआईआर करवाने की तैयारी है। हालाँकि, अभी ये एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। लेकिन उसके ख़िलाफ़ शिकायत दायर करवा दी गई है।
दिल्ली के किशनगढ़ थाने में शिवम राउत नाम के युवक ने फारूकी के खिलाफ़ ये शिकायत दर्ज करवाई है। अपनी शिकायत में उन्होंने मुनव्वर फारूकी समेत मुंबई स्थित ‘द हैबीटेट- कॉमेडी एंड म्यूजिक कैफे’ पर भी एफआईआर दर्ज करने की अपील की है।
उनका कहना है कि कुछ समय पहले जब फारूकी की वीडियोज वायरल होना शुरू हुईं थी, तब कई एक्टिविस्टों ने इस मामले को उठाया था। चारों ओर से आलोचना और निंदा को देखते हुए उस वीडियो से विवादित पार्ट को हटा दिया गया और यूट्यूब पर वीडियो मौजूद रही।
कई शिकायतों के बाद भी जब फारूकी पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो उसकी हिम्मत और बढ़ गई। नतीजतन ये दोबारा यूट्यूब पर आया और इस बार एक नए अंदाज में उन लोगों का मजाक बनाया जो उसके ख़िलाफ़ थे। उसने इस वीडियो में उन लोगों (मुख्यत: हिंदुओं) को ‘भेड़ों की नस्ल’ बताया। साथ ही कहा कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आगे वो आगे नेटफ्लिक्स पर भी आएगा। लोगों ने उसके ख़िलाफ़ शिकायत करके बस उसे फेमस किया है।
शिवम मानते हैं कि फारूकी को अब ये लगने लगा है कि वो कुछ भी बोलेगा लेकिन उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होगी।

शिवम बेंगलुरु में हुई हिंसा की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “हम ऐसी हरकतों का विरोध उस तरह नहीं करेंगे जैसे पिछले दिनों हमने देखा, जहाँ पुलिस थानों को जलाया गया, शहर पर हमला किया गया, सार्वजनिक संपत्तियों को आग लगाकर शहर को दाव पर लगा दिया गया। लेकिन, हम ये जानते हैं कि इन लोगों को कैसे सबक सिखाया जाएगा। हमारे पास न्यायव्यवस्था है, कानून है और हम उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसीलिए मैंने मुनव्वर फारूकी और उस हैबीटेट क्लब के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवा दी है।”
शिवम का कहना है कि ये शिकायत दर्ज करवाने में उन्हें कई थानों से लेकर साइबर सेल के चक्कर लगाने पड़े। कोई भी इस संबंध में एफआईआर दर्ज करने को तैयार नहीं था। लेकिन लगातार प्रयासों, दबाव, और 5-7 घंटे के इंतजार के बाद शिकायत को दर्ज कर लिया गया।
कंप्लेन नंबर मिलने के बाद अब वह लगातार कोशिश कर रहे हैं कि मुनव्वर फारूकी को उसके कृत्य के लिए जेल में डाला जाए। वे कहते हैं कि फारूकी ने भगवान के बारे में असंवेदनशील टिप्पणियाँ कीं जो किसी भी रूप में बर्दाश्त योग्य नहीं है। इसके अलावा उन्होंने गोधरा कांड में भी फारूकी की टिप्पणी का जिक्र किया। जहाँ उसने कारसेवकों के मरने का मजाक बनाया था।

वह अकरम हुसैन के केस का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है, अगर हम कदम उठाएँ। अगर हम शिकायत करेंगे तो एक आशा रहती है कि इनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होगी और इन्हें जेल में डाला जाएगा।
यूट्यूब चैनल पेन ऑफ धर्म पर पूरे मामले के बारे बताते हुए शिवम कहते हैं कि अगर हम लोग शिकायत नहीं दर्ज करवाएँगे, तो सोशल मीडिया एक्टिविजम केवल एकतरफा होता है, वो भी एक निश्चित समय के लिए। हमें लगता है कि जंग जीत ली गई। लेकिन सच ये होता है कि सोशल मीडिया पर शुरू हुई ऐसी जंग एक शुरूआत होती है, अंत नहीं। वहाँ सक्रियता दिखाना जरूरी है। मगर, हकीकत में हमें उससे आगे निकलना होगा। ताकि ऐसे लोगों को पता चल सके कि अगर वह कुछ गलत करेंगे तो उन्हें परेशानी झेलनी पड़ेगी। इसलिए उन्होंने इस फारूखी के अलावा उस जगह पर भी शिकायत करवाई है जहाँ उसने कॉमेडी की।

गोधरा : अयोध्या से ही लौट रहे जलाकर मार डाले गए 27 महिला, 22 पुरुष, 10 बच्चे भी रामभक्त ही थे,

गोधरा कांड, साबरमती एक्सप्रेस
गोधरा : जब दंगाइयों ने साबरमती एक्सप्रेस, कोच एस-6 को आग लगा दी थी 
गोधरा में 27 फरवरी 2002 की सुबह साबरमती एक्सप्रेस के कोच एस-6 को जला दिया गया। इस ट्रेन के कोच में बैठे 59 कारसेवकों की मृत्यु हो गई। ये कारसेवक अयोध्या से विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित पूर्णाहुति महायज्ञ में भाग लेकर वापस लौट रहे थे। 27 फरवरी की सुबह ट्रेन 7:43 बजे गोधरा पहुँची। जैसे ही ट्रेन गोधरा स्टेशन से रवाना होने लगी उसकी चेन खींच दी गई। ट्रेन पर 1000-2000 लोगों की भीड़ ने हमला किया। भीड़ ने पहले पत्थरबाजी की फिर पेट्रोल डालकर उसमें आग लगा दी। इसमें 27 महिलाओं, 22 पुरुषों और 10 बच्चों की जलने से मृत्यु हो गई।
गुजरात सरकार ने इस घटना की जाँच के लिए गुजरात हाईकोर्ट के न्यायाधीश केजी शाह की एक सदस्यीय समिति गठित की। इसका विरोध विपक्ष व मानवाधिकार संगठनों ने किया तो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) जीटी नानावटी की अध्यक्षता में समिति का पुनर्गठन किया और न्यायाधीश केजी शाह को इसका अध्यक्ष बनाया गया। न्यायाधीश केजी शाह की 2008 में मृत्यु हो जाने पर गुजरात उच्च न्यायालय ने उनकी जगह सेवानिवृत्त न्यायाधीश अक्षय कुमार मेहता को अप्रैल 2008 में समिति का सदस्य नियुक्त किया। अत: इस समिति को नानावटी मेहता समिति के नाम से जाना गया। इस समिति ने 6 साल तक तथ्यों और घटनाओं की जाँच करने के बाद 2014 में अपनी रिपोर्ट सौंपी।
रिपोर्ट के अनुसार गोधरा दुर्घटना एक षड्यंत्र था। मुख्य षड्यंत्रकारी गोधरा का मौलवी हुसैन हाजी इब्राहिम उमर और ननूमियाँ थे। इन्होंने सिग्नल फालिया एरिया के मुस्लिमों को भड़काकर इस षड्यंत्र को अंजाम दिया। ट्रेन को जलाने के लिए रज्जाक कुरकुर के गेस्ट हाउस पर 140 लीटर पेट्रोल भी एकत्रित किया गया। रिपोर्ट में पेट्रोल/ ज्वलनशील पदार्थ छिड़कने की सत्यता को प्रमाणित करने के लिए फॉरेंसिक लेबोरेट्री के प्रमाणों का भी उल्लेख किया गया। गुजरात फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्री के अनुसार आग लगने के कारण ज्वलनशील द्रव को कोच के अंदर डाला जाना था और आग लगाना केवल दुर्घटना मात्र नहीं थी।
गोधरा में हिंदू-मुस्लिम आबादी में ज्यादा अंतर नहीं है और गोधरा साम्प्रदायिक हिंसा का लंबे समय से शिकार रहा है। स्वंय न्यायालय ने भी ऐसी 10 घटनाओं का उल्लेख किया जो 1965 से 1992 के मध्य घटी और इसमें हिन्दुओं की दुकानों एवं घरों को जलाया गया।
आरोपियों के वकील का तर्क था कि रेलवे स्टेशन पर मुस्लिम दुकानदारों से कारसेवकों ने दुर्व्यवहार किया जिससे दंगा शुरू हुआ परन्तु न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय का मानना था कि रेलवे स्टेशन के पास स्थित सिग्नल फालिया एरिया के लोगों को यह अफवाह फैलाकर एकत्रित किया गया कि कारसेवक मुस्लिम लड़की का अपहरण कर रहे हैं। पास की मस्जिद से भी लोगों को भड़काने वाले नारे लगाए गए। बाद में एकत्रित हो भीड़ से ट्रेन रोकने के लिए कहा गया। न्यायालय ने माना कि यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था, क्योंकि 5-6 मिनट के अंदर मुस्लिम लोगों को हथियार सहित एकत्रित कर रेलवे स्टेशन और ट्रेन तक लाना बिना पूर्व निर्धारित योजना के संभव नहीं है।
मई 2004 में जब यूपीए सरकार आई तो लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री बने। उन्होंने घटना के पुन: जाँच के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश उमेश चंद्र बनर्जी की अध्यक्षता में एक सदस्यीय समिति नियुक्त की। उमेश चन्द्र बनर्जी समिति ने जनवरी 2005 में अंतरिम रिपोर्ट पेश की। इसमें गोधरा की घटना को और ट्रेन के जलने को केवल एक दुर्घटना माना गया।
बनर्जी कमीशन की रिपोर्ट को गोधरा दुर्घटना में घायल नीलकांत भाटिया ने गुजरात उच्च न्यायालय में चुनौती दी। अक्टूबर 2006 में उच्च न्यायालय ने बनर्जी समिति की रिपोर्ट को खारिज कर दिया और उनकी जाँच को अवैधानिक एवं शून्य घोषित कर दिया। उच्च न्यायालय के अनुसार बनर्जी समिति का यह निष्कर्ष कि ट्रेन में आग दुर्घटनावश लग गई थी और कोई षड्यंत्र नहीं था, प्राप्त आधारभूत प्रमाणों के विपरीत है।
SIT ने 68 लोगों के विरुद्ध चार्जशीट फाइल की। इसमें यह उल्लेख था कि भीड़ ने पुलिस पर भी हमला किया और फायर ब्रिगेड को भी रोकने की कोशिश की। विशेष ट्रॉयल कोर्ट ने 2011 में 31 लोगों को दोषी पाया। 11 लोगों को मौत की सजा दी। यह लोग वो थे जिन्होंने गोधरा में ट्रेन जलाने का षड्यंत्र रचा और कोच में जाकर पेट्रोल छिड़का था। कोर्ट ने अन्य 20 को आजीवन कारावास की सजा दी।
दोषियों ने गुजरात उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने 11 मृत्युदंड पाए अभियुक्तों की सजा मृत्युदंड से बदलकर आजीवन कारावास कर दी। इस प्रकार उच्च न्यायालय ने सभी 31 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा दी। जिन दोषियों को ट्रॉयल कोर्ट ने छोड़ दिया था उनको उच्च न्यायालय ने भी बरी कर दिया।
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न्यूयॉर्क में भूमि पूजन पर उत्सव से भड़का SASI 5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन होना है। इस मौके पर न्यूयॉ....
इस गोधरा कांड के बाद हुए दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी अभियुक्त बनाने की याचिका दायर की गई। परन्तु एसआईटी और उच्च न्यायालय ने मोदी को क्लीनचिट दे दी। इस दंगे की आग से तपकर निकले मोदी आज विश्व में भारत का परचम फहरा रहे हैं। इस दंगे की आग ने उनको और कठोर बना दिया। यही कारण आज दंगाई दंगा तो कर देते हैं, लेकिन बाद में दंगे के परिणाम से बचने के अपने आकाओं की शरण में जाते हैं, जैसा दिल्ली दंगों में दिल्ली सरकार का दंगाइयों को बचाने के लिए षड़यंत्र किये जा रहे हैं। जिस व्यक्ति ने मुख्यमंत्री रहते गोधरा दंगाइयों को नहीं बक्शा, क्या प्रधानमंत्री बनने पर हिन्दुओं के विरुद्ध जानलेवा हमला करने वालों को बख्शेगा क्या?(एजेंसीज इनपुट्स)

नरेंद्र मोदी : कभी अमेरिका ने वीजा देने से किया था मना ; और अब चमक रहे विश्व नेता के रूप में

Narendra Modi
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
5 साल बाद देश में एक बार फिर लोकसभा चुनाव की सरगर्मियाँ दिन-प्रतिदिन तेजी पर हैं। अगले 2 महीने में पता चल जाएगा कि भारतवर्ष को नया प्रधानमंत्री मिलेगा या एक बार फिर नरेंद्र मोदी के हाथ में ही देश का नेतृत्व होगा। लेकिन विरोधियों द्वारा जिस भाषा का इस्तेमाल मोदी के लिए किया जा रहा है, राष्ट्र रक्षा के लिए उठाए जा कदमों के सबूत मांगे जा रहे हैं, मोदी को थाली में सजाकर सत्ता दे रहे हैं। इनके विरुद्ध यह भी विरोधियों द्वारा प्रचार कर जनता को भ्रमित किया जा रहा है कि "मोदी दोबारा आ गया तो देश में कभी चुनाव नहीं होंगें।" या वह दूसरे अर्थों में यह कहने का प्रयास कर रहे हैं कि जिस तरह अब तक जनता को पागल और मूर्ख बनाकर अपनी तिजोरियाँ भरते रहे, वह अवसर हाथ से निकलने को बेक़रार है।  
इस सन्दर्भ में फ्रांस ज्योतिष की भविष्यवाणी भी चरितार्थ होती दिख रही कि "2014 में एक अधेड़ उम्र का सख्त प्रशासक भारत का नेतृत्व करेगा, उसके विरोधी भी बहुत होंगे और चाहने वाले भी और वह 2025 तक राज्य कर, भारत को नयी ऊंचाइयों पर लेकर जाएगा...." 
नरेंद्र मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने। इससे पहले वो 2001 से 2014 तक 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। मोदी को सामने रखकर बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनाव जीता और बहुमत हासिल किया। भारतीय जनता पार्टी को पहली बार इतनी सीटें मिली और 30 साल बाद केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी।
मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे और 1987 में भाजपा से जुड़ गए। एक साल बाद उन्हें गुजरात का महासचिव बनाया गया। उन्होंने पार्टी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1995 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की सफलता में भी मोदी की बड़ी भूमिका रही। 1995 में मोदी को नई दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय संगठन का सचिव बनाया गया और तीन साल बाद उन्हें इसका महासचिव नियुक्त किया गया। वह तीन साल तक उस कार्यालय में रहे। फिर 2001 में एकाएक उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर गुजरात भेज दिया गया।
2002 गुजरात दंगों ने बनाया मील का पत्थर 
इसके बाद मोदी का राजनीतिक करियर गहरे विवाद और उपलब्धियों का मिश्रण बना रहा। 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका पर विशेष रूप से सवाल उठाया गया। इन दंगों को इन्होने राज्य की सीमित पुलिस के सहयोग से नियन्त्रित किया, जबकि केन्द्र एवं किसी भी पड़ोसी राज्य ने अतिरिक्त पुलिस सहायता से मना कर दिया था। इनके विरोधी आज तक उन दंगों को लेकर इन्हे मुस्लिम-विरोधी के नाम से कलंकित करते रहते हैं, परन्तु शान्तिप्रिय जनता के नायक बनकर जो ख्याति अर्जित की उसी ने इन्हे मील का पत्थर बना दिया। इनकी निर्भीकता और साहसिक निर्णयों का इनके कट्टर विरोधी तक लोहा मानते हैं। मेरे अनुमान से गुजरात दंगों के इतिहास के शायद यही एकमात्र ऐसा दंगा था, जो बहुत ही अल्प-समय में समाप्त हो गया था। 
लेकिन विरोधी अपने वोट बैंक के खातिर इन्हें कलंकित करने का कोई अवसर गँवाना नहीं चाहते थे। वार पर वार करते रहे, विरोधियों को नहीं मालूम की उनका हर वार उन्हें एक कठोर और कुशल प्रशासक बना रहा है। इनके विरोधियों ने अमेरिका को इन्हे वीजा न देने के लिए निरन्तर लिखते रहे। 2005 में अमेरिका ने उन्हें इस आधार पर राजनयिक वीजा जारी करने से मना कर दिया, और यूनाइटेड किंगडम ने भी 2002 में उनकी भूमिका की आलोचना की। लेकिन इस बीच वो लोकप्रियता की ऊंचाई चढ़ते रहे और राज्य में एक के बाद एक विधानसभा चुनाव जीतते रहे।
आज विश्व भारत की सुनता है 
जून 2013 में मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के अभियान का नेता चुना गया। कुछ समय बाद पार्टी ने उन्हें पीएम पद का उम्मीदवार भी घोषित कर दिया। 282 सीटों के साथ केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी और पार्टी के साथ-साथ भारतीय राजनीति में भी मोदी की धमक बढ़ती चली गई।
मोदी का नाम आगे रख बीजेपी ने 2014 के बाद कई राज्यों के चुनाव भी जीते। वर्तमान में उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे लोकप्रिय नेता कहा जा सकता है। देश के साथ-साथ विश्व पटल पर भी उनकी छवि एक बड़े राजनेता के रूप में उभरी है। कल तक जो देश भारत की समस्याओं को गम्भीरता से नहीं लेते थे, आज विश्व भारत की बात सुनता ही नहीं अपितु उस समस्या के निवारण के लिए भारत के साथ खड़ा हो रहा है। क्योकि तत्कालीन सरकारें इस्लामिक आतंकवाद को छुपाने के लिए "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" नाम देकर हिन्दू समाज को कलंकित किया जाता रहा, ऐसे वातावरण में कौन भारत की समस्या को सुनेगा। समस्या चाहे आतंकवाद की हो या कोई अन्य, भारत को सहयोग देने में संकोच नहीं करते। 
वोटबैंक पर प्रहार 
यह मोदी का ही देशप्रेम था की विश्व पटल पर आतंकवाद को उछाल विश्व को आतंकवाद पर गंभीरता से लेने को मजबूर कर दिया। अपने वोटबैंक पर प्रहार होता देख, विपक्ष एकजुट होकर 2019 में उनके खिलाफ लोकसभा चुनाव में उतरने जा रहा है। मोदी के विरुद्ध गठबंधन करने वालों न देशहित की चिन्ता है और न जनहित की, विपरीत इसके अपने चरमराते अस्तित्व और बैंड होते काले धन्धों की। इन लोगों ने तुष्टिकरण के पुजारी बन भारतीय इतिहास, भारतीय संस्कृति और हिन्दुओं को कलंकित करते रहे। इन्हे और जयचन्दों को डर है अपनी जन और देश विरोधी हरकतों के उजागर होने का। वहीं भाजपा एक बार फिर उन्हीं के नाम पर चुनाव में उतर रही है और देश की जनता के सामने उनकी मजबूत छवि पेश कर रही है। मोदी की वजह से बीजेपी का विश्वास इतना ऊंचा है कि वो इस बार 2014 से भी बड़ी जीत का दावा कर रही है।