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‘हुमायूं हम आएंगे, बाबरी फिर गिराएंगे’ से हिंदुओं की हुंकार, बंगाल में बाबरी के जिन्न से ममता की मुश्किलें चौतरफा बढ़ीं


मुर्शिदाबाद में तृणमूल कांग्रेस के हुमायूँ कबीर(अब पार्टी से निष्काषित) द्वारा बाबर के नाम पर मस्जिद बनाए जाने से ममता बनर्जी के सत्ता में आने के रास्ते में कांटे बिछा दिए हैं। ममता के लिए आगे कुआँ पीछे खाई वाली स्थिति है यानि ममता मस्जिद का विरोध करती है मुस्लिम वोटबैंक बुरी तरह से छिटक जाएगा, इसलिए ममता ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है। लेकिन चुप्पी भी ममता को भारी पड़ने जा रही है।     

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह से ध्रुवीकरण की जमीन तैयार हो रही है, उसने ममता बनर्जी की रातों की नींद उड़ाकर रख दी है। विश्व हिंदू रक्षा परिषद के पोस्टर—“हुमायूं हम आएंगे, बाबरी फिर गिराएंगे” के साथ ही हिंदुओं ने हुंकार भरी है कि पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद को नहीं बनने दिया जाएगा। दरअसल, बाबरी विवाद ने ममता बनर्जी की राजनीति की कमजोर नस पकड़ ली है। विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनने से यह सियासी आग उनकी सत्ता को झुलसा सकती है। बंगाल का चुनाव अब सिर्फ सत्ता का संघर्ष नहीं रहा, बल्कि यह पहचान, आस्था और राजनीतिक भविष्य की लड़ाई बन चुका है। लखनऊ में विश्व हिंदू रक्षा परिषद का बाबरी को लेकर नारा सिर्फ एक संगठन का उग्र बयान नहीं, बल्कि यह जागृत हो चुके हिंदुओं के ज्वालामुखी का संकेत है, जो मुर्शिदाबाद से निकलकर पूरे पश्चिम बंगाल राजनीति को झुलसाने की तैयारी में है। बाबरी मस्जिद विवाद का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ चुका है और इसका सबसे बड़ा नकारात्मक असर तृणमूल कांग्रेस पर पर पड़ता दिख रहा है। क्योंकि तुष्टिकरण की राजनीति के भंवर में फंसी ममता बनर्जी से अब बाबरी की जिन्न ना निगला जा रहा है और ना ही उगला जा रहा है।

लखनऊ में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने पर भारी विरोध
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से विश्व हिंदू रक्षा परिषद ने मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बन रही एक मस्जिद का विरोध करने के लिए ‘मुर्शिदाबाद चलो’ का नारा दिया। इस मस्जिद की आधारशिला टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर 2024 को रखी थी, जिसे उन्होंने “बाबरी मस्जिद की तर्ज पर” बनाने का दावा किया था। लखनऊ में संगठन के कार्यकर्ताओं ने हाथों में फावड़ा, कुल्हाड़ी और भगवा झंडा लेकर प्रदर्शन किया और “बंटोगे तो कटोगे” आदि नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे बाबर के नाम पर किसी भी नई संरचना का निर्माण नहीं होने देंगे। 10 फरवरी (मंगलवार) को जब संगठन के कार्यकर्ता लखनऊ से मुर्शिदाबाद के लिए रवाना होने वाले थे, तब उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें रोक दिया। विश्व हिंदू रक्षा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय को उनके आवास पर नजरबंद कर दिया। क्योंकि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार नहीं चाहती कि कानून-व्यवस्था में किसी तरह का खलल पड़े। यह कार्रवाई बताती है कि मामला कितना संवेदनशील हो चुका है।

मुर्शिदाबाद में बाबरी-शैली मस्जिद ने आग में घी डाला
मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यही मस्जिद निर्माण कार्य में 1000 से 1200 धर्मगुरुओं द्वारा कुरान की तिलावत भी की गई। इसके साथ ही इस कथित बाबरी मस्जिद का विरोध भी तेज हो गया है। यह विवाद अब केवल स्थानीय नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। जिस तरह हिंदू संगठन सड़क पर उतरने को तैयार हैं, योगी और ओवैसी आदि नेता मैदान में हैं और ममता बनर्जी असहज चुप्पी साधे बैठी हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि यह मुद्दा बंगाल चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा इलाके में सस्पेंडेड टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद के नाम से मस्जिद की नींव रखने की घोषणा ने सियासत को विस्फोटक मोड़ दे दिया। कबीर ने कहा कि यह महज धार्मिक पहल नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग है। यह मामला केवल राजनीतिक नहीं रहा, समाज के विभिन्न वर्गों ने इसे अलग-अलग रुख से लिया है। हिन्दू संगठनों ने इसे ‘अवैध’ और ‘संविधान के अनुरूप नहीं’ करार दिया है और बुलंद आवाज़ों में यह मांग उठी है कि सरकार कबीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे।

हुमायूं के 100 सीटों पर लड़ने के ऐलान से ममता पर संकट
टीएमसी से निलंबित हुमायूं कबीर अब खुद को स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनाने की कोशिश में हैं। नई पार्टी बनाने और 100 से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारने के ऐलान ने ममता बनर्जी के लिए अंदरूनी संकट खड़ा कर दिया है। टीएमसी चाहे औपचारिक रूप से उनसे दूरी बनाए, लेकिन यह विवाद ममता सरकार की प्रशासनिक कमजोरी और राजनीतिक असमंजस को उजागर करता है। इसके अलावा कबीर यदि किसी गठबंधन में चुनाव लड़े तो वह तृणमूल कांग्रेस के ही कोर वोट बैंक में सैंध लगाएगा। अब सवाल यह है कि क्या बंगाल का चुनाव रोज़गार, उद्योग, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर होगा या फिर बाबरी मस्जिद जैसे भावनात्मक विषयों पर होगा। ममता सरकार के दौरान यह विवाद खड़ा होना, उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

बाबरी विवाद: भाजपा के लिए अवसर, टीएमसी के लिए संकट
भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को ममता सरकार की विफलता के तौर पर पेश कर रही है। पार्टी का दावा है कि बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति ने सामाजिक संतुलन बिगाड़ दिया है। बाबरी विवाद भाजपा को हिंदू मतों के ध्रुवीकरण का अवसर दे रहा है, जबकि टीएमसी का पारंपरिक समीकरण दरकता दिख रहा है। विधानसभा चुनाव में ओवैसी और हुमायूं कबीर जैसे चेहरे मुस्लिम मतदाताओं को अलग दिशा में मोड़ सकते हैं। इससे टीएमसी का मुस्लिम वोट बैंक भी कमजोर हो सकता है। यही वजह है कि यह विवाद ममता बनर्जी के लिए दोहरी मार साबित हो सकता है यानी हिंदू नाराज और मुस्लिम बंटे हुए। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि बंगाल धीरे-धीरे धार्मिक राजनीति की प्रयोगशाला बनता जा रहा है।

ममता बनर्जी के लिए क्या है खतरा?
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति पर यह विवाद गंभीर प्रभाव डाल रहा है। टीएमसी की तरफ से इसकी शुरुआत को पार्टी की आधिकारिक नीति नहीं बताते हुए दूरी बनाई गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी को इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से जनता तक पहुंचाने में कठिनाई हो रही है। हुमायूं कबीर के सार्वजनिक आरोपों और टिप्पणिओं ने टीएमसी नेतृत्व को अंदरूनी विवाद में उलझाया है। इसके अलावा, ओवैसी जैसे राष्ट्रीय नेताओं के बंगाल आने की खबरें राजनीतिक समीकरणों को और जटिल बना रही हैं। इससे यह उदाहरण स्थापित हो रहा है कि चुनावों में धार्मिक और सांप्रदायिक मुद्दों को उघाड़ने से स्थिति अस्थिर हो सकती है। राजनीतिक समीकरणों का निचोड़ यह है कि बाबरी मस्जिद विवाद वोट बैंक राजनीति का एक नया मोड़ है। हिंदू मतदाताओं के बीच स्पष्टता की उम्मीदें पैदा होती दिख रही हैं। दरअसल, अब तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से कोई स्पष्ट और मजबूत बयान नहीं आया है। यह चुप्पी बताती है कि वह दो पाटों के बीच फंसी हुई हैं—एक तरफ मुस्लिम वोट बैंक, दूसरी तरफ नाराज हिंदू मतदाता। यही असमंजस उनके लिए सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा बनता जा रहा है।

कयामत के दिन तक भी बाबरी ढांचा नहीं बनेगा- सीएम योगी
उधर उत्तर प्रदेश से बाबरी मस्जिद विवाद का जिन्न एक बार फिर फूट पड़ा है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से बाबरी मस्जिद विवाद यहां गरमा गया है। मामले में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी मैदान में उतर गए हैं। सीएम योगी ने मुद्दे पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा है कि बाबरी ढांचे का पुनर्निर्माण कभी भी नहीं होगा, कयामत तक बाबरी ढांचा नहीं बनेगा। बाराबंकी के श्री राम जानकी मंदिर में आयोजित दशम श्री हनुमान विराट महायज्ञ में सीएम योगी ने कहा कि यह सरकार जो बोलती है, करके दिखाती है। यह जितना करती है, उतना ही बोलती है। हमने कहा था रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। सीएम योगी ने सवालिया लहजे में जनसमूह से पूछा कि क्या आज कोई संदेह है? हम आज फिर इस बात को कह रहे हैं कि कयामत के दिन तक भी बाबरी ढांचा नहीं बनेगा। उन्होंने कहा कि कयामत का दिन तो कभी आना नहीं है, इसलिए बाबरी ढांचे का पुनर्निर्माण भी कभी होना नहीं है। सीएम योगी कहा कि कयामत के दिन के आने का जो लोग सपना देख रहे हैं, ऐसे ही सड़ गल जाएंगे। कयामत का वह दिन कभी आने वाला नहीं है। जिन्हें सपना देखना है, देखते रहें। हम अपनी विरासत को सम्मान देते हुए, भारत की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करते रहेंगे।

मुस्लिम वोटों के लिए औवेसी और हुमायूं कबीर के मिलने की अटकलें
सीएम योगी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि कानून तोड़ने वालों के लिए प्रदेश में कोई जगह नहीं है। अगर कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे। कयामत के दिन के लिए मत जियो। हिंदुस्तान में कायदे से रहना सीखो। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर कोई भी यहां कानून तोड़ने की कोशिश करेगा तो उसके लिए कानून के तहत ही कार्रवाई होगी। ऐसे लोगों का रास्ता जहन्नुम की तरफ ही जाता है। कानून तोड़कर अगर कोई जन्नत जाने का सपना देख रहा है तो उसका सपना कभी पूरा नहीं होने वाला है। हैदाराबाद वाले भड़काऊ भाईजान ओवैसी भी मुर्शिदाबाद जाने की सोच रहे हैं। यहां पर औवेसी और हुमायूं कबीर मिलकर पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने की रुपरेखा बना सकते हैं। अयोध्या में दफ्न हो चुकी बाबरी को मुर्शिदाबाद में जिंदा कर हुमायूं कबीर ने एक ऐसे विवाद को जन्म दे दिया है जिसके नासूर बनने की पूरी आशंका है। लखनऊ के पोस्टर इसकी तस्दीक कर रहे हैं कि भविष्य में यह बड़ा मुद्दा बनने वाला है।

बंगाल : ममता बनर्जी के एक और MLA ने चुनाव से पहले बढ़ा दी TMC की टेंशन, पक रही है सियासी खिचड़ी


पश्चिम बंगाल में ज्यों-ज्यों विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती ही नजर आ रही हैं। विपक्ष के निशाने छोड़िए तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो अपनी ही पार्टी के नेताओं के वाणों से बच नहीं पार रही है। एक के बाद एक टीएमसी के विधायक ममता सरकार को मुश्किलों में डालने में लगे हैं। पहले दो विधायक कबीर और इस्लाम में ममता की धड़कनें बढ़ाईं तो अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ही विधायक मनोरंजन बापरी ने पश्चिम बंगाल की सियासत में हलचल मचा दी है। उनके एक सोशल मीडिया पोस्ट पोस्‍ट ने चुनावी माहौल में टीएमसी की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इसमें उन्होंने भाजपा और सीपीआई(एम) दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं की विनम्रता और दरियादिली तहेदिल से तारीफ की है। हुगली जिले के बालागढ़ से टीएमसी विधायक बापरी ने अपनी पोस्ट में उन्होंने दो निजी अनुभवों का जिक्र किया है। एक में भाजपा कार्यकर्ता शामिल थे और दूसरे में सीपीआई(एम) के युवा कार्यकर्ता। यह बताने के लिए कि बीजेपी में शिष्टाचार और उदारता जैसे मूल्य राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर होते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि उनके निशाने पर टीएमसी है, जिसमें ऐसी विचारधारा दूर-दूर तक नजर नहीं आती।

भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताने का नैरेटिव तोड़ा

ममता बनर्जी की सियासी मुश्किलें अब विपक्ष के हमलों से नहीं, अपनी ही पार्टी की ज़ुबान से बढ़ रही हैं। तृणमूल के विधायक मनोरंजन बापरी का भाजपा कार्यकर्ताओं की “विनम्रता और दरियादिली” की खुलेआम तारीफ करना कोई सामान्य शिष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली चेतावनी है। इससे पहले हुमायूं कबीर और मोनिरुल इस्लाम जैसे विधायक अपने बयानों और कृत्यों से मुख्यमंत्री की किरकिरी करा चुके हैं। अब बापरी का यह सार्वजनिक बयान उस नैरेटिव को तोड़ता है, जिसमें भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताया जाता रहा। जब सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही विरोधी की छवि चमकने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि नेतृत्व की पकड़ ढीली पड़ रही है।

बीजेपी के कट्टर कार्यकर्ताओं से सम्मान मिलना गर्व और सम्मान की बात

टीएमसी विधायक बापरी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में जिस पहली घटना का जिक्र किया है, वह कुछ साल पहले की है। वह सेंट्रल कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एक पार्टी मीटिंग से लौट रहे थे। वापस आते समय डंकुनी टोल प्लाजा पर भाजपा कार्यकर्ताओं के विरोध-प्रदर्शन के कारण उनकी गाड़ी रोक दी गई। बापारी ने अपनी पोस्ट में कहा, ‘मेरे असिस्टेंट पार्थ ने मुझसे गाड़ी से बाहर ना निकलने को कहा। मैंने उनकी बात नहीं मानी और मैं गाड़ी से बाहर निकला और भाजपा समर्थकों से उनके विरोध का कारण पूछा। उन्होंने मुझे पहचान लिया. बहुत ही नरमी से उन्होंने मुझसे माफी मांगी और मुझे आगे बढ़ने को कहा। मैं उनका कट्टर विरोधी हूं, इसके बावजूद विपक्षी बीजेपी के कट्टर कार्यकर्ताओं से सम्मान मिलना मेरे लिए बहुत ही गर्व और सम्मान की बात थी।’

‘मैंने तो बस अपनी पूरी जिंदगी लोगों का प्यार कमाया’

विधायक बापरी यह भी कहा कि ऐसे समय में जब अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के बीच झड़पें आम बात हो गई हैं। वे बिना किसी सुरक्षा के पूरे राज्य में घूमते हैं और कभी-कभी तो पब्लिक गाड़ियों में भी सफर करते हैं। मुझ पर कभी किसी ने हमला नहीं किया। मुझे नहीं लगता कि कोई कभी ऐसा करेगा। मैंने पूरी जिंदगी लोगों का प्यार कमाया है। दूसरी घटना जो उन्होंने बताई, वह रविवार की है, जब वह कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर से पब्लिक गाड़ी से लौट रहे थे। यह समझते हुए कि हाल ही में घुटने की सर्जरी की वजह से मुझे खड़े होने में दिक्कत हो रही है। गाड़ी में बैठे तीन युवाओं में से एक ने मेरे लिए अपनी सीट खाली कर दी। शर्मिंदा होकर मैंने मना कर दिया। फिर उनमें से एक ने मुझसे कहा कि उसने मुझे पहचान लिया है। उसने यह भी कहा कि एक पक्के सीपीआई(एम) युवा कार्यकर्ता होने के नाते, वह और उसके दो दोस्त अक्सर मेरे अलग-अलग सोशल मीडिया पोस्ट पर मेरे साथ राजनीतिक चर्चा करते हैं। इसके बाद उनके साथ काफी देर तक बातचीत हुई। मैं उनकी कुछ बातों से सहमत हुआ और वे भी मेरी कुछ बातों से सहमत हुए। जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा हैरान किया, वह यह थी कि यह जानते हुए भी कि मैं तृणमूल कांग्रेस का विधायक हूं, उन्होंने मुझे बहुत इज्जत दी और मेरी तारीफ भी की।

सत्ता-संतुलन में खिसकने और सियासी खिचड़ी पकने के संकेत

यह घटनाक्रम केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन में खिसकन का संकेत है। राजनीतिक प्रेक्षकों की “सियासी खिचड़ी” वाली आशंका यूं ही नहीं उठी—टीएमसी के भीतर असंतोष, गुटबाज़ी और अवसरवाद अब खुले मंच पर दिखने लगे हैं। भाजपा के लिए यह अप्रत्याशित संजीवनी है, जो उसके कद को ऊंचा करती है और ममता बनर्जी को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल देती है। चुनावी मौसम से पहले पार्टी-अनुशासन का यह क्षरण बताता है कि ममता की ताकत अब विरोधियों से नहीं, अपने ही विधायकों की बयानबाज़ी से चुनौती पा रही है। सत्ता जब अपने ही शब्दों से कटने लगे, तो सियासत में उसका हिसाब जनता तय करती है। ममता की पार्टी के विधायक ने आगे दावा किया कि हालांकि उन्हें नहीं पता कि एक विधायक के तौर पर वह कितने सफल रहे, लेकिन उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि वह सम्मान है जो उन्हें आम लोगों से मिला है। चाहे उनकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी रही हो।

टीएमसी विधायक के बिगड़े बोल- ‘चुनाव आयोग को कब्र से बाहर खींच लाने’ की धमकी

 दरअसल, आज पश्चिम बंगाल की सीएम बनर्जी की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है, जहां सत्ता का संतुलन नहीं, बल्कि सत्ता की असहायता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। उनकी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठती वह बेलगाम आवाज़ें हैं, जो सरकार की साख, संवैधानिक मर्यादा और कानून-व्यवस्था तीनों को एक साथ चुनौती दे रही हैं। एक के बाद एक टीएमसी नेताओं के विवादित कदम यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी पर नियंत्रण खो चुकी हैं? क्या इस बार के विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए भारी मुश्किलों को सबब बनने जा रहे हैं? पश्चिम बंगाल में छात्राओं और महिलाओं के यौन शोषण के मामले में पहले ही टीएमसी नेताओं के नाम आ चुके हैं। पिछले महीने टीएमसी के विधायक रहे हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की राजनीति में बड़ा बवाल कर दिया। अब फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।

बाबरी मस्जिद विवाद: तुष्टिकरण की राजनीति का बोझ
पश्चिम बंगाल में कुछ महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लेकिन राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति के लिए पिछला कुछ समय अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला साबित हो रहा है। पहले देशभर में चर्चित हुए संदेशखाली यौन प्रकरण में टीएमसी नेता का ही नाम आने से ममता बनर्जी को बगलें झांकने को मजबूर होना पड़ा था। एक बार फिर ममता के लिए मुश्किल की शुरुआत टीएमसी के पूर्व विधायक हुमायूं कबीर के उस दावे से हुई, जिसमें उन्होंने पिछले माह छह दिसंबर को पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद के निर्माण का शिलान्यास करा दिया। यह कोई साधारण कदम नहीं था, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक विस्फोट था, जिसने ममता बनर्जी को असहज कर दिया। वर्षों से तुष्टिकरण की राजनीति के सहारे सत्ता संभालने वाली मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर न तो खुलकर विरोध कर सकीं और न ही समर्थन करने का साहस दिखा पाईं। विरोध करतीं तो अपने वोट बैंक से नाराजगी का डर, समर्थन करतीं तो संवैधानिक और राजनीतिक संकट के साथ-साथ बहुसंख्यक वोट बैंक की नाराजगी। परिणामस्वरूप, चुप्पी को रणनीति बना लिया गया।

फरक्का विधायक का जहर और संवैधानिक संस्थाओं पर हमला
ममता बनर्जी की यही चुप्पी ही उनके गले की हड्डी बन गई है। उनकी पार्टी के नेता ही ऐसी हरकतें कर रहे हैं, जो उनके लिए चुनाव में काफी मुश्किलों का कारण बन सकती हैं। दरअसल, अब यह संकट एक और टीएमसी विधायक के बिगड़े बोल से एक बड़े स्तर पर पहुंच चुका गया है। फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम ने सीधे-सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को कब्र से खींच लाने की धमकी दे डाली है। दरअसल, मोनिरुल इस्लाम की खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। यह वही चुनाव आयोग है, जिसे लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है, लेकिन बंगाल में उसे खलनायक बनाने की कोशिश की जा रही है।

चुनाव आयोग के खिलाफ ममता सरकार का पुराना नैरेटिव
टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम का यह अनर्गल आरोप है कि चुनाव आयोग बंगाल के लोगों को परेशान कर रहा है। जबकि चुनाव आयोग सिर्फ एसआईआर का अपना काम कर रहा है, जिसे अदालत बने भी सही ठहराया है। लेकिन इसको लेकर तृणमूल सरकार के नेता और विधायक ऊल-जलूल बयानबाजी पर उतर आए हैं। दरअसल, यह वही पुराना नैरेटिव है, जिसे ममता बनर्जी बार-बार दोहराती रही हैं। हर संवैधानिक संस्था को ‘बाहरी हस्तक्षेप’ बताना, हर जांच को ‘राजनीतिक साजिश’ कहना। लेकिन जब यही भाषा धमकी और डंडे के जोर पर काम कराने तक पहुंच जाए, तो सवाल उठता है कि क्या यह सरकार लोकतंत्र में विश्वास रखती है या भीड़तंत्र में। ममता बनर्जी खुद भी कुछ दिन पहले आई-पैक पर प्रवर्तन निदेशालय के छापे के दौरान भीड़तंत्र का हिस्सा बनकर मौके पर जा पहुंची थी, और वहां के ग्रीन फाइल समेत कई अहम कागजात उठाकर ले आईँ थीं। इस पर कोर्ट ने भी नाराजगी जताई थी।

महिला सुरक्षा पर शर्मनाक चुप्पी, भ्रष्टाचार का गहराता दलदल

विडंबना यह है कि एक महिला मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाले राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े लगातार डराने वाले होते जा रहे हैं। यौन शोषण, बलात्कार, तस्करी और हिंसा के मामलों में पश्चिम बंगाल बार-बार सुर्खियों में रहा है। लेकिन ममता सरकार की प्रतिक्रिया या तो इनकार में होती है या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहती है। सत्ता के संरक्षण में पनपता अपराध और उस पर सरकारी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि शासन का संवेदनशील चेहरा अब खोखला हो चुका है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, पशु तस्करी, राशन घोटाला—ये कोई आरोप नहीं, बल्कि वे मामले हैं जिनमें ममता सरकार के मंत्री, विधायक और शीर्ष नेता जांच एजेंसियों के घेरे में आ चुके हैं। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, बल्कि शासन का स्थायी चरित्र बनता जा रहा है। ऐसे में पार्टी नेताओं की बेलगाम बयानबाज़ी सरकार की कमजोरियों को और उजागर करती है।

कर्जे में कर्नाटक: फ्री की रेवड़ी पड़ रही महंगी : बिजली, बस किराया, पेट्रोल-डीजल और दूध के दाम के बाद अब पानी पर टैक्स बढ़ाने की तैयारी


कर्नाटक में सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार ने महंगाई को चरम पर पहुंचा दिया है। कांग्रेस सरकार की नीतियों के कारण आम लोगों का जीना मुहाल हो गया है। राज्य में कांग्रेस की सरकार बनते ही उत्पाद शुल्क, संपत्ति कर, स्टाम्प पेपर ड्यूटी, रोड टैक्स में बढ़ोतरी के साथ ही आम लोगों के लिए सबसे जरूरी बिजली और दूध की कीमतें बढ़ा दी गईं। और अब राज्य की कांग्रेस सरकार बस किराये के साथ पानी पर टैरिफ बढ़ाने की तैयारी में है। कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने पानी पर टैक्स बढ़ाने की घोषणा कर दी है। 
पानी पर टैरिफ बढ़ाने की घोषणा के बाद जब लोगों ने विरोध किया तो डिप्टी सीएम ने साफ कह दिया कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन क्या कहता है। उन्होंने साफ कहा कि विरोध प्रदर्शन का कोई असर नहीं होगा। मैं पानी की कीमतें बढ़ा दूंगा जिससे जल बोर्ड को हो रहे वित्तीय घाटे की भरपाई हो सके।

कांग्रेस राज में बेंगलुरु जल आपूर्ति एवं सीवरेज बोर्ड गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहा है। डीके शिवकुमार ने लोगों के विरोध को खारिज करते हुए कहा कि बेंगलुरु जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड के सामने चल रही वित्तीय कठिनाइयों के कारण जल शुल्क में वृद्धि जरूरी है। ऐसे में चुनाव के समय खटाखट वादे में फंसकर कांग्रेस की सरकार बनाने वाले लोग अपनी खून-पसीने की कमाई को टैक्स में देने को मजबूर हैं।

कर्नाटक को फ्री की रेवड़ी पड़ रही महंगी
इतना ही नहीं फ्री रेवड़ी के कारण कांग्रेस ने कर्नाटक में महंगाई को भी चरम पर पहुंचा दिया है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने वादा किया था कि सत्ता में सरकार आई तो महिलाओं के लिए फ्री बस यात्रा शुरू करेंगे। कांग्रेस सरकार आई और सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने। सरकार बनते ही राज्य की बसों में महिलाओं की यात्रा फ्री कर दी गई। इसका बोझ राज्य सड़क परिवहन निगम पर पड़ा और तीन महीने में ही निगम को 300 करोड़ रुपये का घाटा हो गया। 

बस किराया 20 प्रतिशत तक बढ़ाने की तैयारी
कर्नाटक में सरकारी बसों के किराए को 20 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) ने बताया है कि पिछले तीन महीनों में उन्हें 295 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। KSRTC के अनुसार, इस घाटे का कारण शक्ति योजना है। इस योजना के तहत राज्य में महिलाओं को फ्री बस सुविधा दी जाती है। KSRTC के चेयरमैन और कांग्रेस विधायक एसआर श्रीनिवास ने कहा है कि बढ़ती महंगाई के बीच विभाग के रखरखाव के संतुलन के लिए ऐसा किया गया है। उन्होंने कहा कि 12 जुलाई को हुई बोर्ड की बैठक में किराया बढ़ाने का फैसला लिया गया।

3 महीने में 300 करोड़ घाटा
कांग्रेस विधायक एसआर श्रीनिवास ने कहा, ‘यदि हम पिछले तीन महीनों की बात करें तो निगम 295 करोड़ के घाटे में है। हमारे पास लगभग 8000 बसें हैं, सभी बसें 10 से 11 लाख किलोमीटर चल चुकी हैं। लगभग 450 से 500 वोल्वो बसें हैं, वे भी 20 लाख किलोमीटर चल चुकी हैं, इसलिए हमें नई वोल्वो बसें भी खरीदनी होगी। हमने बैठक में नई खरीद के बारे में चर्चा की है। इन सभी कारणों को ध्यान में रखते हुए और नई बसें खरीदने, पुरानी बसों के रखरखाव, बहुत सारे खर्च हैं। इसलिए यह अपरिहार्य है कि किराया बढ़ाया जाए। हमें हर चीज का ध्यान रखना है।’

65 करोड़ रुपये का बकाया नहीं चुकाने पर बेंगलुरु में 11 इंदिरा कैंटीन बंद
रेवड़ी कल्चर के कारण कर्नाटक की कांग्रेस सरकार कर्जे में आकंठ डूब गई है। फ्री में सुविधा देने के वादे ने राज्य का ये हाल कर दिया है कि कांग्रेस अब अपने नेता राहुल गांधी की दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर शुरू इंदिरा कैंटीन भी चला नहीं पा रही है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की फ्री रेवड़ी के कारण राज्य की कांग्रेसी सरकार के पास पैसे की तंगी है। इससे गरीबों को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई इंदिरा कैंटीन भी आर्थिक संकट में आ गई है। कैंटीन के ठेकेदारों ने बिलों का भुगतान न होने के कारण बेंगलुरु में 11 इंदिरा कैंटीनों में भोजन परोसना बंद कर दिया है। बुधवार 17 जुलाई की रात से इन 11 कैंटीनों ने खाना परोसना बंद कर दिया है। कैंटीन ठेकेदार का कहना है कि ब्रुहत बेंगलुरु महानगर पालिका (बीबीएमपी) पर 65 करोड़ रुपये का बकाया है, जिसका भुगतान नहीं किया जा रहा है।

बकाया पैसे का भुगतान ना होने के कारण बंगलुरु के बसवनगुड़ी, पद्मनाभनगर, भैरसंद्रा, वीवी पुरम, सिद्दापुरा, होमबेगौड़ा नगर, जयानगर, विद्यापीठ, ईजीपुरा, अदुगोडी वार्ड में स्थित इंदिरा कैंटीन को बंद कर दिया गया है। इससे राज्य की कांग्रेसी सरकार की किरकिरी हो रही है। कांग्रेस अपने पूर्व प्रधानमंत्री के नाम पर शुरू पहल को भी ठीक से जारी रखने में असमर्थ है। जो इंदिरा कैंटीन बीजेपी शासनकाल में बंद नहीं हुई वो कांग्रेसी शासनकाल में पैसे की कमी के कारण बंद हो गई है।

नंदिन दूध के दाम में 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ोतरी
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार विकास के काम रोकने के बाद आम आदमी को महंगाई का झटका देने से भी गुरेज नहीं करती। कर्नाटक सरकार ने नंदिनी दूध के दाम में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी करने का फैसला किया। अगर यह बढ़े हुए दाम दही, दूध पाउडर जैसे अन्य डेयरी प्रोडक्ट पर भी लागू होते हैं तो आम लोगों की परेशानी और भी बढ़ने वाली है।

कर्नाटक में बिजली दरें 2.89 रुपये प्रति यूनिट बढ़ीं
सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कर्नाटक की कांग्रेस सरकार मुफ्त बिजली का वादा कर आम आदमी की जेब काटने का काम कर रही है। सरकार ने नागरिकों को 200 यूनिट फ्री बिजली देने का वादा किया। साथ ही बिजली की दरें 2.89 रुपये प्रति यूनिट बढ़ा दी गई। अगर कर्नाटक के लोग 200 यूनिट स्लैब से ज्यादा बिजली खर्च करते हैं तो उन्हें अब 2.89 रुपये प्रति यूनिट की अतिरिक्त राशि का भुगतान करना होगा।

पेट्रोल 3 रुपए, डीजल 3.20 रुपए महंगी
कर्नाटक सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए। सरकार ने पेट्रोल की कीमत में 3 रुपए प्रति लीटर वहीं, डीजल के दाम में 3.20 रुपए का इजाफा किया है। यह बढ़ोतरी ‘कर्नाटक सेल्स टैक्स’ में बदलाव के बाद हुई है। क्योंकि राज्य सरकार ने बिक्री कर में 29.84 प्रतिशत और 18.44 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की है।

कर्नाटक सरकार ने मोटर वाहन सहित अन्य की कीमतें बढ़ीं
मोटर वाहन कर : सरकार ने टैक्सियों, स्कूल वैन और बसों सहित वाणिज्यिक वाहनों पर कर बढ़ा दिया है। 15 लाख रुपये से अधिक कीमत वाले वाहनों के लिए कर में 15 प्रतिशत की वृद्धि और 10-15 लाख रुपये की कीमत सीमा वाले वाहनों के लिए 9 प्रतिशत कर की वृद्धि की गई है। सरकार को इस टैक्स बढ़ोतरी से 472 करोड़ रुपये की कमाई होने का अनुमान है।

कर्नाटक में विकास के काम पड़े हैं ठप
हालत यह है कि प्रदेश में विकास के काम ठप हैं और कांग्रेस फंड की कमी से चुनावी गारंटी को ही पूरा करने में नाकाम साबित हो रही है। कांग्रेस सरकार ने गारंटी को पूरा करने के लिए दलित समाज के साथ भी धोखा किया है। उसने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण योजनाओं के लिए निर्धारित 14,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि को अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए डायवर्ट कर दिया है।

सिद्धारमैया जब-जब आते हैं कर्ज बढ़ जाता है… लिखने पर टीचर सस्पेंड
जब-जब सिद्धारमैया की सरकार आती है, तब-तब राज्य पर कर्ज बढ़ जाता है। कर्नाटक में एक सरकारी टीचर की टिप्पणी चर्चा में है। इस फेसबुक कॉमेंट के बाद चित्रदुर्ग जिले के शिक्षक शांतामूर्ति एमजी को सस्पेंड कर दिया गया है। टीचर ने अपनी पोस्ट में लिखा था कि मुफ्त वादों पर अमल करने की वजह से राज्य पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला जाता है। इस पोस्ट में शांतामूर्ति ने यह भी कहा कि सिद्धारमैया के पिछले कार्यकाल में (2013-18) के बीच कर्नाटक का कर्ज बढ़कर 2 लाख 42 हजार करोड़ तक पहुंच गया।

‘नौकरी के बदले जमीन’ मामले में लालू की बेटी हेमा भी लपेटे

भारत से जो नेता 2014 के बाद बढ़ते भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी से जनता को गुमराह करते हैं, सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार में पारिवारिक पार्टियां ही लिप्त हैं। जहाँ तक बेरोजगारी, महंगाई की बात है, ये सभी नेता जनता को ईमानदारी-अगर हो तो- से बताएं कि भारत स्वतंत्र होने से आज तक ये समस्याएं समाप्त ही हुई ,जबकि कई चुनाव केवल इन्ही मुद्दों पर लड़े जा चुके हैं। और जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है यह तो बेरोजगारी और महंगाई से भी बहुत पुरानी है। जय चंद और मीर ज़फर भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी मिसाल है। अगर ये लोग नहीं होते, भारत कभी गुलाम नहीं बनता। इन्ही के वशंज भ्रष्टाचार फैला रहे हैं। 

अब एक झलक महंगाई पर डालते हैं। ब्रिटिश काल में दूध 4 पैसे सेर(सेर लीटर से अधिक होता है), सोना 15/17 रूपए तोला(यानि 11.45/50 ग्राम) गेहूं 1 रूपए का 10 सेर, देसी घी 1.50/2 सेर था। उस समय वनस्पति को घासलेट कहते थे और कोई हलवाई घासलेट के पास तक नहीं फटकता था। 

70 दशक के समाचार पत्र देख लो, चपरासी की नौकरी के लिए PhD और MA द्वारा आवेदन किये जाने के समाचार प्रकाशित होते थे। आज आलम यह है कि आठवीं और अनपढ़ तक मुख्यमंत्री बन जाती हैं। इसको कहते हैं लोकतंत्र।    
भ्रष्टाचार के मामले में सज़ायाफ़्ता आरजेडी प्रमुख लालू यादव और उनके परिवार की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने राउज एवेन्यू कोर्ट में लैंड फॉर जॉब स्कैम में एक नई चार्जशीट दाखिल की है। इसमें लालू यादव की एक और बेटी हेमा यादव का नाम शामिल किया गया है। इससे पहले चार्जशीट में लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती, तेजस्वी यादव और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का नाम शामिल किया गया था। लोकसभा चुनाव से पहले ईडी की चार्जशीट से लालू परिवार के साथ ही इंडी गठबंधन को भी झटका लगा है।

09 जनवरी, 2024 को ईडी ने ‘नौकरी के बदले जमीन’ से संबंधित धन शोधन मामले में सात लोगों के खिलाफ राउज एवेन्यू कोर्ट में एक नई चार्जशीट दाखिल की। इसमें लालू यादव की बेटी हिमा यादव के अलावा हृ्दयानंद चौधरी और अमित कात्याल का नाम शामिल किया गया है। इसमें दो कंपनी ए.के. इंफोसिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड और ए.बी. एक्सपोर्ट्स प्रा. लिमिटेड को भी आरोपी बनाया गया है। ईडी की इस चार्जशीट पर कोर्ट 16 जनवरी को सुनवाई करेगा।

‘नौकरी के बदले जमीन’ मामले में ईडी ने तेजस्वी यादव को आवश्यक पूछताछ के लिए 5 जनवरी, 2024 को बुलाया था, लेकिन तेजस्वी ईडी के सामने पेश नहीं हुए। इससे पहले तेजस्वी यादव को 22 दिसंबर, 2023 को ईडी ने पेश होने के लिए कहा था, लेकिन वह पेश नहीं हो सके थे। ईडी इस मामले में राबड़ी देवी और उनकी तीन बेटियों-मीसा भारती, चंदा यादव और रागिनी यादव से पूछताछ कर चुकी है। ईडी ने इस मामले में कात्याल को पिछले साल नवंबर में गिरफ्तार किया था।

लालू यादव ने इस घोटाले को उस समय अंजाम दिया था, जब वह यूपीए-1 सरकार में रेल मंत्री थे। 2004 से 2009 तक कुछ लोगों को भारतीय रेलवे में ‘ग्रुप डी’ के पदों पर नियुक्त किया गया था और इसके बदले में उनसे जमीन ली गई थी। इस जमीन को बाद में तत्कालीन रेल मंत्री लालू यादव और ए.के. इंफोसिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड को हस्तांतरित की गई थी। ईडी ने दावा किया था कि कात्याल इस कंपनी के निदेश थे, जब इसने लालू यादव की ओर से अभ्यर्थियों से जमीन हासिल की थी। एजेंसी ने आरोप लगाया था कि कंपनी का पंजीकृत पता-1088, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, नई दिल्ली है, जो लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के सदस्यों का घर है। ईडी के अनुसार, भूमि प्राप्त करने के बाद कंपनी के शेयर 2014 में लालू प्रसाद के परिवार के सदस्यों को हस्तांतरित कर दिए गए थे। 

केजरीवाल स्वतंत्र राष्ट्र खालिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं : कुमार विश्वास

कृषि कानूनों के विरोध में हुए मोदी विरोधियों द्वारा समर्थित तथाकथित किसान आंदोलन में भी खालिस्तान नज़र आया। 26 जनवरी को लाल किला पहुँच उपद्रव करने पर भी मोदी विरोधी पार्टियां इस आंदोलन को अपना समर्थन देती रहीं। यानि भारत में राजनीति नहीं सियासत इतने निचले स्तर पर पहुंची हुई, जहाँ कुर्सी के भूखे नेताओं और इनकी पार्टियों की नज़र सिर्फ सत्ता पर है देश पर नहीं। जिस खालिस्तान ने देश की प्रधानमंत्री की जान ले ली, उसके बावजूद विपक्ष द्वारा सरकार के साथ नहीं खड़ा होना इनका छद्दम देशप्रेम दर्शा रहा है।
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद से इस सरहदी राज्य में खालिस्तानी शक्तियां फिर से सिर उठा रही हैं। विदेशों में बैठे खालिस्तानी आतंकियों से स्थानीय लोगों के ‘गठजोड़’ की कहानियां कई बार सामने आने के बावजूद मान सरकार बंद आंख से तमाशा देखने में मशगूल है। पंजाब से लेकर दिल्ली तक और आस्ट्रेलिया से लेकर कनाडा और अन्य देशों तक खालिस्तानी समर्थक राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने में लगे हैं। 
पंजाब में AAP की मान सरकार आने के बाद फिर KHALISTAN बनाने की मांग तेज
पंजाब में तो सरकार की नाक के नीचे खालिस्तानी समर्थकों ने खुलेआम जुलूस निकाला था। इसे रोकना तो दूर पंजाब की भगवंत मान सरकार ने इसे बकायदा पुलिस प्रोटेक्शन दिया। आप सरकार के ऐसे ही सहयोगात्मक रवैये का ही दुष्परिणाम हाल ही में दिल्ली और ऑस्ट्रेलिया में खालिस्तानी समर्थकों की सक्रियता को लेकर सामने आया है। एक ओर केंद्र की पीएम मोदी सरकार की आतंक, आतंकियों और राष्ट्र-विरोधी तत्वों पर प्रहार करने के लिए जीरो टोलरेंस नीति लगातार जारी है। दूसरी ओर आप की दिल्ली और पंजाब की सरकार राष्ट्र विरोधी खालिस्तानी समर्थकों के लिए पलक-पांवड़े बिछा रही है।

मोदी सरकार की आतंकियों और राष्ट्र-विरोधी तत्वों के खिलाफ जीरो टोलरेंस नीति
मोदी सरकार ने जीरो टोलरेंस नीति आतंकवादी समूह द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) सहित कुछ संगठनों को आतंकवादी घोषित कर उनपर प्रतिबंध लगाया था। टीआरएफ पाकिस्तान आधारित प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा समूह है। अब आईएसआई समर्थित खालिस्तान टाइगर फोर्स के सहयोगी अर्शदीप सिंह गिल उर्फ अर्श डल्ला के खिलाफ गृह मंत्रालय ने सख्त कदम उठाया है। गृह मंत्रालय ने पंजाब में आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन देने और जबरन वसूली में शामिल रहे कनाडा में रहने वाले अर्शदीप सिंह गिल को आतंकवादी घोषित कर दिया है। पंजाब में जन्मा और अभी कनाडा में बसा गिल उर्फ अर्श डल्ला बड़े स्तर पर मादक पदार्थों तथा हथियारों की सीमापार तस्करी में शामिल है। वह प्रतिबंधित संगठन खालिस्तान टाइगर फोर्स (केटीएफ) के साथ जुड़ा है और घोषित आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की तरफ से आतंकी मॉड्यूल का संचालन करता है। गिल ऐसे अनेक मामलों में आरोपी है, जिन्हें राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) ने दर्ज किया है और जिनमें एजेंसी जांच कर रही है।

केजरीवाल स्वतंत्र राष्ट्र खालिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं- विश्वास
आप और खालिस्तानी समर्थकों का गठजोड़ कोई नई बात नहीं है। पंजाब में विधानसभा चुनाव से चार दिन पहले भी पूर्व आप नेता कुमार विश्वास ने सनसनीखेज खुलासा किया था कि आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को खालिस्तानी अलगाववादियों की मदद लेने में भी कोई परहेज नहीं है। विश्वास का आरोप था कि केजरीवाल पंजाब में चुनाव जीतने और आप की सरकार बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। क्योंकि अरविंद केजरीवाल पंजाब में अलगाववादियों के समर्थक हैं। कुमार विश्वास ने कहा कि एक बार केजरीवाल ने उनसे कहा था कि वे या तो पंजाब के मुख्यमंत्री बनेंगे या स्वतंत्र राष्ट्र खालिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बनकर अपना पीएम बनने का सपना साकार करेंगे। इसीलिए केजरीवाल को अलगाववादियों की मदद लेने में भी कोई परहेज नहीं है। विश्वास ने कहा कि एक ऐसा आदमी जिसे एक समय मैंने ये तक कहा था कि अलगाववादियों का साथ नहीं लीजिए। तो उन्होंने कहा था कि नहीं-नहीं हो जाएगा।

मान के राज में बठिंडा में खालिस्तान के समर्थन में नारे और होशियारपुर में निकाली रैली
कवि कुमार विश्वास की बातों में दम इसलिए नजर आने लगा है, क्योंकि पंजाब में मान सरकार बनने के बाद खालिस्तान समर्थक एक बार फिर सक्रिय नज़र आ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य के बठिंडा में वन विभाग के दफ्तर की दीवार पर खालिस्तान के समर्थन में नारे लिखे पाए गए हैं, तो वहीं होशियारपुर में खालिस्तान समर्थक रैली निकाली गई। और तो और इसमें भारत विरोधी और पंजाब बनेगा खलिस्तान जैसे नारे लगाए गए। इन नारों के पीछे प्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ की भूमिका सामने आई। ये दावा खुद इस आतंकी संगठन के चीफ गुरपतवंत सिंह पन्नू ने किया है। हैरानी की बात यह है कि होशियारपुर में खालिस्तान समर्थक रैली राज्य पुलिस की मौजूदगी में ही निकाली गई। अब इस पर फिल्ममेकर अशोक पंडित ने दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को घेरा था। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि यह अरविंद केजरीवाल का खालिस्तानियों के लिए उधार चुकाने का समय है, क्योंकि खालिस्तान वालों ने ही चुनाव के समय केजरीवाल जी का समर्थन किया था।

राजधानी में बड़ी वारदात की साजिश रच रहे दो खालिस्तानी समर्थक गिरफ्तार
आप नेताओं की शह पर खालिस्तान समर्थकों की सक्रियता बनी हुई है। देश की राजधानी से दिल्ली पुलिस ने दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। दोनों खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के सदस्य हैं। दोनों पर आरोप है कि उन्होंने गणतंत्र दिवस से पहले दिल्ली के कई इलाकों में दीवारों पर खालिस्तानी संदेश लिखे थे। वहीं देश की खुफिया एजेंसियों ने खालिस्तानी समर्थकों के एक्टिव होने की सूचना जारी करते हुए बड़ा हमला होने की चेतावनी दी है। इसके बाद से पूरी दिल्ली पुलिस अलर्ट मोड पर है और चप्पे-चप्पे पर निगरानी रखी जा रही है। दोनों आरोपी दिल्ली के रहने वाले हैं। ये विदेश में बैठे खालिस्तानी आतंकी गुरुपतवंत सिंह पन्नू के इशारे पर दिल्ली में खालिस्तानी स्लीपर सेल के साथ कोई बड़ी वारदात को अंजाम देने की साजिश रच रहे थे। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक दोनों को देश-विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए फंडिंग की गई थी।

दिल्ली में कई जगह पंजाब बनेगा खालिस्तान और रेफरेंडम 2020 के लगाए पोस्टर
दिल्ली पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार दोनों आरोपी विक्रम सिंह व बलराम सिंह विदेश में बैठे गुरपंत सिंह पन्नू के इशारों पर काम कर रहे थे। वो खलिस्तानी टेरर नेटवर्क के स्लीपर सेल की मदद से किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में थे। 12 जनवरी को दिल्ली के जनकपुरी, तिलक नगर, पश्चिम विहार समेत तकरीबन 12 जगहों पर खालिस्तान के समर्थन में लगे पोस्टर एक बड़ी साजिश का हिस्सा थे। इतना ही नहीं रेफरेंडम 2020 लिखकर माहौल खराब करने की कोशिश की गई थी। सूचना मिलते ही पुलिस ने इन पोस्टरों को हटाकर दिवारों पर पेंट किया। इससे पहले खालिस्तानी आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस ने भी वीडियो जारी करके दिल्ली में हमले की धमकी दी थी। लाल किले पर झंडा फहराने वाले को 5 मिलियन डॉलर का इनाम देने की बात भी कही थी। पुलिस सीसीटीवी कैमरों के जरिए इन पोस्टरों को लगाने वालों की पहचान करने में जुटी है। इन समर्थकों ने अंग्रेजी व गुरमुखी में खालिस्तान जिंदाबाद, एसएफजे, 1984, पंजाब बनेगा खालिस्तान और रेफरेंडम 2020 वोट फॉर खालिस्तान जैसे राष्ट्रविरोधी नारे लिखे गए थे।

ऑस्ट्रेलिया में खालिस्तानी समर्थकों ने तिरंगा लिए भारतीयों पर किया हमला
राजधानी दिल्ली ही नहीं ऑस्ट्रेलिया में भी खालिस्तानी समर्थक अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में कुछ खालिस्तानी समर्थकों ने राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को अपने हाथों में लेकर खड़े भारतीयों पर हमला किया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो रहा है। इस घटना में पांच लोग घायल हो गए जिनको अस्पताल में भर्ती किया गया है। ऑस्ट्रेलिया टुडे ने ट्वीट कर बताया कि मेलबर्न के फेडरेशन स्क्वायर में खालिस्तान समर्थकों के हमलों में पांच लोग घायल हो गए। वीडियो वायरल होने के बाद, भारतीय जनता पार्टी के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने ऑस्ट्रेलिया में खालिस्तानी समर्थक द्वारा भारत विरोधी गतिविधियों की कड़ी निंदा की है।

ऑस्ट्रेलिया पुलिस ने मेलबर्न में फेडरेशन स्क्वायर पर दो स्क्वायर से दो खालिस्तानी पकड़े
भाजपा नेता सिरसा ने कहा कि असामाजिक तत्व जो इन गतिविधियों से देश की शांति और सद्भाव को बाधित करने की कोशिश कर रहे हैं, उनसे सख्ती से निपटा जाना चाहिए और दोषियों को कानून के कटघरे में लाया जाना चाहिए। वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि कुछ छात्र तिरंगा झंडा लिए हुए खड़े हैं तभी वहां खालिस्तानी समर्थक अचानक आते हैं और तिरंगा झंडा लिए स्टूडेंट और कुछ लोगों को खदेड़ देते हैं और उन पर हमला कर रहे हैं वहीं खालिस्तान समर्थक अपना खुद का झंडा हाथ में लिए हैं। हिंदू ह्यूमन राइट्स ऑस्ट्रेलेशिया की निदेशक सारा एल गेट्स ने खालिस्तान समर्थकों के एक समूह द्वारा भारतीय राष्ट्रीय ध्वज ले जा रहे एक भारतीय युवक को खदेड़ते हुए ट्विटर पर वीडियो साझा किया। 

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पंजाब में एक नया भिंडरावाला दस्तक दे चुका है, केजरीवाल दिल्ली में चैन की बंसी बजा रहा है; दिल्ली

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ऑस्ट्रेलिया टुडे ने पहले बताया कि भारतीयों ने विक्टोरिया पुलिस को सूचित किया था कि उन्होंने देश में बढ़ती खालिस्तान समर्थक गतिविधियों के खिलाफ मेलबर्न में फेडरेशन स्क्वायर पर एक विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई थी। इस बीच हमले की निंदा करते हुए विक्टोरिया पुलिस ने बताया कि हिंसक हमले के बाद अब तक दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार किए गए दो लोगों की उम्र 30 साल के आसपास है और उन्हें दंगाई व्यवहार के लिए पेनल्टी नोटिस जारी किया गया है।