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बंगाल : ममता बनर्जी के एक और MLA ने चुनाव से पहले बढ़ा दी TMC की टेंशन, पक रही है सियासी खिचड़ी


पश्चिम बंगाल में ज्यों-ज्यों विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती ही नजर आ रही हैं। विपक्ष के निशाने छोड़िए तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो अपनी ही पार्टी के नेताओं के वाणों से बच नहीं पार रही है। एक के बाद एक टीएमसी के विधायक ममता सरकार को मुश्किलों में डालने में लगे हैं। पहले दो विधायक कबीर और इस्लाम में ममता की धड़कनें बढ़ाईं तो अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ही विधायक मनोरंजन बापरी ने पश्चिम बंगाल की सियासत में हलचल मचा दी है। उनके एक सोशल मीडिया पोस्ट पोस्‍ट ने चुनावी माहौल में टीएमसी की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इसमें उन्होंने भाजपा और सीपीआई(एम) दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं की विनम्रता और दरियादिली तहेदिल से तारीफ की है। हुगली जिले के बालागढ़ से टीएमसी विधायक बापरी ने अपनी पोस्ट में उन्होंने दो निजी अनुभवों का जिक्र किया है। एक में भाजपा कार्यकर्ता शामिल थे और दूसरे में सीपीआई(एम) के युवा कार्यकर्ता। यह बताने के लिए कि बीजेपी में शिष्टाचार और उदारता जैसे मूल्य राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर होते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि उनके निशाने पर टीएमसी है, जिसमें ऐसी विचारधारा दूर-दूर तक नजर नहीं आती।

भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताने का नैरेटिव तोड़ा

ममता बनर्जी की सियासी मुश्किलें अब विपक्ष के हमलों से नहीं, अपनी ही पार्टी की ज़ुबान से बढ़ रही हैं। तृणमूल के विधायक मनोरंजन बापरी का भाजपा कार्यकर्ताओं की “विनम्रता और दरियादिली” की खुलेआम तारीफ करना कोई सामान्य शिष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली चेतावनी है। इससे पहले हुमायूं कबीर और मोनिरुल इस्लाम जैसे विधायक अपने बयानों और कृत्यों से मुख्यमंत्री की किरकिरी करा चुके हैं। अब बापरी का यह सार्वजनिक बयान उस नैरेटिव को तोड़ता है, जिसमें भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताया जाता रहा। जब सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही विरोधी की छवि चमकने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि नेतृत्व की पकड़ ढीली पड़ रही है।

बीजेपी के कट्टर कार्यकर्ताओं से सम्मान मिलना गर्व और सम्मान की बात

टीएमसी विधायक बापरी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में जिस पहली घटना का जिक्र किया है, वह कुछ साल पहले की है। वह सेंट्रल कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की एक पार्टी मीटिंग से लौट रहे थे। वापस आते समय डंकुनी टोल प्लाजा पर भाजपा कार्यकर्ताओं के विरोध-प्रदर्शन के कारण उनकी गाड़ी रोक दी गई। बापारी ने अपनी पोस्ट में कहा, ‘मेरे असिस्टेंट पार्थ ने मुझसे गाड़ी से बाहर ना निकलने को कहा। मैंने उनकी बात नहीं मानी और मैं गाड़ी से बाहर निकला और भाजपा समर्थकों से उनके विरोध का कारण पूछा। उन्होंने मुझे पहचान लिया. बहुत ही नरमी से उन्होंने मुझसे माफी मांगी और मुझे आगे बढ़ने को कहा। मैं उनका कट्टर विरोधी हूं, इसके बावजूद विपक्षी बीजेपी के कट्टर कार्यकर्ताओं से सम्मान मिलना मेरे लिए बहुत ही गर्व और सम्मान की बात थी।’

‘मैंने तो बस अपनी पूरी जिंदगी लोगों का प्यार कमाया’

विधायक बापरी यह भी कहा कि ऐसे समय में जब अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के बीच झड़पें आम बात हो गई हैं। वे बिना किसी सुरक्षा के पूरे राज्य में घूमते हैं और कभी-कभी तो पब्लिक गाड़ियों में भी सफर करते हैं। मुझ पर कभी किसी ने हमला नहीं किया। मुझे नहीं लगता कि कोई कभी ऐसा करेगा। मैंने पूरी जिंदगी लोगों का प्यार कमाया है। दूसरी घटना जो उन्होंने बताई, वह रविवार की है, जब वह कोलकाता इंटरनेशनल बुक फेयर से पब्लिक गाड़ी से लौट रहे थे। यह समझते हुए कि हाल ही में घुटने की सर्जरी की वजह से मुझे खड़े होने में दिक्कत हो रही है। गाड़ी में बैठे तीन युवाओं में से एक ने मेरे लिए अपनी सीट खाली कर दी। शर्मिंदा होकर मैंने मना कर दिया। फिर उनमें से एक ने मुझसे कहा कि उसने मुझे पहचान लिया है। उसने यह भी कहा कि एक पक्के सीपीआई(एम) युवा कार्यकर्ता होने के नाते, वह और उसके दो दोस्त अक्सर मेरे अलग-अलग सोशल मीडिया पोस्ट पर मेरे साथ राजनीतिक चर्चा करते हैं। इसके बाद उनके साथ काफी देर तक बातचीत हुई। मैं उनकी कुछ बातों से सहमत हुआ और वे भी मेरी कुछ बातों से सहमत हुए। जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा हैरान किया, वह यह थी कि यह जानते हुए भी कि मैं तृणमूल कांग्रेस का विधायक हूं, उन्होंने मुझे बहुत इज्जत दी और मेरी तारीफ भी की।

सत्ता-संतुलन में खिसकने और सियासी खिचड़ी पकने के संकेत

यह घटनाक्रम केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन में खिसकन का संकेत है। राजनीतिक प्रेक्षकों की “सियासी खिचड़ी” वाली आशंका यूं ही नहीं उठी—टीएमसी के भीतर असंतोष, गुटबाज़ी और अवसरवाद अब खुले मंच पर दिखने लगे हैं। भाजपा के लिए यह अप्रत्याशित संजीवनी है, जो उसके कद को ऊंचा करती है और ममता बनर्जी को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल देती है। चुनावी मौसम से पहले पार्टी-अनुशासन का यह क्षरण बताता है कि ममता की ताकत अब विरोधियों से नहीं, अपने ही विधायकों की बयानबाज़ी से चुनौती पा रही है। सत्ता जब अपने ही शब्दों से कटने लगे, तो सियासत में उसका हिसाब जनता तय करती है। ममता की पार्टी के विधायक ने आगे दावा किया कि हालांकि उन्हें नहीं पता कि एक विधायक के तौर पर वह कितने सफल रहे, लेकिन उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि वह सम्मान है जो उन्हें आम लोगों से मिला है। चाहे उनकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी रही हो।

टीएमसी विधायक के बिगड़े बोल- ‘चुनाव आयोग को कब्र से बाहर खींच लाने’ की धमकी

 दरअसल, आज पश्चिम बंगाल की सीएम बनर्जी की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है, जहां सत्ता का संतुलन नहीं, बल्कि सत्ता की असहायता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। उनकी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठती वह बेलगाम आवाज़ें हैं, जो सरकार की साख, संवैधानिक मर्यादा और कानून-व्यवस्था तीनों को एक साथ चुनौती दे रही हैं। एक के बाद एक टीएमसी नेताओं के विवादित कदम यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी पर नियंत्रण खो चुकी हैं? क्या इस बार के विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए भारी मुश्किलों को सबब बनने जा रहे हैं? पश्चिम बंगाल में छात्राओं और महिलाओं के यौन शोषण के मामले में पहले ही टीएमसी नेताओं के नाम आ चुके हैं। पिछले महीने टीएमसी के विधायक रहे हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की राजनीति में बड़ा बवाल कर दिया। अब फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।

बाबरी मस्जिद विवाद: तुष्टिकरण की राजनीति का बोझ
पश्चिम बंगाल में कुछ महीने बाद ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। लेकिन राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति के लिए पिछला कुछ समय अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला साबित हो रहा है। पहले देशभर में चर्चित हुए संदेशखाली यौन प्रकरण में टीएमसी नेता का ही नाम आने से ममता बनर्जी को बगलें झांकने को मजबूर होना पड़ा था। एक बार फिर ममता के लिए मुश्किल की शुरुआत टीएमसी के पूर्व विधायक हुमायूं कबीर के उस दावे से हुई, जिसमें उन्होंने पिछले माह छह दिसंबर को पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद के निर्माण का शिलान्यास करा दिया। यह कोई साधारण कदम नहीं था, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक विस्फोट था, जिसने ममता बनर्जी को असहज कर दिया। वर्षों से तुष्टिकरण की राजनीति के सहारे सत्ता संभालने वाली मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर न तो खुलकर विरोध कर सकीं और न ही समर्थन करने का साहस दिखा पाईं। विरोध करतीं तो अपने वोट बैंक से नाराजगी का डर, समर्थन करतीं तो संवैधानिक और राजनीतिक संकट के साथ-साथ बहुसंख्यक वोट बैंक की नाराजगी। परिणामस्वरूप, चुप्पी को रणनीति बना लिया गया।

फरक्का विधायक का जहर और संवैधानिक संस्थाओं पर हमला
ममता बनर्जी की यही चुप्पी ही उनके गले की हड्डी बन गई है। उनकी पार्टी के नेता ही ऐसी हरकतें कर रहे हैं, जो उनके लिए चुनाव में काफी मुश्किलों का कारण बन सकती हैं। दरअसल, अब यह संकट एक और टीएमसी विधायक के बिगड़े बोल से एक बड़े स्तर पर पहुंच चुका गया है। फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम ने सीधे-सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को कब्र से खींच लाने की धमकी दे डाली है। दरअसल, मोनिरुल इस्लाम की खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर हमला है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। यह वही चुनाव आयोग है, जिसे लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है, लेकिन बंगाल में उसे खलनायक बनाने की कोशिश की जा रही है।

चुनाव आयोग के खिलाफ ममता सरकार का पुराना नैरेटिव
टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम का यह अनर्गल आरोप है कि चुनाव आयोग बंगाल के लोगों को परेशान कर रहा है। जबकि चुनाव आयोग सिर्फ एसआईआर का अपना काम कर रहा है, जिसे अदालत बने भी सही ठहराया है। लेकिन इसको लेकर तृणमूल सरकार के नेता और विधायक ऊल-जलूल बयानबाजी पर उतर आए हैं। दरअसल, यह वही पुराना नैरेटिव है, जिसे ममता बनर्जी बार-बार दोहराती रही हैं। हर संवैधानिक संस्था को ‘बाहरी हस्तक्षेप’ बताना, हर जांच को ‘राजनीतिक साजिश’ कहना। लेकिन जब यही भाषा धमकी और डंडे के जोर पर काम कराने तक पहुंच जाए, तो सवाल उठता है कि क्या यह सरकार लोकतंत्र में विश्वास रखती है या भीड़तंत्र में। ममता बनर्जी खुद भी कुछ दिन पहले आई-पैक पर प्रवर्तन निदेशालय के छापे के दौरान भीड़तंत्र का हिस्सा बनकर मौके पर जा पहुंची थी, और वहां के ग्रीन फाइल समेत कई अहम कागजात उठाकर ले आईँ थीं। इस पर कोर्ट ने भी नाराजगी जताई थी।

महिला सुरक्षा पर शर्मनाक चुप्पी, भ्रष्टाचार का गहराता दलदल

विडंबना यह है कि एक महिला मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाले राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े लगातार डराने वाले होते जा रहे हैं। यौन शोषण, बलात्कार, तस्करी और हिंसा के मामलों में पश्चिम बंगाल बार-बार सुर्खियों में रहा है। लेकिन ममता सरकार की प्रतिक्रिया या तो इनकार में होती है या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहती है। सत्ता के संरक्षण में पनपता अपराध और उस पर सरकारी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि शासन का संवेदनशील चेहरा अब खोखला हो चुका है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, पशु तस्करी, राशन घोटाला—ये कोई आरोप नहीं, बल्कि वे मामले हैं जिनमें ममता सरकार के मंत्री, विधायक और शीर्ष नेता जांच एजेंसियों के घेरे में आ चुके हैं। भ्रष्टाचार अब अपवाद नहीं, बल्कि शासन का स्थायी चरित्र बनता जा रहा है। ऐसे में पार्टी नेताओं की बेलगाम बयानबाज़ी सरकार की कमजोरियों को और उजागर करती है।

पत्थरों से भरी ट्रॉली, तेज धार हथियार, खास (हिंदुओं के) घर-दुकान निशाना: CM फडणवीस ने नागपुर हिंसा को बताया ‘साजिश’, कहा- पहले से थी तैयारी, DCP पर कुल्हाड़ी से हुआ हमला

भारत में जब कभी कहीं भी हिन्दू-मुस्लिम दंगा होने पर इनके आकाओं द्वारा 'गंगा-जमुनी तहजीब' जैसे ढोंगी फरेबी नारे लगाने वाले दंगाइयों को बाहरी कहकर बचने की कोशिश करते है। लेकिन कभी इनसे यह नहीं पूछा जाता कि आखिर किस के कहने पर बाहरी आए? इनको पत्थर और पेट्रोल बम किसने दिए? इन बाहरी दंगाइयों को कितने रूपए देकर बुलाया गया? अगर दंगाई बाहरी थे फिर स्थानीय लोगों ने उनको क्यों पनाह दी? अपने घरों पर पत्थर और पेट्रोल बम जमा किए? दंगाई बाहरी लोग थे या स्थानीय इसका खुलासा तभी होगा जब सरकार पुलिस को blind firing का आदेश देकर भेजे। blind firing पर जख्मी होने वालों से इस सच्चाई का खुलासा होगा कि दंगाई बाहरी है या स्थानीय। 

दूसरे, जिन घरों से पत्थर और पेट्रोल बम फेंके गए योगी आदित्यनाथ की तरह उन घरों पर बुलडोज़र चलाना चाहिए। और अगर कोई कोर्ट रोक लगाती है तो उसी समय कोर्ट से पूछा जाना चाहिए कि क्या दंगाइयों को ऐसे ही छोड़ दिया जाये? नकाब पहनकर दंगा करना क्या उचित है? अगर पुलिस को blind firing देकर दंगा-ग्रस्त इलाके में भेजा जाता DCP पर कुल्हाड़ी से हमला नहीं होता। पुलिस वालों के भी परिवार होता है। भेज दिया जाता है हाथ में डंडा लेकर जैसे ढोल पीटना हो। बहुत हुआ तो टियर गैस दे दी। जहाँ पेट्रोल बमों का इस्तेमाल हो रहा हो नकाब पहन पत्थरबाज़ी हो रही हो, वहां इस पुरानी सोंच को दरकिनार करना होगा।            
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नागपुर में हुई हिंसा को एक सोची-समझी साजिश करार दिया है। महाराष्ट्र की विधानसभा में बोलते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि नागुपर की हिंसा सुनियोजित थी और इसे अंजाम देने के लिए पहले से तैयारी की गई थी।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि हिंसा में 33 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें तीन डीसीपी शामिल हैं। एक डीसीपी पर तो कुल्हाड़ी से हमला किया गया, जो इसकी गंभीरता दिखाता है। पाँच आम नागरिक भी घायल हुए, जिनमें से तीन को अस्पताल से छुट्टी मिल गई, लेकिन एक अभी भी आईसीयू में है। उन्होंने खुलासा किया कि हिंसा वाली जगह से पत्थरों से भरी एक ट्रॉली मिली और तेज धार वाले हथियारों का इस्तेमाल हुआ। कुछ खास (हिंदुओं) घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया, जिससे साफ है कि यह सब पहले से प्लान था।

सीएम फडणवीस ने सख्त लहजे में कहा कि पुलिस पर हमला बर्दाश्त नहीं होगा और दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा। अब तक पाँच एफआईआर दर्ज की गई हैं और 50 लोगों को हिरासत में लिया गया है। नागपुर के 11 पुलिस थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया गया है। उन्होंने हिंसा की वजह औरंगजेब की कब्र को लेकर फैली अफवाह को बताया, जिसमें कहा गया कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल ने धार्मिक चीजें जलाईं। सीएम ने कहा, “छावा फिल्म ने औरंगजेब के खिलाफ गुस्सा भड़काया, लेकिन शांति बनाए रखना जरूरी है।” उन्होंने लोगों से अपील की कि कानून हाथ में न लें और पुलिस का साथ दें। जाँच जारी है ताकि इस साजिश का पूरा पर्दाफाश हो सके।

इस मामले में बीजेपी विधायक प्रवीण डटके ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि नागपुर में हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए यह हिंसा प्लान की गई थी। डटके ने हंसापुरी इलाके का जिक्र करते हुए बताया कि वहाँ की एक पार्किंग में हमेशा हिंदू और मुस्लिम अपनी गाड़ियाँ खड़ी करते थे, लेकिन 17 मार्च 2025 को एक भी मुस्लिम की गाड़ी नहीं थी। फिर उस पार्किंग में आग लगा दी गई। उन्होंने कहा, “जिन गाड़ियों, दुकानों और घरों को जलाया गया, वे सभी हिंदुओं के थे। मुस्लिमों का कोई नुकसान नहीं हुआ।” डटके ने इसे सुनियोजित साजिश बताया और कहा कि बाहरी लोग आए थे, जिन्होंने सीसीटीवी तोड़े ताकि सबूत मिट जाएँ। उनका दावा है कि यह हिंदुओं के खिलाफ टारगेटेड हमला था।

अवलोकन करें:-

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सोमवार (17 मार्च 2025) को नागपुर के कुछ इलाकों में मुस्लिमों ने हिंदुओं को निशाना बनाकर हमले किए। हिंदुओं के घरों पर पत्थरबाजी हुई। तलवार से हमले हुए, पेट्रोल बम की सहायता से गाड़ियाँ फूँकी गई और गाड़ियों में तोड़फोड़ भी की गई। इस दौरान पुलिसकर्मियों को भी निशाना बनाया गया, जिसके बाद प्रशासन ने पूरे इलाके में कर्फ्यू लागू कर दिया। कुछ समय तक इलाके में इंटरनेट सेवाओं को भी बंद कर दिया गया था, हालाँकि कुछ ही घंटों में इंटरनेट सेवाएँ बहाल कर दी गईँ।

केरल : सोना तस्करों की ‘पहचान’ सत्ताधारी विधायक केटी जलील ने बताई, कहा- ज्यादातर मुस्लिम, जारी हो फतवा: बताया- हज से लौटते समय कुरान में गोल्ड छिपाकर लाया था मौलवी

                         केटी जलील (बाएँ), प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: The Hindu/AI Bing)
केरल के गोल्ड स्मगलिंग मामले में हाल ही में एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसने राज्य की राजनीति में हंगामा खड़ा कर रहा है। मामला तब और गर्म हो गया जब सत्ताधारी पार्टी के नेता और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के विधायक के. टी. जलील ने मुस्लिम समुदाय पर गोल्ड स्मगलिंग में अधिक शामिल होने का आरोप लगाया। उनके इस बयान ने केरल की सियासत में हड़कंप मचा दिया है, खासकर मलप्पुरम जिले के संबंध में दिए गए उनके बयान को लेकर। क्या है ये पूरा विवाद, आइए आपको समझाते हैं।

दरअसल, केरल में सोना तस्करी का मामला तब और उछल गया जब LDF विधायक के. टी. जलील ने मुस्लिम समुदाय पर सोने की अधिक तस्करी में शामिल होने का आरोप लगाया और मजहबी नेताओं से सोना तस्करी के खिलाफ फतवा जारी करने की माँग की। जलील का बयान कोझिकोड हवाई अड्डे से पकड़े गए तस्करों के संदर्भ में आया, जिनमें अधिकांश मुस्लिम समुदाय से थे। जलील ने एक मौलवी पर सोना तस्करी का आरोप लगाते हुए कहा कि वह हज यात्रा से लौटते समय कुरान में छिपाकर सोना लाया था, हालाँकि उसके नाम का खुलासा नहीं किया गया है। 

पूरा मामला

 केरल में गोल्ड स्मगलिंग की घटनाएँ पिछले कुछ वर्षों में बढ़ी हैं, खासकर मलप्पुरम जिले के कोझिकोड हवाई अड्डे से। राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पहले ही इस मुद्दे पर बात कर चुके हैं। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि “आँकड़े बताते हैं कि मलप्पुरम जिले से भारी मात्रा में सोना और हवाला पैसे आ रहे हैं।” मुख्यमंत्री के इस बयान ने पहले ही विपक्ष को हमलावर बना दिया था। अब जलील के बयान ने इस आग में और घी डाल दिया है।

जलील ने अपने बयान में कहा कि “कोझिकोड एयरपोर्ट पर पकड़े जाने वाले अधिकतर लोग मुस्लिम होते हैं।” जलील ने यहाँ तक कहा कि मुस्लिम मजहबी नेताओं को लोगों को सोना तस्करी और हवाला लेन-देन से दूर रहने की सलाह देनी चाहिए। उन्होंने मुस्लिम लीग के नेताओं से अपील की कि वे सोना तस्करी के खिलाफ फतवा जारी करें, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह काम मजहब के खिलाफ है। 

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने दी तीखी प्रतिक्रिया

जलील के इस बयान ने खासकर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) और कॉन्ग्रेस को नाराज कर दिया। IUML के महासचिव पी. एम. ए. सलाम ने कहा कि जलील पूरे समुदाय को अपराधी बता रहे हैं, जो निंदनीय और खतरनाक है। उन्होंने माँग की कि जलील तुरंत अपने बयान के लिए माफी माँगें। IUML के अन्य नेताओं ने भी जलील पर हमला बोला, और कहा कि जलील ने केवल अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए इस तरह के बयान दिए हैं।
IUML के नेता सलाम ने कहा, “यह बयान समुदाय को बदनाम करने की साजिश है। यहाँ तक कि बीजेपी नेताओं ने भी ऐसा आरोप नहीं लगाया है।” वहीं कॉन्ग्रेस नेता वी. टी. बलराम ने जलील के बयान को “बेतुका” बताया और कहा कि अपराधों का मुकाबला फतवे के जरिए नहीं, बल्कि कानूनन किया जाना चाहिए। 

जलील की सफाई से संतुष्ट नहीं हुए लोग

बयान को लेकर हुए विवाद के बाद जलील ने सफाई पेश की। केटी जलील ने कहा कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा जो इस्लाम के खिलाफ हो। उनका मकसद केवल यह था कि मजहबी नेता लोगों को जागरूक करें कि सोना तस्करी और हवाला लेन-देन मजहब के खिलाफ हैं। “मैंने सिर्फ इतना कहा है कि अधिकतर लोग जो पकड़े जा रहे हैं, वे मुस्लिम हैं।”
जलील ने कहा कि उन्होंने पूरे समुदाय पर आरोप नहीं लगाया है, बल्कि उन्होंने सिर्फ यह बताया कि सोना तस्करी में शामिल अधिकतर लोग मुस्लिम समुदाय से हैं। उनका कहना था कि “समुदाय को यह समझना होगा कि यह गतिविधियाँ मजहब के खिलाफ हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने सिर्फ जागरूकता फैलाने के लिए मजहबी नेताओं से फतवे की माँग की है, और यह माँग इस्लामोफोबिया नहीं है।
इस पूरे विवाद में बीजेपी नेता वी. मुरलीधरन ने भी जलील पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि “जलील का बयान संविधान का अपमान है।” मुरलीधरन ने कहा कि देश में अपराधों के खिलाफ कानून बने हुए हैं, और इन कानूनों का आधार संविधान है, न कि कोई मजहबी कानून। उन्होंने यह भी कहा कि जलील का बयान संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और उन्हें इस मामले में सोच-समझकर बोलना चाहिए।
वहीं, बीजेपी के अलावा कॉन्ग्रेस नेताओं ने भी इस विवाद पर टिप्पणी की। कॉन्ग्रेस नेता शफी परम्बिल ने कहा, “भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और यहां किसी भी गैरकानूनी गतिविधि को फतवे के जरिए नहीं बल्कि कानूनी तरीके से सुलझाया जाना चाहिए।” उन्होंने कहा कि जलील का बयान समाज में एक गलत संदेश दे रहा है और यह देश के लोकतांत्रिक ढाँचे के खिलाफ है। 

गोल्ड स्मगलिंग में आ चुका है जलील का नाम, NIA ने की थी पूछताछ

यह पहली बार नहीं है कि जलील विवादों में घिरे हैं। 2020 में जब वह उच्च शिक्षा मंत्री थे, तब भी उन पर कस्टम विभाग ने एक मामले में पूछताछ की थी, जिसमें यूएई के वाणिज्य दूतावास के माध्यम से तस्करी का आरोप लगा था। उन पर कस्टम्स द्वारा सोने की तस्करी का मामला भी दर्ज किया गया था। उस समय भी जलील को ‘व्यक्ति विशेष’ के रूप में संदिग्ध माना गया था, और उन्हें राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) द्वारा भी पूछताछ के लिए बुलाया गया था।
केरल में सोना तस्करी का मामला एक बड़ा मुद्दा बन चुका है, खासकर मलप्पुरम जिले के संदर्भ में। जलील के बयान ने इस पूरे मामले ने केरल की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है, और यह देखना होगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद किस दिशा में जाता है।

ममता बनर्जी के MLA के सीने में धधक रहा ‘मुस्लिम राष्ट्र’, वही हर ताजेमुल के सीने में तालिबानी राज


पश्चिम बंगाल के उत्तरी दिनाजपुर स्थित चोपरा में एक महिला और एक पुरुष की सरेआम पिटाई की गई। वहाँ एक बड़ी भीड़ जमा दी, जब ‘त्वरित न्याय’ हो रहा था तब चारों तरफ से देख रही भीड़ इसके मजे ले रही थी। ताजेमुल नाम का ‘न्यायाधीश’ हाथ में डंडा लेकर ‘न्याय’ कर रहा था। वीडियो वायरल होने के बाद देश भर में इसकी कितनी भी निंदा हुई हो, स्थानीय TMC विधायक हमीदुल रहमान ने ‘इस्लामी मुल्क के अचार-विचार’ का हवाला देते हुए इस घटना का बचाव किया और पीड़िता को ही ‘दुष्ट जानवर’ बता दिया।

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल CV आनंद बोस ने इस मामले पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से रिपोर्ट तलब की है। उन्होने इसे एक बर्बर घटना करार दिया है। हिम्मत देखिए कि सत्ताधारी दल के विधायक को इस तक का भरोसा था कि उक्त महिला या उसके परिजन इस मामले में पुलिस तक नहीं जाएँगे, उन्होंने कह दिया कि सिर्फ मीडिया हल्ला मचा रहा है। इसका अर्थ है कि शरिया के अंतर्गत होने वाले इस न्याय से पीड़ित भी ‘संतुष्ट’ हैं, इसमें प्रशासन-न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

शरिया के सामने सरकार-कानून की कोई हैसियत नहीं

इसका दूसरा मतलब ये भी समझिए कि शरिया के कारण सब कोई खौफ में रहें और मुस्लिमों के लिए भारत सरकार, यहाँ की पुलिस या अदालतें सब ‘बाहरी ताकतें’ हैं। ताजेमुल पहले भी इस तरह के ‘न्याय’ कर चुका है। वीडियो में देखा जा सकता है कि उसने हाथ में बाँस से बनी छड़ी ले रखी है। उक्त महिला और पुरुष प्रेम संबंध में थे, इसीलिए उन्हें ये ‘सज़ा’ दी गई। ताजेमुल हक़ को गिरफ्तार कर के इस्लामपुर में ACJM की अदालत में पेश किया गया।

सचमुच पीड़िता की तरफ से कोई मामला नहीं दर्ज कराया गया, वीडियो देश भर में वायरल होने के बाद पुलिस ने ही स्वतः संज्ञान लेते हुए FIR दर्ज की। वैसे भी चुनावी हिंसा से पीड़ित भाजपा कार्यकर्ताओं की शिकायतों के साथ पुलिस क्या करती है, ये सबको पता है। उल्टे पीड़ित कार्यकर्ताओं को डराया-धमकाया जाता है, अतः उन्हें पलायन को मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में पश्चिम बंगाल में इस्लामी ताकतों के खिलाफ FIR दर्ज कराने वालों को छोड़ दिया जाता, ये शायद ही संभव हो।

भाजपा भी कह रही है कि जंगलराज कैसा होता है, ये हम पश्चिम बंगाल में देख सकते हैं। पार्टी का कहना है कि ताजेमुल हक़ उर्फ़ JCB संविधान को टुकड़े-टुकड़े कर रहा है। ऐसे समय में जब कॉन्ग्रेस और I.N.D.I. गठबंधन ने पूरा का पूरा चुनाव ही संविधान बचाने के नाम पर लड़ा हो, पश्चिम बंगाल में भारत के कानून को धता बता कर शरिया के तहत ‘सज़ा’ दिए जाने वाली घटना पर विपक्षी नेताओं की चुप्पी समझ में आती है। अगर वो कुछ बोलेंगे तो पता चल जाएगा कि कौन संविधान बदल रहा है।

सीरिया से लेकर तमिलनाडु तक, शरिया से शासन नई बात नहीं

ऐसा नहीं है कि शरिया अदालतों के उदाहरण हमारे पास नहीं हैं। हमने सीरिया में ISIS को देखा है कि वो कैसे अमेरिकी बंदियों को घुटने के बल बिठा कर उनका गला काट डालते हैं। हमने अफगानिस्तान में तालिबानियों को देखा है कि कैसे वो महिलाओं पर सरेआम कोड़े बरसाते हैं। हमने पाकिस्तान में देखा है कि कैसे ईशनिंदा के नाम पर किसी शख्स को ज़िंदा जला दिया जाता है। हमने बांग्लादेश में देखा है कैसे दुर्गा पूजा के पंडालों को ध्वस्त करते हुए भीड़ ‘काफिरों को सज़ा’ देने के लिए निकल पड़ती है।
और विदेश से उदाहरण क्यों लें? संविधान तो हमारे देश में भी बदला जा रहा है, शरिया चल रही है बहुत जगह। तमिलनाडु के तिरुचिरपल्ली स्थित श्रीरंगम के तिरुचेंदुराई में तो पूरे के पूरे गाँव पर ही वक्फ बोर्ड ने दावा कर दिया। गाँव में मंदिर भी था, उसको भी वो अपनी संपत्ति बताने लगे। कावेरी नदी के तट पर स्थित 1500 वर्ष पुराना सुंदरेश्वर मंदिर भी उनका हो गया, जिनका मजहब ही उतना पुराना नहीं है। सोचिए, कानून का ये लोग किस तरह दुरूपयोग करते हैं।
एक हिन्दू बेचारा जब अपनी जमीन बेचने चला तो प्रशासन से उसे एक नई बात पता चली – उसकी पूरी की पूरी 1.20 एकड़ जमीन वक्फ बोर्ड की है। उसे 20 पन्नों का दस्तावेज थमा दिया गया। तमिलनाडु का ही एक और उदाहरण लीजिए। पेरम्बलूर स्थित V कलाथुर गाँव में मुस्लिमों ने ‘अपने एरिया’ में हिन्दू शोभा यात्राओं पर ही प्रतिबंध लगा दिया। जहाँ वो बस गए, वो ‘उनका इलाका’ हो गया। वर्षों से ये वार्षिक त्योहार चला आ रहा था, लेकिन 2012 से मुस्लिमों को इससे आपत्ति हो गई और इसे बंद करा दिया गया।
मद्रास हाईकोर्ट को कहना पड़ा कि किसी खास क्षेत्र में कोई खास मजहब बहुलता में है तो इसका अर्थ ये नहीं है कि दूसरे धर्मों को अपना त्योहार न बनाने दिया जाए या शोभा यात्रा न निकालने दिया जाए। उच्च न्यायालय को धार्मिक असहिष्णुता की बात करनी पड़ी। क्या आपने कभी ये खबर सुना है कि किसी हिन्दू बहुल इलाके में ईद, गुरुपर्व या क्रिसमस मनाने से रोका गया हो? आखिर एक ही वर्ग को बार-बार सहिष्णुता का पाठ क्यों पढ़ाना पड़ता है, जब नैरेटिव बनाया जाता है एकदम इसका उलटा।

इतिहास में भी शरिया के कारण हुआ हिन्दुओं का नरसंहार

ऐसा आज से नहीं हो रहा है भारत में भी, यानी ये कोई नई बात नहीं है। आपको केरल में मोपला मुस्लिमों द्वारा बड़े पैमाने पर हिन्दुओं के नरसंहार वाला इतिहास पता होगा। ये हिन्दू समृद्ध थे, लेकिन उनका कत्लेआम हुआ, उनकी बहन-बेटियों का बलात्कार हुआ। उस दौरान केरल में ‘खिलाफत आंदोलन’ का एक नेता था वरियाकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी नाम का, जिसे स्वतंत्रता संग्राम का नायक बता कर पेश किया गया। जबकि वो शरिया कोर्ट चलाता था, कई गाँवों में इस्लामी नियम-कानून चलाता था।
यानी मोपला से लेकर चोपरा, तक – सोच वही है, समूह वही है और परिणाम वही हैं। ये वही पश्चिम बंगाल हैं, जहाँ की लगभग एक तिहाई जनसंख्या मुस्लिम हो चुकी है। ये वही पश्चिम बंगाल है, जहाँ बांग्लादेश और म्यांमार से बड़ी संख्या में घुसपैठिए लेकर बसाए जा रहे हैं। ये वही पश्चिम बंगाल है, जहाँ एक महिला विदेशी घुसपैठिया होने के बावजूद सरपंच बन जाती है। ये वही पश्चिम बंगाल है, जहाँ की सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते हैं।
ज़्यादा पीछे न जाएँ तो ये वही पश्चिम बंगाल है जहाँ बसीरहाट के संदेशखाली में शाहजहाँ शेख नाम का सत्ताधारी पार्टी का गुंडा अपने गुर्गों के साथ जनजातीय समाज की महिलाओं का यौन शोषण करता था। ये सब TMC के दफ्तर में किया जाता था। शाहजहाँ शेख का नाम राशन घोटाले में भी आया था, उसे गिरफ्तार करने गई ED टीम पर ही हमला कर के उसे भगा दिया गया। यही तो है ‘शरिया अदालत’, जहाँ पुलिस-प्रशासन या जाँच एजेंसियों का कोई काम नहीं।
और ज़्यादा पीछे भी चल ही लेते हैं। ये वही बंगाल है जिसका विभाजन ही मजहबी हिंसा की नींव पर हुआ था। 1946 के ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ में 10,000 से अधिक हिन्दुओं को मौत के मुँह में भेज दिया गया था। उस समय भी दंगाइयों को ‘मुस्लिम लीग’ के मुख्यमंत्री हुसैन सुहरावर्दी का समर्थन प्राप्त था। चूँकि तब बंगाल में 54% मुस्लिम थे और 44% हिन्दू, बहुमत में आकर वो क्यों भला अपना अलग मुल्क न बनाएँ, ये तो उनके खून में है। मार-काट कर उन्होंने अपना एक अलग मुल्क ले लिया।
16-19 अगस्त, 1946 के ये दिन कलकत्ता के लिए कत्ल के दिन थे। 16 अगस्त को ही ‘मुस्लिम लीग’ ने पाकिस्तान के गठन के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का ऐलान किया था। सुहरावर्दी पर आरोप लगा कि लालबाजार पुलिस थाने में जाकर उसने खुद ये सुनिश्चित किया कि दंगाइयों पर कार्रवाई न हो, पुलिस भी हिन्दुओं के खिलाफ हो। गोपाल पाठा जैसे वीर अगर उस वक्त इन दंगों के खिलाफ खड़े न होते और हिन्दुओं को प्रेरित न करते तो शायद आज बंगाल हिन्दूविहीन हो जाता।

माँ काली की भूमि को संतों ने सींचा, आज रामनवमी मनाना भी दूभर

थोड़ा और पीछे चलें, ताकि हम समझें कि पश्चिम बंगाल क्या से क्या हो गया। माँ काली की ये वही भूमि है जहाँ रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकाकंद का जन्म हुआ। ये वही भूमि है जहाँ 16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु जैसे महान कृष्णभक्त का जन्म हुआ। श्री अरविन्द ने अपने हिन्दू दर्शन से जिस भूमि को समृद्ध किया, लाहिरी महाशय के चमत्कारों की चर्चा जहाँ गूँजी, जहाँ हरिचंद ठाकुर ने भेदभाव मिटाया, जहाँ स्वामी प्रणवानन्द जैसे योगी की कर्मभूमि रही।
आज स्थिति अलग है। घुसपैठ और हिंसा के लिए कुख्यात पश्चिम बंगाल में आज रामनवमी जैसा त्योहार शांति से नहीं मनाया जा सकता। 2018 में रानीगंज, 2019 में आसनसोल, 2022 में शिवपुर और 2023 में हावड़ा के अलावा इस साल शक्तिपुर क्षेत्र में दंगे हुए। यानी, हिन्दू अपना त्योहार तक ठीक से नहीं बना सकते। शायद पश्चिम बंगाल में स्थिति अभी और भयंकर होने वाली है। हमीदुल रहमान जैसे लोग सत्ता में रहे तो कई ताजेमुल पैदा हो जाएँगे।
और भारत में जहाँ संविधान है, कानून है, यहाँ की पुलिस है, केंद्र-राज्य की सरकारें हैं और न्यायपालिका है – लेकिन इन सबके बावजूद वहाँ के विधायक बात करते हैं ‘इस्लामी मुल्क के अचार-विचार’ की बात करते हैं तो ये सवाल पूछा ही जाएगा कि क्या पश्चिम बंगाल इस्लामी मुल्क है? या फिर सत्ता में बैठे मुस्लिम ही एक और विभाजन का सपना देख रहे हैं। हर जगह इनकी सोच वही है, शिक्षा या सामाजिकता से ये बदलने वाली नहीं है – ये साबित हो चुका है।
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आतंकियों में डॉक्टर-इंजीनियर का पकड़ा जाना इसका उदाहरण है कि शिक्षा से इस्लामी सोच नहीं बदल सकती। जब संसद में शपथग्रहण के दौरान असदुद्दीन ओवैसी जैसे 5वीं बार सांसद चुने जाने के बावजूद ‘जय फिलिस्तीन’ कहते हैं तो हमें खिलाफत की बरबस ही याद आ जाती है। तुर्की में कौन खलीफा बैठे, इसका भारत से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन इसके बावजूद खून हिन्दुओं का बहाया गया। इस सोच से लड़ने की रणनीति क्या है, इसमें हर तरफ कन्फ्यूजन ही है, सैकड़ों वर्षों से यही संशय का माहौल हमारी भूमि को खंडित करता रहा है।

AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के घर पहुँची योगी की पुलिस, बाप-बेटे दोनों हैं ‘फरार’: पेट्रोल पम्प पर की थी मारपीट, सहयोगी इकरार हो चुका है गिरफ्तार; शेर की मांद में घुसकर धमकी दी है तो अब क्यों छुपे-छुपे फिर रहे हो?

दिल्ली और पंजाब में गुंडागर्दी से जनता को डराने वाली आम आदमी पार्टी का विधायक अमानतुल्लाह खान अपने बेटे अनस खान योगी के राज्य उत्तर प्रदेश में गुंडागर्दी कर क्यों फरार है? फिर victim card खेला जाएगा कि मुसलमान होने पर बेकसूर मुसलमान को योगी सरकार परेशान कर रही है। अमानतुल्लाह ने समझा विधायक हूँ कोई नहीं बोलेगा, लेकिन अब उत्तर प्रदेश में अपराध देखा जाता है, अपराधी का मजहब/धर्म नहीं। पेट्रोल पंप कर्मचारियों को मारने की धमकी देने से पहले सोंचना था कि जहां धमकी दी जा रही है वहां का मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल नहीं योगी आदित्यनाथ है। शेर की मांद में घुसकर धमकी दी है तो अब क्यों छुपे-छुपे फिर रहे हो?  
उत्तर प्रदेश पुलिस की एक टीम आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक अमानतुल्लाह खान की तलाश में उनके आवास पर पहुँची है। यूपी पुलिस को विधायक खान और उनके बेटे अनस खान की तलाश है। अनस खान ने हाल ही में एक पेट्रोल पम्प पर मारपीट की थी, इस मामले में यूपी पुलिस उसे तलाश रही है।

जानकारी के अनुसार, गुरुवार (16 मई, 2024) को उत्तर प्रदेश पुलिस की एक टीम अमानतुल्लाह खान के आवास पर पहुँची। यहाँ अमानतुल्लाह खान और उनका बेटा अनस खान को लेकर यूपी पुलिस ने तलाश की। दोनों ही घर पर नहीं मिले। विधायक पिता-पुत्र के खिलाफ गैर जमानती वारंट भी जारी किया जा चुका है।

अमानतुल्लाह खान और उनके बेटे अनस खान का फोन घटना के बाद बंद आ रहा है और वह गायब हैं। यूपी पुलिस ने उनके घर के बाहर नोटिस चस्पा कर दिया है। अमानतुल्लाह खान और उनके बेटे अनस खान के खिलाफ यह मामला पेट्रोल पम्प पर मारपीट के बाद दर्ज किया गया था।

यूपी पुलिस दोनो की तलाश में पहले भी उनके आवास पर दबिश दे चुकी है। 11 मई, 2024 को भी यूपी पुलिस इस मामले में नोटिस लेकर पहुँची थी। यहाँ तब भी अमानतुल्लाह खान और अनस नहीं मिले थे। पुलिस ने इस दिन भी नोटिस चस्पा किया था।

इस मामले में अमानतुल्लाह खान के एक करीबी इकरार अहमद को यूपी पुलिस ने सोमवार (13 मई, 2024) को गिरफ्तार किया था। बताया गया था कि इकरार अहमद अमानतुल्लाह खान का मैनेजर है और शाहीन बाग़ का रहने वाला है। जिस वक्त खान के बेटे अनस ने नोएडा के पेट्रोल पम्प पर मारपीट की, वह वहीं मौजूद था।

7 मई, 2024 को नोएडा के सेक्टर-95 स्थित विधायक का बेटा अनस पेट्रोल पंप पर अपनी कार लेकर पहुँचा था, जहाँ वहाँ उसने लाइन में आगे लगी गाड़ी को आगे बढ़ा कर अपनी गाड़ी में पहले तेल भरने की ज़िद की। सेल्समैन ने नियम का उल्लंघन करने से नकार दिया। इस दौरान अनस और कार में बैठे उसके साथियों ने मारपीट शुरू कर दी।

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जिस पेट्रोल पंप पर AAP विधायक अमानतुल्लाह-अनस ने की गुंडागर्दी वो बलिदानी सैनिक की विधवा का: मैने

इसके बाद खुद विधायक अमानतुल्लाह खान वहाँ पहुँचे और उन्होंने पेट्रोल पंप के मैनेजर को धमकाया। दोनों ही घटनाओं का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। यूपी पुलिस ने इस मामले में FIR दर्ज करके अनस खान की तलाश चालू कर दी थी। इससे पहले अलीगढ़ में भी अनस खान मारपीट कर चुका है।

सांसद साध्वी प्रज्ञा को जिस कांग्रेसी MLA ने जिंदा जलाने की दी थी धमकी, कोरोना वायरस से हुई मौत

गोवर्धन डांगी साध्वी प्रज्ञामध्य प्रदेश के कांग्रेस विधायक गोवर्धन डांगी का गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल में देहांत हो गया। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस ने ट्वीट किया कि ब्यावरा के विधायक गोवर्धन डांगी ने कोरोनो वायरस संक्रमण के कारण दम तोड़ दिया।
संस्कृत में कहते हैं "ईश्वरम यत करोति, शोभनम एव करोति", हिन्दी में कहते हैं "भगवान जो करता है, अच्छा ही करता है" और अंग्रेजी में कहते हैं "It's all for the best", कहने का अभिप्राय यह है कि इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने बेकसूर साधु-संतों को जेलों में डाल, उनकी सात्विकता भंग करने का परिणाम पहले भी 2019 चुनाव के दौरान आया था और दूसरा अब। चुनाव के दौरान साध्वी ने जब एक प्रेस वार्ता में ATS अधिकारी करकरे की मृत्यु पर उनकी प्रसन्नता का कारण पूछने पर मिले जवाब पर विपक्ष तिलमिला कर चुनाव आयोग के पास भागा और जनता में एक मृतक के लिए प्रसन्नता व्यक्त करने पर साध्वी के विरुद्ध माहौल बनाने का असफल प्रयास किया था। लेकिन तब साध्वी ने बेकसूर होते हुए जो यातनाएं झेली थी, उन सबका जिम्मेदार करकरे ही था। दूसरे, अब जिस साध्वी को कांग्रेस विधायक जिन्दा जलाने को बेचैन थे, कोरोना के कारण वह भी हट गए। विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता।     
मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता सैद जाफ़र ने कहा,
“डांगी कुछ दिन पहले कोविड-19 पॉजिटिव पाए गए थे। उन्हें भोपाल के चिरायु मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। तबीयत खराब होने के बाद उन्हें गुरुग्राम के एक अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया था। मंगलवार (15 सितंबर, 2020) सुबह उनका निधन हो गया।”

साध्वी प्रज्ञा को जिन्दा जलाने की दी थी धमकी 
दिवंगत कांग्रेस विधायक गोवर्धन डांगी ने भारतीय जनता पार्टी की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को जिंदा जलाने की खुलेआम धमकी दी थी। नवंबर 2019 में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को ‘आतंकवादी’ कहे जाने के एक दिन बाद, ब्यावरा कांग्रेस के विधायक, गोवर्धन डांगी ने भोपाल के सांसद को धमकी देते हुए कहा था कि वह उन्हें जिंदा जला देंगे।
ब्यावरा के विधायक गोवर्धन डांगी ने तब कहा था:
“अगर वो मध्य प्रदेश की धरती पर कदम रखेंगी तो हम सिर्फ उनका पुतला नहीं जलाएँगे… हम उन्हें भी जिंदा जलाएँगे।”
इस धमकी के बाद, भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा भोपाल में एक पुलिस स्टेशन के बाहर धरने पर बैठी थीं। उनकी माँग थी कि कांग्रेस के विधायक गोवर्धन डांगी के खिलाफ FIR दर्ज की जाए। लेकिन तब राज्य में कमलनाथ की सरकार थी और सांसद की माँग को थाने में अनसुना कर दिया गया था।

कांग्रेस मुख्यालय में सुसाइड, सर्वेंट क्वार्टर में मिला शव: MLA कृष्णा पूनिया के घर पहुँची CBI

कॉन्ग्रेस सुसाइड
दिल्ली के 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय के एक कर्मचारी ने सुसाइड कर लिया। वहीं राजस्थान के चूरू जिले के सादुलपुर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया के घर पर सोमवार(जुलाई 20, 2020) को केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने छापेमारी की।
कांग्रेस ऑफिस में कर्मचारी का शव सर्वेंट क्वार्टर में मिला। समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक, कर्मचारी ने रविवार (जुलाई 19, 2020) को सर्वेंट रूम में जाकर आत्महत्या कर ली। अभी तक की जानकारी के मुताबिक मौके से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। आत्महत्या की वजह भी सामने नहीं आ पाई है। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच कर रही है।
इधर एसएचओ विष्णुदत्त विश्नोई सुसाइड मामले में पूछताछ के लिए सीबीआई की टीम कृष्णा पूनिया के घर पर पहुँची। बताया जा रहा है कि सीबीआई की टीम ने पूरे बंगले को घेर लिया था। फिलहाल पूनिया होटल फेयरमाउंट में कांग्रेस के अन्य विधायकों के साथ मौजूद हैं। छापेमारी के समय को लेकर सवाल उठ रहे हैं।


इसी साल 23 मई को विश्नोई ने कमरे में फंदे से लटककर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था। इस घटना के बाद राजनीति भी गरमा गई थी, क्योंकि स्थानीय कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया पर विश्नोई को प्रताड़ित करने के आरोप लगे थे। 
हालाँकि, पूनिया ने इन सभी आरोपों से इनकार कर दिया था। वहीं, विश्नोई के परिजनों ने भी विरोध जताते हुए शव लेने से इनकार कर दिया था और उनकी रिपोर्ट पर राजगढ़ थाने में आईपीसी की धारा 306 के तहत मामला दर्ज किया गया था। इस घटना की सीबीआई जाँच की माँग की गई थी।
थाने के स्टाफ ने भी स्थानीय कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया और उनके समर्थकों पर झूठी शिकायतें करने का आरोप लगाया है। इसी मामले में कृष्णा पूनिया से सीबीआई पूछताछ करना चाह रही है।
कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया को हाल ही में राज्य सरकार ने जेड श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करवाई है। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि खुफिया विभाग की ओर से जारी आदेश के बाद विधायक और उनके पति को सुरक्षा प्रदान की गई है। गहलोत सरकार ने कांग्रेस विधायक को मिल रही धमकियों के मद्देनजर यह फैसला लिया था। हालाँकि पूनिया को जेड सुरक्षा देने की प्रदेश सरकार के फैसले पर सोशल मीडिया में लोगों ने काफी आपत्ति जताई थी।
विष्णुदत्त विश्नोई की आत्महत्या के बाद थाने के पुलिसकर्मियों ने सामूहिक तबादले की गुहार लगाई थी। उन्होंने पत्र में लिखा था कि राजगढ़ थाने में तैनात सभी लोग डरे हुए और इस घटना से दुखी हैं। उनका मनोबल टूट गया है। इसलिए उन सभी का कहीं और सामूहिक तबादला कर दिया जाए।
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