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तेलंगाना : कांग्रेस की हिटलरशाही, आलोचना करने वालों पर आतंकवाद वाला कानून क्यों? संविधान और लोकतंत्र का रोना-रोने वाले राहुल गाँधी चुप क्यों?


इमरजेंसी में जिस तरह प्रेस और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने गला घोंटा था उसका तेलंगाना कांग्रेस सरकार द्वारा जीवंत उदाहरण पेश कर रही है। फिर शोर मचाते हैं मोदी सरकार में लोकतंत्र और संविधान खतरे में हैं। जनता को गुमराह करती है कांग्रेस। हकीकत में  लोकतंत्र और संविधान कांग्रेस राज में ही खतरे में रहे हैं। अपने राज में कांग्रेस ने संविधान में इतने ज्यादा संशोधन कर संविधान की मूलभावना को ही चकनाचूर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट तक चुपचाप बैठे देखती रही।  

कांग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी राष्ट्रीय स्तर पर खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा चैंपियन बताते हैं। वे अक्सर भाजपा सरकार पर ‘आवाज दबाने’ का आरोप लगाते हैं, लेकिन तेलंगाना में उनकी अपनी सरकार का रवैया कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहा है। तेलंगाना की रेवंत रेड्डी सरकार अब सोशल मीडिया पर आलोचना करने वालों के खिलाफ देश के सबसे कड़े कानून ‘यूएपीए’ (UAPA) का इस्तेमाल कर रही है।

X हैंडल पर UAPA लगाने का क्या है पूरा मामला?

दरअसल, तेलंगाना पुलिस के इंटेलिजेंस विभाग के डीआईजी (CI Cell) आर. भास्करन का एक आधिकारिक पत्र सामने आया है। 18 अप्रैल 2026 को जारी इस पत्र में एक्स कॉर्प (X Corp) को संबोधित करते हुए एक ट्विटर हैंडल @TeluguScribe के खिलाफ कार्रवाई की माँग की गई है। इस पत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 94 और गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 43F का हवाला दिया गया है।

पुलिस ने अपने आधिकारिक पत्र में लिखा, “हम आपसे इस विशिष्ट एक्स (X) खाते से संबंधित निम्नलिखित विवरण प्रदान करने का अनुरोध करते हैं: खाता पंजीकरण की जानकारी, उपयोग लॉग और गतिविधि विवरण, तथा कोई भी अन्य प्रासंगिक डेटा जो हमारी जाँच में सहायता कर सके। यह जानकारी मामले की गहन जाँच के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।”

आलोचना पर आतंकवाद वाला कानून क्यों?

हैरानी की बात यह है कि UAPA जैसा सख्त कानून, जो आमतौर पर आतंकवाद और देश विरोधी गंभीर गतिविधियों को रोकने के लिए बनाया गया है, उसे महज कुछ ट्वीट्स के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। पत्र के अनुसार, उक्त हैंडल पर आपत्तिजनक भाषा और कथित तौर पर ‘पब्लिक फिगर’ की छवि खराब करने वाले ट्वीट किए गए थे। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी सरकार या नेता की आलोचना करना अब आतंकवाद की श्रेणी में आता है?

कांग्रेस और मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पर उठते सवाल

मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा इस कार्रवाई से कांग्रेस के दोहरे चरित्र को उजागर करती है। एक तरफ राहुल गाँधी ‘संविधान बचाने’ और ‘बोलने की आजादी’ का नारा देते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी सरकार असहमति की आवाज को कुचलने के लिए UAPA जैसे दमनकारी प्रावधानों का सहारा ले रही है।

इस मामले को देखें तो साफ है कि तेलंगाना में सत्ता मिलते ही कांग्रेस की ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ वाली परिभाषा बदल गई है। क्या रेवंत रेड्डी सरकार इतनी डर गई है कि उसे साधारण ट्वीट्स से राज्य की सुरक्षा को खतरा महसूस होने लगा है? यह सीधे तौर पर लोकतंत्र में विपक्ष और जनता की आवाज को खामोश करने की एक तानाशाही कोशिश नजर आती है।

हिमाचल प्रदेश : जितने टॉयलेट होंगे, उतना देना होगा पैसा: कांग्रेस सरकार वसूलेगी 25 रूपए माह का सीवर टैक्स, कमाई बढ़ाने के लिए गाँवों में पानी की फ्री आपूर्ति बंद-शहरों में रेट बढ़ा

                                         कांग्रेस सरकार ने शौचालय पर भी टैक्स लगा दिया
हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार अब लोगों पर टॉयलेट टैक्स भी लगाएगी। आर्थिक संकट में फंसे राज्य के राजस्व बढ़ाने को राज्य की सुक्खू सरकार ने यह फार्मूला निकाला है। राज्य सरकार शहरी इलाकों में हर घर से अब शौचालय पर टैक्स वसूलने जा रही है। इसकी दरें भी जारी कर दी गई हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के जल शक्ति विभाग ने हाल ही में फैसला लिया है कि अब राज्य के शहरी इलाकों में हर घर से सीवर टैक्स लिया जाएगा। जल शक्ति विभाग घरों में लगी प्रत्येक टॉयलेट सीट पर 25 रूपए माह का टैक्स लगाएगा। यानी एक घर में जितने शौचालय बने होंगे, उनसे उतना अधिक टैक्स वसूला जाएगा।

हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार का कहना है कि इससे उसके राजस्व में वृद्धि होगी। इसके अलावा पानी की दरों में भी कांग्रेस सरकार ने बदलाव किए हैं। उसने ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की मुफ्त आपूर्ति भी बंद कर दी है। अब ग्रामीण इलाकों में पानी लेने वालों को हर 100 रूपए माह देना होगा।

इसके अलावा शहरों में भी पानी की दरों में बदलाव किया गया है। सुक्खू सरकार ने गैर घरेलू पानी कनेक्शन के लिए और भी अधिक पानी की दरें रखी हैं। पानी की दरों के अलावा मेंटेनेंस चार्ज भी लगाया जाएगा। इन सबके जरिए सुक्खू सरकार अपना खजाना भरेगी।

हिमाचल प्रदेश में शौचालय पर टैक्स से पहले भी सुक्खू सरकार कमाई के जरिए बढ़ाने के लिए जनता पर बोझ बढ़ाती रही है। हाल ही में उसने राज्य में वाहनों की बिक्री पर ग्रीन टैक्स लगाया था। यह टैक्स वाहनों की खरीद के साथ लगेगा।

जहाँ एक ओर सरकार लोगों पर टैक्स का बोझ बढ़ाती जा रही है, वहीं दूसरी ओर उनको दिए जाने वाले फायदे भी घटाए जा रहे हैं। हाल ही में हिमाचल प्रदेश में आयकर भरने वालों को दी जाने वाली 125 यूनिट मुफ्त बिजली की योजना सुक्खू सरकार ने बंद कर दी थी। अब उसने उद्योगों को दी जाने वाली 1 रूपए की सब्सिडी भी बंद कर दिया है।

सुक्खू सरकार के अंतर्गत हिमाचल प्रदेश की आर्थिक हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि वह सितम्बर माह में कर्मचारियों को तनख्वाह और पेंशन तक नहीं समय से दे पाया था। सुक्खू सरकार राज्य में कई रेवड़ी योजनाओं का ऐलान करके सत्ता में आई थी। इन पर भी काम नहीं हो पाया है।

आमदनी अठन्नी, खर्चा रूपए की है स्थिति

हिमाचल की बदहाल आर्थिक स्थिति इसके 2024-25 के बजट से समझी जा सकती है। वित्त वर्ष 2024-25 के लिए 58,444 करोड़ रूपए का बजट सुक्खू सरकार ने पेश किया था। इस बजट में भी सरकार का राजकोषीय घाटा (सरकार की आय और खर्चे के बीच का अंतर, जिसे कर्ज लेकर पूरा किया जाता है) 10,784 करोड़ रूपए है।
इस बजट का बड़ा हिस्सा तो केवल पुराने कर्जा चुकाने और राज्य के कर्मचारियों की पेंशन और तनख्वाह देने में ही चला जाएगा। इस बजट में से 5479 करोड़ रूपए का खर्च पुराने कर्ज चुकाने, 6270 करोड़ रूपए का खर्च पुराने कर्ज का ब्याज देने में करेगी। यानी पुराने कर्जों के ही चक्कर बजट का लगभग 20% हिस्सा चला जाएगा।
इसके अलावा सुक्खू सरकार तनख्वाह और पेंशन पर 27,208 करोड़ रूपए खर्च करेगी। इस हिसाब से देखा जाए तो 38,957 रूपए का खर्च तो केवल कर्ज, ब्याज, तनख्वाह और पेंशन पर ही हो आएगा। यह कुल बजट का लगभग 66% है। अगर नए कर्ज को हटा दें तो यह हिमाचल के कुल बजट का 80% तक पहुँच जाता है। यानी राज्य को बाकी खर्चे करने की स्वतंत्रता ही नहीं है।
हिमाचल प्रदेश 2024-25 में लगभग 1200 करोड़ रूपए सब्सिडी पर भी खर्च करने वाला है। यह धनराशि सामान्य तौर पर छोटी लग सकती है, लेकिन आर्थिक संकट में फंसे हिमाचल के लिए यह भी भारी पड़ रही है। इस सब्सिडी में सबसे बड़ा खर्चा बिजली सब्सिडी का है।

2014 चुनाव से पहले जिस सनातन संस्कृति को भारतीय राजनीति मानती रही अछूत, उसे मोदी ने बना दिया कूटनीति

                     वारंगल के भद्रकाली मंदिर की गोशाला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो साभार: pib.gov.in)
मैंने लाल किले से कहा था ये समय गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर, अपनी विरासत पर गर्व करने का है। आज देश विकास और विरासत दोनों को साथ लेकर चल रहा है। एक ओर भारत डिजिटल टेक्नोलॉजी में नए रिकॉर्ड बना रहा है तो साथ ही सदियों बाद काशी में विश्वनाथ धाम का दिव्य स्वरुप भी देश के सामने प्रकट हुआ है। आज हम वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहे हैं तो साथ ही केदारनाथ और महाकाल महालोक जैसे तीर्थों की भव्यता के साक्षी भी बन रहे हैं। सदियों बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर का हमारा सपना पूरा होने जा रहा है…

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध विदेशी फण्ड पर विपक्ष लामबंध होने का प्रयास कर रहा है, वास्तव में मूल मुद्दों से पदभ्रष्ट हो चुके है। जो नेता और पार्टियां हवा का रुख नहीं पहचान सके, क्या वह राज कर सकते हैं? 2014 चुनाव से पहले कुर्सी के भूखे और मुस्लिम तुष्टिकरण के गुलाम अभी तक अपनी उस गुलामी मानसिकता से बाहर ही नहीं निकल पा रहे। उसका कारण है, कल तक इस्लामिक आतंकवाद को संरक्षण देने वाले 'हिन्दू आतंकवाद', 'भगवा आतंकवाद' का नाम देकर हिन्दू संस्कृति को कलंकित कर रहे थे, हिन्दू तीर्थों को विवादित बना रहे थे, अयोध्या में हुई खुदाई में मिले मंदिर के प्रमाणों को कोर्ट से छुपाने वाले आज किस मुंह से सच्चाई को स्वीकार करें। चुनावों में चुनावी हिन्दू बन जनता को मूर्ख बना रहे हैं। और यही भयंकर भूलें अब इन्हे पाताललोक लेकर जा रही है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 जुलाई 2023 को गोरखपुर में गीता प्रेस के शताब्दी वर्ष समापन समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही। भारतीय धर्म ग्रंथों को घर-घर तक पहुँचाने वाले गीता प्रेस लिबरलों को नहीं सुहाता है। कारण आप समझ सकते हैं। लिबरल गैंग का यह दर्द पिछले दिनों तब भी प्रकट हुआ, जब गीता प्रेस को वर्ष 2021 का गाँधी शांति पुरस्कार देने की घोषणा हुई।

दरअसल भारत के प्रधानमंत्री का गीता प्रेस जाना, वहाँ के लीला मंदिर में अर्चना करना, भारतीय राजनीति की वह लकीर है जो 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने खींची है। इससे पहले भारत की राजनीति हिंदू, मंदिर, सनातन संस्कृति, भारतीय विरासत की बात करने वाले को ‘सांप्रदायिक’ और टोपी-चादर वाली इफ्तार पार्टियों में शिरकत करने वालों को ‘सेकुलर’ मानने की अभ्यस्त रही है। लेकिन मोदी सरकार का कार्यकाल विकास और गरीब कल्याण की योजनाओं के साथ-साथ सांस्कृति विरासत को बढ़ावा देने, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने, सांस्कृतिक कूटनीति के जरिए भारतीय विरासत का वैश्विक प्रसार करने, स्वदेशी विचारों को सम्मान और मान्यता देने, चोरी कर विदेश ले गई भारतीय कलाकृतियों को वापस लाने की गाथा का भी कार्यकाल है।

   गीता प्रेस के लीला मंदिर और वारंगल के भद्रकाली मंदिर में पूजा अर्चना करते पीएम मोदी (फोटो साभार: pib.gov.in)

जिस दिन प्रधानमंत्री गीता प्रेस गए, उसी दिन गोरखपुर से उन्होंने दो वंदे भारत एक्सप्रेस को भी हरी झंडी दिखाई। 498 करोड़ रुपए की लागत से गोरखपुर रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास की आधारशिला रखी। कॉन्ग्रेस शासित छत्तीसगढ़ को 7 हजार करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाएँ देकर प्रधानमंत्री गोरखपुर आए थे। गोरखपुर के बाद वे वाराणसी गए और वहाँ ₹12,110 करोड़ की 29 परियोजनाओं का लोकार्पण/शिलान्यास किया। PM आवास योजना (ग्रामीण) के तहत लाभुकों को 4.51 लाख आवास सौंपे। अगले दिन वे तेलंगाना के वारंगल में थे। 6100 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया। माँ भद्रकाली की पूजा की। यह केवल गोरखपुर, वाराणसी या वारंगल की ही बात नहीं है। मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल में विकास और संस्कृति एक साथ देश के हर कोने में इसी तरह गतिमान रही है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री सार्वजनिक मंचों से बार-बार इस बात को दोहराते हैं कि यह समय अपनी विरासत पर गर्व करने का है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद, घर हो या बाहर अपनी सरकार की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने की रणनीति के ध्वजवाहक बने हुए हैं। मोटे तौर पर चार तरीकों से इस कार्य को पूर्ण किया जा रहा है।

  • भारतीय कला का वैश्विक स्तर पर प्रसार
  • चोरी हुई कलाकृतियों की घर वापसी
  • संस्कृति का संरक्षण करने वालों को सम्मान
  • बजटीय आवंटन में लगातार वृद्धि
जून 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी G-7 शिखर सम्मेलन के लिए जर्मनी गए थे। यहाँ उन्होंने भारत के सांस्कृतिक हुनर को कैसे वैश्विक मंच पर स्थापित किया, इसे राष्ट्राध्यक्षों को दिए भेंट से समझिए। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति को डोकरा कला से बनी नंदी तो दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति को इसी कला से बनी रामायण भेंट की। छत्तीसगढ़ की डोकरा कला अलौह धातु की ढलाई कला है। ऐसी धातु की ढलाई का उपयोग भारत में 4,000 से अधिक वर्षों से होता आ रहा है। जापान के पीएम को उत्तर प्रदेश के निजामाबाद के बने काली मिट्टी के बर्तन भेंट किए। कनाडा के पीएम को हाथ से बुनी गई सिल्क की चटाई भेंट की। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति को लैक्वेरेंस कला से निर्मित राम दरबार भेंट की। सेनेगल के राष्ट्रपति को मूंज से बनी टोकरियाँ और कपास की दरियाँ भेंट की। इसका निर्माण उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, सुल्तानपुर और अमेठी में होता है। जर्मनी की चांसलर को निकेल कोटेड पीतल का मटका भेंट किया। यह मटका यूपी की पीतल नगरी मुरादाबाद की पहचान है। इटली के पीएम को संगरमर से बना टेबल टॉप भेंट किया। यह कलाकृति आगरा की पहचान है। फ्रांस के राष्ट्रपति को जरदोजी बॉक्स में इत्र भेंट किए। अमेरिकी राष्ट्रपति को वाराणसी में बना गुलाबी मीनाकारी ब्रोच और कफलिंक सेट उपहार में दिया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को यूपी के बुलंदशहर में बना प्लेटिनम पेंटेड हैंड पेंटेड टी सेट गिफ्ट किया।
अब 2022 के नवंबर में हुए जी 20 देशों के सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए उपहारों पर गौर करिए;
  • अमेरिका के राष्ट्रपति को भगवान श्रीकृष्ण और राधा की पेंटिंग गिफ्ट की। इसे हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के चित्रकारों ने बनाया था। कांगड़ा की पेंटिंग में श्रृंगार रस और प्राकृतिक प्रेम का चित्रण किया जाता है। इसकी खासियत ये है कि इसे बनाने में सिर्फ प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग किया जाता है।
  • ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को ‘माता नी पछेड़ी’ उपहार के रूप में दिया। यह गुजरात का एक हस्तनिर्मित कपड़ा है। इसमें देवी माँ का चित्र बना होता है। नवरात्रि के समय और अन्य पूजन के दौरान इसे देवी मंदिर में चढ़ाया जाता है।
  • इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री को ‘पाटन पटोला दुपट्टा’ (स्कार्फ) गिफ्ट किया। यह स्कार्फ उत्तरी गुजरात के पाटन क्षेत्र में बनाया जाता है। इसमें आगे और पीछे का हिस्सा एक जैसा दिखता है। इसे अलग-अलग पहचानना मुश्किल है।
  • गुजरात के छोटा उदयपुर के राठवा कारीगरों द्वारा निर्मित जनजातीय लोक कला का चित्र ‘पिथौरा’ ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री को उपहार में दिया गया।
  • इंडोनेशिया के राष्ट्रपति को सूरत का चाँदी का कटोरा और हिमाचल प्रदेश की किन्नौरी शॉल उपहार में दिया।
  • स्पेन के प्रधानमंत्री को मंडी और कुल्लू का कनाल ब्रास सेट (वाद्ययंत्र) गिफ्ट किया। यह हिमाचल के आयोजनों में बजाए जाने वाला प्रमुख बाजा है, जिसका उपयोग अब सजावट के सामान के तौर पर किया जाने लगा है।
बीते जून में प्रधानमंत्री अमेरिका गए थे। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को 10 दान के प्रतीक भेंट कर भारतीय संस्कृति में ‘दस दानम’ के महत्व को चर्चा में ला दिया। दस दानम के प्रतीक जिस विशेष बक्से में बंद थे, उसे मैसूर के चंदन की लकड़ी से जयपुर के कारीगरों ने तैयार किया था। इसमें भगवान गणेश की मूर्ति और एक दीया भी था। साथ ही राष्ट्रपति बायडेन को ’10 प्रिंसिपल्स ऑफ उपनिषद’ नामक किताब भी दी। दूसरी ओर, जब सितंबर 2021 में प्रधानमंत्री अमेरिका से लौटे थे तो 11वीं से 14वीं शताब्दी के बीच 157 मूर्तियाँ-कलाकृतियाँ साथ लेकर आए थे। इन्हें चोरी से देश के बाहर ले जाया गया था। अमेरिका द्वारा भारत को सौंपी गई इन कलाकृतियों में सांस्कृतिक पुरावशेष, हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म से संबंधित मूर्तियाँ शामिल थीं।
भारत सरकार के पोर्टल MyGov के आधिकारिक ट्विटर हैंडल के मुताबिक 2014 के बाद से 238 से अधिक ऐसी कलाकृतियाँ भारत वापस आई हैं, जो चोरी कर देश से बाहर ले जाई गईं थी। 2014 से पहले ऐसी केवल 13 कलाकृतियों को ही देश वापस लाने में सरकार सफल रही थी। स्वदेशी विचारों के सम्मान की संस्कृति भी मोदी सरकार में विकसित हुई है। चाहे वह गीता प्रेस का सम्मान हो या फिर दुनिया के एकमात्र संस्कृत के अखबर ‘सुधर्मा’ को पद्मश्री से सम्मानित करना। इसी तरह जो पद्म पुरस्कार अब तक एलीट वर्ग तक सीमित माने जाते रहे थे, वे उन लोगों तक भी पहुँच रहे हैं जो सुदूर इलाकों में लोक कलाओं को संरक्षित करने में जुटे हुए हैं।
इसके अलावा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ‘प्रसाद योजना’ है तो संस्कृत भाषा को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में 200 करोड़ रुपए का निवेश किया गया है। खादी का पुनरुद्धार इसी सरकार में संभव हुआ है। अभिलेखागार और पुस्तकालयों का विकास किया जा रहा है। 2013-14 के मुकाबले 2023-24 तक संस्कृति संरक्षण के लिए बजट आवंटन में 65 फीसदी तक वृद्धि हो चुकी है।
स्वतंत्र भारत में विकास के साथ भारतीय विरासत को आगे बढ़ाने की जो प्रतिबद्धता मोदी सरकार दिखा रही है, वह इससे पहले कभी नहीं देखी गई। यह केवल हिंदुओं के धार्मिक स्थलों के विकास तक ही सीमित नहीं है। यह एक ऐसी यात्रा है, जिसमें विलुप्त हो रही भारतीय भाषाओं, लोक संस्कृतियों, परंपराओं, वाद्य यंत्रों, कलाओं को न केवल आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जा रहा है, बल्कि उन्हें वैश्विक पहचान देकर इनसे जुड़े लोगों के जीवन में बदलाव लाने के भी प्रयास हो रहे हैं। अपने अब तक के कार्यकाल में मोदी सरकार ने यह भी बार-बार प्रमाणित किया है भारतीयता और भारतीय संस्कृति उसके लिए कोई चुनावी मुद्दा नहीं है।
हम राजनीति के उस दौर में जी रहे हैं जिसमें नेता चुनाव के समय मंदिरों की प्रदक्षिण करने लगते हैं। अपने जनेऊ दिखाने लगते हैं। अपना गोत्र बताने लगते हैं। वे वोटों के लिए हिंदू से लेकर किसान तक दिख रहे हैं। ऐसे दौर में संस्कृति को लेकर एक सरकार की ऐसी प्रतिबद्धता न केवल सुखद है, बल्कि सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का रास्ता भी इससे ही निकलेगा।